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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

११६ चरकसंहिता [ अ० ८ न विद्युतस्वनार्तवीषु नाभ्युदितासु दिक्षु नाग्निसंप्लवे न भूमिकम्पे न महोत्सवे नोल्कापाते न महाग्रहोपगमने न नष्टचन्द्रायां तिथौ न सन्ध्ययोर्नामुखाद् गुरोर्नावपतितं नातिमात्रं तान्तं न विस्वरं नानवस्थि- तपंदं नातिद्रुतं न विलम्बितं नातिकलीवं नात्युच्चैर्नातिनीचैः स्वरै- रध्ययनमभ्यसेत् ॥ २६ ॥ निम्न अवस्थाओं में अध्ययन-पठन नहीं करना चाहिये—ऋतु के बिना बिजली चमकने पर, दिशाओं के जलने पर, ग्राम नगर आदि में आग लगने पर, भूकम्प आने पर, विवाहादि बड़े उत्सवों में, विजयादशमी, दीपमालिका होली आदि में, उल्कापात होने पर, चन्द्रग्रहण, या सूर्यग्रहण होने पर, कृष्णपक्ष की चतुर्दशी, अमावस्या और प्रतिपदा को जिन तिथियों में चन्द्रमा नहीं दीखता, सन्ध्या कालों में, गुरुके मुख से बिना पढ़े, अक्षर को छोड़ते हुए, खाते हुए, अधिक मात्रा में, रूक्ष स्वर से, स्वर के बिना, पदों की व्यवस्था के बिना, विराम आदि चिह्नों का ध्यान न रखकर, रुक रुक कर, अति निर्बल (बलहीन), बहुत ऊँची आवाज से बहुत जोर से, बहुत धीमी आवाज से भी नहीं पढ़ना चाहिये ॥ २६ ॥ नातिसमयं जह्यात् । न नियमं भिन्द्यात् । न नक्तं नादेशे चरेत् । न सन्ध्यास्वभ्यवहाराध्ययन-स्त्री-स्वप्न-सेवी स्यात् । न बाल-वृद्ध-लुब्ध- मूर्ख-क्लिष्ट-क्लीबैः सह सख्यं कुर्यात् । न मद्य-द्यूत-वेश्या-प्रसङ्ग-रुचिः स्यात्, न गुह्यं विवृणुयात् । न कञ्चिदवजानीयात् । नाहंमानी स्यान्नादक्षो नादक्षिणा नासूयकः । न ब्राह्मणान् परिवदेत् । न गवां दण्डमुद्यच्छेत्, न वृद्धान् न गुरून् न गणान् न नृपान् वाऽधिक्षिपेत् । न चातिब्रूयात् । न बान्धवानुरक्तकृच्छ्रद्वितीयगुह्यज्ञान् बहिः कुर्यात् ॥ २७ ॥ समय को न खोये । नियम का उल्लंघन न करे । रात्रि में न घूमे । जंगल आदि बीयाबान स्थानों में न घूमे । सन्ध्या समयों में भोजन, अध्ययन, मैथुन, नींद नहीं करनी चाहिये । बालक, वृद्ध, लालची, मूर्ख, कुष्ठ रोगी, नपुंसक अनु- त्साही अल्पसत्त्व के साथ मित्रता न करे । मद्य शराब, जुआ, वेश्या इनमें मन नहीं लगाये । गुप्त रहस्य को न कहे । किसी का भी अपमान न करे । अहंकार या घमण्ड न करे । कार्यों में मूढ़ न रहे । गुणों में दोषों को न देखे । निन्दक, चुगलखोर न बने । ब्राह्मणों की निन्दा न करे । गाय के प्रति हाथ उठाये । जो अपने अनुकूल हों उनकी निन्दा न करे । गुरु, [..] और आचार्य, सभा, वयोवृद्ध, जनसमूह, समाज और राजा की [...]

अ० ८] सूत्रस्थानम् ११७

अ० ८] सूत्रस्थानम् ११७ भाई बन्धु आदि, अनुरक्त, स्नेही, मित्र आदि, आपत्ति में सहायक इनको कभी बाहर न निकाले, कष्ट न दे ॥ २७ ॥ नाधीरो नात्युच्छ्रितसत्त्वः स्यात् । नाभृतभृत्यो, नाविश्रब्धस्वजनो, नैकः सुखी, न दुःखशीलाचारोपचारो, न सर्वविश्रम्भी, न सर्वाभिशङ्की, न सर्वकालविचारी । न कार्यकारलमतिपातयेत् । नापरीक्षितमभिनिवि- शेत् । नेन्द्रियवशगः स्यात् । न चञ्चलं मनोऽनुभ्रामयेत् । न बुद्धीन्द्रि- याणामतिभारमादध्यात् । न चातिदीर्घसूत्री स्यात् । न क्रोधहर्षायनु- विदध्यात् । न शोकमनुवसेन् । न सिद्धावौत्सुक्यं गच्छेन्नासिद्धौ दैन्यम् । प्रकृतिमभीक्ष्णं स्मरेत् । हेतुप्रभाववििश्चितः स्यात् हेत्वारम्भनित्यश्च । न कृतमित्याश्वसेत्, न वीर्यं जह्यात् । नापवादमनुस्मरेत् ॥ २८ ॥ बहुत अधीर, उतावला जल्दबाज़ न हो, बहुत उच्छ्रङ्खल उद्धत न बने । नौकरों का पोषण अवश्य करे । अपने मनुष्यों में, घर के आदमियों में अवि- श्वास न करे । अकेला सुख का अनुभव न करे । अकेला मधुर पदार्थ न खाये शील (स्वाभाविक व्यवहार), आचार, (शास्त्रानुकूल व्यवहार), उपचार, (वस्त्र धारण करने और रहन सहन) में दुःखी व्यक्तियों की भाँति (गरीबों की तरह) न रहे; सभ्य बनकर रहे । सब जगह सब का विश्वास न करे । सब स्थानों पर सब का अविश्वास भी न करे, सन्देह भी न करे । सब समय सोचता विचारता भी न रहे । काम के समय का उल्लंघन न करे । अपरीक्षित (अज्ञात) स्थान आदि पर न बैठे न जाये । इन्द्रियों के वश में न हो । चंचल मन को इधर उधर न घुमावे । बुद्धि, और ज्ञानेन्द्रियों का अतियोग न करे, उन पर अधिक बोझ न डाले, अधिक विषय सेवन न करे । दीर्घ-सूत्री अर्थात् विलम्ब से काम करने वाला न बने । जितना क्रोध आये उतना उग्र कर्म न करे और जितनी खुशी हो उतनी अधिक खुशी न मनाये । शोक चिन्ता के वश में न हो । कार्य में सफलता मिलने पर बहुत प्रसन्न न हो और कार्य में असफलता मिलने पर दीन, (उदास चेहरा) न बनाये मुंह न लटकाये । बार बार प्रकृति अर्थात् जन्म मरण के स्वभाव को ध्यान में रखे । शुभ कारण से कार्य का आरम्भ करे । इतना कर लिया बस है, यह समझकर बैठ न जाये । वीर्य (परा- क्रम) का त्याग न करे । निन्दा का स्मरण न करे ॥ २८ ॥ रूत्तमाभ्याक्षत-तिल-कुश-सर्षपैरग्निं जुहुयादात्मानमाशीर्भिराम- न्त्रये नर्में नापगच्छेच्छरीरादु, वायुर्मे प्राणानादधातु, विष्णुर्मे न्द्रो मे वीर्यं शिवा मां प्रविशन्त्वाप आपोहिष्ठेत्यपः

११८ चरकसंहिता [ अ० ८ स्पृशेत्, द्विः परिमृज्यौष्ठौ पादौ चाभ्युक्ष्य मूर्धनि खानि चोपस्पृशेदद्भि- रात्मानं हृदयं शिरश्च, ब्रह्मचर्य-ज्ञान-दान-मैत्री-कारुण्य-हर्षोपेक्षा-प्रशम- परश्च स्यादिति ॥ २६ ॥ अपवित्र अवस्था में उत्तम गौ का घी, अक्षत, तिल, कुशा और सरसों द्वारा अग्नि में वेदमन्त्रों से हवन न करे और प्रार्थना करे कि अग्नि मेरे शरीर से बाहर न जाये। वायु मेरे अन्दर प्राणों को धारण करे। विष्णु मेरे अन्दर बल का संचार करें। इन्द्र मुझ में बल बढ़ावे। कल्याणकारी जल मुझ में प्रविष्ट हों। ‘आपो हिष्ठा मयो भुवस्ता न ऊर्जे दधातन०’ इस मन्त्र से जल का स्पर्श स्नान आचमन करना चाहिये। दोनों समय भोजन करने के उप्रान्त ओष्ठ और पांव को धोकर शुष्क कर लेना चाहिये शिर और आंख, कान, नाक इन्द्रियों को जल से स्पर्श करे। फिर अपने हृदय, शिर को जल से स्पर्श करे। ब्रह्मचर्य (काय और मन वाणि से मैथुन को छोड़ना ब्रह्मचर्याश्रम में, गृहस्था- श्रम में भी अपनी पत्नी में ऋतुकाल को छोड़कर) तथा अन्यों को ज्ञान-दान, ‘मैत्री’ सब प्राणियों में आत्मवत् प्रवृत्ति, सब प्राणियों में दयाभाव, हर्ष, प्रसन्नता सब प्राणियों में, उपेक्षा अर्थात् अप्रतिग्रह बुद्धि, प्रशम अर्थात् शान्त इन्द्रिय एवं चित्तवाला बने ॥ २६ ॥ तत्र श्लोकाः-- पञ्चपञ्चकमुद्दिष्टं मनो हेतुचतुष्टयम् । इन्द्रियोपक्रमेऽध्याये सद्वृत्तमखिलेन च ॥ ३० ॥ स्वस्थवृत्तं यथोद्दिष्टं यः सम्यगनुतिष्ठति । स समाः शतमव्याधिरायुषा न वियुज्यते ॥ ३१ ॥ नृलोकमापूरयते यशसा साधुसंमतः । धर्मार्थावेति भूतानां बन्धुतामुपगच्छति ॥ ३२ ॥ परान् सुकृतिनो लोकान् पुण्यकर्मा प्रपद्यते । तस्माद् वृत्तममुष्ठेयमिदं सर्वेण सर्वदा ॥ ३३ ॥ यच्चान्यदपि किंचित्स्यादनुक्तमिह पूजितम् । वृत्तं तदपि चाऽऽत्रेयः सदैवाभ्यनुमन्यते ॥ ३४ ॥ पंचेन्द्रिय और इनके पांच प्रकार, मन एवं चार कारण (समयोग, मिथ्या- योग, हीनयोग, और अतियोग) और सम्पूर्ण सद्वृत्त को 'इन्द्रियोप...' अध्याय में कह दिया है। जो मनुष्य कहे हुए स्वस्थवृत्त का सम्यक् रूप से पालन करता है वह सौ वर्षों तक नीरोग रहता और...

अ० ९ ] सूत्रस्थानम् ११६

अ० ९ ] सूत्रस्थानम् ११६ आयु का भंग नहीं होता, वह सौ वर्षतक जीता है। साधुओं से पूजित होकर मनुष्यलोक को अपने यश से भर देता है, यशस्वी बनता है। धर्म और अर्थ को प्राप्त करता है। सब प्राणियों के प्रति बन्धुभाव उत्पन्न कर लेता है। पुण्य कर्मों वाला मनुष्य अति उत्कृष्ट लोकों को प्राप्त करता है। इसलिये सब पुरुषों को चाहिये कि सदा इस 'सद्वृत्त' का पालन करे। इस 'सद्वृत्त' के अतिरिक्त और जो कुछ उत्तम कर्म हों जो कि यहां पर नहीं भी कहे हैं, उनको भी स्वीकार करके पालन करना चाहिये ऐसा भगवान् आत्रेय का अभिप्राय है ॥ ३०-३४ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने स्वस्थवृत्तचतुष्के इन्द्रियोपक्रमणीयो नामाऽष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥ इति स्वस्थचतुष्कः ॥ नवमोऽध्यायः । अथातः खुड्डाकचतुष्पादमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ अब 'खुड्डाक चतुष्पाद' (चिकित्सा के क्षुद्र चार चरण) नामक अध्याय का व्याख्यान करते हैं, जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ २ ॥ भिषग् द्रव्याण्युपस्थाता रोगी पादचतुष्टयम् । गुणवत्कारणं ज्ञेयं विकारव्युपशान्तये ॥ ३ ॥ वैद्य, औषध, परिचारक और रोगी ये चार पाद अर्थात् चिकित्सा के चार अंग हैं। ये चारों ही विकार अर्थात् रोगों की शान्ति में गुणवान् कारण हैं ॥३॥ विकारो धातुवैषम्यं, साम्यं प्रकृतिरुच्यते । सुखसंज्ञकमरोग्यं, विकारो दुःखमेव च ॥ ४ ॥ शरीर के धातु वात, पित्त और कफ की विषमता का नाम ही 'विकार' अर्थात् रोग है और धातुओं का 'साम्य' अर्थात् अनुकूलता रहने का नाम 'प्रकृति' है। आरोग्यता ही सुख है, रोग का होना दुःख है। वैद्यक शास्त्र में सुख-आरोग्यता है, और दुःख रोग है ॥४॥ चिकित्सा का लक्षण- चतुर्णां भिषगादीनां शस्तानां धातुवैकृते । प्रवृत्तिर्धातुसाम्यार्था चिकित्सेत्यभिधीयते ॥ ५ ॥ धातुओं के विषम होने पर भिषक्, रोगी, औषध और परिचारक ये चारों गुणवाले मिलकर धातुओं को साम्य अर्थात् अनुकूल करने के लिये प्रवृत्त होते हैं, उसी को चिकित्सा कहते हैं ॥ ५ ॥

१२० चरकसंहिता [ अ० ९ वैद्य के गुण— श्रुते पर्यवदातत्वं बहुशो दृष्टकर्मता । दाक्ष्यं शौचमिति ज्ञेयं वैद्ये गुणचतुष्टयम् ॥ ६ ॥ सद्-गुरु के उपदेश मे पूर्ण रूप से शास्त्र का ठीक २ ज्ञान, चिकित्सा-कर्म का बहुत बार दर्शन, चिकित्सा कार्य में कुशलता, चिकित्सा कर्म की सिद्ध- हस्तता, पवित्रता, स्वच्छता ये वैद्य के गुण हैं ॥ ६ ॥ द्रव्य के गुण— बहुता तत्र योग्यत्वमनेकविधकल्पना । संपच्चेति चतुष्कोऽयं द्रव्याणां गुण उच्यते ॥ ७ ॥ (बहुता) द्रव्य की प्रचुरता (योग्यता) रोगियों के दिये जाने वाले द्रव्य में रोग को दूर करने का सामर्थ्य और जिसके अनेक प्रकार के कल्प, (स्वरस कल्क, चूर्ण, कषाय आदि) बनाये जा सकें, 'संपत्' अर्थात् रस, वीर्य, प्रभाव, गुण सम्पूर्ण हों, ठीक २ ऋतु में एकत्र की गई हो, ये चार गुण औषध में होने चाहिये ॥ ७ ॥ परिचारक के गुण— उपचारज्ञता दाक्ष्यमनुरागश्च भर्तरि । शौचं चेति चतुष्कोऽयं गुणः परिचरे जने ॥ ८ ॥ सेवा कर्म को जानने वाला, कर्मकुशल, रोगी में प्रीति रखने वाला शौच, अर्थात् शुद्धि, स्वच्छता ये चार गुण परिचारक के हैं ॥ ८ ॥ रोगी के गुण— स्मृति-निर्देश-कारित्वमभीरुत्वमथापि च । ज्ञापकत्वं च रोगाणामातुरस्य गुणाः स्मृताः ॥ ९ ॥ (स्मृति) स्मरण शक्ति, वैद्य के आदेश के अनुसार करने वाला, डरपोक न हो, रोग या चिकित्सा कर्म से न घबराने वाला, अपनी शिकायतों को भली प्रकार बता सके, ये चार गुण रोगी के हैं ॥ ६ ॥ कारणं षोडशगुणं सिद्धौ पादचतुष्टयम् । विज्ञाता शासिता योक्ता प्रधानं भिषगत्र तु ॥ १० ॥ पक्तौ हि कारणं पक्तुर्यथा पात्रेन्धनानलाः । विजेतुर्विजये भूमिश्चमूः प्रहरणानि च ॥ ११ ॥ आतुराद्यास्तथा सिद्धौ पादाः कारणसंज्ञिताः । वैद्यस्यातश्चिकित्सायां प्रधानं कारणं भिषक् ॥ १२ ॥

अ० ६ ] सूत्रस्थानम् १२१

अ० ६ ] सूत्रस्थानम् १२१ सोलह गुण युक्त चारों पाद मिलकर ही चिकित्सा में कारण हैं। इन सब में प्रधान कारण 'भिषक्' अर्थात् वैद्य ही है। क्योंकि वही विशेष रूप से जानने वाला, परिचारक आदि को आदेश देने वाला, दवाइयों का प्रयोग करने वाला होता है। तीनों पाद वैद्य के अधीन हैं और वैद्य स्वतन्त्र है, इसलिये प्रधान है। खाना पकाने में जिस प्रकार पाचक कारण है, और पात्र, ईंधन और आग ये उसके अधीन रहते हैं और जिस प्रकार विजेता की विजय में भूमि, स्थान, सेना, प्रहरण, शस्त्र आदि कारण निमित्त बनते हैं, उसी प्रकार सिद्धि अर्थात् चिकित्सा की सफलता में रोगी, औषध और परिचारक ये तीन कारण निमित्त होते हैं। चिकित्सा में मुख्य कारण वैद्य ही होता है ॥ १०-१२ ॥ मृद्दण्डचक्रसूत्राद्याः कुम्भकारादृते यथा । न वहन्ति गुणं वैद्यादृते पादत्रयं तथा ॥ १३ ॥ गन्धर्वपुरवन्नाशं यद्विकाराः सुदारुणाः । यान्ति यच्चेतरे वृद्धिमाशुपायप्रतोक्षिणः ॥ १४ ॥ सति पादत्रये ज्ञाना ज्ञौ भिषजावत्र कारणम् । जिस प्रकार कुम्हार के बिना मिट्टी, दण्ड, चक्र (चाक) सूत्र आदि मिल- कर भी घड़े को नहीं बना सकते उसी प्रकार वैद्य के बिना रोगी, द्रव्य और परिचारक मिलकर भी चिकित्सा-कार्य में सफलता नहीं प्राप्त कर सकते। रोगी परिचारक और द्रव्य इन तीनों के होनेपर भी अतिशय भयानक जो रोग गन्धर्व पुर की भांति नष्ट हो जाते हैं और दूसरे साधारण रोग भी जो थोड़ी चिकित्सा से भी अच्छे हो सकते हैं-वे जो बढ़ते हैं-इन दोनों में ज्ञानवान् और अज्ञानी वैद्य ही कारण होता है। गन्धर्व पुर जादूगर का बनाया मकान अथवा आकाश का महल ॥ १३-१४ ॥ वरमात्मा हुतोऽज्ञेन न चिकित्सा प्रवर्तिता ॥ १५ ॥ पाणिचाराद्यथाऽचक्षुरज्ञानाद्भीतभीतवत् । नौर्मारुतवशेवाज्ञो भिषक्चरति कर्मसु ॥ १६ ॥ यदृच्छया समापन्नमुत्तार्य नियतायुषम् । भिषङ्कानी निहन्त्याशु शतान्यनियतायुषाम् ॥ १७ ॥ तस्माच्छास्त्रेऽर्थविज्ञाने प्रवृत्तौ कर्मदर्शने । भिषक् चतुष्टये युक्तः प्राणाभिसर उच्यते ॥ १८ ॥ म्थे मूढ़ वैद्य इलाज करे, इससे अच्छा अपनी हत्या कर लेना है। अन्धा कैंकरके डरता हुआ जिस प्रकार हाथ से टटोल कर चलता है, वायु

१२२ चरकसंहिता [ अ० ९ के वश में पड़ी हुई नाव जिस प्रकार कहीं की कहीं वह जाती है, उसी प्रकार मूढ़ वैद्य भी चिकित्सा-कर्म में प्रवृत्त होता है। नियत आयु वाले रोगियों के स्वतः अच्छा हो जाने से अपने को वैद्य मानने वाला मनुष्य जिनको आयु अभी शेष है, ऐसे सैकड़ों रोगियों को अपनी चिकित्सा से बिना समय के ही शीघ्र मार देता है। इसलिये शास्त्र में तत्त्वार्थ के ज्ञान में, क्रिया में, कर्म और कुशलता में इन चार गुणों से युक्त वैद्य ही 'प्राणाभिसर' अर्थात् रोगी के जाते प्राणों को भी लौटा लाने वाला कहलाता है ॥ १५-१८ ॥ हेतौ लिङ्गे प्रशमने रोगाणामपुनर्भवे । ज्ञानं चतुर्विधं यस्य स राजार्हो भिषक्तमः ॥ १९ ॥ जिस वैद्य को रोगोत्पत्ति के कारण, लक्षण, प्रशमन, रोगों की शान्ति और पुनः आक्रमण न होना इन चार बातों का ज्ञान है, वही 'राजवैद्य' होने योग्य है ॥ शस्त्रं शास्त्राणि सलिलं गुणदोषप्रवृत्तये । पात्रापेक्षीण्यतः प्रज्ञां चिकित्सार्थं विशोधयेत् ॥ २० ॥ शस्त्र, शास्त्र और पानी ये तीनों गुण और दोष को उत्पन्न करने में पात्र की अपेक्षा करते हैं। जैसे निर्मल पानी मैले पात्र में रखने से मैला हो जाता है और स्वच्छ पात्र में साफ दीखता है, तलवार से जहाँ दुष्ट चोर आदि का वध हो सकता है, वहाँ सज्जन का भी गला काटा जा सकता है, शास्त्र द्वारा जहाँ रोगी को बचाया जा सकता है, वहाँ मूढ़ वैद्य मार भी सकता है। इसलिये चिकित्सा के लिये वैद्य को अपनी बुद्धि को सदा स्वच्छ रखना चाहिये ॥२०॥ विद्या वितर्को विज्ञानं स्मृतिस्तत्परता क्रिया । यस्यैते षड्गुणास्तस्य न साध्यमतिवर्तते ॥ २१ ॥ विद्या मतिः कर्मदृष्टिरभ्यासः सिद्धिराश्रयः । वैद्यशब्दाभिनिष्पत्तावलमेकैकमप्यतः ॥ २२ ॥ यस्य त्वेते गुणाः सर्वे सन्ति विद्यादयः शुभाः । स वैद्यशब्दं सद्भूतमर्हन् प्राणिसुखप्रदः ॥ २३ ॥ ( विद्या ) आयुर्वेद विद्या, ( वितर्कः ) शास्त्रार्थ मूलक ऊहापोह, (विज्ञान) बहुत शास्त्र के ज्ञान से विज्ञत्व, ( तत्परता ) लग्न, ( क्रिया ) चिकित्साकुशलता जिस वैद्य में ये उपरोक्त छः गुण हैं उसके लिये कोई भी व्याधि असाध्य नहीं है। आयुर्वेद विद्या, विशुद्ध बुद्धि, दृष्ट चिकित्सा, चिकित्सा कार्य में अभ्यास, अनेक रोगियों को आरोग्य युक्त करने में सफलता, सद्गुरु का आश्रय, एक एक भी गुण वैद्य पद प्राप्तकराने में समर्थ है। परन्तु जिस पुरुष में

अ० १०] सूत्रस्थानम् १२३

अ० १०] सूत्रस्थानम् १२३ आदि सब गुण होते हैं, वही सच्चे अर्थों में 'वैद्य' कहला सकता है। वही प्राणियों के लिये सुख देने वाला होता है ॥ २१-२३ ॥ शास्त्रं ज्योतिः प्रकाशार्थं दर्शनं बुद्धिरात्मनः । ताभ्यां भिषक्सुयुक्ताभ्यां चिकित्सान्नापराध्यति ॥ २४ ॥ चिकित्सिते त्रयः पादा यस्माद्वैद्यव्यपाश्रयाः । तस्मात्प्रयत्नमातिष्ठेद्भिषक् स्वगुणसंपदि ॥ २५ ॥ मैत्री कारुण्यमार्तेषु, शक्ये प्रीतिरुपेक्षणम् । प्रकृतिस्थेषु भूतेषु, वैद्यवृत्तिश्चतुर्विधेति ॥ २६ ॥ आयुर्वेद शास्त्र तो प्रकाश करने के लिये ज्योति है और अपनी बुद्धि आंख है। इन दोनों को मिलाकर ठीक तरह से प्रयोग करके चिकित्सक भूल नहीं करता। चिकित्सा के तीन चरण रोगी, परिचारक और द्रव्य वैद्य पर ही आश्रित हैं। इसलिये अपने गुणों को विशेष रूप से प्राप्त करने में वैद्य को प्रयत्नवान् रहना चाहिये । वैद्य का व्यवहार चार प्रकार का है। रोग से पीडित पुरुष में मित्रता और उन पर दया का भाव; साध्य रोगी में स्नेहभाव, मरणासन्न रोगी में उपेक्षा बुद्धि रखना ॥ २४-२६ ॥ तत्र श्लोकौ- भिषग्जितं चतुष्पादं पादः पादश्चतुर्गुणः । भिषक् प्रधानं पादेभ्यो यस्माद्वैद्यस्तु यद्गुणः ॥ २७ ॥ ज्ञानानि बुद्धिर्ब्राह्मी च भिषजां या चतुर्विधा । सर्वमेतच्चतुष्पादे खुड्डाके संप्रकाशितम् ॥ २८ ॥ चिकित्सा के चार चरण प्रत्येक चरण के चार-चार गुण, सब चरणों में प्रधान 'भिषक्' है, क्यों प्रधान है ? वैद्य के गुण, वैद्यों की चार प्रकार की बुद्धि और ब्राह्मी बुद्धि यह सब 'खुड्डाक चतुष्पाद' अध्याय में कह दिया है॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने निर्देशचतुष्के खुड्डाकचतुष्पादो नाम नवमोऽध्यायः समाप्तः ॥ ६ ॥ दशमोऽध्यायः । ॐ अथातो महाचतुष्पादमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥

१२४ चरकसंहिता [ अ० १०

इस के अनन्तर 'महाचतुष्पाद' नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ चतुष्पादं षोडशकलं भेषजमिति भिषजो भाषन्ते, यदुक्तं पूर्वा- ध्याये षोडशगुणमिति, तद्भेषजं युक्तियुक्तमलमारोग्यायति भगवान् पुनर्वसुरात्रेयः ॥ ३ ॥ चार चरण और सोलह कलायुक्त चिकित्सा होती है ऐसा वैद्य कहते हैं । पूर्व के ( खुड्डाक-चतुष्पाद ) अध्याय में जो सोलह गुणों से युक्त चिकित्सा का उपदेश किया है उसी चिकित्सा को युक्ति पूर्वक प्रयोग करने से आरोग्यता मिलती है ऐसा पुनर्वसु आत्रेय ने कहा है ॥ ३ ॥ नेति मैत्रेयः । किं कारणम् , दृश्यन्ते ह्यातुराः केचिदुपकरणवन्तश्च परिचारकसंपन्नाश्चाऽऽत्मवन्तश्च कुशलैश्च भिषग्भिरनुष्ठिताः समुत्तिष्ठ- मानास्तथायुक्ताश्चापरे म्रियमाणास्तस्माद्भेषजमकिंचित्करं भवति । तद्यथा श्वभ्रे सरसि च प्रसिक्तमल्पमुदकं नद्यां वा स्यन्दमानायां पांसुधाने वा पांसुमुष्टिः प्रकीर्ण इति । तथाऽपरे दृश्यन्तेऽनुपकरणाश्चा- परिचारकाश्चानात्मवन्तश्चाकुशलैश्च भिषग्भिरनुष्ठिताः समुत्तिष्ठमानाः, तथायुक्ता म्रियमाणाश्चापरे । यतश्च प्रतिकुर्वन् सिद्ध्यति प्रतिकुर्वन् म्रियते, अप्रतिकुर्वन् सिध्यत्यप्रतिकुर्वन् म्रियते ; ततश्चिन्त्यते भेषज- मभेषजेनाविशिष्टमिति ॥ ४ ॥ 'मैत्रेय' के विचार में यह ठीक नहीं, क्योंकि कुछ रोगी जिन को सब प्रकार के साधन प्राप्त हैं, जिनके सेवक भी हैं, जो संयमी, जितेन्द्रिय भी हैं, और चतुर वैद्य उनकी चिकित्सा करते हैं, वे अच्छे ( स्वस्थ ) होते देखे जाते हैं । इस के सिवाय उपरोक्त सब कुछ होते हुए भी कुछ रोगी मरते हुए भी देखे जाते हैं । इसलिये कहते हैं कि सोलह गुणों से युक्त चिकित्सा कुछ फलदायक नहीं । जिस प्रकार एक बड़े भारी गढ़े या तालाब में थोड़ा सा पानी डालने पर कुछ लाभ नहीं होता और जिस प्रकार बहती हुई नदी में फेंकी हुई धूलि की मुट्ठी निरर्थक होती है, वह पानी में बह जाती है और जिस प्रकार रेत के बहुत बड़े ढेर में डाली हुई रेत की एक मुट्ठी का कुछ लाभ नहीं, इसी प्रकार शुभ कर्मवाले रोगी में चिकित्सा का कोई लाभ नहीं । कुछ रोगी साधनों के बिना ही, सेवकों से रहित, अजितेन्द्रिय, अपथ्यसेवी, और मूढ़ वैद्यों से चिकित्सा कराने पर भी स्वस्थ होते हुये देखे जाते हैं, एवं कुछ ( इस उपरोक्त अवस्था में ) मरते हुए भी देखे जाते (सोलह गुणों से युक्त) चिकित्सा करने पर आरोग्ययुक्त स्वस्थ हो जाते हैं

चिकित्सा करना और न करना दोनों बराबर हैं ॥४॥

बहुत से चिकित्सा करने पर भी मर जाते हैं, बहुत चिकित्सा न करने पर भी स्वस्थ हो जाते हैं, और न करने पर भी मर जाते हैं, अतः सन्देह होता है कि चिकित्सा करना और न करना दोनों बराबर हैं ॥४॥

मैत्रेय ! मिथ्या चिन्त्यत इत्यात्रेयः । किं कारणम् ? ये ह्यातुराः षोडशगुणसमुदितेनानेन भेषजेनोपपद्यमाना म्रियन्त इत्युक्तं तदनुपप- न्नम्, न हि भेषजसाध्यानां व्याधीनां भेषजमकारणं भवति । ये पुनरा- तुराः केवलाद्भेषजादृते समुत्तिष्ठन्ते न तेषां संपूर्णभेषजोपपादनाय समुत्थानविशेषो नास्ति । यथा हि पतितं पुरुषं समर्थमुत्थानायोत्था- पयन् पुरुषो बलमस्यापादद्योत् , स क्षिप्रतरमपरिक्लिष्ट एवात्तिष्ठेत्तद्व- त्संपूर्णाभेषजोपलम्भादातुराः ! ये चाऽऽतुराः केवलादुपजादपि म्रियन्ते, न च सर्व एव ते भेषजोपपन्नाः समुत्तिष्ठेरन्, न हि सर्व व्याधयो भवन्त्युपायसाध्याः, न चापायसाध्यानां व्याधीनामनुपायेन सिद्धिरस्ति, न चासाध्यानां व्याधीनां भेषजसमुदायोऽयमस्ति । न ह्यलं ज्ञानवान् भिषङ्मुमूर्षुमातुरमुत्थापयितुम् । परीक्ष्यकारिणो हि कुशला भवन्ति । यथा हि योगज्ञाऽभ्यासनित्य इष्वासो धनुरादायेषुमरास्यन्नातिविप्रकृष्टे महति काये नापराधवान् भवति सम्पादयति चेष्टकार्यम्, तथा भिषक् स्वगुणसंपन्न उपकरणवान् वीक्ष्य कर्माऽऽरभमाणः साध्यरोगमनपराधः संपादयत्येवाऽऽतुरमारोग्येन, तस्मान्न भेषजमभेषजेनाविशिष्टं भवति ॥५॥

आत्रेय भगवान् इसका उत्तर देते हैं कि हे मैत्रेय ! तुम्हारा ऐसा विचार करना ठीक नहीं है । क्योंकि, रोगी सोलह गुणों से युक्त चिकित्सा करने पर भी स्वस्थ नहीं होते, मर जाते हैं, यह कथन ठीक नहीं है । क्योंकि चिकित्सा से अच्छे होने वाले रोगों में चिकित्सा निष्फल नहीं होती, और जो रोगी औषध- चिकित्सा के बिना भी स्वस्थ हो जाते हैं, उनमें चिकित्सा के पूर्ण कारणों के होने की आवश्यकता भी नहीं होती । जैसे गिरे हुए मनुष्य को जो कि अपने आप उठने में समर्थ है, उठाने के लिये दूसरा पुरुष सहायता देता है, तब वह जल्दी, बिना कष्ट के ही खड़ा हो जाता है । इस प्रकार सम्पूर्ण (सोलह गुणों से युक्त) चिकित्सा प्राप्त होने से रोगी स्वस्थ हो जाते हैं । जो रोगी सम्पूर्ण चिकित्सा के मिलने पर भी मर जाते हैं वे सब रोगी भी सोलह गुण युक्त चिकित्सा से स्वस्थ नहीं हो सकते, क्योंकि सब रोग उपाय से साध्य नहीं हैं (उन से रोग असाध्य भी हैं) और जो रोग उपाय से अच्छे होने वाले हैं वे उपाय के अच्छे भी नहीं होते । इसी प्रकार जो रोगी असाध्य हैं उन को

१२६ चरकसंहिता [ अ० १० सारा औषध-समुदाय भी ठीक नहीं कर सकता। ज्ञानवान् वैद्य भी मरणासन्न रोगी को स्वस्थ करने में समर्थ नहीं होता। जो वैद्य साध्य-असाध्य का विचार करके चिकित्सा का प्रारम्भ करते हैं वे कुशल चिकित्साकार्य में सफल, यशस्वी होते हैं। जिस प्रकार कि प्रयोग विधि को जानने वाला, अभ्यासी धनुर्धारी धनुष को लेकर बहुत दूर के नहीं, प्रत्युत समीपवर्ती स्थूल लक्ष्य पर बाण फेंकता हुआ नहीं चूकता लक्ष्य वेध कर ही लेता है, इसी प्रकार वैद्य अपने गुणों से युक्त, उपकरणवान्, साधनवान्, साध्य-असाध्य का विचार करके काम आरम्भ करके, रोगी के साध्य रोग को स्वस्थ कर देता है, इसमें भूल नहीं करता, इस लिये कहते हैं कि चिकित्सा करना और न करना दोनों समान नहीं हैं ॥ ५ ॥ इदं चेदं च नः प्रत्यक्षं यदनातुरेण भेषजेनाऽऽतुरं चिकित्सामः, क्षाम- मक्षामेण, कृशं च दुर्बलमाप्याययामः, स्थूलं मेदस्विनमपतर्पयामः, शीतेनोष्णाभिभूतमुपचरामः शीताभिभूतमुष्णेन, न्यूनान् धातून् पूर- यामः, व्यतिरिक्तान् ह्रासयामः, व्याधीन् मूलविपर्ययेणोपचरन्तः सम्यक् प्रकृतौ स्थापयामः, तेषां नस्तथा कुर्वतामयं भेषजसमुदायः कान्ततमो भवति ॥ ६ ॥ और यह हमारा प्रत्यक्ष भी है कि रोगी की हम रोगों की प्रकृति से विपरीत गुण वाली औषध से चिकित्सा करते हैं, क्षीणधातु वाले व्यक्ति की पौष्टिक औषधियों से चिकित्सा करते हैं, (कृश) पतले-दुबले को मोटा बनाते हैं, स्थूल चर्बी वाले पुरुष को पतला (कृश) करते हैं, गरमी से पीड़ित व्यक्ति की शीतल चिकित्सा करते हैं, शीत से पीड़ित व्यक्ति की उष्ण पदार्थों से चिकित्सा करते हैं, कम हुए धातुओं को पूर्ण करते हैं, परिमाण से अधिक बढ़े हुए धातुओं को कम करते हैं, रोगों की कारण के विपरीत विरुद्ध चिकित्सा करते हुए दोषों को प्रकृति में भली प्रकार से स्थित करते हैं। रोगी पुरुषों के लिये ऐसा करते हुए ये भैषज्य-समुदाय अर्थात् सोलह गुणयुक्त चिकित्सा व्याधिनाशक और सुखकारी होती है ॥ ६ ॥ भवन्ति चात्र— साध्यासाध्यविभागज्ञो ज्ञानपूर्वं चिकित्सकः । काले चाऽऽरभते कर्म यत्तत् साधयति ध्रुवम् ॥ ७ ॥ अर्थ-विद्या-यशो-हानिमुपक्रोशमसंप्रहम् । प्राप्नुयान्नियतं वैद्यो योऽसाध्यं समुपाचरेत् ॥ ८ ॥ इसमें श्लोक हैं— रोग के साध्य और असाध्य रूप को एवं साध्य असाध्य के गु...

अ० १० ] सूत्रस्थानम् १२७

अ० १० ] सूत्रस्थानम् १२७ जानकर विचारपूर्वक समय पर जो चिकित्सक कार्य का आरम्भ करता है वह उस कर्म को अवश्य पूर्ण करता है और जो चिकित्सक असाध्य व्याधि की चिकित्सा करता है, वह धन, विद्या और यश की हानि उठाता है । उस की निन्दा होती है और लोग उस से चिकित्सा नहीं करवाते, उसका धन्धा नहीं चलता ॥ ७-८ ॥ सुखसाध्यं मतं साध्यं कृच्छ्रसाध्यमथापि च । द्विविधं चाप्यसाध्यं स्याद्याप्यं यच्चानुपक्रमम् ॥ ६ साध्यानां त्रिविधश्चाल्पमध्यमोत्कृष्टतां प्रति । विकल्पो न त्वसाध्यानां नियतानां विकल्पना ॥ १० ॥ साध्य व्याधियां दो प्रकार की हैं, एक ( सुखसाध्य ) सरलता से अच्छी होने वाली और दूसरी (कृच्छ्रसाध्य) कठिनाई से अच्छी होने वाली । असाध्य व्याधियां भी दो प्रकार की हैं, एक (याप्य) जो कि चिकित्सा से कुछ समय के लिये शान्त की जा सकती हैं और चिकित्सा के छोड़ने पर फिर खड़ी हो जाती हैं। दूसरी (अनुपक्रम) सर्वथा असाध्य जो कभी अच्छी नहीं होती । साध्य व्याधियों के पुनः तीन भेद हैं, (१) अल्पसाध्य, (२) मध्यमसाध्य, और (३) उत्कृष्टसाध्य और जो निश्चित रूप से 'असाध्य' हैं, उनका कोई नियत भेद नहीं है, याप्य, असाध्य रोगों के तीन भेद हैं ! यथा अल्पयाप्य, मध्यम याप्य और उत्कृष्टयाप्य ॥ ॥ ६-१० ॥ सुखसाध्य व्याधि के लक्षण- हेतवः पूर्वरूपाणि रूपाण्यल्पानि यस्य च । न च तुल्यगुणो दूष्यो, न दोषः प्रकृतिर्भवेत् ॥ ११ ॥ न च कालगुणस्तुल्यो, न देशो दुरुपक्रमः । गतिरेका नवत्वं च रोगस्योपद्रवो न च ॥ १२ ॥ दोषश्चैकः समुत्पत्तौ देहः सर्वौषधक्षमः । चतुष्पादोपपत्तिश्च सुखसाध्यस्य लक्षणम् ॥ १३ ॥ रोगोत्पत्ति के कारण थोड़े हों, बहुत अधिक या तीव्र कारण न हो, (पूर्वरूप) अर्थात् रोग के प्राथमिक लक्षण भी हल्के हों, और 'रूप' अर्थात् स्पष्ट लक्षण रोग के थोड़े और हल्के हों । (दूष्य रक्त, मांसादि धातु) दोष वातादि कारण के समान न हों, पित्त के कारण से रक्त कुपित न हो, रोगोत्पादक दोष बात आदि रोगी की प्रकृति न हो, वातजन्य व्याधि में रोगी की प्रकृति 'वात' न हो । समय गुण न हो, हेमन्त में कफ संचय होता है, इस समय कफ का रोग न शरीर का अवयव या अनूप अर्थात् जलबहुल प्रदेश अर्थात

१२८ चरकसंहिता [ अ० १० कष्टसाध्य स्थान पर रोग न हुआ हो, अथवा जहां पर कठिनता से चिकित्सा की जाय ऐसे स्थान पर रोग न हुआ हो, दोष की गति एक मार्ग में हो, दो मार्ग में न हो, रोग नवीन हो, रोग के साथ कोई उपद्रव (पीछे उत्पन्न हुई व्याधि या उपसर्ग (Complication) न हो, और चिकित्सा के चारों चरण प्राप्त हों, रोगोत्पत्ति में कारण एक दोष हो तथा शरीर सम्पूर्ण प्रकार की औषध का सहन कर सके तो ये सुखसाध्य अर्थात् सुगमता से अच्छे होने वाले रोग के लक्षण हैं ॥११-१३॥ कृच्छ्रसाध्य रोग के लक्षण— निमित्तपूर्वरूपाणां रूपाणां मध्यमे बले । कालप्रकृतिदूष्याणां सामान्येऽन्यतमस्य च ॥ १४ ॥ गर्भिणी वृद्ध-बालानां नात्युपद्रवपीडितम् । शस्त्र-क्षार-अग्नि-कृत्यानामनवं कृच्छ्रदेशजम् ॥ १५ ॥ विद्यादेकपर्थं रोगं नातिपूर्णचतुष्पदम् । द्विपथं नातिकालं वा कृच्छ्रसाध्यं द्विदोषजम् ॥ १६ ॥ रोग का कारण, रोग का पूर्वरूप और रोग का रूप, स्पष्ट चिन्ह, मध्यम बल, संख्या में मध्यम हो अर्थात् जिस रोग को उत्पन्न करने वाले दोष-प्रकोप के कारण न तो कम और न अधिक हों, काल प्रकृति और दूष्य इनमें से कोई एक रोगोत्पादक दोष के समान साधारण हो, अधिक उपद्रवों से पीड़ित न हो, तो वह रोग कृच्छ्रसाध्य है। गर्भवती, वृद्ध और बालक, इनकी सब व्याधियां कष्टसाध्य हैं। शस्त्र, क्षार और अग्नि इनसे चिकित्सा करते समय जो व्याधि उत्पन्न हो जाय, नवीन न हो, जो रोग पुराना हो, मर्म स्थान, सन्धिस्यान आदि में जो रोग हो, एक मार्गगामी हो, चिकित्सा के चारों अंग पूर्ण न हों दोष दो मार्गानुसारी हों, बहुत समय का न हो, और दो दोषों से उत्पन्न हुआ हो वह रोग भी कष्टसाध्य है ॥१४-१६॥ याप्य व्याधि का लक्षण— शेषत्वादायुषो याप्यमसाध्यं पथ्यसेवया । लब्धाऽल्पसुखमल्पेन हेतुनाऽऽशुप्रवर्तकम् ॥ १७ ॥ असाध्य व्याधि, पथ्य, आहार विहार के पालन करने से आयु के शेष होने के कारण 'याप्य' होती है। कुछ काल तक आराम मिलता है, परन्तु थोड़े से भी कारण से पुनः शीघ्र उत्पन्न हो जाती है, इस प्रकार की व्याधि को याप्य कहते हैं ॥ १७ ॥

अ० १० ] ६ सूत्रस्थानम् १२६

अ० १० ] ६ सूत्रस्थानम् १२६ असाध्य व्याधि का लक्षण— गम्भीरं बहुधातुस्थं मर्मसन्धिसमाश्रितम् । नित्यमनुशायिनं रोगं दीर्घकालमवस्थितम् ॥ १८ ॥ विद्याद् द्विदोषजं, तद्वत्प्रत्याख्येयं त्रिदोषजम् । क्रियापथमतिक्रान्तं सर्वमार्गानुसारिणम् ॥ १९ ॥ औत्सुक्यारतिसंमोहकरनिन्द्रियनाशनम् । दुर्बलस्य सुसंवृद्धं व्याधिं सारिष्टमेव च ॥ २० ॥ मेद आदि गम्भीर धातु में स्थित, रस रक्तादि बहुत धातुओं में स्थित, मर्म सन्धि में आश्रित हो लगातार रात दिन रहता हो २४ घन्टे चारइ महीने बना रहे, देर तक दो चार साल का हो गया हो, दो दोषों से उत्पन्न हो ऐसे रोग को याप्य, और इस प्रकार के ( गम्भीर बहु धातुस्थ आदि ) तीनों दोषों से उत्पन्न रोग 'असाध्य' समझने चाहियें । जो रोग चिकित्सा से बाहर चला गया हो, बहुत बढ़ गया हो, सब मार्ग ( ऊर्ध्व, अधः और तिर्यग् ) तीनों मार्गों में पहुंच गया हो, अत्यन्त प्रसन्नता, अति बेचैनी, एवं मूर्च्छा ( गम्भीर निद्रा ) को उत्पन्न करे, जिस रोग से इन्द्रिय, आंख का देखना, या कान का सुनना आदि नष्ट हो जाये, निर्बल पुरुष में जो रोग बहुत बढ़ा हुआ हो, जिस रोग के लक्षण निश्चित मृत्यु को बताने वाले स्पष्ट हों वह रोग 'असाध्य' हैं, ऐसा रोगी भी असाध्य है ॥१८-२०॥ भिषजा प्राक् परीक्ष्यैवं विकाराणां स्वलक्षणम् । पश्चात्कायसमारम्भः कार्यः साध्येषु धीमता ॥ २१ ॥ साध्यासाध्यविभागज्ञो यः सम्यक् प्रतिपत्तिमान् । न स मैत्रेयतुल्यानां मिथ्याबुद्धिं प्रकल्पयेत् ॥ २२ ॥ वैद्य को चाहिये कि चिकित्सा करने से पूर्व रोगों की उनके लक्षणों से परीक्षा, जांच कर ले कि यह साध्य है या असाध्य है । पीछे साध्य रोगों में कार्य आरम्भ करना चाहिये असाध्यों में हाथ न लगाये। जो वैद्य साध्य और असाध्य के भेदों को भली प्रकार जानता है, वह ज्ञानो बुद्धिमान् वैद्य, मैत्रेय के समान लोगों की मिथ्या बुद्धि को नहीं बढ़ाता ॥२१-२२॥ तत्र श्लोकौ—इहौषधं पादगुणाः प्रभावो भेषजाश्रयः । आत्रेय-मैत्रेय-मती मति-द्वैविध्य-निश्चयः ॥ २३ ॥ ये चतुर्विधविकल्पाश्च व्याधयः स्वस्वलक्षणाः । महाचतुष्पादे येष्वायत्तं भिषग्जितम् ॥ २४ ॥ इति ॥

इस महाचतुष्पाद नामक अध्याय में औषध, चतुष्पाद, गुण, भेषज के

१३० चरकसंहिता [ अ० ११ इसमें दो श्लोक हैं— इस महाचतुष्पाद नामक अध्याय में औषध, चतुष्पाद, गुण, भेषज के आश्रित प्रभाव, आत्रेय एवं मैत्रेय की दो प्रकार की बुद्धि, चार प्रकार के भेद से रोग एवं उनके लक्षण कह दिये हैं, और उन कारणों का भी वर्णन कर दिया है जिनसे वैद्य यशस्वी होता है ॥२३-२४॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने निर्देशचतुष्के महाचतुष्पादो नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥ एकादशोऽध्यायः । —०*०— अथातस्तिस्रैषणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ अब 'तिस्रैषणीय' नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे, जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥२॥ इह खलु पुरुषेणानुपहत-सत्त्व-बुद्धि-पौरुष-पराक्रमेण हितमिह चामु- ष्मिंश्च लोके समनुपश्यता तिस्र एषणाः पर्येष्टव्या भवन्ति, तद्यथा प्राणै- षणा, धनैषणा, परलोकैषणेति ॥ ३ ॥ इस जगत् में जिस पुरुष का मन, ज्ञान, पौरुष, और पराक्रम मानसिक बल नष्ट नहीं हुआ, जो इह लोक में और परलोक में हित चाहता है उस को तीन एषणायें ( इच्छायें ) रखनी चाहियें, ( १ ) प्राणैषणा ( प्राण या जीवन की इच्छा ), ( २ ) धनैषणा ( धन की इच्छा ), (३) परलोकैषणा ॥३॥ आसां तु खल्वेषणानां प्राणैषणां तावत्पूर्वतरमापद्येत । कस्मात् ? प्राणपरित्यागे हि सर्वत्यागः । तस्यानुपालनं-स्वस्थस्य स्वस्थवृत्तित्रातु- रस्य विकारप्रशमनेऽप्रमादः, तदुभयमेतदुक्तं वक्ष्यते च; तद्यथोक्तमनु- वर्त्तमानः प्राणानुपालनाद्दीर्घमायुरवाप्नोतीति प्रथमैषणा व्याख्याता भवति ॥४॥ इन तीनों एष्णाओं में से 'प्राणैषणा' को सब से प्रथम करे, क्योंकि प्राणों के छूट जाने पर सब कुछ छूट जाता है। प्राणैषणा के लिये स्वस्थ ण ... चाहिये कि स्वस्थवृत्त का पालन करे, जिससे कि वह रोगी न हो औ... शान्त करने में प्रमादी न हो । स्वस्थवृत्त और रोगशान्ति के ...

अ० ७ ] सूत्रस्थानम् १३१

अ० ७ ] सूत्रस्थानम् १३१ बातें पूर्व कह दी गई हैं आगे विस्तार से भी कहेंगे । उनका ठीक २ प्रकार से पालन करने से मनुष्य प्राणों की रक्षा कर के दीर्घायु प्राप्त करता है । इस प्रकार से प्रथमौषणा का उपदेश कर दिया ॥ ४ ॥ अथ द्वितीयां धनैषणामानद्येत, प्राणेभ्यो ह्यनन्तरं धनमेव पर्येष्टव्यं भवति, न ह्यतः पापात्पापीयोऽस्ति यदनुपकरणस्य दीर्घमायुः, तस्मादु- पकरणानि पर्येष्टुं यतेत । तत्रोपकरणोपायाननुव्याख्यास्यामः, तद्यथा कृषि-पाशुपाल्य-वाणिज्य-राजोपसेवाद्दीनि, यानि चान्यान्यपि सतामवि- गर्हितानि कर्माणि वृत्ति-पुष्टि-कराणि विद्यात्तान्यरभेत कर्तुम्, तथा कुर्वन् दीर्घजीवितं जीवत्यनवमतः पुरुषो भवतीति द्वितीया धनैषणा व्याख्याता भवति ॥ ५ ॥ अब दूसरी 'धनैषणा' को भी करें । प्राणों से उतर कर धन ही आवश्यक होता है । क्योंकि इससे बढ़कर और कोई पाप संसार में नहीं है बिना साधनों के दीर्घ जीवन व्यतीत करना, इसलिये उपकरणों अर्थात् धन कमाने के साधनों को प्राप्त करने का यत्न करना चाहिये । धन कमाने के साधनों का भी उपदेश करते हैं, जैसे खेती, पशुओं का पालन, वाणिज्य-व्यापार, राजा की सेवा आदि । इनके सिवाय अन्य और भी जो २ कार्य सज्जन पुरुषों से अनिन्दित, जीविका को देने वाले हों, उन को करे इस प्रकार करने से दीर्घायु प्राप्त करता है और तिरस्काररहित जीवन व्यतीत करता है । इस प्रकार से दूसरी 'धनैषणा' की भी व्याख्या करदी । ५ ॥ अथ तृतीयां परलोकैषणामानद्येत । संशयश्चात्र—कथं ? भवि- ष्याम इतश्च्युता न वेति । कुतः संशयः पुनः इति ? उच्यते-सन्ति ह्येके प्रत्यक्षपराः परोक्षत्वात् पुनर्भवस्य नास्तिक्यमाश्रिताः । सन्ति चापरे ये त्वागमप्रत्ययादेव पुनर्भवमिच्छन्ति । श्रुतिभेदाच्च ।- 'मातरं पितरं चैकं मन्यन्ते जन्मकारणम् । स्वभावं परनिर्माणं यदृच्छां चापरे जनाः ॥' इत्यतः संशयः-किं नु खल्वस्ति पुनर्भवो न वेति ॥ ६ ॥ अब तीसरी 'परलोकैषणा' को भी प्राप्त करे । इस 'परलोकैषणा' के विषय में सन्देह है कि यहां से मरने के पीछे फिर जन्म होगा वा नहीं । संशय क्यों है ? कहते हैं-कुछ मनुष्य ऐसे हैं, जो कि प्रत्यक्ष से जानने योग्य वस्तु को [मान]ते हैं और परोक्ष को नहीं मानते । परोक्ष आंख से दिखाई नहीं देता, [इसलिये] ये नास्तिक मत को स्वीकार करते हैं, पुनर्जन्म को नहीं मानते । [किन्तु दूसरे] वेदोपदेश को प्रमाण मानकर ही पुनर्जन्म को मानते हैं । श्रुति की

१३२ चरकसंहिता [अ० ११ भिन्नता के कारण पुनर्जन्म में सन्देह है। कुछ मनुष्य जन्म का कारण माता-पिता को मानते हैं, और कोई स्वभाव को ही जन्म का कारण मानते हैं। तीसरे दूसरे को समस्त जगत् का कारण मानते हैं। चौथे लोग 'यदृच्छा' को ही जन्म का कारण मानते हैं, अर्थात् अपने आप बिना कारण के ही जन्म हो गया है। इसलिये सन्देह होता है कि पुनर्जन्म है, वा नहीं ॥ ६ ॥ तत्र बुद्धिमानास्तिक्यबुद्धिं जह्याद्विचिकित्सां च । कस्मात् ? प्रत्यक्षं ह्यल्पम्, अनल्पमप्रत्यक्षमस्ति यदागमानुमान-युक्तिभिरुपलभ्यते । यैरेव तावदिन्द्रियैः प्रत्यक्षमुपलभ्यते, तान्येव सन्ति चाप्र- त्यक्षाणि ॥ ७ ॥ इस अवस्था में बुद्धिमान् मनुष्य को चाहिये कि 'नास्तिक्य बुद्धि' अर्थात् परलोक नहीं है इस विचार को और संशय को छोड़ दे । क्योंकि प्रत्यक्ष ज्ञान बहुत थोड़ा है और अप्रत्यक्ष ज्ञान बहुत है जिसको आगम शास्त्र, अनुमान और युक्ति से जाना जाता है। जिन ज्ञानेन्द्रियों से प्रत्यक्ष ज्ञान किया जाता है वे इन्द्रियां स्वयं अप्रत्यक्ष हैं, आंख आंख को नहीं देख सकती, नाक नाक को नहीं सूंघ सकती, कान कान को नहीं सुन सकते ॥७॥ सतां च रूपाणामतिसंनिकर्षादतिविप्रकर्षादावरणात्करणदौर्बल्या- न्मनोऽनवस्थानात्समानाभिहारादभिभवादतिसौक्ष्म्याच्च प्रत्यक्षानुपल- ब्धिस्तस्मादपरीक्षितमेतदुच्यते—प्रत्यक्षमेवास्ति, नान्यदस्तीति ॥ ८ ॥ और रूप आदि के बहुत समीप होने से (जैसे पलकों में लगा हुआ काजल), अति विप्रकर्ष अर्थात् बहुत दूर होने से (जैसे बहुत दूर उड़ता हुआ पक्षी), बीच में व्यवधान आने से (जैसे दीवार के पीछे रक्खी वस्तु), इन्द्रिय के निर्बल होने से, मन स्थिर न होने से, एक साथ दो या अधिक भिन्न विषयों में इच्छा करने से, तिरस्कृत होने से यथा—मध्यान्ह में सूर्य की किरणों द्वारा तिरस्कृत नक्षत्रादि, अतिसूक्ष्म होने से, जैसे कृमि या द्वयणकादि का प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं होता। इसलिये जो चार्वाक आदि नास्तिक का यह कहना कि 'प्रत्यक्ष' इन्द्रियों से जिसका ज्ञान होता है वही है, उसके अतिरिक्त और नहीं है वह अपरीक्षित अर्थात् बिना सोचे विचारे कहा गया है ॥८॥ श्रुतयश्चैता न कारणं, युक्तिविरोधात् ॥ ९ ॥ नाना वादिजनों के वचन भी परलोक के न होने में प्रमाण नहीं हैं क्योंकि वे युक्ति (तर्क) से विरुद्ध हैं ॥९॥ युक्ति— आत्मा मातुः पितुर्वा यः सोऽपत्यं यदि संचरेत् । द्विविधं संचरेदात्मा सर्वो वाऽवयवेन वा ॥ १० ॥

अ० ११] सूत्रस्थानम् १३३

अ० ११] सूत्रस्थानम् १३३ सर्वश्चेत्संचरेन्मातुः पितुर्वा मरणं भवेत् । निरन्तरं नावयवः कश्चित्सूक्ष्मस्य चाऽऽत्मनः ॥ ११ ॥ जो लोग कहते हैं कि माता पिता की आत्मा पुत्र रूप में उत्पन्न होती है; इस अवस्था में आत्मा की गति दो प्रकार से हो सकती है । एक, आत्मा सम्पूर्ण पुत्र रूप में आये; दूसरी अवस्था में आत्मा का कोई अवयव पुत्र रूप में आये । यदि सम्पूर्ण आत्मा पुत्र रूप में आता है तो माता या पिता किसी एक की मृत्यु हो जानी चाहिये, और दूसरी अवस्था में सूक्ष्म आत्मा का कोई अवयव हो ही नहीं सकता । परमाणुओं के संयोग से बनी वस्तु का भाग हो सकता है, परमाणु का नहीं ॥ १०-११ ॥ बुद्धिर्मनश्च निर्णीते यथैवाऽऽत्मा तथैव ते । येषां चैषा मतिस्तेषां योनिर्नास्ति चतुर्विधा ॥ १२ ॥ विद्यात्स्वाभाविकं षण्णां धातूनां यत्स्वलक्षणम् । संयोगे च वियोगे च तेषां कर्मैव कारणम् ॥ १३ ॥ जिस प्रकार माता पिता की आत्मा उत्पत्ति का कारण नहीं बन सकती उसी प्रकार ये बुद्धि और मन भी उत्पत्ति का हेतु नहीं बन सकते, क्योंकि मन और बुद्धि दोनों सूक्ष्म हैं, इसलिये इनका भी विभाग नहीं बन सकता । और यदि सम्पूर्ण अवतरण मानो तो माता पिता में से एक मन और बुद्धि से रहित अर्थात् ज्ञान, चिन्तन, बोध से शून्य होना चाहिये । इसलिये यह भी ठीक नहीं । एक और भी दोष है । उनके मतमें योनि चार प्रकार की ( स्वेदज, अण्डज, उद्भिज्ज और जरायुज ) नहीं होती । ( क्योंकि उद्भिज्ज योनि वनस्पति आदि में माता और पिता नहीं है ) । प्राणियों की उत्पत्ति में छः धातु ( पंच महाभूत, पृथ्वी, अप्, तेज, वायु और आकाश एवं छठी चेतना आत्मा ) अपने लक्षणों से स्वभाव से ही कारण बनते हैं । इनके संयोग और वियोग में कर्म ही कारण है ॥ १२-१३ ॥ अनादेश्चेतनाधातोर्नैष्यते परनिर्मितिः । पर आत्मा स चेद्धेतुरिष्टोऽस्तु परनिर्मितिः ॥ १४ ॥ ईश्वर का ही बनाया जगत् मानकर जो लोग आत्मा का अस्तित्व नहीं मानते उनका कथन भी ठीक नहीं है । क्योंकि अनादि ( जिसका आदि नहीं ) धातु ( आत्मा ) का दूसरे से बनाया जाना भी सम्भव नहीं । यदि पूर्व आत्मा नहीं है तो दूसरा पुरुष भी किस उपादान को ले कर दूसरे को क्योंकि अचेतन वस्तु चेतन को उत्पन्न नहीं कर सकता । यदि

१३४ चरकसंहिता [अ० ११ परमात्मा के केवल शरीर का बनाने वाला मानते हो तो तुम्हारे और हमारे सिद्धान्त में कोई भेद नहीं। इसलिये आत्मा नित्य है, वह समय २ पर स्थूल शरीर को छोड़कर परलोक में कर्मों का भोग करके भोग की समाप्ति पर और भोग्य कर्म फलों के भोग के लिये पुनः उत्पन्न होता है ॥१४॥ न परीक्षा न परीक्ष्यं न कर्ता कारणं न च। न देवा नर्षयः सिद्धाः कर्म कर्मफलं न च ॥ १५ ॥ नास्तिकस्यास्ति नैवाऽऽत्मा यदृच्छोपहतात्मनः । पातकेभ्यः परं चैतत्पातकं नास्तिकग्रहः ॥ १६ ॥ यदृच्छा भी जन्म का कारण नहीं है, क्योंकि यदृच्छावादी के मत में न कोई परीक्षा (प्रमाण) है, और न कोई परीक्ष्य अर्थात् प्रमेय वस्तु है। इसलिये माता, पिता, कन्या, बहिन, पत्नी, गुरु, वृद्ध, तपस्वी इत्यादि परीक्षणीय वस्तु के अभाव में मनमाना आचार होना सम्भव है और कर्म भी नहीं है, जिसका कि अच्छा या बुरा फल मिलेगा, इसलिये कर्म फल भी नहीं है। न कर्म का कोई कर्त्ता है, जो कर्म करे। यह सब यदृच्छा से ही, बिना कारण होता है, कारण के न होने से मनचाहा आचरण करने में कोई दोष नहीं होगा, इससे गुरु, सिद्ध पुरुषों में पूज्यापूज्य भाव भी नहीं रहेगा। वह माता, कन्या आदि में दारवत् बुद्धि कर सकेगा, इसलिये जिसका आत्मा यदृच्छावाद से नष्ट हो जाता है ऐसे नास्तिक का आत्मा नहीं रहता। अतः नास्तिक होना सब पातकों से बड़ा पातक है ॥ १५-१६ ॥ तस्मान्मतिं विमुच्यैताममार्गप्रसृतां बुधः । सतां बुद्धिप्रदीपेन पश्येत्सर्वं यथातथम् ॥ १७ ॥ इति । इसलिये बुद्धिमान् को चाहिये कि उल्टे मार्ग में जाने वाली इस विपरीत बुद्धि को छोड़ दे और सज्जन पुरुषों की बुद्धि रूप दीपक से सब वस्तुओं को ठीक २ रूप में देखे ॥ १७ ॥ द्विविधमेव खलु सर्वं—सच्चासच्च, तस्य चतुर्विधा परीक्षा आप्तो- पदेशः प्रत्यक्षमनुमानं युक्तिश्चेति ॥ १८ ॥ संसार में जो कुछ दीख पड़ता है, वह सब दो प्रकार का है, एक सत् और दूसरा असत् । इस की परीक्षा चार प्रकार से होती है, १. आप्तोपदेश २. प्रत्यक्ष ३. अनुमान और ४. युक्ति । आप्तास्तावत् — रजस्तमोभ्यां निर्मुक्तास्तपो-ज्ञान-बलेन ये । येषां त्रैकालममलं ज्ञानमव्याहतं सदा ॥ १९ ॥

अ० ११ ] सूत्रस्थानम् १३५

अ० ११ ] सूत्रस्थानम् १३५ आप्ताः शिष्टा विबुद्धास्ते तेषां वाक्यमसंशयम् । सत्यं, वक्ष्यन्ति ते कस्मादसत्यं नीरजस्तमाः ॥ २० ॥ जो पुरुष तप और ज्ञान के बल से रजोगुण और तमोगुण से मुक्त हो चुके हैं, केवल सत्त्व गुण ही जिन में रह गया है, उनका ज्ञान भूत, भविष्य और वर्त्तमान तीनों कालों में विशुद्ध और कभी भी बाधित नहीं होता । ऐसे पुरुष 'आप्त', 'शिष्ट' और 'विबुद्ध' होते हैं, इन के वाक्य बिना सन्देह के होते हैं । ये पुरुष सदा सत्य ही कहेंगे, जो पुरुष रजस् और तमस् से रहित हैं वे असत्य कैसे बोल सकते हैं ? ॥ १६-२० ॥ प्रत्यक्ष का लक्षण— आत्मेन्द्रिय-मनोऽर्थानां संनिकर्षात्प्रवर्त्तते । व्यक्ता तदात्वे या बुद्धिः प्रत्यक्षं सा निरुच्यते ॥ २१ ॥ आत्मा, इन्द्रिय, मन और अर्थ ( पदार्थ ) इन चारों का एक साथ संयोग होने से जो ज्ञान उत्पन्न होता है, उस को 'प्रत्यक्ष' कहते हैं ॥ २१ ॥ अनुमान— प्रत्यक्षपूर्वं त्रिविधं त्रिकालं चानुमीयते । वह्निर्निगूढो धूमेन मैथुनं गर्भदर्शनात् ॥ २२ ॥ एवं व्यवस्यन्त्यतीतं, बीजात्फलमनागतम् । दृष्ट्वा बीजात्फलं जातमिहैव सदृशं बुधाः ॥ २३ ॥ प्रथम प्रत्यक्ष प्रमाण से देखकर तीन प्रकार से कार्य-लिंगानुमान, कारण- लिंगानुमान और कार्य-कारण लिंगानुमान होता है, भूत, भविष्यत्, और वर्त्तमान इन तीनों समय में परोक्ष का अनुमान किया जाता है । जैसे कि छिपी अग्नि को धुंआ देखकर जानते हैं और गर्भ को देखकर मैथुन कर्म का ज्ञान कर लेते हैं । इसी प्रकार से अतीत काल का ज्ञान अनुमान से कर लेते हैं और जिस प्रकार बीज को देखकर अनागत फल का अनुमान हो जाता है, जैसा बीज होता है, वैसा ही फल लगता है । इसी प्रकार भविष्य काल का भी अनुमान से ज्ञान करते हैं ॥ २२-२३ ॥ युक्ति— जल-कर्षण-बीजर्त्तु-संयोगात्सस्य-संभवः । युक्तिः षड्धातु-संयोगाद् गर्भाणां संभवस्तथा ॥ २४ ॥ मथ्य-मन्थन-मन्थान-संयोगादग्निसंभवः । युक्तियुक्ता चतुष्पाद-संपद्व्याधि-निबर्हणी ॥ २५ ॥