चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
सूत्र-निदान-विमानात्मक
ॐ श्रीः ॐ महर्षि अग्निवेश प्रणीत चरक-संहिता चरक और दृढ़बल से प्रतिसंस्कृत ( हिन्दी अनुवाद ) सूत्र-निदान-विमानात्मक प्रथम खण्ड अनुवादक— कविराज श्री अत्रिदेवजी गुप्त, विद्यालंकार, भिषग्रत्न ( गुरुकुल विश्वविद्यालय ) प्रकाशक— भार्गव पुस्तकालय, गायघाट, बनारस। ब्राञ्च—कचौड़ीगली, बनारस। [द्वितीय संस्करण] सर्वाधिकार सुरक्षित
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दो शब्द श्रीचरकसंहिता आयुर्वेद में एक सर्वमान्य पुस्तक है। इसका पठन पाठन आयुर्वेद के विद्यार्थि के लिये अति आवश्यक है। वास्तवमें चरकसंहिता का तथा दूसरे ग्रन्थों का स्पष्टीकरण जितना पढ़ाने में होता है, उतना पढ़ने के समय नहीं होता। यही कारण है कि आयु- र्वेद सम्प्रदाय के मुख्य आचार्य श्री गंगाधर जी कविराज, श्री योगीन्द्र- नाथ सेन जी श्रीचरकसंहिता पर जल्पकल्पतरु और चरकोपस्कार टीकायें लिखकर आयुर्वेद के प्रेमियों का बहुत उपकार किया। इनमें चरकोपस्कारभाष्य तो विद्यार्थियों के लिये बहुत ही उत्तम और लाभ दायक है। पढ़ते समय विद्यार्थी की मनोवृत्ति बहुत ही विचित्र रहती है; खास कर आजकल के आयुर्वेद कॉलेज की जीवन में; जब कि उसको पाश्चात्य विद्या भी सत्तर प्रतिशत सीखनी होती है। ऐसी अवस्था में तो वह उत्तीर्ण होकर उपाधि ही प्राप्त करने का इच्छुक रहता है। इसमें कोई दो चार अपवाद भी होते हैं। यह वृत्ति हमारे यहां ही हो-यह बात नहीं; पाश्चात्य देशों में भी इसका-मनुष्य धर्म के स्वभाव के अनुसार परिचय मिलता है। इसके लिये संक्षिप्त प्रकाशन, या सारांश रूप में पुस्तकें छोटी-छोटी प्रकाशित की जाती हैं। यह पुस्तकें सस्ती, छोटी तथा आवश्यक सब विषयों से पूर्ण रहती हैं। इनमें विद्यार्थी को जहाँ आर्थिक भार से बचत होती है वहाँ श्रेणी में सुना सब विषय समझने में सरलता रहती है। इसी कारण से या अन्य कारणों से बंगला में, मराठी में या तेलगु में जो भी अनुवाद चरकसंहिता या दूसरे आयुर्वेद ग्रन्थोंके हुए हैं, वे सस्ते, तथा मूल के साथ साथ अनुवाद रूप में ही हैं। उनको स्पष्ट करने के लिये किसी भी अर्वाचीन रूप की सहायता नहीं ली गई और इन ग्रन्थों के पढ़ने से सफल वैद्य बने हैं, ऐसा हमारे देखने में भी है। मेरी अपनी मान्यता यह है कि आयुर्वेद के विचारों को आयुर्वेद के ही दृष्टि कोण से देखा या समझा जा सकता है; और इन्हीं के दृष्टि कोण से देखने और समझने की कोशिश करनी चाहिये। इस अर्वाचीन चिकित्साशास्त्र से हमारे शास्त्र का समन्वय सिद्धान्तों में हो ही नहीं सकता। दोनों पद्धतियां भिन्न हैं, और भिन्न रहेंगी यह कोई आवश्यक नहीं कि दोनों को एक किया जाय। होम्योपैथ अपनी पद्धति का ऐलोपैथी के साथ गोट-जोड़ा नहीं करता। 'आयुर्वेद'
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शब्द और 'एलोपैथी' ये दोनों शब्द ही भिन्न हैं, और इनके अर्थों में तो जमीन और आसमान का अन्तर है। इतनाही नहीं अपितु छत्तीस का सम्बन्ध है। फिर दोनों कैसे एक हो सकते हैं। इसलिये इस प्रकार को मिलाकर पुस्तकें लिखना-प्राचीन ग्रन्थों के प्रति न्याय मैं नहीं समझता। साथ ही आधुनिक विज्ञान प्रति दिन उन्नति पर है, आज से पच्चीस साल के पहले के सिद्धान्त-आज बहुत कुछ बदल गये; आज के सिद्धान्त-कल नहीं बदलेंगें यह कोई नहीं कह सकता। ऐसी अवस्था में इन पुस्तकों में केवल अग्रेंजी पुस्तकों का उलथा देना युक्तिसंगत मैं नहीं समझता ! इन सब बातों का विचार करके मैंने आयुर्वेद के दृष्टिकोण का विचार करते हुए विद्यार्थियों की दृष्टि से, उनकी रुचि के अनुसार यह अनुवाद किया है। यह अनुवाद आज से बीस साल पहले का है, इस संस्करण में भी इसकी पुनरावृत्ति नहीं कर सकता केवल कुछ थोड़े से स्थानों को छोड़कर। क्योंकि संस्करण बहुत दिनों से समाप्त था विद्यार्थियों की मांग थी। इसलिये इसको प्रकाशित करना जल्दी थी। प्रथम प्रकाशक-श्री आर्यसाहित्य मण्डल लिमिटेड अजमेर वालों को कई बार इसके लिये कहा-परन्तु लड़ाई के कारण तथा अन्य असुविधा के कारण वे इसका प्रकाशन नहीं कर सके। कानून के अनुसार पब्लिशर बनने का या पब्लिश करने का सबको अधिकार नहीं। इसके सिवाय कागज की असुविधा। इसलिये मुझे किसी ऐसे पब्लिशर की इच्छा थी जो इस समय इन असुविधाओं में भी इसका प्रकाशन शीघ्र कर दे। श्रीकैलाशनाथजी भार्गव अमर मालिक भार्गव पुस्तकालय काशी वाले से पत्र व्यवहार हुआ और अब तो उन्होंने इसको छापना भी स्वीकार किया जिसका फल यह है कि इस समय में कागज कम्पोजिटर आदि की कठिनाई होते हुए भी यह छप सका। इसके लिये वे धन्यवाद के पात्र हैं। अग्रिम संस्करण में सम्भव हुआ तो इसकी पुनरावृत्ति हो सकेगी। आशा है कि जिस प्रकार वैद्य समाज ने, विद्यार्थियों ने इसकी पहला संस्करण अपनाया था उसी प्रकार इसका यह भी दूसरा संस्करण अपनायेंगे। इति शम्
$\left.{l} गुरुकुल कांगड़ी १-७-४८ \right}$ \hspace{2cm} अत्रिदेवगुप्त
सूत्रस्थानम्
चरक-संहिता विषय-सूची सूत्रस्थानम् प्रथमोऽध्यायः (पृ० १-२६) दीर्घञ्जीवितीयः-ऋषिभरद्वाज का इन्द्र के पास गमन। रोगों का प्रादुर्भाव। ऋषियों की सभा, रोग शान्ति के उपाय पर विचार। इन्द्र के पास जाने के लिये भरद्वाज का निश्चय। भरद्वाज का इन्द्र से त्रिस्कन्ध आयुर्वेद का ग्रहण। भरद्वाज से ऋषियों का आयुर्वेद-अध्ययन। आत्रेय पुनर्वसु का छः शिष्यों को उपदेश। प्रथम तन्त्र-प्रणेता अग्निवेश। भेल आदि अन्य तन्त्रकार। आयुर्वेद का लक्षण। आयु का लक्षण आयु के पर्यायवाची शब्द। सामान्य और विशेष। आयुर्वेद के प्रकाश करने का प्रयोजन। द्रव्य। गुण। इन्द्रियों के अर्थ। कर्म। समवाय। द्रव्य का लक्षण। गुणों का लक्षण। कर्म का लक्षण। सामान्य आदि छः कारण उनके कार्य धातुओं के विषम होने का कारण। सुख दुःखों का आश्रय आत्मा का स्वरूप। रोगप्रकृति। रोगों का प्रतीकार और उनके भेद। वायु का लक्षण पित्त का लक्षण कफ का लक्षण। साध्य रोगों की शान्ति रसों की उत्पत्ति। रसों द्वारा दोषों की शान्ति। द्रव्य के भेद। जंगम द्रव्य भौम द्रव्य। औद्भिद् द्रव्य के चार भेद उनके अंग। मूलिनी वनस्पतियां उनकी गणना इनके कर्म। फलिनी वनस्पतियां इनके कर्म। चार प्रकार के स्नेह इनके कर्म आठ प्रकार के मूत्र। मूत्रों के सामान्य गुण। आठ प्रकार के दूध उनके सामान्य गुण। दूध के कर्म। दूध वाले वृक्ष उनके गुण। उपसंहार। औषधि ज्ञान का प्रयोजन, न जानी हुई औषधियों से हानियां। वैद्य के कर्तव्य। अध्याय संग्रह। द्वितीयोऽध्यायः (पृ० २६-३७) अपामार्गतण्डुलीयः-शिरोविरेचनोपयोगी द्रव्य। वमनकारक द्रव्य। विरेचन द्रव्य। आस्थापन और अनुवासन के द्रव्य। मात्रा और काल के विचार की आवश्यकता। रोगियों के लिये विशेष आहार द्रव्य, यवागू और विलेपीपाक। उपसंहार। तृतीयोऽध्यायः (पृ० ३७-४५) आरग्वधीयः-त्वक्-रोगोंपर ३२ योगों का वर्णन
चन का शब्दार्थ संशमन चिकित्सा ।
( २ ) चतुर्थोऽध्यायः ( पृ० ४५-६२ ) षड्विरेचनशताश्रितीयः-विरे- चन का शब्दार्थ संशमन चिकित्सा । विरेचन के छः सौ योग विरेचन ओष- धियों के ६ आश्रय कषाय की पांच योनियां । कषाय कल्पना की ५ विधि । कषायों के लक्षण । महाकषाय । ५०० कषायों की कल्पना । उत्तम वैद्य । पञ्चमोऽध्यायः ( पृ० ४५-८२ ) मात्राशितीयः-आहार की मात्रा आहार के चार प्रकार । मात्रा में खाने का फल । स्वस्थवृत्त । धूम्र प्रयोग की विधि । स्नैहिक धूम वैरेचनिक धूम । धूम्रपान के गुण । धूम्रपान के आठ काल । ठीक प्रकार से पान किये हुए धूम- पान का लक्षण। अधिक धूम्रपानमंड त्पन्न उपद्रव और उनकी चिकित्सा । धूम्रपान के अयोग्य जन । धूम पीने की विधि । धूम्रपान के आसन । नलिका की बना- वट । अयोग्य रूप में पिये धूम के लक्षण । अतियोग के रूप में धूमपान के लक्षण । नस्य प्रयोग । अणु तैल की विधि । दन्तधावन की विधि । दातुन करने से लाभ । जीभ को साफ़ करने की विधि । दातुन के लिये उत्तम वृक्ष स्नेहगण्डूष के गुण । शिर पर तैल लगाने से लाभ । कान मे तैल डालने से लाभ । शरीर पर तैल लगाने की विधि । पांव में तैल मर्दन के गुण । उबटन लगाना । स्नान का फल । स्वच्छ वस्त्र पहिनने के गुण । गन्ध माला आदि धारण करने के गुण । रत्न, आभू- षण आदि धारण करने से लाभ । दीर्घायु के लिये आवश्यक शुचिकर्म : जूता पहिनने के गुण । दण्ड धारण के गुण । संक्षेप से स्वस्थवृत्त । उपसंहार । षष्ठोऽध्यायः ( पृ० ८५-६४ ) तस्याशितीयः-- भोजन पर आश्रित आदान और विसर्ग काल का वर्णन । दो अयन । हेमन्तकाल की परिचर्या । हेमन्त ऋतु में त्याज्य । वसन्त की ऋतुचर्या । ग्रीष्मचर्या-वर्षाकाल की ऋतुचर्या । शरद्ऋतु की परिचर्या । हंसोदक का लक्षण । आंकःसात्म्य । उपसंहार ! सप्तमोऽध्यायः ( पृ० ६४-१०६ ) न वेगान्धारणीय.-मल मूत्र आदि के न रोकने का उपदेश । उनके रोकने से हानियां और चिकित्सा । मन के निन्दित कार्य । वाणी के निन्दित कर्म-शरीर के निन्दित कर्म । व्यायाम से लाभ। अधिक व्यायाम से हानियाँ । हितकारी कार्यों के सेवन का क्रम । प्रकृति । तदनुसार हित सेवन का उप- देश-कारण से उत्पन्न होने वाले रोगों से बचने के उपाय । आगन्तुज रोगों के प्रतिकार । सेवन करने योग्य मनुष्य । उपसंहार । अष्टमोऽध्यायः ( पृ० १०७-११६ ) इन्द्रियोपक्रमणीयः-इन्द्रिय और उनके अर्थ और मन का वर्णन । पांच इन्द्रिय, उनके ग्राह्य पांच द्रव्य । उनके पांच ग्राह्य अर्थ । अध्यात्म गुण । द्रव्या- श्रित कर्म । इन्द्रिय और उनके साथ
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ग्राह्य विषयों के समयोग, अयोग, हीन- योग मिथ्यायोग और अतियोग । उनके परिणाम । सद्वृत्त शिक्षा । भोजन विषयक सद्वृत्त । शौचसद्वृत्त । स्त्रियों के सहयोग में सद्वृत्त । गुरुजनों के प्रति सद्वृत्त । अध्ययन के सम्बन्ध में सद्- वृत्त । शिष्टाचार । इति स्वस्थचतुष्कः । नवमोऽध्यायः (पृ० ११६-१२३) खुड्डाकचतुष्पादः—चिकित्सा के शुद्ध चार चरण । चिकित्सा का लक्षण । वैद्य के गुण । द्रव्य के गुण । परिचारक के गुण-रोगी के गुण । चिकित्सा के मुख्य कारण-वैद्य । मूढ़ वैद्य-उसके दोष । उपसंहार । दशमोऽध्यायः (पृ० १२३-१३०) महाचतुष्पादः—चिकित्सा का प्रयोजन । चिकित्सा करने और न करने पर विचार-मैत्रेय-आत्रेय संवाद । चिकित्सा की प्रत्यक्ष सफलता । रोगों के साध्यासाध्य पर विचार । सुख- साध्य-कृच्छ्रसाध्य । साध्य व्याधियों के तीन भेद । असाध्य और याप्य रोग । सुखसाध्य व्याधि के लक्षण । याप्य व्याधि के लक्षण । असाध्य व्याधि के लक्षण । वैद्य का कर्त्तव्य । उपसंहार । एकादशोऽध्यायः (पृ० १३०-१४८) त्रिस्रैषणीयः—तीन एषणाओंका वर्णन । प्राणैषणा, धनैषणा, परलोकै- षणा । नास्तिकता पर विचार-परलोक और आत्मा की सत्ता पर विचार । नास्तिक मतों का खण्डन । सत् असत् की चार प्रकार की परीक्षा । आप्तों के लक्षण । आप्तोपदेश-प्रत्यक्ष अनुमान- युक्ति। इन के द्वारा पुनर्जन्म का निर्णय । आप्तागम-वेद का निर्णय । प्रत्यक्ष अनु- मान युक्ति इन के द्वारा निर्णय । तीन प्रकार के उपस्तम्भ । तीन प्रकार का बल. रोग के तीन आयतन-पांचों ज्ञानेन्द्रिय और मन के अतियोग, अयोग, मिथ्या- योग । सात्म्य-असात्म्येन्द्रियार्थसंयोग । मिथ्यायोग-प्रज्ञापराध । काल—काल के अतियोग, अयोग, मिथ्यायोग । काल परिणाम । रोग के तीन प्रकार । मानस रोगों की औषध । तीन रोगमार्ग— शाखा मर्मस्थ और कोष्ठ । सात रोग- मार्ग । मध्यम रोगमार्ग । आभ्यन्तर रोगमार्ग । भिषक् वैद्य के तीन प्रकार । छद्मचर वैद्य का लक्षण । सिद्ध साधित वैद्य-सद्-वैद्य के लक्षण । औषध के तीन प्रकार-दैवव्यपाश्रय, युक्तिव्य- पाश्रय और सत्त्वावजय । औषध के तीन प्रकार-अन्तःपरिमार्जन-बहिःपरिमार्जन, शस्त्रप्रणिधान । संग्रह । द्वादशोऽध्यायः (पृ० १४८-१५५) वातकलाकलीयः—वायु के अं- शांश-विकल्पना पर विचार । सांकृत्या- यन कुश का मत । कुमारशिरा भारद्वाज का मत । कांकायन का मत । धामागर्व बडिश का मत । वार्योविद का मत । मरीचि का मत । वार्योविदमरीचि-संवाद । मरीचि-काप्य संवाद । पुनर्वसु आत्रेय का मत । उपसंहार ।
प्रकार के उत्पत्तिस्थान—स्थावर और
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[बायाँ स्तम्भ] त्रयोदशोऽध्यायः (पृ० १५१-१७२) स्नेहाध्यायः—अग्निवेश का प्रश्न पुनर्वसु का प्रतिवचन। स्नेहों के दो प्रकार के उत्पत्तिस्थान—स्थावर और जंगम। सब तेलों में सर्वश्रेष्ठ तिल तैल और स्नेहों में घृत। स्नेहों के गुण स्नेहपान गुण—उससे हानियाँ। स्नेह की २४ प्रकार की प्रविचारणाएं। स्नेह की तीन मात्रा प्रधान, मध्यम, ह्रस्व। कौनसा स्नेह किसके लिये हितकारी। स्नेह के अयोग्य व्यक्ति। स्निग्ध, अस्नि- ग्ध, अति स्निग्ध के लक्षण। स्नेहन कालमें हिताहित। उपसंहार। चतुर्दशोऽध्यायः (पृ० १७२-१८४) स्वेदाध्यायः—स्वेदविधि। स्ने- हन, स्वेदन के गुण—उपयोगिता— उसके परिणाम। स्वेदन की अवधि— अतिस्वेदन के लक्षण और उपचार। स्वेदन देने योग्य व्यक्ति। स्वेद-योग्य व्यक्ति। स्वेदन द्रव्य। नाड़ीस्वेद। उपनाहविधि। संकरस्वेद। प्रस्तरस्वेद। नाड़ीस्वेद। परिषेकस्वेद। अवगाहस्वेद जेन्ताकस्वेद। अश्मघनस्वेदविधि। कर्षू- स्वेद। कुटीस्वेदविधि। भूस्वेदविधि। कुम्भीस्वेदविधि। कूपस्वेद। होलाक- स्वेद। अग्निरहित स्वेद। स्वेदके दो प्रकार, अग्निस्वेद, निरग्नि-इनके भेद। उपसंहार। पञ्चदशोऽध्यायः (पृ० १८४-१९५) उपकल्पनीयः—चिकित्सा के पूर्व उचित साधनों के संग्रह का प्रयोजन। आयुर्वेद के ज्ञान-अज्ञान की तुलना-
[दायाँ स्तम्भ] अग्निवेश-आत्रेय संवाद। संशोधन के उपयोगी नाना प्रकार के उपकरणों का संग्रह। स्नेहन, स्वेदन की विधि। वमन के अयोग, सम्यकयोग और अतियोग के विशेष लक्षण। उत्तर उपचार-उपसंहार। षोडशोऽध्यायः (पृ० १९५-२०८) चिकित्साप्राभृतीयः—सद् वैद्य और असद् वैद्य के प्रयोगों में भेद। सम्यग् विरेचन के लक्षण। विरेचने के अतियोग के लक्षण। संशोधन योग्य व्यक्ति। संशोधन का फल। अतियोग होने पर क्या करना चाहिये। धातुओं की समता और विषमता पर विचार। उपसंहार। सप्तदशोऽध्यायः (पृ० २०८-२२५) कियन्तःशिरसीयः—शिरोरोग, हृदयरोग, वात आदि दोषों के संसर्गों से उत्पन्न रोग, क्षय-और-पिड़का और दोषों की गति के सम्बन्ध में अग्निवेश का प्रश्न। गुरु आत्रेय पुनर्वसु का प्रति- वचन। शिर में उत्पन्न होने वाले पांच प्रकार के शिरोरोग। वातजन्य शिरो- रोग के लक्षण। पित्तजन्य, कफजन्य और त्रिदोषजन्य शिरोरोग के लक्षण। पांच प्रकार के हृदय रोग। वातजन्य, पित्तजन्य, कफजन्य, और त्रिदोषजन्य हृदयशूल के लक्षण। कृमिजन्य हृद- यरोग के लक्षण। वात आदि दोषों के संसर्ग से उत्पन्न विकारों के ६२ भेद। दोषों के उपद्रव। अठारह प्रकारके क्षय। ओज का स्वरूप। क्षय के कारण।
विद्रधि, पिड़का । विद्रधि का निदान
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मधुमेह के कारण । सात पिडकाएं । विद्रधि, पिड़का । विद्रधि का निदान स्राव के लक्षण । साध्य-असाध्य विद्रधि के लक्षण । भेद के दोष से उत्पन्न पिड़- काएं-शराविका, कच्छपिका, जालिनी । सर्षपी, अलजी, विनता आदि-इनके उपद्रव दोषों की तीन प्रकार की गति । तीन प्रकार की और गति, संचय, प्रकोप और शमन-संचय के दो भेद-प्राकृत और वैकृत । उपसंहार । अष्टादशोऽध्यायः (पृ० २२१-२३१) त्रिशोथीयः—तीन प्रकार का शोथ ( सूजन )-उसके पुनः दो प्रकार निज और आगन्तु । आगन्तु शोथ का निदान-चिकित्सा । निज शोथ के कारण और सामान्य लक्षण । वातजन्य शोथ के लक्षण । शोथ के दो, तीन, चार, और सात प्रकार । वात, पित्त, कफ और सन्निपात आदि से उत्पन्न शोथों के लक्षण । कष्टसाध्य शोथ । शोथ के उपद्रव । उपजिह्विका, गलगुण्डिका, गलगण्ड, गलग्रह, विसर्प, पिड़का और शंखक के लक्षण । गुल्म, प्लीहा, उदर, आनाह, का लक्षण । रोहिणी रोग, । मृदु, दारुण भेद से साध्य-असाध्य रोग के लक्षण । पीड़ा, वर्ण, समुत्थान, कारण, स्थान, संस्थान नाम भेद आदि के कारण रोग के असंख्य भेद । दोषों के प्राकृत और विकृत के लक्षण । उपसंहार । ऊनविंशोऽध्यायः (पृ० २३१-२३७) अष्टादरीतः—उदर रोग आदि ४८ प्रकार के रोगों की गणना और उनके भेदों के नाम से निर्देश । आठ प्रकार के उदर रोग । सात प्रकार के कुष्ठ । छः प्रकार के अतीसार । पांच प्रकार के गुल्म । चार प्रकार का अपस्मार । तीन प्रकार का शोथ । दो प्रकार का ज्वर । दो प्रकार के व्रण-दो आयाम—दो प्रकार की गृध्रसी—दो प्रकार का कामला—दो प्रकारका आम दो प्रकार का वातरक्त—एक प्रकार का ऊरुस्तम्भ—एक प्रकार का संन्यास— एक प्रकार का महागद । तीन प्रकार की क्रिमि जातियां-बीस प्रकार के प्रमेह- बीस प्रकार के योनिरोग । उपसंहार । विंशोऽध्यायः ( पृ० २३७-२४६ ) महारोगाः—चार प्रकार के रोग, इनकी समानता, लिंग और आयतन भेद से असंख्य रोग—उनका भेदक कारण। दो प्रकार के विकार—सामान्य और नानात्मज । अस्सी प्रकार के वात- विकार । चालीस पित्तविकार । उनके लक्षण । बीस कफजन्य रोग । उनके लक्षण । उपसंहार । एकविंशोऽध्यायः (पृ० २४६-२५५) अष्टौनिन्दित्तीयः—आठ निन्दित पुरुष । विशेष रूप से निन्दित दो, अति- स्थूल और अतिकृश स्थूल पुरुष के दोष, कारण और लक्षण । अतिकृश के दोष, कारण और लक्षण । आदर्श पुरुष । स्थूल को कृश बनाने के लिये उपाय । कृश रोग की चिकित्सा । निद्रा के उचित सेवन से लाभ । दिन में सोने के योग्य व्यक्ति,
( ६ )
[बायाँ स्तम्भ] उनको दिन में सोने से लाभ । दिन में सोने का उचित काल-ग्रीष्म ऋतु-अन्य ऋतुओं में दिन में सोने से हानियाँ । रात्रिजागरण के दोष । निद्रोत्पादक उपाय । अनुचित निद्रा को रोकने के उपाय । उपसंहार । द्वाविंशतितमोऽध्यायः (पृ०२५६-२६१) लंघनबृंहणीयः—वैद्य का लक्षण लंघन, बृंहण, स्नेहन, स्तंभन के सम्ब- न्ध में अग्निवेश का प्रश्न । आत्रेय पुनर्वसु का प्रतिवचन । लंघन, बृंहण, स्वेदन, स्तम्भन के लक्षण । लंघन, बृंहण आदि कारक द्रव्यों के कारण । लंघन के योग्य व्यक्ति । बृंहण के योग्य द्रव्य और व्यक्ति । विरूक्षण करने योग्य व्यक्ति और द्रव्य । स्तम्भन द्रव्य और स्तंभन योग्य व्यक्ति । सम्यक् लंघन और लंघन के अतियोग के लक्षण । सम्यक् बृंहण और बृंहण के अतियोग के लक्षण । रूक्षण के सम्यकयोग और अतियोग । स्तम्भन के सम्यकयोग और अतियोग के लक्षण । लंघन आदि छः क्रियाओं के अयोग, हीनयोग के दुष्परिणाम । त्रयोविंशतितमोऽध्यायः पृ० २६१-२६६ सन्तर्पणीयः—सन्तर्पणजन्य रोग के कारण । रोगों के लक्षण—उनकी चिकित्सा । अपतर्पण और तज्जन्य रोग— उनका उपशमन । चतुर्विंशतितमोऽध्यायः पृ० २६७-२७४ विधिशोणितीयः—विशुद्ध रक्त का लाभ । रक्त दूषित होने के कारण
[दायाँ स्तम्भ] और लक्षण । चिकित्सा । विशुद्ध रक्त का लक्षण । विशुद्ध रक्त वाले पुरुष का लक्षण । मद के लक्षण । मूर्च्छा के लक्षण । अपस्मार और संन्यास के लक्षण । इन के उपाय । उपसंहार । पञ्चविंशतितमोऽध्यायः पृ०२७५-२८१ यज्जःपुरुषीयः—पुरुष और रोग की उत्पत्ति पर ऋषियों का संवाद । पारीक्षि मौद्गल्य का मत पुरुष और रोगों का उपादान कारण 'आत्मा' है । शरलोमा का मत पुरुष और रोगों का उत्पादन 'सत्त्व' है । वार्योविद का मत प्राणियों और रोगों का उत्पत्ति मूल 'रस' है । कुशिक हिरण्याक्ष का मत पुरुष और रोग ६ धातुओं से उत्पन्न होते हैं । शौनक का मन रोगों और पुरुष की उत्पत्ति माता पिता से हुई । भद्रकाप्य का मत कर्म से पुरुष और रोग उत्पन्न होते हैं । भरद्वाज का मत कर्त्ता से स्वभावतः पुरुष और रोग उत्पन्न होते हैं । कांकायन का मत सुख दुःख, चेतन अचेतन का कर्त्ता प्रजापति हैं । आत्रेय भिक्षु का मत पुरुष और रोगादि काल से उत्पन्न होते हैं पुनर्वसु आत्रेय का सिद्धान्त पञ्च महाभूतों से पुरुष और उनसे ही रोग उत्पन्न हुए । इस पर पुरुषों और रोगों की वृद्धि के कारण के विषय में काशिपतिवामक का प्रश्न । भगवान् आत्रेय का प्रति- वचन हिताहित सेवन । अग्निवेश आत्रेय संवाद हित अहित का लक्षण । आहार द्रव्य पर विचार । हित आहार ।
लक्षण। द्रव्यों के नौ उत्पत्ति स्थान।
( ७ )
[बायाँ स्तम्भ]
अहित आहार। हित और अहित उप- योगी द्रव्य। श्रेष्ठ द्रव्य। श्रेष्ठ का लक्षण। द्रव्यों के नौ उत्पत्ति स्थान। उपसंहार ! षड्विंशोऽध्यायः (पृ० २६१-३२२) आत्रेयभद्रकाप्यीयः—ऋषि संवाद ! रस के विषय में भद्रकाप्य का मत रस एक है ब्राह्मण शाकुन्तेय का मत रस दो हैं पूर्णाक्ष मौद्गल्य का मत रस तीन हैं हिरण्याक्ष कौशिक का मत रस चार होते हैं कुमारशिरा भरद्वाज का मत रस पांच हैं। वार्योविद का मत रस छः हैं वैदेह निमि का मत रस सात हैं धामागंव वडिश का मत रस आठ हैं बाल्हीक भिषक् कांकायन का मत रस अगणित हैं। पुनर्वसु आत्रेय का मत रस छः हैं रसों की उत्पत्ति, कर्म, रुचि और प्रभाव। रस विवेचन। द्रव्यों के भेद उनके कर्म। कर्म, वीर्य, काल, अधिकरण, उपाय, तथा फल के लक्षण। द्रव्य, देश, काल, प्रभाव से द्रव्यों के ६३ भेद। रसों के भेद, दो दो रस के १५ भेद। तीन २ रसों के बीस भेद। चार चार रसों के १५ भेद। पांच २ रसों के छः भेद। एक २ रस के छः भेद, सर्वयोग ६३ रस। वैद्यप्रशंसा। अनुरस। अतिरिक्त दश गुण। इनके लक्षण। रसों की उत्पत्ति। रसों के अनुसार द्रव्यों के गुण कर्म। मधुर रस। अम्ल रस। लवण रस। बहुत उपयोग से हानियां। कटु रस के गुण अति सेवन
[दायाँ स्तम्भ]
से हानियां। तिक्त रस के गुण उसके अति सेवन से हानियां। कषाय रस के गुण और उसके अति सेवन से हानियां। रसानुसारी द्रव्यों का वीर्य। रसों में तर-तमयोग। विपाक। पदार्थों के वीर्य ८ प्रकार के। विपाक का लक्षण, प्रभाव। छः रसों के लक्षण। विरोधी आहारों के लक्षण उनके गुण दोष हितकारी अन्न। कालविरुद्ध, देशविरुद्ध अग्निविरोधी, परस्परविरोधी, सात्म्य- विरोधी, दोषविरोधी, संस्कारविरुद्ध, वीर्यविरोधी, कोष्ठविरोधी, अवस्थाविरुद्ध क्रमविरुद्ध, परिहारविरोधी, पाकविरोधी, संयोगविरोधी, सम्पद्विरुद्ध, और शास्त्र- विरुद्ध आहारों का वर्णन। विरोधी अन्न सेवन से रोगों की उत्पत्ति। विरुद्ध अन्न सेवन से उत्पन्न रोगों का प्रति- कार। उपसंहार। सप्तविंशोऽध्यायः (पृ० ३२२-३७४) अन्नपानविधिः—प्राणरूप अन्न का स्वरूप। प्राणों का मूल जाठराग्नि अन्न इन्धन-अन्नपान विधि का विस्तार से वर्णन। जल, क्षार, घृत, दूध, मद्य, सिरका, फाणित, पिण्याक, दालें, मधु आदि के सामान्य गुण दोष। आहार पदार्थों के १२ वर्ग शूकधान्यवर्ग। शमीधान्यवर्ग। मांसवर्ग। बिलेशय वारिशय जलचर जंगलीसूग बिकिर प्रतुद प्रसह और आनूप ये मांस के आठ उत्पत्ति स्थान। इन मांसों के गुण। शाकवर्ग। फलवर्ग। हरितवर्ग। मद्यवर्ग। जलबर्ग। दुग्धवर्ग। इक्षु-
वर्ग। कृतान्नवर्ग। आहारयोनिवर्ग।
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[Column 1] वर्ग। कृतान्नवर्ग। आहारयोनिवर्ग। प्रशस्त धान्य। त्याज्य मांस। त्याज्य शाक। अनुपान। उनके गुण। जल के अनुपान के अयोग्य व्यक्ति। खाद्य पदार्थों में गुरु लघु विचार। उपसंहार। अष्टाविंशोऽध्यायः (पृ० ३७४-३८५) विविधाशितपीतीयः—शरीर के सब धातुओं का अन्न से सम्बन्ध। आहार से उत्पन्न तीन पदार्थ रस, किट्ट और मल हिताहित आहार और रोग एवं आरोग्यविषयक अग्निवेश का प्रश्न आत्रेय पुनर्वसु का समाधान। धातु गत रोग-रसजन्य रोग। रक्तजन्य, मांसजन्य, मेदजन्य, मज्जाजन्य और शुक्रजन्य रोग। अपथ्याहार से मलों का प्रकोप। धातुजन्य विकारों की चिकित्साओं का निर्देश। उपसंहार। इयच्चान्नपानमुक्तम् ॥ एकोनत्रिंशोऽध्यायः (पृ० ३८५-३६०) दश प्राणायतनीयः—प्राण के दश स्थान। प्राणाभिसर वैद्य के लक्षण। रोगाभिसर वैद्य के लक्षण। छद्मवेषी वैद्यों का वर्णन। उपसंहार। त्रिंशत्तमोऽध्यायः (पृ० ३६१-४०७) अर्थे दशमहामूलीयः—हृदय में आश्रित दस धमनियां। हृदय के पर्याय। हृदय का महत्त्व। दस महामूल धम- नियों का प्रतान। धमनी के पर्याय। सेवन योग्य पदार्थ। आयुर्वेद के ज्ञाता के लक्षण। वाक्यार्थ 'अर्थावयवशः निरूपण'। आयुर्वेद का मूल वेद अथर्व
[Column 2] वेद। आयु के समानार्थक पर्याय। आयुर्वेद का लक्षण। आयु का लक्षण। आयुर्वेद की नित्यता आयुर्वेद के आठ अंग। आयुर्वेद के अधिकारी। वैद्य की परीक्षा। चरक तन्त्र के आठ स्थान उनके अध्यायों की पृथक् २ गणना और नाम से निर्देश। तन्त्रयुक्ति। ग्रन्थ संक्षेप। प्रतिवादी उपार्ता वैद्या- भास को पराजय करने का प्रकार। तन्त्रविज्ञों और गर्वीले वैद्यों के स्वरूप। उपसंहार। इति सूत्रस्थानम् ॥ निदानस्थानम् प्रथमोऽध्यायः (पृ० ४०८-४२१) ज्वरनिदानम्—निदान के पर्याय। रोग के तीन प्रकार—आग्नेय, सौम्य और वायव्य। निदानाष्टक अर्थात् रोग के पर्याय। पूर्वरूप लिंग उपशय, सम्प्राप्ति के लक्षण। सम्प्राप्ति के भेद। ज्वर निदान। ज्वर-दाह के लक्षण। पित्तज्वर सम्प्राप्ति भेद लक्षण। कफ- ज्वर सम्प्राप्ति और लक्षण। समंसर्ग व सांनिपातिक ज्वर। आगन्तुकज्वर सम्प्राप्ति-लक्षण। ज्वर-ज्वर के भेद ज्वर के पूर्वरूप ज्वर की उत्पत्ति ज्वर का परिणाम। ज्वर के चिकित्सासूत्र। जीर्ण ज्वर में घृतपान। संस्कार सिद्ध घृत-घृत की श्रेष्ठता। उपसंहार। द्वितीयोऽध्यायः (पृ० ४२१-४२८) रक्तपित्तनिदानम्—रक्तपित्त का लक्षण। पित्त प्रकोप से रक्त का दोष। लोहित पित्त वा रक्तपित्त नाम पड़ने
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[बायाँ स्तम्भ] का हेतु । रक्तपित्त के पूर्वरूप । रक्तपित्त के उपद्रव । रक्तपित्त के दो मार्ग साध्य असाध्य के विचार । रक्तपित्त का इति- हास । ऊर्ध्वगामी रक्तपित्त साध्य । अधोगामी रक्तपित्त याप्य । उभयमार्ग- गामी रक्तपित्त असाध्य । द्विदोषज या त्रिदोषज रक्तपित्त की चिकित्सा । साध्य रोग के असाध्य हो जाने के कारण । असाध्य रक्तपित्त के लक्षण । उपसंहार । तृतीयोऽध्यायः (पृ० ४२८-४३६) गुल्मनिदानम्—गुल्म के पांच भेद—वातगुल्म, पित्तगुल्म, कफगुल्म, निचयगुल्म, रक्तगुल्म । इनके सम्बन्ध में अग्निवेश का प्रश्न । वातगुल्म । सम्प्राप्ति और लक्षण । वात के साथ पित्त प्रकोप के कारण । पित्तगुल्म की सम्प्राप्ति । वात के साथ कफ प्रकोप के कारण । कफगुल्म की सम्प्राप्ति । सान्निपातिक गुल्म । रक्तगुल्म । रक्त- गुल्म की सम्प्राप्ति । गुल्म का पूर्वरूप उपसंहार । चतुर्थोऽध्यायः (पृ० ४३६-४५०) प्रमेहनिदानम्—प्रमेहों की संख्या । रोगों के विधान भेद-अध्याय । कफप्रमेह के कारण । कफप्रमेह के दूष्य । कफप्रमेह की सम्प्राप्ति । विकृत कफ के दश गुण । कफजन्य दश प्रमेह । जैसे उदकमेह, इक्षुवालिकामेह, सान्द्रमेह, सान्द्रप्रसादमेह, शुक्रमेह,
[दायाँ स्तम्भ] शुकमेह, शीतमेह, सिकतामेह, शनैर्मेह, आलालमेह । पित्तप्रमेहों के कारण और सम्प्राप्ति । पित्तजन्य छः प्रमेह । क्षारमेह, कालमेह, नीलमेह, लोहितमेह मञ्जिष्ठामेह और हारिद्रमेह । पित्त- प्रमेहों का विशेष विज्ञान । वातजमेह के कारण । उनके प्रकार वसाप्रमेह, मज्जमेह, हस्तिमेह, मधुमेह । सब वातज मेह असाध्य । वातप्रमेहों का विशेष विज्ञान । प्रमेहों के पूर्वरूप । प्रमेह के उपद्रव । चिकित्सा । प्रमेह किन को होता है । उपसंहार । पञ्चमोऽध्यायः (पृ० ४५०-४५४) कुष्ठनिदानम्—कुष्ठ रोग की उत्पत्ति । कुष्ठ के सात भेद । तर-तम भेद से कुष्ठों के असंख्य भेद । कुष्ठ रोग के कारण । कुष्ठ रोग के पूर्वरूप । कपाल कुष्ठ । उदुम्बर कुष्ठ । मण्डल कुष्ठ । ऋष्यजिह्व कुष्ठ। पुण्डरीक कुष्ठ। सिध्म । काकणक कुष्ठ । साध्य असा- ध्य भेद । उपद्रव । उपसंहार । षष्ठोऽध्यायः (पृ० ४५४-४६३) शोषनिदानम्—शोष के चार कारण । शोष का कारण साहस, । शोष रोग का कारण वेग-संधान्धारण, । क्षय का विवरण । शुक्रक्षय । शोष का कारण विषमाशन । राजयक्ष्मा शब्द की निरुक्ति । शोष के पूर्वरूप । राजयक्ष्मा के ११ रूप । राजयक्ष्मा के साध्य और असाध्य रूप । उपसंहार ।
उन्मादनिदानम्—पांच प्रकार
( १० ) सप्तमोऽध्यायः ( पृ० ४६३–४७२ ) उन्मादनिदानम्—पांच प्रकार के उन्माद। उन्माद का लक्षण। उन्माद के पूर्वरूप वातोन्माद के लक्षण। पित्तजन्य उन्माद के लक्षण। सान्नि- पातिक उन्माद। उन्माद की चिकित्सा। आगन्तुज उन्माद। उन्माद का प्रारम्भ। आगन्तुज के लक्षण। आघात काल। उन्माद उत्पन्न करने का प्रयोजन। उन्माद के भेद। उपसंहार। अष्टमोऽध्यायः ( पृ० ४७२–४८० ) अपस्मारनिदानम्—चार प्रकार का अपस्मार। निदान और सम्प्राप्ति। अपस्मार का लक्षण। अपस्मार के पूर्व- रूप वातजन्य अपस्मार के लक्षण। पित्तजन्य अपस्मार। कफजन्य अपस्मार। सान्निपातिक अपस्मार। चिकित्सा सूत्र। भिन्न २ रोगों की उत्पत्ति। साध्य और असाध्य। रोग ज्ञान का फल। एक रोग के कारण दूसरा रोग। शुद्ध प्रयोग का लक्षण। कारण भेद। लक्षण भेद। चिकित्सा विधान। सुखसाध्य और कृच्छ्रसाध्य। साध्य और असाध्य। उपसंहार। इति निदानस्थानम् ॥ विमानस्थानम् प्रथमोऽध्यायः ( पृ० ४८१–४६४ ) रसविमानम्—विमानस्थान का प्रयोजन। छः रस तीन दोष। रसों के प्रभाव। द्रव्य के प्रभाव। सात्म्य। सात्म्य के भेद। प्रवर मध्यम और अवर। आहार विधि उसके आठ अंग। करण। संयोग। राशि। देश। काल। उपयोग संस्था। उपयोक्ता। आहार विधि। आहार के सद्गुणों का उपदेश। उपसंहार। द्वितीयोऽध्यायः ( पृ० ४६४–५०१ ) त्रिविधकुक्षीयं विमानम्—पेट में तीन भाग। आहार की अमात्रा, हीन मात्रा, अधिक मात्रा। उनके दोष आहार की अति मात्रा से हानियां। आमप्रदोष के दो प्रकार-विषूचिका और अलसक। अलसक का स्वरूप। असाध्य अलसक। साध्य अलसक की चिकित्सा। विषूचिका का उपाय। आम प्रदोष में औषध का प्रयोग। अपतर्पण का प्रयोग। अन्न पाचन के सम्बन्ध में अग्निवेश का प्रश्न और आत्रेय पुनर्वसु का उत्तर। उपसंहार। तृतीयोऽध्यायः ( पृ० ५०१–५१६ ) जनपदोद्ध्वंसनीयं विमानम्— जनपदनाशक रोग के प्रतीकार का उप- देश। जनपदनाशक रोग के फैलने के कारण प्रश्न और उत्तर। आरोग्यनाशक वायु के लक्षण। रोगकारी जल के लक्षण। नाशकारी रोगों के पूर्व, देश में उपस्थित लक्षण। विपरीत ऋतु के लक्षणों वाला काल। आयु-रक्षक उपाय। वायु आदि में विगुणता उत्पन्न होने का
( ११ ) कारण, अधर्म। अधर्म की युगों के के प्रकोप के कारण। स्रोतों के दोष का अनुसार उत्पत्ति और उसके दुष्परि- लक्षण। स्रोतों के प्रकृतिसिद्ध रूप। णाम। आयु के समय और परिणाम उपसंहार। विषयक अग्निवेश का प्रश्न तथा आत्रेय षष्ठोऽध्यायः (पृ० ५३०-५४१) ऋषि का प्रतिवचन। दैव और पुरुषकार रोगानीकं विमानम्—प्रभाव का लक्षण तीन प्रकार की आयु। आयु भेद से रोगों के प्रकार भेद। दश का काल। अकाल-मरण पर विचार। प्रकार के रोग। दो मानस दोष रजस् काल मृत्यु और अकाल मृत्यु पर विचार। और तमस्। इनके कुपित होने के तीन ज्वर में उष्ण जल देने विषयक प्रश्न। कारण अनुबन्ध्य-अनुबन्ध भेद से रोगों आत्रेय का उत्तर। ज्वर में उष्ण जल में भेद। बल के भेदों से शरीरस्थ अग्नि के गुण। निदान से विपरीत चिकित्सा। के चार प्रकार। अग्नि भेद से मनुष्यों अपतर्पण तीन प्रकार के उनके उपयोग के चार प्रकार वात, पित्त, कफ प्रकृति के अवसर। त्याज्य रोगी। उपसंहार। के पुरुषों का विवेचन। आरोग्य प्रकृति। चतुर्थोऽध्यायः सम प्रकृति। वातल, पित्तल और (पृ० ५१६-५२४) श्लेष्मल तीन प्रकार के रोगी। वात, त्रिविधरोगविशेषविज्ञानीयम्— पित्त और श्लेष्म प्रकृति के पुरुषों के तीन प्रकार के रोग विशेषों का विज्ञान लक्षण इनके अनुकूल आहार विहार। आप्तोपदेश, अनुमान और प्रत्यक्ष। उपसंहार। आप्तोपदेश का निरूपण। प्रत्यक्ष और सप्तमोऽध्यायः अनुमान के लक्षण। आप्तोपदेश से (पृ० ५४१-५५ ) क्या जानें। प्रत्यक्ष से क्या जानें। व्याधितरूपीयं विमानम्— अनुमान से क्या जानें उपसंहार। व्याधि के ज्ञान में भ्रम। चार प्रकार पञ्चमोऽध्यायः के कृमि। दो प्रकार का मल। उन में (पृ० ५२४-५३१) उत्पन्न कृमि। उनका प्रभाव और स्रोतोविमानम्—शरीर गत चिकित्सा। रक्तजन्य कृमि। पुरीषजन्य अनेक धातुवाही स्रोतों का वर्णन। कृमि। उनका उपाय अपकर्ष विधि, प्राणवह स्रोतों के दुष्ट होने पर लक्षण। प्रकृति विघात। कृमि-कोष्ठ के रोगी का जलवह स्रोत अन्नवह स्रोत। रसवह उपचार। आस्थापन बस्तिक्रिया की विधि। स्रोत। रक्तवह स्रोत। मांसवह स्रोत। विरेचन। अनुवासन। शिरो विरेचन। मूत्रवह स्रोत। पुरीषवह स्रोत। स्वेद- कृमियों के प्रकृतिविघात की रीति। वह स्रोत। स्रोतों के पर्याय। स्रोतों शिरोरोग पर चिकित्सा। उपसंहार।
( १२ ) अष्टमोऽध्यायः ( पृ० ५१५-६१८ ) रोगभिषग्जितीयम्—शास्त्रप- रीक्षा। शास्त्र के गुण। आचार्य का लक्षण। शास्त्र को दृढ़ करने के उपाय शास्त्र के अध्ययन की विधि ! अध्या- पन-विधि। गुरु शिष्य के परस्पर कर्त्तव्य। दीक्षा। आचार्य का शिष्य को उपदेश। संभाषा-विधि। तद्विद्य- संभाषा। (संधाय) अनुलोम संभाषण विगृह्य संभाषा। प्रतिवादी के तीन प्रकार। तीन प्रकार की परिषद्। प्रतिवादी को निग्रह करने के उपाय : प्रतिलोम संभाषण का प्रकार। वाद की मर्यादा। ४४ आवश्यकीय ज्ञातव्य- वाद का लक्षण। जल्प वितण्डा। प्रतिज्ञास्थापना, प्रतिष्ठापन, हेतु, उत्तर, दृष्टान्त। सिद्धान्त ४ प्रकार के। शब्द प्रत्यक्ष अनुमान ऐतिह्य औपम्य संशय प्रयोजन सव्यभिचार। जिज्ञासा व्यवसाय। अर्थप्राप्ति, अनुयोज्य। अननुयोज्य अनुयोग प्रत्यनुयोग वाक्य- दोष न्यून अधिक अनर्थक अपार्थक विरुद्ध। वाक्यप्रशंसा। छल सामान्य- छल वाक् छल अहेतु तीन प्रकार के प्रकरणसम संशयसम वर्ण्यसम। अतीत काल उपालम्भ परिहार। प्रतिज्ञाहानि अभ्यनुज्ञा हेत्वन्तर अर्थान्तर। निग्रह- स्थान। कारण करण कार्ययोनि-कार्य- कार्यफल। अनुबन्ध, देश, काल, उपाय प्रवृत्ति आदि के सम्बन्ध में विशेष विज्ञान। इनकी परीक्षा। दश विध परीक्षा। कारण-परीक्षा। करण-परीक्षा कार्ययोनि-परीक्षा-कार्य-कार्यफल-परीक्षा। अनुबन्ध-देश कार्य-देश आदि की व्या- ख्या। आतुर परीक्षा। प्रकृति आदि भाव। श्लेष्मप्रकृति। पित्तप्रकृति। वातप्रकृति। समधातुप्रकृति। विकृतियों से परीक्षा। सार से परीक्षा शरीर रचना से परीक्षा। प्रमाण से परीक्षा। तीन प्रकार के प्रमाण। सात्म्य से परीक्षा। बल से परीक्षा। आहार से व्यायाम- शक्ति से परीक्षा। वयस् से परीक्षा। काल का विवेचन संवत्सर। रोगी की दशा के अर्थ में काल की अपेक्षा से काल, अकाल। प्रवृत्ति। उपाय। परीक्षा का प्रयोजन। वमनोपयोगी द्रव्य। विरेचन द्रव्य। रसों की अपेक्षा से द्रव्यों का वर्गीकरण। मधुरस्कन्ध। अम्लस्कन्ध। लवणस्कन्ध। कटुक- स्कन्ध। तिक्तस्कन्ध। कषायस्कन्ध। ६ हों वर्गों के उपयोग में वैद्य का कर्त्तव्य। अनुवासना द्रव्य शिरोविरेचन- द्रव्य। उपसंहार। इति विमानस्थानम्॥
ओ३म् चरकसंहिता सूत्रस्थानम् प्रथमोऽध्यायः अथातो दीर्घञ्जीवितीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ अब यहां से 'दीर्घ-जीवतीय' नामक अध्याय का व्याख्यान करते हैं ॥ १ ॥ इति ह स्माह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ ऐसा ही भगवान् आत्रेय ने कहा था १ ॥ २ ॥ ऋषि भरद्वाज का इन्द्र के पास गमन दीर्घं जीवितमन्विच्छन् भरद्वाज उपागमत् । इन्द्रमुग्रतपा बुद्ध्वा शरण्यममरेश्वरम् ॥३॥ दीर्घ काल तक जीवन की इच्छा से उग्रतपस्वी भरद्वाज मुनि देवों के राजा इन्द्र को शरण योग्य जानकर उनके पास गये ॥ ३ ॥ १. निष्प्रयोजन और अभिधेयरहित अर्थ में बुद्धिमानों की प्रवृत्ति नहीं होती ! इसलिये सब से प्रथम शास्त्र का प्रयोजन अभिधेय और सम्बन्ध बतलाना चाहिये । कहा भी है— अभिधेयफलज्ञानविरहस्तिमितोद्यमाः । श्रोतुमल्पमपि ग्रन्थं नाद्रियन्ते हि साधवः ॥ सिद्धार्थे सिद्धसम्बन्धं श्रोतुं श्रोता प्रवर्तते । शास्त्रादौ तेन वक्तव्यः सम्बन्धः सप्रयोजनः ॥ इस शास्त्र का प्रयोजन 'धातुसाम्य' है । कहा भी है—'धातुसाम्यक्रिया चोक्ता तन्त्रस्यास्यप्रयोजनम्' 'धातुसाम्य' का अर्थ विषम हुए धातुओं को समान करना और समान धातुओं का रक्षण करना है। अथवा रोगी के रोग का निवारण करना और स्वस्थ
२ चरकसंहिता [ अ० १ ब्रह्मणा हि यथा प्रोक्तमायुर्वेदं प्रजापतिः । जग्राह निखिलेनाऽऽदावश्विनौ तु पुनस्ततः ॥ ४ ॥ अश्विभ्यां भगवान्छक्रः प्रतिपेदे ह केवलम् १ । ऋषिप्रोक्तो भरद्वाजस्तस्माच्छक्रमुपागमत् ॥ ५ ॥ आरम्भ में ब्रह्मा ने यथावत् आयुर्वेद का उपदेश किया उसको प्रजापति [दक्ष] ने पूर्ण रूप से ग्रहण किया । दक्ष से दोनों अश्विनीकुमारोंने, अश्विनी- कुमारों से इन्द्र ने ग्रहण किया । इसी कारण ऋषियों से प्रेरित होकर भरद्वाज मुनि इन्द्र के पास आये २ ॥ ४-५ ॥ विघ्नभूता यदा रोगाः प्रादुर्भूताः शरीरिणाम् । तपोपवासाध्ययनब्रह्मचर्यव्रतायुषाम् ॥ ६ ॥ तदा भूतेष्वनुक्रोशं पुरस्कृत्य महर्षयः । समेताः पुण्यकर्माणः पार्श्वे हिमवतः शुभे ॥ ७ ॥ जब तप, उपवास, ब्रह्मचर्य, अध्ययन, व्रत और आयु, इन में विघ्न करनेवाले रोग उत्पन्न हो गये; तब प्राणियों पर दया कर के पुण्यात्मा महर्षिगण पवित्र हिमालय के पार्श्व में एकत्र हुए ॥ ६-७ ॥ अङ्गिरा जमदग्निश्च वसिष्ठः कश्यपो भृगुः । आत्रेयो गौतमः सांख्यः पुलस्त्यो नारदोऽसितः ॥ ८ ॥ अगस्त्यो वामदेवश्च मार्कण्डेयाश्वलायनौ । पारीक्षिर्भिक्षुरात्रेयो भरद्वाजः कपिञ्जलः ॥ ९ ॥ पुरुष के स्वास्थ्य की रक्षा करना है। जैसा कि सुश्रुत ने कहा है:— “व्याध्युपसृष्टानां व्याधिपरिमोक्षः स्वस्थस्य परिरक्षणञ्च” । अभिधेय-सम्बन्ध—हेतु, दोष और द्रव्य ये स्कन्धत्रय और रोगों के उत्पन्न न होने की विधि का बतलाना । शास्त्र और प्रयोजन का उपेय-उपाय सम्बन्ध है । भगवान् का लक्षण—“उत्पत्तिं प्रलयं चैव भूतानामागतिं गतिम् । वेत्ति विद्यामविद्यां च स वाच्यो भगवानिति ॥” १—अश्विनीकुमारों से इन्द्र ने पढ़ा ही था, पढ़ाया नहीं था, इन्द्र को शिष्य की चाह थी, क्योंकि बिना पढ़ाये विद्या संशय रहित नहीं बनती । २. सुश्रुत में—“ब्रह्मा प्रोवाच, ततः प्रजापतिरधिजगे, तस्मादश्विनौ, अश्विभ्यामिन्द्रः ।”
विश्वामित्राश्वत्थ्यौ च भार्गवश्च्यवनोऽभिजित्। गार्ग्यः शाण्डिल्यकौण्डिन्यौ वार्क्षिर्देवलगालवौ ॥ १० ॥ सांकृत्यो वैजवापिश्च कुशिका बादरायणः। बडिशः शरलोमा च काप्यकात्यायनावुभौ ॥ ११ ॥ काङ्कायनः कैकशेशो धौम्यो मारीचिकाश्यपौ। शर्कराक्षो हिरण्याक्षो लोकाक्षः पैङ्गिरेव च ॥ १२ ॥ शौनकः शाकुनेयश्च मैत्रेयो मैमतायनिः। वैखानसा वालखिल्यास्तथा चान्ये महर्षयः ॥ १३ ॥ ब्रह्मज्ञानस्य निधयो यमस्य नियमस्य च। तपसस्तेजसा दीप्ता हूयमाना इवाग्नयः ॥ १४ ॥ सुखोपविष्टास्ते तत्र पुण्यां चक्रुः कथामिमाम्। अंगिरा, जमदग्नि, वसिष्ठ, कश्यप, भृगु, आत्रेय, गौतम, सांख्य, पुलस्त्य नारद, असित, अगस्त्य, वामदेव, मार्कण्डेय, आश्वलायन, पारीक्षि, भिक्षु, आत्रेय, भरद्वाज, कपिञ्जल, विश्वामित्र, आश्वत्थ्य, भार्गव, च्यवन, अभिजित्, गार्ग्य, शाण्डिल्य, कौण्डिन्य, वार्क्षि, देवल, गालव, साङ्कृत्य, वैजवापि, कुशिक, बादरायण, बडिश, शरलोमा, काप्य, कात्यायन, काङ्कायन, कैकशेश, धौम्य, मारीचि, काश्यप, शर्कराक्ष, हिरण्याक्ष, लोकाक्ष, पैङ्गि, शौनक, शाकुनेय, मैत्रेय, मैमतायनि, वैखानस, वालखिल्य और अन्य ब्रह्मज्ञान, यम, १ नियम और तप के तेज से चमकते हुए, आहुति से उज्ज्वल अग्नि के समान तेजस्वी महर्षि लोग वहां सुख से विराज कर, इस पुण्यशाली कथा को इस प्रकार कहने लगे ॥ ८-१५ ॥ धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम् ॥ १५ ॥ रोगास्तस्यापहर्तारः श्रेयसो जीवितस्य च। प्रादुर्भूतो मनुष्याणामन्तरायो महानयम् ॥ १६ ॥ कः स्यात्तेषां शमोपाय इत्युक्त्वा ध्यानमास्थिताः। अथ ते शरणं शक्रं ददृशुर्ज्ञानचक्षुषा ॥ १७ ॥ स वक्ष्यति शमोपायं यथावदमरप्रभुः। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों का मूल कारण आरोग्य १. यम—अहिंसा सत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः ॥ यो० सू० ॥ नियम—शौचसन्तोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः ॥यो०सू० ॥
ही है। १ रोग इस आरोग्य, अभ्युदय तथा जीवन (आयु) को नाश करने वाले हैं। मनुष्यों के लिए ये रोग बड़े विघ्नरूप हो गये हैं। इसलिए इन रोगों की शान्ति का उपाय क्या होना चाहिए ? ऐसा कहकर वे सब ऋषि ध्यान मग्न हो गये। उन्होंने अन्तश्चक्षु से इन्द्र को अपनेको शरण देने वाले के रूप से देखा और जान लिया कि देवों का राजा इन्द्र ही शान्ति का उपाय कहेगा ॥१६-१७॥ कः सहस्राक्षभवनं गच्छेत्प्रष्टुं शचीपतिम् ॥ १८ ॥ अहमर्थे नियुज्येयमत्रेति प्रथमं वचः । भरद्वाजोऽब्रवीत्तस्मादृषिभिः स नियोजितः ॥ १६ ॥ प्रश्न उपस्थित हुआ कि शचीपति इन्द्र से पूछने के लिये इन्द्र के भवन तक कौन जाय ? ऋषि भरद्वाज ने सबसे प्रथम कहा कि—इस कार्य में मुझको नियुक्त किया जाये। इसलिए आंगरा आदि ऋषियों ने भरद्वाज ऋषि को ही इस कार्य में नियुक्त कर दिया ॥ १८-१६ ॥ स शक्रभवनं गत्वा सुरर्षिगणमध्यगम् । ददर्श बलहन्तारं दीप्यमानमिवानलम् ॥ २० ॥ इन्द्र के भवन में जाकर, उन्होंने देवर्षियों के मध्य में प्रदीप्त अग्नि के समान तेजस्वी, बल नाम असुर को मारने वाले इन्द्र को देखा ॥ २० ॥ सोऽभिगम्य जयाशीर्भिरभिनन्द्य सुरेश्वरम् । प्रोवाच भगवान्धीमानृषीणां वाक्यमुत्तमम् ॥ २१ ॥ बुद्धिमान भरद्वाज ने इन्द्र के सम्मुख जाकर जयसूचक आशीर्वादों से इन्द्र का अभिनन्दन करके, ऋषियों का उत्तम वचन प्रस्तुत किया ॥ २१ ॥ व्याधयो हि समुत्पन्नाः सर्वप्राणिभयंकराः । तद् ब्रूहि मे शमोपायं यथावदमरप्रभो ॥ २२ ॥ हे अमरप्रभो ! सब प्राणियों को भय देने वाली व्याधियां उत्पन्न हो गई हैं इसलिये आप इनकी शान्ति का उपाय उपदेश करें ॥ २२ ॥ तस्मै प्रोवाच भगवान्नायुर्वेदं शतक्रतुः । पदैरल्पैर्मतिं बुद्ध्वा विपुलां परमर्षये ॥ २३ ॥ १ कहा भी है— "आयतनं विद्यानां मूलं धर्मार्थकाममोक्षाणाम् । श्रेयः परं किमन्यत् शरीरमजरामरं विधायैकम् ॥” रसहृदयतंत्र ॥ २ योग्य शिष्य ही विनयपूर्वक गुरु से शास्त्रों को सुनने का अधिकारी है। यथा:—तद् विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया । उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥ गीता ॥