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ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

ब्रह्मखण्ड २७ हैं; सम्पूर्ण सिद्धियोंके स्वामी, सर्वसिद्धिस্বরূপ तथा सिद्धिदाता हैं; प्रकृतिसे परे विराजमान, ईश्वर, निर्गुण, नित्य-विग्रह, आदिपुरुष और अव्यक्त हैं। बहुत-से नामोंद्वारा उन्हींको पुकारा जाता है। बहुसंख्यक पुरुषोंने विविध स्तोत्रोंद्वारा उन्हींका स्तवन किया है। वे सत्य, स्वतन्त्र, एक, परमात्मस्वरूप, शान्त तथा सबके परम आश्रय हैं। शान्तचित्त वैष्णवजन उन्हींका ध्यान करते हैं। ऐसा उत्कृष्ट रूप धारण करनेवाले उन एकमात्र भगवान्‌ने प्रलयकालमें दिशाओं और आकाशके साथ सम्पूर्ण विश्वको शून्यरूप देखा। (अध्याय २) श्रीकृष्णसे सृष्टिका आरम्भ, नारायण, महादेव, ब्रह्मा, धर्म, सरस्वती, महालक्ष्मी और प्रकृति (दुर्गा)-का प्रादुर्भाव तथा इन सबके द्वारा पृथक्-पृथक् श्रीकृष्णका स्तवन सौति कहते हैं - भगवान्‌ने देखा कि सम्पूर्ण विश्व शून्यमय है। कहीं कोई जीव-जन्तु नहीं है। जलका भी कहीं पता नहीं है। सारा आकाश वायुसे रहित और अन्धकारसे आवृत्त हो घोर प्रतीत होता है। वृक्ष, पर्वत और समुद्र आदिसे शून्य होनेके कारण विकृताकार जान पड़ता है। मूर्ति, धातु, शस्य और तृणका सर्वथा अभाव हो गया है। ब्रह्मन् ! जगत्‌को इस शून्यावस्थामें देख मन-ही-मन सब बातोंकी आलोचना करके दूसरे किसी सहायकसे रहित एकमात्र स्वेच्छामय प्रभुने स्वेच्छासे ही सृष्टि- रचना आरम्भ की। सबसे पहले उन परम पुरुष श्रीकृष्णके दक्षिणपार्श्वसे जगत्‌के कारणरूप तीन मूर्तिमान् गुण प्रकट हुए। उन गुणोंसे महत्तत्त्व, अहङ्कार, पाँच तन्मात्राएँ तथा रूप, रस, गन्ध, स्पर्श और शब्द - ये पाँच विषय क्रमशः प्रकट हुए। तदनन्तर श्रीकृष्णसे साक्षात् भगवान् नारायणका प्रादुर्भाव हुआ, जिनकी अङ्गकान्ति श्याम थी, वे नित्य-तरुण, पीताम्बरधारी तथा वनमालासे विभूषित थे। उनके चार भुजाएँ थीं। उन्होंने अपने चार हाथोंमें क्रमशः- शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म धारण कर रखे थे। उनके मुखारविन्दपर मन्द मुस्कानकी छटा छा रही थी। वे रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित थे, शार्ङ्गधनुष धारण किये हुए थे। कौस्तुभमणि उनके वक्षःस्थलकी शोभा बढ़ाती थी। श्रीवत्सभूषित वक्षमें साक्षात् लक्ष्मीका निवास था। वे श्रीनिधि अपूर्व शोभाको प्रकट कर रहे थे; शरत्कालकी पूर्णिमाके चन्द्रमाकी प्रभासे सेवित मुख-चन्द्रके कारण वे बड़े मनोहर जान पड़ते थे। कामदेवकी कान्तिसे युक्त रूप- लावण्य उनका सौन्दर्य बढ़ा रहा था। वे श्रीकृष्णके सामने खड़े हो दोनों हाथ जोड़कर उनकी स्तुति करने लगे। नारायण बोले- जो वर (श्रेष्ठ), वरेण्य (सत्पुरुषोंद्वारा पूज्य), वरदायक (वर देनेवाले) और वरकी प्राप्तिके कारण हैं; जो कारणोंके भी कारण, कर्मस्वरूप और उस कर्मके भी कारण हैं; तप जिनका स्वरूप है, जो नित्य-निरन्तर तपस्याका फल प्रदान करते हैं, तपस्वीजनोंमें सर्वोत्तम तपस्वी हैं, नूतन जलधरके समान श्याम, स्वात्माराम और मनोहर हैं, उन भगवान् श्रीकृष्णकी मैं वन्दना करता हूँ। जो निष्काम और कामरूप हैं, कामनाके नाशक तथा कामदेवकी उत्पत्तिके कारण हैं, जो सर्वरूप, सर्वबीजस्वरूप, सर्वोत्तम

२८संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

एवं सर्वेश्वर हैं, वेद जिनका स्वरूप है, जो वेदोंके बीज, वेदोक्त फलके दाता और फलरूप हैं, वेदोंके ज्ञाता, उसके विधानको जाननेवाले तथा सम्पूर्ण वेदवेत्ताओंके शिरोमणि हैं, उन भगवान् श्रीकृष्णको मैं प्रणाम करता हूँ।*

ऐसा कहकर वे नारायणदेव भक्तिभावसे युक्त हो उनकी आज्ञासे उन परमात्माके सामने रमणीय रत्नमय सिंहासनपर विराज गये। जो पुरुष प्रतिदिन एकाग्रचित्त हो तीनों संध्याओंके समय नारायणद्वारा किये गये इस स्तोत्रको सुनता और पढ़ता है, वह निष्पाप हो जाता है। उसे यदि पुत्रकी इच्छा हो तो पुत्र मिलता है और भार्याकी इच्छा हो तो प्यारी भार्या प्राप्त होती है। जो अपने राज्यसे भ्रष्ट हो गया है, वह इस स्तोत्रके पाठसे पुनः राज्य प्राप्त कर लेता है तथा धनसे वञ्चित हुए पुरुषको धनकी प्राप्ति हो जाती है। कारागारके भीतर विपत्तिमें पड़ा हुआ मनुष्य यदि इस स्तोत्रका पाठ करे तो निश्चय ही संकटसे मुक्त हो जाता है। एक वर्षतक इसका संयमपूर्वक श्रवण करनेसे रोगी अपने रोगसे छुटकारा पा जाता है।

**सौति कहते हैं—**शौनकजी! तत्पश्चात् परमात्मा श्रीकृष्णके वामपार्श्वसे भगवान् शिव प्रकट हुए। उनकी अङ्गकान्ति शुद्ध स्फटिकमणिके समान निर्मल एवं उज्ज्वल थी। उनके पाँच मुख थे और दिशाएँ ही उनके लिये वस्त्र थीं। उन्होंने मस्तकपर तपाये हुए सुवर्णके समान पीले रंगकी जटाओंका भार धारण कर रखा था। उनका मुख मन्द-मन्द मुसकानसे प्रसन्न दिखायी देता था। उनके प्रत्येक मस्तकमें तीन-तीन नेत्र थे। उनके सिरपर चन्द्राकार मुकुट शोभा पाता था। परमेश्वर शिवने हाथोंमें त्रिशूल, पट्टिश और जपमाला ले रखी थी। वे सिद्ध तो हैं ही, सम्पूर्ण सिद्धोंके ईश्वर भी हैं। योगियोंके गुरुके भी गुरु हैं। मृत्युकी भी मृत्यु हैं, मृत्युके ईश्वर हैं, मृत्युस्वरूप हैं और मृत्युपर विजय पानेवाले मृत्युञ्जय हैं। वे ज्ञानानन्दस्वरूप, महाज्ञानी, महान् ज्ञानदाता तथा सबसे श्रेष्ठ हैं। पूर्ण चन्द्रमाकी प्रभासे धुले हुए-से गौरवर्ण शिवका दर्शन सुखपूर्वक होता है। उनकी आकृति मनको मोह लेती है। ब्रह्मतेजसे जाज्वल्यमान भगवान् शिव वैष्णवोंके शिरोमणि हैं। प्रकट होनेके पश्चात् श्रीकृष्णके सामने खड़े हो भगवान् शिवने भी हाथ जोड़कर उनका स्तवन किया। उस समय उनके सम्पूर्ण अङ्गोंमें रोमाञ्च हो आया था। नेत्रोंसे अश्रु झर रहे थे और उनकी वाणी अत्यन्त गद्गद हो रही थी।

**महादेवजी बोले—**जो जयके मूर्तिमान् रूप, जय देनेवाले, जय देनेमें समर्थ, जयकी प्राप्तिके कारण तथा विजयदाताओंमें सर्वश्रेष्ठ हैं, उन अपराजित देवता भगवान् श्रीकृष्णकी मैं वन्दना करता हूँ। सम्पूर्ण विश्व जिनका रूप है, जो विश्वके ईश्वरोंके भी ईश्वर हैं, विश्वेश्वर, विश्वकारण, विश्वाधार, विश्वके विश्वासभाजन तथा विश्वके कारणोंके भी कारण हैं, उन भगवान् श्रीकृष्णकी मैं वन्दना करता हूँ। जो जगत्की रक्षाके कारण, जगत्के संहारक तथा जगत्की सृष्टि करनेवाले परमेश्वर हैं; फलके बीज, फलके आधार, फलरूप और फलदाता


* वरं वरेण्यं वरदं वराहं वरकारणम्। कारणं कारणानां च कर्म तत्कर्मकारणम्॥
तपस्तत्फलदं शश्वत् तपस्विनां च तापसम्। वन्दे नवघनश्यामं स्वात्मारामं मनोहरम्॥
निष्कामं कामरूपं च कामघ्नं कामकारणम्। सर्वं सर्वेश्वरं सर्वबीजरूपमनुत्तमम्॥
वेदरूपं वेदबीजं वेदोक्तफलदं फलम्। वेदज्ञं तद्विधानं च सर्ववेदविदां वरम्॥
(ब्रह्मखण्ड ३। १०–१३)

ब्रह्मखण्ड २९

हैं; उन भगवान् श्रीकृष्णको मैं प्रणाम करता हूँ। जो तेजःस्वरूप, तेजके दाता और सम्पूर्ण तेजस्वियोंमें श्रेष्ठ हैं, उन भगवान् गोविन्दकी मैं वन्दना करता हूँ।*

ऐसा कहकर महादेवजीने भगवान् श्रीकृष्णको मस्तक झुकाया और उनकी आज्ञासे श्रेष्ठ रत्नमय सिंहासनपर नारायणके साथ वार्तालाप करते हुए बैठ गये। जो मनुष्य भगवान् शिवद्वारा किये गये इस स्तोत्रका संयतचित्त होकर पाठ करता है, उसे सम्पूर्ण सिद्धियाँ मिल जाती हैं और पग-पगपर विजय प्राप्त होती है। उसके मित्र, धन और ऐश्वर्यकी सदा वृद्धि होती है तथा शत्रुसमूह, दुःख और पाप नष्ट हो जाते हैं।

**सौति कहते हैं—**तत्पश्चात् श्रीकृष्णके नाभि-कमलसे बड़े-बूढ़े महातपस्वी ब्रह्माजी प्रकट हुए। उन्होंने अपने हाथमें कमण्डलु ले रखा था। उनके वस्त्र, दाँत और केश सभी सफेद थे। चार मुख थे। वे ब्रह्माजी योगियोंके ईश्वर, शिल्पियोंके स्वामी तथा सबके जन्मदाता गुरु हैं। तपस्याके फल देनेवाले और सम्पूर्ण सम्पत्तियोंके जन्मदाता हैं। वे ही स्रष्टा और विधाता हैं तथा समस्त कर्मोंके कर्ता, भर्ता एवं संहर्ता हैं। चारों वेदोंको वे ही धारण करते हैं। वे वेदोंके ज्ञाता, वेदोंको प्रकट करनेवाले और उनके पति (पालक) हैं। उनका शील-स्वभाव सुन्दर है। वे सरस्वतीके कान्त, शान्तचित्त और कृपाकी निधि हैं। उन्होंने श्रीकृष्णके सामने खड़े हो दोनों हाथ जोड़कर उनका स्तवन किया। उस समय उनके सम्पूर्ण अङ्गोंमें रोमाञ्च हो आया था तथा उनकी ग्रीवा भगवान्‌के सामने भक्तिभावसे झुकी हुई थी।

**ब्रह्माजी बोले—**जो तीनों गुणोंसे अतीत और एकमात्र अविनाशी परमेश्वर हैं, जिनमें कभी कोई विकार नहीं होता, जो अव्यक्त और व्यक्तरूप हैं तथा गोप-वेष धारण करते हैं, उन गोविन्द श्रीकृष्णकी मैं वन्दना करता हूँ। जिनकी नित्य किशोरावस्था है, जो सदा शान्त रहते हैं, जिनका सौन्दर्य करोड़ों कामदेवोंसे भी अधिक है तथा जो नूतन जलधरके समान श्यामवर्ण हैं, उन परम मनोहर गोपीवल्लभको मैं प्रणाम करता हूँ। जो वृन्दावनके भीतर रासमण्डलमें विराजमान होते हैं, रासलीलामें जिनका निवास है तथा जो रासजनित उल्लासके लिये सदा उत्सुक रहते हैं, उन रासेश्वरको मैं नमस्कार करता हूँ।†

ऐसा कहकर ब्रह्माजीने भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंमें प्रणाम किया और उनकी आज्ञासे नारायण तथा महादेवजीके साथ सम्भाषण करते हुए श्रेष्ठ रत्नमय सिंहासनपर बैठे। जो प्रातःकाल उठकर ब्रह्माजीके द्वारा किये गये इस स्तोत्रका पाठ करता है, उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और बुरे सपने अच्छे सपनोंमें बदल जाते हैं। भगवान् गोविन्दमें भक्ति होती है, जो पुत्रों और पौत्रोंकी वृद्धि करनेवाली है। इस स्तोत्रका पाठ करनेसे अपयश नष्ट होता है और चिरकालतक सुयश बढ़ता रहता है।


* जयस्वरूपं जयदं जयेशं जयकारणम्। प्रवरं जयदानां च वन्दे तमपराजितम्॥
विश्वं विश्वेश्वरेशं च विश्वेशं विश्वकारणम्। विश्वाधारं च विश्वस्तं विश्वकारणकारणम्॥
विश्वरक्षाकारणं च विश्वघ्नं विश्वजं परम्। फलबीजं फलाधारं फलं च तत्फलप्रदम्॥
तेजःस्वरूपं तेजोजं सर्वतेजस्विनां वरम्। (ब्रह्मखण्ड ३। २४-२५ १/२)

† कृष्णं वन्दे गुणातीतं गोविन्दमेकमक्षरम्। अव्यक्तमव्ययं व्यक्तं गोपवेषविधायिनम्॥
किशोरवयसं शान्तं गोपीकान्तं मनोहरम्। नवीननीरदश्यामं कोटिकन्दर्पसुन्दरम्॥
वृन्दावनवनाभ्यर्णे रासमण्डलसंस्थितम्। रासेश्वरं रासवासं रासोल्लाससमुत्सुकम्॥
(ब्रह्मखण्ड ३। ३५-३७)

३० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

सौति कहते हैं—तत्पश्चात् परमात्मा श्रीकृष्णके वक्षःस्थलसे कोई एक पुरुष प्रकट हुआ, जिसके मुखपर मन्द मुस्कानकी छटा छा रही थी। उसकी अङ्गकान्ति श्वेत वर्णकी थी और उसने अपने मस्तकपर जटा धारण कर रखी थी। वह सबका साक्षी, सर्वज्ञ तथा सबके समस्त कर्मोंका द्रष्टा था। उसका सर्वत्र समभाव था। उसके हृदयमें सबके प्रति दया भरी थी। वह हिंसा और क्रोधसे सर्वथा अछूता था। उसे धर्मका ज्ञान था। वह धर्मस्वरूप, धर्मिष्ठ तथा धर्म प्रदान करनेवाला था। वही धर्मात्माओंमें ‘धर्म’ नामसे विख्यात है। परमात्मा श्रीकृष्णकी कलासे उसका प्रादुर्भाव हुआ है, श्रीकृष्णके सामने खड़े हुए उस पुरुषने पृथ्वीपर दण्डकी भाँति पड़कर प्रणाम किया और सम्पूर्ण कामनाओंके दाता उन सर्वेश्वर परमात्माका स्तवन आरम्भ किया।

धर्म बोले—जो सबको अपनी ओर आकृष्ट करनेवाले सच्चिदानन्दस्वरूप हैं, इसलिये ‘कृष्ण’ कहलाते हैं, सर्वव्यापी होनेके कारण जिनकी ‘विष्णु’ संज्ञा है, सबके भीतर निवास करनेसे जिनका नाम ‘वासुदेव’ है, जो ‘परमात्मा’ एवं ‘ईश्वर’ हैं, ‘गोविन्द’, ‘परमानन्द’, ‘एक’, ‘अक्षर’, ‘अच्युत’, ‘गोपेश्वर’, ‘गोपीश्वर’, ‘गोप’, ‘गोरक्षक’, ‘विभु’, ‘गौओंके स्वामी’, ‘गोष्ठनिवासी’, ‘गोवत्स-पुच्छधारी’, ‘गोपों और गोपियोंके मध्य विराजमान’, ‘प्रधान’, ‘पुरुषोत्तम’, ‘नवघनश्याम’, ‘रासवास’ और ‘मनोहर’ आदि नाम धारण करते हैं, उन भगवान् श्रीकृष्णकी मैं वन्दना करता हूँ।

ऐसा कहकर धर्म उठकर खड़े हुए। फिर वे भगवान्‌की आज्ञासे ब्रह्मा, विष्णु और महादेवजीके साथ वार्तालाप करके उस श्रेष्ठ रत्नमय सिंहासनपर बैठे। जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर धर्मके मुखसे निकले हुए इन चौबीस नामोंका पाठ करता है, वह सर्वथा सुखी और सर्वत्र विजयी होता है। मृत्युके समय उसके मुखसे निश्चय ही हरि-नामका उच्चारण होता है। अतः वह अन्तमें श्रीहरिके परम धाममें जाता है तथा उसे श्रीहरिकी अविचल दास्य-भक्ति प्राप्त होती है। उसके द्वारा सदा धर्मविषयक ही चेष्टा होती है। अधर्ममें उसका मन कभी नहीं लगता। धर्म, अर्थ, काम और मोक्षरूपी फल सदाके लिये उसके हाथमें आ जाता है। उसे देखते ही सारे पाप, सम्पूर्ण भय तथा समस्त दुःख उसी तरह भयसे भाग जाते हैं, जैसे गरुड़पर दृष्टि पड़ते ही सर्प पलायन कर जाते हैं।

सौति कहते हैं—तत्पश्चात् धर्मके वामपार्श्वसे एक रूपवती कन्या प्रकट हुई, जो साक्षात् दूसरी लक्ष्मीके समान सुन्दरी थी। वह ‘मूर्ति’ नामसे विख्यात हुई। तदनन्तर परमात्मा श्रीकृष्णके मुखसे एक शुक्ल वर्णवाली देवी प्रकट हुई, जो वीणा और पुस्तक धारण करनेवाली थी। वह करोड़ों पूर्ण चन्द्रमाओंकी शोभासे सम्पन्न थी। उसके नेत्र शरत्कालके प्रफुल्ल कमलोंका सौन्दर्य धारण करते थे। उसने अग्निमें शुद्ध किये गये उज्ज्वल वस्त्र धारण कर रखे थे और वह रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित थी। उसके मुखपर मन्द-मन्द मुस्कराहट छा रही थी। दन्तपंक्ति बड़ी सुन्दर दिखायी देती थी। अवस्था सोलह वर्षकी थी। वह सुन्दरियोंमें भी श्रेष्ठ सुन्दरी थी। श्रुतियों, शास्त्रों और विद्वानोंकी परम जननी थी। वह वाणीकी अधिष्ठात्री, कवियोंकी इष्टदेवी, शुद्ध सत्त्वस्वरूपा और शान्तरूपिणी सरस्वती थी। गोविन्दके सामने खड़ी होकर पहले तो उसने वीणावादनके साथ उनके नाम और गुणोंका सुन्दर कीर्तन किया, फिर वह नृत्य करने लगी। श्रीहरिने प्रत्येक कल्पके युग-युगमें जो-जो लीलाएँ की हैं, उन सबका गान करते हुए सरस्वतीने हाथ जोड़कर उनकी स्तुति की।

सरस्वती बोलीं—‘जो रासमण्डलके मध्य-भागमें विराजमान हैं, रासोल्लासके लिये सदा

ब्रह्मखण्ड ३१ उत्सुक रहनेवाले हैं, रत्नसिंहासनपर आसीन हैं, रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित हैं, रासेश्वर एवं श्रेष्ठ रासकर्ता हैं, रासेश्वर राधाके प्राणवल्लभ हैं, रासके अधिष्ठाता देवता हैं तथा रासलीलाद्वारा मनोविनोद करनेवाले हैं, उन भगवान् गोविन्दकी मैं वन्दना करती हूँ। जो रासलीलाजनित श्रमसे थक गये हैं, प्रत्येक रासमें विहार करनेवाले हैं तथा रासके लिये उत्कण्ठित हुई गोपियोंके प्राणवल्लभ हैं, उन शान्त मनोहर श्रीकृष्णको मैं प्रणाम करती हूँ।' यों कहकर प्रसन्न मुखवाली सती सरस्वतीने भगवान्‌को प्रणाम किया और सफलमनोरथ हो उनकी आज्ञासे वे श्रेष्ठ रत्नमय सिंहासनपर बैठीं। जो प्रातःकाल उठकर वाणीद्वारा किये गये इस स्तोत्रका पाठ करता है, वह सदा बुद्धिमान्, धनवान्, विद्वान् और पुत्रवान् होता है। सौति कहते हैं - तत्पश्चात् परमात्मा श्रीकृष्णके मनसे एक गौरवर्णा देवी प्रकट हुईं, जो रत्नमय अलंकारोंसे अलंकृत थीं। उनके श्रीअङ्गोंपर पीताम्बरकी साड़ी शोभा पा रही थी। मुखपर मन्द हास्यकी छटा छा रही थी। वे नवयौवना देवी सम्पूर्ण ऐश्वर्योंकी अधिष्ठात्री थीं। वे ही फलरूपसे सम्पूर्ण सम्पत्तियाँ प्रदान करती हैं। स्वर्गलोकमें उन्हींको स्वर्गलक्ष्मी कहते हैं तथा राजाओंके यहाँ वे ही राजलक्ष्मी कहलाती हैं। श्रीहरिके सामने खड़ी होकर उन साध्वी लक्ष्मीने उन्हें हाथ जोड़कर प्रणाम किया। उनकी ग्रीवा भक्तिभावसे झुक गयी और उन्होंने उन परमात्मा भगवान् श्रीकृष्णका स्तवन किया। महालक्ष्मी बोलीं- 'जो सत्यस्वरूप, सत्यके स्वामी और सत्यके बीज हैं, सत्यके आधार, सत्यके ज्ञाता तथा सत्यके मूल हैं, उन सनातन देव श्रीकृष्णको मैं प्रणाम करती हूँ।' यों कह श्रीहरिको मस्तक नवाकर तपाये हुए सुवर्णकी-सी कान्तिवाली लक्ष्मीदेवी दसों दिशाओंको प्रकाशित करती हुई सुखासनपर बैठ गयीं। तदनन्तर परमात्मा श्रीकृष्णकी बुद्धिसे सबकी अधिष्ठात्री देवी ईश्वरी मूलप्रकृतिका प्रादुर्भाव हुआ। सुतप्त काञ्चनकी-सी कान्तिवाली वे देवी अपनी प्रभासे करोड़ों सूर्योंका तिरस्कार कर रही थीं। उनका मुख मन्द-मन्द मुस्कराहटसे प्रसन्न दिखायी देता था। नेत्र शरत्कालके प्रफुल्ल कमलोंकी शोभाको मानो छीन लेते थे। उनके श्रीअङ्गोंपर लाल रंगकी साड़ी शोभा पाती थी। वे रत्नमय आभरणोंसे विभूषित थीं। निद्रा, तृष्णा, क्षुधा, पिपासा, दया, श्रद्धा और क्षमा आदि जो देवियाँ हैं, उन सबकी तथा समस्त शक्तियोंकी वे ईश्वरी और अधिष्ठात्री देवी हैं। उनके सौ भुजाएँ हैं। वे दर्शनमात्रसे भय उत्पन्न करती हैं। उन्हींको दुर्गतिनाशिनी दुर्गा कहा गया है। वे परमात्मा श्रीकृष्णकी शक्तिरूपा तथा तीनों लोकोंकी परा जननी हैं। त्रिशूल, शक्ति, शार्ङ्गधनुष, खड्ग, बाण, शङ्ख, चक्र, गदा, पद्म, अक्षमाला, कमण्डलु, वज्र, अङ्कुश, पाश, भुशुण्डि, दण्ड, तोमर, नारायणास्त्र, ब्रह्मास्त्र, रौद्रास्त्र, पाशुपतास्त्र, पार्जन्यास्त्र, वारुणास्त्र, आग्नेयास्त्र तथा गान्धर्वास्त्र-इन सबको हाथोंमें धारण किये श्रीकृष्णके सामने खड़ी हो, प्रकृति देवीने प्रसन्नतापूर्वक उनका स्तवन किया। प्रकृति बोलीं- प्रभो ! मैं प्रकृति, ईश्वरी, सर्वेश्वरी, सर्वरूपिणी और सर्वशक्तिस्वरूपा कहलाती हूँ। मेरी शक्तिसे ही यह जगत् शक्तिमान् है तथापि मैं स्वतन्त्र नहीं हूँ; क्योंकि आपने मेरी सृष्टि की है, अतः आप ही तीनों लोकोंके पति, गति, पालक, स्रष्टा, संहारक तथा पुनः सृष्टि करनेवाले हैं। परमानन्द ही आपका स्वरूप है। मैं सानन्द आपकी वन्दना करती हूँ। प्रभो! आप चाहें तो पलक मारते-मारते ब्रह्माका भी पतन हो सकता है। जो भ्रूभङ्गकी लीलामात्रसे करोड़ों विष्णुओंकी सृष्टि कर सकता है, ऐसे आपके अनुपम प्रभावका

३२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण वर्णन करनेमें कौन समर्थ है ? आप तीनों लोकोंके चराचर प्राणियों, ब्रह्मा आदि देवताओं तथा मुझ-जैसी कितनी ही देवियोंकी खेल- खेलमें ही सृष्टि कर सकते हैं। आप परिपूर्णतम परमात्मा हैं। भलीभाँति स्तुतिके योग्य हैं। विभो ! मैं आपकी सानन्द वन्दना करती हूँ। असंख्य विश्वका आश्रयभूत महान् विराट् पुरुष जिनकी कलाका अंशमात्र है, उन परमात्मा भगवान् श्रीकृष्णको मैं आनन्दपूर्वक प्रणाम करती हूँ। ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि देवता, सम्पूर्ण वेद, मैं और सरस्वती - ये सब जिनकी स्तुति करनेमें असमर्थ हैं तथा जो प्रकृतिसे परे हैं, उन आप परमेश्वरको मैं नमस्कार करती हूँ। वेद तथा श्रेष्ठ विद्वान् लक्षण बताते हुए आपकी स्तुति करनेमें समर्थ नहीं हैं। भला जो निर्लक्ष्य हैं उनकी स्तुति कौन कर सकता है ? ऐसे आप निरीह परमात्माको मैं प्रणाम करती हूँ। ऐसा कहकर दुर्गादेवी श्रीकृष्णको प्रणाम करके उनकी आज्ञासे श्रेष्ठ रत्नमय सिंहासनपर बैठ गयीं। जो पूजाकालमें दुर्गाद्वारा किये गये परमात्मा श्रीकृष्णके इस स्तोत्रका पाठ करता है, वह सर्वत्र विजयी और सुखी होता है। दुर्गा- देवी उसका घर छोड़कर कभी नहीं जाती हैं। वह भवसागरमें रहकर भी अपने सुयशसे प्रकाशित होता रहता है और अन्तमें श्रीहरिके परम धामको जाता है। (अध्याय ३) सावित्री, कामदेव, रति, अग्नि, अग्निदेव, जल, वरुणदेव, स्वाहा, वरुणाणी, वायुदेव, वायवीदेवी तथा मेदिनीके प्राकट्यका वर्णन सौति कहते हैं - शौनकजी ! तत्पश्चात् श्रीकृष्णकी जिह्वाके अग्रभागसे शुद्ध स्फटिकके समान उज्ज्वल वर्णवाली एक मनोहारिणी देवीका प्रादुर्भाव हुआ, जो सफेद साड़ी पहने हुए सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित थीं और हाथमें जपमाला लिये हुए थीं। उन्हें सावित्री कहा गया है। साध्वी सावित्रीने सामने खड़ी हो हाथ जोड़ भक्तिभावसे मस्तक झुकाकर सनातन परब्रह्म श्रीकृष्णका स्तवन आरम्भ किया। सावित्री बोलीं - भगवन् ! आप सबके बीज (आदिकारण) हैं। सनातन ब्रह्म-ज्योति हैं। परात्पर, निर्विकार एवं निरञ्जन ब्रह्म हैं। आप श्यामसुन्दर श्रीकृष्णको मैं नमस्कार करती हूँ। यों कह मन्द-मन्द मुस्कराती हुई वेदमाता सावित्रीदेवी श्रीहरिको पुनः प्रणाम करके श्रेष्ठ रत्नमय सिंहासनपर आसीन हुईं। तत्पश्चात् परमात्मा श्रीकृष्णके मानससे एक पुरुष प्रकट हुआ, जो तपाये हुए सुवर्णके समान कान्तिमान् था। वह पाँच बाणोंद्वारा समस्त कामियोंके मनको मथ डालता है, इसलिये मनीषी पुरुष उसका नाम 'मन्मथ' कहते हैं। उस कामदेवके वामपार्श्वसे एक श्रेष्ठ कामिनी उत्पन्न हुई, जो परम सुन्दरी और सबके मनको मोह लेनेवाली थी। मन्द-मन्द मुस्कराती हुई उस सतीको देखकर समस्त प्राणियोंकी उसमें रति हो गयी! इसीलिये मनीषी पुरुषोंने उसका नाम 'रति' रख दिया। पाँच बाण और पुष्पमय धनुष धारण करनेवाले कामदेव श्रीहरिके सामने खड़े हो उनकी स्तुति करके आज्ञा पाकर रतिके साथ रमणीय रत्नमय सिंहासनपर बैठे। मारण, स्तम्भन, जृम्भन, शोषण और उन्मादन- ये कामदेवके पाँच बाण हैं। उन्हींको वे धारण करते हैं। अपने बाणोंकी परीक्षा करनेके लिये कामदेवने बारी-बारीसे वे सभी बाण चलाये। फिर तो ईश्वरकी इच्छासे सब लोग कामके वशीभूत हो गये। कामपरवश स्खलित महायोगी ब्रह्माजीका वीर्य अग्निके रूपमें उद्दीप्त हो उठा। वे देवेश्वर

गीताप्रेस, गोरखपुर

श्रीकृष्णसे पञ्चमुख महादेवका प्राकट्य

गीताप्रेस, गोरखपुर


भगवान् गणेश

तपस्या करती हुई श्रीपार्वतीको भगवान् श्रीकृष्णके दर्शन

गीताप्रेस, गोरखपुर

रत्नसिंहासनस्थ परात्पर भगवान् श्रीकृष्ण

[चित्र: ब्रह्माके द्वारा श्रीराधा-कृष्णविवाह]

गीताप्रेस, गोरखपुर बी. के. मित्र


ब्रह्माके द्वारा श्रीराधा-कृष्णविवाह

गीताप्रेस, गोरखपुर

ब्रह्माजीके द्वारा श्रीकृष्णका स्तवन

गीताप्रेस, गोरखपुर

देवराज इन्द्रके द्वारा श्रीकृष्णका स्तवन

[चित्र: श्रीकृष्णवियोगिनी राधाजी और उद्धव]

गीताप्रेस, गोरखपुर

श्रीकृष्णवियोगिनी राधाजी और उद्धव

ब्रह्मखण्ड ३३

अग्निदेव बड़ी-बड़ी लपटें उठाते हुए करोड़ों ताड़ोंके समान विशाल रूप धारण करके प्रज्वलित होने लगे। उस अग्निको बढ़ते देख श्रीकृष्णने लीलापूर्वक 'जल' की रचना की। वे अपने मुखसे निःश्वास वायुके साथ जलकी एक-एक बूँद गिराने लगे। मुखसे निकले हुए उस बिन्दुमात्र जलने सम्पूर्ण विश्वको आप्लावित कर दिया। उसके किञ्चित् कणमात्र जलने उस प्रज्वलित अग्निको शान्त कर दिया। तभीसे जलके द्वारा आग बुझने लगी। तत्पश्चात् वहाँ एक पुरुषका प्रादुर्भाव हुआ, जो उस अग्निके अधिदेवता थे। फिर पूर्वोक्त जलसे एक पुरुषका उत्थान हुआ, जिनका नाम 'वरुण' हुआ। वे ही जलके अधिष्ठाता देवता और समस्त जल-जन्तुओंके स्वामी हुए। इसके बाद उस अग्निदेवके वामपार्श्वसे एक कन्याका आविर्भाव हुआ, जिसका नाम 'स्वाहा' था। मनीषी पुरुष उसे अग्निकी पत्नी कहते हैं। जलेश्वर वरुणके वामपार्श्वसे भी एक कन्या प्रकट हुई, जो 'वरुणानी' के नामसे विख्यात थी। वही वरुणकी सती साध्वी प्रिया हुई। भगवान् श्रीकृष्णकी निःश्वास वायुसे श्रीमान् 'पवन' का प्रादुर्भाव हुआ, जो समस्त देहधारियोंके प्राण हैं। श्वास-प्रश्वासके रूपमें उन्हींकी कला प्रकट हुई है। वायुदेवके वामपार्श्वसे एक कन्या प्रकट हुई, जो वायुपत्नी 'वायवी' देवी कही गयी है।

श्रीकृष्णका शुक्र जलमें गिरा। वह एक हजार वर्षके बाद एक अंडेके रूपमें प्रकट हुआ। उसीसे महान् विराट् पुरुषकी उत्पत्ति हुई, जो सम्पूर्ण विश्वके आधार हैं। उन विराट् पुरुषके एक-एक रोम-कूपमें एक-एक ब्रह्माण्डकी स्थिति है। वे स्थूलसे भी स्थूलतम हैं। उनसे बड़ा दूसरा कोई नहीं है। वे परमात्मा श्रीकृष्णके सोलहवें अंश हैं। उन्हींको 'महाविष्णु' जानना चाहिये। वे ही सबके सनातन आधार हैं। जैसे जलमें कमलका पत्ता रहता है, उसी प्रकार वे महार्णवके जलमें शयन करते हैं। उनके शयन करते समय कानोंके मलसे दो दैत्य प्रकट हुए। वे दोनों जलसे उठकर ब्रह्माजीको मार डालनेके लिये उद्यत हो गये। तब भगवान् नारायणने उन दोनोंको अपने जघन-देशमें सुलाकर चक्रसे काट डाला। उन दोनोंके सम्पूर्ण मेदसे यह सारी पृथ्वी निर्मित हुई, जिससे इसका नाम 'मेदिनी' हुआ। उसीपर सम्पूर्ण विश्वकी स्थिति है। उसकी अधिष्ठात्री देवीका नाम 'वसुन्धरा' है। (अध्याय ४)


ब्राह्म आदि कल्पोंका परिचय, गोलोकमें श्रीकृष्णका नारायण आदिके साथ रासमण्डलमें निवास, श्रीकृष्णके वामपार्श्वसे श्रीराधाका प्रादुर्भाव; राधाके रोमकूपोंसे गोपाङ्गनाओंका प्राकट्य तथा श्रीकृष्णसे गोपों, गौओं, बलीवर्दों, हंसों, श्वेत घोड़ों और सिंहोंकी उत्पत्ति; श्रीकृष्णद्वारा पाँच रथोंका निर्माण तथा पार्षदोंका प्राकट्य; भैरव, ईशान और डाकिनी आदिकी उत्पत्ति

महर्षि शौनकके पूछनेपर सौति कहते हैं—ब्रह्मन्! मैंने सबसे पहले ब्राह्मकल्पके चरित्रका वर्णन किया है। अब वाराहकल्प और पाद्मकल्प—इन दोनोंका वर्णन करूँगा, सुनिये। मुने! ब्राह्म, वाराह और पाद्म—ये तीन प्रकारके कल्प हैं; जो क्रमशः प्रकट होते हैं। जैसे सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग—ये चारों युग क्रमसे कहे गये हैं, वैसे ही वे कल्प भी हैं। तीन सौ साठ युगोंका एक दिव्य युग माना गया है। इकहत्तर दिव्य युगोंका एक मन्वन्तर होता है। चौदह मनुओंके व्यतीत हो जानेपर ब्रह्माजीका एक दिन होता है। ऐसे तीन सौ साठ

३४संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

दिनोंके बीतनेपर ब्रह्माजीका एक वर्ष पूरा होता है। इस तरहके एक सौ आठ वर्षोंकी विधाताकी आयु बतायी गयी है। यह परमात्मा श्रीकृष्णका एक निमेषकाल है। कालवेत्ता विद्वानोंने ब्रह्माजीकी आयुके बराबर कल्पका मान निश्चित किया है। छोटे-छोटे कल्प बहुत-से हैं, जो संवर्त आदिके नामसे विख्यात हैं। महर्षि मार्कण्डेय सात कल्पोंतक जीनेवाले बताये गये हैं; परंतु वह कल्प ब्रह्माजीके एक दिनके बराबर ही बताया गया है। तात्पर्य यह कि मार्कण्डेय मुनिकी आयु ब्रह्माजीके सात दिनमें ही पूरी हो जाती है, ऐसा निश्चय किया गया है। ब्राह्म, वाराह और पाद्म—ये तीन महाकल्प कहे गये हैं। इनमें जिस प्रकार सृष्टि होती है, वह बताता हूँ, सुनिये। ब्राह्मकल्पमें मधु-कैटभके मेदसे मेदिनीकी सृष्टि करके स्रष्टाने भगवान् श्रीकृष्णकी आज्ञा ले सृष्टि-रचना की थी। फिर वाराहकल्पमें जब पृथ्वी एकार्णवके जलमें डूब गयी थी, वाराहरूपधारी भगवान् विष्णुके द्वारा अत्यन्त प्रयत्नपूर्वक रसातलसे उसका उद्धार करवाया और सृष्टि-रचना की; तत्पश्चात् पाद्मकल्पमें सृष्टिकर्ता ब्रह्माने विष्णुके नाभिकमलपर सृष्टिका निर्माण किया। ब्रह्मलोकपर्यन्त जो त्रिलोकी है, उसीकी रचना की, ऊपरके जो नित्य तीन लोक हैं, उनकी नहीं। सृष्टि-निरूपणके प्रसंगमें मैंने यह काल-गणना बतायी है और किञ्चिन्मात्र सृष्टिका निरूपण किया है। अब फिर आप क्या सुनना चाहते हैं?

**शौनकजीने पूछा—**सूतनन्दन! अब यह बताइये कि गोलोकमें सर्वव्यापी महान् परमात्मा गोलोकनाथने इन नारायण आदिकी सृष्टि करके फिर क्या किया? इस विषयका विस्तारपूर्वक वर्णन करनेकी कृपा करें।

**सौतिने कहा—**ब्रह्मन्! इन सबकी सृष्टि करके इन्हें साथ ले भगवान् श्रीकृष्ण अत्यन्त कमनीय सुरम्य रासमण्डलमें गये। रमणीय कल्पवृक्षोंके मध्यभागमें मण्डलाकार रासमण्डल अत्यन्त मनोहर दिखायी देता था। वह सुविस्तृत, सुन्दर, समतल और चिकना था। चन्दन, कस्तूरी, अगर और कुङ्कुमसे उसको सजाया गया था। उसपर दही, लावा, सफेद धान और दूर्वादल बिखेरे गये थे। रेशमी सूतमें गुँथे हुए नूतन चन्दन-पल्लवोंकी बन्दनवारों और केलेके खंभोंद्वारा वह चारों ओरसे घिरा हुआ था। करोड़ों मण्डप, जिनका निर्माण उत्तम रत्नोंके सारभागसे हुआ था, उस भूमिकी शोभा बढ़ाते थे। उनके भीतर रत्नमय प्रदीप जल रहे थे। वे पुष्प और सुगन्धकी धूपसे वासित थे। उनके भीतर अत्यन्त ललित प्रसाधन-सामग्री रखी हुई थी। वहाँ जाकर जगदीश्वर श्रीकृष्ण सबके साथ उन मण्डपोंमें ठहरे। मुनिश्रेष्ठ! उस रासमण्डलका दर्शन करके वे सब लोग आश्चर्यसे चकित हो उठे। वहाँ श्रीकृष्णके वामपार्श्वसे एक कन्या प्रकट हुई, जिसने दौड़कर फूल ले आकर उन भगवान्‌के चरणोंमें अर्घ्य प्रदान किया। उसके अङ्ग अत्यन्त कोमल थे। वह मनोहारिणी और सुन्दरियोंमें भी सुन्दरी थी। उसके सुन्दर एवं अरुण ओष्ठ और अधर अपनी लालिमासे बन्धुजीव पुष्प

ब्रह्मखण्ड ३५

(दुपहरियेके फूल)-की शोभाको पराजित कर रहे थे। मनोहर दन्तपंक्ति मोतियोंकी श्रेणीको तिरस्कृत करती थी। वह सुन्दरी किशोरी बड़ी मनोहर थी। उसका सुन्दर मुख शरत्पूर्णिमाके कोटि चन्द्रोंकी शोभाको छीने लेता था। सीमन्तभाग बड़ा मनोहर था। नेत्र शरत्कालके प्रफुल्ल कमलोंके समान अत्यन्त सुन्दर दिखायी देते थे। उसकी मनोहर नासिकाके सामने पक्षिराज गरुडकी नुकीली चोंच हार मान चुकी थी। वह मनोहारिणी बाला अपने दोनों कपोलोंद्वारा सुनहरे दर्पणकी शोभाको तिरस्कृत कर रही थी। रत्नोंके आभूषणोंसे विभूषित दोनों कान बड़े सुन्दर लगते थे। सुन्दर कपोलोंमें चन्दन, अगुरु, कस्तूरी, कुङ्कुम और सिन्दूरकी बूँदोंसे पत्ररचना की गयी थी, जिससे वह बड़ी मनोहर जान पड़ती थी। उसके सँवारे हुए केशपाश मालतीकी मालासे अलंकृत थे। वह सती-साध्वी बाला अपने सिरपर सुन्दर एवं सुगन्धित वेणी धारण करती थी। उसके दोनों चरणस्थल कमलोंकी प्रभाको छीने लेते थे। उसकी मन्द-मन्द गति हंस और खंजनके गर्वका गञ्जन करनेवाली थी। वह उत्तम रत्नोंके सारभागसे बनी हुई मनोहर वनमाला, हीरेका बना हुआ हार, रत्ननिर्मित केयूर, कंगन, सुन्दर रत्नोंके सारभागसे निर्मित अत्यन्त मनोहर पाशक (गलेकी जंजीर या कानका पासा), बहुमूल्य रत्नोंका बना झनकारता हुआ मंजीर तथा अन्य नाना प्रकारके चित्राङ्कित सुन्दर जड़ाऊ आभूषण पहने हुए थी।

वह गोविन्दसे वार्तालाप करके उनकी आज्ञा पा मुसकराती हुई श्रेष्ठ रत्नमय सिंहासनपर बैठ गयी। उसकी दृष्टि अपने उन प्राणवल्लभके मुखारविन्दपर ही लगी हुई थी। उस किशोरीके रोमकूपोंसे तत्काल ही गोपाङ्गनाओंका आविर्भाव हुआ, जो रूप और वेषके द्वारा भी उसीकी समानता करती थीं। उनकी संख्या लक्षकोटि थी। वे सब-की-सब नित्य सुस्थिर-यौवना थीं। संख्याके जानकार विद्वानोंने गोलोकमें गोपाङ्गनागणोंकी उक्त संख्या ही निर्धारित की है। मुने! फिर तो श्रीकृष्णके रोमकूपोंसे भी उसी क्षण गोपगणोंका आविर्भाव हुआ, जो रूप और वेषमें भी उन्हींके समान थे। संख्यावेत्ता महर्षियोंका कथन है कि श्रुतिमें गोलोकके कमनीय मनोहर रूपवाले गोपोंकी संख्या तीस करोड़ बतायी गयी है।

फिर तत्काल ही श्रीकृष्णके रोमकूपोंसे नित्य सुस्थिर यौवनवाली गौएँ प्रकट हुईं, जिनके रूप-रंग अनेक प्रकारके थे। बहुतेरे बलीवर्द (साँड़), सुरभि जातिकी गौएँ, नाना प्रकारके सुन्दर-सुन्दर बछड़े और अत्यन्त मनोहर, श्यामवर्णवाली बहुत-सी कामधेनु गायें भी वहाँ तत्काल प्रकट हो गयीं। उनमेंसे एक मनोहर बलीवर्दको, जो करोड़ों सिंहोंके समान बलशाली था, श्रीकृष्णने शिवको सवारीके लिये दे दिया। तत्पश्चात् श्रीकृष्णके चरणोंके नखछिद्रोंसे सहसा मनोहर हंस-पंक्ति प्रकट हुई। उन हंसोंमें नर, मादा और बच्चे सभी मिले-जुले थे। उनमेंसे एक राजहंसको, जो महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न था, श्रीकृष्णने तपस्वी ब्रह्माको वाहन बनानेके लिये अर्पित कर दिया।

तदनन्तर परमात्मा श्रीकृष्णके बायें कानके छिद्रसे सफेद रंगके घोड़ोंका समुदाय प्रकट हुआ, जो बड़ा मनोहर जान पड़ता था। उनमेंसे एक श्वेत अश्व गोपाङ्गनावल्लभ श्रीकृष्णने देवसभामें विराजमान धर्मको सवारीके लिये प्रसन्नतापूर्वक दे दिया। फिर उन परम पुरुषके दाहिने कानके छिद्रसे उस देवसभाके भीतर ही महान् बलवान् और पराक्रमी सिंहोंकी श्रेणी प्रकट हुई। श्रीकृष्णने उनमेंसे एक सिंह जो बहुमूल्य श्रेष्ठ हारसे अलंकृत था, बड़े आदरके साथ प्रकृति (दुर्गा)-देवीको अर्पित कर दिया। उन्हें वही सिंह दिया गया, जिसे वे लेना चाहती थीं।

१- नैमिषारण्यमें शौनकके प्रश्न करनेपर सौतिद्वारा ब्रह्मवैवर्तपुराणका परिचय देते हुए इसका महत्त्व-निरूपण २४

३६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

इसके बाद योगीश्वर श्रीकृष्णने योगबलसे पाँच रथोंका निर्माण किया। वे सब शुद्ध एवं सर्वश्रेष्ठ रत्नोंसे बनाये गये थे। मनके समान वेगसे चलनेवाले और मनोहर थे। उनकी ऊँचाई लाख योजनकी और विस्तार सौ योजनका था। उनमें लाख-लाख पहिये लगे थे। उनका वेग वायुके समान था। उन रथोंमें एक-एक लाख क्रीड़ाभवन बने हुए थे। उनमें शृङ्गारोचित भोगवस्तुएँ और असंख्य शय्याएँ थीं। उन गृहोंमें लाखों रत्नमय दीप प्रकाश फैलाते थे और लाखों घोड़े उस रथकी शोभा बढ़ाते थे। भाँति-भाँतिके विचित्र चित्र उनमें अङ्कित थे। सुन्दर रत्नमय कलश उनकी उज्ज्वलता बढ़ा रहे थे। रत्नमय दर्पणों और आभूषणोंसे वे सभी रथ (विमान) भरे हुए थे। श्वेत चँवर उनकी शोभा बढ़ा रहे थे। अग्निमें तपाकर शुद्ध किये गये सुनहरे वस्त्र, विचित्र-विचित्र माला, श्रेष्ठ मणि, मोती, माणिक्य तथा हीरोंके हारोंसे वे सभी रथ अलंकृत थे। कुछ-कुछ लाल रंगके असंख्य सुन्दर कृत्रिम कमल, जो श्रेष्ठ रत्नोंके सारभागसे निर्मित हुए थे, उन रथोंको सुशोभित कर रहे थे।

द्विजश्रेष्ठ! भगवान् श्रीकृष्णने उनमेंसे एक रथ तो नारायणको दे दिया और एक राधिकाको देकर शेष सभी रथ अपने लिये रख लिये। तत्पश्चात् श्रीकृष्णके गुह्यदेशसे पिङ्गलवर्णवाले पार्षदोंके साथ एक पिङ्गल पुरुष प्रकट हुआ। गुह्यदेशसे आविर्भूत होनेके कारण वे सब गुह्यक कहलाये और वह पुरुष उन गुह्यकोंका स्वामी कुबेर कहलाया, जो धनाध्यक्षके पदपर प्रतिष्ठित है। कुबेरके वामपार्श्वसे एक कन्या प्रकट हुई, जो कुबेरकी पत्नी हुई। वह देवी समस्त सुन्दरियोंमें मनोरमा थी, अतः उसी नामसे प्रसिद्ध हुई। फिर भगवान्के गुह्यदेशसे भूत, प्रेत, पिशाच, कूष्माण्ड, ब्रह्मराक्षस और विकृत अङ्गवाले वेताल प्रकट हुए। मुने! तदनन्तर श्रीकृष्णके मुखसे कुछ पार्षदोंका प्राकट्य हुआ, जिनके चार भुजाएँ थीं। वे सब-के-सब श्यामवर्ण थे और हाथोंमें शङ्ख, चक्र, गदा एवं पद्म धारण करते थे। उनके गलेमें वनमाला लटक रही थी। उन सबने पीताम्बर पहन रखे थे, उनके मस्तकपर किरीट, कानोंमें कुण्डल तथा अन्यान्य अङ्गोंमें रत्नमय आभूषण शोभा दे रहे थे। श्रीकृष्णने वे चार भुजाधारी पार्षद नारायणको दे दिये। गुह्यकोंको उनके स्वामी कुबेरके हवाले किया और भूत-प्रेतादि भगवान् शङ्करको अर्पित कर दिये।

तदनन्तर श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंसे द्विभुज पार्षद प्रकट हुए, जो श्यामवर्णके थे और हाथोंमें जपमाला लिये हुए थे। वे श्रेष्ठ पार्षद निरन्तर आनन्दपूर्वक भगवान्‌के चरणकमलोंका ही चिन्तन करते थे। श्रीकृष्णने उन्हें दास्यकर्ममें नियुक्त किया। वे दास यत्नपूर्वक अर्घ्य लिये प्रकट हुए थे। वे सभी श्रीकृष्णपरायण वैष्णव थे। उनके सारे अङ्ग पुलकित थे, नेत्रोंसे अश्रु झर रहे थे और वाणी गद्गद थी। उनका चित्त केवल भगवच्चरणारविन्दोंके चिन्तनमें ही संलग्न रहता था।

इसके बाद श्रीकृष्णके दाहिने नेत्रसे भयंकर गण प्रकट हुए, जो हाथोंमें त्रिशूल और पट्टिश लिये हुए थे। उन सबके तीन नेत्र थे और मस्तकपर चन्द्राकार मुकुट धारण करते थे। वे सब-के-सब विशालकाय तथा दिगम्बर थे। प्रज्वलित अग्निशिखाके समान जान पड़ते थे। वे सभी महान् भाग्यशाली भैरव कहलाये। वे शिवके समान ही तेजस्वी थे। रुरुभैरव, संहारभैरव, कालभैरव, असितभैरव, क्रोधभैरव, भीषणभैरव, महाभैरव तथा खट्वाङ्गभैरव—ये आठ भैरव माने गये हैं।

श्रीकृष्णके बायें नेत्रसे एक भयंकर पुरुष प्रकट हुआ, जो त्रिशूल, पट्टिश, व्याघ्रचर्ममय वस्त्र और गदा धारण किये हुए था। वह

ब्रह्मखण्ड ३७


दिगम्बर, विशालकाय, त्रिनेत्रधारी और चन्द्राकार मुकुट धारण करनेवाला था। वह महाभाग पुरुष ‘ईशान’ कहलाया, जो दिक्पालोंका स्वामी है। इसके बाद श्रीकृष्णकी नासिकाके छिद्रसे डाकिनियाँ, योगिनियाँ तथा सहस्रों क्षेत्रपाल प्रकट हुए। इनके सिवा उन परम पुरुषके पृष्ठदेशसे सहसा तीन करोड़ श्रेष्ठ देवताओंका प्रादुर्भाव हुआ, जो दिव्य मूर्तिधारी थे।

(अध्याय ५)


श्रीकृष्णका नारायण आदिको लक्ष्मी आदिका पत्नीरूपमें दान, महादेवजीका दार-संयोगमें अरुचि प्रकट करके निरन्तर भजनके लिये वर माँगना तथा भगवान्‌का उन्हें वर देते हुए उनके नाम आदिकी महिमा बताकर उन्हें भविष्यमें शिवासे विवाहकी आज्ञा देना तथा शिवा आदिको मन्त्रादिका उपदेश करना

सौति कहते हैं—तदनन्तर श्रीकृष्णने श्रेष्ठ रत्नोंकी मालाके साथ महालक्ष्मी और सरस्वती—इन दो देवियोंको भी नारायणके हाथमें सादर समर्पित कर दिया। तत्पश्चात् ब्रह्माजीको सावित्री, धर्मको मूर्ति, कामदेवको रूपवती रति और कुबेरको मनोरमा सादर प्रदान की। इसी तरह अन्यान्य स्त्रियोंको भी पतियोंके हाथमें दिया। जो-जो स्त्री जिस-जिससे प्रकट हुई थी, उस-उस रूपवती सतीको उसी-उसी पतिके हाथोंमें अर्पित किया। तदनन्तर सर्वेश्वर श्रीकृष्णने योगियोंके गुरु शंकरजीको बुलाकर प्रिय वाणीमें कहा—‘आप देवी सिंहवाहिनीको ग्रहण करें।’ श्रीकृष्णका यह वचन सुनकर नीललोहित शिव हँसे और डरते हुए विनीत भावसे उन प्राणेश्वर प्रभु अच्युतसे बोले। महादेवजीने पहले प्रकृतिके दोष बताकर उसे ग्रहण न करनेकी इच्छा प्रकट की। फिर इस प्रकार कहा—

श्रीमहेश्वर बोले—नाथ! मुझे गृहिणी नहीं चाहिये। मुझे तो मनचाहा वर दीजिये। जिस सेवकको जो अभीष्ट हो, श्रेष्ठ स्वामी उसे वही वस्तु देते हैं। ‘मैं आपकी भक्तिमें लगा रहूँ, आपके चरणोंकी दासता—सेवा करता रहूँ’ यह लालसा मेरे हृदयमें निरन्तर बढ़ रही है। आपके नाम-जपसे, आपके चरणकमलोंकी सेवासे मुझे कभी तृप्ति नहीं होती है। मैं सोते-जागते हर समय अपने पाँच मुखोंसे आपके नाम और गुणोंका, जो मङ्गलके आश्रय हैं, निरन्तर गान करता हुआ सर्वत्र विचरा करता हूँ। मेरा मन कोटि-कोटि कल्पोंतक आपके स्वरूपका ध्यान करनेमें ही तत्पर रहे। भोगेच्छामें नहीं, यह योग और तपस्यामें ही संलग्न रहे। आपकी सेवा, पूजा, वन्दना और नाम-कीर्तनमें ही इसे सदा उल्लास प्राप्त हो। इनसे विरत होनेपर यह उद्विग्न हो उठे। सम्पूर्ण वरोंके ईश्वर! आपके नाम और गुणोंका स्मरण, कीर्तन, श्रवण, जप, आपके मनोहर

३८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण


रूपका ध्यान, आपके चरणकमलोंकी सेवा, आपकी वन्दना, आपके प्रति आत्मसमर्पण और नित्य आपके नैवेद्य (प्रसाद)-का भोजन—यह जो नौ प्रकारकी भक्ति है, उसीको मुझे श्रेष्ठ वरदान मानकर दीजिये। प्रभो! सार्ष्टि (आपके समान ऐश्वर्यकी प्राप्ति), सालोक्य (आपके समान लोककी प्राप्ति), सारूप्य (आपके समान रूपकी प्राप्ति), सामीप्य (आपके निकट रहनेका सौभाग्य), साम्य (आपकी समताकी प्राप्ति) और लीनता (आपमें मिलकर एक हो जाना अथवा सायुज्यकी प्राप्ति)—मुक्त पुरुष ये छः प्रकारकी मुक्तियाँ बताते हैं। अणिमा, लघिमा, गरिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, महिमा, ईशित्व, वशित्व, सर्वकामावसायिता, सर्वज्ञता, दूरश्रवण, परकायप्रवेश, वाक्सिद्धि, कल्पवृक्षत्व, सृष्टिशक्ति, संहारशक्ति, अमरत्व और सर्वाग्रगण्यता—ये अठारह सिद्धियाँ मानी गयी हैं। सर्वेश्वर! योग, तप, सब प्रकारके दान, व्रत, यश, कीर्ति, वाणी, सत्य, धर्म, उपवास, सम्पूर्ण तीर्थोंमें भ्रमण, स्नान, आपके सिवा अन्य देवताका पूजन, देवप्रतिमाओंका दर्शन, सात द्वीपोंकी सात परिक्रमा, समस्त समुद्रोंमें स्नान, सभी स्वर्गोंके दर्शन, ब्रह्मपद, रुद्रपद, विष्णुपद तथा परमपद—ये तथा और भी जो अनिर्वचनीय, वाञ्छनीय पद हैं, वे सब-के-सब आपकी भक्तिके कलांशकी सोलहवीं कलाके भी बराबर नहीं हैं।

महादेवजीका यह वचन सुनकर भगवान् श्रीकृष्ण हँसे और उन योगिगुरु महादेवजीसे यह सर्वसुखदायक सत्य वचन बोले—

श्रीभगवान्ने कहा—सर्वज्ञोंमें श्रेष्ठ सर्वेश्वर शिव! तुम पूरे सौ करोड़ कल्पोंतक निरन्तर दिन-रात मेरी सेवा करो। सुरेश्वर! तुम तपस्वीजनों, सिद्धों, योगियों, ज्ञानियों, वैष्णवों तथा देवताओंमें सबसे श्रेष्ठ हो। शम्भो! तुम अमरत्व लाभ करो और महान् मृत्युञ्जय हो जाओ। मेरे वरसे तुम्हें सब प्रकारकी सिद्धियाँ, वेदोंका ज्ञान और सर्वज्ञता प्राप्त होगी। वत्स! तुम लीलापूर्वक असंख्य ब्रह्माओंका पतन देखोगे। शिव! आजसे तुम ज्ञान, तेज, अवस्था, पराक्रम, यश और तेजमें मेरे समान हो जाओ। तुम मेरे लिये प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हो। तुमसे बढ़कर मेरा कोई प्रिय भक्त नहीं है—

त्वत्परो नास्ति मे प्रेयांस्त्वं मदीयात्मनः परः।
ये त्वां निन्दन्ति पापिष्ठा ज्ञानहीना विचेतनाः॥
पच्यन्ते कालसूत्रेण यावच्चन्द्रदिवाकरौ।

शिव! तुमसे बढ़कर अत्यन्त प्रिय मेरे लिये दूसरा नहीं है। तुम मेरी आत्मासे बढ़कर हो। जो पापिष्ठ, अज्ञानी और चेतनाहीन मनुष्य तुम्हारी निन्दा करते हैं, वे तबतक कालसूत्र नरकमें पकाये जाते हैं, जबतक चन्द्रमा और सूर्यकी सत्ता रहती है।

शिव! तुम सौ कोटि कल्पोंके पश्चात् शिवाको ग्रहण करोगे। मेरा वचन कभी व्यर्थ नहीं होता। तुम्हें इसका पालन करना चाहिये। तुम मेरे और अपने वचनका भी पालन करो। शम्भो! तुम प्रकृति (दुर्गा)-को ग्रहण करके दिव्य सहस्त्र वर्षोंतक महान् सुख एवं शृङ्गाररसका आस्वादन करोगे, इसमें संशय नहीं है। तुम केवल तपस्वी नहीं हो। मेरे समान ही महान् ईश्वर हो। जो स्वेच्छामय ईश्वर है, वह समयानुसार गृही, तपस्वी और योगी हुआ करता है। शिव! दार-संयोग (पत्नी-परिग्रह)-में तुमने जो दुःख बताया है, उसके विषयमें मैं यह कहना चाहता हूँ कि कुलटा स्त्री ही स्वामीको दुःख देती है, पतिव्रता नहीं। जो महान् कुलमें उत्पन्न हुई है, कुलीन एवं कुल-मर्यादाका पालन करनेवाली है, वह स्नेहपूर्वक उसी तरह पतिका पालन करती है, जैसे माता उत्तम पुत्रका। पति पतित हो या अपतित, दरिद्र हो या धनवान्—कुलवती स्त्रीके