ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
९० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण श्रीहरि ही विद्यमान हैं, उसे तपस्यासे क्या लेना है? जिसके बाहर और भीतर श्रीहरि नहीं हैं अर्थात् जो श्रीहरिको अपने बाहर और भीतर व्यास नहीं देखता, उसे भी व्यर्थकी तपस्यासे क्या लेना-देना है? तपस्याके द्वारा श्रीहरिकी ही आराधना की जाती है, दूसरा कोई आराध्य नहीं है। बेटा ! जहाँ-तहाँ कहीं भी रहकर की हुई श्रीकृष्णकी सेवा सर्वोत्तम तप है। अतः तुम मेरे कहनेसे ही घरमें रहकर श्रीहरिका भजन करो। मुनिश्रेष्ठ ! गृहस्थ बनो; क्योंकि गृहस्थोंको सदा ही सुख मिलता है। पत्नीके परिग्रहका प्रयोजन है पुत्रकी प्राप्ति; क्योंकि पुत्र सैकड़ों प्राणवल्लभा पत्नियोंसे भी अधिक प्रिय होता है। पुत्रसे बढ़कर कोई बन्धु नहीं है तथा पुत्रसे बढ़कर कोई प्रिय नहीं है। सबसे जीतनेकी इच्छा करे। एकमात्र पुत्रसे ही पराजयकी कामना करे। कोई भी प्रिय पदार्थ अपने लिये नहीं (पुत्रके लिये) रखा जाता है; इसलिये भी पुत्र प्रिय होता है। अतः प्रियतम पुत्रको अपना श्रेष्ठ धन सौंप देना चाहिये। शौनक ! ऐसा कहकर ब्रह्माजी चुप हो गये। तब ज्ञानिशिरोमणि नारदने पितासे यह बात कही। नारदजी बोले-तात ! जो स्वयं सब कुछ जानकर अपने पुत्रको कुमार्गमें लगाता है, वह पिता दयालु कैसे माना जा सकता है? ब्रह्मन् ! सारा संसार पानीके बुलबुलेके समान नश्वर है। जैसे जलकी रेखा मिथ्या होती है, उसी प्रकार तीनों लोक मिथ्या हैं। जिसका मन श्रीहरिकी दासता छोड़कर विषयके लिये चञ्चल रहता है, उसका दुर्लभ मानव तन व्यर्थ हो गया। भवसागरमें कौन किसकी प्रिया है और कौन किसका पुत्र या बन्धु है? कर्ममयी तरङ्गोंके उठनेसे इन सबका संयोग हो जाता है और उन तरङ्गोंके शान्त होनेपर ये एक-दूसरेसे बिछुड़ जाते हैं। जो सत्कर्म करवाता है, वही मित्र है, वही पिता और गुरु है। जो दुर्बुद्धि उत्पन्न करता है, वह तो शत्रु है। उसे पिता कैसे कहा जा सकता है? तात ! इस प्रकार मैंने शास्त्रके अनुसार वेदका बीज (सारतत्त्व) बताया। यद्यपि यह ध्रुव सत्य है, तथापि मुझे आपकी आज्ञाका पालन करना चाहिये। भगवन् ! पहले मैं नर- नारायणके आश्रमपर जाऊँगा। वहाँ नारायणकी वार्ता सुननेके पश्चात् पत्नी-परिग्रह करूँगा। ऐसा कहकर नारदमुनि पिताके सामने चुप हो रहे, उसी क्षण उनके ऊपर फूलोंकी वर्षा होने लगी। पिताके सामने क्षणभर खड़े रहकर मुनिवर नारदने फिर यह मङ्गलदायक वचन कहा। श्रीनारद बोले-पिताजी ! पहले मुझे कृष्णमन्त्रका उपदेश दीजिये, जो मेरे मनको अभीष्ट है। श्रीकृष्णमन्त्र-सम्बन्धी जो ज्ञान है तथा जिसमें उनके गुणोंका वर्णन है, वह सब भी मुझे बताइये। इसके बाद आपकी प्रसन्नताके लिये मैं दार-संग्रह करूँगा; क्योंकि मनकी इच्छा पूर्ण हो जानेपर ही मनुष्यको कोई काम करनेमें सुख मिलता है। नारदकी यह बात सुनकर ज्ञानवेत्ताओंमें श्रेष्ठ कमलजन्मा ब्रह्माजी बड़े प्रसन्न हुए और अपने पुत्रसे फिर इस प्रकार बोले।
२७- परब्रह्म परमात्माके स्वरूपका निरूपण
ब्रह्मखण्ड ९१
ब्रह्माजीने कहा—वत्स! भगवान् शंकर तुम्हारे पूर्वजन्मके गुरु हैं और हमारे भी पुरातन गुरु हैं। अतः तुम उन्हीं ज्ञानियोंके गुरु कल्याणदाता शान्तस्वरूप शिवके पास जाओ। वहीं उन पुरातन गुरुसे भगवन्मन्त्रका ज्ञान प्राप्त करके नारायणकी कथा-वार्ता सुनो और शीघ्र ही मेरे घर लौट आओ। शौनक! ऐसा कहकर तीनों लोकोंका धारण-पोषण करनेवाले ब्रह्माजी चुप हो गये और नारदमुनि पिताको भक्तिभावसे प्रणाम करके शिवलोकको चले गये। (अध्याय २४)
नारदजीको भगवान् शिवका दर्शन, शिवद्वारा नारदजीका सत्कार तथा उनकी मनोवाञ्छापूर्तिके लिये आश्वासन
सौति कहते हैं—शौनक! तदनन्तर विप्रवर नारद क्षणभरमें बड़ी प्रसन्नताके साथ शिवके मनोहर धाममें जा पहुँचे। भगवान् शिवका वह अभीष्ट लोक ध्रुवसे एक लाख योजन ऊपर था। त्रिशूलधारी शिवने दिव्य रत्नोंद्वारा उसका निर्माण किया है। आधारशून्य आकाशमें योगबलसे शम्भुद्वारा धारण किया गया वह विचित्र लोक भाँति-भाँतिके दिव्य भवनोंसे सुशोभित है तथा दिन-रात तेजसे उद्भासित होता रहता है। पवित्र अन्तःकरणवाले श्रेष्ठ साधक तथा मुनीन्द्रशिरोमणि महात्माजन ही उस लोकका दर्शन कर पाते हैं।
मुने! वहाँ सूर्य और चन्द्रमाकी किरणें नहीं पहुँच पातीं। परकोटोंके रूपमें प्रकट हुए अत्यन्त ऊँचे, बहुत बढ़े हुए तथा ज्वालाओंसे जगमगाते हुए असंख्य पावक उस लोकको चारों ओरसे घेरकर स्थित हैं। उस श्रेष्ठ धामका विस्तार एक लाख योजन है। उसमें श्रेष्ठ रत्नोंके बने हुए तीन हजार गृह हैं। हीरेके सार-तत्त्वसे बने हुए भाँति-भाँतिके चित्र-विचित्र मनोहर भवन उसकी शोभा बढ़ाते हैं। वहाँ माणिक्य तथा मुक्तामणिके दर्पण हैं। विश्वकर्माने उस लोकको सपनेमें भी नहीं देखा होगा। एकमात्र शिवसेवी महात्माजन ही उसमें कल्पपर्यन्त निरन्तर वास करते हैं। वह शिवलोक करोड़ों-करोड़ों सिद्धों तथा शिव-पार्षदोंसे युक्त है। वहाँ लाखों विकट भैरव निवास करते हैं। सैकड़ों लाख क्षेत्र उसे घेरे हुए हैं।
सुन्दर फूलोंसे भरे हुए मन्दार आदि देववृक्षोंसे वह सदा आवेष्टित है। सुन्दर कामधेनुएँ उस धामकी उसी तरह शोभा बढ़ाती हैं, जैसे सैकड़ों बलाकाएँ आकाशकी। उस लोकको देखकर नारदमुनि मन-ही-मन बड़े विस्मित हुए और सोचने लगे—'जहाँ ज्ञानियों तथा योगियोंके गुरु निवास करते हैं, वहाँ ऐसी विचित्रताका होना क्या आश्चर्य है? यह सृष्टिलोक त्रिलोकीसे अत्यन्त विलक्षण है और भय, मृत्यु, रोग, पीड़ा तथा जरावस्थाको हर लेनेवाला है।
नारदजीने देखा, दूर सभा-मण्डपके मध्य-भागमें शान्तस्वरूप, कल्याणदाता एवं मनोहर शिव विराजमान हैं। उनके पाँच मुख पाँच चन्द्रमाओंके समान आह्लाददायक जान पड़ते हैं। प्रत्येक मुखमें प्रफुल्ल कमलके समान तीन-तीन नेत्र हैं। उन्होंने मस्तकपर गङ्गाजीको धारण कर रखा है तथा उनके भालदेशमें निर्मल चन्द्रमाका मुकुट शोभा पा रहा है। तपाये हुए सुवर्णके समान कान्तिमती पीली जटा धारण करनेवाले दिगम्बर भगवान् शिव उस समय आकाशगङ्गामें उत्पन्न कमलोंके बीज (पद्माक्ष)-की मालासे सानन्द 'श्रीकृष्ण' नामका जप कर रहे थे। उनकी अङ्गकान्ति गौर वर्णकी है, वे अनन्त और अविनाशी हैं। उनके कण्ठमें सुन्दर नील चिह्न शोभा पाता है। वे नागराजके हारसे अलंकृत हैं। बड़े-बड़े योगीन्द्र, सिद्धेन्द्र और मुनीन्द्र उनके
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चरणोंकी वन्दना करते हैं। वे सिद्धेश्वर हैं, सिद्धिविधानके कारण हैं, मृत्युञ्जय हैं तथा काल और यमका भी अन्त करनेवाले हैं। उनका मुख प्रसन्नतासूचक हास्यसे अत्यन्त मनोहर जान पड़ता है। वे सम्पूर्ण आश्रितोंको कल्याण तथा अभीष्ट वर प्रदान करनेवाले हैं। सदा शीघ्र ही संतुष्ट होनेवाले, भवरोगसे रहित, भक्तजनोंके प्रिय तथा भक्तोंके एकमात्र बन्धु हैं।
दूरसे देखनेके पश्चात् निकट जाकर मुनिने भगवान् शूलपाणिको मस्तक झुकाकर प्रणाम किया। उस समय मुनिके शरीरमें रोमाञ्च हो आया था। वे तीन तारवाली वीणा बजाते हुए कलहंसके समान मधुर कण्ठसे पुनः श्रीकृष्णका गुणगान करने लगे। ब्रह्माजीके पुत्र और वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ मुनीन्द्रशिरोमणि नारदको आया देख भगवान् शंकर योगीन्द्र, सिद्धेन्द्र और महर्षियोंके साथ मुस्कराते हुए सिंहासनसे वेगपूर्वक उठकर खड़े हो गये। फिर उन्होंने मुनिको बड़े वेगसे पकड़कर हृदयसे लगा लिया और आशीर्वाद तथा आसन आदि दिये। साथ ही उन तपोधनसे आनेका प्रयोजन और कुशल-मङ्गल पूछा। इसके बाद भगवान् शम्भु उत्तम रत्नोंके बने हुए श्रेष्ठ एवं सुन्दर सिंहासनपर अपने प्रमुख पार्षदोंके साथ बैठे। किंतु ब्रह्माजीके पुत्र नारद नहीं बैठे। उन्होंने भक्तिभावसे प्रभुको प्रणाम करके दोनों हाथ जोड़कर उनकी स्तुति की। गन्धर्वराजके द्वारा किये गये शुभदायक वेदोक्त स्तोत्रसे स्तुति करके पुनः प्रणाम करनेके अनन्तर भगवान् शिवकी आज्ञा ले नारदजी उनके वाम-भागमें बैठे। वहीं उन्होंने जगत्की वाञ्छा पूर्ण करनेवाले भगवान् शिवसे अपनी हार्दिक अभिलाषा बतायी। मुनिका वह वचन सुनकर कृपानिधान शंकरने तुरंत प्रतिज्ञापूर्वक कहा—'बहुत अच्छा, तुम्हारी अभिलाषा पूर्ण होगी।' (अध्याय २५)
ब्राह्मणोंके आह्निक आचार तथा भगवान्के पूजनकी विधिका वर्णन
**सौति कहते हैं—**शौनकजी! देवर्षि नारदने भगवान् शंकरसे श्रीहरिके स्तोत्र, कवच, मन्त्र, उत्तम पूजाविधान, ध्यान तथा उनके तत्त्वज्ञानकी याचना की। महेश्वरने उन्हें स्तोत्र, कवच, मन्त्र, ध्यान, पूजाविधि तथा उनके पूर्वजन्म-सम्बन्धी ज्ञानका उपदेश दिया। वह सब कुछ पाकर मुनिश्रेष्ठ नारदका मनोरथ पूर्ण हो गया। उन्होंने अपने शरणागतवत्सल गुरु भगवान् शिवको भक्तिभावसे प्रणाम किया और इस प्रकार कहा।
**नारदजी बोले—**वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ प्रभो! आप ब्राह्मणोंके आह्निक आचार (दिनचर्या या नित्य-कर्म)-का वर्णन कीजिये, जिससे प्रतिदिन स्वधर्मपालन हो सके।
**श्रीमहेश्वरने कहा—**प्रतिदिन ब्राह्ममुहूर्तमें उठकर रात्रिमें पहने हुए कपड़ेको बदल दे और अपने ब्रह्मरन्ध्रमें स्थित सूक्ष्म, निर्मल, ग्लानिरहित सहस्रदल-कमलपर विराजमान गुरुदेवका चिन्तन करे। ध्यानमें यह देखे कि ब्रह्मरन्ध्रवर्ती सहस्रदल-कमलपर गुरुजी प्रसन्नतापूर्वक बैठे हैं, मन्द-मन्द मुस्करा रहे हैं, व्याख्याकी मुद्रामें उनका हाथ उठा हुआ है और शिष्यके प्रति उनके हृदयमें बड़ा स्नेह है। मुखपर प्रसन्नता छा रही है। वे शान्त तथा निरन्तर संतुष्ट रहनेवाले हैं और साक्षात् परब्रह्मस्वरूप हैं। सदा इसी प्रकार उनका चिन्तन करना चाहिये। इस तरह ध्यान करके मन-ही-मन गुरुकी आराधना करे। तदनन्तर निर्मल, श्वेत, सहस्रदलभूषित, विस्तृत हृदयकमलपर विराजमान इष्टदेवका चिन्तन करे। जिस देवताका जैसा ध्यान और जो रूप बताया गया है, वैसा ही चिन्तन करना चाहिये। गुरुकी आज्ञा ले समयोचित कर्तव्यका पालन करना चाहिये। क्रम यह है कि पहले गुरुका ध्यान करके उन्हें प्रणाम करे। फिर उनकी विधिवत् पूजा करनेके
ब्रह्मखण्ड ९३
पश्चात् उनकी आज्ञा ले इष्टदेवका ध्यान एवं पूजन करे। गुरु ही देवताके स्वरूपका दर्शन कराते हैं। वे ही इष्टदेवके मन्त्र, पूजाविधि और जपका उपदेश देते हैं। गुरुने इष्टदेवको देखा है; किंतु इष्टदेवने गुरुको नहीं देखा है। इसलिये गुरु इष्टदेवसे भी बढ़कर हैं। गुरु ब्रह्मा हैं, गुरु विष्णु हैं, गुरु महेश्वरदेव हैं, गुरु आद्या प्रकृति-ईश्वरी (दुर्गा देवी) हैं, गुरु चन्द्रमा, अग्नि और सूर्य हैं, गुरु ही वायु और वरुण हैं, गुरु ही माता-पिता और सुहृद् हैं तथा गुरु ही परब्रह्म परमात्मा हैं। गुरुसे बढ़कर दूसरा कोई पूजनीय नहीं है। इष्टदेवके रुष्ट होनेपर गुरु शिष्य अथवा साधककी रक्षा करनेमें समर्थ हैं। परंतु गुरुदेवके रुष्ट होनेपर सम्पूर्ण देवता मिलकर भी उस साधककी रक्षा करनेमें समर्थ नहीं हैं। जिसपर गुरु सदा संतुष्ट हैं, उसे पग-पगपर विजय प्राप्त होती है और जिसपर गुरुदेव रुष्ट हैं, उसके लिये सदा सर्वनाशकी ही सम्भावना रहती है। जो मूढ़ भ्रमवश गुरुकी पूजा न करके इष्टदेवका पूजन करता है, वह सैकड़ों ब्रह्महत्याओंके पापका भागी होता है, इसमें संशय नहीं है। सामवेदमें साक्षात् भगवान् श्रीहरिने भी ऐसी बात कही है। इसलिये गुरु इष्टदेवसे भी बढ़कर परम पूजनीय हैं।
मुने! इस प्रकार गुरुदेव तथा इष्टदेवका ध्यान एवं स्तवन करके साधक वेदमें बताये हुए स्थानपर पहुँचकर प्रसन्नतापूर्वक मल और मूत्रका त्याग करे। जल, जलके निकट का स्थान, बिलयुक्त भूमि, प्राणियोंके निवासके निकट, देवालयके समीप, वृक्षकी जड़के पास, मार्ग, हलसे जोती हुई भूमि, खेतीसे भरे हुए खेत, गोशाला, नदी, कन्दराके भीतरका स्थान, फुलवाड़ी, कीचड़युक्त अथवा दलदलकी भूमि, गाँव आदिके भीतरकी भूमि, लोगोंके घरके आसपासका स्थान, मेख या खम्भेके पास, पुल, सरकंडोंके वन, श्मशानभूमि, अग्निके समीप, क्रीडास्थल (खेल-कूदके मैदान), विशाल वन, मचानके नीचेका स्थान, पेड़की छायासे युक्त स्थान, जहाँ भूमिके भीतर प्राणी रहते हों वह स्थान, जहाँ ढेर-के-ढेर पत्ते जमा हों वह भूमि, जहाँ घनी दूब उगी हो अथवा कुश जमे हों वह स्थान, बाँबी, जहाँ वृक्ष लगाये गये हों वहाँकी भूमि तथा जो किसी विशेष कार्यके लिये झाड़-बुहारकर साफ की गयी हो, वह भूमि-इन सबको छोड़कर सूर्यके तापसे रहित स्थानमें गड्ढा खोद उसीमें मल-मूत्रका त्याग करना चाहिये।
दिनमें उत्तराभिमुख होकर मल-मूत्रका त्याग करे; रातमें पश्चिमकी ओर मुँह करके और संध्याकालमें दक्षिणकी ओर मुँह रखते हुए मलोत्सर्ग तथा मूत्रोत्सर्ग करना उचित है। मौन रहकर, जोर-जोरसे साँस न लेते हुए मलत्याग करे, जिससे उसकी दुर्गन्ध नाकमें न जाय। मलत्यागके पश्चात् उस मलको मिट्टी डालकर ढक दे। तदनन्तर बुद्धिमान् पुरुष गुदा आदि अङ्गोंको शुद्ध करे। पहले ढेले या मिट्टीसे गुदा आदिकी शुद्धि करे। तत्पश्चात् उसे जलसे धोकर शुद्ध करे। मृत्तिकायुक्त जो जल शौचके उपयोगमें आता है, उसका परिमाण सुनो। मूत्रत्यागके पश्चात् लिङ्गमें एक बार मिट्टी लगाये और धोये। फिर बायें हाथमें चार बार मिट्टी लगाकर धोये। तत्पश्चात् दोनों हाथोंमें दो बार मिट्टी लगाकर धोना चाहिये, यह मूत्र-शौच कहा गया। यदि मैथुनके अनन्तर मूत्र-शौच करना हो तो उसमें मिट्टी लगाने और धोनेकी संख्या दुगुनी कर दे अथवा मैथुनके अनन्तरका शौच मूत्र-शौचकी अपेक्षा चौगुना होना चाहिये। मलत्यागके पश्चात् लिङ्गमें एक बार, गुदामें तीन बार, बायें हाथमें दस बार तथा दोनों हाथोंमें सात बार मिट्टी देनी चाहिये। छठे बार मिट्टी लगाकर धोनेसे पैरोंकी शुद्धि होती है। गृहस्थ ब्राह्मणोंके लिये मलत्यागके अनन्तर यही शौच बताया गया है। विधवाओंके लिये इस शौचका परिमाण दुगुना बताया गया है।
२८- बदरिकाश्रममें नारायणके प्रति नारदजीका प्रश्न
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यतियों, वैष्णवों, ब्रह्मर्षियों एवं ब्रह्मचारियोंके लिये गृहस्थोंकी अपेक्षा चौगुने शौचका विधान किया गया है। उपनयनरहित द्विज, शूद्र तथा स्त्रीके लिये उतने ही शौचका विधान है, जितनेसे उन-उन अङ्गोंमें लगे हुए मलके लेप और दुर्गन्ध मिट जायँ। क्षत्रिय और वैश्यके लिये भी गृहस्थ ब्राह्मणोंके समान शौचका विधान है। वैष्णव आदि मुनियोंके लिये दुगुना शौच कहा गया है। शुद्धिकी इच्छा रखनेवाले मनुष्यको शौचके उपर्युक्त नियममें न्यूनता या अधिकता नहीं करनी चाहिये; क्योंकि विहित नियमका उल्लङ्घन करनेपर प्रायश्चित्तका भागी होना पड़ता है।
नारद! अब तुम मुझसे शौच तथा उसके नियमके विषयमें सावधान होकर सुनो! मिट्टीसे शुद्धि करनेपर ही वास्तविक शुद्धि होती है। ब्राह्मण भी इस नियमका उल्लङ्घन करे तो वह अशुद्ध ही है। बाँबीकी मिट्टी, चूहोंकी खोदी हुई मिट्टी और पानीके भीतरकी मिट्टी भी शौचके उपयोगमें न लाये। शौचसे बची हुई मिट्टी, घरकी दीवारसे ली हुई मिट्टी तथा लीपने-पोतनेके काममें लायी हुई मिट्टी भी शौचके लिये त्याज्य है। जिसके भीतर प्राणी रहते हों, जहाँ पेड़से गिरे हुए पत्तोंके ढेर लगे हों तथा जहाँकी भूमि हलसे जोती गयी हो, वहाँकी भी मिट्टी न ले। कुश और दूर्वाके जड़से निकाली गयी, पीपलकी जड़के निकटसे लायी गयी तथा शयनकी वेदीसे निकाली गयी मिट्टीको भी शौचके काममें न लाये। चौराहेकी, गोशालाकी, गायकी खुरीकी, जहाँ खेती लहलहा रही हो, उस खेतकी तथा उद्यानकी मिट्टीको भी त्याग दे।
ब्राह्मण नहाया हो अथवा नहीं, उपर्युक्त शौचाचारके पालनमात्रसे शुद्ध हो जाता है तथा जो शौचसे हीन है, वह नित्य अपवित्र एवं समस्त कर्मोंके अयोग्य है। विद्वान् ब्राह्मण इस शौचाचारका पालन करके मुँह धोये। पहले सोलह बार कुल्ला करके मुख शुद्ध करनेके पश्चात् दँतुवनसे दाँतकी सफाई करे। फिर सोलह बार कुल्ला करके मुँह शुद्ध करे। नारद! दाँत माँजनेके लिये जो काठकी लकड़ी ली जाती है, उसके विषयमें भी कुछ नियम है, उसे सुनो। सामवेदमें श्रीहरिने आह्निक प्रकरणमें इसका निरूपण किया है। अपामार्ग (चिड़चिड़ा या ऊँगा), सिन्धुवार (सँभालू या निर्गुण्डी), आम, करवीर (कनेर), खैर, सिरस, जाति (जायफल), पुन्नाग (नागकेसर या कायफल), शाल (साखू), अशोक, अर्जुन, दूधवाला वृक्ष, कदम्ब, जामुन, मौलसिरी, उड़्र (अढ़उल) और पलाश—ये वृक्ष दँतुवनके लिये उत्तम माने गये हैं। बेर, देवदारु, मन्दार (आक), सेमर, कँटीले वृक्ष तथा लता आदिको त्याग देना चाहिये। पीपल, प्रियाल (पियाल), तिन्तिडीक (इमली), ताड़, खजूर और नारियल आदि वृक्ष दँतुवनके उपयोगमें वर्जित हैं। जिसने दाँतोंकी शुद्धि नहीं की, वह सब प्रकारके शौचसे रहित है। शौचहीन पुरुष सदा अपवित्र होता है। वह समस्त कर्मोंके लिये अयोग्य है। शौचाचारका पालन करके शुद्ध हुआ ब्राह्मण स्नानके पश्चात् दो धुले हुए वस्त्र धारण करके पैर धो आचमनके पश्चात् प्रातः-कालकी संध्या करे।
इस प्रकार जो कुलीन ब्राह्मण तीनों संध्याओंके समय संध्योपासना करता है, वह समस्त तीर्थोंमें स्नानके पुण्यका भागी होता है। जो त्रिकाल संध्या नहीं करता, वह अपवित्र है। समस्त कर्मोंके अयोग्य है। वह दिनमें जो काम करता है, उसके फलका भागी नहीं होता। जो प्रातः और सायं संध्याका अनुष्ठान नहीं करता, वह शूद्रके समान है। उसको समस्त ब्राह्मणोचित कर्मसे बाहर निकाल देना चाहिये।* प्रातः, मध्याह्न और सायं-
* नोपतिष्ठति यः पूर्वां नोपास्ते यस्तु पश्चिमाम्। स शूद्रवद्बहिष्कार्यः सर्वस्माद् द्विजकर्मणः ॥
(ब्रह्मखण्ड २६।५३)
२९- नारायणके द्वारा परमपुरुष परमात्मा श्रीकृष्ण तथा प्रकृतिदेवीकी महिमाका प्रतिपादन
ब्रह्मखण्ड
संध्याका परित्याग करके द्विज प्रतिदिन ब्रह्महत्या और आत्महत्याके पापका भागी होता है। जो एकादशीके व्रत और संध्योपासनासे हीन है, वह द्विज शूद्रजातिकी स्त्रीसे सम्बन्ध रखनेवाले पापीकी भाँति एक कल्पतक कालसूत्र नामक नरकमें निवास करता है। प्रातःकालकी संध्योपासना करके श्रेष्ठ साधक गुरु, इष्टदेव, सूर्य, ब्रह्मा, महादेव, विष्णु, माया, लक्ष्मी और सरस्वतीको प्रणाम करे। तत्पश्चात् गुड़, घी, दर्पण, मधु और सुवर्णका स्पर्श करके समयानुसार स्नान आदि करे। जब पोखरी या बावड़ीमें स्नान करे, तब धर्मात्मा एवं विद्वान् पुरुष पहले उसमेंसे पाँच पिण्ड मिट्टी निकालकर बाहर फेंक दे। नदी, नद, गुफा अथवा तीर्थमें स्नान करना चाहिये। पहले जलमें गोता लगाकर पुनः स्नानके लिये संकल्प करे। वैष्णव महात्माओंका स्नानविषयक संकल्प श्रीकृष्णकी प्रीतिके लिये होता है और गृहस्थोंका वह संकल्प किये हुए पापोंके नाशके उद्देश्यसे होता है। ब्राह्मण संकल्प करके अपने शरीरमें मिट्टी पोते। उस समय निम्नांकित वेद-मन्त्रका पाठ करे। मिट्टी लगानेका उद्देश्य शरीरकी शुद्धि ही है।
शरीरमें मृत्तिका-लेपनका मन्त्र
अश्वक्रान्ते रथक्रान्ते विष्णुक्रान्ते वसुन्धरे।
मृत्तिके हर मे पापं यन्मया दुष्कृतं कृतम्॥
'वसुन्धरे! तुम्हारे ऊपर अश्व चलते हैं, रथ दौड़ते हैं और भगवान् विष्णुने अपने चरणोंसे तुम्हें आक्रान्त किया है (अथवा अवतारकालमें वे तुम्हारे ऊपर लीलाविहार करते हैं)। मृत्तिकामयी देवि! मैंने जो भी दुष्कर्म किया है, मेरा वह सारा पाप तुम हर लो।'
उद्धृतासि वराहेण कृष्णेन शतबाहुना।
आरुह्य मम गात्राणि सर्वं पापं प्रमोचय॥
पुण्यं देहि महाभागे स्नानानुज्ञां कुरुष्व माम्।
'सैकड़ों भुजाओंसे सुशोभित वराहरूपधारी श्रीकृष्णने एकार्णवके जलसे तुम्हें ऊपर उठाया है। तुम मेरे अङ्गोंपर आरूढ़ हो समस्त पापोंको दूर कर दो। महाभागे! पुण्य प्रदान करो और मुझे स्नान करनेके लिये आज्ञा दो।'
तपोधन! ऐसा कहकर नाभितक जलमें प्रवेश करे और मन्त्रोच्चारणपूर्वक चार हाथ लम्बा-चौड़ा सुन्दर मण्डल बनाकर उसमें हाथ दे तीर्थोंका आवाहन करे। जो-जो तीर्थ हैं, उन सबका वर्णन कर रहा हूँ।
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् संनिधिं कुरु ॥
'हे गङ्गे! यमुने! गोदावरि! सरस्वति! नर्मदे! सिन्धु! और कावेरि! तुम सब लोग इस जलमें निवास करो' (इस प्रकार आवाहन करनेसे सब तीर्थ जलमें आ जाते हैं)। तदनन्तर नलिनी, नन्दिनी, सीता, मालिनी, महापथा, भगवान् विष्णुके पादार्घ्यसे प्रकट हुई त्रिपथगामिनी गङ्गा, पद्मावती, भोगवती, स्वर्णरेखा, कौशिकी, दक्षा, पृथ्वी, सुभगा, विश्वकाया, शिवामृता, विद्याधरी, सुप्रसन्ना, लोकप्रसाधिनी, क्षेमा, वैष्णवी, शान्ता, शान्तिदा, गोमती, सती, सावित्री, तुलसी, दुर्गा, महालक्ष्मी, सरस्वती, श्रीकृष्णप्राणाधिका राधिका, लोपामुद्रा, दिति, रति, अहल्या, अदिति, संज्ञा, स्वधा, स्वाहा, अरुन्धती, शतरूपा तथा देवहूति इत्यादि देवियोंका शुद्ध बुद्धिवाला बुद्धिमान् पुरुष स्मरण करे। इनके स्मरणसे स्नान कर अथवा बिना स्नान किये ही मनुष्य परम पवित्र हो जाता है। इसके बाद विद्वान् पुरुष दोनों भुजाओंके मूलभागमें, ललाटमें, कण्ठदेशमें और वक्षःस्थलमें तिलक लगाये। यदि ललाटमें तिलक न हो तो स्नान, दान, तप, होम, देवयज्ञ तथा पितृयज्ञ—सब कुछ निष्फल हो जाता है। ब्राह्मण स्नानके पश्चात् तिलक करके संध्या और तर्पण करे। फिर भक्तिभावसे देवताओंको नमस्कार करके प्रसन्नतापूर्वक अपने घरको जाय। वहाँ यत्नपूर्वक पैर धोकर धुले हुए दो वस्त्र धारण
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करे। तत्पश्चात् बुद्धिमान् पुरुष मन्दिरमें जाय। यह साक्षात् श्रीहरिका ही कथन है। जो स्नान करके पैर धोये बिना ही मन्दिरमें घुस जाता है, उसका स्नान, जप और होम आदि सब नष्ट हो जाता है। जो गृहस्थ पुरुष पानीसे भींगे या तेलसे तर वस्त्र पहनकर घरमें प्रवेश करता है, उसके ऊपर लक्ष्मी रुष्ट हो जाती हैं और उसे अत्यन्त भयंकर शाप देकर उसके घरसे निकल जाती हैं। यदि ब्राह्मण पिण्डलियोंसे ऊपरतक पैरोंको धोता है तो वह जबतक गङ्गाजीका दर्शन न कर ले, तबतक चाण्डाल बना रहता है।
ब्रह्मन्! पवित्र साधक आसनपर बैठकर आचमन करे। फिर संयमपूर्वक रहकर भक्तिभावसे सम्पन्न हो वेदोक्त विधिसे इष्टदेवकी पूजा करे। शालग्राम-शिलामें, मणिमें, मन्त्रमें, प्रतिमामें, जलमें, थलमें, गायकी पीठपर अथवा गुरु एवं ब्राह्मणमें श्रीहरिकी पूजा की जाय तो वह उत्तम मानी जाती है। जो अपने सिरपर शालग्रामका चरणोदक छिड़कता है, उसने मानो सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान कर लिया और सम्पूर्ण यज्ञोंकी दीक्षा ग्रहण कर ली। जो मनुष्य प्रतिदिन भक्तिभावसे शालग्राम-शिलाका जल (चरणामृत) पान करता है, वह जीवन्मुक्त होता है और अन्तमें श्रीकृष्णधामको जाता है। नारद! जहाँ शालग्राम-शिलाचक्र विद्यमान है, वहाँ निश्चय ही चक्रसहित भगवान् विष्णु तथा सम्पूर्ण तीर्थ विराजमान हैं। वहाँ जो देहधारी जानकर, अनजानमें अथवा भाग्यवश मर जाता है, वह दिव्य रत्नोंद्वारा निर्मित विमानपर बैठकर श्रीहरिके धामको जाता है। कौन ऐसा साधुपुरुष है, जो शालग्राम-शिलाके सिवा और कहीं श्रीहरिका पूजन करेगा; क्योंकि शालग्राम-शिलामें श्रीहरिकी पूजा करनेपर परिपूर्ण फलकी प्राप्ति होती है।
पूजाके आधार (प्रतीक)-का वर्णन किया गया। अब पूजनकी विधि सुनो। श्रीहरिकी पूजा बहुसंख्यक सज्जनोंद्वारा सम्मानित है। अतः शास्त्रके अनुसार उसका वर्णन करता हूँ। कोई-कोई वैष्णव पुरुष श्रीहरिको प्रतिदिन भक्तिभावसे सोलह सुन्दर तथा पवित्र उपचार अर्पित करते हैं। कोई बारह द्रव्योंका उपचार और कोई पाँच वस्तुओंका उपचार चढ़ाते हैं। जिनकी जैसी शक्ति हो, उसके अनुसार पूजन करें। पूजाकी जड़ है—भगवान्के प्रति भक्ति। आसन, वस्त्र, पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय, पुष्प, चन्दन, धूप, दीप, उत्तम नैवेद्य, गन्ध, माल्य, ललित एवं विलक्षण शय्या, जल, अन्न और ताम्बूल—ये सामान्यतः अर्पित करने योग्य सोलह उपचार हैं। गन्ध, अन्न, शय्या और ताम्बूल—इनको छोड़कर शेष द्रव्य बारह उपचार हैं। पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय, पुष्प और नैवेद्य—ये पाँच उपचार हैं। श्रेष्ठतम साधक मूलमन्त्रका उच्चारण करके ये सभी उपचार अर्पित करे। गुरुके उपदेशसे प्राप्त हुआ मूलमन्त्र समस्त कर्मोंमें उत्तम माना गया है। पहले भूतशुद्धि करके फिर प्राणायाम करे। तत्पश्चात् अङ्गन्यास, प्रत्यङ्गन्यास, मन्त्रन्यास तथा वर्णन्यासका सम्पादन करके अर्घ्यपात्र प्रस्तुत करे। पहले त्रिकोणाकार मण्डल बनाकर उसके भीतर भगवान् कूर्म (कच्छप)-की पूजा करे। इसके बाद द्विज शङ्खमें जल भरकर उसे वहीं स्थापित करे। फिर उस जलकी विधिवत् पूजा करके उसमें तीर्थोंका आवाहन करे। तदनन्तर उस जलसे पूजाके सभी उपचारोंका प्रक्षालन करे। इसके बाद फूल लेकर पवित्र साधक योगासनसे बैठे और गुरुके बताये हुए ध्यानके अनुसार अनन्यभावसे भगवान् श्रीकृष्णका चिन्तन करे। इस तरह ध्यान करके साधक मूलमन्त्रका उच्चारण करते हुए पाद्य आदि सब उपचार बारी-बारीसे आराध्यदेवको अर्पित करे। तन्त्रशास्त्रमें बताये हुए अङ्ग-प्रत्यङ्ग देवताओंके साथ श्रीहरिकी पूजा करे। मूलमन्त्रका यथाशक्ति जप करके इष्टदेवके मन्त्रका विसर्जन करे। फिर भाँति-भाँतिके उपहार निवेदित करके स्तुतिके पश्चात् कवचका पाठ करे।
( प्रकृतिखण्ड )
ब्रह्मखण्ड ९७
तत्पश्चात् विसर्जन करके पृथ्वीपर माथा टेककर प्रणाम करे। इस तरह देवपूजा सम्पन्न करके बुद्धिमान् एवं विद्वान् पुरुष श्रौत तथा स्मार्त अग्निसे युक्त यज्ञका अनुष्ठान करे। मुने! यज्ञके पश्चात् दिक्पाल आदिको बलि देनी चाहिये। फिर यथाशक्ति नित्य-श्राद्ध और अपने वैभवके अनुसार दान करे। यह सब करके पुण्यात्मा साधक आवश्यक आहार-विहारमें प्रवृत्त हो। श्रुतिमें पूजनका यही क्रम सुना गया है। नारद! इस प्रकार मैंने तुमसे सम्पूर्ण वेदोक्त उत्तम सूत्रका तथा ब्राह्मणोंके आह्निक कर्मका वर्णन किया। अब और क्या सुनना चाहते हो? (अध्याय २६)
ब्राह्मणोंके लिये भक्ष्याभक्ष्य तथा कर्तव्याकर्तव्यका निरूपण
नारदजीने पूछा— प्रभो! गृहस्थ ब्राह्मणों, यतियों, वैष्णवों, विधवा स्त्रियों और ब्रह्मचारियोंके लिये क्या भक्ष्य है और क्या अभक्ष्य? क्या कर्तव्य है और क्या अकर्तव्य? अथवा उनके लिये क्या भोग्य है और क्या अभोग्य? आप सर्वज्ञ, सर्वेश्वर और सबके कारण हैं, अतः मेरी पूछी हुई सब बातें बताइये।
महादेवजीने कहा— मुने! कोई तपस्वी ब्राह्मण चिरकालतक मौन रहकर बिना आहारके ही रहता है। कोई वायु पीकर रह जाता है और कोई फलाहारी होता है। कोई गृहस्थ ब्राह्मण अपनी स्त्रीके साथ रहकर यथोचित समयपर अन्न ग्रहण करता है। ब्रह्मन्! जिनकी जैसी इच्छा होती है, वे उसीके अनुसार आहार करते हैं; क्योंकि रुचियोंका स्वरूप भिन्न-भिन्न प्रकारका होता है। गृहस्थ ब्राह्मणोंके लिये हविष्यान्न-भोजन सदा उत्तम माना गया है। भगवान् नारायणका उच्छिष्ट प्रसाद ही उनके लिये अभीष्ट भोजन है। जो भगवान्को निवेदित नहीं हुआ है, वह अभक्षणीय है। जो भगवान् विष्णुको अर्पित नहीं किया गया, वह अन्न विष्ठा और जल मूत्रके समान है। एकादशीके दिन सब प्रकारका अन्न-जल मल-मूत्रके तुल्य कहा गया है। जो ब्राह्मण एकादशीके दिन स्वेच्छासे अन्न खाता है, वह पाप खाता है, इसमें संशय नहीं है। नारद! एकादशीका दिन प्राप्त होनेपर गृहस्थ ब्राह्मणोंको कदापि अन्न नहीं खाना चाहिये, नहीं खाना चाहिये, नहीं खाना चाहिये। जन्माष्टमीके दिन, रामनवमीके दिन तथा शिवरात्रिके दिन जो अन्न खाता है, वह भी दूने पातकका भागी होता है। जो सर्वथा उपवास करनेमें समर्थ न हो, वह फल-मूल और जल ग्रहण करे; अन्यथा उपवासके कारण शरीर नष्ट हो जानेपर मनुष्य आत्महत्याके पापका भागी होता है। जो व्रतके दिन एक बार हविष्यान्न खाता अथवा भगवान् विष्णुके नैवेद्यमात्रका भक्षण करता है, उसे अन्न खानेका पाप नहीं लगता। वह उपवासका पूरा फल प्राप्त कर लेता है।*
नारद! गृहस्थ, शैव, शाक्त, विशेषतः वैष्णव यति तथा ब्रह्मचारियोंके लिये यह बात बतायी गयी है। जो वैष्णव पुरुष नित्य भगवान् श्रीकृष्णके नैवेद्य (प्रसाद)-का भोजन करता है, वह जीवन्मुक्त हो प्रतिदिन सौ उपवास-व्रतोंका फल पाता है। सम्पूर्ण देवता और तीर्थ उसके अङ्गोंका स्पर्श चाहते हैं। उसके साथ वार्तालाप तथा उसका दर्शन समस्त पापोंका नाश करनेवाला है। यतियों, विधवाओं और ब्रह्मचारियोंके लिये ताम्बूल-भक्षण निषिद्ध है।
* उपवासासमर्थश्च फलमूलजलं पिबेत्। नष्टे शरीरे स भवेदन्यथा चात्मघातकः॥
सकृद् भुंक्ते हविष्यान्नं विष्णोर्नैवेद्यमेव च। न भवेत् प्रत्यवायी स चोपवासफलं लभेत्॥
(ब्रह्मखण्ड २७।१२-१३)
९८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
नारद! समस्त ब्राह्मणोंके लिये जो अभक्ष्य है, उसका वर्णन सुनो। ताँबेके पात्रमें दूध पीना, जूठे बर्तन या अन्नमें घी लेकर खाना तथा नमकके साथ दूध पीना तत्काल गोमांस-भक्षणके समान माना गया है। काँसके बर्तनमें रखा हुआ एवं जो द्विज उठकर बायें हाथसे जल पीता है, वह शराबी माना गया है और समस्त धर्मोंसे बहिष्कृत है। मुने! भगवान् श्रीहरिको निवेदित न किया गया अन्न, खानेसे बचा हुआ जूठा भोजन तथा पीनेसे शेष रहा जूठा जल—ये सब सर्वथा निषिद्ध हैं। कार्तिकमें बैगनका फल, माघमें मूली तथा श्रीहरिके शयनकाल (चौमासे)-में कलम्बींका शाक सर्वथा नहीं खाना चाहिये। सफेद ताड़, मसूर और मछली—ये सभी ब्राह्मणोंके लिये समस्त देशोंमें त्याज्य हैं। प्रतिपदाको कूष्माण्ड (कोहड़ा) नहीं खाना चाहिये; क्योंकि उस दिन वह अर्थका नाश करनेवाला है। द्वितीयाको बृहती (छोटे बैगन अथवा कटेहरी) भोजन कर ले तो उसके दोषसे छुटकारा पानेके लिये श्रीहरिका स्मरण करना चाहिये। तृतीयाको परवल शत्रुओंकी वृद्धि करनेवाला होता है; अतः उस दिन उसे नहीं खाना चाहिये। चतुर्थीको भोजनके उपयोगमें लायी हुई मूली धनका नाश करनेवाली होती है। पञ्चमीको बेल खाना कलङ्क लगनेमें कारण होता है। षष्ठीको नीमकी पत्ती चबायी जाय या उसका फल या दाँतुन मुँहमें डाला जाय तो उस पापसे मनुष्यको पशु-पक्षियोंकी योनिमें जन्म लेना पड़ता है। सप्तमीको ताड़का फल खाया जाय तो वह रोग बढ़ानेवाला तथा शरीरका नाशक होता है। अष्टमीको नारियलका फल खाया जाय तो उससे बुद्धिका नाश होता है। नवमीको लौकी और दशमीको कलम्बीका शाक सर्वथा त्याज्य है। एकादशीको शिम्बी (सेम), द्वादशीको पूतिका (पोई) और त्रयोदशीको बैगन खानेसे पुत्रका नाश होता है। मांस सबके लिये सदा वर्जित है।
पार्वणश्राद्ध और व्रतके दिन प्रातःकालिक स्नानके समय सरसोंका तेल और पकाया हुआ तेल उपयोगमें लाया जाय तो उत्तम है। अमावास्या, पूर्णिमा, संक्रान्ति, चतुर्दशी और अष्टमी तिथियोंमें, रविवारको, श्राद्ध और व्रतके दिन स्त्री-सहवास तथा तिलके तेलका सेवन निषिद्ध है। सभी वर्णोंके लिये दिनमें अपनी स्त्रीका भी सेवन वर्जित है। रातमें दही खाना, दिनमें दोनों संध्याओंके समय सोना तथा रजस्वला स्त्रीके साथ समागम करना—ये नरककी प्राप्तिके कारण हैं। रजस्वला तथा कुलटाका अन्न नहीं खाना चाहिये।
ब्रह्मर्षे! शूद्रजातीय स्त्रीसे सम्बन्ध रखनेवाले ब्राह्मणका अन्न भी खाने योग्य नहीं है। ब्रह्मन्! सूदखोर और गणकका अन्न भी नहीं खाना चाहिये। अग्रदानी ब्राह्मण (महापात्र) तथा चिकित्सक (वैद्य या डाक्टर)-का अन्न भी खाने योग्य नहीं है। अमावास्या तिथि और कृत्तिका नक्षत्रमें द्विजोंके लिये क्षौर-कर्म (हजामत) वर्जित है। जो मैथुन करके देवताओं तथा पितरोंका तर्पण करता है, उसका वह जल रक्तके समान होता है तथा उसे देनेवाला नरकमें पड़ता है। नारद! जो करना चाहिये, जो नहीं करना चाहिये, जो भक्ष्य है और जो अभक्ष्य है, वह सब तुम्हें बताया गया। अब और क्या सुनना चाहते हो? (अध्याय २७)
* जलज शाकविशेष अथवा कदम्ब।
ब्रह्मखण्ड
९९
परब्रह्म परमात्माके स्वरूपका निरूपण
नारदजीने पूछा— जगन्नाथ! जगद्गुरो! आपकी कृपासे मैंने सब कुछ सुन लिया। अब आप ब्रह्मके स्वरूपका वर्णन—ब्रह्मतत्त्वका निरूपण कीजिये। प्रभो! सर्वेश्वर! ब्रह्म साकार है या निराकार? क्या उसका कुछ विशेषण भी है? अथवा वह विशेषणोंसे रहित (निर्विशेष) ही है? ब्रह्मका नेत्रोंसे दर्शन हो सकता है या नहीं? वह समस्त देहधारियोंमें लिप्त है अथवा नहीं? उसका क्या लक्षण बताया गया है? वेदमें उसका किस प्रकार निरूपण किया गया है? क्या प्रकृति ब्रह्मसे अतिरिक्त है या ब्रह्मस्वरूपिणी ही है? श्रुतिमें प्रकृतिका सारभूत लक्षण किस प्रकार सुना गया है? ब्रह्म और प्रकृति इन दोनोंमेंसे किसकी सृष्टिमें प्रधानता है? दोनोंमें कौन श्रेष्ठ है? सर्वज्ञ! इन सब बातोंपर मनसे विचार करके जो सिद्धान्त हो, उसे अवश्य मुझे बताइये।
नारदजीकी यह बात सुनकर भगवान् पञ्चमुख महादेव ठठाकर हँस पड़े और उन्होंने परब्रह्म-तत्त्वका निरूपण आरम्भ किया।
महादेवजी बोले— वत्स नारद! तुमने जो-जो पूछा है, वह उत्तम गूढ़ ज्ञानका विषय है। वेदों और पुराणोंमें भी वह उत्तम एवं गूढ़ ज्ञान परम दुर्लभ है। ब्रह्मन्! मैं, ब्रह्मा, विष्णु, शेषनाग, धर्म और महाविराट्—इन सबने तथा श्रुतियोंने भी सब बातोंका निरूपण किया है। वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ नारद! जो सविशेष तथा प्रत्यक्ष दृश्य-तत्त्व है, उसका हमलोगोंने वेदमें निरूपण किया है। प्राचीनकालकी बात है, वैकुण्ठधाममें मैंने, ब्रह्माजीने और धर्मने श्रीहरिके समक्ष अपना प्रश्न उपस्थित किया था। उस समय श्रीहरिने उसका जो कुछ उत्तर दिया, वह सुनो; मैं तुम्हें बताता हूँ। वह ज्ञान तत्त्वोंका सारभूत तत्त्व है, अज्ञानान्धकारसे अन्धे हुए लोगोंके लिये नेत्ररूप है तथा दुविधा अथवा द्वैत नामक भ्रमरूपी अन्धकारका नाश करनेके लिये सर्वोत्तम प्रदीपके समान है। सनातन परब्रह्म परमात्मस्वरूप है। वह देहधारियोंके कर्मोंके साक्षीरूपसे समस्त शरीरोंमें विराजमान है। प्रत्येक शरीरमें पाँचों प्राणोंके रूपमें साक्षात् भगवान् विष्णु विद्यमान हैं। मनके रूपमें प्रजापति ब्रह्मा विराज रहे हैं। सम्पूर्ण ज्ञान (बुद्धि)-के रूपमें स्वयं मैं हूँ और शक्तिके रूपमें ईश्वरीय प्रकृति है। हम सब-के-सब परमात्माके अधीन हैं। शरीरमें उसके स्थित होनेपर ही स्थित होते हैं और उसके चले जाने (सम्बन्ध हटा लेने)-पर हम भी चले जाते हैं। जैसे राजाके सेवक सदा राजाका अनुसरण करते हैं, उसी प्रकार हम-लोग उस परमात्माके अनुगामी बने रहते हैं। जीव परमात्माका प्रतिबिम्ब है। वही कर्मोंके फलका उपभोग करता है। जैसे जलसे भरे हुए घड़ोंमें पृथक्-पृथक् सूर्य और चन्द्रमाका प्रतिबिम्ब होता है तथा उन घड़ोंके फूट जानेपर वह प्रतिबिम्ब फिर चन्द्रमा और सूर्यमें लीन हो जाता है, उसी प्रकार सृष्टिकालमें परमात्माके प्रतिबिम्ब-स्वरूप जीवकी उपलब्धि होती है तथा सृष्टिमयी उपाधिके नष्ट हो जानेपर वह प्रतिबिम्बस्वरूप जीव पुनः सर्वव्यापी परमात्मामें लीन हो जाता है।
वत्स! संसारका संहार हो जानेपर एकमात्र परब्रह्म परमात्मा ही शेष रहता है। हम तथा यह चराचर जगत् उसीमें लीन हो जाते हैं। वह ब्रह्म मण्डलाकार ज्योतिःपुञ्जस्वरूप है। ग्रीष्म-ऋतुके मध्याह्नकालमें प्रकट होनेवाले कोटि-कोटि सूर्योंके समान उसका प्रकाश है। वह आकाशके समान विस्तृत, सर्वत्र व्यापक तथा अविनाशी है। योगीजनॉको ही वह चन्द्रमण्डलके समान सुखपूर्वक दिखायी देता है। योगीलोग उसे सनातन परब्रह्म कहते हैं और दिन-रात उस सर्वमङ्गलमय सत्यस्वरूप परमात्माका ध्यान करते रहते हैं। वह परमात्मा निरीह, निराकार तथा सबका ईश्वर है।
१००
संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
उसका स्वरूप उसकी इच्छाके अनुसार है। वह स्वतन्त्र तथा समस्त कारणोंका भी कारण है। परमानन्दस्वरूप तथा परमानन्दकी प्राप्तिका हेतु है। सबसे उत्कृष्ट, प्रधान पुरुष (पुरुषोत्तम), प्राकृत गुणोंसे रहित तथा प्रकृतिसे परे है। प्रलयके समय उसीमें सर्वबीजस्वरूपिणी प्रकृति लीन होती है। ठीक उसी तरह, जैसे अग्निमें उसकी दाहिका शक्ति, सूर्यमें प्रभा, दुग्धमें धवलता और जलमें शीतलता लीन रहती है। मुने! जैसे आकाशमें शब्द और पृथ्वीमें गन्ध सदा विद्यमान है, उसी तरह निर्गुण ब्रह्ममें निर्गुण प्रकृति सर्वदा स्थित है। जब ब्रह्म सृष्टिके लिये उन्मुख होता है, तब अपने अंशसे पुरुष कहलाता है। वत्स! वही गुणों—विषयोंसे सम्बन्ध स्थापित करनेपर प्राकृत एवं विषयी कहा गया है। त्रिगुणा प्रकृति उस परमात्मामें ही उत्कृष्ट छायारूपिणी मानी गयी है। मुने! जैसे कुम्हार मिट्टीसे घड़ा बनानेमें सदा ही समर्थ होता है, उसी प्रकार वह ब्रह्म प्रकृतिके द्वारा सृष्टिका निर्माण करनेमें नित्य समर्थ है। जैसे सुनार सुवर्णसे कुण्डल बनानेकी शक्ति रखता है, उसी तरह परमेश्वर उपादानभूता प्रकृतिके द्वारा सदा सृष्टि करनेमें समर्थ है। जैसे कुम्हार मिट्टीका निर्माण नहीं करता, मिट्टी उसके लिये नित्य एवं सनातन है तथा जैसे सुनार सुवर्णकी सृष्टि नहीं करता, सुवर्ण उसके लिये नित्य वस्तु ही है, उसी प्रकार वह परब्रह्म परमात्मा नित्य है और वह प्रकृति भी नित्य मानी गयी है। इसीलिये कुछ लोग सृष्टिमें उन दोनोंकी ही समानरूपसे प्रधानता बतलाते हैं। कुम्हार और सुनार स्वयं मिट्टी और सुवर्ण पैदा करके लानेमें समर्थ नहीं हैं तथा मिट्टी और सुवर्ण भी कुम्हार और सुनारको ले आनेकी शक्ति नहीं रखते। अतः मिट्टी और कुम्हारकी घटमें तथा सुवर्ण और सुनारकी कुण्डलमें समानरूपसे प्रधानता है।
नारद! इस विवेचनसे ब्रह्म प्रकृतिसे परे ही सिद्ध होता है। यही बात दृष्टिमें रखकर कुछ लोग प्रकृति और ब्रह्म दोनोंकी ही निश्चितरूपसे नित्यताका प्रतिपादन करते हैं। कुछ विद्वानोंका कथन है कि ब्रह्म स्वयं ही प्रकृति और पुरुषरूपमें प्रकट है। कुछ लोग यह भी कहते हैं कि प्रकृति ब्रह्मसे अतिरिक्त (भिन्न) है। वह ब्रह्म परमधाम-स्वरूप तथा समस्त कारणोंका भी कारण है। ब्रह्मन्! उस ब्रह्मका लक्षण श्रुतिमें कुछ इस प्रकारका सुना गया है—ब्रह्म सबका आत्मा है। वह सबसे निर्लिप्त और सबका साक्षी है। सर्वत्र व्यापक और सबका आदिकारण है। सर्वबीजस्वरूपिणी प्रकृति उस ब्रह्मकी शक्ति है। जिससे वह ब्रह्म शक्तिमान् है, अतः शक्ति और शक्तिमान् दोनों अभिन्न हैं। योगीलोग सदा तेजःस्वरूपमें ही ब्रह्मका ध्यान करते हैं; परंतु सूक्ष्म बुद्धिवाले मेरे भक्त—वैष्णवजन ऐसा नहीं मानते। वे वैष्णवजन उस आश्चर्यमय तेजोमण्डलके भीतर सदा साकार, सर्वात्मा, स्वेच्छामय पुरुषके मनोहर रूपका ध्यान करते हैं। करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान जो मण्डलाकार तेजःपुञ्ज है, उसके भीतर नित्यधाम छिपा हुआ है, जिसका नाम गोलोक है। वह मनोहर लोक चारों ओरसे लक्षकोटि योजन विस्तृत है। सर्वश्रेष्ठ दिव्य रत्नोंके सारतत्त्वसे जिनका निर्माण हुआ है, ऐसे दिव्य भवनों तथा गोपाङ्गनाओंसे वह लोक भरा हुआ है। उसे सुखपूर्वक देखा जा सकता है। चन्द्रमण्डलके समान ही वह गोलाकार है। रतेन्द्रसारसे निर्मित वह धाम परमात्माकी इच्छाके अनुसार बिना किसी आधारके ही स्थित है। उस नित्य लोककी स्थिति वैकुण्ठसे पचास करोड़ योजन ऊपर है। वहाँ गौएँ, गोप और गोपियाँ निवास करती हैं। वहाँ कल्पवृक्षोंके वन हैं। गोलोक कामधेनु गौओंसे भरा हुआ तथा रासमण्डलसे मण्डित है। मुने! वह वृन्दावनसे आच्छन्न और विरजा नदीसे आवेष्टित है। वहाँ सैकड़ों शिखरोंसे सुशोभित गिरिराज विराजमान है। सुवर्णनिर्मित
ब्रह्मखण्ड १०१
लक्ष कोटि मनोहर आश्रम हैं, जिनसे वह अभीष्ट धाम अत्यन्त दीप्तिमान् एवं श्रीसम्पन्न दिखायी देता है। उन सबके मध्यभागमें एक परम मनोहर आश्रम है, जो अकेला ही सौ मन्दिरोंसे संयुक्त है। वह परकोटों तथा खाइयोंसे घिरा हुआ तथा पारिजातके वनोंसे सुशोभित है। उस आश्रमके भवनोंमें जो कलश लगे हैं, उनका निर्माण रत्नराज कौस्तुभमणिसे हुआ है। इसलिये वे उत्तम ज्योतिःपुञ्जसे जाज्वल्यमान रहते हैं। उन भवनोंमें जो सीढ़ियाँ हैं, वे दिव्य हीरोंके सार-तत्त्वसे बनी हुई हैं। उनसे उन भवनोंका सौन्दर्य बहुत बढ़ गया है। मणीन्द्रसारसे निर्मित वहाँके किवाड़ोंमें दर्पण जड़े हुए हैं। नाना प्रकारके चित्र-विचित्र उपकरणोंसे वह आश्रम भलीभाँति सुसज्जित है। उसमें सोलह दरवाजे हैं तथा वह आश्रम रत्नमय प्रदीपोंसे अत्यन्त उद्भासित होता रहता है।
वहाँ बहुमूल्य रत्नोंद्वारा निर्मित तथा नाना प्रकारके विचित्र चित्रोंसे चित्रित रमणीय रत्नमय सिंहासनपर सर्वेश्वर श्रीकृष्ण बैठे हुए हैं। उनकी अङ्गकान्ति नवीन मेघ-मालाके समान श्याम है। वे किशोर-अवस्थाके बालक हैं। उनके नेत्र शरत्कालकी दोपहरिके सूर्यकी प्रभाको छीने लेते हैं। उनका मुखमण्डल शरत्पूर्णिमाके पूर्ण चन्द्रमाकी शोभाको ढक देता है। उनका सौन्दर्य कोटि कामदेवोंकी लावण्यलीलाको तिरस्कृत कर रहा है। उनका पुष्ट श्रीविग्रह करोड़ों चन्द्रमाओंकी प्रभासे सेवित है। उनके मुखपर मुस्कराहट खेलती रहती है। उनके हाथमें मुरली शोभा पाती है। उनके मनोहर छबिकी सबने भूरि-भूरि प्रशंसा की है। वे परम मङ्गलमय हैं। अग्निमें तपाकर शुद्ध किये गये सुवर्णके समान रंगवाले दो पीताम्बर धारण करनेसे उनका श्रीविग्रह परम उज्ज्वल प्रतीत होता है। भगवान्के सम्पूर्ण अङ्ग चन्दनसे चर्चित तथा कौस्तुभमणिसे प्रकाशित हैं। घुटनोंतक लटकती हुई मालतीकी माला और वनमालासे वे विभूषित हैं। त्रिभंगी छबिसे युक्त और मणिमाणिक्यसे अलंकृत हैं। मोरपंखका मुकुट धारण करते हैं। उत्तम रत्नमय मुकुटसे उनका मस्तक जगमगाता रहता है। रत्नोंके बाजूबंद, कंगन और मंजीरसे उनके हाथ-पैर सुशोभित हैं। उनके गण्डस्थल रत्नमय युगल कुण्डलसे अत्यन्त शोभा पाते हैं। उनकी दन्तपंक्ति मोतियोंकी पाँतिका तिरस्कार करनेवाली है। वे बड़े ही मनोहर हैं। उनके ओठ पके हुए बिम्बफलके समान लाल हैं। उन्नत नासिका उनकी शोभा बढ़ाती है। सब ओरसे घेरकर खड़ी हुई गोपाङ्गनाएँ उन्हें सदा सादर निहारती रहती हैं। वे गोपाङ्गनाएँ भी सुस्थिर यौवनसे युक्त, मन्द मुस्कानसे सुशोभित तथा उत्तम रत्नोंके बने हुए आभूषणोंसे विभूषित हैं। देवेन्द्र, मुनीन्द्र, मुनिगण तथा नरेशोंके समुदाय और ब्रह्मा, विष्णु, शिव, अनन्त तथा धर्म आदि उनकी सानन्द वन्दना किया करते हैं। वे भक्तोंके प्रियतम, भक्तोंके नाथ तथा भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये कातर रहनेवाले हैं। राधाके वक्षःस्थलपर विराजमान परम रसिक रासेश्वर हैं। मुने! वैष्णवजन उन निराकार परमात्माका इस रूपमें ध्यान किया करते हैं। वे परमात्मा ईश्वर हम सब लोगोंके सदा ही ध्येय हैं। उन्हींको अविनाशी परब्रह्म कहा गया है। वे ही दिव्य स्वेच्छामय शरीरधारी सनातन भगवान् हैं। वे निर्गुण, निरीह और प्रकृतिसे परे हैं। सर्वाधार, सर्वबीज, सर्वज्ञ, सर्वरूप, सर्वेश्वर, सर्वपूज्य तथा सम्पूर्ण सिद्धियोंको हाथमें देनेवाले हैं। वे आदिपुरुष भगवान् स्वयं ही द्विभुज रूप धारण करके गोलोकमें निवास करते हैं। उनकी वेश-भूषा भी ग्वालोंके समान होती है और वे अपने पार्षद गोपालोंसे घिरे रहते हैं। उन परिपूर्णतम भगवान्को श्रीकृष्ण कहते हैं। वे सदा श्रीजीके साथ रहनेवाले और श्रीराधिकाके प्राणेश्वर हैं। सबके अन्तरात्मा, सर्वत्र प्रत्यक्ष
१०२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
दर्शन देनेके योग्य और सर्वव्यापी हैं। 'कृष्' का अर्थ है सब और 'ण' का अर्थ है आत्मा। वे परब्रह्म परमात्मा सबके आत्मा हैं। इसलिये उनका नाम 'कृष्ण' है। 'कृष्' शब्द सर्वका वाचक है और 'ण' कार आदिवाचक है। वे सर्वव्यापी परमेश्वर सबके आदिपुरुष हैं, इसलिये 'कृष्ण' कहे गये हैं। वे ही भगवान् अपने एक अंशसे वैकुण्ठधाममें चार भुजाधारी लक्ष्मीपतिके रूपमें निवास करते हैं, चार भुजाधारी पार्षद उन्हें घेरे रहते हैं। वे ही जगत्पालक भगवान् विष्णु अपनी एक कलासे श्वेतद्वीपमें चार भुजाधारी रमापति-रूपसे निवास करते हैं। समुद्रतनया रमा उनकी पत्नी हैं।
इस प्रकार मैंने तुमसे परब्रह्म-निरूपणविषयक सब बातें बतायीं। वे परमात्मा हम सबके प्रिय, वन्दनीय, सेव्य तथा सर्वदा स्मरणीय हैं।
शौनक! ऐसा कहकर भगवान् शंकर वहाँ चुप हो गये। तब नारदने गन्धर्वराज उपबर्हणद्वारा रचे गये स्तोत्रसे उनकी स्तुति की। मुनिके उस स्तोत्रसे संतुष्ट हो अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले आदि भगवान् मृत्युञ्जयने उन्हें अभीष्ट वरदान—ज्ञान प्रदान किया। उस समय मुनिवर नारदके मुख और नेत्र प्रसन्नतासे खिल उठे। वे भगवान् शिवको प्रणाम करके उनकी आज्ञा ले पुण्यमय नारायणाश्रमको चले गये।
(अध्याय २८)
बदरिकाश्रममें नारायणके प्रति नारदजीका प्रश्न
सौति कहते हैं—शौनक! देवर्षि नारदने नारायण ऋषिके आश्चर्यमय आश्रमको देखा, जो बेरके वनोंसे सुशोभित था। नाना प्रकारके वृक्षों और फलोंसे भरे हुए उस आश्रममें कोयलकी मीठी कूक मुखरित हो रही थी। बड़े-बड़े शरभों, सिंहों और व्याघ्रसमुदायोंसे घिरे होनेपर भी उस आश्रममें ऋषिराज नारायणके प्रभावसे हिंसा और भयका कहीं नाम नहीं था। वह विशाल वन जनसाधारणके लिये अगम्य और स्वर्गसे भी अधिक मनोहर था। वहाँ नारदजीने देखा—ऋषिप्रवर नारायण मुनियोंकी सभामें रत्नमय सिंहासनपर विराजमान हैं। उनका रूप बड़ा मनोहर है और वे योगियोंके गुरु हैं। श्रीकृष्णस्वरूप परमेश्वर परब्रह्मका जप करते हुए नारायण मुनिका दर्शन करके ब्रह्मपुत्र नारदने उन्हें प्रणाम किया। उन्हें आया देख नारायणने सहसा उठकर हृदयसे लगा लिया और उत्तम आशीर्वाद प्रदान किया। साथ ही स्नेहपूर्वक कुशल-समाचार पूछा और आतिथ्यसत्कार किया। फिर नारदजीको भी उन्होंने रमणीय रत्नमय सिंहासनपर बिठाया। उस रमणीय आसनपर बैठकर नारदजीने रास्तेकी थकावट दूर की और उन ऋषिश्रेष्ठ सनातन भगवान् नारायणसे, साथ ही उन सब परम दुर्लभ मुनियोंसे भी पूछा, जो पिताके स्थानमें वेदाध्ययन करके वहाँ विराजमान थे।
नारदजी बोले—प्रभो! योगेश्वर शंकरसे ज्ञान और मन्त्रका उपदेश पाकर भी मेरा मन तृप्त नहीं हो रहा है; क्योंकि यह बड़ा चञ्चल है और इसे रोकना अत्यन्त कठिन है। मेरे मनमें प्रभुकी कुछ ऐसी प्रेरणा हुई, जिससे मैंने आपके चरणारविन्दोंका दर्शन किया। इस समय मैं आपसे कुछ विशेष ऐसा ज्ञान प्राप्त करना चाहता हूँ, जिसमें श्रीकृष्णके गुणोंका वर्णन हो, जो कि जन्म, मृत्यु और जराका नाश करनेवाला है। भगवन्! ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि देवता, देवराज इन्द्र, मुनि और विद्वान् मनु किसका चिन्तन करते हैं? सृष्टिका प्रादुर्भाव किससे होता है अथवा उसका लय कहाँ होता है? समस्त
ब्रह्मखण्ड १०३
कारणोंके भी कारणभूत सर्वेश्वर विष्णु कौन हैं? जगत्पते! उन ईश्वरका रूप अथवा कर्म क्या है? इन सब बातोंपर मन-ही-मन विचार करके आप बतानेकी कृपा करें।
नारदजीका यह वचन सुनकर भगवान् नारायण ऋषि हँसे। फिर उन्होंने त्रिभुवनपावनी पुण्यकथाको कहना आरम्भ किया।
(अध्याय २९)
नारायणके द्वारा परमपुरुष परमात्मा श्रीकृष्ण तथा प्रकृतिदेवीकी महिमाका प्रतिपादन
श्रीनारायण बोले—गणेश, विष्णु, शिव, रुद्र, शेष, ब्रह्मा आदि देवता, मनु, मुनीन्द्रगण, सरस्वती, पार्वती, गङ्गा और लक्ष्मी आदि देवियाँ भी जिनका सेवन करती हैं, उन भगवान् गोविन्दके चरणारविन्दका चिन्तन करना चाहिये। जो अत्यन्त गम्भीर और भयंकर दावाग्निरूपी सर्पसे आवेष्टित हो छटपटाते अङ्गवाले संसार-सागरको लाँघकर उस पार जाना चाहता है और श्रीहरिके दास्य-सुखको पानेकी इच्छा रखता है, वह भगवान् श्रीकृष्णके चरणारविन्दका चिन्तन करे। जिन्होंने गोवर्धन पर्वतको हाथपर उठाकर व्रजभूमिको इन्द्रके कोपसे बचानेकी कीर्ति प्राप्त की है, वाराहावतारके समय एकार्णवके जलमें गली जाती हुई पृथ्वीको अपनी दाढ़ोंके अग्रभागसे उठाकर जलके ऊपर स्थापित किया तथा जो अपने रोमकूपोंमें असंख्य विश्व-ब्रह्माण्डको धारण करते हैं, उन आदिपुरुष भगवान् गोविन्दके चरणारविन्दका चिन्तन करना चाहिये। जो गोपाङ्गनाओंके मुखारविन्दके रसिक भ्रमर हैं और वृन्दावनमें विहार करनेवाले हैं, उन व्रजवेषधारी विष्णुरूप परमपुरुष रसिक-रमण रासेश्वर श्रीकृष्णके चरणारविन्दका चिन्तन करना चाहिये। वत्स नारदमुने! जिनके नेत्रोंकी पलक गिरते ही जगत्स्रष्टा ब्रह्मा नष्ट हो जाते हैं, उनके कर्मका वर्णन करनेमें भूतलपर कौन समर्थ है? तुम भी श्रीहरिके चरणारविन्दका अत्यन्त आदरपूर्वक
चिन्तन करो। तुम और हम उन भगवान्की कलाकी कलाके अंशमात्र हैं। मनु और मुनीन्द्र भी उनकी कलाके कलांश ही हैं। महादेव और ब्रह्माजी भी कलाविशेष हैं और महान् विराट्-पुरुष भी उनकी विशिष्ट कलामात्र हैं। सहस्त्र सिरोंवाले शेषनाग सम्पूर्ण विश्वको अपने मस्तकपर सरसोंके एक दानेके समान धारण करते हैं, परंतु कूर्मके पृष्ठभागमें वे शेषनाग ऐसे जान पड़ते हैं, मानो हाथीके ऊपर मच्छर बैठा हो। वे भगवान् कूर्म (कच्छप) श्रीकृष्णकी कलाके कलांशमात्र हैं। नारद! गोलोकनाथ भगवान् श्रीकृष्णका निर्मल यश वेद और पुराणमें किञ्चिन्मात्र भी प्रकट नहीं हुआ। ब्रह्मा आदि देवता भी उसका वर्णन करनेमें समर्थ नहीं हैं। ब्रह्मपुत्र नारद! तुम उन सर्वेश्वर श्रीकृष्णका ही मुख्यरूपसे भजन करो।
जिन विश्वाधार परमेश्वरके सम्पूर्ण लोकोंमें सदा बहुत-से ब्रह्मा, विष्णु तथा रुद्र रहा ही करते हैं तथा श्रुतियाँ और देवता भी उनकी नियत संख्याको नहीं जानते हैं, उन्हीं परमेश्वर श्रीकृष्णकी तुम आराधना करो। वे विधाताके भी विधाता हैं। वे ही जगत्प्रसविनी नित्यरूपिणी प्रकृतिको प्रकट करके संसारकी सृष्टि करते हैं। ब्रह्मा आदि सब देवता प्रकृतिजन्य हैं। वे भक्तिदायिनी श्रीप्रकृतिका भजन करते हैं। प्रकृति ब्रह्मस्वरूपा है। वह ब्रह्मसे भिन्न नहीं है। उसीके द्वारा सनातन पुरुष परमात्मा संसारकी सृष्टि करते हैं, श्रीप्रकृतिकी
२- परब्रह्म श्रीकृष्ण और श्रीराधासे प्रकट चिन्मय देवी और देवताओंके चरित्र
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कलासे ही संसारकी सारी स्त्रियाँ प्रकट हुई हैं। प्रकृति ही माया है, जिसने सबको मोहमें डाल रखा है। वह सनातनी परमा प्रकृति नारायणी कही गयी है; क्योंकि वह परमपुरुष नारायणकी शक्ति है। सर्वात्मा ईश्वर भी उसीके द्वारा शक्तिमान् होते हैं। उस शक्तिके बिना वे सृष्टि करनेमें सदा असमर्थ ही हैं। वत्स! तुम इस समय जाकर विवाह करो। मैं तुम्हें पिताके आदेशका पालन करनेकी आज्ञा देता हूँ। जो गुरुकी आज्ञाका पालन करनेवाला है, वह सदा सर्वत्र पूजनीय तथा विजयी होता है। जो पुरुष वस्त्र, अलंकार और चन्दनसे अपनी पत्नीका सत्कार करता है, उसपर प्रकृतिदेवी संतुष्ट होती हैं। ठीक उसी तरह जैसे ब्राह्मणकी पूजा-अर्चा करनेपर भगवान् श्रीकृष्ण संतुष्ट होते हैं। प्रकृति ही सम्पूर्ण लोकोंमें अपनी मायासे स्त्रियोंके रूपमें प्रकट हुई हैं। अतः महिलाओंके अपमानसे वे प्रकृतिदेवी ही अपमानित होती हैं। जिसने पति-पुत्रसे युक्त सती-साध्वी दिव्य नारीका पूजन किया है, उसके द्वारा सर्वमङ्गलदायिनी प्रकृतिदेवीका ही पूजन सम्पन्न हुआ है। मूल प्रकृति एक ही है। वह पूर्ण ब्रह्मस्वरूपिणी है। उसीको सनातनी विष्णुमाया कहा गया है। सृष्टिकालमें वह पाँच रूपोंमें प्रकट होती है। जो परमात्मा श्रीकृष्णके प्राणोंकी अधिष्ठात्री देवी है तथा समस्त प्रकृतियोंमें उन्हें सबसे अधिक प्यारी है, उस मुख्या प्रकृतिका नाम 'राधा' है। दूसरी प्रकृति नारायणप्रिया लक्ष्मी हैं, जो सर्वसम्पत्स्वरूपिणी हैं। तीसरी प्रकृति वाणीकी अधिष्ठात्री देवी सरस्वती हैं, जो सदा सबके द्वारा पूजनीया हैं। चौथी प्रकृति वेदमाता सावित्री हैं। वे ब्रह्माजीकी प्यारी पत्नी और सबकी पूजनीया हैं। पाँचवीं प्रकृतिका नाम दुर्गा है, जो भगवान् शंकरकी प्यारी पत्नी हैं। उन्हींके पुत्र गणेश हैं। (अध्याय ३०)
ब्रह्मखण्ड सम्पूर्ण
प्रकृतिखण्ड
पञ्चदेवीरूपा प्रकृतिका तथा उनके अंश, कला एवं कलांशका विशद वर्णन
भगवान् नारायण कहते हैं— नारद ! गणेशजननी दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती, सावित्री और राधा—ये पाँच देवियाँ प्रकृति कहलाती हैं। इन्हींपर सृष्टि निर्भर है।
नारदजीने पूछा— ज्ञानियोंमें प्रमुख स्थान प्राप्त करनेवाले साधो ! वह प्रकृति कहाँसे प्रकट हुई है, उसका कैसा स्वरूप है, कैसे लक्षण हैं तथा क्यों वह पाँच प्रकारकी हो गयी ? उन समस्त देवियोंके चरित्र, उनके पूजाके विधान, उनके गुण और वे किसके यहाँ कैसे प्रकट हुईं—ये सभी प्रसङ्ग आप मुझे बतानेकी कृपा करें।
भगवान् नारायणने कहा— वत्स ! 'प्र' का अर्थ है 'प्रकृष्ट' और 'कृति' से सृष्टिके अर्थका बोध होता है, अतः सृष्टि करनेमें जो प्रकृष्ट (परम प्रवीण) है, उसे देवी 'प्रकृति' कहते हैं। सर्वोत्तम सत्त्वगुणके अर्थमें 'प्र' शब्द, मध्यम रजोगुणके अर्थमें 'कृ' शब्द और तमोगुणके अर्थमें 'ति' शब्द है। जो त्रिगुणात्मकस्वरूपा है, वही सर्वशक्तिसे सम्पन्न होकर सृष्टिविषयक कार्यमें प्रधान है, इसलिये 'प्रधान' या 'प्रकृति' कहलाती है। 'प्र' प्रथम अर्थमें और 'कृति' सृष्टि-अर्थमें है। अतः जो देवी सृष्टिकी आदिकारणरूपा है, उसे प्रकृति कहते हैं। सृष्टिके अवसरपर परब्रह्म परमात्मा स्वयं दो रूपोंमें प्रकट हुए—प्रकृति और पुरुष। उनका आधा दाहिना अङ्ग 'पुरुष' और आधा बायाँ अङ्ग 'प्रकृति' हुआ। वही प्रकृति ब्रह्मस्वरूपा, नित्या और सनातनी माया है। जैसे परमात्मा हैं, वैसी उनकी शक्तिस्वरूपा प्रकृति है अर्थात् परब्रह्म परमात्माके सभी अनुरूप गुण इन प्रकृतिमें निहित हैं, जैसे अग्निमें दाहिका शक्ति सदा रहती है। इसीसे परम योगी पुरुष स्त्री और पुरुषमें भेद नहीं मानते हैं। नारद ! वे सबको ब्रह्ममय देखते हैं। भगवान् श्रीकृष्ण स्वेच्छामय, सर्वतन्त्र-स्वतन्त्र परम पुरुष हैं। उनके मनमें सृष्टिकी इच्छा उत्पन्न होते ही सहसा 'मूल प्रकृति' परमेश्वरी प्रकट हो गयीं। तदनन्तर परमेश्वरकी आज्ञाके अनुसार सृष्टि-रचनाके लिये इनके पाँच रूप हो गये। भगवती प्रकृति भक्तोंके अनुरोधसे अथवा उनपर कृपा करनेके लिये विविध रूप धारण करती हैं।
जो गणेशकी माता 'भगवती दुर्गा' हैं, उन्हें 'शिवस्वरूपा' कहा जाता है। ये भगवान् शंकरकी प्रेयसी भार्या हैं। नारायणी, विष्णुमाया और पूर्ण ब्रह्मस्वरूपिणी नामसे ये प्रसिद्ध हैं। ब्रह्मादि देवता, मुनिगण तथा मनु प्रभृति—सभी इनकी पूजा करते हैं। ये सबकी अधिष्ठात्री देवी हैं, सनातन ब्रह्मस्वरूपा हैं। यश, मङ्गल, धर्म, श्री, सुख, मोक्ष और हर्ष प्रदान करना इनका स्वाभाविक गुण है। दुःख, शोक और उद्वेगको ये दूर कर देती हैं। शरणमें आये हुए दीनों एवं पीड़ितोंकी रक्षामें सदा संलग्न रहती हैं। ये तेजःस्वरूपा हैं। इनका विग्रह परम तेजस्वी है। इन्हें तेजकी अधिष्ठात्री देवी कहा जाता है। ये सर्वशक्तिस्वरूपा हैं और भगवान् शंकरको निरन्तर शक्तिशाली बनाये रखती हैं। सिद्धेश्वरी, सिद्धिरूपा, सिद्धिदा, सिद्धिदाताओंकी ईश्वरी, बुद्धि, निद्रा, क्षुधा, पिपासा, छाया, तन्द्रा, दया, स्मृति, जाति, क्षान्ति, शान्ति, कान्ति, भ्रान्ति, चेतना, तुष्टि, पुष्टि, लक्ष्मी, वृत्ति और माता—ये सब इनके नाम हैं। श्रीकृष्ण परब्रह्म परमात्मा हैं। उनके समीप सर्वशक्तिरूपसे ये विराजती हैं। श्रुतिमें इनके सुविख्यात गुणका अत्यन्त संक्षेपमें वर्णन किया गया है, जैसा कि आगमोंमें उपलब्ध होता है। ये अनन्ता हैं। अतएव इनमें गुण भी
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अनन्त हैं। अब इनके दूसरे रूपका वर्णन करता हूँ, सुनो।
जो परम शुद्ध सत्त्वस्वरूपा हैं, उन्हें ‘भगवती लक्ष्मी’ कहा जाता है। परम प्रभु श्रीहरिकी वे शक्ति कहलाती हैं। अखिल जगत्की सारी सम्पत्तियाँ उनके स्वरूप हैं। उन्हें सम्पत्तिकी अधिष्ठात्री देवी माना जाता है। वे परम सुन्दरी, अनुपम संयमरूपा, शान्तस्वरूपा, श्रेष्ठ स्वभावसे सम्पन्न तथा समस्त मङ्गलोंकी प्रतिमा हैं। लोभ, मोह, काम, क्रोध, मद और अहंकार आदि दुर्गुणोंसे वे सहज ही रहित हैं। भक्तोंपर अनुग्रह करना तथा अपने स्वामी श्रीहरिसे प्रेम करना उनका स्वभाव है। वे सबकी आदिकारणरूपा और पतिव्रता हैं। श्रीहरि प्राणके समान जानकर उनसे अत्यन्त प्रेम करते हैं। वे सदा प्रिय वचन ही बोलती हैं; कभी अप्रिय बात नहीं कहतीं; धान्य आदि सभी शस्य तथा सबके जीवन-रक्षाके उपाय उनके रूप हैं। प्राणियोंका जीवन स्थिर रहे—एतदर्थ उन्होंने यह रूप धारण कर रखा है। वे परम साध्वी देवी ‘महालक्ष्मी’ नामसे विख्यात होकर वैकुण्ठमें अपने स्वामीकी सेवामें सदा संलग्न रहती हैं। स्वर्गमें ‘स्वर्गलक्ष्मी’, राजाओंके यहाँ ‘राजलक्ष्मी’ तथा मर्त्यलोकवासी गृहस्थोंके घर ‘गृहलक्ष्मी’ के रूपमें वे विराजमान हैं। समस्त प्राणियों तथा द्रव्योंमें सर्वोत्कृष्ट शोभा उन्हींका स्वरूप है। वे परम मनोहर हैं। पुण्यात्माओंकी कीर्ति उन्हींकी प्रतिमा है। वे राजाओंकी प्रभा हैं। व्यापारियोंके यहाँ वे वाणिज्यरूपसे विराजती हैं। पापीजन जो कलह आदि अशिष्ट व्यवहार करते हैं, उनमें भी इन्हींकी शक्ति है। वे दयामयी हैं, भक्तोंकी माता हैं और उन भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये सदा व्याकुल रहती हैं। इस प्रकार दूसरी शक्ति (या प्रकृति)-का परिचय दिया गया। उनका वेदोंमें वर्णन है तथा सबने उनका सम्मान किया है। सब लोग उनकी आराधना और वन्दना करते हैं।
नारद! अब मैं अन्य प्रकृतिदेवीका परिचय देता हूँ, सुनो। परब्रह्म परमात्मासे सम्बन्ध रखनेवाली वाणी, बुद्धि, विद्या और ज्ञानकी जो अधिष्ठात्री देवी हैं, उन्हें ‘सरस्वती’ कहा जाता है। सम्पूर्ण विद्याएँ उन्हींके स्वरूप हैं। मनुष्योंको बुद्धि, कविता, मेधा, प्रतिभा और स्मरण-शक्ति उन्हींकी कृपासे प्राप्त होती हैं। अनेक प्रकारके सिद्धान्तभेदों और अर्थोंकी कल्पनाशक्ति वे ही देती हैं। वे व्याख्या और बोधस्वरूपा हैं। उनकी कृपासे समस्त संदेह नष्ट हो जाते हैं। उन्हें विचारकारिणी और ग्रन्थकारिणी कहा जाता है। वे शक्तिस्वरूपा हैं। सम्पूर्ण संगीतकी सन्धि और तालका कारण उन्हींका रूप है। प्रत्येक विश्वमें जीवोंके लिये विषय, ज्ञान और वाणीरूपा वे ही हैं। उनका एक हाथ व्याख्या (अथवा उपदेश)-की मुद्रामें सदा उठा रहता है। वे शान्तस्वरूपा हैं तथा हाथमें वीणा और पुस्तक लिये रहती हैं। उनका विग्रह शुद्धसत्त्वमय है। वे सदाचारपरायण तथा भगवान् श्रीहरिकी प्रिया हैं। हिम, चन्दन, कुन्द, चन्द्रमा, कुमुद और कमलके समान उनकी कान्ति है। वे रत्न (स्फटिकमणि)-की माला फेरती हुई भगवान् श्रीकृष्णके नामोंका जप करती हैं। उनकी मूर्ति तपोमयी है। तपस्वीजनोंको उनके तपका फल प्रदान करनेमें वे सदा तत्पर रहती हैं। सिद्धि-विद्या उनका स्वरूप है। वे सदा सम्पूर्ण सिद्धि प्रदान करती हैं। इस प्रकार तृतीया देवी (प्रकृति) श्रीजगदम्बा सरस्वतीका शास्त्रके अनुसार किञ्चित् वर्णन किया गया। अब चौथी प्रकृतिका परिचय सुनो।
नारद! वे चारों वेदोंकी माता हैं। छन्द और वेदाङ्ग भी उन्हींसे उत्पन्न हुए हैं। संध्या-वन्दनके मन्त्र और तन्त्रोंकी जननी भी वे ही हैं। द्विजातिवर्णोंके लिये उन्होंने अपना यह रूप धारण किया है। वे जगद्रूपा, तपस्विनी, ब्रह्मतेजसे
१४- अपनी चिन्मयी शक्तिद्वारा स्वर्गर्भसे उत्पन्न बालकको ब्रह्माण्ड-गोलकके अथाह जलमें छोड़ दिये जानेपर श्रीकृष्णका उसे संतानहीना हो जानेका शाप देना और उस (शक्ति) देवीकी जीभके अग्रभागसे सहसा वीणा-पुस्तकधारिणी एक मनोहर कन्याका प्रकट होना
प्रकृतिखण्ड १०७
सम्पन्र तथा सबका संस्कार करनेवाली हैं। उन पवित्र रूप धारण करनेवाली देवीको 'सावित्री' अथवा 'गायत्री' कहते हैं। वे ब्रह्माकी परम प्रिय शक्ति हैं। तीर्थ अपनी शुद्धिके लिये उनके स्पर्शकी कामना करते हैं। शुद्ध स्फटिकमणिके समान उनकी स्वच्छ कान्ति है। वे शुद्ध सत्त्वमय विग्रहसे शोभा पाती हैं। उनका रूप परम आनन्दमय है। उनका सर्वोत्कृष्ट रूप सदा बना रहता है। वे परब्रह्मस्वरूपा हैं। मोक्ष प्रदान करना उनका स्वाभाविक गुण है। वे ब्रह्मतेजसे सम्पन्न परमशक्ति हैं। उन्हें शक्तिकी अधिष्ठात्री माना जाता है। नारद! उनके चरणकी धूलि सम्पूर्ण जगत्को पवित्र कर देती है।
नारद! इन चौथी देवीका प्रसंग सुना चुका। अब तुम्हें पाँचवीं देवीका परिचय देता हूँ। ये प्रेम और प्राणोंकी अधिदेवी तथा पञ्चप्राणस्वरूपिणी हैं। परमात्मा श्रीकृष्णको प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय हैं। सम्पूर्ण देवियोंमें अग्रगण्य हैं, सबकी अपेक्षा इनमें सुन्दरता अधिक है। इनमें सभी सद्गुण सदा विद्यमान हैं। ये परम सौभाग्यवती और मानिनी हैं। इन्हें अनुपम गौरव प्राप्त है। परब्रह्मका वामार्द्धाङ्ग ही इनका स्वरूप है। ये ब्रह्मके समान ही गुण और तेजसे सम्पन्न हैं। इन्हें परावरा, सारभूता, परमाद्या, सनातनी, परमानन्दरूपा, धन्या, मान्या और पूज्या कहा जाता है। ये नित्यनिकुञ्जेश्वरी, रासक्रीड़ाकी अधिष्ठात्री देवी हैं। परमात्मा श्रीकृष्णके रासमण्डलमें इनका आविर्भाव हुआ है। इनके विराजनेसे रासमण्डलकी विचित्र शोभा होती है। गोलोकधाममें रहनेवाली ये देवी 'रासेश्वरी' एवं 'सुरसिका' नामसे प्रसिद्ध हैं। रासमण्डलमें पधारे रहना इन्हें बहुत प्रिय है। ये गोपीके वेषमें विराजती हैं। ये परम आह्लादस्वरूपिणी हैं। इनका विग्रह संतोष और हर्षसे परिपूर्ण है। ये निर्गुणा (लौकिक त्रिगुणोंसे रहित स्वरूपभूत गुणवती), निर्लिप्ता (लौकिक विषयभोगसे रहित), निराकारा (पाञ्चभौतिक शरीरसे रहित दिव्यचिन्मयस्वरूपा), आत्मस्वरूपिणी (श्रीकृष्णकी आत्मा) नामसे विख्यात हैं। इच्छा और अहंकारसे ये रहित हैं। भक्तोंपर कृपा करनेके लिये ही इन्होंने अवतार धारण कर रखा है। वेदोक्त विधिके अनुसार ध्यान करनेसे विद्वान् पुरुष इनके रहस्यको समझ पाते हैं। सुरेन्द्र एवं मुनीन्द्र प्रभृति समस्त प्रधान देवता अपने चर्मचक्षुओंसे इन्हें देखनेमें असमर्थ हैं। ये अग्निशुद्ध नीले रंगके दिव्य वस्त्र धारण करती हैं। अनेक प्रकारके दिव्य आभूषण इन्हें सुशोभित किये रहते हैं। इनकी कान्ति करोड़ों चन्द्रमाओंके समान प्रकाशमान है। इनका सर्वशोभासम्पन्न श्रीविग्रह सम्पूर्ण ऐश्वर्योंसे सम्पन्न है। भगवान् श्रीकृष्णके भक्तोंको दास्य-रति प्रदान करनेवाली एकमात्र ये ही हैं; क्योंकि सम्पूर्ण सम्पत्तियोंमें ये इस दास्य-सम्पत्तिको ही परम श्रेष्ठ मानती हैं। श्रीवृषभानुके घर पुत्रीके रूपसे ये पधारी हैं। इनके चरणकमलका संस्पर्श प्राप्तकर पृथ्वी परम पवित्र हो गयी है। मुने! जिन्हें ब्रह्मा आदि देवता नहीं देख सके, वही ये देवी भारतवर्षमें सबके दृष्टिगोचर हो रही हैं। ये स्त्री-रत्नोंमें साररूपा हैं। भगवान् श्रीकृष्णके वक्षःस्थलपर इस प्रकार विराजती हैं, जैसे आकाशस्थित नवीन नील मेघोंमें बिजली चमक रही हो। इन्हें पानेके लिये ब्रह्माने साठ हजार वर्षोंतक तपस्या की है। उनकी तपस्याका उद्देश्य यही था कि इनके चरणकमलके नखके दर्शन सुलभ हो जायँ, जिससे मैं परम पवित्र बन जाऊँ; परंतु स्वप्नमें भी वे इन भगवतीके दर्शन प्राप्त न कर सके; फिर प्रत्यक्षकी तो बात ही क्या है। उसी तपके प्रभावसे ये देवी वृन्दावनमें प्रकट हुई हैं—धराधामपर इनका पधारना हुआ है, जहाँ ब्रह्माजीको भी इनका दर्शन प्राप्त हो सका। ये ही पाँचवीं देवी 'भगवती राधा' के नामसे प्रसिद्ध हैं।
इन प्रकृतिदेवीके अंश, कला, कलांश और
१६- श्रीराधाके रोमकूपोंसे बहुत-सी गोप-कन्याओंका प्राकट्य
१०८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
कलांशांशभेदसे अनेक रूप हैं। प्रत्येक विश्वमें सम्पूर्ण स्त्रियाँ इन्हींकी रूप मानी जाती हैं। ये पाँच देवियाँ परिपूर्णतम कही गयी हैं। इन देवियोंके जो-जो प्रधान अंश हैं, अब उनका वर्णन करता हूँ, सुनो। भूमण्डलको पवित्र करनेवाली गङ्गा इनका प्रधान अंश हैं। ये सनातनी 'गङ्गा' जलमयी हैं। भगवान् विष्णुके विग्रहसे इनका प्रादुर्भाव हुआ है। पापियोंके पापमय ईंधनको भस्म करनेके लिये ये प्रज्वलित अग्नि हैं। इन्हें स्पर्श करने, इनमें नहाने अथवा इनका जलपान करनेसे पुरुष कैवल्य-पदके अधिकारी हो जाते हैं। गोलोक-धाममें जानेके लिये ये सुखप्रद सीढ़ीके रूपमें विराजमान हैं। इनका रूप परम पवित्र है। समस्त तीर्थों और नदियोंमें ये श्रेष्ठ मानी जाती हैं। ये भगवान् शंकरके मस्तकपर जटामें ठहरी थीं। वहाँसे निकलीं और पङ्क्तिबद्ध होकर भारतवर्षमें आ गयीं। तपस्वीजन अपनी तपस्यामें सफलता प्राप्त कर सकें—एतदर्थ शीघ्र ही इनका पधारना हो गया। इनका शुद्ध एवं सत्त्वमय स्वरूप चन्द्रमा, श्वेतकमल या दूधके समान स्वच्छ है। मल और अहंकार इनमें लेशमात्र भी नहीं है। ये परम साध्वी गङ्गा भगवान् नारायणको बहुत प्रिय हैं।
श्री 'तुलसी' को प्रकृतिदेवीका प्रधान अंश माना जाता है। ये विष्णुप्रिया हैं। विष्णुको विभूषित किये रहना इनका स्वाभाविक गुण है। भगवान् विष्णुके चरणमें ये सदा विराजमान रहती हैं। मुने! तपस्या, संकल्प और पूजा आदि सभी शुभकर्म इन्हींसे शीघ्र सम्पन्न होते हैं। पुष्पोंमें ये मुख्य मानी जाती हैं। ये परम पवित्र एवं सदा पुण्यप्रदा हैं। अपने दर्शन और स्पर्शमात्रसे ये तुरंत मनुष्योंको परमधामके अधिकारी बना देती हैं। पापमयी सूखी लकड़ीको जलानेके लिये प्रज्वलित अग्निके समान रूप धारण करके ये कलिमें पधारी हैं। इन देवी तुलसीके चरणकमलका स्पर्श होते ही पृथ्वी परम पावन बन गयी। तीर्थ स्वयं पवित्र होनेके लिये इनका दर्शन एवं स्पर्श करना चाहते हैं। इनके अभावमें अखिल जगत्के सम्पूर्ण कर्म निष्फल समझे जाते हैं। इनकी कृपासे मुमुक्षुजन मुक्त हो जाते हैं। जो जिस कामनासे इनकी उपासना करते हैं, उनकी वे सारी इच्छाएँ पूर्ण हो जाती हैं। भारतवर्षमें वृक्षरूपसे पधारनेवाली ये देवी कल्पवृक्षस्वरूपा हैं। भारतवासियोंका त्राण (उद्धार एवं रक्षा) करनेके लिये इनका यहाँ पधारना हुआ है। ये पूजनीयोंमें परम देवता हैं।
प्रकृतिदेवीके एक अन्य प्रधान अंशका नाम देवी 'जरत्कारु' है। ये कश्यपजीकी मानसपुत्री हैं; अतः 'मनसा' देवी कहलाती हैं। इन्हें भगवान् शंकरकी प्रिय शिष्या होनेका सौभाग्य प्राप्त है। ये परम विदुषी हैं। नागराज शेषकी बहिन हैं। सभी नाग इनका सम्मान करते हैं। नागकी सवारीपर चलनेवाली इन अनुपम सुन्दरी देवीको 'नागेश्वरी' और 'नागमाता' भी कहा जाता है। प्रधान-प्रधान नाग इनके साथ विराजमान रहते हैं। ये नागोंसे सुशोभित रहती हैं। नागराज इनकी स्तुति करते हैं। ये सिद्धयोगिनी हैं और नागलोकमें निवास करती हैं। ये विष्णुस्वरूपिणी हैं। भगवान् विष्णुमें इनकी अटल श्रद्धा-भक्ति है। ये सदा श्रीहरिकी पूजामें संलग्न रहती हैं। इनका विग्रह तपोमय है। तपस्वीजनोंको फल प्रदान करनेमें ये परम कुशल हैं। ये स्वयं भी तपस्या करती हैं। इन्होंने देवताओंके वर्षसे तीन लाख वर्षतक भगवान् श्रीहरिकी प्रसन्नताके लिये तपस्या की है। भारतवर्षमें जितने तपस्वी और तपस्विनियाँ हैं, उन सबमें ये पूज्य एवं श्रेष्ठ हैं। सर्प-सम्बन्धी मन्त्रोंकी ये अधिष्ठात्री देवी हैं। ब्रह्मतेजसे इनका विग्रह सदा प्रकाशमान रहता है। इनको 'परब्रह्मस्वरूपा' कहते हैं। ये ब्रह्मके चिन्तनमें सदा संलग्न रहती हैं। जरत्कारुमुनि भगवान् श्रीकृष्णके अंश हैं। उन्हींकी ये पतिव्रता
३- परिपूर्णतम श्रीकृष्ण और चिन्मयी श्रीराधासे प्रकट विराट्स्वरूप बालकका वर्णन
प्रकृतिखण्ड १०९
पत्नी हैं। मुनिवर आस्तीक, जो तपस्वियोंमें श्रेष्ठ गिने जाते हैं, ये देवी उनकी माता हैं।
नारद! प्रकृतिदेवीके एक प्रधान अंशको 'देवसेना' कहते हैं। मातृकाओंमें ये परम श्रेष्ठ मानी जाती हैं। इन्हें लोग भगवती 'षष्ठी' के नामसे कहते हैं। प्रत्येक लोकमें शिशुओंका पालन एवं संरक्षण करना इनका प्रधान कार्य है। ये तपस्विनी, विष्णुभक्ता तथा कार्तिकेयजीकी पत्नी हैं। ये साध्वी भगवती प्रकृतिका छठा अंश हैं। अतएव इन्हें 'षष्ठी' देवी कहा जाता है। संतानोत्पत्तिके अवसरपर अभ्युदयके लिये इन षष्ठी योगिनीकी पूजा होती है। अखिल जगत्में बारहों महीने लोग इनकी निरन्तर पूजा करते हैं। पुत्र उत्पन्न होनेपर छठे दिन सूतिकागृहमें इनकी पूजा हुआ करती है—यह प्राचीन नियम है। कल्याण चाहनेवाले कुछ व्यक्ति इक्कीसवें दिन इनकी पूजा करते हैं। इनकी मातृका संज्ञा है। ये दयास्वरूपिणी हैं। निरन्तर रक्षा करनेमें तत्पर रहती हैं। जल, थल, आकाश, गृह—जहाँ कहीं भी बच्चोंको सुरक्षित रखना इनका प्रधान उद्देश्य है।
प्रकृतिदेवीका एक प्रधान अंश 'मङ्गलचण्डी' के नामसे विख्यात है। ये मङ्गलचण्डी प्रकृतिदेवीके मुखसे प्रकट हुई हैं। इनकी कृपासे समस्त मङ्गल सुलभ हो जाते हैं। सृष्टिके समय इनका विग्रह मङ्गलमय रहता है। संहारके अवसरपर ये क्रोधमयी बन जाती हैं। इसीलिये इन देवीको पण्डितजन 'मङ्गलचण्डी' कहते हैं। प्रत्येक मङ्गलवारको विश्वभरमें इनकी पूजा होती है। इनके अनुग्रहसे साधक पुरुष पुत्र, पौत्र, धन, सम्पत्ति, यश और कल्याण प्राप्त कर लेते हैं। प्रसन्न होनेपर सम्पूर्ण स्त्रियोंके समस्त मनोरथ पूर्ण कर देना इनका स्वभाव ही है। ये भगवती महेश्वरी कुपित होनेपर क्षणमात्रमें विश्वको नष्ट कर सकती हैं।
देवी 'काली' को प्रकृतिदेवीका प्रधान अंश मानते हैं। इन देवीके नेत्र ऐसे हैं, मानो कमल हों। संग्राममें जब भगवती दुर्गाके सामने प्रबल राक्षस-बन्धु शुम्भ और निशुम्भ डटे थे, उस समय ये काली भगवती दुर्गाके ललाटसे प्रकट हुई थीं। इन्हें दुर्गाका आधा अंश माना जाता है। गुण और तेजमें ये दुर्गाके समान ही हैं। इनका परम पुष्ट विग्रह करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान है। सम्पूर्ण शक्तियोंमें ये प्रमुख हैं। इनसे बढ़कर बलवान् कोई है ही नहीं। ये परम योगस्वरूपिणी देवी सम्पूर्ण सिद्धि प्रदान करती हैं। श्रीकृष्णके प्रति इनमें अटूट श्रद्धा है। तेज, पराक्रम और गुणमें ये श्रीकृष्णके समान ही हैं। इनका सारा समय भगवान् श्रीकृष्णके चिन्तनमें ही व्यतीत होता है। इन सनातनी देवीके शरीरका रंग भी कृष्ण ही है। ये चाहें तो एक श्वासमें समस्त ब्रह्माण्डको नष्ट कर सकती हैं। अपने मनोरञ्जनके लिये अथवा जगत्को शिक्षा देनेके विचारसे ही ये संग्राममें दैत्योंके साथ युद्ध करती हैं। सुपूजित होनेपर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—सब कुछ देनेमें ये पूर्ण समर्थ हैं। ब्रह्मादि देवता, मुनिगण, मनु प्रभृति और मानवसमाज सब-के-सब इनकी उपासना करते हैं।
भगवती 'वसुन्धरा' भी प्रकृतिदेवीके प्रधान अंशसे प्रकट हैं। अखिल जगत् इन्हींपर ठहरा है। ये सर्व-शस्य-प्रसूतिका (सम्पूर्ण खेतीको उत्पन्न करनेवाली) कही जाती हैं। इन्हें लोग 'रत्नाकरा' और 'रत्नगर्भा' भी कहते हैं। सम्पूर्ण रत्नोंकी खान इन्हींके अंदर विराजमान है। राजा और प्रजा—सभी लोग इनकी पूजा एवं स्तुति करते हैं। सबको जीविका प्रदान करनेके लिये ही इन्होंने यह रूप धारण कर रखा है। ये सम्पूर्ण सम्पत्तिका विधान करती हैं। ये न रहें तो सारा चराचर जगत् कहीं भी ठहर नहीं सकता।
मुनिवर! प्रकृतिदेवीकी जो-जो कलाएँ हैं, उन्हें सुनो और ये जिन-जिनकी पत्नियाँ हैं, वह सब भी मैं तुम्हें बताता हूँ। देवी 'स्वाहा' अग्निकी