ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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समावर्त्तन-संस्कार
उपनयन-संस्कार से ब्रह्मचर्याश्रम का प्रारम्भ और समावर्त्तन-संस्कार से उसकी समाप्ति होती है। उपनीत होकर ब्रह्मचारी गुरु-कुल में प्रविष्ट होता है, और स्नातक होकर उससे बाहर निकलता है। इस संस्कार में ब्रह्मचारी की तीर्थों के जल से स्नान कराय जाता है और तब से उसको 'स्नातक' कहा जाता है।
“सम्रह्मचारी यो विद्या-व्रत-स्नातः।”
(छन्दोग्योपनिषद्)
वह ब्रह्मचारी है, जिसने विद्याव्रत रूपी तीर्थों के जल में स्नान किया हो।
इस संस्कार के समय गुरु को यथा-शक्ति दक्षिणा दी जाती है, और गुरु उस ब्रह्मचारी के आयुर्वल, यशःप्रसार, ज्ञानगौरव और धनधान्य का आशीर्वाद देता है।
इस संस्कार से ब्रह्मचारी अपने आचार्य के संरक्षण से पृथक् होता है। अधिक समय के एक साथ रहने से दोनों में अत्यन्त अभिन्नता हो जाती है। अतएव मोह के धन्यन को तोड़ कर आचार्य उसे शुद्ध्याश्रम में जाने और अपना कर्तव्य पालन करने का उपदेश इस समय भी देता है:—
१—प्रमाद में पड़ कर ब्रह्मचर्य-व्रत का दुःखयोग न करना।
२—अपनी विद्या और वल से लोक-सेवा में सदा लगे रहना।
३—पञ्चमहायज्ञ में कभी प्रान्ति से असावधानी न करना।
४—माता-पिता तथा कुटुम्ब के भरण-पोषण को अपने हाथ में लेना।
५—सुयज्ञ उत्पन्न करने के लिये विधि-पूर्वक विवाह करना।
६—सदाचारी और उत्तम पुरुषों का सङ्ग करना।
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- ७—धर्म तथा धन का सन्धय करते रहना ।
- ८—अधर्ममूलक व्यवसाय में कभी न लिपटना ।
- ९—क्रोध, मोह, लोभ, भोग और दुर्घ से दूर ही रहना ।
- १०—गृहस्थाश्रम को नियत समय तक सुखमय बनाते रहना ।
२५—विवाह-विधान
“ब्रह्मचर्यं समाप्याथ, गृहधर्मं समाचरेत् ।”
ब्रह्मचर्याश्रम को समाप्त कर गृहस्थ-धर्म का पालन करना योग्य है ।
उद्धेत द्विजोभायां, सवर्णं लक्षणन्विताम् ।”
(मनुस्मृति)
स्नातक को चाहिये कि सवर्णों और मुलच्छियों वाली कन्या से विवाह करे ।
ब्रह्मचारी वीर्य-रक्षण सहित ज्ञानार्जन कर लेने पर, गुरु की आज्ञा से स्नातक होकर घर आता है । उस अवस्था में उसके पिता या उसके समान अधिकारी उसका सत्कार करते हैं । इसके अनन्तर विवाह का समय आता है । वर अपने सम्बन्धियों के साथ कन्या के पिता के यहाँ पहुँचता है । कन्या-पक्ष से उसका द्वार—पूजन (स्वागत) होता है, तदनन्तर ‘जनवास’ दिया जाता है । विवाह के विशिष्ट समय पर वर विवाह-मण्डप में जाता है । कन्या का पिता उसका ‘मनुषक’ अर्थात् उत्तम पदार्थों से सत्कार कर बैठता है । फिर अभिदेव का स्थापन कर वर, वधू का पाणि-भरण कर इस प्रकार कहता है—
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विवाह-विधान
मैं तुम्हें अपनी पत्नी बनाता हूँ। तू उत्तम सन्तान वाली हो। मेरे साथ तुम्हें भी दीर्घ जीवन प्राप्त हो। अर्थात् दिवों ने गृह-स्थाश्रम के लिये तुम्हें प्रदान किया है। तेरी शुभ दृष्टि हो—तुम्हें से पति का हित हो—पशुओं का कल्याण हो—तू मनोहर हृदय और नेत्रवाली हो। तेरे पुत्र जीवित और पुत्रपार्थी हों। तुम्हें से सब को सुख प्राप्त हो।
फिर वर वधू से ध्वन करता है और वह पत् के दीर्घ-जीवन एवं सम्बन्धियों के सुख की प्रार्थना करती है। तदनन्तर 'सप्तपदी' होती है। इसमें वर वधू को साथ लेकर सात बार फेरी करता है, और उससे अपने अनुकूल रहने की प्रतिज्ञा करता है। इसी समय से दोनों पति-पत्नी (दम्पति) बन जाते हैं। पश्चात् कन्या का पिता भी वर से निम्नलिखित प्रतिज्ञा करता है:—
यस्त्वया धर्मश्चरितव्यः सोऽनयासह ।
धर्मं चार्थं च कामे च, नाति चरितव्यं ॥
जो कुछ सत्कर्म करना हो, इस (कन्या) की सहकारिता सं करता—धर्म, अर्थ और काम मैं इसके विरुद्ध आचरण न करना।
इस पर वर भी उसकी बातों को जलपूर्वक इस प्रकार स्वीकार करता है:—
नाति चरामि, नातिचरामि नातिचरामि ।”
मैं कभी इसके विरुद्ध आचरण नहीं करूँगा—नहीं करूँगा और नहीं करूँगा !
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२६—गृहस्थ ब्रह्मचर्य
“ऋतुकालाभिगमनं, ब्रह्मचर्यमिवोच्यते ।”
ऋतु काल में स्त्री-प्रासङ्ग करना भी ब्रह्मचर्य के बराबर माना जाता है । विवाह सम्बन्ध में देखिये, भारत के आधुनिक राष्ट्र-निर्माता महात्मा गान्धी जी क्या कहते हैं:—
“विवाह स्नेच्छाचार ( असाधारिक मैथुन ) के लिये नहीं है । स्थूलियों में भी लिखा है कि दम्पति-नियम से रहते हुये, वै भी ब्रह्मचर्य का पालन कर सकते हैं ।”
विवाह मानवी स्तुति के चलाने के लिए एक धार्मिक तथा स्वामाविक कर्तव्य है । इसका विधिवत् पालन करने से गृहस्थाश्रम सुख और शान्ति का देने वाला होता है । इस के विरुद्ध जाने से दम्पति का जीवन अत्यन्त दुःख-कारक बन जाता है । विवाह का विधान बहुत प्राचीन तथा शास्त्रीय है । इसके उद्देश्य के सम्बन्ध में मनु महाराज यह आज्ञा देते हैं:—
“ऋणुजय विमुत्स्यै, धर्मणीत्पादयोत्पन्ना ।”
तीनों ऋणों ( देव, ऋषि तथा पित्रु ) के बन्धन से छूटने के लिये धर्म-पूर्वक प्रजा का उत्पादन करे ।
विवाह का उद्देश्य ही है कि धर्म-युक्त प्रजा उत्पन्न की जाय । गृहस्थाश्रम में भी पुरुष और स्त्री को संयम से रहने की शास्त्र में आज्ञा है । अब तो अज्ञानता के कारण गृहस्थाश्रम अत्यन्त दुःखित हो रहा है । सुप्रजा उत्पन्न करना तो दूर रहा, विवाह होते ही कामवासनाओं को उत्पन्न करने का उद्योग होने लगता है । इस कुवृत्ति की साधना में सन्तान हो जाय, तो हो जाय; पर इसका
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गृहस्थ ब्रह्मचर्य
ज्ञान किस को रहता है। हम बल-पूर्वक कहते हैं कि १५ शतक युवकों का गर्भाधान अनियमित रूप से होता है। इसे हम कैसे धर्म-पूर्वक कह सकते हैं। यही कारण है कि समाज की दिन पर दिन क्षीणता होती जाती है। अधर्म-युक्त प्रजा कभी अच्छी नहीं हो सकती। बहुत उचित कहा गया है:—
“सन्तानार्थेन मैथुनम्।”
केवल सन्तान उत्पन्न करने के लिये ही मैथुन का विधान है। गृहस्थाश्रम में भी ब्रह्मचर्य का विधान है। जो पुरुष नियत समय पर सन्तान को अभिलाषा से स्त्री का समागम करता है, वह भी ब्रह्मचारी है। ‘एकनारी ब्रह्मचारी’ ऐसी कहावत है। पर एकनारी रहने पर भी मनुष्य पर-स्वो सेवन न करने से भी न्य-भिचारी माना जा सकता है; शास्त्र को आहा है:—
“श्रुतीभ्यांमुपेयात्।”
श्रुतुकाल में भार्या का सेवन करना धर्म है। इसका अभि-प्राय यह है कि रजोदर्शन के पश्चात् स्त्रियाँ गर्भधारण कर सकती हैं। अन्य समय में केवल बीर्य-नाश होता है। इसलिये बाल-हत्या का महा पातक लगता है। मनु भगवान की आहा है:—
“ब्रह्मचार्येभ्य भवति, यत्रतत्राश्रमे वसन्।”
श्रुतुकाल की वजित रात्रियों को छोड़ कर स्त्री-सहवास करने वाला पुरुष जिस किसी आश्रम में हो—ब्रह्मचारी ही है। इस वचन से भी गृहस्थाश्रम में ब्रह्मचर्य का पालन करना योग्य है। स्त्री समागम के पश्चात् गर्भ के लक्षणों का ज्ञान हो जाने पर, सन्तानोत्पत्ति के तीन वर्ष पश्चात् पुनः गर्भाधान करने की
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शास्त्र-आज्ञा देता है। फिर भी अयोग्य पुरुष और अयोग्य स्त्री को तो मैथुन की आज्ञा ही नहीं है। शास्त्रों में कहे गये नियमों के अनुकूल गृहस्थाश्रम में ब्रह्मचर्य के पालन से मनुष्य की शारीरिक तथा मानसिक किसी प्रकार की हानि नहीं होती। गृहस्थ ब्रह्मचारी भी विद्वान्, श्रीमान् और कीर्तिमान् हो सकता है।
२७—सदाचार की सौ शिष्टाग्यें
अब हम इस शीर्षक के नीचे उन शिष्टाग्यों को देते हैं, जिन का पालन करने से गृहस्थाश्रम सुखमय बनाया जा सकता है:—
१—जो परमात्मा को सर्वदर्शी और अपने हृदय में रहने-वाला समझता है, वह पाप नहीं करता।
२—अभिमान करनेवाला पुरुष बहुत थोड़े दिनों में नाश को प्राप्त होता है।
३—इश्वर केवल हमारे सुकर्मों में सहायता करता है। वह किसी के कुकर्म का सहजी नहीं।
४—वह परमेश्वर सब निराशों की आशा है। इसलिये उसे किसी भी अवस्था में भूलना योग्य नहीं।
५—जिसके हृदय में सद्भावना है, वह पुरुष कभी दुःखी नहीं हो सकता।
६—मानसिक ऊष्णरणयें ही हमारे पतनका कारण बनती हैं।
७—जो कार्य जितनी ही दृढ़ता और सुचारुता से किया जाता है, उसमें उतनी ही सफलता भी मिलती है।
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सदाचार की सौ शिक्षाएँ
८—एक कर्तव्यशील मूढ़ भी एक अकर्तव्यशील विद्वान् से श्रेष्ठ है।
९—मनुष्य अपने उन्नत स्वभाव से ही अपने को उच्च पद पर नियुक्त करा सकता है।
१०—धन और खारण्य से भी सदाचार का मूल्य अधिक माना गया है।
११—सज्जनता का चिन्ह उस मनुष्य के सद्व्यवहार से प्रकट होता है।
१२—अपनी मानसिक सद्वृत्तियों को उन्नत तथा सुदृढ़ बनाने के लिये सदा-चेष्टा करनी चाहिये।
१३—अपने गुणों के प्रभाव से पुरुष सबसे पूजित होता है। वास्तव में गुण ही पूजा का स्थान है।
१४—चरित्र-गठन के लिये आदर्श पुरुषों का अनुकरण करना चाहिये।
१५—सबरित्रता और सद्व्यवहार से मनुष्य समाज और राज्य में महान् बनता है।
१६—अच्छे ग्रन्थों के पढ़ने से उत्तम लाभ नहीं होता, जितना कि उनमें कहीं गई बातों के पालन करने से होता है।
१७—मनुष्य-जीवन का उद्देश्य सुख और सततन्त्रता है। इसी के लिये अनेक साधन किये जाते हैं।
१८—जीवन में उसी को अच्छी सफलता मिलती है, जो पुरुष बाल्यावस्था से ही अच्छे नियमों का अभ्यास करता है।
१९—ज्ञान के लिये सत्संग से काम लेना चाहिये।
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२०—जो अपने सच्चरित्र से जनता को उपदेश देकर ऊपर उठाता है, वही महापुरुष कहलाने योग्य है ।
२१—विद्या के साथ साथ नम्रता और सरलता होने से सोने में सुगन्धि हो जाती है ।
२२—वही विद्वान् पुरुष है, जो दूसरों को श्रविषा से बुझाने का उद्योग करे ।
२३—सत्यता और स्पष्टवादिता से मनुष्य की स्वाधीनता का ज्ञान होता है ।
२४—जो अपने मानसिक विचारों का स्वयं दास है, वह कभी उदार और उच्च नहीं हो सकता ।
२५—बहुत विचार करने पर थोड़ा कार्य करना वचित है ।
२६—नर-रत्नों को अपने सिद्धान्त से यमराज भी नहीं डगा सकते ।
२७—अपनी प्रतिष्ठा और रीति को सदैव निमाने का प्रयत्न करना चाहिये ।
२८—धर्म और ईश्वर से डरना चाहिये और पाप तथा दुष्टों से कभी न भय खाना चाहिये ।
२९—निष्कलङ्क चरित्र, उच्च विचार और सरल व्यवहार से बढ़ कर इस संसार में कुछ है ही नहीं ।
३०—सुख की इच्छा सबको है, पर उसके साधने के उपाय को कार्य-रूप में लाने में बहुत से लोग पीछे हट जाते हैं ।
३१—निर्धनता और हीनता में भी कभी असत्य से लाभ न उठाना चाहिये ।
३२—अपने आत्मा के प्रतिकूल चलना बड़ा भारी पाप है ।
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सदाचार की सौ शिल्पियाँ
३३—दुष्टों की निन्दा से डर कर अपना सुकार्य या विचार न छोड़ना ही सत्साहस है ।
३४—मधुर वचन से सारा संसार वश किया जा सकता है ।
३४—सदाचारी और स्थाय-स्वागी पुरुष को ही सम्पत्ति मिलती है ।
३५—स्वात्माभिमानी और पवित्र हृदयी पुरुष निर्धन होने पर भी सर्व-श्रेष्ठ गिना जाता है ।
३६—श्रमशीलता, कर्तव्यनिष्ठा और नियमबद्धता से ही प्रतिभा उत्पन्न होती है ।
३७—विद्यार्थियों के लिये उनका सब से बड़ा गुण सरल तथा शुद्ध जीवन है ।
३८—एक क्षण भी समय व्यर्थ न खोना चाहिये । समय का आश्रय लेकर कार्य-साधन करना ही योग्य है ।
३९—आडम्बर शून्य और सन्तोषी व्यक्ति बनने से ही शान्ति प्राप्त हो सकती है ।
४०—सदाचारी विद्यार्थी का शारीरिक और मानसिक तेज बढ़ता जाता है ।
४१—जीवन को सुविधा-सम्पन्न बनाने के लिये बुद्धिमान को चाहिये कि सतत परिश्रम करता रहे ।
४२—विद्याध्ययन और पुरय के सन्ध्य में जो समय लगता है, वह फलद और सार्थक है ।
४३—परोपकार और जाति-सेवा ही मनुष्यता का रूप है । इसके लिये सदा कटिबद्ध रहना धर्म है ।
गहनचर्य-विद्वान
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४४—ज्ञान और बल की सदा उपासना करनी चाहिये। .योंकि संसार में सब कुछ इन्हीं की सत्ता का हेतु है।
४५—सत्पुरुष और प्रेमी पुरुष दुःख में भी कभी दया और प्रेम नहीं छोड़ते।
४६—उदार और बुद्धिमान वैरी भी मित्रता के योग्य माना जाता है।
४७—न्याय, स्नेह, उत्साह, कर्तव्य, बुद्धि, विद्या और प्रेम जिस पुरुष में है, वह देव-सुख है।
४८—बहुत विचार कर मित्रता करनी चाहिये। सच्चे मित्रों से बढ़ कर संसार में कुछ भी सुख नहीं है।
४९—कुल की सुखीति तथा अपने अधिकारों की सदा रक्षा करनी चाहिये।
५०—देश, काल तथा पात्र का विचार करने वाला पुरुष सदा आनन्द की वंशी बजाता है।
५१—अपने दोषों का अनुभव होते ही उन्हें छोड़ने का प्रयत्न करना कर्तव्य है।
५२—जो लोग हठ-बश उचित बातों को नहीं मानते, वे अन्त में काम बिगाड़ कर पड़ताते हैं।
५३—जब तक कुछ भी आशा है, उद्योग से हाथ न धो बैठना चाहिये।
५४—किसी से कभी वैर न करना ही परम चतुरता है।
५५—अत्यन्त कष्ट में भी धीरज का न छोड़ने वाला ही बिजयी होता देखा गया है।
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सवाचार की सौ शिक्षायें
५६—अभिय चचन कहने वाला पुरुष, सब के हृदय का काँटा बन जाता है।
५७—खलों से सर्वदा दूर रहना चाहिये।
५८—शास्त्रों के उद्देश्यों को न मानने वाला मनुष्य जीवन भर रोता रहता है।
५९—पितृ, माता और आचार्य से सदा अपने हित की बात पूछनी चाहिये।
६०—भविष्य का विचार कर वर्तमान कार्य करने वाला पुरुष सीधा मार्ग पा जाता है।
६१—पुरुष के लिये एक पद्मोत्तम और स्त्री के लिये पतिव्रत ही सनातन और वैदिक धर्म है।
६२—अच्छे कर्मों के लिये कभी न मुख मोड़ना चाहिये। समय की गति कभी अनुकूल नहीं होती।
६३—जो परमार्थ में मन लगाता है, वह स्वार्थ भी सिद्ध कर सकता है। परमार्थ का पलड़ा स्वार्थ से बहुत भारी है।
६४—यदि आपके हाथ में अधिकार है, तो उसका सदुपयोग करना चाहिये।
६५—मुख से बही बात कहनी चाहिये, जो सुगमता से की जा सके।
६६—अपने अवगुणों पर कड़ा ध्यान रखना चाहिये। असावधानी से ये बढ़ जाते हैं, और मनुष्य को पतित कर देते हैं।
६७—उत्तम वस्तुओं और अच्छी शिक्षाओं का संग्रह करने वाला पुरुष, अवसर पड़ने पर अधीर नहीं होता।
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ब्रह्मचर्य-विज्ञान
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६८—विचारशील और उत्तम पुरुष का नियम होता है कि वे सब की सौ सुनते हैं, पर अपनी एक ही करते हैं।
६९—भूतकाल के अपराधों पर परचात्ताप और भविष्य में वैसा न करने का प्रयत्न करना चाहिये।
७०—माता-पिता, गुरु तथा सज्जनों का आदर करने वाला बालक ही विद्वान हो सकता है।
७१—नित्य नियम से विद्याभ्यास करने से शीघ्र सफलता मिलती है।
७२—जो बाल्यावस्था में विद्या और युवावस्था में धन नहीं एकत्र कर लेता, वह ध्रुवता में बड़ा दुःख पाता है।
७३—बहुत सी बातों और ग्रन्थों के सुनने-देखने से अनुभव बढ़ता है।
७४—आत्म-मर्यादा कभी न खोनी चाहिये। यही पुरुष को सुख देती है।
७५—असफलता के कारण सत्कार्य का छोड़ना केवल कायरता है।
७६—यह जीवन एक प्रकार का युद्धक्षेत्र है, यहाँ वही विजयी हो सकता है, जो अपने कर्म-धर्म में सदा तत्परता दिखाता सके।
७७—विद्या पढ़ने का अभिप्राय गुणों का संग्रह करना है। इससे परे अविद्या है।
७८—जिस जाति और जिस देश में जन्म हुआ है, उसके लिये कुछ न करना कृतज्ञता है।
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सदाचार की सौ शिल्पावें
५९—किसी प्रकार का अभ्यास करने से वह बढ़ता है, और न करने से घटता है। अभ्यासी शिष्य निरभ्यासी गुरु से बढ़ जाता है।
८८—काम और क्रोध, ये दोनों नरक में गिराते हैं। अतः सदा इन्हें दवाना चाहिये।
८९—किसी को दुर्बचन न कहना चाहिये। कड़ी बात बर्खा की भाँति हृदय में जुम जाती है।
८२—पुरुषार्था-उत्साही पुरुष कभी दरिद्री नहीं हो सकता और अगलसी निरुत्साही मनुष्य कभी धनी नहीं हो सकता।
८३—यदि परमात्मा ने विद्या, शक्ति और धन दिया है तो अज्ञानी, निर्बल और दीन के लिये लगादो।
८४—अपने कुटुम्ब में अनेक्य न होने देने में ही सबका करवाण है।
८५—प्रिय होने पर भी वे वस्तुयें त्याज्य हैं, जिनसे किसी प्रकार की मानसिक या शारीरिक हानि होती है।
८६—अपनी सत्कीर्ति को कभी मूलकर भी मैली न होने देने वाला ही पुरुष कुल का रत्न है।
८७—अनधिकार चेष्टा करना व्यर्थ है। अधिकारी को कुछ भी दुर्लभ नहीं।
८८—श्रेष्ठ पुरुष अपनी सरलता और सज्जनता से कभी घृष्य नहीं होते। यही उनकी श्रेष्ठता का मूल कारण है।
८९—दयालु और परोपकारी व्यक्ति का ही जीवन सार्थक होता है।
९०—गुरु में भी यदि कुछ गुण हों तो उसे ले लेना ही बुद्धिमत्ता है।
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११—संसार के हित के लिये अपने सुखों पर लात मारने वाले ही एक दिन सब के पूज्य बनते हैं।
१२—पतित से पतित 'मनुष्य भी परमात्मा की शरण में जाने से पवित्र और पुरयात्मा बन जाता है।
१३—आत्मिक बल का सन्धय करने वाला पुरुष जो चाहे कर सकता है।
१४—विद्वान, उपदेशक तथा सच्चे साधुओं से अपने लाभ की बात पूछनी चाहिये।
१५—जो बात अपने को ठुरी लगे उसका बोग दूसरे के ऊपर न लादना चाहिये।
१६—सुदृढ़-श्रेष्ठ और आचरण रहित पुरुषों को सदा अपमानित होना पड़ता है।
१७—सदाचारी पुरुष कठिन से कठिन कार्य में सफलता पा जाता है। दुराचार ही दुःखों का मूल है।
१८—हमारे पूर्वज कैसे वशत थे—वे क्यों संसार का हित करते थे और उनका जीवन क्यों आदर्श था ? इन सब बातों का सदा विचार करना चाहिये।
१९—देश, काल और बल का अनुभव तथा उचित कर्मों की योजना से कदापि न चुकना चाहिये।
१००—प्रत्येक मनुष्य अपने भले घुरे कर्मों का उत्तरदायी है; जो जैसा करता है, वैसा भरता है। यह सिद्धान्त अटल है !
ॐ. विधीय शिक्षा के प्रेमी को लेखक का सुसमय सिद्धान्त पढ़ना चाहिये।
चतुर्थः लघु
१.—ब्रह्म-चन्दनां
ॐ असतो मा सद् गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय ॥ मृत्योर्माऽमृतं गमयेति ।
( वात्सप्य माहाण १४, १, १, १० )
हे प्रभो ! तुम हमें अधर्म-मार्ग से पृथक् कर सन्मार्ग में चलाओ ! तुम हमें श्रम्वकार में न ले जाकर, प्रकाश में ले चलो !! और मृत्यु से दूर कर मोक्ष-सुख को प्रदान करो !!
तुम हमारे पथ-प्रदर्शक हो । तुम जियर चाहो वधर ले जा सकते हो । नेता को अधिकार है कि वह अपने अनुयायी को जिस मार्ग से चाहे, ले जा सकता है । हमें सन्मार्ग से चलने की इच्छा है । हमें भय है कि हम अज्ञान-वश मूर्खता न कर बैठें । इसीलिये हमें ज्योति की आवश्यकता है । जब हमें मार्ग दिखालाई पड़ेगा, तब हम श्रम में न पड़ सकेंगे । मृत्यु से तभी तक लोग डरते हैं, जब तक अमृत नहीं प्राप्त हो जाता । तुम अमृत के समुद्र हो । तुम्हारी दया होते ही हम अमरत्व को प्राप्त कर सकेंगे । ब्रह्मचर्य का पालन करने के लिये हम इसकी याचना करते हैं । तुम दयालु हो ! अतः हमारी अभिलाषा पूर्ण करो !!
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२—कन्या और ब्रह्मचर्य
“ब्रह्मचर्येण कन्या युवानं विन्दते पतिम् ।”
( अथर्ववेद )
ब्रह्मचर्य का पालन करने के पश्चात् कन्या अपने योग्य युवक पति को प्राप्त करती है ।
“कन्या सदा पालनीया, स्त्रीणीया च यलतः ।”
( मूक )
कन्या का सदैव पालन और उसका यल-पूर्वक संरक्षण करता चाहिये ।
कुछ हठी और अहानी पुरुषों का विचार है कि कन्याओं के लिये शास्त्र में ब्रह्मचर्य की आज्ञा नहीं दी गई है । ब्रह्मचर्य का पालन उसी के लिये है जो वेद पढ़ने का अधिकारी हो, पर कन्याओं को वेद पढ़ने का अधिकार नहीं । इसलिये वे ब्रह्मचर्य की भी अधिकारिणी नहीं ।
वास्तव में यह विचार भ्रम-मूलक और समाज को दुर्वाचार के समुद्र में डुबानेवाला है । हम बल-पूर्वक कहते हैं कि कहीं भी ऐसी किसी ऋषि-महर्षि ने आज्ञा नहीं दी है कि कन्यायें वेद न पढ़ें । वैदिककाल में बहुत सी ऐसी स्त्रियाँ थीं जो वेदों का अध्ययन करती थीं और ऋचाओं का अर्थ जानती थीं । सरस्वती और गायत्री की आज भी संसार में पूजा हो रही है । गार्गी, मैत्रेयी तथा अरुन्धती आदि स्त्रियाँ वेद जानती थीं और उनके चरित्र में भी हमें वैदिकता के प्रमाण मिलते हैं । फिर हम कैसे मान सकते हैं कि स्त्रियों को वेद पढ़ने का अधिकार नहीं है । जब उन्हें वेद
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कन्या और ब्रह्मचर्य
पढ़ने का अधिकार है, तब वे ब्रह्मचर्य के पालन से किस प्रकार विमुख रह सकती हैं।
ऋग्वेद के दसवें मण्डल के ३९, ४० सूक्त में घोषा नाम की ब्रह्मचारिणी कन्या द्वारा प्रकट किये हुए मन्त्र हैं। वनमें स्पष्ट रूप से ब्रह्मचारिणी कन्या के वैद्याध्ययन के समय से लेकर, उनके गृहस्थाश्रम में पैर रखने तक के प्रायः सभी कर्तव्यकर्मों का वर्णन है। फिर कैसे कहें कि स्त्रियाँ वेद पढ़ने और ब्रह्मचर्य पालन करने की अधिकारिणी नहीं।
बालकों के ब्रह्मचर्य-विषय में तो किसी को सन्देह ही नहीं, पर कन्याओं को भी ब्रह्मचर्य का पूर्ण अधिकार है। कोई वेद ऐसा नहीं जो इस बात का विरोध करता हो। हमारी इस बात का समर्थन-प्रमाण अथर्ववेद के एक मन्त्र से भी हो सकता है जो सबसे ऊपर दिया गया है।
यदि हम नीति-शास्त्र के अनुसार भी विचार करते हैं, तो भी कन्याओं के लिये ब्रह्मचर्य उत्तम ही आवश्यक ज्ञान पड़ता है, जितना कि बालकों के लिये। क्या एक ब्रह्मचारी और वेदज्ञ-पुरुष कभी भी एक ब्रह्मचर्य-रहिता और वेद-विहीना स्त्री से विवाह कर सकेगा ?
कुमार्यं शिष्येद् विद्याः धर्म-नीतौ निवेशयेत् ।
दुर्यः कल्याणद्वा प्रोक्ता, या विद्यामधि गच्छति ॥
(देसादि)
कुमारी को विद्या पढ़ानी चाहिये। उसी भाँति धर्म और नीति में भी प्रवेश कराना योग्य है। जो कन्या विदुषी होती है, उससे दोनों कुलों का कल्याण होता है।
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विद्या पढ़ाने का अभिप्राय साक्षर बनाने से नहीं है, बल्कि योग्य बनाने से है। वही कन्या विद्याध्ययन कर सकती है, जो ब्रह्मचर्य का पालन करे। जब तक वह ब्रह्मचारिणी तथा अविवाहितो है, सब तक वह नाना प्रकार की विद्यायें और कलायें सीख सकती है। गोमिल आदि गृह सूत्रों में भी कन्या के ब्रह्मचर्य की बात स्पष्ट रूप से आई है।
यवनों के आक्रमण-काल में कन्याओं को बचाने के लिये पाराशरी और शीघ्रकौष में “अष्ट वर्षा भवेद्वगोरी, नव वर्षा च रोहिणी” जैसे पाठ गढ़ दिये गये थे, जो आज तक प्रचलित हैं। इन फकिराओं के अनुकूल रजोदर्शन से पूर्व ही कन्याओं का विवाह हो जाता है और वे ब्रह्मचर्य-व्रत के पालन से परे रह जाती हैं। हमारे शरीर-शास्त्र के जानने वाले महर्षि शुभ्रत ने भी कन्याओं को सोलह वर्ष तक के पहले विवाह करने के अयोग्य ठहराया है। अतएव जब तक वे अयोग्य हैं, ब्रह्मचर्य का पालन कर जानवती वनें। इसके उपरान्त सुयोग्य वर से उनका विवाह होना चाहिये।
हमारे विचार से तो कन्याओं के लिये ब्रह्मचर्य-पालन बालकों से भी नितान्त आवश्यक और शास्त्र-सम्मत है। क्योंकि उन पर संवातोत्पत्ति सम्बन्धी संसार का बड़ा भारी उत्तर-दायित्व है।
वर्तमान भारत के आचार्य स्वामी दयानन्द सरस्वती लिखते हैं—
“बालक और बालिकाओं की पाठशाला दो कोस, एक दूसरे से दूरहोनी चाहिये। बालकों की पाठशाला में अभ्यापक तथा भृत्य आदि सभी पुरुष हों, और बालिकाओं की पाठशाला में सभी स्त्रियाँ होनी चाहिये। स्त्रियों की पाठशाला में पाँच वर्ष का बालक
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कन्या और ब्रह्मचर्य
और पुरुषों की पाठशाला में पाँच वर्ष की बालिका न जाने पावे अर्थात् जब तक वे ब्रह्मचारी या ब्रह्मचारिणी रहें, तब तक पुरुष या स्त्री के दर्शन, स्पर्श, एकान्त सेवन, भाषण, विषय-कथा, परस्पर-क्रीड़ा, विषय का ध्यान और सङ्ग—इन आठ प्रकार के मैथुनों से अलग रहें ।”
इस प्रकार कोई भी सज्जन और विचारशील पुरुष कन्याओं के ब्रह्मचर्य-व्रत और विद्याध्ययन का विरोध नहीं कर सकता ।
स्त्री के शरीर में साधारणतया १२ वर्ष की अवस्था में रज की उत्पत्ति हो जाती है और पुरुषों को प्रायः १५ वर्ष की अवस्था में वीर्यगम होता है । महर्षि शुश्रुत के मत से १६ वर्ष की कन्या और २५ वर्ष का बालक वीर्य के विचार से वराबर समका जाता है । रजोदर्शन और वीर्योत्पत्ति के उपरान्त का समय ही वास्तविक ब्रह्मचर्य-काल है । इससे पूर्व नहीं । इस प्रकार स्त्री के ब्रह्मचर्य के ३ वर्ष का समय पुरुष के ब्रह्मचर्य के ९ वर्षों के बराबर होता है । अर्थात् स्त्री का १ वर्ष का ब्रह्मचर्य पुरुष के ३ वर्ष के बराबर हुआ ।
३—ब्रह्मचारिणी का विवाह
“कन्यायां द्विगुणोवरः ।
(सूक्ति )
कन्या की अवस्था से उसका वर द्विगुण अवस्था का होना चाहिये ।
“कन्यानां सम्प्रदानञ्च, कुमारशास्त्रं रक्षणम् ।”
(मनुस्मृति)
ब्रह्मचर्य-विज्ञान
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कन्याओं का दान और कुमारों का संरक्षण बहुत विचार कर करना योग्य है।
ऋतुमती होने के उपरान्त कम से कम ३ वर्ष तक प्रत्येक कन्या को ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिये। १५ वर्ष से पहले विवाह का न होना ही श्रेयस्कर है, इस बात का प्रायः सभी शास्त्रकारों ने समर्थन किया है। यदि कोई यह कहे कि रजोदर्शन से पूर्व ही विवाह कर देना चाहिये, तो इस बात को हम अवैदिक समझते हैं।
समाज-सुधारक स्वामी दयानन्दजी ब्रह्मचारी और ब्रह्मचारिणी के विवाह-काल को इस प्रकार व्यवस्था देते हैं:—
“जो २५ वर्ष तक पुरुष ब्रह्मचारी रहे तो १६ वर्ष तक कन्या; जो पुरुष ३० वर्ष तक ब्रह्मचारी रहे, तो स्त्री १७ वर्ष तक; जो पुरुष ३६ वर्ष तक रहे, तो स्त्री १८ वर्ष तक जो पुरुष ४० वर्ष तक रहे तो स्त्री २० वर्ष तक रहे; जो पुरुष ४४ वर्ष तक; तो स्त्री २२ वर्ष तक और जो पुरुष ४८ वर्ष तक ब्रह्मचर्य से रहे तो स्त्री २४ वर्ष तक ब्रह्मचर्य का सेवन करे। अर्थात् ४८ वर्ष से आगे पुरुष और २४ वर्ष से आगे स्त्री को ब्रह्मचर्य न रखना चाहिये। पर यह नियम विवाह करनेवाले पुरुष और स्त्रियों के लिये है। और जो विवाह करना ही न चाहें, वे मरण पर्यन्त ब्रह्मचारी रह सकें, तो भले ही रहें, परन्तु यह कार्य पूर्ण विद्यावाले, जितेन्द्रिय और निर्दोष योगी पुरुष-स्त्री का है। यह वड़ा कठिन काम है कि काम के वेग को शाम के इन्द्रियों को अपने वश में रख सकें।”
जीष्णु वर्षाण्युधीर्योत्त, कुमार्युत्तुमती सती।
ऊर्व्यन्तु कालादेत्स्माद्, विन्देत सदृशं पतिम् ॥
(मन्त्रस्थिति)