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ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

६५६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

**ब्रह्माजी बोले—**जगदीश्वर ! आपकी जय हो, जय हो। आपके चरणोंकी सभी वन्दना करते हैं। आप निर्गुण, निराकार और स्वेच्छामय हैं। सदा भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये ही दिव्य विग्रह धारण करते हैं और वह श्रीविग्रह नित्य है। मायासे गोपवेष धारण करनेवाले मायापते ! आपकी वेश-भूषा तथा शील-स्वभाव सभी सुन्दर एवं मनोहर हैं। आप शान्त तथा सबके प्राणवल्लभ हैं। स्वभावतः इन्द्रिय-संयम और मनोनिग्रहसे सम्पन्न हैं। नितान्त ज्ञानानन्दस्वरूप, परात्परतर, प्रकृतिसे परे, सबके अन्तरात्मा, निर्लिप्त, साक्षिस्वरूप, व्यक्ताव्यक्तरूप, निरञ्जन, भूतलका भार उतारनेवाले, करुणासागर, शोक-संतापनाशन, जरा-मृत्यु और भय आदिको हर लेनेवाले, शरणागतरक्षक, भक्तोंपर दया करनेके लिये व्याकुल रहनेवाले, भक्तवत्सल, भक्तोंके संचित धन तथा सच्चिदानन्दस्वरूप हैं; आपको नमस्कार है। सबके अधिष्ठाता देवता तथा प्रीति प्रदान करनेवाले प्रभुको सादर नमस्कार है।

इस तरह बारंबार कहते हुए ब्रह्माजी प्रेमावेशसे मूर्च्छित हो गये। जो ब्रह्माजीद्वारा किये गये इस स्तोत्रको एकाग्रचित्त होकर सुनता है, उसके सम्पूर्ण अभीष्ट पदार्थोंकी सिद्धि होती है; इसमें संशय नहीं है।

इस प्रकार स्तुति और बारंबार प्रणाम करके जगद्विधाता ब्रह्माजी सचेत हो धीरे-धीरे उठे और पुनः भक्तिभावसे बोले।

**ब्रह्माजीने कहा—**देवदेवेश्वर ! उठिये। परमानन्दकारण ! सानन्द, नित्यानन्दमय नन्दनन्दन ! आपको नमस्कार है। नाथ ! नन्दभवनमें पधारिये और वृन्दावनको छोड़िये। सौ वर्षोंके लिये जो सुदामका शाप प्राप्त हुआ है, उसको स्मरण कीजिये। भक्तके शापको सफल बनानेके लिये प्रियाजीको उतने समयके लिये त्याग दीजिये। फिर इन्हें पाकर आप गोलोकमें पधारियेगा। देव ! आप पिताके घर जाकर वहाँ आये हुए अक्रूरजीसे मिलिये। वे आपके पितृव्य (चाचा), माननीय अतिथि तथा धन्यवादके योग्य सर्वसमर्थ वैष्णव हैं। भगवन् ! अब उनके साथ मधुपुरीकी यात्रा कीजिये। हरे ! वहाँ शिवके धनुषको तोड़िये और शत्रुगणोंको हतोत्साह कीजिये—मार भगाइये। दुरात्मा कंसका वध कीजिये और पिता-माताको सान्त्वना दीजिये। द्वारकापुरीका निर्माण कीजिये, भूतलका भार उतारिये, भगवान् शंकरकी वाराणसीपुरीको दग्ध कीजिये और इन्द्रके भवनपर भी धावा बोलिये। युद्धमें शिवजीको जृम्भास्त्रसे जृम्भित करके बाणासुरकी भुजाओंको काटिये। नाथ! इससे पहले आपको रुक्मिणीका हरण, नरकासुरका वध तथा सोलह हजार राजकुमारियोंका पाणिग्रहण करना है। व्रजेश्वर ! अब इन प्राणतुल्या प्रियतमाको छोड़िये और व्रजमें चलिये। उठिये, उठिये, आपका कल्याण हो। जबतक राधाकी नींद नहीं टूटती है; तभीतक चल दीजिये।

इतना कहकर ब्रह्माजी इन्द्र आदि देवताओंके साथ ब्रह्मलोकको चले गये। साथ ही शेषनाग तथा शंकरजी भी अपने स्थानको पधारे। देवताओंने श्रीकृष्णके ऊपर प्रेम और भक्तिसे पुष्प और चन्दनकी वर्षा की। फिर आकाशवाणी हुई—‘प्रभो ! कंस वधके योग्य है; अतः उसका वध कीजिये; अपने माता-पिताको बन्धनसे छुड़ाइये और पृथ्वीके भारका निवारण कीजिये।’ नारद ! इस प्रकार आकाशवाणी सुनकर भूतभावन भगवान् श्रीकृष्ण भगवती राधाको छोड़कर धीरे-धीरे वहाँसे उठे। बारंबार पीछेकी ओर देखते हुए श्रीहरि कुछ दूरतक गये; फिर चन्दनवनमें वासस्थानके पास ही थोड़ी देरके लिये ठहर गये। उधर राधा निद्रा त्यागकर अपनी शय्यासे उठ बैठीं और शान्त, कान्त, प्राणवल्लभ श्रीहरिको वहाँ न देख विलाप करती हुई बोलीं—‘हा नाथ! हा रमणश्रेष्ठ ! हा प्राणेश्वर !

९८- श्रीकृष्णकी दृष्टि पड़ते ही कुब्जाका सहसा अनुपम शोभा और रूप-यौवनसे लक्ष्मीके समान रमणीय हो जाना

श्रीकृष्णजन्मखण्ड

६५७


हा प्राणवल्लभ! हे प्राणचोर प्रियतम! तुम कहाँ गये?' फिर एक क्षणतक अन्वेषण करती हुई वे मालतीवनमें घूमती फिरीं। कभी क्षणभरके लिये बैठ जातीं, कभी उठ जातीं और कभी भूतलपर सो जाती थीं। कुछ क्षणोंतक अत्यन्त उच्चस्वरसे बारंबार रोदन और विलाप करती रहीं। 'हे नाथ! आओ-आओ' ऐसा बारंबार कहकर वे संतापसे मूर्च्छित हो गयीं। विरहानलसे संतप्त हो घास-फूससे ढके हुए भूतलपर इस तरह गिरीं, मानो प्राणान्त हो गया हो।

ब्रह्मन्! उस समय वहाँ अगणित गोपियाँ आ पहुँचीं। किन्हींके हाथोंमें चँवर थे और कोई चन्दनका अनुलेपन लिये आयी थीं। उन सबके बीच जो प्रियाली (प्यारी सखी) थी, उसने श्रीराधाको अपनी छातीसे लगा लिया। वह प्रियाजीको मरणासन्न-सी देख प्रेमसे विह्वल हो रोने लगी। उसने पङ्कके ऊपर सजल कमलदल बिछाकर उसपर श्रीराधाको सुलाया। वे चेष्टाहीन और मृतक-सी जान पड़ती थीं। गोपियाँ सुन्दर श्वेत चँवर डुलाती हुई उनकी सेवामें लग गयीं। उनके अङ्गोंमें चन्दनका लेप किया। उस अवस्थामें सती राधाके वस्त्र गीले हो गये थे। इतनेमें ही श्रीकृष्ण वहाँ लौट आये और अपनी उन प्राणवल्लभाको पूर्वोक्त अवस्थामें देखा। नारद! जब वे पास आने लगे तो बलवती गोपियोंने उन्हें रोक दिया और उन्हें इस तरह पकड़कर ले आयीं, जैसे राजभय आदिसे प्रेरित हो किसी दण्डनीय अपराधीको बाँधकर लाया गया हो। निकट आकर कृपानिधान श्रीकृष्णने राधाको गोदमें बिठा लिया, उन्हें सचेत किया और प्रबोधक वचनोंद्वारा समझाया। होशमें आकर देवी राधाने जब प्राणवल्लभको देखा, तब वे सुस्थिर हो गयीं और उन्होंने विरह-ज्वरको त्याग दिया। उस समय राधाकी चतुर सखी रत्नमालाने जो सबके द्वारा सम्मानित थी, श्रीकृष्णसे नीतिका सारभूत परम उत्तम मधुर वचन कहा।

रत्नमाला बोली—श्रीकृष्ण! सुनो। मैं ऐसी बात बताती हूँ, जो परिणाममें सुख देनेवाली, हितकारक, सत्य, नीतिका सारभूत तथा पति-पत्नीमें प्रीति बढ़ानेवाली है। वह नीतिसम्मत, वेदों और पुराणोंद्वारा अनुमोदित, लोक-व्यवहारमें प्रशंसनीय तथा उत्तम यशकी प्राप्ति करानेवाली है। नारियोंको जैसे माता प्यारी होती है, उसी तरह बन्धुजनोंमें भाई प्रिय होता है। भाईसे प्रिय पुत्र और पुत्रसे प्रिय पति होता है। साध्वी स्त्रियोंके लिये सत्पुरुषोंद्वारा समादृत स्वामी सौ पुत्रोंसे भी अधिक प्रिय होता है। रसिका और चतुरा स्त्रियोंके लिये पतिसे बढ़कर प्यारा दूसरा कोई नहीं है। इस मिथ्या संसारमें पति-पत्नीकी परस्पर प्रीति, समता तथा प्रेम-सौभाग्य परम अभीष्ट है। जिस-जिस घरमें पति-पत्नी एक-दूसरेके प्रति समभाव नहीं रखते, वहीं दरिद्रताका निवास है। वहाँ उन दोनोंका जीवन निष्फल है*। स्त्रीके लिये स्वामीसे मतभेद या फूट होना महान् दुःखकी बात है। वैसा जीवन शोक और संतापका बीज तथा मरणसे भी अधिक कष्टदायक है। सोते और जागते समय भी स्त्रियोंके प्राण पतिमें ही बसते हैं। पति ही इहलोक और परलोकमें स्त्रीका गुरु है। नाथ! ज्यों ही आप यहाँसे गये त्यों ही राधाको मूर्च्छा आ गयी। ये सहसा घाससे ढकी हुई भूमिपर गिर पड़ीं। उस समय मैंने इनके मुँहपर उत्तम शीतल जलका छींटा दिया, तब इनकी साँस चलने लगी और कुछ-कुछ चेतना आयी। मेरी सखी क्षण-क्षणमें पुकार उठती


*दम्पत्योः समता नास्ति यत्र यत्र हि मन्दिरे। अलक्ष्मीस्तत्र तत्रैव विफलं जीवनं तयोः॥
(६९।६४)

९९- मथुरामें मालीको श्रीकृष्णका दास्यभावका वरदान देना

६५८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण


थीं—'हे नाथ! हे कृष्ण!' फिर दूसरे ही क्षण संतप्त हो रोने लगतीं और तत्काल मूर्च्छित हो जाती थीं। राधिकाका शरीर विरहाग्निसे संतप्त हो तपायी हुई लोहेकी छड़ीके समान अग्नितुल्य हो गया था; इसे छूआ नहीं जाता था। राधाके लिये सोने और जागनेमें, दिन और रातमें, घर और वनमें, जल, थल और आकाशमें तथा चन्द्रोदय और सूर्योदयमें कोई भेद नहीं रह गया है। इनकी आकृति मृतकतुल्य एवं जडवत् हो गयी है। ये एक ही स्थानपर रहकर सदा सम्पूर्ण जगत्‌को विष्णुमय देखती हैं। चिकने पङ्कपर कमलोंके सजल पत्र बिछाकर जो शय्या तैयार की गयी थी; उसपर ये आपके लिये विरहातुर होकर सोयी थीं। प्यारी सखियाँ निरन्तर श्वेत चँवर डुलाकर सेवा करने लगीं। इनके अङ्गोंपर चन्दनमिश्रित जल छिड़का गया। इनके सारे वस्त्र गीले हो गये, तथापि राधाके अङ्गोंका स्पर्श होनेमात्रसे वहाँका सारा पङ्क सूख गया। स्निग्ध कमलदल तत्क्षण जलकर भस्म हो गये। चन्दन सूख गया। राधाका चम्पाके समान कान्तिमान् सुनहरा वर्ण केशके रंगकी भाँति काला पड़ गया। सिन्दूरके सुन्दर बिन्दु तत्काल श्याम हो गये। वेश-भूषा, विलास, लीला एवं क्रीड़ा छूट गयी। कमलाकान्त कृष्ण! यदि आप शीघ्र लौटकर नहीं आयेंगे तो आपके वियोगमें मेरी सखी निश्चय ही अपने प्राणोंका परित्याग कर देगी। अतः नीतिविशारद श्रीकृष्ण! आप मन-ही-मन विचारकर जो उचित हो वह करें, जिससे आपके प्रति अनुरक्त अबलाकी हत्या न हो।

रत्नमालाकी यह बात सुनकर माधव हँस पड़े और हितकर, सत्य, नीतिसार एवं परिणाममें सुखद वचन बोले।

श्रीभगवान्‌ने कहा— प्रिये रत्ने! यद्यपि मैं ईश्वर हूँ और मिलनमें बाधा डालनेवाले शापका खण्डन कर सकता हूँ, तथापि ऐसा करना मेरे लिये उचित नहीं है। मैं नियतिके नियमको बदला नहीं करता हूँ। समस्त ब्रह्माण्डोंमें मैंने जो मर्यादा स्थापित की है, उसीका सहारा लेकर देवता, मुनि और मनुष्य कर्म करते हैं (फिर उसको मैं ही कैसे तोड़ दूँ)। सुन्दरि! सुदामके शापसे हम दोनों दम्पतिको परस्पर जो कुछ समयके लिये वियोग प्राप्त होनेवाला है, वह यद्यपि हमें अभीष्ट नहीं है, तथापि होकर ही रहेगा। सुमध्यमे! मैं राधाको वर देता हूँ। उस वरके अनुसार जाग्रत्-अवस्थामें ही इन्हें मुझसे वियोगका अनुभव होगा; परंतु स्वप्नमें राधाको निरन्तर मेरा आलिङ्गन प्राप्त होता रहेगा। मैंने प्रियाजीको आध्यात्मकी बुद्धि प्रदान की है। उससे इनका शोक मिट जायगा। रत्नमाले! तुम्हारा कल्याण हो। तुम राधाको समझाओ। अब मैं नन्दभवनको जा रहा हूँ।

नारद! यों कहकर जगदीश्वर श्रीकृष्ण नन्दभवनकी ओर चल दिये और सखियाँ राधाको समझाने लगीं। घर जाकर श्यामसुन्दरने माता-पिताको प्रणाम किया। माताने उन्हें गोदमें बिठा लिया और तुरंतका तैयार किया हुआ माखन खिलाया। फिर शीतल जल पीकर उन्होंने माताका दिया हुआ पान खाया और वहीं माँके समीप बैठे रहे। समस्त गोपसमूह श्वेत चँवर डुलाकर उनकी सेवा करने लगे। उन्होंने भी श्यामसुन्दरको प्रसन्नतापूर्वक हार, चन्दन और ताम्बूल दिये।

\hfill (अध्याय ६८-६९)


१००- श्रीकृष्णद्वारा कंस-वध

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६५९

अक्रूरजीके शुभ स्वप्न तथा मङ्गलसूचक शकुनका वर्णन, उनका रासमण्डल और वृन्दावनका दर्शन करते हुए नन्दभवनमें जाना, नन्दद्वारा उनका स्वागत-सत्कार, उन्हें श्रीकृष्णके विविध रूपोंमें दर्शन, उनके द्वारा श्रीकृष्णकी स्तुति तथा श्रीकृष्णको मथुरा चलनेकी सलाह देना, गोपियोंद्वारा अक्रूरका विरोध और उनके रथका भञ्जन, श्रीकृष्णका उन्हें समझाना और आकाशसे दिव्य रथका आगमन

भगवान् नारायण कहते हैं—नारद! कंससे ब्रजमें जानेकी आज्ञा पाकर अक्रूरजी अपने घर गये और उत्तम मिष्टान्न खाकर शय्यापर सोये। उन्होंने सुवासित जल पीकर कपूर मिला हुआ पान खाया और सुखपूर्वक निद्रा ली। तदनन्तर रातके पिछले पहरमें जब कि बाजे आदिकी ध्वनि नहीं होती थी; उन्होंने एक सुन्दर सपना देखा। ऐसा सपना, जिसकी पुराणों और श्रुतियोंमें प्रशंसा की गयी है। अक्रूरजी नीरोग थे। उनकी शिखा बँधी हुई थी। उन्होंने दो वस्त्र धारण कर रखे थे। वे सुन्दर शय्यापर सोये थे। उनके मनमें उत्तम स्नेह उमड़ रहा था और वे चिन्ता तथा शोकसे रहित थे।

मुने! उन्होंने स्वप्नमें पहले एक ब्राह्मण-बालकको देखा, जिसकी किशोर अवस्था और अङ्गकान्ति श्याम थी। वह दो भुजाओंसे विभूषित था। उसके हाथोंमें मुरली थी। वह पीत वस्त्र धारण करके वनमालासे सुशोभित था। उसके सारे अङ्ग चन्दनसे चर्चित थे। मालतीकी माला उसकी शोभा बढ़ाती थी। वह भूषणके योग्य और उत्तम मणिरत्ननिर्मित आभूषणोंसे विभूषित था। उसके मस्तकपर मोरपंखका मुकुट शोभा दे रहा था। मुखपर मन्द मुस्कानकी प्रभा फैल रही थी और नेत्र कमलोंकी शोभाको लज्जित कर रहे थे। इसके बाद उन्होंने पति और पुत्रोंसे युक्त, पीताम्बरधारिणी तथा रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित एक सुन्दरी सतीको देखा, जिसके एक हाथमें जलता दीपक था और दूसरेमें श्वेत धान्य। उसका मुख शरद्-ऋतुके चन्द्रमाको तिरस्कृत कर रहा था। वह सुन्दरी सती मुस्कराती हुई वर देनेको उद्यत थी। इसके बाद उन्हें शुभाशीर्वाद देते हुए एक ब्राह्मण, श्वेत कमल, राजहंस, अश्व तथा सरोवरके दर्शन हुए। उन्होंने फल और फूलोंसे लदे हुए आम, नीम, नारियल, विशाल आक और केलेके वृक्षका सुन्दर एवं मनोहर चित्र भी देखा। उन्हें यह भी दिखायी दिया कि सफेद साँप मुझे काट रहा है और मैं पर्वतपर खड़ा हूँ। उन्होंने कभी अपनेको वृक्षपर, कभी हाथीपर, कभी नावपर और कभी घोड़ेकी पीठपर बैठे देखा। कभी देखा कि मैं वीणा बजा रहा हूँ और खीर खा रहा हूँ। कमलके पत्तेपर परोसा हुआ प्रिय अन्न दही, दूधके साथ ले रहा हूँ। कभी देखा कि मेरे अङ्गोंमें कीड़े और विष्ठा लग गये हैं और मैं रोता-रोता मोहित हो रहा हूँ। कभी उन्हें अपने हाथोंमें श्वेत धान्य और श्वेत पुष्प दिखायी दिया तथा कभी उन्होंने अपने-आपको चन्दनसे चर्चित देखा। कभी अपने-आपको अट्टालिकापर और कभी समुद्रमें देखा। शरीरमें रक्त लगा है; अङ्ग-अङ्ग छिन्न-भिन्न एवं क्षत-विक्षत हो रहा है और उसमें मेद तथा पीब लिपटे हुए हैं—यह बात देखनेमें आयी। तदनन्तर चाँदी, सोना, उज्ज्वल मणिरत्न, मुक्ता, माणिक्य, भरे हुए कलशका जल, बछड़ासहित गौ, साँड़, मोर, तोता, सारस, हंस, चील, खंजरीट, ताम्बूल, पुष्पमाला, प्रज्वलित अग्नि, देवपूजा, पार्वतीकी प्रतिमा, श्रीकृष्णकी प्रतिमा, शिवलिङ्ग, ब्राह्मण-

६६० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

बालिका, सामान्य बालिका, फली और पकी हुई खेती, देवस्थान, सिंह, बाघ, गुरु और देवताके दर्शन हुए।

ऐसा स्वप्न देख प्रातःकाल उठकर उन्होंने इच्छानुसार आह्निक कृत्योंका सम्पादन किया। इसके बाद उद्धवसे स्वप्नका सारा वृत्तान्त कहा और उनकी आज्ञा ले गुरु एवं देवताकी पूजा करके मन-ही-मन श्रीकृष्णका ध्यान करते हुए वहाँसे यात्रा की। नारद! रास्तेमें भी उन्हें ऐसे ही मङ्गलयोग्य, शुभदायक, मनोवाञ्छित फल देनेवाले, रमणीय तथा मङ्गलसूचक शकुन अपने सामने दृष्टिगोचर हुए। बायीं तरफ उन्हें मुर्दा, सियारिन, भरा घड़ा, नेवला, नीलकण्ठ, दिव्याभूषणोंसे विभूषित पति-पुत्रवती साध्वी स्त्री, श्वेत पुष्प, श्वेत माला, श्वेत धान्य तथा खञ्जरीटके शुभ दर्शन हुए। दाहिनी ओर उन्होंने जलती आग, ब्राह्मण, वृषभ, हाथी, बछड़ेसहित गाय, श्वेत अश्व, राजहंस, वेश्या, पुष्पमाला, पताका, दही, खीर, मणि, सुवर्ण, चाँदी, मुक्ता, माणिक्य, तुरंतका कटा हुआ मांस, चन्दन, मधु, घी, कृष्णसार मृग, फल, लावा, सरसों, दर्पण, विचित्र विमान, सुन्दर दीप्तिमती प्रतिमा, श्वेत कमल, कमलवन, शङ्ख, चील, चकोर, बिलाव, पर्वत, बादल, मोर, तोता और सारसके दर्शन किये तथा शङ्ख, कोयल एवं वाद्योंकी मङ्गलमयी ध्वनि सुनी। श्रीकृष्ण-महिमाके विचित्र गान, हरिकीर्तन और जय-जयकारके शब्द भी उनके कानोंमें पड़े।

ऐसे शुभ-शकुन देख-सुनकर अक्रूरका हृदय हर्षसे खिल उठा। उन्होंने श्रीहरिका स्मरण करके पुण्यमय वृन्दावनमें प्रवेश किया। सामने देखा— रमणीय रासमण्डल शोभा पाता है, जो मनको अभीष्ट है। चन्दन, अगुरु, कस्तूरी, पुष्प तथा चन्दनका स्पर्श करके बहनेवाली वायु उस स्थानको सुवासित कर रही है। केलेके खम्भे तथा मङ्गल-कलश रासमण्डलकी शोभा बढ़ा रहे हैं। रेशमी सूतमें गूँथे हुए आम्रपल्लवोंकी सुन्दर बन्दनवारें भी इस रम्य प्रदेशकी श्रीवृद्धि कर रही हैं। सारा शोभनीय रासमण्डल सब ओरसे पद्मरागमणिद्वारा निर्मित है तथा तीन करोड़ रत्नमय मन्दिर एवं लाखों रमणीय कुञ्ज-कुटीर उसकी शोभा बढ़ाते हैं।

रासमण्डल तथा वृन्दावनकी शोभा देखकर जब अक्रूर कुछ दूर आगे गये तो उन्हें अपने समक्ष नन्दरायजीका परम उत्तम सुरम्य व्रज दिखायी दिया, जो विष्णुके निवास-स्थान— वैकुण्ठधामके समान सुशोभित था। उसमें रत्नोंकी सीढ़ियाँ लगी थीं। रत्नोंके बने हुए खम्भोंसे वह बड़ा दीप्तिमान् दिखायी देता था। भाँति-भाँतिके विचित्र चित्र उसका सौन्दर्य बढ़ा रहे थे। श्रेष्ठ रत्नोंके मण्डलाकार घेरेसे वह घिरा हुआ था। विश्वकर्माद्वारा रचित वह नन्दभवन मणियोंके सारभागसे खचित (जड़ा हुआ) था। दरवाजेपर जो मार्ग दिखायी दिया, उसके द्वारा अक्रूरने राजद्वारके भीतर प्रवेश किया। वह द्वार पताकाओं तथा रत्नोंकी झालरोंसे सजा था। मुक्ता और माणिक्यसे विभूषित था। रत्नोंके दर्पण उसकी शोभा बढ़ा रहे थे तथा रत्नोंसे जटित होनेके कारण उस द्वारकी विचित्र शोभा होती थी। वहाँ रत्नमयी वीथियोंकी रचना की गयी थी तथा मङ्गल-कलशोंसे सुसज्जित वह द्वार मङ्गलमय दिखायी देता था।

अक्रूरका आगमन सुनकर नन्दजी बड़े प्रसन्न हुए और बलराम तथा श्रीकृष्णको साथ ले उनकी अगवानीके लिये गये। नन्दजीके साथ वृषभानु आदि गोप भी थे। नर्तकी, भरा हुआ घड़ा, गजराज तथा श्वेत धान्यको आगे करके काली गौ, मधुपर्क, पाद्य तथा रत्नमय आसन आदि साथ ले नन्दजी विनीत एवं शान्तभावसे मुस्कराते हुए आगे बढ़े। वे गोपगणों तथा बालकोंसहित आनन्दमग्न हो रहे थे। महाभाग अक्रूरको देख

५४- श्रीकृष्णका नन्दको अपना स्वरूप और प्रभाव बताना; गोलोक, रासमण्डल और राधा-सदनका वर्णन; श्रीराधाके महत्त्वका प्रतिपादन तथा उनके साथ अपने नित्य सम्बन्धका कथन और दिव्य विभूतियोंका वर्णन

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६६१

नन्दजीने तत्काल ही उन्हें हृदयसे लगा लिया। सब गोपोंने मस्तक झुकाकर अक्रूरको प्रणाम किया और आशीर्वाद लिये। मुने! उन सबका परस्पर संयोग बड़ा ही गुणवान् हुआ। अक्रूरने बारी-बारीसे श्रीकृष्ण और बलरामको गोदमें उठा लिया तथा उनके गाल चूमे। उस समय उनका सारा अङ्ग पुलकित था। नेत्रोंसे अश्रुधारा झर रही थी। हृदयमें आह्लाद उमड़ा आ रहा था। अक्रूर कृतार्थ हो गये। उनका मनोरथ सिद्ध हो गया। उन्होंने दो भुजाओंसे सुशोभित श्यामसुन्दर श्रीकृष्णकी ओर एक क्षणतक देखा, जो पीताम्बर धारण किये मालतीकी मालासे विभूषित थे। उनके सारे अङ्ग चन्दनसे चर्चित थे। उन्होंने हाथमें वंशी ले रखी थी। ब्रह्मा, शिव और शेष आदि देवता तथा सनकादि मुनीन्द्र जिनकी स्तुति करते हैं और गोप-कन्याएँ जिनकी ओर सदा निहारती रहती हैं; उन परिपूर्णतम परमात्मा श्रीकृष्णको अक्रूरने एक क्षणतक अपनी गोदमें देखा। वे मुस्करा रहे थे। तत्पश्चात् उन्होंने चतुर्भुज विष्णुके रूपमें उनको सामने खड़े देखा। लक्ष्मी और सरस्वती—ये दो देवियाँ उनके अगल-बगलमें खड़ी थीं। वे वनमालासे विभूषित थे। सुनन्द, नन्द और कुमुद आदि पार्षद उनकी सेवामें उपस्थित थे। सिद्धोंके समुदाय भक्तिभावसे नम्र हो उन परात्पर प्रभुकी सेवा कर रहे थे।

फिर, दूसरे ही क्षण अक्रूरने श्रीकृष्णको महादेवजीके रूपमें देखा। उनके पाँच मुख और प्रत्येक मुखमें तीन-तीन नेत्र थे। अङ्गकान्ति शुद्ध स्फटिक-मणिके समान उज्ज्वल थी। नागराजके आभूषण उनकी शोभा बढ़ाते थे। दिशाएँ ही उनके लिये वस्त्रका काम देती थीं। योगियोंमें श्रेष्ठ वे परब्रह्म शिव अपने अङ्गोंमें भस्म रमाये, सिरपर जटा धारण किये और हाथमें जप-माला लिये ध्यानमें स्थित थे।

तदनन्तर एक ही क्षणमें श्रीकृष्ण उन्हें ध्यानपरायण एवं मनीषियोंमें श्रेष्ठ चतुर्भुज ब्रह्माके रूपमें दृष्टिगोचर हुए। फिर कभी धर्म, कभी शेष, कभी सूर्य, कभी सनातन ज्योतिःस्वरूप और कभी कोटि-कोटि कन्दर्पनिन्दक, परम शोभासम्पन्न एवं कामिनियोंके लिये कमनीय प्रेमास्पदके रूपमें दिखायी दिये। इस रूपमें नन्दनन्दनका दर्शन करके अक्रूरने उन्हें छातीसे लगा लिया। नारद! नन्दजीके दिये हुए रमणीय रत्नसिंहासनपर पुरुषोत्तम श्रीकृष्णको बिठाकर भक्तिभावसे उनकी परिक्रमा करके पुलकित-शरीर हो अक्रूरने पृथ्वीपर माथा टेक उन्हें प्रणाम किया और स्तुति प्रारम्भ की।

अक्रूर बोले—जो सबके कारण, परमात्मस्वरूप तथा सम्पूर्ण विश्वके ईश्वर हैं, उन श्रीकृष्णको बारंबार नमस्कार है। सर्वेश्वर! आप प्रकृतिसे परे, परात्पर, निर्गुण, निरीह, निराकार, साकार, सर्वदेवस्वरूप, सर्वदेवेश्वर, सम्पूर्ण देवताओंके भी अधिदेवता तथा विश्वके आदिकारण हैं; आपको नमस्कार है। असंख्य ब्रह्माण्डोंमें आप ही ब्रह्मा, विष्णु और शिवरूपमें निवास करते हैं। आप ही सबके आदिकारण हैं। विश्वेश्वर और विश्व दोनों आपके ही स्वरूप हैं; आपको नमस्कार है। गोपाङ्गनाओंके प्राणवल्लभ! आपको नमस्कार है। गणेश और ईश्वर आपके ही रूप हैं। आपको नमस्कार है। आप देवगणोंके स्वामी तथा श्रीराधाके प्राणवल्लभ हैं; आपको बारंबार नमस्कार है। आप ही राधारमण तथा राधाका रूप धारण करते हैं। राधाके आराध्य देवता तथा राधिकाके प्राणाधिक प्रियतम भी आप ही हैं; आपको नमस्कार है। राधाके वशमें रहनेवाले, राधाके अधिदेवता और राधाके प्रियतम! आपको नमस्कार है। आप राधाके प्राणोंके अधिष्ठाता देवता हैं तथा सम्पूर्ण विश्व आपका ही रूप है; आपको नमस्कार है। वेदोंने जिनकी स्तुति की है, वे परमात्मा तथा वेदज्ञ विद्वान् भी आप ही हैं। वेदोंके ज्ञानसे सम्पन्न होनेके कारण आप

६६२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

वेदी कहे गये हैं; आपको नमस्कार है। वेदोंके अधिष्ठाता देवता और बीज भी आप ही हैं; आपको नमस्कार है। जिनके रोमकूपोंमें असंख्य ब्रह्माण्ड नित्य निवास करते हैं, उन महाविष्णुके ईश्वर आप विश्वेश्वरको बारंबार नमस्कार है। आप स्वयं ही प्रकृतिरूप और प्राकृत पदार्थ हैं। प्रकृतिके ईश्वर तथा प्रधान पुरुष भी आप ही हैं। आपको बारंबार नमस्कार है*।

इस प्रकार स्तुति करके अक्रूरजी नन्दरायजीके सभाभवनमें मूर्च्छित हो गये और सहसा भूमिपर गिर पड़े। उसी अवस्थामें पुनः उन्होंने अपने हृदयमें और बाहर भी सब ओर उन श्यामसुन्दर सर्वेश्वर परमात्माको देखा। वे ही विश्वमें व्यास थे और वे ही विश्वरूपमें प्रकट हुए थे। नारद! अक्रूरजीको मूर्च्छित हुआ देख नन्दजीने आदरपूर्वक उठाया और रमणीय रत्नसिंहासनपर बिठा दिया। तत्पश्चात् उन्होंने अक्रूरसे सारा वृत्तान्त पूछा और बारंबार कुशलप्रश्न करते हुए उन्हें मिष्टान्न भोजन कराया। अक्रूरने कंसका सारा वृत्तान्त कह सुनाया और यह भी कहा कि अपने माता-पिताको बन्धनसे छुड़ानेके लिये बलराम और श्रीकृष्णको वहाँ अवश्य चलना चाहिये।

जो अक्रूरद्वारा किये गये इस स्तोत्रका एकाग्रचित्त होकर पाठ करता है, वह पुत्रहीन हो तो पुत्र पाता है और भार्याहीन हो तो उसे प्रिय भार्याकी उपलब्धि होती है। निर्धनको धन, भूमिहीनको उर्वरा भूमि, संतानहीनको संतान और प्रतिष्ठाहीनको प्रतिष्ठाकी प्राप्ति होती है और जो यशस्वी नहीं है, वह भी अनायास ही महान् यश प्राप्त कर लेता है।

तदनन्तर अक्रूरजी रातके समय अत्यन्त प्रसन्नचित्त हो रमणीय चम्पाकी शय्यापर श्रीकृष्णको छातीसे लगाकर सोये। प्रातःकाल सहसा उठकर परम उत्तम आह्निक कृत्यका सम्पादन करके उन्होंने जगदीश्वर श्रीकृष्ण तथा बलरामको अपने रथपर बिठाया। पाँच प्रकारके गव्य (दूध, दही, माखन, घी और छाँछ) तथा नाना प्रकारके परम दुर्लभ द्रव्य रखवाये। वृषभानु, नन्द, सुनन्द तथा चन्द्रभानु गोपको भी साथ ले लिया। उस समय व्रजराज नन्द गोपने आनन्दमग्न हो नाना प्रकारके वाद्य—मृदङ्ग, मुरज (ढोल), पटह, पणव, ढक्का, दुन्दुभि, आनक, सज्जा, संनहनी, कांस्य-पट्ट (झाँझ), मर्दल और मण्डवी आदि बजवाये। बाजोंकी ध्वनि और बलराम तथा श्रीकृष्णके जानेका समाचार सुन श्रीकृष्णको रथपर बैठे देख गोपियाँ प्रणय-कोपसे पीड़ित हो उनके पास आ पहुँचीं। ब्रह्मन्! श्रीकृष्णके मना करनेपर भी श्रीराधाकी प्रेरणासे उन गोपकिशोरियोंने पैरोंके आघातसे राजा कंसके उस रथको अनायास ही तोड़ डाला। उसपर बैठे हुए सब गोप हाहाकार


*नमः कारणरूपाय परमात्मस्वरूपिणे। सर्वेषामपि विश्वानामीश्वराय नमो नमः॥
पराय प्रकृतेरीश परात्परतराय च। निर्गुणाय निरीहाय नीरूपाय स्वरूपिणे॥
सर्वदेवस्वरूपाय सर्वदेवेश्वराय च। सर्वदेवाधिदेवाय विश्वादिभूतरूपिणे॥
असंख्येषु च विश्वेषु ब्रह्मविष्णुशिवात्मकः। स्वरूपायादिबीजाय तदीशविश्वरूपिणे॥
नमो गोपाङ्गनेशाय गणेशेश्वररूपिणे। नमः सुरगणेशाय राधेशाय नमो नमः॥
राधारमणरूपाय राधारूपधराय च। राधाराध्याय राधायाः प्राणाधिकतराय च॥
राधासाध्याय राधाधिदेवप्रियतमाय च। राधाप्राणाधिदेवाय विश्वरूपाय ते नमः॥
वेदस्तुतात्मवेदङ्गरूपिणे वेदिने नमः। वेदाधिष्ठातृदेवाय वेदबीजाय ते नमः॥
यस्य लोमसु विश्वानि चासंख्यानि च नित्यशः। महद्विष्णोरीश्वराय विश्वेशाय नमो नमः॥
स्वयं प्रकृतिरूपाय प्राकृताय नमो नमः। प्रकृतीश्वररूपाय प्रधानपुरुषाय च॥
(७०। ५६—६५)

६६४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण


बाहर निकाल दिया। तत्पश्चात् नन्दनन्दन नन्दके श्रेष्ठ प्राङ्गणमें सानन्द आये। वे परमानन्दमय, नित्यानन्दस्वरूप तथा सनातन हैं। नित्य-अनित्य सब उन्हींके रूप हैं। वे नित्यबीजस्वरूप, नित्यविग्रह, नित्याङ्गभूत, नित्येश तथा नित्यकृत्यविशारद हैं। उनके रूप, यौवन, वेश-भूषा तथा किशोर-अवस्था—सभी नित्य नूतन हैं। उनके सम्भाषण, प्रेम-प्राप्ति, सौभाग्य, सुधा-रससे सराबोर मीठे वचन, भोजन तथा पद भी नित्य नवीन हैं। इस अत्यन्त रमणीय प्राङ्गणमें खड़े-खड़े मायायुक्त मायेश्वर अत्यन्त स्नेहमें डूब गये। तत्पश्चात् वे वहाँसे जानेको उद्यत हुए। केलेके सुन्दर खम्भों और रेशमी डोरेमें गूँथे हुए आम्र-पल्लवोंकी बन्दनवारोंसे उस आँगनको सजाया गया था। विश्वकर्माने उसकी फर्शमें पद्मराग मणि जड़ दी थी। कस्तूरी, केसर और चन्दनसे उसका संस्कार किया गया था। अक्रूर तथा बान्धवजनोंसहित श्रीकृष्ण स्वयं वहाँ थोड़ी देर खड़े रहे। यशोदाने बायीं ओरसे और आनन्दयुक्त नन्दने दाहिनी ओरसे आकर अपने लालाको हृदयसे लगा लिया। बन्धु-बान्धवोंने उनसे प्रेमभरी बातें कीं तथा मैया और बाबाने लालाका मुँह चूमा।

मुने! तदनन्तर श्रीकृष्ण गुरुजनोंको नमस्कार करके आँगनसे बाहर निकले और स्वर्गीय रथपर आरूढ़ हो सुन्दर मथुरापुरीकी ओर चल दिये। मथुरा अपनी शोभासे इन्द्रकी अमरावतीपुरीको परास्त करके अत्यन्त मनोहर दिखायी देती थी। श्रीकृष्णने अक्रूर तथा सखाओंके साथ उस रमणीय नगरीमें प्रवेश किया। श्रेष्ठ रत्नोंसे खचित और विश्वकर्माद्वारा रचित मथुरापुरी सुन्दर बहुमूल्य रत्ननिर्मित कलशोंसे सुशोभित थी। सैकड़ों सुन्दर, श्रेष्ठ और अभीष्ट राजमार्गोंसे वह नगरी घिरी हुई थी। वे राजमार्ग चन्द्रकान्त मणियोंके सारभागसे जटिल होनेके कारण चन्द्रमाके समान ही प्रकाशित होते थे। वहाँ विचित्र मणियोंके सारतत्त्वसे शत-शत वीथियोंका निर्माण किया गया था। पुण्य वस्तुओंके संचयसे सम्पन्न श्रेष्ठ व्यवसायी अपनी दूकानोंसे उन राजमार्गोंकी शोभा बढ़ाते थे। पुरीके चारों ओर सहस्रों सरोवर शोभा दे रहे थे, जो शुद्ध स्फटिकमणिके समान उज्ज्वल तथा पद्मरागमणियोंकी दीप्तिसे देदीप्यमान थे। रत्नमय अलंकारों एवं आभूषणोंसे विभूषित पद्मिनी जातिकी श्रेष्ठ सुन्दरियोंसे वह नगरी शोभायमान थी। वे सब सुन्दरियाँ सुस्थिर यौवनसे युक्त थीं और श्रीकृष्ण-दर्शनकी लालसासे मुँह ऊपर उठाये अपलक नेत्रोंसे राजमार्गकी ओर देख रही थीं। उनके हाथोंमें अक्षतपुञ्ज थे। असंख्य रत्ननिर्मित रथ पुरीकी शोभा बढ़ाते थे। अनेक प्रकारके विचित्र भूषणोंसे उन रथोंको विभूषित एवं चित्रित किया गया था। बहुत-से पुष्पोद्यान, जो भाँति-भाँतिके पुष्पोंसे भरे थे और जिनमें भ्रमर रसास्वादन करते थे, मथुरापुरीकी श्रेयोवृद्धि कर रहे थे। माधुर्य मधुसे युक्त, मधुलोभी तथा मधुमत्त मधुकर मधुकरीयोंके समूहसे संयुक्त हो उन उद्यानोंमें आनन्दका अनुभव कर रहे थे। नगरके चारों ओर अनेक प्रकारके दुर्ग थे, जिनके कारण शत्रुओंका वहाँ पहुँचना अत्यन्त कठिन था। रक्षाशास्त्र-विशारद रक्षकोंसे वह पुरी सदा सुरक्षित थी। विश्वकर्माद्वारा श्रेष्ठ एवं विचित्र रत्नोंसे रचित अगणित अट्टालिकाओंसे संयुक्त मथुरानगरी बड़ी मनोहर जान पड़ती थी।

इस प्रकार मथुरापुरीकी शोभा देख आगे बढ़ते हुए कमलनयन श्रीकृष्णने मार्गमें कुब्जाको देखा, जो अत्यन्त जराजीर्ण एवं वृद्धा-सी थी। डंडेके सहारे चलती थी। अत्यन्त झुकी हुई थी और झुर्रियाँ लटक रही थीं। उसकी आकृति रूखी और विकृत थी। वह कस्तूरी और केसर मिला हुआ चन्दनका अनुलेपन लिये आ रही थी, जिसके स्पर्शमात्रसे शरीर सुगन्धित, सुस्निग्ध तथा अत्यन्त मनोहर हो जाता था। उस वृद्धाने शान्त,

५५- श्रीकृष्णद्वारा नन्दजीको ज्ञानोपदेश, लोकनीति, लोकमर्यादा तथा लौकिक सदाचारसे सम्बन्ध रखनेवाले विविध विधि-निषेधोंका वर्णन, कुसङ्ग और कुलटाकी निन्दा, सती और भक्तकी प्रशंसा, शिवलिङ्ग-पूजन एवं शिवकी महत्ता

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६६५

ऐश्वर्ययुक्त, श्रीसम्पन्न, श्रीनिवास, श्रीबीज एवं श्रीनिकेतन श्यामसुन्दर श्रीवल्लभको मन्द मुस्कानके साथ देखा। देखते ही उसके दोनों हाथ जुड़ गये। वह भक्तिसे विनीत हो गयी और सहसा चरणोंमें सिर रखकर उसने प्रणाम किया। साथ ही उनके श्याम मनोहर अङ्गमें चन्दन लगाया। श्रीकृष्णके जो सखा थे, उनके अङ्गोंमें भी चन्दनका अनुलेपन किया। फिर चन्दनका सुवर्णमय पात्र हाथमें लिये श्रेष्ठ दासीने बारंबार परिक्रमा करके श्रीकृष्णको प्रणाम किया। श्रीकृष्णकी दृष्टि पड़ते ही वह सहसा अनुपम शोभासे सम्पन्न तथा रूप और यौवनसे लक्ष्मीके समान रमणीय हो गयी। आगमें तपाकर शुद्ध की हुई स्वर्णप्रतिमाके समान दीप्तिमती हो उठी। सुन्दर वस्त्र और रत्नोंके आभूषण उसके अङ्गोंकी शोभा बढ़ाने लगे। वह बारह वर्षकी अवस्थावाली कुमारी कन्याके समान धन्या और मनोहारिणी प्रतीत होने लगी। बहुमूल्य रत्नोंद्वारा निर्मित श्रेष्ठतम हारसे उसका वक्षःस्थल उद्भासित हो उठा। वह गजराजकी भाँति मन्द गतिसे चलने लगी। रत्नोंके मञ्जीर उसके चरणोंकी शोभा बढ़ाने लगे। सिरपर केशोंकी बँधी हुई वेणी मालतीकी मालासे आवेष्टित थी, जो सुन्दर और गोलाकार दिखायी देती थी। उसने ललाटमें सिन्दूरकी बेंदी लगा रखी थी, जो अनारके फूलकी भाँति लाल थी। उस बेंदीके ऊपर कस्तूरी और चन्दनके भी बिन्दु थे। उस सुन्दरीने अपने हाथमें रत्नमय दर्पण ले रखा था। श्रीनिवास हरि उसे आश्वासन देकर आगे बढ़ गये। वह कृतार्थ हो प्रसन्नतापूर्वक अपने घर गयी, मानो लक्ष्मी अपने धामको जा रही हो। उसने अपने घरको देखा। वह लक्ष्मीके निवास-मन्दिरकी भाँति मनोहर हो गया था। उसमें रत्नमयी शय्या बिछी थी तथा उस भवनका निर्माण श्रेष्ठ रत्नोंके सारतत्त्वसे हुआ था। रत्नोंकी दीपमालाएँ अपनी प्रभासे उस गृहको उद्भासित कर रही थीं। उस भवनमें सब ओर रत्नमय दर्पण लगे थे, जो उसकी भव्यताको बढ़ा रहे थे। सिन्दूर, वस्त्र, ताम्बूल, श्वेत चँवर और माला लिये दास-दासियोंके समुदाय उस दिव्य भवनको घेरकर खड़े थे। मुने! सुन्दरी कुब्जा मन, वाणी और शरीरसे श्रीहरिके चरणोंके ही चिन्तन और समाराधनमें लगी थी। वह निरन्तर यही सोचती रहती थी कि कब श्रीहरिका शुभागमन होगा और कब मैं उनके मनोहर मुखचन्द्रके दर्शन पाऊँगी। उसे सारा जगत् सदा श्रीकृष्णमय दिखायी देता था। करोड़ों कन्दर्पोंकी लावण्य-लीलासे सुशोभित श्यामसुन्दर पलभरके लिये भी उसे भूलते नहीं थे।

कुब्जाको बिदा करनेके पश्चात् श्रीकृष्णने एक मनोहर मालीको देखा, जो मालाओंका समूह लिये राजभवनकी ओर जा रहा था। उसने भी श्रीकान्तको देख पृथ्वीपर माथा टेककर उन्हें प्रणाम किया और अपनी सारी मालाएँ परमात्मा श्रीकृष्णको अर्पित कर दीं। श्रीकृष्ण उसे अत्यन्त दुर्लभ दास्यभावका वरदान दे मालाएँ पहनकर उस सुन्दर राजमार्गपर आगे बढ़ गये। तदनन्तर उन्हें एक धोबी दिखायी दिया, जो वस्त्रोंका गट्ठर लिये

६६६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

जा रहा था। वह बड़ा बलवान् और अहंकारी था तथा यौवनके मदसे उन्मत्त हो सदा उद्दण्डतापूर्ण बर्ताव किया करता था। महामुने! श्रीकृष्णने उससे विनयपूर्वक वस्त्र माँगा। उसने वस्त्र तो उन्हें दिया नहीं, उलटे कठोर बातें सुनायीं।

**धोबी बोला—**ओ मूढ़! तू गोप-जनोंका लाड़ला है। यह वस्त्र गायके चरवाहोंके योग्य नहीं है; अत्यन्त दुर्लभ और राजाओंके ही उपयोगमें आने योग्य है।

धोबीकी यह बात सुनकर मधुसूदन हँसे। बलदेव, अक्रूर और गोपगण भी हँसने लगे। श्रीकृष्णने एक ही तमाचेमें उस धोबीका काम तमाम करके कपड़ोंका वह गट्ठर ले लिया और सखाओंसहित उन्होंने अपनी रुचिके अनुसार वस्त्र धारण किये। वह रजकराज (धोबियोंका सरदार) दिव्य देह धारण करके श्रीकृष्ण-पार्षदोंसे वेष्टित रत्नमय विमानद्वारा गोलोकको चला गया। उसका वह दिव्य शरीर अक्षय यौवनसे युक्त, जरा और मृत्युका निवारक, श्रेष्ठ पीताम्बरसे सुशोभित, मन्द मुस्कानसे विलसित, श्यामकान्तिसे कमनीय और मनोहर था। गोलोकमें पहुँचकर वह भी वहाँके पार्षदोंमें एक पार्षद हो गया। वहाँ अपने मनको वशमें रखकर वह नित्य-निरन्तर श्रीकृष्णके शुभागमनका चिन्तन करता रहा। उधर मथुरामें सूर्यदेव अस्ताचलको चले गये। तब श्रीकृष्णकी आज्ञा लेकर अक्रूर अपने घरको गये और श्रीकृष्ण भी नन्द एवं बलदेव आदिके साथ आनन्दपूर्वक किसी वैष्णवके घर गये, जो कपड़ा बुननेका व्यवसाय करता था। उसने अपना सर्वस्व भगवान्‌को समर्पित कर रखा था। उस भक्तने श्रीनिवासको प्रणाम करके उनका पूजन किया और भगवान्‌ने उसको अपना वह दास्यभाव प्रदान किया जो ब्रह्मा आदि देवताओंके लिये भी दुर्लभ है। वहाँ उत्तम मिष्टान्न भोजन करके सब लोग पलंगपर सो गये। तदनन्तर श्रीकृष्ण कुब्जाके घर पधारे। उसने स्वागत किया। भगवान्‌ने उसको बताया—'प्रिये! श्रीरामावतारके समय तुमने मेरे लिये तप किया था; अतः अब मुझसे मिलकर जरा-मृत्युरहित और अत्यन्त दुर्लभ मेरे परमधाम गोलोकको जाओ।' इसी समय गोलोकसे एक रत्ननिर्मित रथ वहाँ आया और कुब्जा दिव्य देह धारण करके उसीके द्वारा गोलोकको चली गयी। मुने! वह वहीं चन्द्रमुखी गोपी हो गयी और कितनी ही गोपियाँ उसकी परिचारिका हुईं।

भगवान् नन्दनन्दन भी क्षणभर कुब्जाके यहाँ ठहरकर पुनः अपने निवास-मन्दिरमें लौट आये, जहाँ नन्दजी सानन्द विराजमान थे। उधर भयविह्वल कंसने रातको नींद आ जानेपर दुःखद दुःस्वप्न देखा, जो उसकी मृत्युका सूचक था। उसने देखा, सूरज आकाशसे गिरकर पृथ्वीपर पड़ा है और उसके चार खण्ड हो गये हैं। मुने! इसी तरह चन्द्रमण्डल भी आकाशसे भूमिपर गिरकर दस खण्डोंमें विभक्त दिखायी दिया। उसने कुछ ऐसे पुरुष देखे, जिनकी आकृति विकृत थी। वे हाथोंमें रस्सी लिये नंग-धड़ंग दिखायी देते थे। एक विधवा शूद्री दृष्टिगोचर हुई, जो नंगी थी और

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६६७

जिसकी नाक कटी हुई थी। वह हँसती थी। उसने चूनेका तिलक लगा रखा था और उसके सफेद और काले केश ऊपरकी ओर उठे थे। वह एक हाथमें तलवार और दूसरेमें खप्पर लिये हुए थी। उसकी जीभ लपलपा रही थी और उसके गलेमें मुण्डमाला पड़ी थी। उसके सिवा कंसने गदहा, भैंस, बैल, सूअर, भालू, कौआ, गीध, कङ्क, वानर, सफेद कुत्ता, घड़ियाल, सियार, भस्मपुञ्ज, हड्डियोंका ढेर, ताड़का फल, केश, कपास, बुझे अङ्गार (कोयले), उल्का, चितापर चढ़ा हुआ मुर्दा, कुम्हार और तेलीके चक्र, टेढ़ी-मेढ़ी कौड़ी, मरघट, अधजला काठ, सूखा काठ, कुश, तृण, चलता हुआ धड़, मुर्देका चिल्लाता हुआ मस्तक, आगसे जला हुआ स्थान, भस्म-युक्त सूखा तालाब, जली मछली, लोहा, दावानलसे जलकर बुझे हुए वन, गलित कोढ़से युक्त नंगा शूद्र, शिखा खोले और अत्यन्त रोषसे भरकर शाप देते हुए ब्राह्मण एवं गुरु, अधिक कुपित हुए संन्यासी, योगी एवं वैष्णव मनुष्य देखे। ऐसा दुःस्वप्न देख कंसकी नींद खुल गयी और उसने माता, पिता, भाई तथा पत्नीसे वह सब कह सुनाया। पत्नी प्रेमसे विह्वल होकर रोने लगी।

कंसने रङ्गभूमिमें दर्शकोंके बैठनेके लिये मञ्च बनवाये और सभाके द्वारपर हाथीको खड़ा कर दिया। हाथीके साथ ही पहलवान और जुझारू सेना भी स्थापित कर दी। तत्पश्चात् धनुर्यज्ञका मङ्गल-कृत्य आरम्भ किया। सभा बनवायी। पुण्यदायक स्वस्तिवाचन एवं मङ्गलपाठ कराया तथा योगयुक्त पुरोहितको यत्नपूर्वक आवश्यक कार्यके अनुष्ठानमें नियुक्त किया। राजा कंस हाथमें विलक्षण तलवार ले रमणीय मञ्चपर जा बैठा। मल्लयुद्धके लिये उस कलामें निपुण योद्धाको नियुक्त किया। आमन्त्रित श्रेष्ठ राजाओं, ब्राह्मणों, मुनीश्वरों, सुहृद्वर्गके लोगों, धर्मात्मा पुरुषों तथा युद्धकुशल पुरुषोंको यथास्थान बैठाया।

नारद! इसी समय बलरामके साथ भगवान् श्रीकृष्ण रङ्गभूमिमें आये और महादेवजीके धनुषको लीलापूर्वक बीचसे ही तोड़ डाला। धनुष टूटनेकी भयंकर आवाजसे सारी मथुरापुरी बहरी-सी हो गयी। कंसको बड़ा दुःख हुआ और देवकीनन्दन श्रीकृष्ण हर्षसे खिल उठे। द्वारवर्ती मल्लसहित हाथीका वध करके वे सभामें उपस्थित हुए। योगीजनोंने उन्हें साक्षात् परमात्मदेव परमेश्वरके रूपमें देखा। वे अपने हृदयकमलमें जिस स्वरूपका ध्यान करते थे, वही उन्हें बाहर दृष्टिगोचर हुआ। राजाओंकी दृष्टिमें वे सर्वशासक दण्डधारी राजेन्द्र थे। माता-पिताने उनको स्तनपान करनेवाले दुधमुँहे बालकके रूपमें देखा। कामिनियोंकी दृष्टिमें वे करोड़ों कन्दर्पोंकी लावण्य-लीला धारण करनेवाले रसिकशेखर थे। कंसने कालपुरुष समझा और उसके भाइयोंने शत्रु। मल्लोंने अपनी मृत्युका स्थान माना और यादवोंने उनको प्राणोंके समान प्रिय देखा।

श्रीकृष्णने सभामें बैठे हुए मुनियों, ब्राह्मणों तथा माता, पिता एवं गुरुजनोंको नमस्कार किया। फिर वे हाथमें सुदर्शनचक्र लिये राजमञ्चके निकट गये। मुने! उन्होंने कंसको भक्तके रूपमें देखा।

५६- जिनके दर्शनसे पुण्यलाभ और जिनके अनुष्ठानसे पुनर्जन्मका निवारण होता है, उन वस्तुओं और सत्कर्मोंका वर्णन तथा विविध दानोंके पुण्यफलका कथन

६६८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

भक्तोंके तो वे जीवनबन्धु ही हैं। कृपानिधान श्रीकृष्णने कृपापूर्वक कंसको मञ्चसे खींच लिया और लीलासे ही उसको मार डाला। उस समय राजा कंसको सम्पूर्ण जगत् श्रीकृष्णमय दिखायी दे रहा था। मृत्युके पश्चात् उसके निकट हीरेके हारोंसे विभूषित रत्नमय विमान आ पहुँचा और वह दिव्य रूप धारण करके समृद्धिशाली हो उस विमानसे विष्णुधाममें जा पहुँचा। मुने ! कंसका उत्कृष्ट तेज श्रीकृष्णके चरणारविन्दमें प्रविष्ट हो गया। उसका और्ध्वदैहिक संस्कार एवं सत्कार करके श्रीहरिने ब्राह्मणोंको धनका दान किया। इसके बाद राज्य एवं राजाका छत्र बुद्धिमान् उग्रसेनको सौंप दिया। चन्द्रवंशी उग्रसेन पुनः यादवोंके 'राजेन्द्र' हो गये।

कंसकी माता, पत्नियाँ, पिता, बन्धु-बान्धव, मातृवर्गकी स्त्रियाँ, बहिन तथा भाइयोंकी स्त्रियाँ भी विलाप करने लगीं। वे बोलीं—'राजेन्द्र ! उठो, राजसिंहासनपर बैठकर हमें दर्शन दो। ब्रह्मासे लेकर कीटपर्यन्त चराचर प्राणियोंका आधारभूत जो असंख्य विश्व हैं, उन सबकी जो स्वयं ही लीलापूर्वक सृष्टि करते हैं; ब्रह्मा, शिव, शेष, धर्म, सूर्य तथा गणेश आदि देवता, मुनीन्द्रवर्ग और देवेन्द्रगण जिनका दिन-रात ध्यान करते हैं; वेद और सरस्वती भयभीत हो जिनका स्तवन करती हैं; प्रकृतिदेवी भी हर्षसे उल्लसित हो जिनके गुण गाती हैं; जो प्रकृतिसे परे, प्राकृतस्वरूप, स्वेच्छामय, निरीह, निर्गुण, निरञ्जन, परात्परतर ब्रह्म, परमात्मा, ईश्वर, नित्यज्योतिःस्वरूप, भक्तोंपर अनुग्रहके लिये ही दिव्य देह धारण करनेवाले, नित्यानन्दमय, नित्यरूप तथा नित्य अविनाशी शरीर धारण करनेवाले हैं; वे ही मायापति भगवान् गोविन्द भूतलका भार उतारनेके लिये मायासे गोपबालकके वेषमें अवतीर्ण हुए हैं। वे सर्वेश्वर प्रभु जिसे मारते हैं, उसकी रक्षा कौन पुरुष कर सकता है ? इसी प्रकार वे सर्वात्मा श्रीहरि जिसकी रक्षा करते हों उसे मारनेवाला भी कोई नहीं है*।'

महामुने ! ऐसा कहकर सब लोग चुप हो गये। परिवारके लोगोंने ब्राह्मणोंको भोजन कराया और उन्हें सब प्रकारका धन दिया। सर्वात्मा भगवान् श्रीकृष्ण भी पिताके निकट गये और उनकी बेड़ी-हथकड़ी काटकर उन्होंने माता और पिता दोनोंको बन्धनसे मुक्त किया। तत्पश्चात् उन देवेश्वरने दण्डकी भाँति पृथ्वीपर पड़कर माता-पिताको साष्टाङ्ग प्रणाम किया और भक्तिसे मस्तक झुकाकर उनकी स्तुति की।

श्रीभगवान् बोले—जो पुरुष पिता और माताका तथा विद्यादाता एवं मन्त्रदाता गुरुका पोषण नहीं करता, वह जीवनभर पापसे शुद्ध नहीं होता। समस्त पूजनीयोंमें पिता वन्दनीय महान् गुरु हैं। परंतु माता गर्भमें धारण एवं पोषण करती है; इसलिये पितासे भी सौगुनी श्रेष्ठ है। माता पृथ्वीके समान क्षमाशीला और सबका समानरूपसे हित चाहनेवाली है; अतः भूतलपर सबके लिये मातासे बढ़कर बन्धु दूसरा कोई नहीं है। साथ ही यह भी सच है कि विद्यादाता और मन्त्रदाता गुरु मातासे भी बहुत बढ़-चढ़कर आदरके योग्य हैं। वेदके अनुसार गुरुसे बढ़कर वन्दनीय और पूजनीय दूसरा कोई नहीं है।

मुने ! ऐसा कहकर श्रीकृष्ण और बलरामने माताको प्रणाम किया। फिर माता-पिताने भी उन दोनोंको आदरपूर्वक गोदमें बिठा लिया और उन्हें उत्तम मिष्ठान्न भोजन कराया। नन्द और ग्वालबालोंको भी बड़े आदरसे खिलाया। बच्चोंका मङ्गल-कृत्य कराया और उसके उपलक्ष्यमें भी बहुत-से ब्राह्मणोंको जिमाया। उस समय वसुदेवने प्रसन्नतापूर्वक ब्राह्मणोंको बहुत धन दिया। (अध्याय ७१-७२)


* स यं हन्ति च सर्वेशो रक्षिता तस्य कः पुमान्। स यं रक्षति सर्वात्मा तस्य हन्ता न कोऽपि च॥
(७२। १०५)

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६६९

श्रीकृष्णका नन्दको अपना स्वरूप और प्रभाव बताना; गोलोक, रासमण्डल और राधा-सदनका वर्णन; श्रीराधाके महत्त्वका प्रतिपादन तथा उनके साथ अपने नित्य सम्बन्धका कथन और दिव्य विभूतियोंका वर्णन

श्रीनारायण कहते हैं—नारद! तदनन्तर शोकसे आतुर और पुत्रवियोगसे कातर हो फूट-फूटकर रोते हुए चेष्टाशून्य पिता नन्दको श्रीकृष्ण और बलरामने आध्यात्मिक आदि दिव्य योगोंद्वारा सानन्द समझाना आरम्भ किया।

श्रीभगवान् बोले—बाबा! प्रसन्नतापूर्वक मेरी बात सुनो। शोक छोड़ो और हर्षको हृदयमें स्थान दो। मैं जो ज्ञान देता हूँ, इसे ग्रहण करो। यह वही ज्ञान है, जिसे पूर्वकालमें मैंने पुष्करमें ब्रह्मा, शेष, गणेश, महेश (शिव), दिनेश (सूर्य), मुनीश और योगीशको प्रदान किया था। यहाँ कौन किसका पुत्र, कौन किसका पिता और कौन किसकी माता है? यह पुत्र आदिका सम्बन्ध किस कारणसे है? जीव अपने पूर्वकृत कर्मसे प्रेरित हो इस संसारमें आते और परलोकमें जाते हैं। कर्मके अनुसार ही उनका विभिन्न स्थानोंमें जन्म होता है। कोई जीव अपने शुभकर्मसे प्रेरित हो योगीन्द्रोंके कुलमें जन्म लेता है और कोई राजरानियोंके पेटसे उत्पन्न होता है। कोई ब्राह्मणी, क्षत्रिया, वैश्या अथवा शूद्राओंके गर्भसे जन्म ग्रहण करता है; किसी-किसीकी उत्पत्ति पशु, पक्षी आदि तिर्यक् योनियोंमें होती है। सब लोग मेरी ही मायासे विषयोंमें आनन्द लेते हैं और देहत्यागकालमें विषाद करते हैं। बान्धवोंके साथ बिछोह होनेपर भी लोगोंको बड़ा कष्ट होता है। संतान, भूमि और धन आदिका विच्छेद मरणसे भी अधिक कष्टदायक प्रतीत होता है। मूढ़ मनुष्य ही सदा इस तरहके शोकसे ग्रस्त होता है; विद्वान् पुरुष नहीं। जो मेरा भक्त है, मेरे भजनमें लगा है, मेरा यजन करता है, इन्द्रियोंको वशमें रखता है, मेरे मन्त्रका उपासक है और निरन्तर मेरी सेवामें संलग्न रहता है; वह परम पवित्र माना गया है। मेरे भयसे ही यह वायु चलती है, सूर्य और चन्द्रमा प्रतिदिन प्रकाशित होते हैं, इन्द्र भिन्न-भिन्न समयोंमें वर्षा करते हैं, आग जलाती है और मृत्यु सब जीवोंमें विचरती है। मेरा भय मानकर ही वृक्ष समयानुसार पुष्प और फल धारण करता है। वायु बिना किसी आधारके चलती है। वायुके आधारपर कच्छप, कच्छपके आधारपर शेष और शेषके आधारपर पर्वत टिके हुए हैं। पंक्तिबद्ध विद्यमान सात पाताल पर्वतोंके सहारे स्थित हैं। पातालोंसे जल सुस्थिर है और जलके ऊपर पृथ्वी टिकी हुई है। पृथ्वी सात स्वर्गोंकी आधारभूमि है। ज्योतिश्चक्र अथवा नक्षत्रमण्डल ग्रहोंके आधारपर स्थित हैं; परंतु वैकुण्ठ बिना किसी आधारके ही प्रतिष्ठित है। वह समस्त ब्रह्माण्डोंसे परे तथा श्रेष्ठ है। उससे भी परे गोलोकधाम है। वह वैकुण्ठधामसे पचास

६७० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण करोड़ योजन ऊपर बिना आधारके ही स्थित है। उसका निर्माण दिव्य चिन्मय रत्नोंके सारतत्त्वसे हुआ है। उसके सात दरवाजे हैं। सात सार हैं। वह सात खाइयोंसे घिरा हुआ है। उसके चारों ओर लाखों परकोटे हैं। वहाँ विरजा नदी बहती है। वह लोक मनोहर रत्नमय पर्वत शतशृङ्गसे आवेष्टित है। शतशृङ्गका एक-एक उज्ज्वल शिखर दस-दस हजार योजन लंबा-चौड़ा है। वह पर्वत करोड़ों योजन ऊँचा है। उसकी लंबाई उससे सौगुनी है और चौड़ाई एक लाख योजन है। उसी धाममें बहुमूल्य दिव्य रत्नोंद्वारा निर्मित चन्द्रमण्डलके समान गोलाकार रासमण्डल है; जिसका विस्तार दस हजार योजन है। वह फूलोंसे लदे हुए पारिजात-वनसे, एक सहस्र कल्पवृक्षोंसे और सैकड़ों पुष्पोद्यानोंसे घिरा हुआ है। वे पुष्पोद्यान नाना प्रकारके पुष्पसम्बन्धी वृक्षोंसे युक्त होनेके कारण फूलोंसे भरे रहते हैं; अतएव अत्यन्त मनोहर प्रतीत होते हैं। उस रासमण्डलमें तीन करोड़ रत्ननिर्मित भवन हैं, जिनकी रक्षामें कई लाख गोपियाँ नियुक्त हैं। वहाँ रत्नमय प्रदीप प्रकाश देते हैं। प्रत्येक भवनमें रत्ननिर्मित शय्या बिछी हुई है। नाना प्रकारकी भोगसामग्री संचित है। रासमण्डलके सब ओर मधुकी सैकड़ों बावलियाँ हैं। वहाँ अमृतकी भी बावलियाँ हैं और इच्छानुसार भोगके सभी साधन उपलब्ध हैं। गोलोकमें कितने गृह हैं, यह कौन बता सकता है? वहाँ केवल राधाका जो सुन्दर, रमणीय एवं उत्तम निवास-मन्दिर है, वह बहुमूल्य रत्ननिर्मित तीन करोड़ भव्य भवनोंसे शोभित है। जिनकी कीमत नहीं आँकी जा सकती, ऐसे रत्नोंद्वारा निर्मित चमकीले खम्भोंकी पंक्तियाँ उस राधाभवनको प्रकाशित करती हैं। वह भवन नाना प्रकारके विचित्र चित्रोंद्वारा चित्रित है। अनेक श्वेत चामर उनकी शोभा बढ़ाते हैं। माणिक्य और मोतियोंसे जटित, हीरेके हारोंसे अलंकृत तथा रत्नमय प्रदीपोंसे प्रकाशित राधामन्दिर रत्नोंकी बनी हुई सीढ़ियोंसे अत्यन्त सुन्दर जान पड़ता है। बहुमूल्य रत्नोंके पात्र और शय्याओंकी श्रेणियाँ उस भवनकी शोभा बढ़ाती हैं। तीन खाइयों, तीन दुर्गम द्वारों और सोलह कक्षाओंसे युक्त राधाभवनके प्रत्येक द्वारपर और भीतर नियुक्त हुई सोलह लाख गोपियाँ इधर-उधर घूमती रहती हैं। उन सबके शरीरपर अग्निशुद्ध दिव्य वस्त्र शोभा पाते हैं। वे रत्नमय अलंकारोंसे अलंकृत हैं। उनकी अङ्गकान्ति तपाये हुए सुवर्णके समान उद्भासित होती है। वे शत-शत चन्द्रमाओंकी मनोरम आभासे सम्पन्न हैं। राधिकाके किंकर भी ऐसे ही और इतने ही हैं। इन सबसे भरा हुआ उस भवनका अन्तःपुर बड़ा सुन्दर लगता है। उस भवनका आँगन बहुमूल्य रत्नोंद्वारा निर्मित है। वह राधाभवन अत्यन्त मनोहर, अमूल्य रत्नमय खम्भोंके समुदायसे सुशोभित, फल-पल्लवसंयुक्त, रत्ननिर्मित मङ्गल- कलशोंसे अलंकृत और रत्नमयी वेदिकाओंसे विभूषित है। सुन्दर एवं बहुमूल्य रत्नमय दर्पण उसकी शोभा बढ़ाते हैं। अमूल्य रत्नोंसे निर्मित वह सुन्दर सदन सब भवनोंमें श्रेष्ठ है। वहाँ श्रीराधारानी रत्नमय सिंहासनपर विराजमान होती हैं। लाखों गोपियाँ उनकी सेवामें रहती हैं। वे करोड़ों पूर्ण चन्द्रमाओंकी शोभासे सम्पन्न हैं। श्वेत चम्पाके समान उनकी गौर कान्ति है। वे बहुमूल्य रत्नोंद्वारा निर्मित आभूषणोंसे विभूषित हैं। अमूल्य रत्नजटित वस्त्र पहने, बायें हाथमें रत्नमय दर्पण तथा दाहिनेमें सुन्दर रत्नमय कमल धारण करती हैं। उनके ललाटमें अनारके फूलकी भाँति लाल और अत्यन्त मनोहर सिन्दूर शोभित होता है। उसके साथ ही कस्तूरी और चन्दनके सुन्दर बिन्दु भी भालदेशका सौन्दर्य बढ़ाते हैं। वे सिरपर बालोंका चूड़ा धारण करती हैं, जो मालतीकी मालासे अलंकृत होता है। ऐसी राधा गोलोकमें गोपियोंद्वारा सेवित होती हैं। उनकी सेवामें रहनेवाली गोपियाँ भी

५७- सुस्वप्न-दर्शनके फलका विचार

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६७१

उन्हींके समान हैं। वे हाथमें श्वेत चँवर लिये रहती हैं और बहुमूल्य रत्नोंद्वारा निर्मित आभूषणोंसे विभूषित होती हैं। समस्त देवियोंमें श्रेष्ठ वे राधा ही मेरे प्राणोंकी अधिष्ठात्री देवी हैं। वे सुदामके शापसे इस समय भूतलपर वृषभानुनन्दिनीके रूपमें अवतीर्ण हुई हैं। मेरे साथ उनका अब सौ वर्षोंतक वियोग रहेगा। पिताजी! इन्हीं सौ वर्षोंकी अवधिमें मैं भूतलका भार उतारूँगा। तदनन्तर निश्चय ही श्रीराधा, तुम, माता यशोदा, गोप, गोपीगण, वृषभानुजी, उनकी पत्नी कलावती तथा अन्य बान्धवजनोंके साथ मैं गोलोकको चलूँगा। बाबा! यही बात तुम प्रसन्नतापूर्वक मैया यशोदासे भी कह देना। महाभाग! शोक छोड़ो और व्रजवासियोंके साथ व्रजको लौट जाओ। मैं सबका आत्मा और साक्षी हूँ। सम्पूर्ण जीवधारियोंके भीतर रहकर भी उनसे निर्लिप्त हूँ। जीव मेरा प्रतिबिम्ब है; यही सर्वसम्मत सिद्धान्त है। प्रकृति मेरा ही विकार है अर्थात् वह प्रकृति भी मैं ही हूँ। जैसे दूधमें धवलता होती है। दूध और धवलतामें कभी भेद नहीं होता। जैसे जलमें शीतलता, अग्निमें दाहिका शक्ति, आकाशमें शब्द, भूमिमें गन्ध, चन्द्रमामें शोभा, सूर्यमें प्रभा और जीवमें आत्मा है; उसी प्रकार राधाके साथ मुझको अभिन्न समझो। तुम राधाको साधारण गोपी और मुझे अपना पुत्र न जानो। मैं सबका उत्पादक परमेश्वर हूँ और राधा ईश्वरी प्रकृति है*।

बाबा! मेरी सुखदायिनी विभूतिका वर्णन सुनो, जिसे पहले मैंने अव्यक्तजन्मा ब्रह्माजीको बताया था। मैं देवताओंमें श्रीकृष्ण हूँ। गोलोकमें स्वयं ही द्विभुजरूपसे निवास करता हूँ और वैकुण्ठमें चतुर्भुज विष्णुरूपसे। शिवलोकमें मैं ही शिव हूँ। ब्रह्मलोकमें ब्रह्मा हूँ। तेजस्वियोंमें सूर्य हूँ। पवित्रोंमें अग्नि हूँ। द्रव-पदार्थोंमें जल हूँ। इन्द्रियोंमें मन हूँ। शीघ्रगामियोंमें समीर (वायु) हूँ। दण्ड प्रदान करनेवालोंमें मैं यम हूँ। कालगणना करनेवालोंमें काल हूँ। अक्षरोंमें अकार हूँ। सामोंमें साम हूँ, चौदह इन्द्रोंमें इन्द्र हूँ। धनियोंमें कुबेर हूँ। दिक्पालोंमें ईशान हूँ। व्यापक तत्त्वोंमें आकाश हूँ। जीवोंमें सबका अन्तरात्मा हूँ। आश्रमोंमें ब्रह्मतत्त्वज्ञ संन्यास आश्रम हूँ। धनोंमें मैं सर्वदुर्लभ बहुमूल्य रत्न हूँ। तैजस पदार्थोंमें सुवर्ण हूँ। मणियोंमें कौस्तुभ हूँ। पूज्य प्रतिमाओंमें शालग्राम तथा पत्तोंमें तुलसीदल हूँ। फूलोंमें पारिजात, तीर्थोंमें पुष्कर, वैष्णवोंमें कुमार, योगीन्द्रोंमें गणेश, सेनापतियोंमें स्कन्द, धनुर्धरोंमें लक्ष्मण, राजेन्द्रोंमें राम, नक्षत्रोंमें चन्द्रमा, मासोंमें मार्गशीर्ष, ऋतुओंमें वसन्त, दिनोंमें रविवार, तिथियोंमें एकादशी, सहनशीलोंमें पृथ्वी, बान्धवोंमें माता, भक्ष्य वस्तुओंमें अमृत, गौसे प्रकट होनेवाले खाद्यपदार्थोंमें घी, वृक्षोंमें कल्पवृक्ष, कामधेनुओंमें सुरभि, नदियोंमें पापनाशिनी गङ्गा, पण्डितोंमें पाण्डित्यपूर्ण वाणी, मन्त्रोंमें प्रणव, विद्याओंमें उनका बीजरूप तथा खेतसे पैदा होनेवाली वस्तुओंमें धान्य हूँ। फलवान् वृक्षोंमें पीपल, गुरुओंमें मन्त्रदाता गुरु, प्रजापतियोंमें कश्यप, पक्षियोंमें गरुड़, नागोंमें अनन्त (शेषनाग), नरोंमें नरेश, ब्रह्मर्षियोंमें भृगु, देवर्षियोंमें नारद, राजर्षियोंमें जनक, महर्षियोंमें शुक, गन्धर्वोंमें चित्ररथ, सिद्धोंमें कपिलमुनि, बुद्धिमानोंमें बृहस्पति, कवियोंमें शुक्राचार्य, ग्रहोंमें शनि, शिल्पियोंमें विश्वकर्मा, मृगोंमें मृगेन्द्र, वृषभोंमें शिववाहन नन्दी, गजराजोंमें ऐरावत, छन्दोंमें गायत्री, सम्पूर्ण शास्त्रोंमें वेद, जलचरोंमें उनका राजा वरुण, अप्सराओंमें उर्वशी, समुद्रोंमें जलनिधि, पर्वतोंमें सुमेरु, रत्नवान् शैलोंमें हिमालय, प्रकृतियोंमें देवी पार्वती तथा देवियोंमें लक्ष्मी हूँ।

मैं नारियोंमें शतरूपा, अपनी प्रियतमाओंमें


* यथा जीवस्तथात्मानं तथैव राधया सह। त्यज त्वं गोपिकाबुद्धिं राधायां मयि पुत्रताम्॥
अहं सर्वस्य प्रभवः सा च प्रकृतीश्वरी। (७३। ५० १/२)

६७२संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

राधिका तथा साध्वी स्त्रियोंमें निश्चय ही वेदमाता सावित्री हूँ। दैत्योंमें प्रह्लाद, बलिष्ठोंमें बलि, ज्ञानियोंमें भगवान् नारायण ऋषि, वानरोंमें हनुमान्, पाण्डवोंमें अर्जुन, नागकन्याओंमें मनसा, वसुओंमें द्रोण, बादलोंमें द्रोण, जम्बूद्वीपके नौ खण्डोंमें भारतवर्ष, कामियोंमें कामदेव, कामुकी स्त्रियोंमें रम्भा और लोकोंमें गोलोक हूँ, जो समस्त लोकोंमें उत्तम और सबसे परे है। मातृकाओंमें शान्ति, सुन्दरियोंमें रति, साक्षियोंमें धर्म, दिनके क्षणोंमें संध्या, देवताओंमें इन्द्र, राक्षसोंमें विभीषण, रुद्रोंमें कालाग्निरुद्र, भैरवोंमें संहारभैरव, शङ्खोंमें पाञ्चजन्य, अङ्गोंमें मस्तक, पुराणोंमें भागवत, इतिहासोंमें महाभारत, पाञ्चरात्रोंमें कपिल, मनुओंमें स्वायम्भुव, मुनियोंमें व्यासदेव, पितृपत्नियोंमें स्वधा, अग्निप्रियाओंमें स्वाहा, यज्ञोंमें राजसूय, यज्ञपत्नियोंमें दक्षिणा, अस्त्र-शस्त्रज्ञोंमें जमदग्निनन्दन महात्मा परशुराम, पौराणिकोंमें सूत, नीतिज्ञोंमें अङ्गिरा, व्रतोंमें विष्णुव्रत, बलोंमें दैवबल, ओषधियोंमें दूर्वा, तृणोंमें कुश, धर्मकर्मोंमें सत्य, स्नेहपात्रोंमें पुत्र, शत्रुओंमें व्याधि, व्याधियोंमें ज्वर, मेरी भक्तियोंमें दास्य-भक्ति, वरोंमें वर, आश्रमोंमें गृहस्थ, विवेकिय़ोंमें संन्यासी, शस्त्रोंमें सुदर्शन और शुभाशीर्वादोंमें कुशल हूँ।

ऐश्वर्योंमें महाज्ञान, सुखोंमें वैराग्य, प्रसन्नता प्रदान करनेवालोंमें मधुर वचन, दानोंमें आत्मदान, संचयोंमें धर्मकर्मका संचय, कर्मोंमें मेरा पूजन, कठोर कर्मोंमें तप, फलोंमें मोक्ष, अष्ट सिद्धियोंमें प्राकाम्य, पुरियोंमें काशी, नगरोंमें काञ्ची, देशोंमें वैष्णवोंका देश और समस्त स्थूल आधारोंमें मैं ही महान् विराट् हूँ। जगत्में जो अत्यन्त सूक्ष्म पदार्थ हैं; उनमें मैं परमाणु हूँ। वैद्योंमें अश्विनीकुमार, भेषजोंमें रसायन, मन्त्रवेत्ताओंमें धन्वन्तरि, विनाशकारी दुर्गुणोंमें विषाद, रागोंमें मेघ-मल्लार, रागिनियोंमें कामोद, मेरे पार्षदोंमें श्रीदामा, मेरे बन्धुओंमें उद्धव, पशुजीवोंमें गौ, वनोंमें चन्दन, पवित्रोंमें तीर्थ और निःशंकोंमें वैष्णव हूँ; वैष्णवसे बढ़कर दूसरा कोई प्राणी नहीं है। विशेषतः वह जो मेरे मन्त्रकी उपासना करता है, सर्वश्रेष्ठ है। मैं वृक्षोंमें अंकुर तथा सम्पूर्ण वस्तुओंमें उनका आकार हूँ। समस्त भूतोंमें मेरा निवास है, मुझमें सारा जगत् फैला हुआ है। जैसे वृक्षमें फल और फलोंमें वृक्षका अंकुर है, उसी प्रकार मैं सबका कारणरूप हूँ; मेरा कारण दूसरा नहीं है। मैं सबका ईश्वर हूँ; मेरा ईश्वर दूसरा कोई नहीं है। मैं कारणका भी कारण हूँ। मनीषी पुरुष मुझे ही सबके समस्त बीजोंका परम कारण बताते हैं। मेरी मायासे मोहित हुए पापीजन मुझे नहीं जान पाते हैं। मैं सब जन्तुओंका आत्मा हूँ; परंतु दुर्बुद्धि और दुर्भाग्यसे वञ्चित पापग्रस्त जीव मुझ अपने आत्माका भी आदर नहीं करते। जहाँ मैं हूँ, उसी शरीरमें सब शक्तियाँ और भूख-प्यास आदि हैं; मेरे निकलते ही सब उसी तरह निकल जाते हैं, जैसे राजाके पीछे-पीछे उसके सेवक। व्रजराज नन्दजी! मेरे बाबा! इस ज्ञानको हृदयमें धारण करके व्रजको जाओ और राधा तथा यशोदा मैयाको इसका उपदेश दो।

इस ज्ञानको भलीभाँति समझकर नन्दजी अपने अनुगामी व्रजवासियोंके साथ व्रजको लौट गये। वहाँ जाकर उन्होंने उन दोनों नारीशिरोमणियोंसे उस ज्ञानकी चर्चा की। नारद! वह महाज्ञान पाकर सब लोगोंने अपना शोक त्याग दिया। श्रीकृष्ण यद्यपि निर्लिप्त हैं, तथापि मायाके स्वामी हैं; इसलिये मायासे अनुरक्त जान पड़ते हैं। यशोदाजीने पुनः नन्दरायजीको माधवके पास भेजा। उनकी प्रेरणासे फिर आकर नन्दजीने ब्रह्माजीके द्वारा किये गये सामवेदोक्त स्तोत्रसे परमानन्दस्वरूप नन्दनन्दन माधवकी स्तुति की। तत्पश्चात् वे पुत्रके सामने खड़े हो बार-बार रोदन करने लगे। (अध्याय ७३)

५८- श्रीकृष्णके द्वारा नन्दको आध्यात्मिक ज्ञानका उपदेश, बाईस प्रकारकी सिद्धि, सिद्धमन्त्र तथा अदर्शनीय वस्तुओंका वर्णन

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६७३

श्रीकृष्णद्वारा नन्दजीको ज्ञानोपदेश, लोकनीति, लोकमर्यादा तथा लौकिक सदाचारसे सम्बन्ध रखनेवाले विविध विधि-निषेधोंका वर्णन, कुसङ्ग और कुलटाकी निन्दा, सती और भक्तकी प्रशंसा, शिवलिङ्ग-पूजन एवं शिवकी महत्ता

श्रीनारायण कहते हैं—नारद! भगवान् श्रीकृष्ण परमानन्दमय परिपूर्णतम प्रभु हैं। भक्तोंपर अनुग्रहके लिये व्याकुल रहनेवाले परम परमात्मा हैं। पृथ्वीका भार उतारनेके लिये अवतीर्ण हुए वे भगवान् निर्गुण, प्रकृतिसे परे तथा परात्पर हैं। ब्रह्मा, शिव और शेष भी उनके चरणोंकी वन्दना करते हैं। नन्दजीकी स्तुति सुनकर वे जगदीश्वर बहुत संतुष्ट हुए। नन्द बाबा विरहज्वरसे कातर हो गोकुलसे उनके पास आये थे।

श्रीभगवान्ने कहा—'बाबा! शोक और भ्रमको छोड़ो तथा व्रजको लौट जाओ। वहाँ जाकर सबको आनन्दित करो। मैं जो परम सत्य ज्ञान बता रहा हूँ, इसे सुनो। यह ज्ञान शोकग्रन्थिका उच्छेद करनेवाला है।'

यों कह पञ्चभूतोंका वर्णन करते हुए श्रीहरिने नन्द बाबाको उत्तम ज्ञानका उपदेश दिया और अन्तमें कहा—'तात! मेरे भक्तोंका कहीं अमङ्गल नहीं होता। मेरा सुदर्शनचक्र प्रतिदिन उनकी सब ओरसे रक्षा करता है। मेरी यह बात यशोदा मैयासे, गोपियोंसे और गोपगणोंसे कहो। उन सबके साथ शोकको त्याग दो। अच्छा अब घरको जाओ।' यों कहकर भगवान् श्रीकृष्ण यादवोंकी सभामें चुप हो गये। तब आनन्दमग्न नन्दने पुनः उनसे पूछा।

नन्द बोले—परमानन्दस्वरूप गोविन्द! मैं मूढ़ हूँ और तुम वेदोंके उत्पादक हो। मुझे ऐसा लौकिक ज्ञान बताओ, जिससे तुम्हारे चरणोंको प्राप्त कर सकूँ।

नन्दजीकी यह बात सुनकर सर्वज्ञ भगवान् श्रीकृष्णने उन्हें श्रुतिदुर्लभ आह्निक-कृत्यसम्बन्धी ज्ञान प्रदान किया।

श्रीभगवान् बोले—तात! मैं तुम्हें वह परम अद्भुत ज्ञान प्रदान करता हूँ, जो वेदोंमें अत्यन्त गोपनीय और पुराणोंमें अत्यन्त दुर्लभ है, कुलटा स्त्रियाँ मोक्ष-मार्गके द्वारको ढकनेके लिये अर्गलाएँ हैं, भ्रम और मायाकी सुन्दर भूमियाँ हैं; उनपर कभी विश्वास नहीं करना चाहिये। व्रजराज! असाध्वी स्त्रियाँ हरिभक्तिके विरुद्ध होती हैं। वे नाशकी बीजरूपा हैं। उनपर विश्वास करना कदापि उचित नहीं है। प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर रातमें पहने हुए कपड़ोंको त्याग दे और हृदय-कमलमें इष्टदेवका तथा ब्रह्मरन्ध्रमें परम गुरुका चिन्तन करे। मन-ही-मन उनका चिन्तन करके प्रातःकालिक कृत्य पूर्ण करनेके पश्चात् बुद्धिमान् पुरुष निश्चय ही निर्मल जलमें स्नान करे। कर्मका उच्छेद करनेवाला भक्त कोई कामना या संकल्प नहीं करता। वह स्नान करके भगवान्का स्मरण करता और संध्या करके घरको लौट जाता है। दरवाजेपर दोनों पैर धोकर वह घरमें प्रवेश करे और धुले हुए दो वस्त्र (धोती-चादर) धारण करके मोक्षके कारणभूत मुझ परमात्माका ही पूजन करे। शालग्राम, मणि, यन्त्र, प्रतिमा, जल, ब्राह्मण, गौ तथा गुरुमें सामान्यरूपसे मेरी स्थिति मानकर इनमें कहीं भी मेरी पूजा करनी चाहिये। कलशमें, अष्टदल कमलमें तथा चन्दननिर्मित पात्रमें भी मेरी पूजा की जा सकती है। सर्वत्र पूजनके समय आवाहन करे; परंतु शालग्राम-शिलामें और जलमें पूजा करनी हो तो आवाहन न करे। मन्त्रके अनुरूप ध्यानका श्लोक पढ़कर मेरा ध्यान करनेके पश्चात् व्रती पुरुष षोडशोपचारकी

६७४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

सामग्री क्रमशः अर्पित करे और भक्तिभावसे मूलमन्त्रद्वारा पूजा करे। मेरे साथ ही प्रथम आवरणमें श्रीदामा, सुदामा, वसुदामा, वीरभानु और शूरभानु—इन पाँच गोपोंका पूजन करे। तत्पश्चात् सुनन्द, नन्द, कुमुद और सुदर्शन—इन पार्षदोंका; लक्ष्मी, सरस्वती, दुर्गा, राधा, गङ्गा और पृथ्वी—इन देवियोंका; गुरु, तुलसी, शिव, कार्तिकेय और विनायकका तथा नवग्रहों और दस दिक्पालोंका सब दिशाओंमें विद्वान् पुरुष पूजन करे। सबसे पहले विघ्न-निवारणके लिये गणेश, सूर्य, अग्नि, विष्णु, शिव और पार्वती—इन छः देवताओंका पूजन करना चाहिये। ये वेदोक्त देवता कर्मबन्धनको काटनेवाले और मोक्ष प्रदान करनेवाले हैं। विघ्नोंके नाशके लिये गणेशका, रोगनिवारणके लिये सूर्यका, अभीष्टकी प्राप्ति तथा अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये अग्निका, मोक्षके निमित्त विष्णुका, ज्ञानदानके लिये शिवका तथा बुद्धि और मुक्तिके लिये विद्वान् पुरुष पार्वतीका पूजन करे। तीन बार पुष्पाञ्जलि देकर उन-उन देवताओंके स्तोत्र और कवचका पाठ करे। गुरुका वन्दन और पूजन करनेके पश्चात् देवताको प्रणाम करे। नित्यकर्म करके देवपूजनके पश्चात् सुखपूर्वक यथाप्राप्त कार्य करनेका विधान है। यह नित्यकर्म वेदवर्णित है। इसका अनुष्ठान करनेवाले पुरुषकी आत्मशुद्धि होती है।

बुद्धिमान् पुरुष मल-मूत्र, गुह्याङ्ग, स्त्रियोंके अङ्ग, कटाक्ष और हास्य आदि न देखे; क्योंकि ये सब विनाशके बीज हैं। उनका रूप सदा ही विपत्तिका कारण है। दिनमें अपनी स्त्रीके साथ भी समागम न करे; क्योंकि दिनमें स्त्री-सहवास करनेसे रोगोंकी उत्पत्ति होती है; नेत्रों और कानोंमें पीड़ा होती है। जब आकाशमें एक ही तारा उगा हो, उस समय उधर नहीं देखना चाहिये; अन्यथा रोगोंका भय प्राप्त होता है। यदि उस एक तारेको देख ले तो देवताओंका दर्शन और भगवान्‌का स्मरण करके सात बार नारदजीका नाम जपे। अस्तके समय सूर्य और चन्द्रमाको न देखे; क्योंकि उस समय उन्हें देखनेसे रोगोंकी उत्पत्ति होती है। कृष्णपक्षमें खण्डित चन्द्रमाके उदयकालमें उसे न देखे; अन्यथा रोग होता है। जलमें सूर्य और चन्द्रमाका प्रतिबिम्ब देखनेसे मनुष्यको शोककी प्राप्ति होती है। पराया मैथुन देखनेसे भाईका वियोग होता है; इसलिये उसे न देखे। पापीके साथ एक जगह सोना, बैठना, भोजन करना और घूमना-फिरना निषिद्ध है; क्योंकि वह सब नाशका लक्षण है। किसीके साथ बात करने, शरीरको छूने, सोने, बैठने और भोजन करनेसे उन दोनोंके पाप एक-दूसरेमें अवश्य संचरित होते हैं। ठीक उसी तरह, जैसे तेलका बिन्दु पानीमें पड़नेसे फैल जाता है। हिंसक जन्तुके समीप न जाय; क्योंकि उसके पास जाना दुःखका कारण होता है। दुष्टके साथ मेल-जोल न बढ़ाये; क्योंकि वह शोकप्रद होता है। ब्राह्मणों, गौओं तथा विशेषतः वैष्णवोंकी हिंसा न करे; उनकी हिंसा सर्वनाशका कारण बन जाती है। देवता, देवपूजक, ब्राह्मण और वैष्णवोंके धनका अपहरण न करे; क्योंकि वह धन सर्वनाशका कारण होता है। जो अपने या दूसरेके द्वारा दी हुई ब्राह्मणवृत्तिका अपहरण करता है; वह साठ हजार वर्षोंतक विष्ठाका कीड़ा होता है। ब्राह्मणको देनेके लिये जो दक्षिणा संकल्प की जाती है, वह यदि तत्काल न दे दी जाय तो एक रात बीतनेपर दूनी, एक मास बीतनेपर सौगुनी और दो मास बीतनेपर वह सहस्रगुनी हो जाती है। एक वर्ष बीत जाय तो दाता नरकमें पड़ता है। यदि दाता न दे और मूर्ख गृहीता न माँगे तो दोनों नरकमें पड़ते हैं। दाता रोगी होता है। ब्राह्मणोंकी हिंसा करनेसे अवश्य ही वंशकी हानि होती है। हिंसक मनुष्य धन और लक्ष्मीको खोकर भिखमंगा हो जाता है। देवता और ब्राह्मणको देखकर जो

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६७५

मस्तक नहीं झुकाता, वह शोकका भागी होता है। जो गुरुके प्रति भक्तिभाव नहीं रखता, उसे रौरव नरकका कष्ट भोगना पड़ता है।

जो दुराचारिणी मूढा स्त्री साक्षात् श्रीहरिस्वरूप अपने पतिकी ओर नहीं देखती, उलटे उसे डाँट बताती है; वह निश्चय ही कुम्भीपाकमें जाती है। वाणीद्वारा डाँट बतानेके कारण वह कौएकी योनिमें जन्म लेती है। हिंसा करनेसे सूकरी होती है। क्रोध करनेसे सर्पिणी और दर्प दिखानेसे गर्दभी होती है। कुवाक्य बोलनेसे कुक्कुरी और विष देनेसे अन्धी होती है। पतिव्रता स्त्री निश्चय ही पतिके साथ वैकुण्ठधाममें जाती है। जो मूढ़ शिव, पार्वती, गणेश, सूर्य, ब्राह्मण, वैष्णव तथा विष्णुकी निन्दा करता है; वह महारौरव नामक नरकमें गिरता है। पिता, माता, पुत्र, सती पत्नी, गुरु, अनाथा स्त्री, बहिन और पुत्रीकी निन्दा करके मनुष्य नरकगामी होता है। जो क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र ब्राह्मणोंके प्रति भक्तिभावसे रहित हैं और भगवद्भक्तिसे भी दूर हैं; वे निश्चय ही नरकमें पकाये जाते हैं। यही दशा पतिभक्तिसे शून्य नराधमा स्त्रियोंकी होती है।

जो ब्राह्मण शालग्रामका चरणामृत पीते और भगवान् विष्णुका प्रसाद खाते हैं वे तीर्थोंको भी पवित्र कर देते हैं। अपनी सौ पीढ़ियोंको तारते और पृथ्वीको भी उबारते हैं। जो भगवान् विष्णुका प्रसाद ग्रहण करता और मछली-मांस नहीं खाता है; वह निश्चय ही पग-पगपर अश्वमेध-यज्ञका फल पाता है। जो एकादशी और कृष्णजन्माष्टमीका व्रत करते हैं, वे सौ जन्मोंके किये हुए पापसे मुक्त हो जाते हैं; इसमें संशय नहीं है। बाल्यावस्था, कुमारावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्थामें भी जो-जो पाप बन गये हैं, वे सब भस्म हो जाते हैं। रोगी, अत्यन्त वृद्ध और बालकके लिये उपवासका नियम नहीं है। भक्त ब्राह्मणको द्विगुण भोजनका दान करके दाता शुद्ध हो जाता है। जो उपवासमें समर्थ होकर भी शिवरात्रि तथा श्रीरामनवमीके दिन भोजन करता है; वह महारौरव नरकमें पड़ता है। अमावास्या, पूर्णिमा, चतुर्दशी और अष्टमीको स्त्री, तैल तथा मांसका सेवन करनेसे मनुष्य चाण्डाल-योनिमें जन्म लेता है। रविवारको काँस्यपात्रमें भोजन न करे। उस दिन मसूरकी दाल, अदरख और लाल रंगका शाक भी न खाय। व्रजेश्वर ! जो ब्राह्मण रजस्वला और वेश्याके हाथका तथा मदिरामिश्रित अन्न खा लेता है; वह निश्चय ही मलभोजी जन्तु होता है। वह उस दिन जो सत्कर्म करता है, उसका फल उसे नहीं मिलता। वह सदा अपवित्र रहता है। उसका अशौच उसके मरनेके बाद ही समाप्त होता है। जिस स्त्रीने अपने जीवनमें चार पुरुषोंके साथ समागम कर लिया; उसे वेश्या समझना चाहिये। वह देवताओं और पितरोंके लिये भोजन बनानेकी अधिकारिणी नहीं है।

जो प्रातःकाल और सायंकालकी संध्योपासना नहीं करता, उसका समस्त द्विजोचित कर्मोंसे शूद्रकी भाँति बहिष्कार कर देना चाहिये। संध्याहीन द्विज नित्य अपवित्र तथा समस्त कर्मोंके लिये अयोग्य होता है। वह दिनमें जो सत्कर्म करता है; उसका फल उसे नहीं मिलता। राममन्त्रसे हीन ब्राह्मण नरकमें पड़ता है। नदीके बीचमें, गड्ढेमें, वृक्षकी जड़में, पानीके निकट, देवताके समीप और खेतीसे भरी हुई भूमिपर समझदार मनुष्य मलत्याग न करे। बाँबीसे निकली हुई, चूहेकी खोदी हुई, पानीके भीतरसे निकाली हुई, शौचसे बची हुई और घरके लीपनेसे प्राप्त हुई मिट्टीको शौचके काममें न ले। जिस मिट्टीमें चींटी आदि प्राणी हों, उसे भी शौचके काममें न ले। व्रजेश्वर ! हल चलानेसे उखड़ी हुई, पौधोंके थालेसे निकाली हुई, जिस खेतमें खेती लहलहा रही हो उसकी मिट्टी, वृक्षकी जड़से खोदकर ली हुई मिट्टी तथा नदीके पेटेसे निकाली हुई मृत्तिका—इन सबको