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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

६० चरकसंहिता [ अ० ६ व्यायाम उबटन, धूमपान, कवल (गरारे करना) और अञ्जन लगाना चाहिये । स्नान एवं शौच कार्य में गरम पानी का व्यवहार करना चाहिये (पीनेमें नहीं)। शरीर पर चन्दन और अगर का लेप करना चाहिये, जौ और गेहूँ, शरभ बारहसींगे, खरगोश, हरिण, बटेर, कपिञ्जल (कट फोड़ा) इनका मांस खाना चाहिये । कफ दोष नाशक सीधु या अंगूरों का बना शराब पीना चाहिये । वसन्त काल में युवती स्त्रियों और जङ्गलों में मनोरंजन करे ॥ २२-२६ ॥ ग्रीष्मचर्या- मयूखैर्जगतः सारं ग्रीष्मे पेपीयते रविः । स्वादु शीतं द्रवं स्निग्धमन्नपानं तदा हितम् ॥ २७ ॥ शीतं सशर्करं १मन्थं जाङ्गलाम्मृगपक्षिणः । घृतं पयः सशाल्यन्नं भजन् ग्रीष्मे न सीदति ॥ २८ ॥ मद्यमल्पं न वा पेयमथवा सुबहुदकम् । लवणाम्ल-कटूष्णानि व्यायामं चात्र वर्जयेत् ॥ २९ ॥ दिवा शीतगृहे निद्रां निशि चन्द्रांशुशीतले । भजेच्चन्दन-दिग्धाङ्गः प्रवातं हर्म्यमस्तके ॥ ३० ॥ व्यजनैः पाणिसंस्पर्शैश्चन्दनाेदक-शीतलैः । सेव्यमानो भजेदास्यां मुक्तामणि-विभूषितः ॥ ३१ ॥ काननानि च शीतानि जलानि कुसुमानि च । ग्रीष्मकाले निषेवेत मैथुनाद्विरतो नरः ॥ ३२ ॥ ग्रीष्म ऋतु में सूर्य अपनी किरणों द्वारा संसार का सार खींचता रहता है । इसलिये इस समय मीठा, ठण्डा द्रव पदार्थ पीना, चिकने (घी आदि) खान पान हितकारी हैं। ठण्ड और शर्करा मिश्रित सत्तू खाने से, जंगली पशु- पक्षियों का मांस खाने से, घी और दूध के साथ चावल खाने से ग्रीष्म ऋतु में कष्ट नहीं होता । इस ऋतु में मद्य नहीं पीना चाहिये और यदि पीना ही हो तो बहुत पानी मिलाकर पीना चाहिये । नमकीन, खट्टे, कडुवे और गरम रस पदार्थ तथा व्यायाम इस ऋतु में छोड़ देना चाहिये । दिन के समय ठण्डे मकानों में सोना चाहिये और रात में चन्द्रमा की किरणों से ठण्डी की हुई मकान की छत पर खुली वायु में शरीर पर चन्दन मलकर सोना चाहिये । चन्दन और पानी से ठण्डे किये हुए पङ्खों से या हाथ के स्पर्श से, मोती और १ मन्थ—सक्तवः सर्पिषा युक्ताः शीत-वारि-परिप्लुताः । नात्यच्छा नातिसान्द्राश्च मन्थ इत्यभिधीयते ॥

अ० ६ ] सूत्रस्थानम् ६१

अ० ६ ] सूत्रस्थानम् ६१ मणियों से शोभित होकर पलंग पर सोये । जङ्गलों को, ठण्डे पानी ( झरने आदि ) को और फूलों को ग्रीष्म काल में सेवन करे। ग्रीष्म ऋतु में मैथुन से अलग रहे ॥ २७-३२ ॥ वर्षा काल की ऋतुचर्या— आदान-दुर्बले देहे पक्ता भवति दुर्बलः । स वर्षास्वनिलादीनां दूषणैर्बाध्यते पुनः ॥ ३३ ॥ भू-बाष्पाम्भेघ-निष्यन्दात्पाकादम्लाज्जलस्य च । वर्षास्वग्निबले क्षीणे कुप्यन्ति पवनादयः ॥ ३४ ॥ तस्मात्साधारणः सर्वो विधिर्वर्षामु शस्यते । उदमन्थं दिवास्वप्नमवश्यायं नदीजलम् ॥ ३५ ॥ व्यायाममातपं चैव व्यवायं चात्र वर्जयेत् । पान-भोजन-संस्कारान् प्रायः क्षौद्रान्वितान् भजेत् ॥ ३६ ॥ व्यक्ताम्ल-लवण-स्नेहं वात-वर्षाकुलेऽहनि । विशेपशीते भोक्तव्यं वर्षास्वनिल-शान्तये ॥ ३७॥ अग्निं संरक्षणवता यव-गोधूम-शालयः । पुराणा जाङ्गलेर्मासैर्भाज्या यूषैश्च संस्कृतैः ॥ ३८ ॥ पिवेत्क्षौद्रान्वितं चाल्पं मार्द्वीकारिष्टमम्बु वा । माहेन्द्रं तप्तशीतं वा कौपं सारसमेव वा । प्रघर्षोद्वर्तन-स्नान-गन्ध-माल्य-परो भवेत् । लघुशुद्धाम्बरः स्थानं भजेदक्लेदि वार्षिकम् ॥ ४० ॥ आदान काल में शरीर के निर्बल होने से अग्नि भी निर्बल हो जाती है । यह अग्नि वर्षा ऋतु में वायु, पित्त, कफ तीनों के दूषणों से दूषित हो जाती है । ग्रीष्म ऋतु में प्रचण्ड सूर्य की गरमी से भूमि के तप जाने से, वर्षा में बरसात पड़ने से, पानी के स्पर्श से, भूमि में से गरम भाप के निकलने से तीनों दोष कुपित हो जाते हैं, इसी प्रकार बादलों के बरसने से वात, कफ कुपित होते हैं, जल के अम्लपाक होने से पित्त कुपित होता है । वर्षा ऋतु में अग्नि-बल के क्षीण होने से वात, पित्त कफ तीनों कुपित हो जाते हैं । इसलिये वर्षा में साधा- रण विधि का पालन करना चाहिये । पानी में घुला सत्तू, दिन में सोना, ओस, नदी का पानी, सम्भोग-मैथुन, धूप और व्यायाम इस ऋतु में नहीं सेवन करने

चाहियें। वर्षा काल में खान पान के अन्दर प्रायः करके शहद का उपयोग करना चाहिये। बरसात के दिनों में जिस दिन वायु और बरसात जोर का पड़ रहा हो और सर्दी बहुत हो, उस दिन वायु को शान्त करने के लिये अम्ल, लवण रस तथा स्नेह घी जिस अन्न में स्पष्ट दीखता हो, उसे विशेष करके खाना चाहिये। अग्नि की रक्षा करने के लिये जौ, गेहूँ, चावल (पुराने), जंगली- वन के पशुओं का मांस एवं घी आदि से संस्कृत यूष खाने चाहिये। पित्त को शान्त करने के लिये थोड़ा शहद मिला माध्वीकारिष्ट (द्राक्षासव), अथवा पानी में शहद (थोड़ा) मिलाकर पीना चाहिये। वर्षा ऋतु में या तो आकाश से गिरा स्वच्छ पानी पीना चाहिये अथवा कुएं या तालाब के पानी को गरम करके ठण्डा करके पीना चाहिये। तैल का मर्दन, उबटन लगाना, स्नान करना सुगन्ध धारण करना, माला पहिनना, हल्का और साफ़ वस्त्र पहिनना, तथा सूखे स्थान पर रहना चलना आदि कार्य वर्षा ऋतु में करना चाहिये ।।३३-४०।।

शरद् ऋतु की परिचर्या— वर्षा-शीतोचिताङ्गानां सहसैवार्करश्मिभिः । तप्तानामाचितं पित्तं प्रायः शरदि कुप्यति ॥ ४१ ॥ तत्रान्नपानं मधुरं लघु शीतं सतिक्तकम् । पित्त-प्रशमनं सेव्यं मात्रया सुप्रकाङ्क्षितैः ॥ ४२ ॥ लावान् कपिञ्जलान् हरिणानुरभ्राञ्छरभाञ्छशान् । शालीन् सयवगोधूमान् सेव्यानाहुर्घनात्यये ॥ ४३ ॥ तिक्तस्य सर्पिषः पानं विरेको रक्तमोक्षणम् । धाराधरात्यये कार्यमातपस्य च वर्जनम् ॥ ४४ ॥ वसां तैलमवश्यायमौदकानूपमामिषम् । क्षारं दधि दिवास्वप्नं प्राग्वातं चात्र वर्जयेत् ॥ ४५ ॥

वर्षा ऋतु में काल स्वभाव से संचित हुआ पित्त शरद् काल में बादलों के हट जाने से, सूर्य के किरणों के ताप से सहसा कुपित होता है। इसलिये इस ऋतु में मधुर, लघु, शीत और तिक्त, पित्तशामक खान पान परिमाण में खाना चाहिये। बटेर, कटफोड़ा, हरिण, मेढ़ा, बारहसींगा और खरगोश इनका मांस, चावल, जौ, गेहूँ इनको शरद् काल में खाना चाहिये। तिक्त औषधियों से संस्कृत घृत (पंचतिक्त घृत), विरेचन, रक्तमोक्षण, शिरावेध, जोंक आदि से रक्त का निकलवाना और धूप का सेवन न करना ये काम बादलों के चले जाने पर शरद् ऋतु में करने चाहिये। इस ऋतु में चर्बी, तेल, ओस, जलचर प्राणि...

अ० ६ ] सूत्रस्थानम् ६३

अ० ६ ] सूत्रस्थानम् ६३ का मांस, क्षार, दही दिन में सोना सामने मे आती हुई वा पुरवा वायु का त्याग करना चाहिये । ४१-४५ ॥ हंसोदक का लक्षण— दिवा सूर्यांश-सन्तप्तं निशि चन्द्रांशु-शीतलम् । कालेन पक्वं निर्दोषमगस्त्येनाविषीकृतम् ॥ ४६ ॥ हंसोदकमिति ख्यातं शारदं विमलं शुचि । स्नानपानावगाहेषु हितमम्बु यथाऽमृतम् ॥ ४७ ॥ शारदानि च माल्यानि वासांसि विमलानि च । शरत्काले प्रशस्यन्ते प्रदोषे चेन्दुरश्मयः ॥ ४८ ॥ दिन में सूर्य की किरणों से गरम और रात्रि मे चन्द्रमा की शीतल किरणों से ठण्डा होने वाला कालस्वभाव से पका हुआ अर्थात् वर्षा का जल जिसमें न रहा हो; इससे दोष रहित; अगस्त्य नक्षत्र के उदय होने के प्रभाव से निर्मल, ( विष रहित ) पानी को हंसोदक ( चन्द्रार्क ) कहते हैं । यह हंसोदक शरद् ऋतु में निर्मल और पवित्र है । इसलिये स्नान कार्य मे, पीने मे, अवगाहन, पानी में बैठने आदि कार्यों मे उत्तम और अमृत के समान है । शरत्काल में रात्रि के प्रथम प्रहर में चन्द्रमा की किरणों का सेवन करना तथा शरत् कालीन मालायें, और निर्मल वस्त्र प्रशस्त हैं ॥ ४६-४८ ॥ इत्युक्तमृतुसात्म्यं यच्चेष्टाऽऽहार-व्यपाश्रयम् । उपशेते यदौचित्यादोकःसात्म्यं तदुच्यते ॥ ४६ ॥ देशनामामयानां च विपरीतगुणं गुणैः । सात्म्यमिच्छन्ति सात्म्यज्ञाश्चेष्टितं चायमेव च ॥ ५० ॥ ( चेष्टा ) क्रिया और आहार, खान विहार के आश्रित अर्थात् ऋतुओं के अनुकूल जो कर्म हैं, वे कह दिये । पुरुष की प्रकृति के अनुसार जो उचित अनुकूल पड़ता है, उसे 'ओकः-सात्म्य' कहते हैं । जो आहार या विहार देश ( जांगल आनूप और साधारण ) एवं रोग इनके गुणों से विपरीत, गुण वाले होते हैं उस आहार विहार को 'सात्म्य' को जानने वाले विद्वान् 'सात्म्य' कहते हैं ॥ ४६-५० ॥ तत्र श्लोकाः— ऋतावृत्तौ नृभिः सेव्यमसेव्यं यच्च किञ्चन । तस्याशितीये निर्दिष्टं हेतुमत्सात्म्यमेव च ॥ ५१ ॥ प्रत्येक ऋतु में मनुष्यों को क्या २ सेवन करना चाहिये और क्या २ नहीं

९४ चरकसंहिता [ अ० ७ सेवन करना चाहिये; तथा कारण रूपसात्म्य को भी इस 'तस्याशितीय' अध्याय में कह दिया ॥ ५१ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने स्वस्थवृत्तचतुष्के तस्याशितीयो नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥ अथ सप्तमोऽध्यायः । अथातो न वेगान्धारणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ मल मूत्रादि के उपस्थित वेगों को रोकने का प्रतिषेध करने के लिये 'न वेगान् धारणीय' नामक अध्याय का व्याख्यान करते हैं । जैसा भगवानात्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ न वेगान् धारयेद्धीमाञ्जातान्मूत्रपुरीषयोः । न रेतसो न वातस्य न वम्याः क्षवथोर्न च ॥ ३ ॥ नोद्गारस्य न जृम्भाया न वेगान् क्षुत्पिपासयोः । न बाष्पस्य न निद्राया निःश्वासस्य श्रमेण च ॥ ४ ॥ एतान् धारयतो जातान् वेगान् रोगा भवन्ति ये । पृथक्पृथक् चिकित्सार्थं तन्मे निगदतः शृणु ॥ ५ ॥ बुद्धिमान मनुष्य को चाहिये कि उपस्थित हुए मूत्र मल के वेगों को नहीं रोके । इसी प्रकार शुक्र, अपान आदि वायु, वमन, छींक, डकार, जम्भाई, भूख और प्यास, हर्ष या शोक के कारण उत्पन्न आंसू; नींद और श्रमजनित तीव्र प्रश्वास के वेगों को भी नहीं रोकना चाहिये । इन उपस्थित वेगों को रोकने से जो जो रोग होते हैं, उनकी चिकित्सा के लिये पृथक् पृथक् उपदेश करते हैं, सुनो। बस्ति-मेहनयोः शूलं मूत्रकृच्छ्रं शिरोरुजा । विनामो वङ्क्षणानाहः स्याल्लिङ्गं मूत्रनिग्रहे ॥ ६ ॥ मूत्र के उपस्थित वेगको रोकने से 'बस्ति' ( मूत्राशय ) और लिंग में दर्द होती है, मूत्र त्याग में कष्ट होता है, शिर में दर्द, मूत्र वेग के कारण खींच होने से शरीर झुक जाता है वंक्षण प्रदेश ( पेडू ) जकड़ा हुआ प्रतीत होता है, अथवा उस प्रदेश में फुलाव प्रतीत होता है ये लक्षण मूत्र के उपस्थित वेग को रोकने से होते हैं ॥ ६ ॥

अ० ७ ] सूत्रस्थानम् ६५

अ० ७ ] सूत्रस्थानम् ६५ इस की चिकित्सा— स्वेदावगाहनाभ्यङ्गान् सर्पिषश्चावपीडकम् । मूत्रे प्रतिहते कुर्यात् त्रिविधं बस्तिकर्म च ॥ ७ ॥ ( स्वेद ) पसीना देना, ( अवगाहन ) गरम पानी की नाद में बैठना, ( अभ्यंग ) तैल आदि मर्दन और घी का नस्य देना, तीन प्रकार का बस्ति कर्म ( निरूहण, अनुवासन और उत्तर बस्ति ) मूत्र के उपस्थित वेग को रोकने के प्रतीकार हैं ॥ ७ ॥ पक्वाशय-शिरःशूलं वात-वर्चो-निरोधनम् । पिण्डिकोद्वेष्टनाध्मानं पुरीषे स्याद्विधारिते ॥ ८ ॥ मल के उपस्थित वेग को रोकने से पक्वाशय अर्थात् नाभि के नीचे के भाग में और शिर में वेदना होती है, अपान वायु और मल बन्द हो जाते हैं, पिण्ड- लियों में ऐंठन होने लगती है, पेट में अफरा चढ़ जाता है ॥ ८ ॥ चिकित्सा— स्वेदाभ्यङ्गाऽवगाहाश्च वर्तयः बस्तिकर्म च । हितं प्रतिहते वर्चस्यन्नपानं प्रमाथि च ॥ ९ ॥ स्वेद पसीना देना, अभ्यंग, अवगाहन ( नांद या टब आदि में स्नान ), फलवर्ति, और बस्तिकर्म करे । विरेचन द्रव्यों का घी और तैल आदि द्वारा चूर्ण, क्वाथ, कल्कादि के रूप में बनाकर देना और वात को अनुलोमन करने वाली औषध मल के रोकने में हितकारी है ॥ ९ ॥ मेढे वृषणयोः शूलमङ्गमर्दो हृदि व्यथा । भवेत्प्रतिहते शुक्रे विबद्धं मूत्रमेव च ॥ १० ॥ वीर्य के उपस्थित वेग को रोकने से लिंग और अण्डकोषों में वेदना होती है, अंग टूटते हुए प्रतीत होते हैं, चेतना के स्थान हृदय में वेदना अनुभूत होती है और मूत्र भी बन्द हो जाता है ॥ १० ॥ चिकित्सा— तत्राभ्यङ्गावगाहश्च मदिरा चरणायुधाः । शालिः पयो निरूहाश्च शस्तं मैथुनमेव च ॥ ११ ॥ तैलमर्दन, अवगाहन स्नान ( द्रोणीस्नान ), मद्य, कुक्कुट का मांस, हेम- न्तिक धान्य, दूध, बस्तिकर्म और मैथुन कर्म ये शुक्र वेग के निरोध से उत्पन्न रोगों की चिकित्सा है ॥ ११ ॥ वात-मूत्र-पुरीषाणां सङ्गो ध्मानं क्लमो रुजा । जठरे वातजाश्चान्ये रोगाः स्युर्वातनिग्रहात् ॥ १२ ॥ अपान वायु के रोकने से, अपान वायु, मूत्र और पुरीष रुक जाते हैं ।

वातजन्य रोग भी हो जाते हैं ॥ १२ ॥ चिकित्सा—

६६ चरकसंहिता [ अ० ७ अफरा हो जाता है थकान की अंगों में प्रतीति होना, पेट में पीड़ा और अन्य वातजन्य रोग भी हो जाते हैं ॥ १२ ॥ चिकित्सा— स्नेह-स्वेद-विधिस्तत्र वर्तयो भोजनानि च । पानानि बस्तयश्चैव शस्तं वातानुलोमनम् ॥१३॥ स्नेह (तैल) एवं स्वेद देना चाहिये, फलवर्त्तियाँ, वातनाशक खान-पान और वातनाशक बस्तिकर्म उत्तम हैं ॥ १३ ॥ कण्डू-कोठ-रुचि-व्यङ्ग-शोथ-पाण्ड्वामय-ज्वराः । कुष्ठ-हृल्लास-वीसर्पच्छर्दि-निग्रहजा गदाः ॥ १४ ॥ वमन के रोकने से खाज, कोठ, भोजन में अनिच्छा, झांई, मुखपर काले- काले दाग आना, सूजन, पाण्डु रोग, ज्वर, कोढ़, हृल्लास (वमन की रुचि), जी मिचलाना, वीसर्प ये रोग उत्पन्न होते हैं ॥ १४ ॥ चिकित्सा— भुक्त्वा प्रच्छर्दनं धूमो लङ्घनं रक्तमोक्षणम् । रूक्षान्नपानं व्यायामो विरेकश्चात्र शस्यते ॥ १५ ॥ भोजन खिलाकर वमन कराना चाहिये, धूम्रपान, उपवास, शिराव्यधन करके रक्त का निकालना, रूखे अन्न और पान, व्यायाम और विरेचन ये उपाय उत्तम हैं ॥ १५ ॥ मन्यास्तम्भः शिरःशूलमर्दिताधार्धावभेदकौ । इन्द्रियाणां च दौर्बल्यं क्षवथोः स्याद्विधारणात् ॥ १६ ॥ छींक के रोकने से ग्रीवा का जकड़ जाना, शिरोवेदना, चेहरे का लकवा, आधा सीसी, आँख आदि इन्द्रियों की निर्बलता हो जाती है ॥ १६ ॥ तत्रोर्ध्वजत्रुकेऽभ्यङ्गः स्वेदो धूमः सनावनः । हितं वातघ्नमान्नं च घृतं चोत्तरभक्तिकम् ॥ १७ ॥ चिकित्सा—ग्रीवा से ऊपर के भागों में मालिश, पसीना देना, धूम्रपान नस्य, वातनाशक भोजन और खाना खानेके पीछे घृतपान करना हितकारी है ॥ हिक्का श्वासोऽरुचिः कम्पो विबन्धो हृदयोरसोः । उद्गार-निग्रहात्तत्र हिक्कायास्तुल्यमौषधम् ॥ १८ ॥ डकार को रोकने पर हिचकी का आना, श्वास, भोजन में अनिच्छा, सिर- छाती का काँपना, छाती और हृदय का रुक जाना ये रोग हो जाते हैं। चिकित्सा—डकार के रोकने से उत्पन्न विकार की शान्ति के लिये हिचकी के समान औषध करनी चाहिये ॥ १८ ॥ विनामाक्षेपसङ्कोचाः सुप्तिः कम्पः प्रवेपनम् । जृम्भाया निग्रहात्तत्र सर्वं वातघ्नमौषधम् ॥ १६ ॥

अ० ७ ] ७ सूत्रस्थानम् ८७

अ० ७ ] ७ सूत्रस्थानम् ८७ जम्भाई के रोकने से शरीर का झुकना, आक्षेप अर्थात् हाथ-पाँव का जोर से कम्पन, पर्वसन्धियों का आकुञ्चन, अङ्गों का सो जाना, ( स्पर्श ज्ञान का अभाव ), काँपना-हिलना आदि होता है। चिकित्सा के लिये वातनाशक उप- चार करना चाहिये ॥ १६ ॥ कार्श्य-दौर्बल्य-वैवर्ण्यमङ्गमर्दोऽरुचिर्भ्रमः । क्षुद्वेग-निग्रहात्तत्र स्निग्धमुष्णं लघु भोजनम् ॥ २० ॥ भूख रोकने से कृशता, दुर्बलता, रंग का बदल जाना, अङ्ग-प्रत्यङ्गों में वेदना, उनका टूटते हुए प्रतीत होना, भोजन में अनिच्छा, चक्कर आना ये लक्षण होते हैं। चिकित्सा—स्निग्ध ( चिकना ), गरम और हल्का भोजन देना चाहिये ॥ २० ॥ कण्ठास्य-शोषो बाधिर्यं श्रमः श्वासो हृदि व्यथा । पिपासा-निग्रहात्तत्र शीतं तर्पणमिष्यते ॥ २१ ॥ प्यास के रोकने से गले और मुख का खुश्क हो जाना, बहरापन, थकान, श्वास, दम का चढ़ना, हृदय प्रदेश में दर्द ये लक्षण होते हैं। चिकित्सा— शीतल, तृप्ति करनेवाले खान-पान देने चाहिये ॥ २१ ॥ प्रतिश्यायोऽक्षिरोगश्च हृद्रोगश्चारुचिर्भ्रमः । बाष्प-निग्रहात्तत्र स्वप्नो मद्यं प्रियाः कथाः ॥ २२ ॥ आँसुओं के रोकने से नाक से पानी झरना, कफ का स्राव होना, आँखों के रोग, हृदय रोग, अनिच्छा और भ्रम, (सिरमें चक्कर) आदि होते हैं। चिकित्सा— नींद, मदिरा का पान, आनन्ददायक प्रिय बातचीत करना चाहिये ॥ २२ ॥ जृम्भाऽङ्गमर्दस्तन्द्रा च शिरो-रोगाक्षि-गौरवम् । निद्रा-विधारणात्तत्र स्वप्नः संवाहनानि च ॥ २३ ॥ नींद रोकने से जम्भाई, अङ्गों का टूटना ( शरीर में भारीपन ), शिर की वेदना और आँखें भारी हो जाती हैं। चिकित्सा—नींद लाना, अङ्गों का संवा- हन अर्थात् हाथों से अङ्गों का दबाना कल्याणकारी है ॥ २३ ॥ गुल्म-हृद्रोग-संमोहाः श्रम-निश्वास-धारणात् । जायन्ते, तत्र विश्रामो वातघ्नाश्च क्रिया हिताः ॥ २४ ॥ थकान से उत्पन्न निःश्वास को रोकने से गुल्म रोग, हृद्-रोग, ( मूर्च्छा ) उत्पन्न होती है। इस के लिये विश्राम, ( आराम ) एवं वातनाशक उपचार करने चाहियें ॥२४॥

९८ चरकसंहिता [ अ० ७ वेग-निग्रहजा रोगा य एते परिकीर्त्तिताः। इच्छंस्तेषामनुत्पत्तिं वेगानेतान्न धारयेत् ॥ २५ ॥ उपस्थित वेगों को रोकने से उत्पन्न होने वाले जो ये रोग कहे हैं, रोगों की उत्पत्ति को न चाहने वाले व्यक्ति को चाहिये कि वह इन वेगों को न रोका करे ॥ २५ ॥ इमांस्तु धारयेद्वेगान् हितैषी प्रेत्य चेह च । साहसानामशस्तानां मनो-वाक्काय-कर्मणाम् ॥ २६ ॥ लोभ-शोक-भय-क्रोध-मान-वेगान् विधारयेत् । नैर्लज्ज्येष्र्यातिरागाणामभिध्यायाश्च बुद्धिमान् ॥ २७ ॥ परुषस्यातिमात्रस्य सूचकस्यानृतस्य च । वाक्यस्याकालयुक्तस्य धारयेद्वेगमुत्थितम् ॥ २८ ॥ देहप्रवृत्तिर्या काचिद्वर्तते परपीड़या । स्त्रीभोगस्तेय-हिंसाद्या तस्या वेगान्विधारयेत् ॥ २९ ॥ पुण्यशब्दो विपापत्वान्मनो-वाक्काय-कर्मणाम् । धर्मार्थकामान् पुरुषः सुखी भुङ्क्ते चिनोति च ॥ ३० ॥ इहलोक और परलोक की हित कामना करने वाले मनुष्य को चाहिये कि इन आगे कहे वेगों को धारण करे, जैसे—अयोग्य अनुचित साहस और मन वाणी और शरीर के निन्दित कर्मों के उपस्थित वेगों को रोके । मन के निन्दित कार्य जैसे—लोभ, अनुचित विषय में मन की प्रवृत्ति, ( शोक ) धन बान्धव आदि के कारण दुःख में मन की प्रवृत्ति, भय, क्रोध जिसके कारण मनुष्य अपने को जलता हुआ प्रतीत करता है, ( द्वेष ) वैर, दूसरे के अपकार करने में मन की प्रवृत्ति, ( मान ) महत्व, अभिमान में मन की प्रवृत्ति, ( जुगुप्सित ) दूसरे की निन्दा, ( निर्लज्जा ) लज्जा का अभाव, ( ईर्ष्या ) कुढ़ना, ( अभिध्या ) दूसरे के द्रव्य को लेने की लालसा-बुद्धि, इन मन के निन्दित कार्यों को रोकना चाहिये। वाणी के निन्दित कर्म—कर्कश, कठोर विशेषतः दूसरे की निन्दा या अनिष्ट करने की इच्छा से झूठी और अप्रासंगिक वाणी को रोकना चाहिये। शरीर के निन्दित कर्म—दूसरे को दुःख देने की जो कोई शरीर की चेष्टा हो, उसे स्त्री-भोग ( पर-स्त्रीसम्भोग ), स्तेय ( चोरी ), हिंसा ( दुःख कष्ट देना., मारना ) आदि शरीर कार्यों के उपस्थित वेगों को रोकना चाहिये। अपनी आत्मा के प्रतिकूल जो कार्य हों वे कार्य दूसरे के लिये न

अ० ७ ] सूत्रस्थानम् ६६

अ० ७ ] सूत्रस्थानम् ६६ करने चाहिये । मनुष्य मन वचन और शरीर से पापरहित होकर ही 'पुण्य' शब्द का भागी होता है । उसमें 'पुण्य' शब्द तभी सार्थक होता है और तभी वह धर्म, अर्थ और काम इनको प्राप्त करता है, और सुख का भी भोग कर सकता है ॥ २६-३० ॥ व्यायाम— शरीरचेष्टा या चेष्टा स्थैर्यार्था बलवर्धिनी । देह-व्यायाम-संख्याता मात्रया तां समाचरेत् ॥ ३१ ॥ लाघवं कर्म-सामर्थ्यं स्थैर्यं क्लेश सहिष्णुता । दोषक्षयोऽग्निवृद्धिश्च व्यायामादुपजायते ॥ ३२ ॥ जो शारीरिक चेष्टायें शरीर की स्थिरता, दृढ़ता के लिये शरीर के बल को बढ़ाने की इच्छा से की जाती हैं, उनको 'व्यायाम' कहते हैं । इस व्यायाम को 'मात्रा' में सेवन करना चाहिये । व्यायाम के गुण— व्यायाम करने से शरीर में हल्कापन, काम करने की शक्ति, शरीर एवं यौवन का टिकाऊपन, दुःख को सहन करने की शक्ति, वात आदि दोषों का शमन, जठराग्नि की प्रदीप्ति होती है ।॥३१-३२॥ अधिक व्यायाम से हानियां— श्रमः क्लमः क्षयस्तृष्णा रक्तपित्तं प्रतामकः । अतिव्यायामतः कासो ज्वरश्छर्दिश्च जायते ॥ ३३ ॥ शरीर का थकान, मन और इन्द्रियों का थकान धातुओं का क्षय, रक्तपित्त रोग, प्रतमक संज्ञक श्वास, खांसी, ज्वर और वमन .अधिक व्यायाम से उत्पन्न होते हैं ॥ ३३ ॥ व्यायाम-हास्य-भाष्याध्व-ग्राम्यधर्म-प्रजागरान् । नोचितानपि सेवेत बुद्धिमानतिमात्रया ॥ ३४ ॥ एतानेवविधांश्चान्यान् योऽतिमात्रं निषेवते । गजः सिंहमिवाऽऽकर्षन् सहसा स विनश्यति ॥ ३५ ॥ उचितादहिताद्धीमान् क्रमशो विरमेन्नरः । शरीर का परिश्रम, हँसना, ऊँचा या अधिक बोलना, ( मार्ग चलना सफर करना ), ग्राम्यधर्म, ( मैथुन ), प्रजागर ( रात को जागना ), इन उचित कार्यों को भी बुद्धिमान् मनुष्य अधिक मात्रा में सेवन न करे । इन ऊपर लिखे हुए या अन्य इसी प्रकार के कार्यों को जो मनुष्य अधिक सेवन करता है, जिस प्रकार कि हाथी सिंह, को खींचता हुआ मरता है, उसी प्रकार वह मनुष्य भी नष्ट हो जाता है । इसलिये बुद्धि-

मान् मनुष्य को चाहिये कि छोड़ने योग्य उन दुःखदायी कर्मों से क्रमशः हट जावे ॥ ३४-३५ ॥ हितं क्रमेण सेवेत, क्रमश्चात्रोपदिश्यते ॥ ३६ ॥ प्रक्षेपचापचये नाभ्यां क्रमः पादांशिको भवेत् । एकान्तरं ततश्चोर्ध्वं व्यन्तरं त्र्यन्तरं तथा ॥ ३७ ॥ क्रमेणापचिता दोषाः क्रमेणोपचिता गुणाः । सन्तो यान्त्यपुनर्भावमप्रकम्प्या भवन्ति च ॥ ३८ ॥ हितकारी कार्यों का (क्रमशः) सेवन करना चाहिये । यहां अब क्रम का उपदेश करते हैं। छोड़ने लायक ( सञ्चय करन योग्य ) कार्य को चौथाई भाग करके क्रम से सेवन करना चाहिये । फिर दो और फिर तीन भाग छोड़ कर ग्रहण करना चाहिये । अर्थात् छोड़ने योग्य एवं ग्रहण करने योग्य कार्य दोनों के चार चार भाग करने चाहिये । छोड़ने योग्य कर्म का एक भाग छोड़कर ग्रहण करने योग्य कर्म का एक भाग उसके स्थान पर ग्रहण करना चाहिये । फिर दो भाग छोड़ कर दो भाग ग्रहण करने चाहिये और फिर तीन भाग छोड़ कर तीन भाग ग्रहण करने चाहिये और पुनः सारा छोड़कर सारा ग्रहण कर लेना चाहिये । ग्रहण करते समय एक दो तीन चार दिन का अन्तर क्रम से देना चाहिये । छोड़ने योग्य कर्म को चतुर्थांश छोड़ कर ग्रहण करने योग्य कर्म का चतुर्थांश ग्रहण करे । इस विधान को एक दिन बरते । तीसरे दिन छोड़ने योग्य कर्म के दो भाग छोड़ कर ग्रहण करने योग्य कर्म के दो भाग ग्रहण करे-इस प्रकार दो दिन करे । फिर तीन भाग छोड़कर ग्रहण करने योग्य कर्म के तीन भाग ग्रहण करे-इस प्रकार तीन दिन करे और फिर सारा कर्म छोड़कर सम्पूर्ण का ग्रहण कर लेवे । ऊपर बताये हुए क्रम पूर्वक छोड़े हुए दोष फिर पैदा नहीं होते और क्रम से ग्रहण किये हुए गुण नष्ट नहीं होते, चिरकाल तक स्थिर रहते हैं । हितकारी पदार्थ भी सहसा उपयोग करने से अग्निनाश, अरुचि आदि करते हैं, इसलिये इनको भी क्रम से ही ग्रहण करना चाहिये । इन सब कार्यों में मनुष्य की प्रकृति का ज्ञान अपेक्षित है, क्योंकि कुछ कार्य ऐसे हैं जो कि एक के लिये अहितकारी हों, परन्तु दूसरे के लिये हितकारी ॥ ३६-३८ ॥ सम-पित्तानिल-कफाः केचिद् गर्भादि-मानवाः । दृश्यन्ते वातलाः केचित्पित्तलाः श्लेष्मलास्तथा ॥ ३९ ॥ तेषामनातुराः पूर्वे, वातलाद्याः सदाऽऽतुराः । दोषानुशयिता ह्येषां देहप्रकृतिरुच्यते ॥ ४० ॥

अ० ७ ] सूत्रस्थानम् १०१

अ० ७ ] सूत्रस्थानम् १०१ विपरीत-गुणस्तेषां स्वस्थवृत्तेर्विधिर्हितः । सम-सर्व-रसं सात्म्यं समधातोः प्रशस्यते ॥ ४१ ॥ कुछ मनुष्य जन्म या गर्भकाल से ही पित्त, वायु, कफ की असमानावस्था वाले होते हैं और कुछ मनुष्य गर्भाधान काल से ही वात प्रकृति वाले, पित्त प्रकृति वाले और कफ प्रकृति वाले होते हैं। इन में पित्त वायु और कफ की साम्यावस्था वाले मनुष्य प्रायः नीरोग रहते हैं, और वात प्रकृति या पित्त प्रकृति अथवा कफ प्रकृति के मनुष्य सदा रोगी रहते हैं। इन में वातादि दोषों का सात्म्य अर्थात् अनुकूल हो जाना ही शरीरकी 'प्रकृति' कही जाती है । अर्थात् वात प्रकृति वाले मनुष्य में वात दोष उस के शरीर के अनुकूल हो जाता है। इसलिये वही उसकी प्रकृति है, प्रकृति होने से वात उस में दोष नहीं, परन्तु जब स्वास्थ्यावस्था में वात बढ़ेगा तभी दोष होगा। जिस प्रकार कि विषकीट अपने विष से नहीं मरता, उसी प्रकार प्रकृतिस्थ वात से भी वात प्रकृति का मनुष्य पीड़ित नहीं होता। इन वात आदि की अधिकता में वात आदि के विपरीत विरुद्ध गुणों का इनके कारणों के विपरीत गुण भी सेवन करना स्वास्थ्य के लिये कल्याणकारी उपाय है। और पित्त, वायु और कफ की समानता वाली प्रकृति के मनुष्यों के लिये सब (मधुर अम्ल, लवण, तिक्त, कटु और कषाय ) रसों का समानावस्था में अभ्यास करना उत्तम है। समान धातुओं वाला आदमी प्रशस्त है ॥ ३६-४१ ॥ द्वे अधः सप्त शिरसि खानि स्वेद्मुखानि च । मलायनानि बाध्यन्ते दुष्टैर्मात्राधिकैर्मलैः ॥ ४२ ॥ मलवृद्धिं गुरुत्वेन लाघवान्मलसंक्षयम् । मलायनानां बुद्ध्येत सङ्गोत्सर्गादतीव च ॥ ४३ ॥ तान्दोषलिङ्गैरादिश्य व्याधीन् साध्यानुपाचरेत् । व्याधि-हेतु-प्रतिद्वन्द्वैर्मात्रा-कालो विचारयन् ॥ ४४ ॥ विषम-स्वस्थ-वृत्तानामेते रोगास्तथाऽपरे । जायन्तेऽनातुरस्तस्मात्स्वस्थ-वृत्त-परो भवेत् ॥ ४५ ॥ जब मल परिमाण से अधिक हो जाते हैं, तब वे विकृत होकर मल के स्थानों को पीड़ित करते हैं, मल के स्थान नीचे के दो-गुदा और उपस्थ (स्त्रियों में योनि भी); शिर में सात-दो नाक, दो कान, दो आंखें और एक मुख, पसीना निकलने के सब छिद्र ये मल के स्थान हैं, मल इनको पीड़ित करते हैं। भारीपन होने से मल की वृद्धि समझनी चाहिये और शरीर में हलकापन

१०२ चरकसंहिता [ अ० ७ होने से मल का क्षय समझना चाहिये। मल के स्थानों से मल के न निकलने से मल का क्षय, मल स्थानों से मल का बार-बार अधिक बाहर निकलना वृद्धि को बताता है । मलों की वृद्धि और क्षय दूसरों के कारण हुए हैं, यह समझकर उनके चिन्हों से पहिचानकर उन से उत्पन्न साध्य रोगों को रोग और व्याधि के हेतु इन दोनों के विपरीत गुण, वीर्य, विपाक और प्रभाव से विरुद्ध औषध, आहार और विहार द्वारा चिकित्सा करनी चाहिये । चिकित्सा करते समय वैद्य मात्रा औषध, आहार और विहार का परिमाण काल, दोष, व्याधि के प्रकोप, ऋतु, रात, दिन आदि समयों का विचार कर ले। ये विषम धातु वाले रोगी और नीरोगी इन दोनों के लिये हितकारी हैं, धातु की विषमता से उत्पन्न होने वाले रोग और मानस या आगन्तुज रोग नहीं उत्पन्न होते । इसलिये मनुष्य रोगी नहीं होता, रोगी न हो अतः रोगी होने से पूर्व ही स्वस्थवृत्त का सेवन करना चाहिये ॥ ४२-४५ ॥ कारण से उत्पन्न होने वाले रोगों से बचने के उपाय— माधव-प्रथमे मासि नभस्य-प्रथमे पुनः । सहस्य-प्रथमे चैव हारयेद्दोषसंचयम् ॥ ४६ ॥ स्निग्ध-स्विन्न-शरीराणामूर्ध्वं चाधश्च बुद्धिमान् । बस्तिकर्म ततः कुर्यान्नस्तः कर्म च बुद्धिमान् ॥ ४७ ॥ यथाक्रमं यथायोगमत ऊर्ध्वं प्रयोजयेत् । रसायनानि सिद्धानि वृष्ययोगांश्च कालवित् ॥ ४८ ॥ रोगास्तथा न जायन्ते प्रकृतिस्थेषु धातुषु । धातवश्चाभिवर्धन्ते जरा-मान्द्यमुपैति च ॥ ४९ ॥ विधिरेश विकाराणामनुत्पत्तौ निदर्शितः । निजानामितरेषां तु पृथगेवोपदिष्यते ॥ ५० ॥ वैशाख और इस से पूर्व के मास अर्थात् चैत्र में, और भाद्रपद, इससे पूर्वके मास अर्थात् श्रावण में तथा पौष इससे मास पूर्व के मार्गशीर्ष में एकत्रित दोषों को वमन विरेचन आदि से निकाल देना चाहिये । हेमन्त ऋतु में संचित कफ को चैत्र मास में ग्रीष्म में संचित वायुको श्रावण मास में, वर्षा में संचित पित्त को मार्गशीर्ष में निकाल देना चाहिये । इन मासों में दोषों के प्रकोप होने का भय रहता है, इसलिये प्रको[प] होने से पूर्व ही दोषों को निकाल देना चाहिये । पहिले शरीर को स्नि[ग्ध] [घृत] और आदि से चिकना करके पसीना देना चाहिये जिससे कि शरीर के म्ने[द] [स्वेद]

जायें । स्नेहन और स्वेदन के पीछे वमन कार्य और विरेचन कराना चाहिये । इन के पीछे बस्ति कर्म और अन्त में नस्य कर्म अर्थात् शिरोविरेचन देना चाहिये । स्निग्ध और स्विन्न शरीर वाले पुरुषों के लिये वमन कफ नाशक होने से चैत्र में, अनुवासन, बस्तिकर्म वात हर होने से श्रावण मास में एवं पित्त- नाशक होने से विरेचन मार्गशीर्ष मास में लेना चाहिये । अथवा चैत्र मास में वमन के पीछे विरेचन, मार्गशीर्ष में विरेचन से पूर्व वमन और फिर चैत्र और मार्गशीर्ष दोनों में बस्तिकर्म एवं नस्य कर्म करना चाहिये । चैत्र में यदि वम- नादि कार्य कर लिए हों तो श्रावण मास में अनुवासन और आस्थापन करना चाहिये । और यदि चैत्र में वमनादि न किये हों तो वमन विरेचन करके फिर बस्तिकर्म और नस्य कर्म करना चाहिये । स्नेह के पीछे स्वेद, स्वेद के पीछे वमन, वमन के पीछे विरेचन, विरेचन के पीछे बस्तिकर्म और बस्तिकर्म के पीछे नस्य देना चाहिये । प्रथम स्वेदन, वमन, विरेचन, बस्ति और नस्य कर्म ये क्रमशः तथा जिस पुरुष के लिये जो २ कर्म योग्य हों उन्हें करने के पीछे जरा और रोग को दूर करने वाली औषध का उपयोग करना चाहिये । रसायन सेवन के पीछे सिद्ध एवं वृष्य पौष्टिक प्रयोगों का सेवन समय को जानने वाला वैद्य करावे । रस रक्तादि धातुओं के प्रकृतिस्थ होने से शरीर में दोषजन्य रोग नहीं होते । वृष्य आदि क्रिया करने से रस रक्तादि बढ़ते हैं और बुढ़ापे का अन्त हो जाता है, बुढ़ापा नहीं आता । यह उपरोक्त विधि शरीर-दोषजन्य रोगों की अनुत्पत्ति के लिये कहा है । आगन्तुक रोगों के लिये भिन्न विधि कहते हैं ।

ये भूत-विष-वाय्वग्नि-संप्रहारादि-संभवाः । नृणामागन्तवो रोगाः प्रज्ञा तेष्वपराध्यति ॥ ५१ ॥ ईर्ष्या-शोक-भय-क्रोध-मान-द्वेषादयश्च ये । मनो-विकारास्तेऽप्युक्ताः सर्वे प्रज्ञापराधजाः ॥ ५२ ॥

जो कि (भूत) नाना सूक्ष्म प्राणी ग्रह आदि, (विष) स्थावर या जंगम विष, (वायु) झंझावात, (अग्नि) ज्वालामुखी, दावानल आदि (संप्रहार) चोट आदि से मनुष्यों के 'आगन्तुज' अर्थात् बाहर से होने वाले रोग होते हैं, उन में बुद्धि का अपराध मिथ्या या अन्यथा रूप में प्रयोग हुआ होता है । (मत्सर), शोक, भय, क्रोध, अभिमान, द्वेष आदि मन के विकार अर्थात् वात आदि दोषजन्य नहीं प्रत्युत ये सब बुद्धि के दोष से ही उत्पन्न हैं ॥ ५१-५२ ॥

१०४ चरकसंहिता [ अ० ७ आगन्तुज रोगों के प्रतीकार— त्यागः प्रज्ञापराधानामिन्द्रियोपशमः स्मृतिः । देश-कालात्म-विज्ञानं सद्वृत्तस्यानुवर्त्तनम् ॥ ५३ ॥ आगन्तूनामनुत्पत्तावेष मार्गो निदर्शितः । प्राज्ञः प्रागेव तत्कुर्याद्धितं विद्याद्यदात्मनः ॥ ५४ ॥ आप्तोपदेश-प्रज्ञानं प्रतिपत्तिश्च कारणम् । विकाराणामनुत्पत्तावुपन्नानाञ्च शान्तये ॥ ५५ ॥ आगन्तुज एवं मानसिक रोग बुद्धि के दोष से उत्पन्न होते हैं, इस लिये इस प्रज्ञापराध को छोड़ना चाहिये । इन्द्रियों को विषयों से रोकना बुद्धि, स्मृति, भगवान् का स्मरण, देश काल और आत्मा का चिन्तन, (सद्वृत्त) सच्चे, कल्याणकारी मार्ग का अनुसरण करना, यह विधि आगन्तुज रोगों की उत्पत्ति से बचने का मार्ग है । इस प्रकार बरतने से आगन्तुज रोग उत्पन्न नहीं होते । बुद्धिमान् व्यक्ति को चाहिये कि अपने लिये जो हितकारी काम हो उनको रोगो- त्पत्ति से पूर्व ही करे । (आप्तोपदेश) रजस् और तमस् से मुक्त निर्भ्रान्त विद्वानों के उपदेश और (प्रज्ञान) बुद्धि से सिद्ध, प्रमाण द्वारा सिद्ध किये, बुद्धि से स्वीकार किये ये दोनों मानसिक विकारों की अनुत्पत्ति में तथा उत्पन्न विकारों की शान्ति में कारण है ॥ ५३-५५ ॥ वर्जने योग्य मनुष्य— पाप-वृत्त-वचःसत्त्वाः सूचकाः कलह-प्रियाः । मर्मोपहासिनो लुब्धाः पर-वृद्धि द्विषः शठाः ॥ ५६ ॥ परापवाद-रतयश्चपला रिपु-सेविनः । निर्घृणास्त्यक्तधर्माणः परिवर्ज्या नराधमाः ॥ ५७ ॥ जिनकी वाणी और मन पापमय हों, चुगलखोर, झगड़ालू, कमजोरी या छिद्र को ढूँढ़कर उस पर हंसनेवाले, लालची, जो दूसरी की उन्नति में द्वेष भाव रखते हैं, दूसरों की निन्दा ही करना जिनका काम है, चंचल प्रकृति, अस्थिर मन, दुश्मन से मिले हुए, या काम क्रोधादि के वशीभूत, दयारहित, निर्दयी, धर्म से न डरने वाले, ऐसे नीच पुरुषों को छोड़ देना चाहिये ॥५६-५७॥ सेवन करने योग्य मनुष्य— बुद्धि-विद्या-वयः-शील-धैर्य-स्मृति-समाधिभिः । वृद्धोपसेविनो वृद्धाः स्वभावज्ञा गत-व्यथाः ॥५८॥

अ० ७ ] सूत्रस्थानम् १०५

अ० ७ ] सूत्रस्थानम् १०५ सुमुखाः सर्वभूतानां प्रशान्ताः संशित-व्रताः । सेव्याः सन्मार्ग-वक्तारः पुण्य-श्रवण-दर्शनाः ॥५९॥ जो बुद्धि, विद्या, आयु, शील, स्वभाव, धैर्य्य साहस, स्मरण शक्ति, (समाधि) मन का संयम आदि में अपने से बड़े हों, जो वृद्धों की सेवा करते हों, स्वभाव को जानने वाले, अनुनयी, जिनको कि किसी प्रकार की चिन्ता नहीं, सुमुख- सब प्राणियों के लिये प्रसन्नमुख, (प्रशान्त) इन्द्रियों के विषयों से निवृत्त, ब्रह्मचारी, सच्चे मार्ग का उपदेश करने वाले, पुण्य शब्दों को सुनाने वाले एवं पुण्य दर्शनशील, जिनका शब्द और दर्शन पवित्र करता है, इस प्रकार के आप्त पुरुषों का सेवन करना चाहिये, उनको गुरु मानना चाहिये, ये ज्ञान, विज्ञान, धैर्य्य, स्मृति आदि की शिक्षा देकर मानस रोगों को नष्ट कर सकते हैं ॥ आहाराऽऽचारचेष्टासु सुखार्थी प्रेत्य चेह च । परं प्रयत्नमातिष्ठेद् बुद्धिमान् हितसेवने ॥ ६० ॥ न नक्तं दधि भुञ्जीत न चाप्यघृत-शर्करम् । नामुद्गसूपं नाक्षौद्रं नोष्णं नाऽऽमलकैर्विना ॥ ६१ ॥ ( अलक्ष्मी-दोष-युक्तत्वान्नक्तं तु दधि वर्जितम् । श्लेष्मलं स्यात्ससर्पिष्कं दधि मारुत-सूदनम् ॥ ६२ ॥ न च सन्धुक्षयेत्पित्तमाहारं च विपाचयेन् । शर्करा-संयुक्तं दद्यात्तृष्णा-दाह-निवारणम् ॥ ६३ ॥ मुद्गसूपेन संयुक्तं दद्याद्वह्निकानिलापहम् । सुरसं चाल्पदोषं च क्षौद्रयुक्तं भवेद्दधि । उष्णं पित्तास्रकृद्दोषान् धात्रीयुक्तं तु निर्हरेत् ॥ ६४ ॥ ज्वरासृक्पित्त-वीसर्प-कुष्ठ-पाण्ड्वामय-श्रमान् । प्राप्नुयात्कामलां चोग्रां विधिं हित्वा दधिप्रियः ) ॥ ६५ ॥ इहलोक और परलोक में सुख चाहने वाले बुद्धिमान् व्यक्ति को चाहिये कि हितकारी आहार, खान पान, आचार वर्त्तन और चेष्टा-क्रियाओ इन में विशेष रूप से यत्नवान् रहे। रात्रि में दही नहीं खाना चाहिये, और रात के सिवाय अन्य समय में जब खाना हो तब भी घी या शकर के बिना, मूंग की दाल के बिना, शहद के बिना किये बिना, अथवा आंवले के बिना नहीं खाना चाहिये। जब खाना हो य, शहद, आंवला इन के साथ या गरम करके खाना चाहिये। रात भी प्रकार से नहीं खाना चाहिये। रात्रि में दही खाने से शरीर की

१०६ चरकसंहिता [ अ० ७ श्लेष्मा और स्वास्थ्य नष्ट हो जाते हैं और शरीर के दोष कुपित होते हैं। दही में घी मिलाने से दही कफकारक हो जाता है, परन्तु वायु का नाश करता है। शर्करा युक्त दही 'पित्त' ( जठराग्नि या पित्त को ) नहीं बढ़ाता, परन्तु आहार भोजन को पचा देता है। इस लिये तृष्णा, प्यास और कलेजे की जलन को मिटाता है। मूंग के साथ मिलाकर दही खाने से 'वातरक्त' रोग में लाभ होता है। शहद के मिलाने से दही सुस्वाद और थोड़ा दोष वाला हो जाता है। दही को गरम करके खाने से रक्तपित्त जन्य विकार नष्ट होते हैं, आंवले के साथ खाने से भी रक्त पित्त रोग शान्त होता है। बहुत दही खाने वाला मनुष्य जो इस उपरोक्त विधि को छोड़ कर दही खाता है, उसको ज्वर, रक्तपित्त, वीसर्प, कुष्ठ, पाण्डुरोग, भ्रम, और तीव्र कामला रोग हो जाते हैं ॥ ६०-६५ ॥ तत्र श्लोकाः- वेगा वेगसमुत्थाश्च रोगास्तेषां च भेषजम् । येषां वेगा विधार्याश्च यदर्थं यद्धिताहितम् ॥ ६६ ॥ उचिते चाहिते वर्ज्ये सेव्ये चानुचिते क्रमः । यथाप्रकृति चाऽऽहारो मलायनगदौषधम् ॥ ६७ ॥ भविष्यतामनुत्पत्तौ रोगाणामौषधं च यत् । वर्ज्याः सेव्याश्च पुरुषा धीमताऽऽत्म-सुखार्थिना ॥ ६८ ॥ विधिना दधि सेव्यं च येन यस्मात्तदत्रिजः । न वेगान्धारणेऽध्याये सर्वमेवाबदन्मुनिः ॥ ६६ ॥ मनुष्यों में उत्पन्न होने वाले स्वाभाविक वेग, वेगों को रोकने से उत्पन्न होने वाले रोग, इन रोगों की औषध, जिन उपस्थित वेगों को धारण करना चाहिये, जिस के लिये जो लाभकारी है, उचित एवं अहितकारी, छोड़ने योग्य और सेवनीय क्रम प्रकृत के अनुसार आहार, मलस्थान मल की वृद्धि, क्षय, औषध, भविष्य में न होने वाले रोगों की औषध, सुख चाहने वाले बुद्धिमान् मनुष्य को जिन पुरुषों को छोड़ना या जिनका सेवन करना उचित है, और दही को सेवन करने की विधि यह सब आत्रेय मुनि ने 'न वेगान्धारणीय' नामक अध्याय में सम्पूर्ण रूप से उपदेश किया है ॥ ६६-६९ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने स्वस्थवृत्तचतुष्के 'न वेगान्धारणीयो' नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥ और

अ० ८ ] सूत्रस्थानम् १०१

अ० ८ ] सूत्रस्थानम् १०१ अष्टमोऽध्यायः । अथात इन्द्रियोपक्रमणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ आहार एवं 'स्वस्थ-चतुष्क' कहने के अनन्तर 'इन्द्रियोपक्रमणीय' नामक अध्याय का व्याख्यान करते हैं जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ इह खलु पञ्चेन्द्रियाणि पञ्चेन्द्रियद्रव्याणि पञ्चेन्द्रियाधिष्ठानानि पञ्चेन्द्रियार्थाः पञ्चेन्द्रियबुद्धयो भवन्तीत्युक्तमिन्द्रियाधिकारे ॥ ३ ॥ इस आयुर्वेद के प्रकरण में पाँच इन्द्रियाँ हैं। पाँच ही इन्द्रियों के ग्राह्य द्रव्य हैं। पांच ही इन्द्रियों के अधिष्ठान हैं। पांच ही इन्द्रियों के अर्थ, पाँच प्रकार की इन्द्रियों का ज्ञान है ऐसा पूर्वाचार्यों ने इन्द्रियों के विषय में कहा है ॥ अतीन्द्रियं पुनर्मनः सत्त्वसञ्ज्ञकं चेत इत्याहुरेके, तदर्थात्मसंपत्त- दायत्तचेष्टं चेष्टाप्रत्ययभूतमिन्र्द्रियाणाम् ॥ ४ ॥ 'मन' अतीन्द्रिय अर्थात् इन्द्रियों में सूक्ष्मतम है वह इसी मन को 'सत्त्व' कहते हैं। इसी मन को कितने 'चित्त' इस नाम से कहते हैं। वह मन अपने विषय और आत्मा इन की श्रेष्ठता के अधीन व्यापार वाला है और इन्द्रियों की चेष्टाओं का कारण है। एवं इन्द्रियों की चेष्टाओं, व्यापार वा प्रतीति का कारण मन ही है ॥ ४ ॥ स्वार्थेन्द्रियार्थ-संकल्प-व्यभिचरणाच्चानेकमेकस्मिन् पुरुषे सत्त्वम्, रजस्तमः सत्त्व-गुण-योगाच्च; न चानेकत्वम्, नह्येकं ह्येककालमनेकेषु प्रवर्तते, तस्मान्नैक-काला सर्वेन्द्रिय-प्रवृत्तिः ॥ ५ ॥ वास्तव में 'मन' एक ही है, परन्तु इन्द्रियों के अपने २ द्रव्य में विषय के संकल्पों के बदलते रहने से एक पुरुष में अनेक मन एवं मन के सत्त्व गुण होने पर, सत्त्व, रजस्, तमस् इन गुणों के न्यूनाधिक होने से अनेक मन एकही मनुष्य में प्रतीत होते हैं। वास्तव में मन एक ही है अनेक नहीं है। क्योंकि एक ही समय में एक मन अनेक इन्द्रियों में प्रवृत्त नहीं हो सकता इसलिये एक ही समय में सब इन्द्रियों की प्रवृत्तियाँ चेष्टा नहीं होती ॥ ५ ॥ यद्गुणं चाभीक्ष्णं पुरुषमनुवर्त्तते सत्त्वम्, तत्सत्त्वमेवोपविशन्ति ...यद्बहुत्वानुशयात् ॥ ६ ॥ जिस गुण (सत्व, रजस् या तमस् ) वाला मन बार बार अनु-

१०८ चरकसंहिता [अ० ८ सरण करता है, मन को उसी ही गुण वाला मुनि लोग कहते हैं। क्योंकि जिस गुण की अधिकता होगी उसी गुण वाला मन होगा ॥ ६ ॥ मनःपुरःसराणीन्द्रियाण्यथं-ग्रहण-समर्थानि भवन्ति ॥ ७॥ इन्द्रियां मन को साथ में लेकर ही विषय के ग्रहण करने में समर्थ होती हैं। बिना मन के इन्द्रियां विषय को ग्रहण नहीं कर सकतीं ॥ ७ ॥ तत्र चक्षुः श्रोत्रं घ्राणं रसनं स्पर्शनमिति पञ्चेन्द्रियाणि ॥ ८ ॥ पञ्चेन्द्रियद्रव्याणि—खं वायुर्ज्योतिरापो भूरिति ॥ ६ ॥ पञ्चेन्द्रियाधिष्ठानानि अक्षिणी कर्णौ नासिके जिह्वा त्वक् चेति।१०। पञ्चेन्द्रियार्थाः—शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्धाः ॥ ११ ॥ आंख, श्रोत्र, नासिका, जिह्वा और त्वचा ये पांच इन्द्रियां हैं। पांच इन्द्रियों के पांच ग्राह्य पदार्थ हैं, यथा आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथिवी। इन्द्रियों के पांच अधिष्ठान हैं, यथा चक्षु गोलक दो, दोनों बाह्य कान, जीभ, दोनों नासिकायें और त्वचा। इन्द्रियों के पांच विषय हैं:—शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध। इन्द्रिय-ज्ञान भी पांच प्रकार का है—चक्षुर्ज्ञान, श्रोत्र-ज्ञान, गन्ध-ज्ञान, रस ज्ञान और स्पर्श ज्ञान ॥ ८-११ ॥ पञ्चेन्द्रियबुद्धयश्चक्षुर्बुद्ध्यादिकाः, ताः पुनरिन्द्रियेन्द्रियार्थसत्त्वा- त्मसंनिकर्षजाः क्षणिका निश्चयात्मिकाश्च इत्येतत्पञ्चपञ्चकम् ॥१२॥ ये पांचों इन्द्रियों के विषय, मन और आत्मा इनका एक साथ संयोग होने से उत्पन्न होते हैं। यह और ही क्षणिक निश्चयात्मक (स्थायो ज्ञान) है। इस प्रकार से ये पांच-पांच पदार्थों के समूह होते हैं ॥ १२ ॥ मनो मनोऽर्थो बुद्धिरात्मा चेत्यध्यात्म-द्रव्य-गुण-संग्रहः शुभाशुभ-प्रवृ- त्तिनिवृत्ति हेतुश्च, द्रव्याश्रितं च कर्म, यदुच्यते क्रियेति ॥ १३ ॥ मन, मन के अर्थ (विषय), बुद्धि और आत्मा यह अध्यात्म द्रव्यों का और गुणों का संग्रह है। तथा जो कर्म द्रव्य में आश्रित है उसे क्रिया कहते हैं। 'शुभ' दोनों लोकों में कल्याणकारी, अशुभ (लोकों में निन्दित), प्रवृत्ति, निवृत्ति ये कारण हैं ॥१३ ॥ तत्रानुमानगम्यानां पञ्च-महाभूत-विकार-समुदायात्मकानामपि स- तामिन्द्रियाणां तेजश्चक्षुषि, खं श्रोत्रे, घ्राणे क्षितिः, आपोरसने, स्पर्शनेऽ- निलो विशेषेणोपदिश्यते ॥ १४ ॥ अनुमान द्वारा जानने योग्य इन्द्रियां पंचमहाभूतों के विकार के समूह... उत्पन्न हुई हैं तो भी, तेज आंखों में, आकाश श्रोत्रों में, पृथिवी ना... और जल रसना में और वायु त्वचा में विशेष रूप से रहते हैं ॥ १४ ...

अ० ८] सूत्रस्थानम् १०६

अ० ८] सूत्रस्थानम् १०६ तत्र यद्यदात्मकमिन्द्रियं विशेषात्तत्तदात्मकमेवार्थमनुधावति, तत्स्वभावाद्द्विभुत्वाच्च ॥ १५ ॥ इनमें जो जो इन्द्रियाँ, जिस जिस भूत से बनी हैं वे विशेष रूप से उसी उसी (भूत) से बने अर्थ (विषय) को ग्रहण करती हैं। ये अपने समान स्वभाव वाली होने से समान जातिकारी विषय को ग्रहण करने में समर्थ होने से प्रधान भूतात्मक विषय को ही ग्रहण करती हैं। यथा आंख तैजस है, इसलिये वह तेज की ओर दौड़ती है, कान आकाश जन्य है इसलिये शब्द की ओर दौड़ते हैं। स्पर्श वायव्य होने से वायु की ओर, जिह्वा आप्य है इसलिये रस की ओर और घ्राण पार्थिव होने से पृथिवी की ओर दौड़ती है ॥ १५ ॥ यदर्थाति योगायोगमिथ्यायोगात्सममनस्कमिन्द्रियं विकृतिमापद्यमानं यथास्वं बुद्धयुपघाताय संपद्यते, समयोगान्तुनः प्रकृतिमापद्यमानं यथास्वं बुद्धिमाप्याययति ॥ १६ ॥ इनमें मन के साथ इन्द्रिय का विषय में अतियोग, अयोग, या मिथ्यायोग होने से 'विकृति' अर्थात् रोग उत्पन्न होकर अपने अपने ज्ञान के नाश के लिये उद्यत हो जाता है। समयोग से इन्द्रिय स्वभाव में रहकर अपने अपने ज्ञान की वृद्धि करती हैं। समान अर्थात् उचित योग से वृद्धि होती है ॥ १६ ॥ मनसस्तु चिन्त्यमर्थः, तत्र मनसो बुद्धेश्च त एव समानाति हीन- मिथ्यायोगाः प्रकृति-विकृति-हेतवो भवन्ति ॥ १७ ॥ मन का विषय चिन्तन करना है (सुख, दुःख, प्रयत्न आदि चिन्तनीय होने से मन के विषय हैं)। इसलिये मन और बुद्धि का समान योग स्वस्थता कारण है और मन एवं बुद्धि का अतियोग वा हीनयोग अथवा मिथ्यायोग विकृति अर्थात् 'विकार' या रोग का कारण है ॥ १७ ॥ तत्रेन्द्रियाणां समनस्कानामनुपतप्तानामनुपतापाय प्रकृतिभावे प्रय- तितव्यमेभिर्हेतुभिः। तद्यथा—सात्म्येन्द्रियार्थसंयोगेन, बुद्ध्या सम्यग- वेक्ष्यावेक्ष्य कर्मणां सम्यक्प्रतिपादनेन, देशकालात्मगुणांविपरीतोपसेव- नेन चेति । तस्मादात्महितं चिकीर्षता सर्वेण सर्वं सर्वदा स्मृतिमास्थाय सद्वृत्तमनुष्ठेयम् । तद्ध्यनुष्ठितं युगपत्संपादयत्यर्थद्वयमारोग्यमिन्द्रि- यविजयं चेति ॥ १८ ॥ इसलिये अपनी प्रकृति में स्थित मन सहित इन्द्रियों को स्वस्थ तथा अपने वश में रखने के लिये, विकृति से बचाने के लिये निम्न कारणों द्वारा प्रयत्न । उचित अनुकूल रूप से इन्द्रिय और विषय के संयोग न अति,