ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
३२२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ अपि=किसी कारणसे कठिनता प्राप्त होनेपर भी; ते=वे भक्तिसम्बन्धी कर्म या भागवतधर्म तो; सर्वथा=सब प्रकारसे; एव=ही आचरणमें लाने योग्य हैं; उभयलिङ्गात्=क्योंकि श्रुति और स्मृति दोनोंके निश्चयात्मक वर्णनरूप लिङ्ग ( लक्षण ) से यही सिद्ध होता है । व्याख्या—श्रुतिमें कहा है कि— तमेव धीरो विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत ब्राह्मणः । नानुध्यायाद् बहून् शब्दान् वाचो विग्लापनँ हि तत् ॥ 'बुद्धिमान् ब्राह्मणको चाहिये कि उस परब्रह्म पुरुषोत्तमके तत्त्वको समझकर उसीमे बुद्धिको प्रविष्ट करे, अन्य नाना प्रकारके व्यर्थ शब्दोंपर ध्यान न दे; क्योंकि वह तो केवल वाणीका अपव्ययमात्र है ।' (बृह० उ० ४ । ४ । २१ ) तथा— यस्मिन् द्यौः पृथिवी चान्तरिक्षमोतं मनः सह प्राणैश्च सर्वैः । तमेवैकं जानथ आत्मानमन्या वाचो विमुञ्चथामृतस्यैष सेतुः ॥ 'जिस परब्रह्म परमेश्वरमे स्वर्ग, पृथिवी, अन्तरिक्ष, मनसहित समस्त इन्द्रियाँ और प्राण स्थित हैं, उसी एक सबके आत्मा परमेश्वरको कहे हुए उपायोंद्वारा जानो, दूसरी बातोको छोड़ो । यही अमृतरूप परमात्माको पानेके लिये सेतुके सदृश सरल मार्ग है ।' ( मु० उ० २ । २ । ५ ) इसी प्रकार श्रीमद्भागवतमें भी कहा है कि— शृण्वन्ति गायन्ति गृणन्त्यभीक्ष्णशः स्मरन्ति नन्दन्ति तवेहितं जनाः । त एव पश्यन्त्यचिरेण तावकं भवप्रवाहोपरमं पदाम्बुजम् ॥ 'जो आपके भक्त आपके चरित्रोंको प्रतिक्षण सुनते हैं, गाते हैं और वर्णन करते है तथा उन्हींका स्मरण करके आनन्दित होते हैं, वे ही अविलम्ब आपके उन चरण-कमलोंका दर्शन करते हैं, जो जन्म-मरणरूप प्रवाहके नाशक हैं ।' ( १ । ८ । ३६ ) । श्रीमद्भगवद्गीतामें भी कहा है— महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः । भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् ॥
सूत्र ३५ ] अध्याय ३ ३२३
सूत्र ३५ ] अध्याय ३ ३२३ सततम् कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः । नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते ॥ 'हे पार्थ ! दैवी प्रकृतिमें स्थित हुए महात्मागण मुझे समस्त प्राणियोंका आदि और अविनाशी जानकर अनन्य मनसे मेरा भजन करते हैं, वे यत्नशील दृढ़ निश्चयवाले भक्त निरन्तर मेरा कीर्तन और मुझे नमस्कार करते हुए, सदा मुझमे ही संलग्न रहकर प्रेमपूर्वक मेरी उपासना करते हैं।' (गीता ९। १३-१४)। इत्यादि श्रुतियों और स्मृतियोंमें वर्णित लक्षणोंसे यही सिद्ध होता है कि आपत्तिकालमे किसी कारणवश अन्य वर्ण, आश्रम और शरीर-निर्वाहसम्बन्धी कर्मोंका पालन पूर्णतया न हो सके तो भी उन भगवदुपासनाविषयक श्रवण, कीर्तन आदि मुख्य धर्मोंका अनुष्ठान तो किसी भी प्रकारसे अवश्य करना ही चाहिये। भाव यह कि किसी भी अवस्थामें इनके अनुष्ठानमे शिथिलता नहीं आने देनी चाहिये। सम्बन्ध-उक्त धर्मानुष्ठानकी विशेषता दिखलाते हैं— अनभिभवं च दर्शयति ॥ ३।४।३५॥ श्रुति (इनका अनुष्ठान करनेवालेका) अनभिभवम्=पापोंसे अभिभूत न होना; च=भी; दर्शयति=दिखलाती है (इससे भी यह सिद्ध होता है कि इनका अनुष्ठान अवश्य करना चाहिये)। व्याख्या—श्रुतिने कहा है कि 'उस परमात्माको प्राप्त करनेवालेकी महिमाको जाननेवाले जिस साधकका मन शान्त है अर्थात् विषय-वासनासे अभिभूत नहीं है, जिसकी इन्द्रियाँ वशमें की हुई हैं, जो अन्य सभी क्रिया-कलापसे उपरत है, सब प्रकारके शारीरिक और मानसिक सुख-दुःखोंको सहन करनेमे समर्थ- तितिक्षु है तथा परमात्माके स्मरणमें तल्लीन है, वह अपने हृदयमे स्थित उस आत्मस्वरूप परमेश्वरका साक्षात्कार करता है; अतः वह समस्त पापोंसे पार हो जाता है, उसे पाप ताप नहीं पहुँचा सकते; अपितु वही पापोंको सन्तप्त करता है।' इत्यादि (बृह० उ० ४।४।२३)। इस प्रकार श्रुतिमें भगवान्का भजन-स्मरण करनेवालेको पाप न लगनेकी बात कही गयी है। इसलिये यही सिद्ध होता है कि परमात्माकी प्राप्तिके लिये बतलाये हुए जो उपासना-विषयक श्रवण, कीर्तन और स्मरण आदि धर्म है, उनका अनुष्ठान तो प्रत्येक परिस्थितिमें करते ही रहना चाहिये।
३२४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे पुनः उपासनाविषयक कर्मानुष्ठानकी विशेषताका प्रतिपादन करते हैं— अन्तरा चापि तु तद्दृष्टेः ॥ ३ । ४ । ३६ ॥ तु = इसके सिवा; अन्तरा = आश्रमधर्मोंके अभावमे; च अपि = भी ( केवल उपासनाविषयक अनुष्ठानसे परमात्माकी प्राप्ति हो सकती है ); तद्दृष्टेः = क्योंकि श्रुतिमें ऐसा विधान देखा जाता है । व्याख्या—श्वेताश्वतरोपनिषद् ( १ । १४ ) मे कहा है— स्वदेहमरणिं कृत्वा प्रणवं चोत्तरारणिम् । ध्याननिर्मथनाभ्यासाद्देवं पश्येन्निगूढवत् ॥ 'अपने शरीरको नीचेकी अरणि और प्रणवको ऊपरकी अरणि बनाकर ध्यानके द्वारा निरन्तर मन्थन करते रहनेसे साधक छिपी हुई अग्निकी भाँति हृदयमें स्थित परमदेव परमेश्वरको देखे ।' इस कथनके पश्चात् उपर्युक्तरूपसे परमेश्वरमे ध्यानकी स्थितिके लिये प्रार्थना करने तथा उन्हीं परमात्माकी शरण ग्रहण करनेका भी वर्णन है ( श्वेता० उ० २ । १ से ५ ) । तदनन्तर यह कहा गया है कि 'हे साधक ! सम्पूर्ण जगत्के उत्पादक सर्वान्तर्यामी परमेश्वरकी प्रेरणासे तुम्हें उस परब्रह्म परमात्माकी सेवा-समाराधना करनी चाहिये । उन परमेश्वरकी ही शरण लेकर उन्हींमे अपने- आपको विलीन कर देना चाहिये । ऐसा करनेसे तुम्हारे पूर्वकृत समस्त सञ्चित कर्म साधनमे विघ्नकारक नहीं होगे ।' ( श्वेता० उ० २ । ७)। इसके बाद इसका फल आत्मा और परमात्माके स्वरूपका साक्षात्कार बताया है ( २ । १४, १५ ) । इसी तरह अन्य श्रुतियोंमें भी केवल उपासनासे ही परमात्माकी प्राप्ति बतायी है। ( श्वेता० उ० ४ । १७ तथा ६ । २३ ) । इससे यह सिद्ध होता है कि जो अन्य वर्णाश्रमधर्मोंका पालन करनेमें असमर्थ हैं, उनको केवल उपासनाके धर्मोंका पालन करनेसे ही परमात्माकी प्राप्ति हो सकती है । सम्बन्ध—इसी बातके समर्थनमें स्मृतिका प्रमाण देते हैं— अपि च स्मर्यते ॥ ३ । ४ । ३७ ॥ अपि च = इसके सिवा; स्मर्यते = स्मृतियोंमें भी यही बात कही गयी है ।
सूत्र ३६--३८ ] अध्याय ३ ३२५
सूत्र ३६--३८ ] अध्याय ३ ३२५ व्याख्या-गीता आदि स्मृतियोमे जो वर्णाश्रमोचित कर्मके अधिकारी नहीं है, ऐसे पापयोनि चाण्डाल आदिको भी भगवान्की शरणागतिसे परमगतिकी प्राप्ति बतलायी गयी है (गीता ९ । ३२)। वहाँ भगवान्ने यह भी स्पष्ट कहा है कि 'मेरी प्राप्तिमें वेदाध्ययन, यज्ञानुष्ठान, दान तथा नाना प्रकारकी क्रिया और उग्र तप हेतु नहीं है, केवलमात्र अनन्यभक्तिसे ही मै जाना, देखा और प्राप्त किया जा सकता हूँ' ( ११ । ४८, ५३, ५४ )। इसी प्रकार श्रीमद्भागवत आदि ग्रन्थोंमें भी जगह-जगह इस बातका समर्थन किया गया है कि वर्ण और आश्रमकी मर्यादासे रहित मनुष्य केवल भक्तिसे पवित्र होकर परमात्माको प्राप्त कर लेता है। यथा- किरातहूणान्ध्रपुलिन्दपुल्कसा आभीरकङ्का यवनाः खसादयः। येऽन्ये च पापा यदुपाश्रयाश्रयाः शुद्ध्यन्ति तस्मै प्रभविष्णवे नमः ॥ 'किरात, हूण, आन्ध्र, पुलिन्द, पुल्कस, आभीर, कङ्क, यवन, खस आदि तथा अन्य जितने भी पापयोनिके मनुष्य हैं, वे सब जिनकी शरण लेनेसे शुद्ध हो परमात्माको प्राप्त हो जाते है, उन सर्वसमर्थ भगवान्को नमस्कार है।' (श्रीमद्भा० २ । ४ । १८)। इन सब वचनोसे भी यह सिद्ध होता है कि उपासना-सम्बन्धी धर्मोका अनुष्ठान ही परम आवश्यक है। सम्बन्ध-अब भागवतधर्मानुष्ठानका विशेष माहात्म्य सिद्ध करते है- विशेषानुग्रहश्च ॥ ३ । ४ । ३८ ॥ च=इसके सिवा, विशेषानुग्रहः = भगवान्की भक्तिसम्बन्धी धर्मोंका पालन करनेसे भगवान्का विशेष अनुग्रह होता है। व्याख्या-ऊपर बतलायी हुई अन्य सब बाते तो भागवतधर्मकी विशेषतामे हेतु है ही। उनके सिवा, यह एक विशेष बात है कि अन्य किसी प्रकारके धर्म- कर्म आदिका आश्रय न लेकर जो अनन्य-भावसे केवल भगवान्की भक्तिका अनुष्ठान करता है,* उसको भगवान्की विशेष कृपा प्राप्त होती है। गीतामे भगवान्ने
- भक्तिका वर्णन श्रीमद्भागवतमे इस प्रकार आया है- श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्। अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥ (७।५।२३) 'भगवान् विष्णुका श्रवण, कीर्तन, स्मरण, चरणसेवन, अर्चन, वन्दन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन-ये भगवद्भक्तिके नौ भेद हैं।' (इन्हींको नवधा भक्ति कहते हैं।)
पादारविन्दविमुखाच्छ्वपचं वरिष्ठम् ।
३२६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ स्वयं कहा है कि 'उन भक्तोंके लिये मै सुलभ हूँ' (गीता ८ । १४), 'उनका योग-क्षेम स्वयं वहन करता हूँ' (९ । २२) । भगवान्ने अपने भक्तोंका महत्त्व बतलाते हुए श्रीमद्भागवतमें यहाँतक कह दिया है कि 'मैं सदा भक्तोके अधीन रहता हूँ' (९ । ४ । ६३) । इसके सिवा इतिहास, पुराण और स्मृतियोंमे यह वर्णन विशेषरूपसे पाया जाता है कि भक्तिका अनुष्ठान करनेवालोंपर भगवान्की विशेष कृपा होती है। यही कारण है कि भगवान्के इस भक्तवत्सल स्वभावको जाननेवाले निरन्तर उनके भजन, स्मरणमे ही लगे रहते हैं (गीता १५ । १९) तथा वे भक्तजन मुक्तिका भी निरादर करके केवल भक्ति ही चाहते है। सम्बन्ध—अब अन्य धर्मोंकी अपेक्षा भागवतधर्मोंकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन करते है— अतस्त्वितरज्यायो लिङ्गाच्च ॥ ३ । ४ । ३९ ॥ अतः=ऊपर बतलाये हुए इन सभी कारणोंसे (यह सिद्ध हुआ कि); इतरज्यायः=अन्य सब धर्मोंकी अपेक्षा भगवान्की भक्तिविषयक धर्म श्रेष्ठ है; तु=इसके सिवा; लिङ्गात्=लक्षणोंसे; च=भी (यही सिद्ध होता है)। व्याख्या—ऊपर बतलाये हुए कारणोंसे यह बात सिद्ध हो चुकी कि अन्य सभी प्रकारके धर्मोंसे भगवान्की भक्ति-विषयक धर्म अधिक श्रेष्ठ है। इसके सिवा, स्मृति-प्रमाणसे भी यही बात सिद्ध होती है। श्रीमद्भागवतमें कहा है— विप्राद् द्विषड्गुणयुतादरविन्दनाभ- पादारविन्दविमुखाच्छ्वपचं वरिष्ठम् । मन्ये तदर्पितमनोवचनेहितार्थ- प्राणं पुनाति स कुलं न तु भूरिमानः ॥ 'बारह प्रकारके गुणोंसे युक्त ब्राह्मण भी यदि भगवान् पद्मनाभके चरणकमल- से विमुख है तो उसकी अपेक्षा उस चाण्डालको श्रेष्ठ मानता हूँ, जिसके मन, धन, वचन, कर्म और प्राण परमात्माको अर्पित है; क्योकि वह भक्त चाण्डाल अपनी भक्तिके प्रतापसे सारे कुलको पवित्र कर सकता है, परन्तु वह बहुत मानवाला ब्राह्मण ऐसा नहीं कर सकता।' (७ । ९ । १०)
सूत्र ३९—४० ] अध्याय ३ ३२७
सूत्र ३९—४० ] अध्याय ३ ३२७ अहो बत श्वपचोऽतो गरीयान् यज्जिह्वाग्रे वर्तते नाम तुभ्यम् । तेपुस्तपस्ते जुहुवुः सस्नुरार्या ब्रह्मानूचुर्नाम गृणन्ति ये ते ॥ 'अहो आश्चर्य है कि जिसकी जिह्वापर तुम्हारा पवित्र नाम रहता है, वह चाण्डाल भी श्रेष्ठ है, क्योंकि जो तुम्हारे नामका कीर्तन करते हैं, उन श्रेष्ठ पुरुषोने तप, यज्ञ, तीर्थस्नान और वेदाध्ययन आदि सब 'कुछ कर लिये।' ( श्रीमद्भा० ३ । ३३ । ७ ) इसी प्रकार जगह-जगह भगवान्के भक्तोंके लक्षण बतलाते हुए वर्ण-आश्रम आदिके धर्मका पालन करनेवालोकी अपेक्षा उनकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन किया गया है। सम्बन्ध—इस प्रकार उपासना-विषयक श्रवण, कीर्तन आदि विशेष धर्मोंका महत्त्व दिखलाया गया। अब यह जिज्ञासा होती है कि यदि कोई मनुष्य किसी कारणवश आश्रमका व्यतिक्रम करना चाहे तो कर सकता है या नहीं ? यदि कर ले तो उसका व्यक्तित्व कैसा माना जाना चाहिये ? इत्यादि। अतः इस विषय- का निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ करते हैं— तद्भूतस्य तु नातद्भावो जैमिनेरपि नियमातद्रूपाभावेभ्यः।३।४।४०। तद्भूतस्य = उच्च आश्रममे स्थित मनुष्यका; तु = तो; अतद्भावः = उसे छोड़कर पूर्व आश्रममें लौट आना; न = नहीं बन सकता; नियमातद्रूपाभावेभ्यः = क्योंकि शास्त्रोंमे पीछे न लौटनेका ही नियम है, श्रुतिमे आश्रम बदलनेका जो क्रम कहा गया है, उससे यह विपरीत है और इस प्रकारका शिष्टाचार भी नहीं है; जैमिनेः अपि = जैमिनि ऋषिकी भी यही सम्मति है। व्याख्या—जो चतुर्थ आश्रम ग्रहण कर चुके हैं, उनका पुनः गृहस्थाश्रममे लौटना शास्त्रसम्मत नहीं है। इसी प्रकार वानप्रस्थका भी पुन. गृहस्थमे प्रवेश उचित नहीं है, क्योकि ऊँचे आश्रममे जाकर पुनः लौटनेका श्रुति-स्मृतियोमे निषेध है तथा आश्रम बदलनेका जो क्रम श्रुतिमे बताया गया है, वह इस प्रकार है—'ब्रह्मचर्यं परिसमाप्य गृही भवेत्। गृही भूत्वा वनी भवेत्। वनी भूत्वा प्रव्रजेत्। यदि वेतरथा ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेद् गृहाद् वा वनाद् वा।'—'ब्रह्मचर्य- को पूरा करके गृहस्थ होवे, गृहस्थसे वानप्रस्थ हो और वानप्रस्थसे संन्यास ले
३२८ वेदान्त-दर्शन [पाद ४ अथवा दूसरे प्रकारसे यानी ब्रह्मचर्यसे या गृहस्थसे अथवा वानप्रस्थसे ही संन्यास ले।' ( जाबाल० उ० ४ ) । अतः पीछे लौटना उस क्रमसे विपरीत है। इसके सिवा, इस प्रकारका शिष्टाचार भी नहीं है। इन सब कारणोंसे जैमिनि ऋषिकी भी यही सम्मति है कि उच्च आश्रमसे पुनः लौटना नहीं हो सकता। इसलिये यही सिद्ध हुआ कि वेद और स्मृतियोमे जो एक आश्रमसे दूसरे आश्रममे प्रवेश करनेकी रीति बतायी गयी है, उसको छोड़कर आश्रमका व्यतिक्रम करना किसी प्रकार भी न्यायसङ्गत नहीं है। अतः जो इस प्रकार आश्रमभ्रष्ट हो चुका है, उसका ब्रह्मविद्यामे अधिकार नहीं है। सम्बन्ध—इस प्रकारके मनुष्यको प्रायश्चित्त कर लेनेपर तो अधिकार प्राप्त हो जाता होगा ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— न चाधिकारिकमपि पतनानुमानात्तदयोगात् ॥ ३ । ४ । ४१ ॥ च=इसके सिवा; आधिकारिकम्=प्रायश्चित्तके अधिकारी अन्य आश्रम- वालोके लिये जो प्रायश्चित्त बताया गया है, वह; अपि=भी; न=उसके लिये विहित नहीं है; पतनानुमानात्=क्योकि स्मृतिमे उसका महान् पतन माना गया है; तदयोगात्=इसलिये वह प्रायश्चित्तके उपयुक्त नहीं रहा । व्याख्या—ब्रह्मचर्य-आश्रममे यदि ब्रह्मचारीका व्रत भङ्ग हो जाय तो वेद और स्मृतियोमे उसका प्रायश्चित्त बताया गया है ( मनु० २ । १८१ ) तथा गृहस्थ भी ऋतुकाल आदिका नियमपालन भङ्ग कर दे तो उसका प्रायश्चित्त है; क्योकि वे प्रायश्चित्तके अधिकारी है। परन्तु जिन्होने वानप्रस्थ या संन्यास आश्रम स्वीकार कर लिया, वे यदि पुनः गृहस्थ-आश्रममें लौटकर स्त्रीप्रसङ्गादिमे प्रवृत्त होकर पतित हो गये हैं तो उनके लिये शास्त्रोमें किसी प्रकारके प्रायश्चित्तका विधान नहीं है; क्योकि स्मृतियोमे उनका अतिशय पतन माना गया है। इसलिये वे प्रायश्चित्तके अधिकारी नही रहे। जैमिनि आचार्यकी भी सूत्रकारके मतानुसार यही सम्मति है कि उनके लिये प्रायश्चित्तका विधान नहीं है। सम्बन्ध—इसपर अन्य आचार्योंका मत बताते हैं— उपपूर्वमपि त्वेके भावमशनवत्तदुक्तम् ॥ ३ । ४ । ४२ ॥ एके=कई एक आचार्य; उपपूर्वम्=इसे उपपातक; अपि=भी मानते है,
सूत्र ४१—४४ ] अध्याय ३ ३२९
सूत्र ४१—४४ ] अध्याय ३ ३२९ ( इसलिये वे ); अशनवत्=भोजनके नियमभङ्गके प्रायश्चित्तकी भाँति; भावम्= इसके लिये भी प्रायश्चित्तका भाव मानते है; तदुक्तम्=यह बात शास्त्रमे कही है ( यह भी उनका कहना है ) । व्याख्या—कई एक आचार्योंका कहना है कि जिस प्रकार ब्रह्मचारी अपने व्रतसे भ्रष्ट होकर प्रायश्चित्तका अधिकारी होता है, वैसे ही वानप्रस्थी और संन्यासियोंका भी प्रायश्चित्तमे अधिकार है; क्योकि यह महापातक नहीं है; किन्तु उपपातक है और उपपातकके प्रायश्चित्तका शास्त्रमे विधान है ही । अत. अभक्ष्य- भक्षण आदिके प्रायश्चित्तकी भाँति इसका भी प्रायश्चित्त अवश्य होना उचित है । सम्बन्ध—इसपर आचार्य अपनी सम्मति बताते हैं— बहिस्तूभयथापि स्मृतेराचाराच्च ॥ ३ । ४ । ४३ ॥ तु=किन्तु; उभयथापि=दोनो प्रकारसे ही; बहिः=यह विद्याके अधिकारसे बहिष्कृत है; स्मृतेः=क्योकि स्मृतिप्रमाणसे, च=और; आचारात्=शिष्टाचारसे भी ( यही बात सिद्ध होती है ) । व्याख्या—वे उच्च आश्रमसे पतित हुए सन्यासी और वानप्रस्थी लोग महापातकी हों या उपपातकी, दोनों प्रकारसे ही शिष्ट-सम्प्रदाय और वैदिक ब्रह्मविद्याके अधिकारसे सर्वथा बहिष्कृत है; क्योकि स्मृति-प्रमाण और शिष्टोके आचार-व्यवहारसे यही बात सिद्ध होती है । उनका पतन भोगोकी आसक्तिसे ही होता है । अतः वे ब्रह्मविद्याके अधिकारी नहीं हैं । श्रेष्ठ पुरुष उनके साथ यज्ञ, स्वाध्याय और विवाह आदि सम्बन्ध भी नहीं करते है । सम्बन्ध—इस प्रकार उच्च आश्रमसे भ्रष्ट हुए द्विजोंका ब्रह्मविद्यामे अधिकार नहीं है, यह सिद्ध किया गया । अब जो कर्मोंके अङ्गभूत उद्गीथ आदिमें उपासना की जाती है,' उसका कर्ता यजमान होता है या कर्म करनेवाला ऋत्विक्—इसपर विचार करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है— स्वामिनः फलश्रुतेरित्यात्रेयः ॥ ३ । ४ । ४४ ॥ स्वामिनः=उस उपासनामे यजमानका ही कर्तापन है; इति=ऐसा, आत्रेयः=आत्रेय मानते हैं; फलश्रुतेः=क्योकि श्रुतिमे यजमानके लिये ही फलका वर्णन किया गया है ।
३३० वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ व्याख्या-आत्रेय ऋषि मानते हैं कि श्रुतिमे 'जो इस उपासनाको इस प्रकार जानता है, वह पुरुष वृष्टिमे पाँच प्रकारके सामकी उपासना करता है, उसके लिये वर्षा होती है, वह वर्षा करानेमे समर्थ होता है।' (छा० उ० २। ३। २) बृहदारण्यकोपनिषद्में प्रस्तोताद्वारा की जानेवाली अनेक प्रार्थनाओंका उल्लेख करके अन्तमे उद्गाताका कर्म बताते हुए कहा है कि 'उद्गाता अपने या यजमानके लिये जिसकी कामना करता है, उसका आगान करता है' (बृह० उ० १। ३। २८)। इस प्रकार फलका वर्णन करनेवाली श्रुतियोंसे सिद्ध होता है कि यज्ञके स्वामीको उसका फल मिलता है, अतएव इन फलकामनायुक्त उपासनाओंका कर्तापन भी स्वामी अर्थात् यजमानका ही होना उचित है। सम्बन्ध-इसपर दूसरे आचार्यका मत कहते हैं- आर्त्विज्यमित्यौडुलोमिस्तस्मै हि परिक्रीयते ॥ ३ । ४ । ४५ ॥ आर्त्विज्यम्=कर्तापन ऋत्विक्का है; इति=ऐसा; औडुलोमिः=औडुलोमि आचार्य मानते हैं; हि=क्योंकि; तस्मै=उस कर्मके लिये; परिक्रीयते=वह ऋत्विक् यजमानद्वारा धनदानादिसे वरण कर लिया जाता है। व्याख्या-आचार्य औडुलोमि ऐसा मानते हैं कि कर्तापन यजमानका नहीं, किन्तु ऋत्विक्का ही है; तथापि फल यजमानको मिलता है, क्योकि वह ऋत्विक् उस कर्मके लिये यजमानके द्वारा धनदानादिसे वरण कर लिया जाता है। अतः वह दाताद्वारा दी हुई दक्षिणाका ही अधिकारी है; उसका फलमें अधिकार नहीं है। सम्बन्ध-सूत्रकार श्रुतिप्रमाणसे अपनी सम्मति प्रकट करते हैं- श्रुतेश्च ॥ ३ । ४ । ४६ ॥ श्रुतेः=श्रुतिप्रमाणसे; च=भी (औडुलोमिका ही मत उचित सिद्ध होता है)। व्याख्या-यज्ञका ऋत्विक् जो कुछ भी कामना करता है, वह निःसन्देह यजमानके लिये ही करता है (शत० १। ३ । १ । १६) इसलिये इस प्रकार जाननेवाला उद्गाता यजमानसे कहे कि 'मैं तेरे लिये किन-किन भोगोका आगान करूँ' (छा० उ० १। ७। ८) इत्यादि श्रुतियोंसे भी कर्मका कर्तापन ऋत्विक्का और फलमे अधिकार यजमानका सिद्ध होता है।
सूत्र ४५-४७ ] अध्याय ३ ३३१
सूत्र ४५-४७ ] अध्याय ३ ३३१
सम्बन्ध—इस प्रकार प्रसङ्गानुसार सकाम उपासनाके फल और कर्त्तापनका निर्णय किया गया । अब ब्रह्मविद्याका अधिकार किसी एक ही आश्रममें है या सभी आश्रमोंमें ? इस बातका निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है— सहकार्यन्तरविधिः पक्षेण तृतीयं तद्वतो विध्यादिवत् ॥ ३।४।४७॥ तद्वतः = ब्रह्मविद्यासे युक्त साधकके लिये; तृतीयम् = बालकपन और पाण्डित्यके साथ कहा हुआ जो तीसरा मौन साधन है, वह विधेय है; सहकार्यन्तरविधिः = (क्योंकि) उसका दूसरे सहकारी साधनके रूपमे विधान है; विध्यादिवत् = दूसरे स्थलमे कहे हुए विधिवाक्योंकी भाँति; पक्षेण = एक पक्ष- को लेकर यह भी विधि है । व्याख्या—कहोलने याज्ञवल्क्यसे साक्षात् परब्रह्मका स्वरूप पूछा, उसके उत्तरमें याज्ञवल्क्यने सबके अन्तरात्मा परमात्माका स्वरूप सङ्केतसे बताकर कहा कि ‘जो शोक, मोह, भूख, प्यास, बुढापा और मृत्युसे अतीत है, वह परमात्मा है, ऐसे इस परमात्माको जानकर ब्राह्मण पुत्रकामना, धनकामना तथा मान-बड़ाई और स्वर्गसम्बन्धी लोककामनासे विरक्त होकर भिक्षासे निर्वाह करनेवाले मार्गसे विचरता है।’ इसके बाद इन तीनों कामनाओंकी एकता करके कामनामात्रको त्याज्य बताया और अन्तमें कहा कि ‘वह ब्राह्मण उस पाण्डित्यको भलीभाँति समझकर बाल्यभावसे स्थित रहनेकी इच्छा करे, फिर उससे भी उपरत होकर मुनि हो जाय, फिर वह मौन और अमौन—दोनोंसे उपरत होकर ब्राह्मण हो जाता है अर्थात् ब्रह्मको भलीभाँति प्राप्त हो जाता है' इत्यादि (बृह० उ० ३।५।१) । इस प्रकरणमे संन्यास-आश्रममे परमात्माकी प्राप्तिका वर्णन किया गया । इस वर्णनमे पाण्डित्य और बाल्यभावके अन्तमे तो 'तिष्ठासेत्' (स्थित रहनेकी इच्छा करे) यह विधिवाक्य है; परन्तु मुनि शब्दके बाद कोई विधि नहीं है, इसलिये सूत्रकारका कहना है कि जिस प्रकार अन्यत्र कहे हुए वचनोंमें स्पष्ट विधिका प्रयोग न होनेपर सहकारीभावसे एकके लिये प्रयुक्त विधिवाक्य दूसरेके लिये भी मान लिये जाते हैं, वैसे ही यहाँ भी पाण्डित्य और बाल्यभाव इन दो सहकारी साधनोंसे युक्त साधकके प्रति उनके साथ कहे
३३२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ हुए इस तीसरे साधन मुनिभावके लिये भी विधिवाक्यका प्रयोग पक्षान्तरसे समझ लेना चाहिये । ध्यान रहे कि इस प्रकरणमे आये हुए बाल्यभावसे तो दम्भ, मान आदि विकारोंका अभाव दिखाया गया है और मननशीलताको मौन कहा गया है । अतः ब्रह्मका शास्त्रीय ज्ञान ( पाण्डित्य ), उक्त विकारोका अभाव ( बाल्यभाव ) और निरन्तर मनन तथा निदिध्यासन ( मौन ) —इन तीनोकी परिपक्व-अवस्था होनेसे ही ब्रह्मसाक्षात्कार होता है, यही इस प्रकरणका भाव है । सम्बन्ध—पूर्व सूत्रमें जिस प्रकरणपर विचार किया गया है, वह संन्यास- आश्रमका द्योतक है; अतः यह जिज्ञासा होती है कि संन्यास-आश्रममें ही ब्रह्मविद्याका साधन हो सकता है या अन्य आश्रमोंमे भी उसका अधिकार है ? यदि संन्यास-आश्रममें ही उसका साधन हो सकता है तो ( छा० उ० ८ । १५ । १ ) की श्रुतिमें गृहस्थ-आश्रमके साथ-साथ ब्रह्मविद्याका प्रकरण क्यों समाप्त किया गया है ? वहाँके वर्णनसे तो गृहस्थका ही अधिकार स्पष्टरूपसे सूचित होता है, अतः इसका निर्णय करनेके लिये कहते हैं-- कृत्स्नभावात्तु गृहिणोपसंहारः ॥ ३ । ४ । ४८ ॥ कृत्स्नभावात् = गृहस्थ-आश्रममें सम्पूर्ण आश्रमोंका भाव है, इसलिये; तु = ही; गृहिणा = ( उस प्रकरणमें ) गृहस्थ-आश्रमके साथ; उपसंहारः = ब्रह्म- विद्याके प्रकरणका उपसंहार किया गया है । व्याख्या—गृहस्थ-आश्रममे चारो आश्रमोंका भाव है; क्योकि ब्रह्मचारी भी गृहस्थाश्रममें स्थित गुरुके पास ही ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करता है, वानप्रस्थ और संन्यासीका भी मूल गृहस्थ ही है । इस प्रकार चारो आश्रमोका गृहस्थमे अन्त- र्भाव है और ब्रह्मविद्याका अधिकार सभी आश्रमोंमे है, यह भी श्रुतिका अभिप्राय है, इसलिये वहाँ उस प्रकरणका गृहस्थके वर्णनके साथ-साथ उपसंहार किया गया है तथा पूर्वप्रकरणमें जो संन्यास-आश्रमका संकेत है, वह साधनोकी सुगमताको लक्ष्य करके कहा गया है; क्योकि किसी भी आश्रममे स्थित साधक- को ब्रह्मज्ञानसम्पादनके लिये पुत्रैषणा आदि सभी प्रकारकी कामनाओ तथा राग- द्वेषादि विकारोका सर्वथा नाश करके मननशील तो होना ही पड़ेगा । दूसरे आश्रमोंमें विघ्नोकी अधिकता है और संन्यास-आश्रममें स्वभावसे ही उनका अभाव
सूत्र ४८-५० ] अध्याय ३ ३३३
सूत्र ४८-५० ] अध्याय ३ ३३३ है। इस सुगमताको दृष्टिमे रखकर वैसा कहा गया है, न कि अन्य आश्रमोंमे ब्रह्मविद्याके अधिकारका निषेध करनेके लिये । सम्बन्ध-प्रकारान्तरसे पुनः सभी आश्रमोंमें ब्रह्मविद्याका अधिकार 'सिद्ध किया जाता है— मौनवदितरेषामप्युपदेशात् ॥ ३ । ४ । ४९ ॥ इतरेषाम् = अन्य आश्रमवालोके लिये; अपि = भी; मौनवत् = मननशीलताकी भाँति; उपदेशात् = ( विद्योपयोगी सभी साधनोंका ) उपदेश होनेके कारण ( सभी आश्रमोंमे ब्रह्मविद्याका अधिकार सिद्ध होता है )। व्याख्या—जिस प्रकार पूर्व प्रकरणमे मननशीलता ( मौन ) रूप साधनका सबके लिये विधान बताया गया है, इसी प्रकार श्रुतिमे अन्य आश्रमवालोंके लिये भी विद्योपयोगी सभी साधनोंका उपदेश दिया गया है। जैसे— 'इस प्रकार ब्रह्मवेत्ताकी महिमाको जाननेवाला शान्त ( मनको वशमे करनेवाला मननशील ), दान्त (इन्द्रिय-समुदायको वशमें करनेवाला ), उपरत ( भोगोंसे सम्बन्धरहित ), तितिक्षु ( सुख-दुःखसे विचलित न होनेवाला ) और समाहित ( ध्यानस्थ ) होकर अपने ही भीतर उस सबके आत्मस्वरूप परमात्माका साक्षात्कार करता है।' (बृह० ३ ० ४ । ४ । २३)। ऐसी ही बात दूसरे प्रकरणोंमें भी कही है। इससे यही सिद्ध होता है कि ब्रह्मविद्याका अधिकार सभी आश्रमोंमें है। सम्बन्ध—सैंतालीसवें सूत्रके प्रकरणमे जो बाल्यभावसे स्थित होनेकी बात कही गयी थी, उसमे बालकके कौन-से भावोंका ग्रहण है, यह स्पष्ट करनेके लिये कहते हैं— अनाविष्कुर्वन्नन्वयात् ॥ ३ । ४ । ५० ॥ अनाविष्कुर्वन् = अपने गुणोंको प्रकट न करता हुआ बालककी भाँति दम्भ और अभिमानसे रहित होवे; अन्वयात् = क्योकि ऐसे भावोंका ही ब्रह्मविद्यासे सम्बन्ध है। व्याख्या—बालकमें मान, दम्भ तथा राग-द्वेष आदि विकारोंका अभाव है; अतः उसीकी भाँति उन विकारोंसे रहित होना ही यहाँ बाल्य-भाव है। अपवित्र- भक्षण, आचारहीनता, अशौच और स्वेच्छाचारिता आदि निषिद्ध भावोंको ग्रहण करना यहाँ अभीष्ट नहीं है। विद्याके सहकारी साधनरूपसे श्रुतिमे बाल्यभावका
३३४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ उल्लेखं हुआ है। अतः उसके उपयोगी भाव ही लिये जा सकते है, विरोधी भाव नहीं। इससे श्रुतिका यही भाव मालूम होता है कि ब्रह्मविद्याका साधक बालककी भाँति दम्भ, अभिमान तथा राग-द्वेष आदिसे रहित होकर विचरे। सम्बन्ध—यहाँतक यह निश्चय किया गया कि सभी आश्रमोंमें ब्रह्मविद्याका अधिकार है। अब यह जिज्ञासा होती है कि शास्त्रोंमें जो ब्रह्मविद्याका फल जन्म- मृत्यु आदि दुःखोंसे छूटना और परमात्माको प्राप्त हो जाना बताया गया है, वह इसी जन्ममें प्राप्त हो जाता है या जन्मान्तरमें ? इसपर कहते हैं— ऐहिकमप्यप्रस्तुतप्रतिबन्धे तद्दर्शनात् ॥ ३ । ४ । ५१ ॥ अप्रस्तुतप्रतिबन्धे=किसी प्रकारका प्रतिबन्ध उपस्थित न होनेपर; ऐहिकम्=इसी जन्ममे वह फल प्राप्त हो सकता है; अपि= ( प्रतिबन्ध होनेपर ) जन्मान्तरमे भी हो सकता है; तद्दर्शनात्=क्योकि यही बात श्रुतियो और स्मृतियोमें देखी जाती है। व्याख्या—श्रुतिमे कहा गया है कि गर्भमे स्थित वामदेव ऋषिको ब्रह्मभावकी प्राप्ति हो गयी थी । ( ऐ० उ० २ । ५ ) भगवद्गीतामे कहा है कि 'न हि कल्याणकृत् कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति ।' 'कल्याणमय कर्म अर्थात् परमात्माकी प्राप्तिके लिये साधन करनेवालेकी कभी दुर्गति नहीं होती।' ( ६ । ४० ) । 'किन्तु वह दूसरे जन्ममे पूर्वजन्म-सम्बन्धी शरीरद्वारा प्राप्त की हुई बुद्धिसे युक्त हो जाता है और पुनः परमात्माकी प्राप्तिके साधनमे लग जाता है ।'* ( गीता ६ । ४३ ) इस प्रकार श्रुतियो और स्मृतियोंके प्रमाणोको देखनेसे यही सिद्ध होता है कि यदि किसी प्रकारका कोई प्रतिबन्ध उपस्थित नहीं होता, तब तो इसी जन्ममे उसको मुक्ति- रूप फलकी प्राप्ति हो जाती है और यदि कोई विघ्न पड़ जाता है तो जन्मान्तरमे वह फल मिलता है । तथापि यह निश्चय है कि किया हुआ अभ्यास व्यर्थ नहीं जाता । सम्बन्ध—उपर्युक्त ब्रह्मविद्याका मुक्तिरूप फल किसी प्रकारका प्रतिबन्ध न रहनेके कारण जिस साधकको इसी जन्ममें मिलता है, उसे यहाँ मृत्युलोकमें ही मिल जाता है या लोकान्तरमें जाकर मिलता है ? इस जिज्ञासापर कहते हैं-- ✲ तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् । यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन ॥
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श्रीपरमात्मने नमः चौथा अध्याय पहला पाद तीसरे अध्यायमें परमात्माकी प्राप्तिके भिन्न-भिन्न साधनोंको बतलानेवाली श्रुतियोंपर विचार किया गया; अब उन उपासनाओंके फलविषयक श्रुतियों- पर विचार करनेके लिये फलाध्यायनामक चौथा अध्याय आरम्भ किया जाता है। यहाँपर यह जिज्ञासा होती है कि पूर्वोक्त उपासनाएँ गुरुद्वारा अध्ययन कर लेनेमात्रसे ही अपना फल देनेमें समर्थ हैं या उनके साधनोंका बार-बार अभ्यास करना चाहिये ? इसपर कहते हैं— आवृत्तिरसकृदुपदेशात् ॥ ४ । १ । १ ॥ आवृत्तिः=अध्ययन की हुई उपासनाका आवर्तन (बार-बार अभ्यास) करना चाहिये; असकृदुपदेशात्=क्योंकि श्रुतिमें अनेक बार इसके लिये उपदेश किया गया है। व्याख्या—श्रुतिमे कहा है—'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः ।'—'वह परमात्मा ही दर्शन करने योग्य, सुनने योग्य, मनन करने योग्य और ध्यान करने योग्य है।' (बृह० उ० ४ । ५ । ६)। 'ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्त्वस्ततस्तु तं पश्यते निष्कलं ध्यायमानः ।' अर्थात् 'विशुद्ध अन्तःकरणवाला साधक उस अवयवरहित परमेश्वरको निरन्तर ध्यान करता हुआ ज्ञानकी निर्मलतासे देखता है।' (मु० उ० ३ । १ । ८)। 'उपासते पुरुषं ये ह्यकामास्ते शुक्रमेतदतिवर्तन्ति धीराः ।'—'जो कामनारहित साधक उस परम- पुरुषकी उपासना करते हैं, वे इस रजोवीर्यमय शरीरको अतिक्रमण कर जाते हैं।' (मु० उ० ३ । २ । १) इस प्रकार जगह-जगह ब्रह्मविद्यारूप उपासनाका अभ्यास करनेके लिये बार-बार उपदेश दिया गया है। इससे यह सिद्ध होता है कि आचार्यसे भलीभाँति ब्रह्मविद्याका अध्ययन करके उसपर बार-बार विचार करते हुए उस परमात्मामें संलग्न होना चाहिये।
सूत्र १-३ ] अध्याय ४ ३३७
सूत्र १-३ ] अध्याय ४ ३३७ सम्बन्ध-प्रकारान्तरसे इसी बातको सिद्ध करते हैं— लिङ्गाच्च ॥ ४ । १ । २ ॥ लिङ्गात्=स्मृतिके वर्णनरूप लिङ्ग (प्रमाण) से; च=भी (यही बात सिद्ध होती है)। व्याख्या-भगवद्गीतामे जगह-जगह यह बात कही है कि 'सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर'—'सब कालमे मेरा स्मरण कर।' (गीता ८ । ७)। 'परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन् ।' 'बार-बार चिन्तन करता हुआ साधक परम पुरुषको प्राप्त होता है।' (गीता ८ । ८)। 'जो सदा अनन्यचित्त होकर मुझे नित्य स्मरण करता है, उस नित्ययुक्त योगीके लिये मै सुलभ हूँ।'* (गीता ८ । १४) 'मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते ।'—'मुझमे मन लगाकर नित्य योगयुक्त होकर जो मेरी उपासना करते हैं।' (गीता १२ । २) इसी प्रकार दूसरी स्मृतियोमे भी कहा है। इससे भी यही सिद्ध होता है कि ब्रह्मविद्याका निरन्तर अभ्यास करते रहना चाहिये। सम्बन्ध-उस परम प्राप्य परब्रह्मका किस भावसे निरन्तर चिन्तन करना चाहिये ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— आत्मेति तूपगच्छन्ति ग्राहयन्ति च ॥ ४ । १ । ३ ॥ आत्मा=वह मेरा आत्मा है; इति=इस भावसे; तु=ही; उपगच्छन्ति = ज्ञानीजन उसे जानते या प्राप्त करते हैं; च=और; ग्राहयन्ति=ऐसा ही ग्रहण कराते या समझाते हैं। व्याख्या—'यह आत्मा ब्रह्म है, यह आत्मा चार पादवाला है' इत्यादि (मा० उ० २) 'सबका अन्तर्वर्ती यह तेरा आत्मा है।' (बृह० उ० ३ । ४ । १ ) 'यह तेरा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है।' (बृह० उ० ३ । ७ । ३ ) इसी प्रकार उद्दालकने अपने पुत्र श्वेतकेतुसे बार-बार कहा है कि 'वह सत्य है, वह आत्मा है, वह तू है।' (छा० उ० ६ । ८ से १६ वें खण्ड- तक) 'जो आत्मामें स्थित हुआ आत्माका अन्तर्यामी है, जिसको आत्मा नहीं जानता, जिसका आत्मा शरीर है, वह तेरा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है।' (बृह० उ०
- अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः । तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः ॥ वे० द० २२—
३३८ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ ३ । ७ । २२) । इस प्रकार श्रुतिमे उस परब्रह्म परमात्माको अपना अन्तर्यामी आत्मा मानकर उपासना करनेका विधान आता है तथा भगवद्गीतामें भी भगवान्- ने अपनेको सबका अन्तर्यामी बताया है (गीता १८ । ६१) । दूसरी श्रुतिमे भी उस ब्रह्मको हृदयरूप गुहामे निहित बताकर उसे जाननेवाले विद्वान्की महिमाका वर्णन किया गया है। (तै० उ० २ । १) इसलिये साधकको उचित है कि वह परमेश्वरको अपना अन्तर्यामी आत्मा समझकर उसी भावसे उसकी उपासना करे। सम्बन्ध—क्या प्रतीकोपासनामें भी ऐसी ही भावना करनी चाहिये ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— न प्रतीके न हि सः ॥ ४ । १ । ४ ॥ प्रतीके=प्रतीकमे; न=आत्मभाव नहीं करना चाहिये; हि=क्योकि; सः= वह; न=उपासकका आत्मा नहीं है। व्याख्या—'मन ही ब्रह्म है, इस प्रकार उपासना करे।' (छा० उ० ३ । १८ । १) 'आकाश ब्रह्म है, ऐसी उपासना करे।' (छा० उ० ३ । १८ । १) 'आदित्य ब्रह्म है, यह आदेश है।' (छा० उ० ३ । १९ । १) इस प्रकार जो भिन्न-भिन्न पदार्थोंमे ब्रह्मरूपसे उपासना करनेका कथन है, वही प्रतीकोपासना है। वहाँ प्रतीकमे आत्मभाव नहीं करना चाहिये; क्योकि वह उपासकका अन्तरात्मा नहीं है। जैसे मूर्ति आदिमे भगवान्की भावना करके उपासना की जाती है, उसी प्रकार मन आदि प्रतीकमे भी उपासना करनेका विधान है। भाव यह है कि पूर्वोक्त मन, आकाश, आदित्य आदिको प्रतीक बनाकर उनमे भगवान्के उद्देश्यसे की हुई जो उपासना है, उसे परम दयालु पुरुषोत्तम परमात्मा अपनी ही उपासना मानकर ग्रहण करते है और उपासकको उसकी भावनाके अनुसार फल भी देते है; इसीलिये वैसी उपासनाका भी विधान किया गया है। परन्तु प्रतीकको अपना अन्तर्यामी आत्मा नहीं माना जा सकता। सम्बन्ध—प्रतीकोपासना करनेवालेको प्रतीकमे ब्रह्मभाव करना चाहिये या ब्रह्ममें उस प्रतीकका भाव करना चाहिये ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— ब्रह्मदृष्टिरुत्कर्षात् ॥ ४ । १ । ५ ॥
सूत्र ४-६ ] अध्याय ४ ३३९
सूत्र ४-६ ] अध्याय ४ ३३९ उत्कर्षात्=ब्रह्म ही सर्वश्रेष्ठ है, इसलिये; ब्रह्मदृष्टिः=प्रतीकमें ब्रह्मदृष्टि करनी चाहिये (क्योंकि निकृष्ट वस्तुमे ही उत्कृष्टकी भावना की जाती है)। व्याख्या—जब किसी देवताकी प्रत्यक्ष उपासना करनेका साधन सुलभ नहीं हो, तब सुविधापूर्वक उपलब्ध हुई साधारण वस्तुमे उस देवताकी भावना करके उपासना की जाती है, देवतामे उस वस्तुकी भावना नहीं की जाती है; क्योंकि वैसा करनेका कोई उपयोग ही नहीं है। उसी प्रकार जो साधक उस परब्रह्म परमात्माके तत्त्वको नहीं समझ सकता, उसके लिये प्रतीकोपासनाका विधान किया गया है, अतः उसे चाहिये कि इन्द्रिय आदिसे प्रत्यक्ष अनुभवमे आनेवाले प्राण, मन, सूर्य, चन्द्रमा आदि किसी भी पदार्थको उस परब्रह्म परमात्माका प्रतीक बनाकर उसमे ब्रह्मकी भावना करके उपासना करे; क्योंकि परब्रह्म परमात्मा ही सर्वश्रेष्ठ है और निकृष्टमें ही श्रेष्ठकी भावना की जाती है, श्रेष्ठमे निकृष्टकी नहीं। इस प्रकार प्रतीकमें ब्रह्मभाव करके उपासना करनेसे वह परब्रह्म परमात्मा उस उपासनाको अपनी ही उपासना मानते हैं। सम्बन्ध—अब कर्मके अङ्गभूत उद्गीथ आदिके विषयमे कहते हैं— आदित्यादिमतयश्चाङ्ग उपपत्तेः ॥ ४ । १ । ६ ॥ च=तथा; अङ्गे=कर्माङ्गभूत उद्गीथ आदिमे; आदित्यादिमतयः=आदित्य आदिकी बुद्धि करनी चाहिये; उपपत्तेः=क्योंकि ऐसा करनेसे कर्मसमृद्धिरूप फलकी सिद्धि होती है। व्याख्या—कर्मके अङ्गभूत उद्गीथ आदिमे जो आदित्य आदिकी भावना- पूर्वक उपासना करनेका विधान किया गया है (छा० उ० १।३।१ तथा २। २।१) वह अवश्य कर्तव्य है; क्योंकि ऐसा करनेसे कर्म-समृद्धिरूप फलकी सिद्धि होती है। आत्मभाव करनेका ऐसा कोई फल नहीं दिखायी देता, अतः उसका निषेध किया गया है। इसलिये यही सिद्ध होता है कि कनिष्ठ वस्तुमें श्रेष्ठकी भावनाका नाम प्रतीक-उपासना है। सम्बन्ध—यह जिज्ञासा होती है कि साधकको किसी आसनपर बैठकर उपासना करनी चाहिये या चलते-फिरते प्रत्येक परिस्थितिमें वह उपासना कर सकता है? इसपर कहते हैं—
३४० वेदान्त-दर्शन [ पाद १ आसीनः सम्भवात् ॥ ४ । १ । ७ ॥ आसीनः=बैठे हुए ही ( उपासना करनी चाहिये ); सम्भवात्=क्योंकि बैठकर ही निर्विघ्न उपासना करना सम्भव है । व्याख्या—परब्रह्म परमेश्वरका जैसा रूप सुनने और विचार करनेपर समझमें आया है, उसका बार-बार तैलधाराकी भाँति निरन्तर चिन्तन करते रहनेका नाम उपासना है । यह उपासना चलते-फिरते या अन्य शरीरसम्बन्धी काम करते समय नहीं हो सकती; क्योंकि उस समय चित्त विक्षिप्त रहता है तथा सोते हुए करनेमें भी निद्रारूप विघ्नका आना स्वाभाविक है; अतः केवल बैठकर करनेसे ही निर्विघ्न उपासना हो सकती है । इसलिये उपासनाका अभ्यास बैठकर ही करना चाहिये । भगवान् श्रीकृष्णने भी कहा है कि 'उपविश्यासने युञ्ज्याद् योगमात्मविशुद्धये ।' अर्थात् 'आसनपर बैठकर अन्तः- करणकी शुद्धिके लिये योगका अभ्यास करे ।' ( गीता ६ । १२ ) । सम्बन्ध—उसी बातको दृढ़ करनेके लिये दूसरा हेतु उपस्थित करते हैं— ध्यानाच्च ॥ ४ । १ । ८ ॥ ध्यानात्=उपासनाका स्वरूप ध्यान है, इसलिये; च=भी ( यही सिद्ध होता है कि बैठकर उपासना करनी चाहिये ) । व्याख्या—अपने इष्टदेवका ध्यान ही उपासनाका स्वरूप है ( मु० उ० ३ । १ । ८) और चित्तकी एकाग्रताका नाम ध्यान है । अतएव यह बैठकर ही किया जा सकता है, चलते-फिरते या सोकर नहीं किया जा सकता । सम्बन्ध—पुनः उसी बातको दृढ़ करते हैं— अचलत्वं चापेक्ष्य ॥ ४ । १ । ९ ॥ च=तथा श्रुतिमें; अचलत्वम्=शरीरकी निश्चलताको; अपेक्ष्य=रखते हुए ध्यान करनेका उपदेश है । व्याख्या—श्रुतिमें कहा है कि— त्रिरुन्नतं स्थाप्य समं शरीरं हृदीन्द्रियाणि मनसा संनिवेश्य । ब्रह्मोडुपेन प्रतरेत विद्वान् स्रोतांसि सर्वाणि भयावहानि ॥ 'ब्रह्मकी प्राप्तिके लिये ध्यानका अभ्यास करनेवालेको चाहिये कि सिर, ग्रीवा और छाती—इन तीनोंको उठाये हुए, शरीरको सीधा और स्थिर करके समस्त
सूत्र ७-११ ] अध्याय ४ ३४१
सूत्र ७-११ ] अध्याय ४ ३४१ इन्द्रियोंको मनके द्वारा हृदयमे निरुद्ध करके ॐकाररूप नौकाद्वारा समस्त भय- दायक जन्मान्तररूप स्रोतोसे तर जाय ।' ( श्वेता० उ० २ । ८ ) । इस श्रुतिसे यह स्पष्ट हो जाता है कि उपासनाके लिये शरीरकी भी अचलता आवश्यक है, इसलिये भी उपासना बैठकर ही की जानी चाहिये । सम्बन्ध—उसी बातको स्मृतिप्रमाणसे दृढ करते हैं— स्मरन्ति च ॥ ४ । १ । १० ॥ च=तथा; स्मरन्ति=ऐसा ही स्मरण करते हैं । व्याख्या—स्मृतिमे भी यही बात कही गयी है— समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिर । सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ॥ प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः । मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः ॥ 'काया, शिर और ग्रीवाको सम और अचल धारण किये हुए स्थिर होकर, अपनी नासिकाके अग्रभागपर दृष्टि लगाकर, अन्य दिशाओको न देखता हुआ निर्भय होकर, भलीभाँति विक्षेपरहित, शान्तचित्त एवं ब्रह्मचर्यव्रतमे स्थित रहते हुए, मनको वशमें करके, मुझमे चित्त लगाये हुए, मुझे ही अपना परम प्राप्य मानकर साधन करनेके लिये बैठे ।' ( गीता ६ । १३-१४ ) । इस प्रकार स्मृति-प्रमाणसे भी यही सिद्ध होता है कि परम प्राप्य परमात्माके निरन्तर चिन्तनरूप ध्यानका अभ्यास बैठकर ही करना चाहिये । सम्बन्ध—उक्त साधन कैसे स्थानमें बैठकर करना चाहिये ? इस जिज्ञासा- पर कहते हैं— यत्रैकाग्रता तत्राविशेषात् ॥ ४ । १ । ११ ॥ अविशेषात्=किसी विशेष स्थान या दिशाका विधान न होनेके कारण ( यही सिद्ध होता है कि ); यत्र=जहाँ; एकाग्रता=चित्तकी एकाग्रता ( सुगमतासे हो सके ); तत्र=वहीं ( बैठकर ध्यानका अभ्यास करे ) । व्याख्या—श्रुतिमे कहा है कि—