चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३३१
अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३३१ दुन्दुभि, वाकार, लोहपृष्ठ, कुलिङ्ग, कबूतर, तोता, चारक, चिरिटा, ककुयष्टिक, सारिका, कलविंक, चटक, अंगारचूड़क ( बुलबुल ), पारावत, पानविक ये सब 'प्रतुद' पक्षी हैं ॥ ५०-५२ ॥ प्रसह्य भक्षयन्तीति प्रसह्यास्तेन संज्ञिताः ॥ ५३ ॥ भूशया बिलवासित्वादानूपाऽनूपसंश्रयात् । जले निवासाज्जलजा जलेचर्याज्जलेचराः ॥ ५४ ॥ स्थलजा जाङ्गलाः प्रोक्ता मृगा जाङ्गलचारिणः । विकीर्य विष्किराश्चैव प्रतुद्य प्रतुदाः स्मृताः ॥ ५५ ॥ योनिरष्टविधा त्वेषां मांसानां परिकीर्तिता । गाय, घोड़ा, बाघ आदि प्राणी भक्ष्य दृष्टि से एकदम जोर से खाने पर गिरते हैं, इसलिये इनको 'प्रसह' कहते हैं । सांप, मेंढक आदि बिल में रहते हैं, इस- लिये इनको 'विलेशय' कहते हैं। हाथी भैंसा आदि प्राणी पानी के आश्रय से रहते हैं, इसलिये इनको 'आनूप' कहते हैं । पानी में रहने से 'जलज', जल में चरने-विचरने से 'जलचर', स्थलभूमि पर चलने वाले जंगल में फिरने वाले पशुओं को 'जांगल' कहते हैं । तीतर आदि पक्षी अपने खाद्य पदार्थ को बिखेर कर खाते हैं, इसलिये 'विष्किर' और तोता आदि पक्षी अपने खाद्य पदार्थ को चोंच से तोड़कर खाते हैं इस लिये 'प्रतुद' कहलाते हैं। इस प्रकार से मांस के आठ उत्पत्तिस्थान हैं ॥ ५३-५५ ॥ प्रसह्या भूशयानूपवारिजा वारिचारिणः ॥ ५६ ॥ गुरूष्ण-स्निग्ध-मधुरा बलोपचयवर्धनाः । वृष्याः परं वातहराः कफपित्ताभिवर्धिनः ॥ ५७ ॥ हिता व्यायामनित्येभ्यो नरा दीप्ताग्नयश्च ये । प्रसह्यानां विशेषेण मांसं मांसाशिनां भिषक ॥ ५८ ॥ जीर्णार्शो-ग्रहणी-दोष-शोषार्तानां प्रयोजयेत् । लावाद्यो वैष्किरो वर्गः प्रतुदा जाङ्गला मृगाः ॥ ५६ ॥ लघवः शीतमधुराः सकषाया हिता नृणाम् । पित्तोत्तरे वातमध्ये सन्निपाते कफानुगे ॥ ६० ॥ विष्किरा वर्तकाद्यास्तु प्रसह्याल्पान्तरा गुणैः । नातिशीतं गुरु-स्निग्धं मांसमाजमदोषलम् ॥ ६१ ॥ शरीर-धातु-सामान्यादनभिष्यन्दि बृंहणम् । ग्राही मधुरशीतत्त्वाद् गुरु बृंहणमाविकम् ॥ ६२ ॥ तौ ह्यजाविके मिश्रगोचरत्वादनिश्छिते ।
३३२ चरकसंहिता [ अ० २७ सामान्येनोपदिष्टानां मांसानां स्वगुणैः पृथक् ॥ ६३ ॥ केषांचिद् गुणवैशेष्याद्विशेष उपदेक्ष्यते । दर्शन-श्रोत्र-मेधाग्नि-वयो-वर्ण-स्वरायुषाम् ॥ ६४ ॥ बर्ही हिततमो बल्यो वातघ्नो मांसशुक्रलः । गुरूष्ण-स्निग्ध-मधुराः स्वर-वर्ण-बल-प्रदाः ॥ ६५ ॥ बृंहणाः शुक्रलाश्चोक्ता हंसा मारुतनाशनाः । स्निग्धाश्चोष्णाश्च वृष्या श्च बृंहणाः स्वरबोधनाः ॥ ६६ ॥ बल्याः परं वातह्राः स्वेदनाश्चरणायुधाः । गुरूष्णमधुरो नातिधन्वानूपनिषेवणात् ॥ ६७ ॥ तित्तिरिः संजयेच्छीघ्रं त्रीन् दोषाननिलोल्बणान् । पित्तश्लेष्मविकारेषु सरक्तेषु कपिञ्जलाः ॥ ६८ ॥ मन्दवातेषु शस्यन्ते शैत्य-माधुर्य-लाघवात् । लावाः कषायमधुरा लघवोऽग्निविवर्धनाः ॥ ६६ ॥ सन्निपातप्रशमनाः कटुकाश्च विपाकतः । कषायमधुराः शीता रक्तपित्तनिबर्हणाः ॥ ७० ॥ विपाके मधुराश्चैव कपोता गृहवासिनः । तेभ्यो लघुतराः किंचित्कपोता वनवासिनः ॥ ७१ ॥ शीताः संग्राहिणश्चैव स्वल्पमूत्रकराश्च ते । शुकमांसं कषायाम्लं विपाके रूक्षशीतलम् ॥ ७२ ॥ शोष-कास-क्षय-हितं संग्राहि लघु दीपनम् । कषायो विशदो रूक्षः शीतः पाके कटुर्लघुः ॥ ७३ ॥ शशः स्वादुः प्रशस्तश्च संनिपातेऽनिलावरे । चटका मधुराः स्निग्धा बलशुक्रविवर्धनाः ॥ ७४ ॥ सन्निपातप्रशमनाः शमना मारुतस्य च । मधुरार्मधुराः पाके त्रिदोषशमनाः शिवाः ॥ ७५ ॥ लघवो बद्धविण्मूत्राः शीताश्चैणाः प्रकीर्तिताः । गोधा विपाके मधुरा कषायकटुका रसे ॥ ७६ ॥ वात-पित्त-प्रशमनी बृंहणी बलवर्धनी । शल्लको मधुराम्लश्च विपाके कटुकः स्मृतः ॥ ७७ ॥ वात-पित्त-कफघ्नश्च कास-श्वास-हरस्तथा । गुरूष्णमधुरा बल्या बृंहणा पवनापहाः ॥ ७८ ॥
अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३३३
अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३३३ मत्स्याः स्निग्धाश्च वृष्याश्च बहुदोषाः प्रकीर्तिताः । शैवलाहारभोजित्वात्स्वप्नस्य च विवर्जनात् ॥ ७९ ॥ रोहितो दीपनोयश्च लघुपाको महाबलः । स्नेहनं बृंहणं वृष्यं श्रमघ्नमनिलापहम् ॥ ८० ॥ वराहपिशितं बल्यं रोचनं स्वेदनं गुरु । बल्यो वातहरो वृष्यश्चक्षुष्यो बलवर्धनः ॥ ८१ ॥ मेधास्मृतिकरः पथ्यः शोषघ्नः कूर्म उच्यते । गव्यं केवलवातेषु पीनसे विषमज्वरे ॥ ८२ ॥ शुष्क-कास-श्रमात्यग्नि-मांस-क्षय-हितं च तत् । स्निग्धोष्णमधुरं वृष्यं माहिषं गुरु तर्पणम् ¹ ॥ ८३ ॥ दार्थं बृहत्त्वमुत्साहं स्वप्नं च जनयत्यपि । धार्तराष्ट्रचकोराणां दक्षाणां शिखिनामपि ॥ ८४ ॥ चटकानां च यानि स्युरण्डानि च हितानि च । रेतःक्षीणेपु कासेषु हृद्रोगेषु क्षतेषु च ॥ ८५ ॥ मधुराण्यविदाहीनि ² सद्यो बलकराणि च । शरीरबृंहणे नान्यद्दाद्यं ³ मांसाद्विशिष्यते । इति वर्गस्तृतीयोऽयं मांसानां परिकीर्तितः ॥ ८६ ॥ इनमें प्रसह, भूशय, आनूप, जलज और जलचर प्राणियों का मांस गुरु, स्निग्ध, मधुर, शक्ति बढ़ाने वाला, वीर्यवर्द्धक, वातनाशक, कफपित्त को बढ़ाने वाला है, इनका मांस नित्य प्रति व्यायाम करने वाले, जिनकी जाठराग्नि प्रदीप्त हो, उनके लिये हितकारी है। 'प्रसह' जानवर दो प्रकार के हैं। एक मांस खाने वाले सिंह आदि, दूसरे मांस न खाने वाले गाय आदि। इनमें मांस खाने वाले 'प्रसह' पक्षी या पशुओं का मांस पुराने अर्श-रोग, ग्रहणी-रोग, क्षय, या निर्बल पुरुष के लिये उपकारी है। लावा (बटेर) आदि विष्किरवर्ग के पक्षी, प्रतुदपक्षी, जांगलदेश के पशु इनका मांस लघु, शीतल, मधुर कषाय रस, और पित्तप्रधान, मध्यम वात, कनिष्ठ कफ वाले सन्निपात में हितकारी है। बटेर आदि समस्त विष्किर पक्षियों का मांस 'प्रसह' श्रेणो के मांसों से गुणों में मिलता है, थोड़ा ही अन्तर है। बकरी का मांस बहुत ठण्डा नहीं, बहुत भारी नहीं, बहुत स्निग्ध नहीं, कुछ ठण्डा, कुछ गुरु और कुछ स्निग्ध है) इसलिये वह दोषों को कुपित १. ... पाठः । २. मधुराण्यविपाकीनि इति पाठः । ३. खाद्यं इति पाठः ।
३३४ चरकसंहिता [ अ० २७ नहीं करता, कफ को उत्पन्न नहीं करता । उक्त गुणों के कारण मनुष्यों के मांस के समान धातुओं वाला है, जो गुण मनुष्य के धातुओं के हैं, वे ही गुण बकरी के मांस के हैं इसलिये पुष्टिकारक है । मेढ़ का मांस मधुर, ठण्डा और भारी है । मधुर और शीतल होने से पित्तनाशक१ है । बकरी और मेढ़ के मिश्रित२ स्थान में चरने से मांस का गुण अनिश्चित है, फिर भी सामान्य रूप से कह दिया । और जो मांस अपने गुणों में विशेषता रखते हैं उन को कहते हैं । मोर का मांस—आंख, कान, मेधा, अग्नि, तारुण्य, वर्ण, स्वर और आयु के लिये हितकारी; बलकारक, वायुनाशक और मांस एवं शुक्रवर्धक है । हंस का मांस गुरु, उष्ण, स्निग्ध, मधुर, स्वर, वर्ण, बल को बढ़ाने वाला, बृंहण पुष्टिकारक, शुक्रवर्धक और वातनाशक है । कुक्कुट का मांस—स्निग्ध, उष्ण, वृष्य, पुष्टिकारक, स्वर को अच्छा करने वाला, बलकारक और विशेषतः वात- नाशक तथा पसीना लाता है । तित्तिर पक्षी का ( मरुभूमि और आनूप देश दोनों स्थानों में रहने से ) मांस मध्यम गुरु, मध्यम उष्ण और मध्यम मधुर है, वातप्रधान सन्निपात को शीघ्र शान्त करता है । कपिंजल पक्षी का मांस—ठण्डा, मधुर और लघु होने से वात का जोर कम होने पर रक्तयुक्त पित्त या रक्तयुक्त कफ विकार में प्रशस्त है । लावा ( बटेर ), कषाय, मधुर, लघु, अग्निवर्धक, सन्निपात को शमन करने वाले और विपाक में कटु हैं । घर में पाले हुए कबूतरों का मांस—कषाय, विशद, शीत, रक्तपित्तनाशक, मधुर विपाक वाला होता है । और जो कबूतर जंगल में रहते हैं, उन का मांस इन से कुछ हल्का और शीतल, संग्राही और मूत्र को कम करने वाला होता है। तोते का मांस—कषाय, विपाक में अम्ल, रूक्ष, ठण्डा, शोष, क्षय, दमा, में हितकारी, स्तम्भक, हल्का, दीपक होता है । खरगोश का मांस—कषाय, स्वच्छ, रूक्ष, शीतल, विपाक में कटु, हल्का, मधुर और हीनवायु सन्निपात में प्रशस्त है । चिड़िया का मांस—मधुर, स्निग्ध, शक्ति व वीर्य को बढ़ाने वाला, सन्नि- १. सुश्रुत में भी कहा है— "बृंहणं मांसमौरभ्रं पित्तश्लेष्मापहं गुरु" ॥ २. मिश्र-गोचरत्वात्—बकरी या मेढ़ आनूप और मरु दोनों प्रदेशों में रहती है । इसलिये इन की योनि निश्चित नहीं है । तित्तिर पक्षी धन्व और आनूप किसी एक स्थान पर रहता है, ऐसा निश्चित करके कहा जा सकता है, इसलिये वह इस श्रेणी में नहीं है ।
अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३३५
अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३३५ पात को शान्त करने वाला और विशेषतः वायुनाशक है' । शिवा ( गीदड़ ) का मांस—मधुर रस, मधुर विपाक, त्रिदोषनाशक है । काले हरिण का मांस—हल्का, मल मूत्र को रोकने वाला और शीतल होता है। गोह का मांस—विपाक में मधुर, कषाय, कटु रस, वात-पित्तनाशक, पुष्टिकारक, बल- वर्धक है। शल्लकी का मांस—मधुर अम्लरस, विपाक में कटु, त्रिदोषनाशक, श्वास-कास नाशक है। मछलियों का मांस—गुरु, उष्ण, मधुर, बलकारक, पुष्टिकारक, वायुनाशक, स्निग्ध, वृष्य, वीर्यवर्धक और बहुत से दोषों को उत्पन्न करने वाला है। रोहू मछली का मांस—शैवाल ( सरवाल ) का भोजन करने से, कभी न सोने से, दीपनीय, अग्निवर्धक, पचने में लघु और बहुत बल देने वाला है। सूअर का मांस—स्नेहन, बृंहण, वीर्यवर्धक, थकान और वायुनाशक बलकारक, रुचिकर और बहुत पसीना लाने वाला है। कछुए का मांस—बल- कारक, वातनाशक, वीर्यवर्धक, आंखों के लिये हितकारी, बलवर्धक, मेधा, बुद्धि और स्मरण शक्ति को बढ़ाने वाला, आयु के लिये हितकारी, शोषनाशक है। गाय का मांस—केवल वात रोगों में, पीनस में, विषम ज्वर में, सूखी खांसीमें, थकान में, अग्नि या मांस के बहुत अधिक क्षय हो जाने में हितकारी है। भैंस का मांस—स्निग्ध, उष्ण, मधुर, वीर्यवर्धक, भारी, पुष्टिदायक, शरीर में दृढ़ता, पुष्टि, उत्साहवर्धक और नींद लाने वाला है। हंस ( जिन के पांव और चोंच काले होते हैं ) चकोर, बत्तख, मोर और चिड़ियां इनके अण्डे वीर्य की क्षीणता में, कास रोग में, हृदय रोग में, क्षत (उरःक्षत) में हितकारी हैं। ये अण्डे मधुर अविपाकी और तत्काल बलदायक हैं। खाद्य पदार्थ में शरीर को पुष्ट करने के लिये मांस से बढ़कर और कोई दूसरी वस्तु नहीं है। यह तीसरा मांस- वर्ग कह दिया ॥ ५६-८६॥ इति मांसवर्गः । अथ शाकवर्गः । पाठा शुषा शटीशाकं वास्तुकं सुनिषण्णकम् । विद्याद् ग्राहि त्रिदोषघ्नं भिन्नवर्चस्तु वास्तुकम् ॥ ८७ ॥ त्रिदोषशमनी वृष्या काकमाची रसायनी । नात्युष्णशीतवीर्या च भेदिनी कुष्ठनाशनी ॥ ८८ ॥ राजक्षवकशाकं तु त्रिदोषशमनं लघु ॥ वृष्य के लिये—"तृप्तिं चटकमांसानां गत्वा योऽनु पिबेत्पयः ।"
ग्राहि शस्तं विशेषेण ग्रहण्यर्शोविकारिणाम् ॥ ८९ ॥ कालशाकं तु कटुकं दीपनं गरशोफजित् । लघूष्णं वातलं रूक्षं कालीयं शाकमुच्यते ॥ ९० ॥ दीपनी चोष्णवीर्या च ग्राहिणी कफमारुते । प्रशस्यतेऽम्लचाङ्गेरी ग्रहण्यर्शोहिता च सा ॥ ९१ ॥ मधुरा मधुरा पाके भेदिनी श्लेष्मवर्धिनी । वृष्या स्निग्धा च शीता च मदघ्नी चाप्युपोदिका ॥ ९२ ॥ रूक्षो महाविषघ्नश्च प्रशस्तो रक्तपित्तिनाम् । मधुरोऽमधुरः पाके शीतलस्तण्डुलीयकः ॥ ९३ ॥ मण्डूकपर्णी वेत्राग्रं कुचेला वनतिक्तकम् । कर्कोटकावल्गुजकौ पटोलं शकुलादनी ॥ ९४ ॥ वृषपुष्पाणि शार्ङ्गेष्टा केबूकं सकठिल्लकम् । नाडीं कलायं गोजिह्वा वार्त्ताकं तिलपर्णिका ॥ ९५ ॥ कुलकं कर्कशं निम्बं शाकं पार्पटकं च यत् । कफपित्तहरं तिक्तं शीतं कटु विपच्यते ॥ ९६ ॥ सर्वाणि सूप्यशाकानि फञ्जी चिल्ली कुतुम्बकः । आलुकानि च सर्वाणि सपत्राणि कुटिञ्जरम् ॥ ९७ ॥ शणशाल्मलिपुष्पाणि कर्बुदारः सुवर्चला । निष्पावः कोविदारश्च पत्तूरश्चुचुपर्णिका ॥ ६७ ॥ कुमारजीवो लोट्टाकः पालङ्क्या मारिषस्तथा । कलम्बनालिकासूयः कुसुम्ववृकधूमकौ ॥ ९९ ॥ लक्ष्मणा प्रपुन्नाडं च नलिनीका कुठेरकः । लोणिका यवशाकं च कुष्माण्डकमवल्गुजम् ॥ १०० ॥ यातुकः शालकल्याणी त्रिपर्णी पीलुपर्णिका । शाकं गुरु च रूक्षं च प्रायो विष्टभ्य जीर्यति ॥ १०१ ॥ मधुरं शीतवीर्यं च पुरीषस्य च भेदनम् । स्विन्नं निष्पीडितरसं स्नेहाढ्यं तत्प्रशस्यते ॥ १०२ ॥ शणस्य कोविदारस्य कर्बुदारस्य शाल्मलेः । पुष्पं ग्राहि प्रशस्तं च रक्तपित्ते विशेषतः ॥ १०३ ॥ न्यग्रोधोदुम्बराश्वत्थ-प्लक्ष-पद्मादि-पल्लवाः । कषायाः स्तम्भनाः शीता हिताः पित्तातिसारिणाम् ॥
अ० २७ ] २२ सूत्रस्थानम् ३३७
अ० २७ ] २२ सूत्रस्थानम् ३३७
वायुं वत्सादिनी हन्यात्कफं गण्डीरचित्रकौ ।
श्रेयसी बिल्वपर्णी च बिल्वपत्रं च वातनुत् ॥ १०५ ॥
भण्डी शतावरीशाकं बलो जीवन्तिकं च यत् ।
पर्वण्याः पर्वपुष्प्याश्च वातपित्तहरं स्मृतम् ॥ १०६ ॥
लघुभिन्नशकृत्तिक्तं लाङ्गलक्युरुबूकयोः ।
तिलवेत्रसशाकं च शाकं पञ्चाङ्गुलस्य च ॥ १०७ ॥
वातलं कटुतिक्ताम्लमधोमार्गप्रवर्तकम् ।
रूक्षाम्लमुष्णं कौसुम्भं कफघ्नं पित्तवर्धनम् ॥ १०८ ॥
त्रपुसैर्वारुकेस्वादु-गुरु-विष्टम्भि-शीतले ।
मुखप्रियं च रूक्षं च मूत्रलं त्रपुसं त्वति ॥ १०९ ॥
एर्वारुकं च संपक्वं दाह-तृष्णा-क्लमाति-नुत् ।
वर्चोभेदीन्यलाबूनि रूक्षशीतगुरूणि च ॥ ११० ॥
चिर्भट्यैर्वारुके तद्वद्वर्चोभेदहिते तु ते ।
कूष्माण्डमुक्तं सक्षारं मधुराम्लं तथा लघु ॥ १११ ॥
सृष्टमूत्रपुरीषं च सर्वदोषनिबर्हणम् ।
केलुटं च कदम्बं च नदीमाषकमैन्दुकम् ॥ ११२ ॥
विशदं गुरु शीतं च समभिष्यन्दि चोच्यते ।
उत्पलानि कषायाणि रक्तपित्तहराणि च ॥ ११३ ॥
तथा तालप्रलम्बं च उरःक्षतरुजापहम् ।
खर्जूरं तालशस्यं च रक्तपित्तक्षयापहम् ॥ ११४ ॥
तरूट-बिस-शालूक-क्रौञ्चादन-कशेरुकम् ।
शृङ्गाटमङ्कलोड्यं च गुरु विष्टम्भि शीतलम् ॥ ११५ ॥
कुमुदोत्पलनालास्तु सपुष्पाः सफलाः स्मृताः ।
शीताः स्वादुकषायास्तु कफमारुतकोपर्नाः ॥ ११६ ॥
कषायमीषद्दिष्टम्भि रक्तपित्तहरं स्मृतम् ।
पौष्करं तु भवेद् बीजं मधुरं रसपाकयोः ॥ ११७ ॥
बल्यः शीतो गुरुः स्निग्धस्तर्पणो बृंहणात्मकः ।
वातपित्तहरः स्वादुर्वृष्यो युञ्जातकः स्मृतः ॥ ११८ ॥
जीवनो बृंहणो वृष्यः कण्ठ्यः शस्तो रसायने ।
विदारिकन्दो बल्यश्च मूत्रलः स्वादुशीतलः ॥ ११९ ॥
अम्लिकायाः स्मृतः कन्दो ग्रहण्यर्शोहितो लघुः ।
उष्णः कफवातघ्नो ग्राही शस्तो मदात्यये ॥ १२० ॥
३३८ चरकसंहिता [ अ० २७
त्रिदोषं बद्धविण्मूत्रं सार्षपं शाकमुच्यते ।
तद्वत्पिण्डालुकं विद्यात्कन्दत्वाच्च मुखप्रियम् ॥ १२१ ॥
सर्पच्छत्राफणश्याँस्तु बह्वयोऽन्याश्छत्रजातयः ।
शीताः पीनसकर्त्र्यश्च मधुरा गुर्व्य एव च ॥ १२२ ॥
चतुर्थः शाकवर्गोऽयं पत्रकन्दफलाश्रयः ।
शाकवर्ग-पाठा, शुषा ( सुशवी, ), कचूर, वास्तुक ( बथुआ ), सुनिषण्णक
( मेथी ) ये सब शाक ( भाजी ) ग्राहक, त्रिदोषनाशक हैं, परन्तु बथुआ की
भाजी ज़रा रेचक है । काकमाची ( मकोय ) की भाजी तीनों दोषों को नाश
करने वाली, पुष्टिदायक, और रसायन है, यह न तो बहुत गरम और न
बहुत ठण्डी है, मध्यमवीर्य, रेचक और कुष्ठनाशक है १ । राजक्षवक की
भाजी त्रिदोषनाशक, लघु, संग्राही है, ग्रहणी और अर्श रोग में विशेषतः हित-
कारी है । काल नामक शाक—कटु, अग्निदीपक, संयोगजन्य विषनाशक और
शोथनाशक, लघु, उष्ण, वायुकारक और रूक्ष है । खट्टी चांगेरी ( चौपतिया )
की भाजी—अग्निदीपक, उष्णवीर्य, संग्राही, कफ-वायु रोग में उत्तम तथा ग्रहणी
और अर्श रोग में हितकारी है। उपोदिका (चौलाई) मधुर रस मधुर विपाक, रेचक,
श्लेष्मावर्धक, वृष्य; स्निग्ध, शीतल और उन्मादनाशक (धत्तूरे आदि के मद को नष्ट
करनेवाली) है । तण्डुलीयका (चौलाई का भेद) रूक्ष, मद और विषनाशक, रक्तपित्त
रोग में श्रेष्ठ, मधुर रस, मधुर विपाक और शीतल है । मण्डूकपर्णी का शाक,
बेंत का अग्र भाग, कुचेला, वनतिक्ता, कंकोड़ा, अवल्गुजा ( बाबची ), परबल,
शकुनादनी, अडूसे के फूल, शार्ङ्गष्टा केम्बुक, कठिल्लक ( पुनर्नवा ), नाड़ी
( नाड़ीच ), कशाय ( मटर ), गोजिह्वा ( गाज़बां ), वार्त्ताक ( बैंगन ),
तिलपर्णी ( हुलहुल ), कुरुक ( करेला या परबल का भेद ), कर्कश ( अरुण-
दत्त के अनुसार कुचला, चक्रदत्त के अनुसार कर्कोटक ), नीम का शाक,
पित्तपापड़ा इन की भाजी कफ-पित्त नाशक, तिक्त, शीत और कटु विपाक है ।
'सूप्य शाक' ( माषपर्णी, उद्दपर्णी आदि ) फंजी ( ब्राह्मण, यष्टिका, भार्गी ),
चिल्छी २ कुतुम्बाक ( द्रोणपुष्पी, गोमा ), आलुक ( आलु, रतालु, पिण्डालु कन्द
मूल ), इन के पत्ते और कुटिंजर ( जंगली बथुआ ), सन, सिम्बल के फूल,
कर्बुदार ( कचनार ), सुवर्चला ( हुलहुल ), निष्पाव ( पालक ), कोविदार
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१. सुश्रुत में काकमाची को—"तिक्ता काकमाची वातं शमयत्युष्णवीर्य-
त्वात् ।” उष्णवीर्य कहा है ।
२. 'चिल्छी'—'माषपर्ण्या शुनः पुच्छे चिल्छी स्याच्छाकलोप्रयो । - डनि० ।
अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३३९
अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३३९ ( लाल कचनार ), पत्तुर ( शालिञ्च ), चुचुचपर्णिका ( नाड़ीच का भेद ) उंडुरकानी ( आखुपर्णी ), कुमारजीव ( जीवशाक ), क्रोष्टाक ( क्रोष्टा मारिष ), पालं क्य ( पालक ), मारिष कलम्ब, नालिका, आसुरी ( राई ), कुसुमभ ( धनिया ), वृकधूमक, लक्ष्मणा, प्रपुन्नाड़ ( चक्रमर्द ), नलिनी ( कमल की नाल, भिस ), कुठेरक ( तुलसी भेद ), लोणिका ( लूनी ), यवशाक ( खेत पापड़ा ), कूष्माण्डक ( पेठा ), अवल्गुजा ( बावची ), यातु क ( सफेद शाल- पर्णी ), शालकल्याणी, त्रिपत्री ( हंसपादिका ), पीलुपर्णी ( मोरटक, मोरबेल ), इन की भाजी गुरु, रूक्ष और प्रायः करके जब तक पचती नहीं, तब तक पेट में अफरा करती है, मधुर, शीतवीर्य और मल के रेचक है । इनको पानी में भापकर ( बिना बाहर का पानी मिलाये ) रस निकाल कर इस में घी या तैल मिलाकर खाना उत्तम है । सन, कचनार, लाल कचनार और सिम्बल इनके फूल संग्राही है, इसलिये रक्तपित्त में विशेषतः प्रशस्त हैं । न्यग्रोध ( बड़ ), गूलर, पीपल, पिलखन, कमल आदि के पत्ते कषाय रस, स्तम्भक,शीत तथा पित्तातिसार में हित-कारी हैं । वत्साडनी ( गिलोय ) की भाजी वायु नाशक, गण्डीर ( शमठ, कडुवा जिमीकन्द ) और चीता की भाजी कफनाशक, श्रेयसी ( गज पिप्पली ), बिल्वपर्णी और बेल के पत्तों की भाजी वायुनाशक है । भण्डी ( भिण्डो ), शतावर, बला, खरैटी, जीवन्ती, पर्वरणी ( इन्द्रवारुणी ), पर्वपुष्पी इन की भाजी वातपित्तनाशक है । लांगली (कलिहारी) की, लाल एरण्ड की भाजी तिक्त, रेचक और लघु है । तिक्त अम्ल वेतस ( या बेंत का शाक ), या एरण्ड की भाजी वायुकारक, कटु, तिक्त, अम्ल तथा रेचक है । कुसुमभ की भाजी रूक्ष, अम्ल, उष्ण, कफनाशक, पित्तवर्धक है । त्रपुस ( खीरा ), उर्वारुक ( ककड़ी ), स्वादु गुरु, अवष्टम्भ करने वाली और शीतल है । इनमें खीरा मुखप्रिय ( खाने में स्वादु ), रूक्ष और बहुत मूत्र लाने वाले हैं । पका हुआ उर्वारुक ( ककड़ी), प्यास, जलन थकान की पीड़ा को नष्ट करती है । अलाबूं ( तूंबी, घीया, आल ) मल का रेचक, रूक्ष, शीतल और गुरु है । चिर्भटी ( ककड़ी ), एवों- रुक भी रेचक हैं। पेठा कद्दू-क्षारयुक्त, मधुर, अम्ल, लघु, मल मूत्र का रेचक, त्रिदोषनाशक है १ । १. कच्चे और पक्के कूष्माण्ड के गुणों मे अन्तर है । यथा- “पित्तघ्नं तेषु कूष्माण्डं बालं मध्यं कफावहम् । पक्वं लघूष्णं स क्षारं दीपनं बस्तिशोधनम् ॥ सर्वदोषहरं हृद्यम्-॥”
[Header] ३४० चरकसंहिता [ अ० २७
केलुट ( केंबुक कन्द शाक ) और कदम्ब नन्दी माषक ( उन्दी मान- वक ), ऐन्द्रक इन की भाजी स्वच्छ, गुरु, शीतल, कफकारक है। नीला कमल कषाय रस और रक्त पित्तनाशक है। ताल प्रलम्ब ( ताड़ का अंकुर ), खर्जूर, तालशस्य ( ताल के सिर की मज्जा ) रक्त-पित्त और क्षयरोगनाशक है। तरूट ( तिरट कन्द ), बिस वा भिस, कमल की दण्डी, लाल कमल का कन्द, कौंचादन ( डूकूर कन्द, कमल ), कशेरू, शृंगाटक (सिंघाड़ा) अंकालोद्य ( ह्रस्व उत्पलकन्द ), गुरु, विष्टम्भि और शीतल हैं। कुमुद ( श्वेत कमल ), उत्पल (नीला कमल ) फूल और फल समेत शीतल, मधुर, कषाय रस, कफ वायु के प्रकोपक हैं। पुष्कर का बीज कषाय रस, थोड़ा विष्टम्भ करने वाला, रक्तपित्तनाशक, मधुर रस और मधुर विपाक है। मुंजातक ( औखरपथिक कन्द ) बलकारक, शीतल, गुरु, स्निग्ध, तृप्तिकारक, बृंहण पुष्टि- कारक, वात-पित्तनाशक, मधुर वृष्य है। विदारीकन्द, जीवनीय, बृंहण, वृष्य, स्वर के लिये हितकारी, रसायन में प्रशस्त, बलकारक, मूत्ररेचक, मधुर और शीतल है। अम्ली कन्द ( आसाम में होता है आंवर जाति का कन्द ) ग्रहणी, अर्श में हितकारी, लघु, बहुत गरम, कफ-वातनाशक, संग्राहि और मदात्यय रोग में प्रशस्त है। सरसों का शाक—त्रिदोषकारक मल-मूत्र का अवरोधक है। पिण्डालु ( रतालु ) भी इसी प्रकार का है, परन्तु कन्द जाति का होने से खाने में अच्छा लगता है। सर्पछत्रक (खुम्बी) को छोड़कर अन्य सब इस प्रकार की भाजियां शीतल, पीनस रोग को उत्पन्न करने वाली, मधुर गुरु होती हैं। इस प्रकार से पत्ते, कन्द और फलवाला शाकवर्ग समाप्त हुआ ॥ ८७-१२२ ॥ इति शाकवर्गः ।
अथ फलवर्गः तृष्णा-दाह-ज्वर-श्वास-रक्त-पित्त-क्षत-क्षयान् । वातपित्तमुदावर्त्तं स्वरभेदं मदात्ययम् ॥ १२३ ॥ तिक्तास्यतामास्यशोषं कासं चाऽऽशु व्यपोहति । मृद्वीका बृंहणं वृष्या मधुरा स्निग्धशीतला ॥ १२४ ॥ मधुरं बृंहणं वृष्यं खर्जूरं गुरु शीतलम् । क्षयेऽभिघाते दाहे च वातपित्ते च तद्धितम् ॥ १२५ ॥ तर्पणं बृंहणं फल्गु गुरु विष्टम्भि शीतलम् । परूषकं मधूकं च वातपित्ते च शस्यते ॥ १२६॥
अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३४१
अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३४१ मधुरं बृंहणं बल्यमाम्रातं तर्पणं गुरु । सस्नेहं श्लेष्मलं शीतं वृष्यं विष्टभ्य जीर्यति ॥ १२७ ॥ तालशस्यानि सिद्धानि नारिकेलफलानि च । बृंहणस्निग्धशीतानि बल्यानि मधुराणि च ॥ १२८ ॥ मधुरामलकषायं च विष्टम्भि गुरु शीतलम् । पित्तश्लेष्मकरं भव्यं ग्राहि वक्त्रविशोधनम् ॥ १२९ ॥ अम्लं परूषकं द्राक्षा बदराण्यारुकाणि च । पित्त-श्लेष्म-प्रकोपीणि कर्कन्धुलकुचान्यपि ॥ १३० ॥ नात्युष्णं गुरु संपक्वं स्वादुप्रायं मुखप्रियम् । बृंहणं जीर्यति क्षिप्रं नातिदोषलमारुकम् ॥ १३१ ॥ द्विविधं शीतमुष्णं च मधुरं चाम्लमेव च । गुरु पारावतं ज्ञेयमरुच्यत्यग्निनाशनम् ॥ १३२ ॥ भव्यादल्पान्तरगुणं काश्मर्यफलमुच्यते । तथैवाल्पान्तरगुणं तूदमम्लपरूषकात् ॥ १३३ ॥ कषायमधुरं टङ्कं वातलं गुरु शीतलम् । कपित्थं विषकण्ठघ्नमामं संग्राहि वातलम् ॥ १३४ ॥ मधुरामलकषायत्वात्सौगन्ध्याच्च रुचिप्रदम् । तदेव पक्वं दोषघ्नं विषघ्नं ग्राहि गुर्वपि ॥ १३५ ॥ बिल्वं तु दुर्जरं सिद्धं दोषलं पूतिमारुतम् । स्निग्धोष्णतीक्ष्णं तद्बालं दीपनं कफवातजित् ॥ १३६ ॥ वातपित्तकरं बालमापूर्णं पित्तवर्धनम् । पक्वमाम्रं जयेद्वायुं मांसशुक्रबलप्रदम् ॥ १३७ ॥ कषायमधुरप्रायं गुरु विष्टम्भि शीतलम् । जाम्बवं कफपित्तघ्नं ग्राहि वातकरं परम् ॥ १३८ ॥ मधुरं बदरं स्निग्धं भेदनं वातपित्तजित् । तच्छुष्कं कफवातघ्नं पित्ते न च विरुध्यते ॥ १३९ ॥ कषायमधुरं शीतं ग्राहि सिम्बितिकाफलम् । गाङ्गेरुकं करीरं च बिम्बीतोदनधन्वनम् ॥ १४० ॥ मधुरं सकषायं च शीतं पित्तकफापहम् । संपक्वं पनस मोचं राजादनफलानि च ॥ १४१ ॥ स्वादूनि सकषायाणि स्निग्धशीतगुरूणि च ।
३४२ चरकसंहिता [ अ० २७ कषायविशदत्वाच्च सौगन्ध्याच्च रुचिप्रदम् ॥ १४२ ॥ अवदंशक्षमं रूक्षं वातलं लवलीफलं । नीपं सभागकं पीलु तृणशून्यं१ विकङ्कतम् ॥ १४३ ॥ प्राचीनामलकं चैव दोषघ्नं गरहारि च । ऐङ्गुदं तिक्तमधुरं स्निग्धोष्णं कफवातजित् ॥ १४४ ॥ तिन्दुकं कफपित्तघ्नं कषायमधुरं लघु । विद्यादामलके सर्वान् रसाँल्लवणवर्जितान् ॥ १४५ ॥ स्वेद-मेदः-कफोत्क्लेद-पित्तरोग-विनाशनम् । रूक्षं स्वादु कषायाम्लं कफपित्तहरं परम् ॥ १४६ ॥ रसासृङ्-मांस-मेदो-जान्दोषान् हन्ति बिभीतकम् । स्वरभेद-कफोत्क्लेद-पित्तरोग-विनाशनम् । अम्लं कषायमधुरं वातघ्नं ग्राहि दीपनम् ॥ १४७ ॥ स्निग्धोष्णं दाडिमं हृद्यं कफपित्ताविरोधि च । रूक्षाम्लं दाडिमं यत्तु तत्पित्तानिलकोपनम् ॥ १४८ ॥ मधुरं पित्तनुद्दोषं तद्धि दाडिममुत्तमम् । वृक्षाम्लं ग्राहि रूक्षोष्णं वातश्लेष्मणि शस्यते ॥ १४९ ॥ अम्लिकायाः फलं पक्वं तस्मादल्पान्तरं गुणैः । गुणैस्तैरेव संयुक्तं भेदनं त्वम्लवेतसम् ॥ १५० ॥ शू लेऽरुचौ विबन्धे च मन्देऽग्नौ मद्यविप्लवे । हिक्काकासे च श्वासे च वम्यां वर्चोगदेषु च ॥ १५१ ॥ वातश्लेष्मसमुत्थेषु सर्वेष्वेतेषु दिश्यते । केशरं मातुलुङ्गस्य लघु शीतमतोऽन्यथा ॥ १५२ ॥ गुर्वी त्वगस्य कटुका मारुतस्य च नाशिनी । रोचनो दीपनो हृद्यः सुगन्धिस्त्वग्विवर्जितः ॥ १५३ ॥ कर्चूरः कफवातघ्नः श्वासहिक्कार्शसां हितः । मधुरं किंचिदम्लं च हृद्यं भक्तप्ररोचनम् ॥ १५४ ॥ दुर्जरं वातशमनं नागरङ्गफलं गुरु । वातामाभिषुकाक्षोट-मकूलक-निकोचकाः ॥ १५५ ॥ गुरूष्णस्निग्धमधुराः सोष्माणो बलप्रदाः । वातघ्ना बृंहणा वृष्याः कफपित्ताभिवर्धनाः ॥ १५६ ॥ १. शतातकं, शतातकमिति च पाठौ ।
अ० २७] सूत्रस्थानम् ३४३
अ० २७] सूत्रस्थानम् ३४३
पियालमज्जा सदृशं विद्यादौष्ण्यं विना गुणैः ।
श्लेष्मलं मधुरं शीतं श्लेष्मातकफलं गुरु ॥ १५७ ॥
श्लेष्मलं गुरु विष्टम्भि चाक्षोटफलमग्निजित् ।
गुरूष्णं मधुरं रूक्षं१ केशघ्नं च शमीफलम् ॥ १५८ ॥
विष्टम्भयति कारञ्जं पित्तश्लेष्माविरोधि च ।
आम्रातकं दन्तशठमम्लं सकरमर्दकम् ॥ १५९ ॥
रक्तपित्तकरं विद्यादैरावतकमैव च ।
वातघ्नं दीपनं चैव वार्त्ताकं कटुतिक्तकम् ॥ १६० ॥
वातलं कफपित्तघ्नं विद्यात्पर्यटकीफलम् ।
पित्तश्लेष्मघ्नमम्लं च वातलं चाक्षिकीफलम् ॥ १६१ ॥
मधुराण्यनुपाकीनि वातपित्तहराणि च ।
अश्वत्थोदुम्बर-प्लक्ष-न्यग्रोधानां फलानि च ॥ १६२ ॥
कषायमधुराम्लानि वातलानि गुरूणि च ।
भल्लातकास्थ्यग्निसमं त्वङ्मांसं स्वादु शीतलम् ।
पञ्चमः फलवर्गोऽयमुक्तः प्रायोपयोगिकः ॥ १६३ ॥
फलवर्ग—पकी हुई किशमिश प्यास, जलन, ज्वर, श्वास, रक्त-पित्त, उरः-
क्षत, क्षय, वातपित्त, उदावर्त्त, स्वरभेद, मदात्यय, मुख की कटुता मुखशोष और
और कास को शीघ्र नष्ट करती है। यह बृंहणी पुष्टिकारक, वृष्य, मधुर, स्निग्ध
शीतल है। खजूर-मधुर, पुष्टिकारक, शुक्रवर्धक, गुरु शीतल, क्षय, चोट लगने,
जलन और वात-पित्त रोग में हितकारी है। फल्गु (अंजीर), तृप्तिकारक,
बृंहण, गुरु, विष्टम्भी और शीतल है। फालसा और महुआ वात-पित्त रोग में
उत्तम है। आम्रात (आमड़ा) मधुर, पुष्टिकारक, बलकारक, तृप्तिकारक,
गुरु, स्निग्ध, कफकारक, शीतल, वृष्य और पेट में अफारा करता है। तालके
फल (ताड़फल) और पका हुआ नारियल बृंहण, स्निग्ध, शीतल, बलकारक
और मधुर होते हैं।
भव्य (कमरख) मधुर, अम्ल-कषाय, विष्टम्भि, गुरु, शीतल, पित्तश्लेष्म-
कारक, स्तम्भक और मुख को शोधन करता है। खट्टा फालसा, द्राक्षा, झाड़ी के
बेर, आरुक (आडू या आलूबुखारा), ये पित्तकफ को कुपित करने वाले हैं।
इसी प्रकार बेर और लकुच (बढ़ो), भी पित्त-कफकारक है। आरुक (आलु-
बुखारा) बहुत गरम नहीं, स्वादुमधुर और खाने में स्वादिष्ट, बृंहण पुष्टिकारक,
१. 'शीतं' इति च पाठः ।
३४४ चरकसंहिता [ अ० २७ जल्दी पच जाता है, बहुत अधिक दोषों को नहीं बढ़ाता। पारावत (कामरूप में प्रसिद्ध है) दो प्रकार का है। मधुर और अम्ल। इनमें मधुर शीतल और अम्ल, उष्ण गुरु, अरुचि और अग्नि की तीक्ष्णता को नाश करता है। काश्मरी ( गम्भारी ) का फल लगभग कमरख के फल के समान है, इसी प्रकार खट्टे फाळसे के समान तूद ( औत्तरपथिक शहतूत ) भी है। टंक का फल कषाय मधुर, वातल, गुरु और शीतल है। कच्चा कैथ कण्ठ ( स्वर ) को नाश करने वाला ( स्वर बिठानेवाला ), विषनाशक, आम का संग्राहक, वायुकारक है। पका हुआ कैथ मधुर-अम्लकषाय रस एवं सुगन्धित होने से खाने में रुचिकर और अच्छी तरह पक जाने पर दोषनाशक, विषनाशक, संग्राही और गुरु है। पका हुआ बेल पचने में दुर्जर, दोषकारक, बहुत दुर्गन्धयुक्त वायु पैदा करने वाला है। कच्चा बेल स्निग्ध, उष्ण, तीक्ष्ण, अग्निदीपक, कफ- वायुनाशक है। कच्चा आम (गुठली बैठने से पहिले) रक्तपित्तकारक, पित्तका- रक है। पकने पर आम वायुनाशक, मांस शुक्र और बलवर्द्धक है। पका हुआ जामुन कषाय मधुर रस, गुरु विष्टम्भी, शीतल, कफ-पित्तनाशक संग्राही और वायुकारक है। बेर-मधुर, स्निग्ध, रेचक, वात-पित्तनाशक है, सूखा बेर कफ-वातनाशक और पित्त के लिये अविरोधी है, पित्त का प्रकोप नहीं करता। सिञ्चितिका (सेव, सफरज़ंद) कषाय, मधुररस, शीतल, संग्राही है। गांगेरन ( नागबला ) और करीर (करौंदा), कन्दूरी, तोदन और धाय के फल मधुर-कषाय, शीतल, पित्त-कफनाशक हैं। पका हुआ कटहल, केला और राजादन ( खिरनी ) स्वादु, कषाय, स्निग्ध, शीतल, गुरु हैं। छबकी का फल ( हरफारेवड़ी ) कषाय और विशद एवं सुगन्धित होने से रुचिकर हृद्य, वायुकारक तथा अवदंशक्षम ( इस फलको खाकर दूसरे वस्तुओंमें रुचि होती) है, नीप ( कदम्ब ), शताह्व ( शरका ), पीलु, तृणधान्य ( केतकी फल ), विकङ्कत, प्राचीन आमलक, दोषनाशक और विषनाशक हैं। इंगुद (हिंगोट) का फल तिक्त मधुर स्निग्ध, उष्ण और कफवातनाशक है। तिन्दुक- फल ( तेन्दू ), कफ-पित्तनाशक कषाय, मधुर और लघु है। आंवले में लवण रस को छोड़कर और सब रस हैं और स्वेद मेद, कफ, उत्क्लेद (वमन की रुचि) और पित्त के रोगों को नष्ट करता है, रूक्ष, स्वादु, कषाय, अम्ल, कफ-पित्तना- शक है। विभीतक ( बहेड़ा ), रस, रक्त, मांस, मेदजन्य रोगों को नष्ट करती है स्वर भेद, कफ के उत्क्लेद, तथा पित्त रोग नाशक है। खट्टा अनार कषाय, मधुर, वातनाशक, संग्राही, अग्निदीपक, स्निग्ध और उष्ण है, तथा हृदय के
अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३४५
अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३४५ लिये रुचिकर कफपित्त का अविरोधी (प्रकोपक नहीं) रूक्ष है। मीठा अनार पित्तनाशक है इन सब में खट्टा अनार श्रेष्ठ है। वृक्षाम्ल (कोकम) संग्राही, रूक्ष, उष्ण, वात-कफ में प्रशस्त है। अम्लिका (इमली) का फल पकने पर लगभग कोकम के समान गुणवाला होता है। अम्लवेतस का गुण भी इसी प्रकार है, परन्तु रेचक है। मातुलुंग (बिजौरे निम्बू) का केशर शूल, अरुचि, विबन्ध, मन्दाग्नि, मदात्यय, हिक्का, कास, श्वास, वमन, मल सम्बन्धी रोगों में और तथा वातकफ-जन्य रोगों में प्रशस्त और लघु है। इसकी छाल, गिरी आदि गुरु और वात-प्रकोपक है। बिना छाल का खजूर रोचक, अग्निदीपक, हृदय के लिये हितकारी, सुगन्धित, कफ-वातनाशक, श्वास, हिचकी और अर्श रोग में हितकारी है। नारंगी का फल—मधुर, कुछ खट्टा, हृद्य, खाने में रुचिकर, पचने में दुर्जर, वातनाशक और गुरु है। बादाम, अभिषुक् (पिस्ता), अखरोट, मकूकक, निकोच, गुरु, उष्ण स्निग्ध, मधुर, शक्तिवर्धक, वायुनाशक, पुष्टिदायक और कफ-पित्त को बढ़ाने वाला है। इनमें पियाल के गुण भी इसी के समान हैं, परन्तु वह उष्ण नहीं है। श्लेष्मातक (लसूड़े) का फल कफकारक, मधुर, शीतल, गुरु है। अंकोटक का फल कफकारक, गुरु, विष्टं भी और अग्निनाशक है। शमी (जंडी) का फल गुरु, उष्ण, मधुर, शीतल और बालों का नाश- कारक है। करंज का फल विष्टम्भी और वात-कफ के लिये अविरोधी है। आम्रातक, दन्तशठ (निम्बू, खट्टा), करौंदा और ऐरावत ये रक्त- पित्तनाशक हैं। वार्त्ताक, वातनाशक, अग्निदीपक, कटुतिक्त रस है। पित्तपापडे का फल वायुकारक और कफ-पित्तनाशक है। आखिकी-फल पित्त-कफनाशक, खट्टा और वायुकारक है। पीपल, गूलर, पिलखन, बड़ इनके फल पकने पर मधुर और वात-पित्तनाशक हैं। कच्चे फल कषाय मधुर, अम्ल, वायुकारक और गुरु हैं। भिलावे का फल अग्नि के समान (छाले डालने वाला) है, भिलावे की छाल, मज्जा स्वादु, शीतल है। इस प्रकार से उपयोगी पांचवां फलवर्ग भी कह दिया है ॥ १२३-१६३ ॥ इति फलवर्गः ।
अथ हरितवर्गः । रोचनं दीपनं हृद्यमार्द्रकं विश्वभेषजम् । वातश्लेष्मविबन्धेषु रसस्तस्योपदिश्यते ॥ १६४ ॥
३४६ • चरकसंहिता [ सू० २७ रोचनो दीपनस्तीक्ष्णः सुगन्धिर्मुखशोधनः । जम्बीरः कफवातघ्नः कृमिघ्नो भुक्तपाचनः ॥ १६५ ॥ बालं दोषहरं, वृद्धं त्रिदोषं, मारुतापहम् । स्निग्धसिद्धं, विशुष्कं तु मूलकं कफवातजित् ॥ १६६ ॥ हिक्का-कास-विष-श्वास-पार्श्व-शूल-विनाशनः । पित्तकृत्कफवातघ्नः सुरसः पूतिगन्धहा ॥ १६७ ॥ यवानी चार्जकञ्चैव शिग्रुशालेयमृष्टकम् । हृद्यान्यास्वादनीयानि पित्तमुत्क्लेशयन्ति च ॥ १६८ ॥ गण्डीरो जलपिप्पल्यस्तुम्बुरुः शृङ्गवेरिका । तीक्ष्णोष्ण-कटु-रूक्षाणि कफवातहराणि च ॥ १६९ ॥ पुंस्त्वघ्नः कटुरूक्षोष्णो भूस्तृणो वक्त्रशोधनः । खराश्वा कफवातघ्नी बस्तिरोगरुजापहा ॥ १७० ॥ धान्यकं चाजगन्धा च सुमुखश्चेति रोचनाः । सुगन्धना नातिकटुका दोषानुत्क्लेशयन्ति च ॥ १७१ ॥ ग्राही गृञ्जनकस्तीक्ष्णो वातश्लेष्मार्शसां हितः । स्वेदनेऽभ्यवहार्ये च योजयेत्तमपित्तिनाम् ॥ १७२ ॥ श्लेष्मलो मारुतघ्नश्च पलाण्डुर्न च पित्तनुत् । आहारयोगी बल्यश्च गुरुर्वृष्योऽथ रोचनः ॥ १७३ ॥ कृमि-कुष्ठ-किलासघ्नो वातघ्नो गुल्मनाशनः । स्निग्धश्चोष्णश्च वृष्यश्च लशुनः कटुको गुरुः ॥ १७४ ॥ शुष्काणि कफवातघ्नान्येतान्येषां फलानि च । हरितानामयं चैषां षष्ठो वर्गः समाप्यते ॥ १७५ ॥ हरितवर्ग—आर्द्रक (अदरक) रोचक, अग्निदीपक, वीर्यवर्धक है। इस का रस वात-कफजन्य अवरोधों में गुणकारी है। नीम्बू, रुचिकारक, दीपक, तीक्ष्ण, सुगन्धित, मुख को साफ करने वाला, कफ-वातनाशक, कृमिनाशक और अन्न का पाचक है। कच्ची मूली दोषनाशक है और बढ़ने पर (पक- जाने पर) त्रिदोषकारक है, स्निग्ध और सिद्ध (पकाई हुई) मूली वायु- नाशक, सूखी मूली कफ-वातनाशक है १। तुलसी-हिचकी, कास, विष, श्वास, पार्श्वशूल का नाश करती तथा पित्तकारक, कफ- वायुनाशक एवं शरीर तथा ( १. मूली—यावद्धि चाव्यक्तरसान्वितानि, नवप्ररूढानि च मूलकानि । ) तावल्लघु दीपदानि पित्तानिलश्लेष्महराणि चैव ॥
अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३४७ अन्न के दुर्गन्ध को नष्ट करती है। अजवायन, अर्जक ( अजपका ), शोभा- ञ्जन, शालेयमुष्टक और राई ये हृदय को प्रिय और स्वादिष्ठ तथा पित्तवर्धक हैं। गण्डीर ( लाल और श्वेत भेद से दो प्रकार का है, यहां पर लाल का ग्रहण है और श्वेत को शाकवर्ग में कह दिया है ), जल पिप्पली, तुम्बरु, गोजिह्वा ( गाज़बां ) ये तीक्ष्ण, उष्ण, कटु, रूक्ष, कफ-वायुनाशक हैं। भूस्तृण ( गन्ध- तृण ), पुरुषत्वनाशक, कटु, रूक्ष, उष्ण और मुख का शोषक है। खराश्वा ( कालाजीरा ) कफ-वातनाशक, बस्तिरोग और बस्तिशूलनाशक है। धनिया, अजवायन, सुमुखा ( तुलसी भेद ), रोचक, सुगन्धि बहुत कटु नहीं और दोषों को उत्तेजित करते हैं। गाजर ( गृञ्जन ) या शलजम संग्राही, तीक्ष्ण, वात-कफ अर्श रोग में हितकारी, स्वेदन कार्य में हितकारी है, इसका उपयोग पित्त जहां न बढ़ा हो वहां पर करना चाहिये। पलाण्डु ( प्याज़ ) कफकारक, वायुनाशक है, परन्तु पित्त नाशक नहीं है, भोजन में उपयोगी, बलकारक, गुरु, वृष्य और रुचिकर है। लहसुन कृमि, कुष्ठ, किलास रोग- नाशक, वायुनाशक, गुल्मनाशक, स्निग्ध और उष्ण, वीर्यवर्धक, कटु, और गुरु है। ये सब सूखे होने पर तथा इनके फल कफ-वायु नाशक हैं। यह छठा हरितवर्ग समाप्त हुआ। हरितवर्ग की वस्तुवें प्रायः हरी कच्ची ही बरती जाती हैं; इस लिये इसे हरितवर्ग कहते हैं-जैसे आजकल सलाद, प्याज टमाटर कच्चे खाने का रिवाज़ है ॥ १६४-१७५ ॥ इति हरितवर्गः। अथ मद्यवर्गः। प्रकृत्या मद्यमम्लोष्णमम्लं चोक्तं विपाकतः। सर्वं सामान्यतस्तस्य विशेष उपदेक्ष्यते ॥ १७६ ॥ कृशानां सक्तमूत्राणां ग्रहण्यर्शोविकारिणाम्। सुरा प्रशस्ता वातघ्नी स्तन्यरक्तक्षयेषु च ॥ १७७ ॥ हिक्का-श्वास-प्रतिश्याय-कास-वर्चो-प्रहारुचौ। वम्यानाहविबन्धेषु वातघ्नी मदिरा हिता ॥ १७८ ॥ शूल-प्रवाहिकाटोप-कफ-वातार्शसां हितः। जगलो ग्राहिरूक्षोष्णः शोफघ्नो भुक्तपाचनः ॥ १७९ ॥ शोफार्शो-ग्रहणीदोष-पाण्डुरोगाकबिज्वरान्। हन्त्यरिष्टः कफकृतान् रोगान् रोचनदीपनः ॥ १८० ॥
३४८ चरकसंहिता [ अ० २७ मुखप्रियः सुखमदः सुगन्धिर्बस्तिरोगनुत् । जरणीयः परिणतो हृद्यो वर्ण्यश्च शार्करः ॥ १८१ ॥ रोचनो दीपनो हृद्यः शोषशोफार्शसां हितः । स्नेह-श्लेष्म-विकारघ्नो वर्ण्यः पक्वरसो मतः ॥ १८२ ॥ जरणीयो विबन्धघ्नः स्वरवर्णविशोधनः । कर्शनः शीतरसिको हितः शोफोदरार्शसाम् ॥ १८३ ॥ सृष्टभिन्नशकृद्वातो गौडस्तर्पणदीपनः । पाण्डुरोगव्रणहितो दीपनी चाक्षिकी मता ॥ १८४ ॥ सुरासवस्तीव्रमदो वातघ्नो वदनप्रियः । छेदी मध्वासवस्तीक्ष्णो मैरेयो मधुरो गुरुः ॥ १८५ ॥ धातक्याभिषुतो हृद्यो रूक्षो रोचनदीपनः । माध्वीकवन्न चात्युष्णो मृद्वीकेक्षुरसासवः ॥ १८६ ॥ रोचनं दीपनं हृद्यं बल्यं पित्ताविरोधि च । विबन्धघ्नं कफघ्नं च मधु लघ्वल्पमारुतम् ॥ १८७ ॥ सुरा समण्डा रूक्षोष्णा यवानां वातपित्तला । गुर्वी जीर्यति विष्टभ्य श्लेष्मला तु मधूलिका ॥१८८॥ दीपनं जरणीयं च त्पाण्डुकृमिरोगनुत् । ग्रहण्यार्शोहितं भेदि सौवीरकतुषोदकम् ॥ १८९ ॥ दाहज्वरापहं स्पर्शात्पानाद्वातकफापहम् । विबन्धश्रमविध्वंसि दीपनं चाम्लकाञ्जिकम् ॥ १९० ॥ प्रायशोऽभिनवं मद्यं गुरु दोषसमीरणम् । स्रोतसां शोधनं जीर्णं दीपनं लघु रोचनम् ॥ १९१ ॥ हर्षणं प्रीणनं बल्यं भय-शोक श्रमापहम् । प्रागल्भ्य-वीर्य-प्रतिभा-तुष्टि-पुष्टि-बल-प्रदम् ॥ १९२ ॥ सात्त्विकैर्विधिवद्युक्त्या पीतं स्यादमृतं यथा । वर्गोऽयं सप्तमो मद्यमधिकृत्य प्रकीर्तितः ॥ १९३ ॥ मद्यवर्ग—स्वभाव से मद्य लघु, उष्ण है, वह रस में अम्ल नहीं, विपाक में अम्ल है । पीने पर दांत खट्टे होजाते हैं, मुख से स्राव होता है इसलिये अम्ल¹ है । यह बात सब मद्यों में समान है, विशेष रूप से आगे कहते हैं— • सुरा ( अनुद्धतमण्ड ) कृश पुरुषों के लिये, मूत्र रुक जाने पर, ग्रहणी, अर्श- १. मद्य-सर्वेषां मद्यमम्लानामुपर्य्युपरि वर्त्तते ॥सु०॥
अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३४६
अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३४६ रोग में हितकारी, वायुनाशक तथा स्तन्य (दूध) और रक्तक्षय में उपकारी है। मदिरा (सुरामण्ड) हिचकी, श्वास, प्रतिश्याय, कास, मलाबरोध, अरुचि, वमन, अफारा, विबन्ध में हितकारी एवं वायुनाशक है। जगल (अन्न से बनी सुरा) शूल, प्रवाहिका, अफारा, कफ-वायु और अर्शरोग में हितकारी संग्राही, रूक्ष, उष्ण, शोफनाशक और अन्न को पचाने वाली है। अरिष्ट (औषध क्वाथ से सम्पादित) शोष, अर्श, ग्रहणी, पाण्डु, अरुचि, ज्वर एवं कफजन्य रोगों को नष्ट करता है, रोचक और अग्निवर्धक है। शर्कर (शर्करा का प्राकृतिक आसव) खाने में प्रिय, सुखपूर्वक नशा करने वाला, सुगन्धित, बस्तिरोगनाशक जीर्ण होकर पचने वाला. हृदय को प्रिय, वर्ण, कान्तिकारक है। पक्व रस (गन्ने के रस को पका कर बनाने पर) रोचक, अग्निदीपक, हृद्य, शोष, शोफ, अर्श रोग में हितकारी, स्नेह-श्लेष्मा के रोगों का नाशक और कान्तिकारक है। शीत रस (गन्ने के अपक्व रस से बनाया) लाघवकारक, विबन्धनाशक, स्वर वर्ण को साफ करने वाला, लेखन, शोफ, उदर, अर्श रोग में हितकारी है। गौड (गुड़ से बना) मद्य रेचक, वायु का अनुलोमक, तृप्तिकारक और अग्निवर्धक है। बहेड़े का मद्य पाण्डुरोग, व्रण में हितकारी और दीपक है। सुरासव (सुरा को ही पानी के स्थान पर जहाँ व्यवहार करें) तीव्र मदकारी, वायु- नाशक, मुख और शरीर के लिये प्रिय है। महुवे के फूलों से बना आसव छेदक और तीक्ष्ण है, मैरेय १ मधुर और गुरु है। धाय के फूलों से बना आसव हृद्य, रूक्ष, रोचक और दीपक है। मृद्वीका रस और गन्ने के रस को मिलाकर तैयार किया हुआ आसव माध्वीक से बने आसव के समान गरम नहीं, रोचक, दीपक, हृद्य, बलकर और पित्त के लिये अविरोधी है। मधु प्रधान आसव विबन्धना- शक, कफनाशक, लघु और थोड़ी वायुकारक है। मण्ड के साथ सुरा (यव- तण्डुलों से बनी) रूक्ष, उष्ण, वात-पित्तकारक है। मधूलक (गेहूँ से बनी मद्य) गुरु, पेट में अफारा करके जीर्ण होती है, कफकारक है। धान्य-तुष से बनी कांजी दीपक, लघु, हृदय पांडु, कृमि, रोगनाशक, ग्रहणी, अर्शरोग में हितकारी और रेचक है। खट्टी कांजी के पीने से दाह, ज्वर नष्ट होता है, वात-कफ- नाशक, विबन्धनाशक, अविदांही, दीपक है। नवीन मद्य प्रायः गुरु और दोष प्रकोपक होता है। पुराना २ मद्य स्रोतों का शोधक, दीपक, लघु, रुचिकर, हर्षों- १. मैरेय—'आसवस्य सुरायाश्च द्वयोरेकत्र भाजने । सन्धानं तद् विजानीयान् मैरेयमुभयाश्रयम् ॥' २. एक वर्ष के पीछे शराब पुरानी मानी जाती है ।
इति मद्यवर्गः।
३५० चरकसंहिता [ अ० २७ त्पादक, पुष्टिदायक, बलकारक, भय, शोक, श्रम को मिटाने वाला है। सात्त्विक विधिपूर्वक सेवन किया हुआ मद्य अमृत के समान होता है, यह मद्य अत्यन्त वीर्यप्रद, प्रतिभा, प्रसन्नता, पुष्टिबल को देता है। यह सातवां मद्यवर्ग समाप्त हुआ ॥ १७६-१६३ ॥ इति मद्यवर्गः। अथ जलवर्गः । जलमेकविधं सर्वं पतत्यैन्द्रं नभस्तलात् । तत्पतत्पतितं चैव देशकालावपेक्षते ॥ १६४ ॥ खात्पतत्सोमवाय्वर्कैः स्पृष्टं कालानुवर्तिभिः । शीतं शुचि शिवं मृष्टं विमलं लघु षड्गुणम् । प्रकृत्या दिव्यमुदकं, भ्रष्टं पात्रमपेक्षते । १६६ ॥ श्वेते कषायं भवति पाण्डुरे चैव तिक्तकम् । कपिले क्षारसंमृष्टमूषरे लवणान्वितम् । कटु पर्वतविस्तारे मधुरं कृष्णमृत्तिके ॥ १६७ ॥ एतत्षाड्गुण्यमाख्यातं महीस्थस्य जलस्य हि । तथाऽव्यक्तरसं विद्यादैन्द्रं कारं हिमं च यत् ॥ १६८ ॥ यदन्तरीक्षात्पततीन्द्रसृष्टं चोक्तैश्च पात्रैः परिगृह्यतेऽम्भः तदैन्द्रमित्येव वदन्ति धीरा नरेन्द्रपेयं सलिलं प्रधानम् ॥ १६६ ॥ श्रुतावृताबिह ख्याताः सर्व एवाम्भसो गुणाः । ईषत्कषायमधुरं सुसूक्ष्मं विशदं लघु ॥ २०० ॥ अरूक्षममभिष्यन्दि सर्वं पानीयमुत्तमम् । गुर्वभिष्यन्दि पानीयं वार्षिकं मधुरं नवम् ॥ २०१ ॥ तनु लघ्वनभिष्यन्दि प्रायः शरदि वर्षति । तत्त ये सुकुमाराः स्युः स्निग्धभूयिष्ठभोजनाः ॥ २०२ ॥ तेषां भोज्ये च भक्ष्ये च लेह्ये पेये च शस्यते । हेमन्ते सलिलं स्निग्धं वृष्यं बलहितं गुरु ॥ २०३ ॥ किंचित्ततो लघुतरं शिशिरे कफवातजित् । कषायमधुरं रूक्षं विद्याद्वासन्तिकं जलम् ॥ २०४ ॥ ग्रैष्मिकं त्वनभिष्यन्दि रूपमित्येष निश्चयः । विभ्रान्तेषु तु कालेषु यत्प्रयच्छन्ति तोयदाः ॥ २०५ ॥