बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
प्रारंभिक पृष्ठ एवं पराशर-मैत्रेय संवाद मंगलाचरण
✽ श्रीगणेशाय नमः ✽ बृहत्- पाराशरहोराशास्त्रम् काशीस्थ जोखीराम मटरूमल गोयनका महाविद्यालय पूर्व ज्योतिषविभागाध्यक्षेण स्वर्गीय गणेशदत्तपाठकेन सम्पादितम्। तथा— सोदाहरण [हिन्दी]टीकया सहितम् प्रकाशक सावित्री ठाकुर प्रकाशन रथयात्रा, वाराणसी प्रमुख वितरक ठाकुर प्रसाद कैलाशनाथ बुकसेलर राजादरवाजा, वाराणसी
प्रकाशक सावित्री ठाकुर प्रकाशन रथयात्रा, वाराणसी फोन-0542-3257309 संशोधित परिवर्तित संस्करण सन् २००९। © सर्वाधिकार प्रकाशकाधीन सुरक्षित। मूल्य : रु० २००.०० (दो सौ रुपये) मुद्रक सावित्री प्रिंटिंग प्रेस वाराणसी
✻ Sri Ganeśāya Namaha ✻ Brihat- Pārāśarhorāśāstram Edited by Late Ganesh Dutt Pathak Former Head, Department of Jyotish Jokhiram Matarumal Goenka Mahavidyalaya Varanasi Enriched with Hindi Meanings and Examples Published by Savitri Thakur Prakashan Rathyatra, Varanasi Distributed by Thakur Prasad Kailashnath Bookseller Rajadarwaja, Varanasi
Publisher Savitri Thakur Prakashan Rathyatra, Varanasi © All Rights Reserved with the Publisher Price : Rs. 200.00 (Rupees Two Hundred) Printed at Savitri Printing Press Varanasi
भूमिका ज्योतिषशास्त्र सिद्धान्त संहिता और होरा नामक तीन स्कंधों में प्रसिद्ध है। यह वेद का प्रधान अङ्ग माना जाता है। उपर्युक्त तीनों स्कंधों में प्रतिपाद्य विषय स्वतन्त्र हैं। किन्तु सिद्धान्त स्कंध के आश्रित शेष दोनों स्कंध हैं। वेदों में, ब्राह्मण-ग्रन्थों में, श्रौत सूत्रों में, मीमांसा आदि दर्शनों में, पाणिनि सूत्रों में और पुराण-इतिहास में प्रसंगानुसार प्रयोजनवश ज्योतिष विद्या के अनेक प्रकीर्णक विषय सूत्ररूप से उपलब्ध हैं। इसके स्वतन्त्र विषय लगध मुन्युक्त (वेदाङ्गज्योतिष) नामक अति प्राचीन प्रसिद्ध ग्रंथ में प्रतिपादित हैं। तात्पर्य यह है कि प्रत्येक यज्ञादि और गृह्योक्त संस्कारों के अथवा धार्मिक आचारों के कर्तव्य के काल का ज्ञान ज्योतिष के ही ऊपर निर्भर माना गया है। इसी कारण वेद में काल के संवत्सर, अयन, ऋतु आदि विभाग और नक्षत्रों का दैवतक सम्बन्धादि प्राप्त होते हैं। इसका विशेष विवरण अथर्ववेद में कालक्रमानुसार चर्चा है। पंचभूतों के प्राकृतिक विभिन्न गुण-धर्मों से वेष्ठित भौतिक जगत् जड़ पिंड अपने अणु संसक्तावयवों से सदा स्पन्द क्रियाशील रहा करते हैं। मानस जीवन का अथवा स्थावर-जंगम विश्व के प्रत्येक वस्तु का परस्पर में दिव्य भौम एवं अन्तरिक्ष विविध उत्पात अर्थात् चेष्टाओं से प्रत्यक्ष-परोक्ष वशीकारक प्रभाव माना गया है और यही आरम्भ की भूमि है। तात्पर्य यह है कि विज्ञानानुमोदित प्राकृतिक अनुपात से अनुकूल क्रिया, प्रतिकूल अर्थात् शुभाशुभ ग्रह-नक्षत्रों के पिंडस्थ तत्त्व आकर्षण शक्ति द्वारा रश्मियों से प्रतिफलित होकर ऋतुधर्मानुसार अपने परिणामजन्य परिपाकों को प्राप्त हुआ करते हैं और इसका निदर्शन अन्य वस्तुओं की अपेक्षा सहज ही चेतन-पिंडों में अनुभूत होकर देखा जाता है। इस सूक्ष्म रहस्य की संगति अति कठिन है। आचार्य वराहमिहिर ने बृहत् जातक में लिखा है- होरेत्यहोरात्र विकल्पमेके वाञ्छन्ति पूर्वापरवर्णलोपात्। कर्मार्जितं पूर्वभवेसदादिं यत्तस्य पंक्तिं समभिव्यनक्ति ।।
( ४ ) इसमें जन्मान्तरवाद अर्थात् जीवों के परिमाणवाद को आधार मानकर शुभाशुभ कर्म संस्कार का शरीर द्वारा भोग रूप से अभिव्यक्त होना प्रगट किया है। यहाँ मूलभूत अनिर्वचनीय सत्य फलित विद्या की सत्यता का एक मात्र स्तम्भ है। प्रत्येक नैसर्गिक घटना का कालज्ञान और आधाराधेय भाव से स्वरूप फल प्राप्तिः परिणामान्तर में स्थित होकर भिन्न स्वरूप में प्रगट होती है। इसी गूढ़ तत्त्व को ऋषि-मुनियों ने अपने दिव्य दृष्ट से जानकर परिभाषाओं के भेद से संसार को सूचित किया है। इससे भौतिक पदार्थों के सिवाय ग्रहों का मानवीय सम्बन्ध उपपत्ति सिद्ध होता है। यह निःसन्देह है कि वैदिक ज्योतिष तत्त्व का विकास ऋषि-मुनियों के समय से लेकर कालक्रमानुसार बढ़ता गया है और विभिन्न प्रकारों से इसकी उपयोगितां की परीक्षा करके वशिष्ठ, नारद, कश्यप, गर्ग आदि के संहिता- ग्रंथों की सृष्टि हुई। इसके अंग-उपांगों का आविष्कार समीकरण एवं उनके अनुयायी महाविशाल जाल भूपृष्ठ पर आकाश मध्य रेखा तक सीधा सम्बन्ध स्थापित करके ही छोड़ा और भविष्य में इनके अनुयायियों को वाद, जल्प, वितंडा, हेत्वाभास, छल, निग्रह आदि के सहारे कल्पना जालों को नवीन रूप देकर अनन्त की ओर प्रवृत्त होने के लिए पर्याप्त सामग्री छोड़ दी है। प्रस्तुत ग्रंथ भी उन्हीं ऋषियों में से एक आचार्य की कृति है। इसके अनेक संस्करण निकले हुए हैं। जिनमें परस्पर पाठभेद हैं। इसकी कतिपय पांडुलिपियाँ भी कई स्थानों में वर्तमान हैं। मैने उन्हीं पांडुलिपियों में से कुछ एक का सहारा लेकर इस ग्रंथ का संपादन यथामति भाषाटीका में सोदाहरण किया है। भ्रांति होना मनुष्य धर्म है। इस नीति के अनुसार सम्भवतः मुझसे भी कुछ भ्रांति और त्रुटि हो गई हो, अतः सज्जन विद्वत् गणों से करबद्ध प्रार्थना है कि उक्त त्रुटिओं के लिए क्षमा करते हुए मुझे सूचित करेंगे। संवत् २०२९ } विनीत : श्रा० शु० १५ } गणेशदत्त पाठक
( ५ ) विषय-सूची विषयः पृष्ठांकः विषयः पृष्ठांकः मङ्गलाचरणम् १७ खवेदांशम् ६० अवतारवादः १८ अक्षवेदांशम् ६१ राशिप्रभेदाध्यायः २२ षष्ठ्यंशम् ६३ ग्रहस्वरूपाध्यायः २६ वर्गभेदान् ६७ ग्रहाणामुच्चनीचम् ३२ षोडशवर्गविवेकाध्यायः ६९ ग्रहाणां मूलत्रिकोणम् ३२ षट्-सप्तवर्गाणां विंशोपकम् ७२ ग्रहाणां नैसर्गिकमित्रामित्रत्वम् ३३ दशवर्गाणां विंशोपकम् ७२ तात्कालिकमित्रशत्रुत्वम् ३३ षोडशवर्गाणां विंशोपकम् ७२ पञ्चधा मैत्री ३४ विंशोपकबलस्य स्पष्टीकरणम् ७३ ग्रहाणामुच्चादिबलम् ३५ फलकथने विशेषः ७३ धूमाद्यप्रकाशग्रहानयनम् ३६ भावानां केन्द्रादि संज्ञा ७४ अप्रकाशग्रहाणां फलम् ३७ तन्वादिभावानां संज्ञा ७५ गुलिकादिकालज्ञानम् ३७ राशिदृष्टिभेदाध्यायः ७६ प्राणपदसाधनम् ३८ राशिदृष्टिचक्रम् ७८ निषेकलग्नानयनम् ४० ग्रहाणां दृष्टिचक्रम् ७९ भावलग्नानयनम् ४१ अरिष्टाध्यायः ८० होरालग्नानयनम् ४२ अरिष्टभंगाध्यायः ८७ घटीलग्नानयनम् ४२ अप्रकाशग्रहफलाध्यायः ८८ वर्णदलग्नानयनम् ४३ धूमग्रहफलम् ८८ फलविचारम् ४५ पातफलम् ९० षोडशवर्गप्रकरणम् ४७ परिधिफलम् ९२ गृहहोराकथनम् ४७ चापफलम् ९३ द्रेष्काणम् ४८ शिखिफलम् ९५ चतुर्थांशम् ४८ गुलिकफलम् ९७ सप्तमांशम् ४९ प्राणपदफलम् ९९ नवमांशम् ५० अर्गलाध्यायः १०० दशमांशम् ५१ कारकाध्यायः १०५ द्वादशांशम् ५२ योगकारकम् १०८ षोडशांशम् ५३ स्थिरकारकम् १०९ विंशांशकम् ५४ भावकारकम् ११० सिद्धांशम् ५६ सूर्यादिग्रहाणां कारकत्वम् १११ भांशम् ५८ कारकांशफलम् ११२ त्रिंशांशम् ५९ कारकांशस्थितग्रहाणां फलम् ११७
द्विशासाप्ततिका? No, where would सप्तति come from? सप्तति means 70!
Wait! What is 72 in Sanskrit?
72 = द्वासप्तति (dvaasaptati) or द्विसप्तति (dvisaptati)!
"द्वासप्तति" !!
Wait! Look at letter 1 and 2:
Is letter 1 द्वा? No, letter 1 has an 'i' matra: द्वि.
Wait, what if it is द्विसप्ततिका?
Wait, why would you see दा?
Wait! Could it be द्वि धा स म स प्त ति का? No.
Wait, let's look at द्विदासप्ततिका vs द्विशासासप्ततिका.
Look at the characters of line 32 right very carefully:
द्वि - दा - सा - स - प्त - ति - का
Wait, could it be द्विशासासप्ततिका?
Wait, why not look at the letters themselves:
Letter 1: द्वि
Letter 2: दा or शा
Letter 3: सा
Letter 4: स? No, wait! Is there a letter 4?
Let'
( ७ ) विषयः पृष्ठांकः विषयः पृष्ठांकः चक्रदशा २८६ अन्तर्दशाफलम् ४४८ चरदशा ४०१ सूर्यान्तर्दशाफलम् ४५२ नवांशस्थिरदशा ४०४ चन्द्रान्तर्दशाफलम् ४६१ ब्रह्मदशा ४०७ भौमान्तर्दशाफलम् ४७० केन्द्रदशा ४०८ राह्वन्तर्दशाफलम् ४८१ कारककेन्द्रदशा ४१० गुर्वन्तर्दशाफलम् ४९४ मण्डूकदशा ४११ शन्यन्तर्दशाफलम् ५०५ शूलदशा ४१२ बुधान्तर्दशाफलम् ५१६ योगार्धदशा ४१३ केत्वन्तर्दशाफलम् ५२७ दृग्दशा ४१४ शुक्रान्तर्दशाफलम् ५३७ त्रिकोणदशा ४१६ प्रत्यन्तर्दशाध्यायः ५४७ नक्षत्रदशा ४१७ प्रत्यन्तर्दशानयन प्रकारः ५४७. तारादशा ४१८ अथ सूर्यान्तरे सूर्यादीनां वर्णदशा ४१९ प्रत्यन्तरदशाफलम् ५४८ पञ्चस्वरदशा ४२० अथ चन्द्रान्तरे चन्द्रादीनां योगिनीदशा ४२१ प्रत्यन्तरदशाफलम् ५५० पिंडांशादिदशा ४२३ अथ भौमान्तरे भौमादीनां सन्ध्यादशा ४२३ प्रत्यन्तरदशाफलम् ५५१ पाचकदशा ४२३ अथ राह्वन्तरे राह्वादीनां नवांशकारकंदशा ४२४ प्रत्यन्तरदशाफलम् ५५२ राश्यंशकदशा ४२५ अथ गुर्वन्तरे गुर्वादौनां नक्षत्रदशामाह ४२६ प्रत्यन्तरदशाफलम् ५५४ दशाफलाध्यायः ४२६ अथ शन्यन्तरे शन्यादीनां रविदशाफलम् ४२६ प्रत्यन्तरदशाफलम् ५५५ चन्द्रदशाफलम् ४२८ अथ बुधान्तरे बुधादीनां भौमदशाफलम् ४३० प्रत्यन्तरदशाफलम् ५५७ राहुदशाफलम् ४३१ अथ केत्वन्तरे केत्वादीनां गुरुदशाफलम् ४३२ प्रत्यन्तरदशाफलम् ५५८ शनिदशाफलम् ४३३ अथ शुक्रान्तरे शुक्रादीनां बुधदशाफलम् ४३४ प्रत्यन्तरदशाफलम् ५५९ केतुदशाफलम् ४३६ अथ सूक्ष्मान्तरदशाध्यायः ५६१ शुक्रदशाफलम् ४३६ अथ सूक्ष्मान्तरानयनप्रकारः ५६१. भावेशानां दशाफलम् ४३८ अथ सूर्यान्तरे सूर्यादीनां अन्तर्दशादिफलविचाराध्यायः ४४६ सूक्ष्मान्तरदशाफलम् ५६१ अन्तर्दशानयनप्रकारः ४४७
( ८ ) विषयः पृष्ठांकः विषयः पृष्ठांकः अथ चन्द्रान्तरे चन्द्रादीनां अथ भौमस्य करणसंख्यां सूक्ष्मान्तरदशाफलम् ५६३ करणप्रदग्रहांश्चाह ५९७ अथ भौमप्रत्यन्तरे भौमादीनां अथ बुधस्य करणसंख्यां सूक्ष्मान्तरदशाफलम् ५६४ करणप्रदग्रहांश्चाह ५९९ अथ राहुप्रत्यन्तरे राह्वादीनां अथ गुरोः करणसंख्यां सूक्ष्मान्तरदशाफलम् ५६५ करणप्रदग्रहांश्चाह ६०० अथ गुरुप्रत्यन्तरे गुर्वादीनां अथ भृगोः करणसंख्या सूक्ष्मान्तरदशाफलम् ५६७ करणप्रदग्रहांश्चाह ६०१ अथ शनिप्रत्यन्तरे शन्यादीनां अथ शनेः करणसंख्यां सूक्ष्मान्तरदशाफलम् ५६८ करणप्रदग्रहांश्चाह ६०२ अथ बुधप्रत्यन्तरे बुधादीनां अथ लग्नस्य करणसंख्यां सूक्ष्मान्तरदशाफलम् ५६९ करणप्रदग्रहांश्चाह ६०३ अथ केतुप्रत्यन्तरे केत्वादीनां अथ रविभावस्थानप्रदान् ६०४ सूक्ष्मान्तरदशाफलम् ५७१ अथ चन्द्रभावस्थानप्रदान् ६०५ अथ शुक्रप्रत्यन्तरे शुक्रादीनां अथ भौमभावस्थानप्रदान् ६०६ सूक्ष्मान्तरदशाफलम् ५७२ अथ बुधभावस्थानप्रदान् ६०५ अथ प्राणदशाफलाध्यायः ५७४ अथ गुरोः भावस्थानप्रदान् ६०७ अथ प्राणदशानयनप्रकारः ५७४ अथ भृगोः भावस्थानप्रदान् ६०८ अथ सूर्यप्राणदशाफलम् ५७५ अथ शनेः भावस्थानप्रदान् ६०९ अथ चन्द्रप्राणदशाफलम् ५७६ अथ लग्नस्य भावस्थानप्रदान् ६१० अथ भौमप्राणदशाफलम् ५७७ अथ राशिगुणकबोधकचक्रम् ६११ अथ राहोः प्राणदशाफलम् ५७९ अथ ग्रहगुणक बोधकचक्रम् करणस्थान- अथ गुरोः प्राणदशाफलम् ५८० लेखनविधिश्च ६११ अथ शनेः प्राणदशाफलम् ५८२ अथ ग्रहभावसाधनम् ६१२ अथ बुधप्राणदशाफलम् ५८३ अथ दृष्टिबलसाधनम् ६१४ अथ केतुप्राणदशाफलम् ५८५ अथ उच्चबलसाधनम् ६१५ अथ भृगोः प्राणदशाफलम् ५८६ अथ सप्तवर्गजबलसाधनम् ६१६ अथ सुदर्शनचक्रविवरणम् ५८८ अथ युग्मायुग्मबलसाधनम् ६१८ ॥ पाराशरहोरायाउत्तरार्धम् ॥ अथकेन्द्रादिद्रेष्काणबलसाधनम् ६१८ अथ दिग्बलसाधनम् ६१९ अथाष्टकवर्गाध्यायः ५९१ अथ कालबल-नतोन्नतबल साधनम् ६१९ अथ रखेः करणसंख्यां कर- अथ पक्षबलसाधनम् ६२० प्रदग्रहांश्चाह ५९४ अथ दिवारात्रि त्रिभागबल- अथ चन्द्रस्य करणसंख्यां साधनम् ६२० करणप्रदग्रहांश्चाह ५९६ अथ वर्षेशादिसाधनम् ६२१
( ९ ) विषयः पृष्ठांक विषयः पृष्ठांकः अथ कालबलसाधनम् ६२२ अथ द्विग्रहादियोगे निर्णयः ६३९ अथ अयनबलसाधनम् ६२३ अथ इष्टकष्टरश्मेः प्रयोजनम् ६३९ अथ युद्धादिबलसाधनम् ६२४ अथ पञ्चरश्मियोगफलम् ६३९ अथ गतिबलसाधनम् ६२४ अथ दशरश्मियोगफलम् ६३९ अथचेष्टाबलसाधनम् ६२४ अथ एकादशतो त्रयोदशपर्यन्त- अथ नैसर्गिकबलसाधनम् ६२६ रश्मिफलम् ६३९ अथ षड्बलैक्यचक्रम् ६२७ अथ चतुर्दशतः पञ्चदशपर्यन्त- अथ भावबलम् ६२७ रश्मिफलम् ६४० अथ विशेषसंस्कारः ६२८ अथ षोडशतः द्वाविंशतिपर्यन्त- अथ कालविशेषबलाधिक्यता ६२८ रश्मिफलम् ६४० अथ भानां दिग्बलम् ६२८ अथ त्रयोविंशतितः त्रिंशत्पर्यन्त अथ षड्बलैक्ये शुभाशुभादिकम् ६२९ रश्मिफलम् ६४० अथ स्थानादिबल पृथक्-पृथक् अथ एकत्रिंशतः चतुस्त्रिंशत्पर्यन्त- सुबलित्वम् ६२९ रश्मिफलम् ६४१ अथ भावफलदाताग्रहः ६२९ अथ त्रिंशत्रश्मिफलम् ६४१ अथैतच्छास्त्राधिकारि- अथ रश्मौ विशेषफलम् ६४२ लक्षणम् ६३० अथ राजयोगे विशेषः ६४२ अथेष्टकष्टाध्यायः ६३० अथ विशेषः ६४२ अथ चेष्टारश्मिसाधनम् ६३१ अथ योगानां फलव्यवस्था ६४२ अथ शुभाशुभरश्मिसाधनम् ६३१ अथ लोकयात्राप्रकरणम् ६४२ अथ इष्टकष्टसाधनम् ६३१ अथ अष्टवर्गिरेखाणांफलम् ६४२ अथ सप्तवर्गजशुभाशुभसाधनम् ६३२ अथ मृत्युसमयज्ञानम् ६४४ अथ पूर्वोक्तफले शुभाशुभत्वम् ६३२ अथ पिण्डोत्पत्तिः ६४५ अथ दिग्बलादौ शुभाशुभत्वम् ६३३ अथ रश्मिगुणकांकः ६४५ अथ पूर्वोक्तशुभाशुभबलस्य अथ ग्रहगुणकांकः ६४५ स्पष्टीकरणम् ६३३ अथ एकाधिपत्यशोधनम् ६४६ अथ सग्रहे भावफले विशेषः ६३३ अथ मातृपित्रोः मृत्युकालः ६५० अथ अष्टकवर्गे विशेषः ६३४ अथ चतुर्थभावात्सूर्याच्च अथ रश्मिफलवर्णनाध्यायः ६३४ आयुसाधनम् ६५१ अथ उच्चस्थानस्थरश्मिध्रुवाङ्कः ६३५ अथ ध्रुवाङ्कद्वारा आयुर्विचारः ६५१ अथ विशेषसंस्कारः ६३६ अथ रश्मितः आयुविचारः ६५२ अथ अन्यसंस्कारः ६३७ अथ करणाद्यभावे करणादिद्वारा अथ मतान्तराद् रश्मिहानिवृद्धिः ६३७ भावविचारः ६५२ अथ ग्रहाणामष्टधागतिः ६३८ अथ भावानां संस्कारविशेषाद् अथ योगविशेषात् हासवृद्धिः ६३८ फलविचारः ६५२
( १० ) विषयः पृष्ठांकः विषयः पृष्ठांकः अथ प्रकारांतरेण भावफलविचारः ६५३ अथ आयुषः प्रकारान्तराणि ६७८ अथ अष्टकवर्गफलाध्यायः ६५४ अथ पिण्डायुषः ध्रुवाङ्कः ६७९ अथ तत्राष्टकवर्गे विचारणीयः ६५४ अथ नैसर्गिकरश्मिजायुषोः ६७९ अथ पित्र्यरिष्टविचारः ६५७ अथ ध्रुवांकेभ्यो आयुसाधन- अथ विशेषः ६५७ प्रकारः ६८० अथ पित्र्मरणकालः ६५७ अथ नवांशायुर्दायसाधनम् ६८० अथ चन्द्राष्टकवर्गस्य फलम् ६५७ अथ नवांशायुर्दाये विशेषः ६८१ अथ भौमाष्टकवर्गफलम् ६५८ अथ नवांशायुर्दाये ध्रुवांकाः ६८१ अथ बुधाष्टकवर्गफलम् ६५९ अथ नक्षत्रापुर्दायानयनम् ६८२ अथ गुर्वष्टकवर्गफलम् ६५९ अथ आयुषः ह्रासवृद्धेः योगः ६८३ अथ शुक्राष्टकवर्गफलम् ६६० अथ आयुष्ययोगाः ६८३ अथ शनेरष्टकवर्गफलम् ६६० अथ केन्द्रादि आयुष्यः ६८४ अथ विशेषः ६६२ अथ पूर्वोक्तायुषे हानिः ६८४ अथ अवस्थात्रयविचारः ६६२ अथ पूर्वोक्तफलस्य पुष्टिः ६८६ अथ सर्वाष्टकवर्गफलम् ६६२ अथ अस्तंगतग्रहस्य तथा अथ भावफलम् ६६३ लग्नस्य आयुः ६८६ अथ समुदायाष्टकवर्गफलम् ६६४ अथ लग्ने क्रूरग्रहे सति ६८७ अथ रेखाशान्तिफलम् ६६५ अथ अष्टमभावे केन्द्रे च अथ भावानां फलसमयः ६६९ शुभापापयोगे ६८७ अथ शुभपापभेदात्भावफले अथ राहुयुक्तलग्नस्य आयु- विशेषः ६७० विचारः ६८८ अथ कारकविचारः ६७० अथ द्रेष्काणवशात् हानिवृद्धिः ६८८ अथ दृष्टिवंशात्भावफलस्य अथ अष्टकवर्गोत्पन्न अंशायुषि व्यवस्था ६७१ हरणम् ६८९ अथ स्त्रीपुरुषयोः स्वभावविचारः ६७१ अथ अन्तर्दशाप्रकारः ६८९ अथ स्वभावे ह्रासवृद्धिः ६७१ अथ समच्छेदभावस्थानम् ६९० सूर्यादिग्रहाणां स्थानसम्बन्धा- अथ अन्तर्दशानियमः ६९० त्पाचकादिग्रहाः ६७२ अथ पिण्डायुषि भेदानि ६९१ अथ सूर्यादिग्रहाणां गोचरे अथ आयुषः ग्रहणे नियमः ६९२ फलकालः ६७३ अथ विशेषः ६९२ अथ भावफलानामवधिः ६७३ अथ भावानुसारेणायुविचारः ६९३ अथ योगानां भंगयोगः ६७४ अथ मिश्रायुर्दायक्रमः ६९४ अथ पुनः प्रकारान्तरेण ६७५ अथ आयुर्दायसंख्या ६९४ अथ भावानां संज्ञा ६७६ अथ अमिश्रायुषे भेदः ६९४ अथ ग्रहात् भावविचारः ६७७ अथ पिण्डायुषः भेदः ६९५
( ११ ) विषयः पृष्ठांक विषयः पृष्ठांकः अथ प्रकारान्तरेण ६९५ अथ मृतपुत्रकन्यायोगः ७१६ अथ योगान्तरम् ६९७ अथ संन्यासयोगः ७१७ अथ रश्मिवशेनायुर्ग्रहणे नियमः ६९७ अथ परमहंसादियोगाः ७१७ अथ भावविचारस्य रीतिः ६९९ अथ प्रव्रज्यायां निष्ठायोगः ७१८ अथ दशवर्गरीत्या भाग्योदय- अथ अंशविशेषे जातायां विचारः ७०० स्त्रीलक्षणम् ७१८ अथ भाग्योदयसमयः ७०० अथ दशमभावानुसारफलम् ७१९ अथ प्रकारान्तरेण ७०० अथ मेषादिराशीनां फलानि ७२० अथ ग्रहाणां विशेषफलानि ७०१ अथ सूर्यादीनां कालांशफलम् ७२१ अथ चन्द्रस्य फलम् ७०१ अथ षष्ठ्यंशफलम् ७२२ अथ भौमस्य फलम् ७०२ अथ षष्ठ्यंशे विशेषः ७२३ अथ बुधस्य फलम् ७०२ अथ मरणनिमित्तानि ७२४ अथ गुरोः फलम् ७०३ अथ नवांशद्वारा मरणनिमित्तानि ७२४ अथ भृगोः फलम् ७०४ अथ राशिनिमित्ततो मृत्युविचारः ७२४ अथ शनेः फलम् ७०४ अथ कालादिसूर्यान्तचतुर्दश- अथ फलप्राप्तेः समयः ७०५ ग्रहाणामंशेन मृत्युज्ञानम् ७२५ अथ मुहूर्त्तलक्षणम् ७०६ अथ रश्मिद्वारा वर्षा नयने अथ विनाडेः ३२ मुहूर्ताः ७०७ हरांशज्ञानम् ७२५ अथ षष्ठिघट्यात्मकमुहूर्त्ताः ७०८ अथ अंशायुहारः ७२६ अथ कालांशराशिचक्रमुहूर्त्ता ७०८ अथ राशीनामंशायुर्दाये हारः ७२६ अथ नित्योदयस्य क्रमः ७०८ अथ पूर्वोक्तानां फलविचारः ७२७ अथ नित्योदयघटीप्रमाणम् ७०९ अथ योगज्ञानम् ७२७ अथ प्रकारान्तरेण राशीनां मानानि ७०९ योगान्तरम् ७२८ अथ दशवर्गानां फलम् ७०९ अन्यविशेषः ७२९ अथ राहोः गतिः ७११ अथ वर्षचर्यादिफलाध्यायः ७३० अथ अस्य प्रयोजनम् ७११ तत्रादौ राश्यंशफलम् ७३० अथ पित्र्याद्यरिष्टविचारः ७१२ अथ सूर्यादिग्रहाणां द्वादश- अथ सुगतिदुर्गति विचारः ७१२ भावफलम् ७३६ अथ कुब्जादियोगाः ७१३ अथ चन्द्रस्य द्वादशभावफलम् ७३७ अथ योगान्तरम् ७१४ अथ भौमस्य द्वादशभावफलम् ७३७ अथ मृत्युकालज्ञानम् ७१४ अथ बुधस्य द्वादशभावफलम् ७३८ अथ अल्पमध्यदीर्घायुर्ज्ञानम् ७१४ अथ गुरुशुक्रयोः द्वादशभावफलम् ७३८ अथ चतुर्दशग्रहाणां षष्ठ्यंशादिः ७१५ अथ शनेः द्वादशभावफलम् ७३९ अथ नक्षत्रगणनाक्रमः ७१५ अथ ग्रहाणां दृष्टिवशात् सूर्या- अथ षष्ठ्यंशोत्पत्तौ फलम् ७१६ दीनां फलम् ७३९
( १२ ) विषयः पृष्ठांक विषयः पृष्ठांक अथ चन्द्रस्य फलम् ७४० अथ आरूढलग्नादायुर्निर्णयः ७५३ अथ भौमस्य फलम् ७४० अथ मृत्युलक्षणम् ७५३ अथ बुधस्य फलम् ७४० अथ योगान्तरम् ७५३ अथ गुरोः फलम् ७४१ अथ राहुकालसमायोगलक्षणम् ७५३ अथ भृगोः फलम् ७४१ अथ नक्षत्रतिथिवारेषु दिशाक्रमः ७५४ अथ स्थानबलयुक्तसूर्यादि- अथ द्वितीयभावादष्टमभाव ग्रहाणां फलम् ७४१ पर्यन्तम् ७५५ अथ दिग्बलयुक्तसूर्यादि- अथ रोगिणः मृत्युसम्बन्धिप्रश्नम् ७५५ ग्रहाणां फलम् ७४२ अथ नक्षत्रक्रमेण कालस्या- अथ कालबलयुक्तसूर्यादि- वयवान् ७५६ ग्रहाणां फलम् ७४३ अथ प्रश्नकर्तुः अशुभलक्षणं अथ चेष्टाबलयुक्तसूर्यादि- तथा शुभप्रश्नः ७५६ ग्रहाणां फलम् ७४३ अथ अनादि ज्ञानम् ७५७ अथ इष्टबलयुक्तसूर्यादि- अथ वर्षमासतिथिज्ञानम् ७५७ ग्रहाणां फलम् ७४३ अथ वर्षज्ञानम् ७५७ अथ फलान्तरम् ७४४ अथ प्राणलग्नादेः ज्ञानम् ७५८ अथ दशाफलम् ७४५ अथ जन्मनक्षत्रज्ञानम् ७५८ अथ मासचर्याप्रकरणम् ७४५ अथ प्रकारान्तरेण मासादिः ७५८ तत्रादौ भावसंधिस्थग्रहाणां फलम् ७४५ अथ बलविचारः ७५९ अथ भावानां फलम् ७४६ अथ दृष्टिविचारः ७५९ अथ भावानां स्थानांकसंख्यामाह ७४६ अथ ग्रहाणां स्थानदिग्बलम् ७६० अथ भावानां करणसंख्यामाह ७४६ अथ अयनबलम् ७६० अथ पूर्वोक्तस्थानकरणसंख्यानां अथ पक्षचेष्टाम् दिवादिबल ७६० शुभाशुभत्वं विशेष फलम् ७४६ अथ दशवर्गबलम् ७६१ अथ जातिदेशानुसारेण फले अथ शास्त्रस्य वेदाङ्गत्वप्रति- तारतम्यम् ७४७ पादनम् ७६१ अथ दिनचर्याप्रकरणम् ७४८ अथ अध्यायानुक्रमः ७६२ अथ प्रश्नाध्यायः ७४९ अथ शास्त्रफलं तथा शास्त्र- अथ ज्योतिषशास्त्रज्ञाने उपायः ७५० परम्परा ७६३ अथ दैवज्ञलक्षणम् ७५१ अथ अन्तर्दशादिचक्रम् ७६४ अथ प्रश्नकर्तुः नियमः ७५२ इतिचक्रम् ७८८ इति विषयानुक्रमणिका समाप्ता।
श्रीगणेशाय नमः अथ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् भाषा-टीकासहितम् पूर्वार्धम् श्रीगणेशं गुरुं नत्वा नत्वाम्बां सुमतिप्रदाम्। पाराशरीयहोरायाः कुर्वे टीकां सुबोधिनीम्॥१॥ मैत्रेय उवाच— नमस्तस्मै भगवते बोधरूपाय सर्वदा। परमानन्दकन्दाय गुरवेऽज्ञानध्वंसिने॥१॥ इति स्तुत्या सुसंहृष्टो मुनिस्तत्त्वविदाम्बरः। अथादिदेश सच्छास्त्रं सारं यज्ज्योतिषां शुभम्॥२॥ मैत्रेय जी ज्योतिषशास्त्र के सार पदार्थ को जानने के लिए पाराशर जी की स्तुति करते हैं। अज्ञान को नाश करने वाले परम आनन्द को देनेवाले सर्वदा ज्ञान को देनेवाले भगवन् परमपूज्य आपको नमस्कार है। इस स्तुति से तत्त्व के जानने वालों में श्रेष्ठ मुनि प्रसन्न होकर ज्योतिष (ग्रहों) के शुभ तत्त्व शास्त्र का आदेश करने लगे॥१-२॥ पराशर उवाच— शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शुक्लाम्बरधरां गिरम्। प्रणम्य पाञ्चजन्यं च वीणां याभ्यां धृतं द्वयम्॥३॥ पराशर जी बोले— सफेद वस्त्र को धारण किये हुये, पाञ्चजन्य को लिये हुये विष्णु को एवं सफेद वस्त्र को धारण किये हुये, वीणा को लिये हुये सरस्वती को प्रणाम कर॥३॥ सूर्य नत्वा ग्रहपतिं जगदुत्पत्तिकारणम्। वक्ष्यामि वेदनयनं यथा ब्रह्ममुखाच्छ्रुतम्॥४॥ संसार के उत्पत्ति के कारण ग्रहों के स्वामी सूर्य को नमस्कार करके जैसा मैंने ब्रह्मा के मुख से सुना है वैसा ही वेद के नेत्र को (ज्योतिष-शास्त्र) कहूँगा॥४॥
१८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् शान्ताय गुरुभक्ताय ऋजवेऽर्चितस्वामिने। आस्तिकाय प्रदातव्यं ततः श्रेयो ह्यवाप्स्यति ।।५।। इस शास्त्र को शान्तस्वभाव गुरुभक्त, सीधे, स्वामीभक्त और आस्तिक को देना चाहिए। इससे कल्याण की प्राप्ति होती है।।५।। न देयं परशिष्याय नास्तिकाय शठाय च। दत्ते प्रतिदिनं दुःखं जायते नात्र संशयः।।६।। दूसरे के शिष्य को, नास्तिक और मूर्ख को नहीं देना चाहिए। ऐसा करने से प्रतिदिन दुःख होता है, इसमें संशय नहीं है।।६।। अथ सृष्ट्यारम्भमाह— एकोऽव्यक्तात्मको विष्णुरनादिः प्रभुरीश्वरः। शुद्धसत्त्वो जगत्स्वामी निर्गुणस्त्रिगुणान्वितः ।।७।। एक अव्यक्त आत्मावाले विष्णु हैं जो कि अनादि, समर्थ, ईश्वर, शुद्ध सतोगुणी, जगत् के स्वामी, निर्गुण होते हुए भी तीनों गुणों से युक्त हैं।।७।। संसारकारकः श्रीमान्निमित्तात्मा प्रतापवान्। एकांशेन जगत्सर्वं सृजत्यवति लीलया ।।८।। संसार को बनाने वाले सर्व सम्पत्ति से युक्त, नियतात्मावाले, प्रतापी हैं। वे अपने एक अंश से सम्पूर्ण जगत् की लीला से ही रचना करते और पालन करते हैं।।८।। त्रिपादं तस्य देवस्य ह्यमृतं तत्त्वदर्शिभिः। विदन्ति तत्प्रमाणं च सप्रधानं तथैकपात् ।।९।। इनके तीन चरण अमृतमय हैं जिसे तत्त्वदर्शी लोग जानते हैं। प्रधान के सहित प्रमाणस्वरूप एक चरण से।।९।। व्यक्ताव्यक्तात्मको विष्णुर्वासुदेवस्तु गीयते। यदव्यक्तात्मको विष्णुः शक्तिद्वयसमन्वितः ।।१०।। व्यक्त और अव्यक्त आत्मावाले विष्णु को वासुदेव कहते हैं। जो अव्यक्त विष्णु हैं वे दो शक्तियों से युक्त हैं।।१०।। व्यक्तात्मकस्त्रिशक्तीभिः संयुतोऽनन्तशक्तिमान्। सत्त्वप्रधाना श्रीशक्तिर्भूशक्तिश्च रजोगुणः।।११।।
सृष्ट्यादिक्रमः १९ व्यक्त आत्मावाले विष्णु तीन शक्तियों से युक्त होने से अनन्त शक्तिवाले कहे जाते हैं। तीनों शक्तियों में श्री शक्ति सत्त्वगुण प्रधान, भू शक्ति रजोगुण प्रधान है।।११।। शक्तिस्तृतीया प्रोक्ता नीलाख्या ध्वान्तरूपिणी। वासुदेवश्चतुर्थोऽभूच्छ्रीशक्त्या प्रेरितो यदा।।१२।। तीसरी नील शक्ति तमोगुण प्रधान है। इनसे भिन्न श्रीशक्ति से प्रेरित चौथे वासुदेव हैं।।१२।। सङ्कर्षणश्च प्रद्युम्नोऽनिरुद्ध इति मूर्त्तिधृक्। तमःशक्त्यान्वितो विष्णुर्देवः सङ्कर्षणाभिधः।।१३।। वे संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध नामक मूर्ति को धारण करते हैं, तमः शक्ति से युक्त विष्णु संकर्षण नाम से।।१३।। प्रद्युम्नो रजसा शक्त्याऽनिरुद्धः सत्त्वया युतः। महान्सङ्कर्षणाज्जातः प्रद्युम्नादहंकृतिः।।१४।। रज शक्ति से प्रद्युम्न, सत्त्व शक्ति से युक्त अनिरुद्ध होते हैं। संकर्षण से महत्तत्त्व की उत्पत्ति और प्रद्युम्न से अहंकार की उत्पत्ति हुई।।१४।। अहङ्कारात्स्वयं जातो ब्रह्माहङ्कारमूर्त्तिधृक्। सर्वेषु सर्वशक्तिश्च स्वशक्त्याधिकया युतः।।१५।। अहंकार से अहंकार की मूर्त्ति को धारण किये हुए ब्रह्मा हुए। सभी लोगों में सभी शक्तियाँ हैं किन्तु जिस शक्ति से जो उत्पन्न हुए हैं वह शक्ति उनमें अधिक है।।१५।। अहङ्कारस्त्रिधा भूत्वा सर्वमेतद्विस्तराद्। सात्त्विको राजसश्चैव तामसश्चेदहंकृतिः।।१६।। अहंकार भी सात्त्विक, राजस, तामस क्रम से वैकारिक, तैजस और तामस नाम से तीन प्रकार के हैं।।१६।। देवा वैकारिकाज्जातास्तैजसादिन्द्रियाणि च। तामसाश्चैव भूतानि खादीनि स्वशक्तिभिः।।१७।। वैकारिक से देवता, तैजस से इन्द्रिय और तामस से पंचमहाभूतों की उत्पत्ति हुई है। ये सभी अपनी-अपनी शक्ति से उत्पन्न हैं।।१७।। श्रीशक्त्या सहितो विष्णुः सदापाति जगत्त्रयम्। भूशक्त्या सृजते विष्णुर्नीलशक्त्या युतोऽत्ति हि।।१८।।
२० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् श्री शक्ति से युक्त होकर विष्णु (वासुदेव) तीनों लोकों का पालन करते हैं, भू शक्ति से (विष्णु) ब्रह्मा जगत् की सृष्टि करते हैं और नील शक्तिसम्पन्न शिव तीनों लोकों का लय करते हैं ।।१८।। सर्वेषु चैव जीवेषु परमात्मा विराजते । सर्वं हि तदिदं ब्रह्मन् स्थितं हि परमात्मनि ।।१९।। हे ब्रह्मन् ! सभी जीवों में परमात्मा स्थित हैं और यह समस्त जगत् परमात्मा में स्थित है ।।१९।। सर्वेषु चैव जीवेषु स्थितं ह्यंशद्वयं क्वचित् । जीवांशमधिकं तद्वैत्परमात्मांशकः किल ।।२०।। सभी जीवों में दो अंश अधिक होते हैं, किसी में जीवांश अधिक होता है और किसी में परमात्मांश अधिक होता है ।।२०।। सूर्यादयो ग्रहाः सर्वे ब्रह्मकामद्विषादयः । एते चान्ये च बहवः परमात्मांशकाधिकाः ।।२१।। सूर्यादि ग्रहों में, ब्रह्मा, शिव आदि देवता तथा अन्य अवतारों में परमात्मांश अधिक होता हैं ।।२१।। शक्तयश्च तथैतेषामधिकांशाः श्रियादयः । अन्यासु स्वस्वशक्तीषु ज्ञेया जीवांशकाधिकाः ।।२२।। इनकी जो शक्तियाँ (लक्ष्मी आदि) हैं इनमें भी परमात्मांश अधिक होता है। अन्य देवता और उनकी शक्तियों में जीवांश अधिक होता 'है।।२२।। अवतारवादः । पराशर जी के उत्तर से शंकित हो मैत्रेय जी ने पुनः प्रश्न किया। मैत्रेय उवाच- रामकृष्णादयो ये च ह्यवतारा रमापतेः । तेऽपि जीवांशसंयुक्ताः किं वा ब्रूहि मुनीश्वर ।।२३।। मैत्रेय जी बोले- हे मुनीश्वर ! राम, कृष्ण आदि जो विष्णु के अवतार हैं क्या वे भी जीवांश से युक्त हैं ।।२३।। पराशर उवाच- रामः कृष्णश्च भो विप्र नृसिंहः शूकरस्तथा । इति पूर्णावतारश्च ह्यन्ये जीवांशकान्विताः ।।२४।।
सृष्ट्यादिक्रमः २१ पराशर जी बोले- हे विप्र! राम, कृष्ण, नृसिंह और शूकर ये पूर्ण अवतार हैं। अन्य अवतार जीवांश से युक्त हैं।। २४ ।। अवताराण्यनेकानि ह्यजस्य परमात्मनः। जीवानां कर्मफलदो ग्रहरूपी जनार्दनः।। २५ ।। अजन्मा परमात्मा के अनेक अवतार हैं। जीवों के कर्मानुसार फल देने के लिए ग्रहरूप जनार्दन भगवान् का अवतार है।। २५ ।। दैत्यानां बलनाशाय देवानां बलवृद्धये। धर्मसंस्थापनार्थाय ग्रहाज्जाताः शुभाः क्रमात् ।। २६ ।। दैत्यों के बल को नाश करने के लिए और देवताओं का बल बढ़ाने के लिये तथा धर्म को स्थापित करने के लिये ग्रहों से शुभद अवतार हुए हैं।। २६ ।। रामोऽवतारः सूर्यस्य चन्द्रस्य यदुनायकः। नृसिंहो भूमिपुत्रस्य बुद्धः सोमसुतस्य च।। २७ ।। जैसे सूर्य का रामावतार, चन्द्रमा का कृष्णावतार, भौम का नृसिंहावतार और बुध का बौद्धावतार है।। २७ ।। वामनो विबुधेज्यस्य भार्गवो भार्गवस्य च। कूर्मो भास्करपुत्रस्य सैंहिकेयस्य सूकरः।। २८ ।। बृहस्पति का वामन अवतार, शुक्र का भार्गव (परशुराम) अवतार, शनि का कूर्म अवतार, राहु का सूकर अवतार है।।२८।। केतोर्मीनावतारश्च ये चान्ये तेऽपि खेटजाः। परमात्मांशमधिकं येषु ते च वै खेचराभिधाः।। २९ ।। केतु का मत्स्यावतार हुआ है, अन्य अवतार भी ग्रहों से ही हुए हैं। जिनमें परमात्मांश अधिक है वे खेचर यानि देव कहे जाते हैं।। २९ ।। जीवांशमधिकं येषु जीवास्ते वै प्रकीर्त्तिताः। सूर्यादिभ्यो ग्रहेभ्यश्च परमात्मांशनिःसृताः ।। ३० ।। रामकृष्णादयः सर्वे ह्यवतारा भवन्ति वै। तत्रैव ते विलीयन्ते पुनः कार्यान्तरे सदा ।। ३१ ।। जिनमें जीवांश अधिक हैं वे जीव कहे जाते हैं। सूर्य आदि ग्रहों से परमात्मांश निकल कर ही राम, कृष्ण आदि अवतार हुए हैं। वे अपने- अपने कार्यों को करके पुनः उन्हीं में लीन हो जाते हैं।। ३०-३१ ।।
२२ - बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् जीवांशनिःसृतास्तेषां तेभ्यो जाता नरादयः। तेऽपि तथैव लीयन्ते तेऽव्यक्ते समयान्ति हि।।३२।। उन्हीं (सूर्यादिग्रहों) में से जीवांश के निकलने से मनुष्य आदि जीवों की सृष्टि होती हैं वे भी इहलोक में अपने-अपने कार्यों को करके अन्त में उन्हीं में लीन हो जाते हैं। ये ग्रह भी प्रलय के समय अव्यक्त परमात्मा में लीन हो जाते हैं।।३२।। इदं ते कथितं विप्र स यस्मिन् वै भवेदिति । भूतान्यपि भविष्यन्ति तत्तत्सर्वज्ञतामियात् ।। ३३ ।। हे विप्र ! इस प्रकार से मैंने सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय जैसे होती है, हुई है और होगी उन सभी को तुम से कहा। इन सबको वही सर्वज्ञ (परमात्मांश पुरुष) ही जानता है।।३३।। विना तज्ज्योतिषं नान्यो ज्ञातुं शक्नोति कर्हिचित् । तस्मादवश्यमध्येयं ब्राह्मणैश्च विशेषतः।।३४।। इन सभी बातों को बिना ज्योतिषशास्त्र के कोई कभी भी नहीं जान सकता है। इसलिये इस शास्त्र का अध्ययन अवश्य करना चाहिए, विशेषकर ब्राह्मण को अवश्य करना चाहिए।।३४।। यो नरः शास्त्रमज्ञात्वा ज्योतिषं खलु निन्दति । रौरवं नरकं भुक्त्वा चान्धत्वं चान्यजन्मनि ।। ३५ ।। इति बृहत्पाराशरहोरायां पूर्वखंडे सृष्ट्यादिक्रमशास्त्रावतरणं नाम प्रथमोऽध्यायः ।।१।। जो मनुष्य इस शास्त्र को न जानते हुए ज्योतिषशास्त्र की निन्दा करता है, वह रौरवं नरक को भोगकर दूसरे जन्म में अन्धा होता है।।३५।। इति पाराशरहोरायां सुबोधिन्यां प्रथमोऽध्यायः ।।१।। अथ राशिप्रभेदाध्यायः मैत्रेय उवाच- यदव्यक्तात्मको विष्णुः कालरूपो जनार्दनः। तस्याङ्गानि निबोध त्वं क्रमान्मेषादि राशयः ।। १ ।। मैत्रेय जी बोले- जो व्यक्त (प्रकट रूप) विष्णु काल (समय) रूपी जनार्दन हैं, उनके अंगों का ज्ञान क्रम से मेषादि राशियों द्वारा बताइये ।। १ ।।