देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
[ १० ]
| अध्याय | विषय | पृष्ठ-संख्या | अध्याय | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|---|---|
| प्रसूतिगृहसे हरण, कृष्णद्वारा भगवतीकी स्तुति, भगवती चण्डिकाद्वारा सोलह वर्षके बाद पुनः पुत्रप्राप्तिका वर देना ......... | ५१७ | सुनकर महिषासुरका उद्विग्न होकर अपने प्रधान अमात्यको देवीके पास भेजना... | ५७३ | ||
| २५- | व्यासजीद्वारा शाम्भवी मायाकी बलवत्ताका वर्णन, श्रीकृष्णद्वारा शिवजीकी प्रसन्नताके लिये तप करना और शिवजीद्वारा उन्हें वरदान देना....................................... | ५२३ | १०- | देवीद्वारा महिषासुरके अमात्यको अपना उद्देश्य बताना तथा अमात्यका वापस लौटकर देवीद्वारा कही गयी बातें महिषासुरको बताना.............................. | ५७९ |
| पंचम स्कन्ध | ११- | महिषासुरका अपने मन्त्रियोंसे विचार-विमर्श करना और ताम्रको भगवतीके पास भेजना................................... | ५८५ | ||
| १- | व्यासजीद्वारा त्रिदेवोंकी तुलनामें भगवतीकी उत्तमताका वर्णन ................................. | ५३१ | १२- | देवीके अट्टहाससे भयभीत होकर ताम्रका महिषासुरके पास भाग आना, महिषासुरका अपने मन्त्रियोंके साथ पुनः विचार-विमर्श तथा दुर्धर, दुर्मुख और बाष्कलकी गर्वोक्ति ........................... | ५९१ |
| २- | महिषासुरके जन्म, तप और वरदान-प्राप्तिकी कथा ..................................... | ५३६ | १३- | बाष्कल और दुर्मुखका रणभूमिमें आना, देवीसे उनका वार्तालाप और युद्ध तथा देवीद्वारा उनका वध............................. | ५९७ |
| ३- | महिषासुरका दूत भेजकर इन्द्रको स्वर्ग खाली करनेका आदेश देना, दूतद्वारा इन्द्रका युद्धहेतु आमन्त्रण प्राप्तकर महिषासुरका दानववीरोंको युद्धके लिये सुसज्जित होनेका आदेश देना ........... | ५४१ | १४- | चिक्षुर और ताम्रका रणभूमिमें आना, देवीसे उनका वार्तालाप और युद्ध तथा देवीद्वारा उनका वध ............................. | ६०२ |
| ४- | इन्द्रका देवताओं तथा गुरु बृहस्पतिसे परामर्श करना तथा बृहस्पतिद्वारा जय-पराजयमें दैवकी प्रधानता बतलाना...... | ५४६ | १५- | बिडालाख्य और असिलोमाका रणभूमिमें आना, देवीसे उनका वार्तालाप और युद्ध तथा देवीद्वारा उनका वध ...................... | ६०७ |
| ५- | इन्द्रका ब्रह्मा, शिव और विष्णुके पास जाना; तीनों देवताओंसहित इन्द्रका युद्धस्थलमें आना तथा चिक्षुर, बिडाल और ताम्रको पराजित करना ................................. | ५५१ | १६- | महिषासुरका रणभूमिमें आना तथा देवीसे प्रणय-याचना करना ............. | ६१२ |
| ६- | भगवान् विष्णु और शिवके साथ महिषासुरका भयानक युद्ध............. | ५५६ | १७- | महिषासुरका देवीको मन्दोदरी नामक राजकुमारीका आख्यान सुनाना.......... | ६१८ |
| ७- | महिषासुरको अवध्य जानकर त्रिदेवोंका अपने-अपने लोक लौट जाना, देवताओंकी पराजय तथा महिषासुरका स्वर्गपर आधिपत्य, इन्द्रका ब्रह्मा और शिवजीके साथ विष्णुलोकके लिये प्रस्थान ........ | ५६१ | १८- | दुर्धर, त्रिनेत्र, अन्धक और महिषासुरका वध | ६२३ |
| १९- | देवताओंद्वारा भगवतीकी स्तुति ........... | ६२९ | |||
| २०- | देवीका मणिद्वीप पधारना तथा राजा शत्रुघ्नका भूमण्डलाधिपति बनना ........ | ६३५ | |||
| ८- | ब्रह्माप्रभृति समस्त देवताओंके शरीरसे तेजःपुंजका निकलना और उस तेजोराशिसे भगवतीका प्राकट्य ........................... | ५६६ | २१- | शुम्भ और निशुम्भको ब्रह्माजीके द्वारा वरदान, देवताओंके साथ उनका युद्ध और देवताओंकी पराजय .................... | ६४० |
| ९- | देवताओंद्वारा भगवतीको आयुध और आभूषण समर्पित करना तथा उनकी स्तुति करना, देवीका प्रचण्ड अट्टहास करना, जिसे | २२- | देवताओंद्वारा भगवतीकी स्तुति और उनका प्राकट्य ............................. | ६४६ | |
| २३- | भगवतीके श्रीविग्रहसे कौशिकीका प्राकट्य, |
[ ११ ]
| अध्याय | विषय | पृष्ठ-संख्या | अध्याय | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|---|---|
| देवीकी कालिकारूपमें परिणति, चण्ड-मुण्डसे देवीके अद्भुत सौन्दर्यको सुनकर शुम्भका सुग्रीवको दूत बनाकर भेजना, जगदम्बाका विवाहके विषयमें अपनी शर्त बताना .............................. | ६५२ | भगवतीका प्रकट होना और उन्हें इच्छित वरदान देना........................... | ७१८ | ||
| षष्ठ स्कन्ध | |||||
| २४- | शुम्भका धूम्रलोचनको देवीके पास भेजना और धूम्रलोचनका देवीको समझानेका प्रयास करना .................................. | ६५७ | १- | त्रिशिराकी तपस्यासे चिन्तित इन्द्रद्वारा तपभंगहेतु अप्सराओंको भेजना .......... | ७२३ |
| २५- | भगवती काली और धूम्रलोचनका संवाद, कालीके हुंकारसे धूम्रलोचनका भस्म होना तथा शुम्भका चण्ड-मुण्डको युद्धहेतु प्रस्थानका आदेश देना .................... | ६६३ | २- | इन्द्रद्वारा त्रिशिराका वध, क्रुद्ध त्वष्टाद्वारा अथर्ववेदोक्त मन्त्रोंसे हवन करके वृत्रासुरको उत्पन्न करना और उसे इन्द्रके वधके लिये प्रेरित करना ............. | ७२८ |
| २६- | भगवती अम्बिकासे चण्ड-मुण्डका संवाद और युद्ध, देवी कालिकाद्वारा चण्ड-मुण्डका वध .......................... | ६६८ | ३- | वृत्रासुरका देवलोकपर आक्रमण, बृहस्पतिद्वारा इन्द्रकी भर्त्सना करना और वृत्रासुरको अजेय बतलाना, इन्द्रकी पराजय, त्वष्टाके निर्देशसे वृत्रासुरका ब्रह्माजीको प्रसन्न करनेके लिये तपस्यारत होना......... | ७३२ |
| २७- | शुम्भका रक्तबीजको भगवती अम्बिकाके पास भेजना और उसका देवीसे वार्तालाप | ६७४ | ४- | तपस्यासे प्रसन्न होकर ब्रह्माजीका वृत्रासुरको वरदान देना, त्वष्टाकी प्रेरणासे वृत्रासुरका स्वर्गपर आक्रमण करके अपने अधिकारमें कर लेना, इन्द्रका पितामह ब्रह्मा और भगवान् शंकरके साथ वैकुण्ठधाम जाना | ७३७ |
| २८- | देवीके साथ रक्तबीजका युद्ध, विभिन्न शक्तियोंके साथ भगवान् शिवका रणस्थलमें आना तथा भगवतीका उन्हें दूत बनाकर शुम्भके पास भेजना, भगवान् शिवके सन्देशसे दानवोंका क्रुद्ध होकर युद्धके लिये आना ................................... | ६८० | ५- | भगवान् विष्णुकी प्रेरणासे देवताओंका भगवतीकी स्तुति करना और प्रसन्न होकर भगवतीका वरदान देना ............. | ७४३ |
| २९- | रक्तबीजका वध और निशुम्भका युद्धक्षेत्रके लिये प्रस्थान .................. | ६८५ | ६- | भगवान् विष्णुका इन्द्रको वृत्रासुरसे सन्धिका परामर्श देना, ऋषियोंकी मध्यस्थतासे इन्द्र और वृत्रासुरमें सन्धि, इन्द्रद्वारा छलपूर्वक वृत्रासुरका वध ...... | ७४९ |
| ३०- | देवीद्वारा निशुम्भका वध ................ | ६९१ | ७- | त्वष्टाका वृत्रासुरकी पारलौकिक क्रिया करके इन्द्रको शाप देना, इन्द्रको ब्रह्महत्या लगना, नहुषका स्वर्गाधिपति बनना और इन्द्राणीपर आसक्त होना .................... | ७५४ |
| ३१- | शुम्भका रणभूमिमें आना और देवीसे वार्तालाप करना, भगवती कालिकाद्वारा उसका वध, देवीके इस उत्तम चरित्रके पठन और श्रवणका फल ................. | ६९७ | ८- | इन्द्राणीको बृहस्पतिकी शरणमें जानकर नहुषका क्रुद्ध होना, देवताओंका नहुषको समझाना, बृहस्पतिके परामर्शसे इन्द्राणीका नहुषसे समय माँगना, देवताओंका भगवान् विष्णुके पास जाना और विष्णुका उन्हें देवीको प्रसन्न करनेके लिये अश्वमेधयज्ञ करनेको कहना, बृहस्पतिका शचीको | |
| ३२- | देवीमाहात्म्यके प्रसंगमें राजा सुरथ और समाधि वैश्यकी कथा ................... | ७०३ | |||
| ३३- | मुनि सुमेधाका सुरथ और समाधिको देवीकी महिमा बताना ..................... | ७०९ | |||
| ३४- | मुनि सुमेधाद्वारा देवीकी पूजा-विधिका वर्णन .......................................... | ७१४ | |||
| ३५- | सुरथ और समाधिकी तपस्यासे प्रसन्न |
[ १२ ]
| अध्याय | विषय | पृष्ठ-संख्या | अध्याय | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|---|---|
| भगवतीकी आराधना करनेको कहना, शचीकी आराधनासे प्रसन्न होकर देवीका प्रकट होना और शचीको इन्द्रका दर्शन होना ....... | ७५९ | १९- | भगवती लक्ष्मीको अश्वरूपधारी भगवान् विष्णुके दर्शन और उनका वैकुण्ठगमन | ८१४ | |
| ९- | शचीका इन्द्रसे अपना दुःख कहना, इन्द्रका शचीको सलाह देना कि वह नहुषसे ऋषियोंद्वारा वहन की जा रही पालकीमें आनेको कहे, नहुषका ऋषियोंद्वारा वहन की जा रही पालकीमें सवार होना और शापित होकर सर्प होना तथा इन्द्रका पुनः स्वर्गाधिपति बनना.................. | ७६५ | २०- | राजा हरिवर्माको भगवान् विष्णुद्वारा अपना हैहयसंज्ञक पुत्र देना, राजाद्वारा उसका 'एकवीर' नाम रखना ........... | ८१९ |
| २१- | आखेटके लिये वनमें गये राजासे एकावलीकी सखी यशोवतीकी भेंट, एकावलीके जन्मकी कथा .................................. | ८२४ | |||
| १०- | कर्मकी गहन गतिका वर्णन तथा इस सम्बन्धमें भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनका उदाहरण ...................................... | ७७१ | २२- | यशोवतीका एकवीरसे कालकेतुद्वारा एकावलीके अपहृत होनेकी बात बताना | ८२९ |
| २३- | भगवतीके सिद्धिप्रदायक मन्त्रसे दीक्षितएकवीर-कालकेतुका वध, एकवीर और एकावलीका विवाह तथा हैहयवंशकीपरम्परा .......... | ८३५ | |||
| ११- | युगधर्म एवं तत्सम्बन्धी व्यवस्थाका वर्णन | ७७४ | २४- | धृतराष्ट्रके जन्मकी कथा ................... | ८४१ |
| १२- | पवित्र तीर्थोंका वर्णन, चित्तशुद्धिकी प्रधानता तथा इस सम्बन्धमें विश्वामित्र और वसिष्ठके परस्पर वैरकी कथा, राजा हरिश्चन्द्रका वरुणदेवके शापसे जलोदरग्रस्त होना ............................. | ७७९ | २५- | पाण्डु और विदुरके जन्मकी कथा, पाण्डवोंका जन्म, पाण्डुकी मृत्यु, द्रौपदीस्वयंवर, राजसूययज्ञ, कपटद्यूत तथा वनवास और व्यासजीके मोहका वर्णन .................. | ८४६ |
| १३- | राजा हरिश्चन्द्रका शुनःशेपको यज्ञीय पशु बनाकर यज्ञ करना, विश्वामित्रसे प्राप्त वरुणमन्त्रके जपसे शुनःशेपका मुक्त होना, परस्पर शापसे विश्वामित्र और वसिष्ठका बक तथा आडी होना | ७८४ | २६- | देवर्षि नारद और पर्वतमुनिका एक-दूसरेको शाप देना, राजकुमारी दमयन्तीका नारदसे विवाह करनेका निश्चय ........ | ८५१ |
| २७- | वानरमुख नारदसे दमयन्तीका विवाह, नारद तथा पर्वतका परस्पर शापमोचन | ८५६ | |||
| १४- | राजा निमि और वसिष्ठका एक-दूसरेको शाप देना, वसिष्ठका मित्रावरुणके पुत्रके रूपमें जन्म लेना .................... | ७८९ | २८- | भगवान् विष्णुका नारदजीसे मायाकी अजेयताका वर्णन करना, मुनि नारदको मायावश स्त्रीरूपकी प्राप्ति तथा राजा तालध्वजका उनसे प्रणय-निवेदन करना | ८६१ |
| १५- | भगवतीकी कृपासे निमिको मनुष्योंके नेत्र-पलकोंमें वासस्थान मिलना तथा संसारी प्राणियोंकी त्रिगुणात्मकताका वर्णन...... | ७९४ | २९- | राजा तालध्वजसे स्त्रीरूपधारी नारदजीका विवाह, अनेक पुत्र-पौत्रोंकी उत्पत्ति और युद्धमें उन सबकी मृत्यु, नारदजीका शोक और भगवान् विष्णुकी कृपासे पुनः स्वरूपबोध | ८६६ |
| १६- | हैहयवंशी क्षत्रियोंद्वारा भृगुवंशी ब्राह्मणोंका संहार.......................................... | ७९९ | ३०- | राजा तालध्वजका विलाप और ब्राह्मण-वेशधारी भगवान् विष्णुके प्रबोधनसे उन्हें वैराग्य होना, भगवान् विष्णुका नारदसे मायाके प्रभावका वर्णन करना .......... | ८७१ |
| १७- | भगवतीकी कृपासे भार्गव-ब्राह्मणीकी जंघासे तेजस्वी बालककी उत्पत्ति, हैहयवंशी क्षत्रियोंकी उत्पत्तिकी कथा .. | ८०३ | ३१- | व्यासजीका राजा जनमेजयसे भगवतीकी महिमाका वर्णन करना ..................... | ८७६ |
| १८- | भगवती लक्ष्मीद्वारा घोड़ीका रूप धारणकर तपस्या करना .................... | ८०९ |
श्रीमद्देवीभागवतमाहात्म्य १३
श्रीमद्देवीभागवतमाहात्म्य १३
श्रीमद्देवीभागवतमाहात्म्य
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| देवीभागवतं नाम पुराणं परमोत्तमम्।<br>त्रैलोक्यजननी साक्षाद् गीयते यत्र शाश्वती॥ | श्रीमद्देवीभागवत नामक पुराण सभी पुराणोंमें अतिश्रेष्ठ है, जिसमें तीनों लोकोंकी जननी साक्षात् सनातनी भगवतीकी महिमा गायी गयी है। |
| श्रीमद्भागवतं यस्तु पठेद्वा शृणुयादपि।<br>श्लोकार्धं श्लोकपादं वा स याति परमां गतिम्॥ | जो श्रीमद्देवीभागवतके आधे श्लोक या चौथाई श्लोकको भी प्रतिदिन सुनता या पढ़ता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है। |
| पूजितं यद्गृहे नित्यं श्रीभागवतपुस्तकम्।<br>तद्गृहं तीर्थभूतं हि वसतां पापनाशकम्॥ | जिस घरमें नित्य श्रीमद्देवीभागवतग्रन्थका पूजन किया जाता है, वह घर तीर्थस्वरूप हो जाता है तथा उसमें निवास करनेवाले लोगोंके पापोंका नाश हो जाता है। |
| यस्तु भागवतं देव्याः पठेद् भक्त्या शृणोति वा।<br>धर्ममर्थं च कामं च मोक्षं च लभते नरः॥ | जो व्यक्ति भक्ति-भावसे देवीके इस भागवतपुराणका पाठ अथवा श्रवण करता है; वह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्राप्त कर लेता है। |
| सुधां पिबन्नेक एव नरः स्यादजरामरः।<br>देव्याः कथामृतं कुर्यात् कुलमेवाजरामरम्॥ | अमृतके पानसे तो केवल एक ही मनुष्य अजर-अमर होता है, किंतु भगवतीका कथारूप अमृत सम्पूर्ण कुलको ही अजर-अमर बना देता है। |
| अष्टादशपुराणानां मध्ये सर्वोत्तमं परम्।<br>देवीभागवतं नाम धर्मकामार्थमोक्षदम्॥ | सभी अठारह पुराणोंमें यह श्रीमद्देवीभागवतपुराण सर्वश्रेष्ठ है और धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्षको प्रदान करनेवाला है। |
| ये शृण्वन्ति सदा भक्त्या देव्या भागवतीं कथाम्।<br>तेषां सिद्धिर्न दूरस्था तस्मात् सेव्या सदा नृभिः॥ | जो लोग सदा भक्ति-श्रद्धापूर्वक श्रीमद्देवीभागवतकी कथा सुनते हैं, उन्हें सिद्धि प्राप्त होनेमें रंचमात्र भी विलम्ब नहीं होता, इसलिये मनुष्योंको इस पुराणका सदा पठन-श्रवण करना चाहिये। |
| दिनमर्धं तदर्धं वा मुहूर्तं क्षणमेव वा।<br>ये शृण्वन्ति नरा भक्त्या न तेषां दुर्गतिः क्वचित्॥ | पूरे दिन, दिनके आधे समयतक, चौथाई समयतक, मुहूर्तभर अथवा एक क्षण भी जो लोग भक्तिपूर्वक इसका श्रवण करते हैं, उनकी कभी भी दुर्गति नहीं होती। |
| तावद् गर्जन्ति तीर्थानि पुराणानि व्रतानि च।<br>यावन्न श्रूयते सम्यग् देवीभागवतं नरैः॥ | समस्त तीर्थ, पुराण और व्रत [अपनी श्रेष्ठताका वर्णन करते हुए] तभीतक गर्जना करते हैं, जबतक मनुष्य श्रीमद्देवीभागवतका सम्यक् रूपसे श्रवण नहीं कर लेते। |
| तावत् पापाटवी नृणां क्लेशदादभ्रकण्टका।<br>यावन्न परशुः प्राप्तो देवीभागवताभिधः॥ | मनुष्योंके लिये पापरूपी अरण्य तभीतक दुःखप्रद एवं कंटकमय रहता है, जबतक श्रीमद्देवीभागवतरूपी परशु (कुठार) उपलब्ध नहीं हो जाता। |
| तावत् क्लेशावहं नृणामुपसर्गमहातमः।<br>यावन्नैवोदयं प्राप्तो देवीभागवतोष्णगुः॥ | मनुष्योंको उपसर्ग (ग्रहण)-रूपी घोर अन्धकार तभीतक कष्ट पहुँचाता है, जबतक श्रीमद्देवीभागवतरूपी सूर्य उनके सम्मुख उदित नहीं हो जाता। |
| इदमखिलकथानां सारभूतं पुराणं<br>निखिलनिगमतुल्यं सप्रमाणानुविद्धम्।<br>पठति परमभावाद्यः शृणोतीह भक्त्या<br>स भवति धनवान्वै ज्ञानवान्मानवोऽत्र॥ | इस संसारमें जो मनुष्य विशेष श्रद्धाके साथ उच्च विचारोंसे युक्त होकर सम्पूर्ण पुराणोंके सारस्वरूप, समस्त वेदोंकी तुलना करनेवाले तथा नानाविध प्रमाणोंसे परिपूर्ण इस श्रीमद्देवीभागवतपुराणका पाठ करता है तथा इसका भक्तिपूर्वक श्रवण करता है, वह ऐश्वर्य तथा ज्ञानसे सम्पन्न हो जाता है। |
| १४ | श्रीमद्देवीभागवत |
|---|
| श्रुत्वैतत्तु महादेव्याः पुराणं परमाद्भुतम्।<br>कृतकृत्यो भवेन्मर्त्यो देव्याः प्रियतमो हि सः॥ | [ महर्षि व्यासने राजा जनमेजयसे कहा— ]<br>महादेवीका यह परम अद्भुत पुराण सुनकर मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है और वह भगवतीका प्रियतम हो जाता है। हे | | मूलप्रकृतिरेवैषा यत्र तु प्रतिपाद्यते।<br>समं तेन पुराणं स्यात्कथमन्यन्नृपोत्तम॥ | नृपश्रेष्ठ! जिस देवीभागवतमें साक्षात् मूलप्रकृतिका ही प्रतिपादन किया गया है, उसके समान अन्य कोई पुराण भला कैसे हो सकता है? हे जनमेजय! जिस | | पाठे वेदसमं पुण्यं यस्य स्याज्जनमेजय।<br>पठितव्यं प्रयत्नेन तदेव विबुधोत्तमैः॥ | देवीभागवतपुराणका पाठ करनेसे वेद-पाठके समान पुण्य प्राप्त होता है, उसका पाठ श्रेष्ठ विद्वानोंको प्रयत्नपूर्वक करना चाहिये। [ श्रीसूतजी मुनियोंसे बोले— ] जो इस | | नित्यं यः शृणुयाद्भक्त्या देवीभागवतं परम्।<br>न तस्य दुर्लभं किञ्चित्कदाचित्क्वचिदस्ति हि॥ | श्रेष्ठ श्रीमद्देवीभागवतका नित्य भक्तिपूर्वक श्रवण करता है, उसके लिये कुछ भी कहीं और कभी दुर्लभ नहीं है। | | अपुत्रो लभते पुत्रान्धनार्थी धनमाप्नुयात्।<br>विद्यार्थी प्राप्नुयाद्विद्यां कीर्तिमण्डितभूतलः॥ | इसके श्रवणसे पुत्रहीन व्यक्तिको पुत्र, धन चाहनेवालेको धन और विद्याके अभिलाषीको विद्याकी प्राप्ति हो जाती है, साथ ही सम्पूर्ण पृथ्वीलोकमें वह कीर्तिमान् हो जाता | | वन्ध्या वा काकवन्ध्या वा मृतवन्ध्या च याङ्गना।<br>श्रवणादस्य तद्दोषान्निवर्तेत न संशयः॥ | है। जो स्त्री वन्ध्या, काकवन्ध्या अथवा मृतवन्ध्या हो; वह इस पुराणके श्रवणसे उस दोषसे मुक्त हो जाती है; इसमें सन्देह नहीं है। यह पुराण जिस घरमें विधिपूर्वक पूजित | | यद्गेहे पुस्तकं चैतत्पूजितं यदि तिष्ठति।<br>तद्गेहं न त्यजेन्नित्यं रमा चैव सरस्वती॥ | होकर स्थित रहता है, उस घरको लक्ष्मी तथा सरस्वती कभी नहीं छोड़तीं और वेताल, डाकिनी तथा राक्षस आदि | | नेक्षन्ते तत्र वेतालडाकिनीराक्षसादयः।<br>ज्वरितं तु नरं स्पृष्ट्वा पठेदेतत्समाहितः॥ | वहाँ झाँकतेतक नहीं। यदि ज्वरग्रस्त मनुष्यको स्पर्श करके एकाग्रचित्त होकर इस पुराणका पाठ किया जाय तो दाहक | | मण्डलान्नाशमाप्नोति ज्वरो दाहसमन्वितः।<br>शतावृत्त्यास्य पठनात्क्षयरोगो विनश्यति॥ | ज्वर उसके मण्डलको छोड़कर भाग जाता है। इसकी एक सौ आवृत्तिके पाठसे क्षयरोग समाप्त हो जाता है। जो मनुष्य | | प्रतिसन्ध्यं पठेद्यस्तु सन्ध्यां कृत्वा समाहितः।<br>एकैकमस्य चाध्यायं स नरो ज्ञानवान्भवेत्॥ | प्रत्येक सन्ध्याके अवसरपर दत्तचित्त होकर सन्ध्या-विधि सम्पन्न करके इस पुराणके एक-एक अध्यायका पाठ करता है, वह ज्ञानवान् हो जाता है। शारदीय नवरात्रमें परम भक्तिसे | | नवरात्रे पठेन्नित्यं शारदीयेऽतिभक्तितः।<br>तस्याम्बिका तु सन्तुष्टा ददातीच्छाधिकं फलम्॥ | इस पुराणका नित्य पाठ करना चाहिये। इससे जगदम्बा उस व्यक्तिपर प्रसन्न होकर उसकी अभिलाषासे भी अधिक फल प्रदान करती हैं। वैष्णव, शैव, सौर तथा गाणपत्यजनोंको | | वैष्णवैश्चैव शैवैश्च रमोमा प्रीयते सदा।<br>सौरैश्च गाणपत्यैश्च स्वेष्टशक्तेश्च तुष्टये॥ | अपने-अपने इष्टदेवकी शक्तिकी सन्तुष्टिके लिये चैत्र, आषाढ़, आश्विन और माघ—इन मासोंके चारों नवरात्रोंमें इस पुराणका प्रयत्नपूर्वक पाठ करना चाहिये; इससे रमा, | | पठितव्यं प्रयत्नेन नवरात्रचतुष्टये।<br>वैदिकैर्निजगायत्रीप्रीतये नित्यशो मुने॥ | उमा आदि शक्तियाँ उसपर सदा प्रसन्न रहती हैं। हे मुने! इसी प्रकार वैदिकोंको भी अपनी गायत्रीकी प्रसन्नताके लिये इसका नित्य पाठ करना चाहिये। हे श्रेष्ठ | | वेदसारमिदं पुण्यं पुराणं द्विजसत्तमाः।<br>वेदपाठसमं पाठे श्रवणे च तथैव हि॥ | मुनियो! यह पुराण परम पवित्र तथा वेदोंका सारस्वरूप है। इसके पढ़ने तथा सुननेसे वेदपाठके समान फल प्राप्त होता है। [ श्रीमद्देवीभागवत ] |
अर्धश्लोकी देवीभागवत १५
अर्धश्लोकी देवीभागवत १५
अर्धश्लोकी देवीभागवत
जिस प्रकार सप्तश्लोकी दुर्गा^१, सप्तश्लोकी गीता^२, पंचश्लोकी गणेशपुराण,^३ चतुःश्लोकी भागवत,^४ एकश्लोकी भागवत^५, एकश्लोकी रामायण^६, एकश्लोकी योगवासिष्ठ^७, सार्धश्लोकी दुर्गा^८ तथा एकश्लोकी महाभारत^९ प्राप्त होता है; उसी प्रकार अर्धश्लोकी देवीभागवत भी प्राप्त होता है, जो तात्त्विक दृष्टिसे बड़े ही महत्त्वका है। पुराण-वाङ्मयमें देवीभागवतका अत्यन्त महनीय स्थान है। इसमें भगवती जगदम्बाका पराशक्तिके रूपमें निरूपण हुआ है। इस पुराणके प्राकट्यके विषयमें इसी पुराणमें बताया गया है कि जब भगवान् वेदव्यासने अपने पुत्र श्रीशुकदेवजीको गृहस्थाश्रम ग्रहण करनेका परामर्श दिया तो ज्ञानमार्गके उपासक श्रीशुकदेवजीने प्रवृत्तिमार्गको स्वीकार नहीं किया, तब वेदव्यासजीने मोक्षमार्गाभिलाषी अपने पुत्रसे कहा— हे महाभाग! तुम मेरे द्वारा रचित वेदतुल्य श्रीमद्देवी-भागवतपुराणको पढ़ो, इसमें बारह स्कन्ध हैं, यह पुराण सभी पुराणोंका आभूषण है और इसके सुननेमात्रसे सत् और असत् वस्तुओंका यथार्थ ज्ञान हो जाता है— ‘सदसज्ज्ञानविज्ञानं श्रुतमात्रेण जायते।’ (श्रीमद्देवीभा० १।१५।४९) व्यासजीने इस पुराणके प्राकट्यकी कथा बताते हुए आगे कहा— हे महामते! एक समयकी बात है, जब महाप्रलयावस्थामें एकार्णवके मध्य वटपत्रपर भगवान् विष्णु बालरूपमें शयन कर रहे थे और बड़े ही विचारमग्न थे कि किस चिदात्मा शक्तिने मुझे इस बालरूपमें उत्पन्न किया है, मैं उन्हें कैसे जानूँ? उसी समय आदिशक्ति भगवतीने आकाशवाणीके रूपमें आधे श्लोकमें ही सम्पूर्ण अर्थको प्रदान करनेवाले ज्ञानको बताते हुए कहा—
‘सर्वं खल्विदमेवाहं नान्यदस्ति सनातनम्॥’ (श्रीमद्देवीभा० १।१५।५२)
अर्थात् सब कुछ मैं ही हूँ और दूसरा कोई भी सनातन नहीं है।
भगवान् बालमुकुन्द सोचने लगे कि इस सत्य वचनका उच्चारण किसने किया, उस कहनेवालेको मैं कैसे जानूँ, वह स्त्री है या पुरुष? तब उन्होंने उस श्लोकार्धरूपी भागवतको अपने हृदयमें धारण कर लिया। वे उसके अर्थपर चिन्तन करने लगे और बार-बार उसका उच्चारण करने लगे। बालमुकुन्दको चिन्तातुर देखकर उसी समय भगवती पराशक्ति शंख, चक्र धारण किये चतुर्भुजा महादेवीके रूपमें अपनी सखियोंसहित
१. ‘ॐ ज्ञानिनामपि चेतांसि०’ इत्यादि सात श्लोक।
२. ‘ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म०’ इत्यादि सात श्लोक।
३. श्रीविघ्नेशपुराणसारमुदितम्० इत्यादि पाँच श्लोक।
४. अहमेवासमेवाग्रे नान्यद् यत् सदसत् परम्। पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम्॥
ऋतेऽर्थं यत् प्रतीयेत न प्रतीयेत चात्मनि। तद्विद्यादात्मनो मायां यथाऽऽभासो यथा तमः॥
यथा महान्ति भूतानि भूतेषूच्चावचेष्वनु। प्रविष्टान्यप्रविष्टानि तथा तेषु न तेष्वहम्॥
एतावदेव जिज्ञास्यं तत्त्वजिज्ञासुनाऽऽत्मनः। अन्वयव्यतिरेकाभ्यां यत् स्यात् सर्वत्र सर्वदा॥
(श्रीमद्भा० २।९।३२—३५)
५. आदौ देवकिदेवगर्भजननं गोपीगृहे वर्धनम् मायापूतनजीवतापहरणं गोवर्धनोद्धारणम्।
कंसच्छेदनकौरवादिहननं कुन्तीसुतापालनम् एतद् भागवतं पुराणकथितं श्रीकृष्णलीलामृतम्॥
६. आदौ रामतपोवनादिगमनं हत्वा मृगं काञ्चनं वैदेहीहरणं जटायुमरणं सुग्रीवसम्भाषणम्।
वालीनिग्रहणं समुद्रतरणं लङ्कापुरीदाहनं पश्चाद् रावणकुम्भकर्णहननमेतद्धि रामायणम्॥
७. तरवोऽपि हि जीवन्ति जीवन्ति मृगपक्षिणः। स जीवति मनो यस्य मननेनोपजीवति॥
८. मधुकैटभनाशं च महिषासुरघातनम्। शक्रादिस्तुतिकं चैव दूतसंवाद एव च॥
शुम्भराजवधश्चैव नारायणीस्तुतिस्तथा। सार्धपाठमिदं प्रोक्तं नवपाठफलप्रदम्॥
९. आदौ पाण्डवधार्तराष्ट्रजननं लाक्षागृहे दाहनं द्यूते श्रीहरणं वने विचरणं मत्स्यालये वर्तनम्।
लीलागोग्रहणं रणे विहरणं सन्धिक्रियाजृम्भणं पश्चाद् भीष्मसुयोधनादिहननं चैतन्महाभारतम्॥
१६ श्रीमद्देवीभागवत
वहाँ प्रकट हो गयीं, वे दिव्य वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत थीं और उनका स्वरूप बड़ा ही शान्त था। वे मन्द-मन्द मुस्करा रही थीं।
उनका दर्शनकर भगवान् विष्णु बड़े ही विस्मयमें पड़ गये और उन्होंने पूछा हे देवि! कुछ समय पूर्व मैंने जो आधा श्लोक सुना, वह परम रहस्यमय वचन किसने कहा था, मुझे बतानेकी कृपा करें। इसपर देवीने कहा—मैं सगुणरूपा चतुर्भुजा भगवती हूँ। सब गुणोंका आलय होते हुए मैं निर्गुणा भी हूँ। वह आधा श्लोक निर्गुणा पराशक्तिने ही कहा था, आप इसे सब वेदोंका तत्त्वस्वरूप, कल्याणकारी और पुण्यप्रद श्रीमद्देवीभागवत समझिये। 'पुण्यं भागवतं विद्धि वेदसारं शुभावहम्।' (श्रीमद्देवीभा० १।१६।१५) आप इसे सदा अपने चित्तमें रखिये और कभी विस्मृत न कीजिये। यह सब शास्त्रोंका सार है तथा भगवती महाविद्याके द्वारा प्रकाशित किया गया है। तीनों लोकोंमें इससे बढ़कर अन्य कुछ भी ज्ञातव्य नहीं है। ऐसा कहकर देवी अन्तर्धान हो गयीं और भगवान् विष्णुने वह श्लोकार्ध—देवीभागवतरूपी मन्त्र अपने हृदयदेशमें सदाके लिये धारण कर लिया। कुछ समय बाद जब ब्रह्माजी दैत्योंके भयसे डरकर भगवान् विष्णुकी शरणमें गये तो भगवान्को ध्यानमें स्थित होकर मन्त्र-जप करते हुए देखकर ब्रह्माजी बोले—हे देवेश! आप किस देवताका जप कर रहे हैं, आपसे भी बढ़कर कोई है क्या? तब विष्णुजी बोले—हे महाभाग! हम सभीमें जो कार्यकारणरूपा शक्ति विद्यमान है, जिनके द्वारा यह संसार पालित-पोषित और तिरोहित किया जाता है, वे ही सनातनी पराविद्या हैं, वे ही सभी ईश्वरोंकी भी स्वामिनी हैं। उन भगवतीने आधे श्लोकमें जो कहा, वही वास्तविक श्रीमद्देवीभागवत है। प्रत्येक द्वापरयुगमें उसीका विस्तार होगा—
श्लोकार्थेन तया प्रोक्तं तद्वै भागवतं किल।
विस्तरो भविता तस्य द्वापरादौ युगे तथा॥
(श्रीमद्देवीभा० १।१६।२९)
इतना कहनेके अनन्तर व्यासजीने शुकदेवजीसे फिर कहा—हे महाभाग! तब ब्रह्माजीने उस भागवतका संग्रह किया और उन्होंने इसे अपने पुत्र नारदजीको सुनाया। पूर्वकालमें वही भागवत देवर्षि नारदजीने मुझे दिया और फिर मैंने इसे बारह स्कन्धोंमें विस्तृत किया। हे पुत्र! यह पुराण वेदतुल्य है; सर्ग, प्रतिसर्ग आदि पाँच लक्षणोंसे युक्त है तथा भगवतीके उत्तम चरित्रोंसे ओत-प्रोत है। यह तत्त्वज्ञानके रससे परिपूर्ण, वेदार्थका उपबृंहण करनेवाला, ब्रह्मविद्याका निधान एवं भवसागरसे पार करनेवाला है। यह पुराण अत्यन्त पुण्यप्रद है। तुम इसके अठारह हजार श्लोकोंको हृदयंगम कर लो। यह पुराण पाठ तथा श्रवण करनेवालेके लिये अज्ञानका नाश करनेवाला, दिव्य, ज्ञानरूपी सूर्यका बोध करानेवाला, सुखप्रद, शान्तिदायक, धन्य, दीर्घ आयु प्रदान करनेवाला, कल्याणकारी तथा पुत्र-पौत्रकी वृद्धि करनेवाला है—
गृहाण त्वं महाभाग योग्योऽसि मतिमत्तरः।
पुण्यं भागवतं नाम पुराणं पुरुषर्षभ॥
अष्टादशसहस्त्राणां श्लोकानां कुरु संग्रहम्।
अज्ञाननाशनं दिव्यं ज्ञानभास्करबोधकम्॥
सुखदं शान्तिदं धन्यं दीर्घायुष्यकरं शिवम्।
शृण्वतां पठतां चेदं पुत्रपौत्रविवर्धनम्॥
(श्रीमद्देवीभा० १।१६।३५—३७)
इस प्रकार वेदव्यासजीके द्वारा प्रेरित किये जानेपर व्यासजीके शिष्य सूतजीने तथा श्रीशुकदेवजीने श्लोकार्धसे विस्तृत हुए श्रीमद्देवीभागवतपुराणका अध्ययन किया।
भगवतीकी कृपासे भगवान् बालमुकुन्दको जो आधे श्लोकमें देवीभागवत प्राप्त हुआ, उसे ब्रह्माजीने ग्रहण किया और फिर उसीको व्यासजीने बारह स्कन्धोंमें विस्तृत किया,* वही देवीभागवत हम सबको प्राप्त हुआ। यह भगवती आदिशक्ति तथा भगवान् वेदव्यासजीका जीवोंपर महान् अनुग्रह है।
* अर्धश्लोकात्मकं यन्नु देवीवक्त्राब्जनिर्गतम्। श्रीमद्भागवतं नाम वेदसिद्धान्तबोधकम्॥
उपदिष्टं विष्णवे यद्वटपत्रनिवासिने। शतकोटिप्रविस्तीर्णं तत्कृतं ब्रह्मणा पुरा॥
तत्सारमेकतः कृत्वा व्यासेन शुकहेतवे। अष्टादशसहस्रं तु द्वादशस्कन्धसंयुतम्॥ (श्रीमद्देवीभा० १२।१४।१—३)
भवान्यष्टकम् १७
भवान्यष्टकम्
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| न तातो न माता न बन्धुर्न दाता<br>न पुत्रो न पुत्री न भृत्यो न भर्ता।<br>न जाया न विद्या न वृत्तिर्ममैव<br>गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥ १॥ | हे भवानि! पिता, माता, भाई, दाता, पुत्र, पुत्री, भृत्य, स्वामी, स्त्री, विद्या और वृत्ति—इनमेंसे कोई भी मेरा नहीं है, हे देवि! एकमात्र तुम्हीं मेरी गति हो, तुम्हीं मेरी गति हो ॥ १॥ |
| भवाब्धावपारे महादुःखभीरुः<br>पपात प्रकामी प्रलोभी प्रमत्तः।<br>कुसंसारपाशप्रबद्धः सदाहं। गतिस्त्वं० ॥ २ ॥ | मैं अपार भवसागरमें पड़ा हुआ हूँ, महान् दुःखोंसे भयभीत हूँ; कामी, लोभी, मतवाला तथा संसारके घृणित बन्धनोंमें बँधा हुआ हूँ, हे भवानि! अब एकमात्र तुम्हीं मेरी गति हो, तुम्हीं मेरी गति हो ॥ २॥ |
| न जानामि दानं न च ध्यानयोगं<br>न जानामि तन्त्रं न च स्तोत्रमन्त्रम्।<br>न जानामि पूजां न च न्यासयोगं। गतिस्त्वं० ॥ ३ ॥ | हे भवानि! मैं न तो दान देना जानता हूँ और न ध्यानमार्गका ही मुझे पता है, तन्त्र और स्तोत्र-मन्त्रोंका भी मुझे ज्ञान नहीं है, पूजा तथा न्यास आदिकी क्रियाओंसे तो मैं एकदम कोरा हूँ, अब एकमात्र तुम्हीं मेरी गति हो, तुम्हीं मेरी गति हो ॥ ३ ॥ |
| न जानामि पुण्यं न जानामि तीर्थं<br>न जानामि मुक्तिं लयं वा कदाचित्।<br>न जानामि भक्तिं व्रतं वापि मातर्गतिस्त्वं० ॥ ४॥ | न मैं पुण्य जानता हूँ न तीर्थ, न मुक्तिका पता है न लयका। हे मातः! भक्ति और व्रत भी मुझे ज्ञात नहीं है, हे भवानि! अब केवल तुम्हीं मेरी गति हो, तुम्हीं मेरी गति हो ॥ ४॥ |
| कुकर्मी कुसङ्गी कुबुद्धिः कुदासः<br>कुलाचारहीनः कदाचारलीनः।<br>कुदृष्टिः कुवाक्यप्रबन्धः सदाहं। गतिस्त्वं० ॥ ५ ॥ | मैं कुकर्मी, बुरी संगतिमें रहनेवाला, दुर्बुद्धि, दुष्टदास, कुलोचित सदाचारसे हीन, दुराचारपरायण, कुत्सित दृष्टि रखनेवाला और सदा दुर्वचन बोलनेवाला हूँ, हे भवानि! मुझ अधमकी एकमात्र तुम्हीं मेरी गति हो, तुम्हीं मेरी गति हो ॥ ५ ॥ |
| प्रजेशं रमेशं महेशं सुरेशं<br>दिनेशं निशीथेश्वरं वा कदाचित्।<br>न जानामि चान्यत् सदाहं शरण्ये। गतिस्त्वं० ॥ ६॥ | मैं ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र, सूर्य, चन्द्रमा तथा अन्य किसी भी देवताको नहीं जानता, हे शरण देनेवाली भवानि! एकमात्र तुम्हीं मेरी गति हो, तुम्हीं मेरी गति हो ॥ ६ ॥ |
| विवादे विषादे प्रमादे प्रवासे<br>जले चानले पर्वते शत्रुमध्ये।<br>अरण्ये शरण्ये सदा मां प्रपाहि। गतिस्त्वं० ॥ ७॥ | हे शरण्ये! तुम विवाद, विषाद, प्रमाद, परदेश, जल, अनल, पर्वत, वन तथा शत्रुओंके मध्यमें सदा ही मेरी रक्षा करो, हे भवानि! एकमात्र तुम्हीं मेरी गति हो, तुम्हीं मेरी गति हो ॥ ७॥ |
| अनाथो दरिद्रो जरारोगयुक्तो<br>महाक्षीणदीनः सदा जाड्यवक्त्रः।<br>विपत्तौ प्रविष्टः प्रणष्टः सदाहं । गतिस्त्वं० ॥ ८ ॥ | हे भवानि! मैं सदासे ही अनाथ, दरिद्र, जरा-जीर्ण, रोगी, अत्यन्त दुर्बल, दीन, गूँगा, विपद्ग्रस्त और नष्टप्राय हूँ, अब एकमात्र तुम्हीं मेरी गति हो, तुम्हीं मेरी गति हो ॥ ८॥ |
॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्यकृतं भवान्यष्टकं सम्पूर्णम् ॥
॥ इस प्रकार श्रीमच्छङ्कराचार्यकृत भवान्यष्टक सम्पूर्ण हुआ ॥
सिंहस्कन्धाधिरूढां नानालङ्कारभूषिताम्। चतुर्भुजां महादेवीं नागयज्ञोपवीतिनीम्॥
ॐ श्रीश्रीजगद्धात्री ॐ
सिंहस्कन्धाधिरूढां नानालङ्कारभूषिताम्। चतुर्भुजां महादेवीं नागयज्ञोपवीतिनीम्॥
शङ्खशार्ङ्गसमायुक्तवामपाणिद्वयान्विताम् । चक्रं च पञ्चबाणांश्च धारयन्तीं च दक्षिणे॥
रत्नद्वीपे महाद्वीपे सिंहासनसमन्विते। प्रफुल्लकमलारूढां ध्यायेत्तां भवसुन्दरीम्॥
| श्रीमद्देवीभागवतकी पाठविधि | ११ |
|---|
श्रीमद्देवीभागवतकी पाठविधि
देवीभागवतं नाम पुराणं परमोत्तमम्।
त्रैलोक्यजननी साक्षाद् गीयते यत्र शाश्वती॥
श्रीमद्भागवतं यस्तु पठेद्वा शृणुयादपि।
श्लोकार्थं श्लोकपादं वा स याति परमां गतिम्॥
श्रीमद्देवीभागवत नामक पुराण सभी पुराणोंमें अतिश्रेष्ठ है, जिसमें तीनों लोकोंकी जननी साक्षात् सनातनी भगवतीकी महिमा गायी गयी है। जो श्रीमद्देवीभागवतके आधे श्लोक या चौथाई श्लोकको भी प्रतिदिन सुनता या पढ़ता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है।
श्रीमद्देवीभागवतके नवाह्नकी विधि है। दोनों नवरात्रोंमें तथा आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, कार्तिक, मार्गशीर्ष, माघ एवं फाल्गुन शुक्ल प्रतिपदासे नवमीतक इसके अनुष्ठानका विधान है। इसे 'नवाहयज्ञ' कहा जाता है। एतदर्थ कथा-स्थानकी भूमि का संशोधन, मार्जन-लेपनादिकर कदली-स्तम्भादिसे मण्डित मण्डप बनाना चाहिये। मण्डपका स्थान शुभ तथा बराबर होना चाहिये। उसका मान १६ हाथ लम्बा-चौड़ा हो तथा उसे तोरण, विमान एवं ध्वजा-पताकासे मण्डित किया जाय। मण्डपके बीचमें चार हाथ लम्बी-चौड़ी तथा एक हाथ ऊँची वेदी होनी चाहिये। फिर प्रतिपद्को प्रातः उठकर हृदय या शिरोदेशमें उज्ज्वल-पद्मके अन्तर्गत गुरुका ध्यान करना चाहिये। फिर शिखाके बीच इस रूपमें देवीका ध्यान करना चाहिये—
प्रकाशमानां प्रथमे प्रयाणे
प्रतिप्रयाणेऽप्यमृतायमानाम् ।
अन्तःपदव्यामनुसंचरन्ती-
मानन्दरूपामबलां प्रपद्ये ॥
(श्रीमद्देवीभा० ७।४०।३)
प्रथम प्रयाणमें अर्थात् ब्रह्मरन्ध्रमें संचरण करनेपर प्रकाश-पुंजरूपवाली, प्रतिप्रयाणमें अर्थात् मूलाधारमें संचरण करनेपर अमृतमयस्वरूपवाली तथा अन्तःपदमें अर्थात् सुषुम्णा नाड़ीमें विराजनेपर आनन्दमयी स्त्रीरूपिणी देवी कुण्डलिनीकी मैं शरण ग्रहण करता हूँ।
तत्पश्चात् किसी नदी, तड़ाग, सरोवर या पहाड़ी झील, झरने आदिमें स्नानकर नित्यकृत्य करना चाहिये। फिर भूतशुद्धि, मातृकान्यास एवं हृल्लेखा-मातृकान्यास करना चाहिये। इसकी विधि यह है कि मूलाधारमें 'ह' कार, हृदयमें 'र'कार, भ्रूमध्यमें 'ई'कार और मस्तकमें 'ह्रीं'कारका न्यास करे। फिर उपयुक्त ब्राह्मणोंका वरणकर वेदीपर सिंहासन रखकर उसपर क्षौम (रेशमी) वस्त्र-युक्त चार हाथोंवाली जगदम्बिकाकी प्रतिमा स्थापित करे। उन्हें रत्नाभूषण तथा मुक्ताहारादिसे विभूषित करे। चार हाथोंमें शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण कराये या अठारह भुजावाली प्रतिमा स्थापित करे। प्रतिमाके अभावमें 'नवार्ण मन्त्र' का यन्त्र ही रख दे। फिर पंचपल्लवादिसंयुक्त एक कलश वेद-मन्त्रोंसे संस्कृतकर श्रेष्ठ तीर्थके जलसे भरकर पास ही स्थापित करे। तत्पश्चात् गणपति-पूजन, बटुक, क्षेत्रपाल, योगिनी, मातृका, नवग्रह, तुलसी, ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर, लोकपाल, दिक्पाल आदिकी पूजाकर षोडशोपचार तथा श्रीसूक्त या नवार्णमन्त्रसे भगवती महाशक्तिकी पूजा करे। देवी-पूजनमें चन्दन, अगर या अष्टगन्ध* तथा अशोक, चम्पा, करवीर, मालती, मन्दार आदिके पुष्पों, बिल्व तथा तुलसी आदिका प्रयोग श्रेष्ठ है। फलोंमें नारियल, नारंगी, अनार, केला, आम शुभ हैं। तत्पश्चात् १६ उपचारोंसे देवीभागवत-ग्रन्थकी भी पूजा करे। अन्तमें फिर इस प्रकार स्तुति करनी चाहिये—
कात्यायनि महामाये भवानि भुवनेश्वरि॥
संसारसागरे मग्नं मामुद्धर कृपामये।
ब्रह्मविष्णुशिवाराध्ये प्रसीद जगदम्बिके॥
मनोऽभिलषितं देवि वरं देहि नमोऽस्तु ते।
(श्रीमद्देवीभा० माहात्म्य ५।३१-३३)
हे कात्यायनि! हे महामाये! हे भुवनेश्वरि! हे कृपामये! हे भवानि! मैं संसार-सागरमें डूब रहा हूँ; मेरा उद्धार कीजिये तथा हे ब्रह्मा, विष्णु, महेशसे पूजनीया माता जगदम्बिके! मेरे ऊपर प्रसन्न होइये। हे देवि! आप मुझे
* चन्दनागुरुकर्पूरचौरकुङ्कुमरोचनाः। जटामांसी कपियुता शक्तेर्गन्धाष्टकं विदुः॥ (तन्त्रसार—कलावती दीक्षा ५।१)
अर्थात् चन्दन, अगुरु, कपूर, कृष्णशुंठी, कुंकुम (केसर), गोरोचन, जटामांसी तथा गांठना (एक प्रकारका करंज) मिलाकर शक्तिका अष्टगन्ध बनता है।
श्रीमद्देवीभागवतकथा ( पारायण ) एवं अनुष्ठान-विधि
| २० | श्रीमद्देवीभागवत |
|---|
मनोवांछित वर प्रदान कीजिये; आपको बार-बार प्रणाम है।
तत्पश्चात् ऋष्यादिका न्यासकर पाठ आरम्भ करे।
पाठ आरम्भ करनेके बाद फिर अध्यायके बीचमें नहीं रुकना चाहिये। रुक जानेपर पुनः उसी अध्यायको आरम्भसे पढ़ना चाहिये। मध्यम स्वरसे श्रद्धापूर्वक धीरे-धीरे स्पष्ट पाठ करना चाहिये। गीत गाना, जल्दी करना, सिर कँपाना, अशुद्ध या अस्पष्ट उच्चारण करना, बिना अर्थ समझे ही पाठ करना—ये पाठके दोष हैं। पाठमें यथासाध्य इन दोषोंसे बचे रहना चाहिये। क्रोध, मद, त्वरा बाधक हैं। मनकी पवित्रता, शरीरकी पवित्रता अधिक सहायक है। दोपहरके बाद एक घड़ी विश्रामकर तथा लघुशंका आदिसे निवृत्त होकर पुनः पाठ करना चाहिये।
कथारम्भमें सोम, बुध, गुरु, शुक्रवार; अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, पुष्य, हस्त, अनुराधा, मूल तथा श्रवण नक्षत्र शुभ हैं। बृहस्पति जिस नक्षत्रमें हों, वहाँसे चौथे नक्षत्रतक कथा आरम्भ करनेसे धर्मप्राप्ति, ५ से ८ वेंतक लक्ष्मीप्राप्ति, पुनः ९ में सिद्धि, १० से १४ तक सुख प्राप्त होता है। गुर्वनिष्ठित नक्षत्रसे २० नक्षत्रोंतकमें कथारम्भ करनेसे पीड़ा, २४ वेंतक राजभय तथा २७ वेंतक ज्ञानकी प्राप्ति होती है। इस चक्रका ध्यान रखना आवश्यक है। (किंतु नवरात्रोंमें देवीभागवत-कथामें चक्र-विचार अपेक्षित नहीं है।) अनुष्ठानके समय ब्रह्मचर्य, भूमिशयन, सत्यवचन तथा इन्द्रियसंयम अत्यन्त आवश्यक है। पत्तलमें भोजन करना चाहिये। बैगन, दाल, बहेड़ा, मधु, तैल, बासी तथा दूषित अन्न नहीं खाना चाहिये। रजस्वला आदिसे स्पृष्ट तथा मसूर, मूली, हींग, प्याज, गाजर, कुम्हड़ा तथा नलिका आदिका शाक भी नहीं खाना चाहिये। प्रतिदिन कुमारीपूजन करना चाहिये या प्रतिदिन क्रमशः दुगुनी, तिगुनी पूजा बढ़ाते जाय। एक वर्षकी कन्याकी पूजा नहीं करनी चाहिये; क्योंकि उसे गन्धादिका कोई भी ज्ञान नहीं होता। दोसे नौ वर्षोंतककी कन्याएँ पूज्य हैं। अन्तिम दिन गायत्रीसहस्रनामका पाठ करना चाहिये और सप्तशतीके मन्त्रोंसे हवन करना चाहिये अथवा गायत्री या नवार्णमन्त्रसे हवन किया जाय। यह संक्षेपमें देवीभागवतकी पाठविधि है।
श्रीमद्देवीभागवतकथा ( पारायण ) एवं अनुष्ठान-विधि
जो लोग विधि-विधानसे श्रीमद्देवीभागवतकी कथा अथवा पारायण-पाठ कराना चाहते हों, उनके लिये पूजन आदिकी विस्तृत विधि और क्रम नीचे लिखा जा रहा है—
स्नान-सन्ध्योपासनादि कृत्यसे निवृत्त होकर पवित्र आसनपर सपत्नीक पूर्वाभिमुख बैठ जाय और पत्नीको अपने दाहिनी ओर बैठाये। चन्दन आदिसे तिलक कर ले। दोनों हाथोंकी अनामिका अँगुलीमें पवित्री धारण कर ले। आचमन, प्राणायाम कर ले, शिखामें ग्रन्थि लगा ले। तदनन्तर ग्रन्थिबन्धन कर ले और भगवान् विष्णुका ध्यान कर ले। रक्षादीप जलाकर हाथ धो ले।
अधिकारप्राप्तिके लिये गोत्रयनिष्क्रयद्रव्यका संकल्प— श्रीमद्देवीभागवतश्रवणमें अधिकारप्राप्तिके लिये प्रायश्चित्तके रूपमें तीन गौओंके निष्क्रयद्रव्यका दान करे। देवद्रव्य तथा त्रिकूर्च, अक्षत, पुष्प, जल लेकर निम्न संकल्प करे—
ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य श्रीब्रह्मणो द्वितीये परार्धे विष्णुपर्वे श्रीश्वेतवाराहनाम्नि प्रथमकल्पे वैवस्वत-मन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगस्य प्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भूर्लोके भारतवर्षे भरतखण्डे आर्यावर्तैकदेशे ....क्षेत्रे बौद्धावतारे ....नाम्नि संवत्सरे श्रीसूर्ये ....अयने ....ऋतौ महामाङ्गल्यप्रदे मासोत्तमे ....मासे ....पक्षे ....तिथौ ....वासरे ....राशिस्थिते श्रीसूर्ये शेषेषु ग्रहेषु यथायथं राशिस्थानस्थितेषु सत्सु एवं ग्रहगुणगणविशेषणविशिष्टायां शुभपुण्यतिथौ ....गोत्रः ....शर्मा/वर्मा/गुप्तः सपत्नीकोऽहं मम कृच्छ्रत्रयात्मक-प्रायश्चित्तानुष्ठानसिद्ध्यर्थं गोत्रयनिष्क्रयद्रव्यं रजतं चन्द्रदैवतं ....गोत्राय ....शर्मणे ब्राह्मणाय भवते सम्प्रददे।
संकल्पजल तथा द्रव्य ब्राह्मणको दे दे। तदनन्तर
श्रीमद्देवीभागवतकी पाठविधि २१
गोप्रार्थना करे—
गोप्रार्थना
गवामङ्गेषु तिष्ठन्ति भुवनानि चतुर्दश।
यस्मात्तस्माच्छिवं मे स्यादिहलोके परत्र च॥
प्रार्थनाके अनन्तर निम्न वाक्य बोले—अनेन गोदानेन पापापहा महाविष्णुः प्रीयताम्।
निम्न मन्त्रसे पंचगव्यप्राशन कर ले—
यत्त्वगस्थिगतं पापं देहे तिष्ठति मामके।
प्राशनात् पञ्चगव्यस्य दहत्यग्निरिवेन्धनम्॥
तदनन्तर हाथमें अक्षत-पुष्प लेकर ‘आ नो भद्रा०’ आदि मंगलमन्त्रोंका पाठ करे।
‘लक्ष्मीनारायणाभ्यां नमः’ आदि वाक्यों तथा ‘सुमुखश्चैकदन्तश्च’ इत्यादि गणपतिमन्त्रोंका पाठ करे। हाथके अक्षतपुष्प भगवान्को अर्पित कर दे। इसके बाद देवीभागवतश्रवणका तथा पूजनका प्रधान संकल्प करे—
प्रधान संकल्प
हाथमें त्रिकुश, अक्षत, पुष्प, जल, फल तथा द्रव्य लेकर निम्न संकल्प करे—
ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य श्रीब्रह्मणो द्वितीये परार्धे विष्णुपर्वे श्रीश्वेतवाराहनाम्नि प्रथमकल्पे वैवस्वत-मन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगस्य प्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भूर्लोके भारतवर्षे भरतखण्डे आर्यावर्तैकदेशे ॰॰॰॰क्षेत्रे (यदि काशी हो तो अविमुक्तवाराणसीक्षेत्रे आनन्दवने महाश्मशाने गौरीमुखे त्रिकण्टकविराजिते भागीरथ्याः पश्चिमे तीरे बोले) बौद्धावतारे ॰॰॰॰नाम्नि संवत्सरे श्रीसूर्ये ॰॰॰॰अयने ॰॰॰॰ऋतौ महामाङ्गल्यप्रदे मासोत्तमे ॰॰॰॰मासे ॰॰॰॰पक्षे ॰॰॰॰तिथौ ॰॰॰॰वासरे ॰॰॰॰नक्षत्रे ॰॰॰॰योगे ॰॰॰॰करणे ॰॰॰॰राशिस्थिते श्रीसूर्ये ॰॰॰॰राशिस्थिते चन्द्रे ॰॰॰॰राशिस्थिते देवगुरौ शेषेषु ग्रहेषु यथायथं राशिस्थानस्थितेषु सत्सु एवं ग्रहगुणगणविशेषण-विशिष्टायां शुभपुण्यतिथौ ॰॰॰॰गोत्रः ॰॰॰॰शर्मा/वर्मा/गुप्तः सपत्नीकोऽहं अतीतानेकजन्मसंञ्चिताखिल-दुष्कृतनिवृत्तिपुरस्सरैहिकामुष्मिकाध्यात्मिकादिताप-त्रयोपशमनपूर्वककायिकादित्रिविधपापानां समूलोन्मूल-नार्थं मनोभिलषितफलप्राप्तिपूर्वकश्रीपराम्बाप्रीतया-विर्भावकामः ॰॰॰॰गोत्रोत्पन्न ॰॰॰॰शर्माब्राह्मणवदनार-विन्दात् अनेकश्रोतृश्रावणपूर्वकं श्रीमद्देवीभागवतं नवाह्वविधिना श्रोष्यामि। तदङ्गतया विहितं स्वस्ति-पुण्याहवाचनं मातृकापूजनं वसोर्धारापूजनं आयुष्य-मन्त्रजपं साङ्कल्पिकेन विधिना नान्दीश्राद्धमाचार्यादि-वरणानि च करिष्ये। तत्रादौ प्रारीप्सितसम्पूर्तिप्रति-बन्धकविघ्नव्यूहध्वंसकामः गणेशाम्बिकयोः यथोपचारैः पूजनमहं करिष्ये। संकल्पजल छोड़ दे।
तदनन्तर संक्षेपमें स्वस्तिवाचन, गणपतिपूजन, कलशस्थापन, पुण्याहवाचन, मातृकापूजन, वसोर्धारापूजन, आयुष्यमन्त्रजप तथा नान्दीमुखश्राद्ध करे। इसके बाद आचार्य आदिका वरण करे।
तदनन्तर सर्वतोभद्रमण्डलपर कलश स्थापितकर पराम्बा भगवतीका षोडशोपचारपूजन करे। इसके बाद सूर्यादि नवग्रहोंका स्थापन-पूजन, असंख्यात रुद्रकलशकी स्थापना और पूजा, कुमारीपूजन, बटुकपूजन, पुस्तकपूजन आदि सम्पन्नकर कथा प्रारम्भ करनी चाहिये। कथा एवं पाठके अन्तमें अन्तिम दिन हवन करनेकी विधि है। (यदि विस्तृत पूजा न करनी हो तो केवल गणेशाम्बिकाका पूजनकर आचार्यादि ब्राह्मणोंको वरण देकर कलशपर पराम्बा भगवतीका पूजन कर ले तथा पुस्तकपूजन एवं कथावाचकका पूजनकर पाठ अथवा कथा प्रारम्भ करनी चाहिये।) यहाँ आचार्य आदिका वरण, पराम्बा भगवती दुर्गादेवी, कुमारी एवं बटुक आदिका पूजन संक्षेपमें दिया जा रहा है—
आचार्यवरण
हाथमें कुशाक्षत, जल, वरण-द्रव्य एवं वरणसामग्री लेकर सर्वप्रथम आचार्यके वरणका संकल्प करे—
ॐ अद्य पूर्वोच्चारितग्रहगणगुणविशेषण-विशिष्टायां शुभपुण्यतिथौ ॰॰॰॰गोत्रः ॰॰॰॰शर्मा/वर्मा/गुप्तोऽहं मम सर्वविधपापक्षयद्वारा ॰॰॰॰पूर्वोक्त-संकल्पितकार्यसिद्ध्यर्थं श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थञ्च श्रीम-द्देवीभागवतनवाह्नकथाश्रवणार्थं ॰॰॰॰गोत्रं ॰॰॰॰शर्माणं
२२ श्रीमद्देवीभागवत
२२ श्रीमद्देवीभागवत
नवाहकथाश्रावयितारं ब्राह्मणं एभिर्वरणद्रव्यैः भवन्तमहं वृणे। संकल्पजल छोड़ दे और वरणसामग्री आचार्यको प्रदान करे।
आचार्य बोले—ॐ वृतोऽस्मि।
उपवाचकका वरण
इसके बाद उपवाचकके वरणका निम्न संकल्प करे—ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः अद्य यथोक्तगुणविशिष्टतिथ्यादौ <sup>....</sup>गोत्रः <sup>....</sup>शर्मा/वर्मा/गुप्तोऽहं मम सकलपापक्षयद्वारा पूर्वोक्तसङ्कल्पितकार्यसिद्धयर्थं <sup>....</sup>गोत्रं <sup>....</sup>शर्माणं उपवाचयितारं ब्राह्मणं एभिर्वरणद्रव्यैः भवन्तमहं वृणे। संकल्पजल छोड़ दे तथा वरणसामग्री दे दे।
मन्त्रजप तथा दुर्गापाठके लिये ब्राह्मणोंका वरण
तदनन्तर गायत्री, गणेश आदिके मन्त्रजप तथा सप्तशतीपाठके लिये निम्न संकल्पसे ब्राह्मणोंका वरण करे—
ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः अद्य यथोक्तगुणविशिष्टतिथ्यादौ <sup>....</sup>गोत्रः <sup>....</sup>शर्मा/वर्मा/गुप्तोऽहं मम सर्वविधपातकनिवृत्तिद्वारा श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थं करिष्यमाणश्रीमद्देवीभागवतनवाहकथायज्ञकर्मणि एभिर्वरणद्रव्यैः नानागोत्रान् नानाशर्मणो ब्राह्मणान् गायत्रीगणेशादिमन्त्रजापकान् श्रीसूक्तसप्तशत्यादिपाठाकांश्च तत्तत्कर्मकर्तृत्वेन भवतोऽहं वृणे। संकल्पजल छोड़ दे। वरण-सामग्री ब्राह्मणोंको दे दे।
ऋत्विज बोलें—वृताः स्मः।
ब्राह्मण निम्न मन्त्रका पाठ करे—
व्रतेन दीक्षामाप्नोति दीक्षयाप्नोति दक्षिणाम्।
दक्षिणा श्रद्धामाप्नोति श्रद्धया सत्यमाप्यते॥
**प्रार्थना—**निम्न मन्त्रसे ब्राह्मणोंकी प्रार्थना करे—
अक्रोधनाः शौचपराः सततं ब्रह्मचारिणः।
देवध्यानरता नित्यं प्रसन्नमनसः सदा॥
अदुष्टभाषणाः सन्तु मा सन्तु परनिन्दकाः।
ममापि नियमा ह्येते भवन्तु भवतामपि॥
ऋत्विजश्च यथा पूर्वं शक्रादीनां मखेऽभवन्।
यूयं तथा मे भवत ऋत्विजो द्विजसत्तमाः॥
अस्मिन् कर्मणि ये विप्राः वृता गुरुमुखादयः।
सावधानाः प्रकुर्वन्तु स्वं स्वं कर्म यथोदितम्॥
अस्य यागस्य निष्पत्तौ भवन्तोऽभ्यर्थिता मया।
सुप्रसन्नैः प्रकर्तव्यं कर्मेदं विधिपूर्वकम्॥
तदनन्तर दिग्रक्षण, पंचगव्यप्रोक्षण करके सर्वतोभद्रमण्डलमें देवताओंका आवाहन-पूजन करे।
कलशके ऊपर देवीकी प्रतिमाका स्थापन
सर्वतोभद्रमण्डलके मध्यमें प्रधान कलशकी स्थापना करे। कलशके ऊपर अगन्युत्तारणपूर्वक स्वर्णनिर्मित देवीकी प्रतिमा स्थापित करे। प्रतिमाकी प्रतिष्ठा कर ले और श्रीसूक्तसे षोडशोपचारपूजन करे। प्रतिमाके ऊपर पंचरंगा वितान बाँधे।
सपत्नीक यजमान श्रीभगवतीदुर्गादेवीके समीपमें बैठकर अपने दक्षिण भागमें पूजनकी सामग्री स्थापित करे। तत्त्वशुद्धिके लिये निम्न रीतिसे आचमन करे—
ॐ ऐं आत्मतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा।
ॐ ह्रीं विद्यातत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा।
ॐ क्लीं शिवतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा।
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं सर्वतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा।
प्राणायाम
पूरक-कुम्भक-रेचकके क्रमसे प्राणायाम करे।
पवित्रीकरण
निम्न मन्त्रसे अपने ऊपर तथा पूजन-सामग्रीपर जल छिड़के—
अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।
यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥
ॐ पुण्डरीकाक्षः पुनातु। ॐ पुण्डरीकाक्षः पुनातु। ॐ पुण्डरीकाक्षः पुनातु।
आसन-पवित्रीकरण
पहले निम्न रीतिसे विनियोग करे—
पृथ्वीति मन्त्रस्य मेरुपृष्ठ ऋषिः सुतलं छन्दः कूर्मो देवता आसनपवित्रकरणे विनियोगः।
तदनन्तर निम्न मन्त्र बोले—
ॐ पृथ्वि त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता।
त्वं च धारय मां देवि पवित्रं कुरु चासनम्॥
श्रीमद्देवीभागवतकी पाठविधि २३
शिखाबन्धन
निम्न मन्त्रसे शिखाका स्पर्श करे—
ॐ ऊर्ध्वकेशि विरूपाक्षि मांसशोणितभोजने।
तिष्ठ देवि शिखामध्ये चामुण्डे चापराजिते॥
भैरवनमस्कार
निम्न मन्त्रसे भैरवजीको नमस्कार करे—
ॐ तीक्ष्णदंष्ट्र महाकाय कल्पान्तदहनोपम।
भैरवाय नमस्तुभ्यं अनुज्ञां दातुमर्हसि॥
दुर्गापूजनका संकल्प
हाथमें जल, अक्षत, पुष्प लेकर बोले—
ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः अद्य यथोक्तगुण-विशिष्टतिथ्यादौ ॰॰॰॰गोत्रः ॰॰॰॰शर्मा/वर्मा/गुप्तोऽहम् अस्मिन् श्रीमद्देवीभागवतनवाह्नकथायज्ञकर्मणि मम आत्मनः श्रुतिस्मृतिपुराणोक्तफलप्राप्त्यर्थं श्रीभगवत्या जगदम्बिकायाः त्रिगुणात्मिकायाः श्रीदुर्गादेव्याः पूजनं करिष्ये। पूजनकर्मणि आत्मनोऽधिकारपूर्वकयोग्यता-सम्पादनार्थं नवार्णेन न्यासान् करिष्ये। संकल्पजल छोड़ दे।
नवार्णमन्त्रके न्यासका संकल्प
अस्य श्रीनवार्णमन्त्रस्य ब्रह्मविष्णुरुद्रा ऋषयः गायत्र्युष्णिगनुष्टुभश्छन्दांसि श्रीमहाकालीमहालक्ष्मी-महासरस्वत्यो देवताः ऐं बीजं ह्रीं शक्तिः क्लीं कीलकम् श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीप्रीत्यर्थे न्यासे पूजायां च विनियोगः।
विनियोग पढ़कर जल गिराये। नीचे लिखे न्यासवाक्योंमेंसे एक-एकका उच्चारण करके दाहिने हाथकी अँगुलियोंसे क्रमशः सिर, मुख, हृदय, गुदा, दोनों चरण और नाभि—इन अंगोंका स्पर्श करे।
ऋष्यादिन्यास
ब्रह्मविष्णुरुद्रऋषिभ्यो नमः शिरसि (सिरका स्पर्श करे)।
गायत्र्युष्णिगनुष्टुप्छन्दोभ्यो नमः मुखे (मुखका स्पर्श करे)।
महाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीदेवताभ्यो नमः हृदि (हृदयका स्पर्श करे)।
ऐं बीजाय नमः गुह्ये (गुह्यस्थानका स्पर्श करे)।
ह्रीं शक्तये नमः पादयोः (दोनों पैरोंको छुए)।
क्लीं कीलकाय नमः नाभौ (नाभिका स्पर्श करे)।
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे—इस मूल मन्त्रसे हाथोंकी शुद्धि करके करन्यास करे।
करन्यास
ॐ ऐं अङ्गुष्ठाभ्यां नमः। (दोनों हाथोंकी तर्जनी अँगुलियोंसे दोनों अँगूठोंका स्पर्श करे)।
ॐ ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः। (दोनों हाथोंके अँगूठोंसे दोनों तर्जनी अँगुलियोंका स्पर्श करे)।
ॐ क्लीं मध्यमाभ्यां नमः। (दोनों अँगूठोंसे मध्यमा अँगुलियोंका स्पर्श करे)।
ॐ चामुण्डायै अनामिकाभ्यां नमः। (दोनों अँगूठोंसे अनामिका अँगुलियोंका स्पर्श करे)।
ॐ विच्चे कनिष्ठिकाभ्यां नमः। (कनिष्ठिका अँगुलियोंका स्पर्श करे)।
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे करतल-करपृष्ठाभ्यां नमः। (हथेलियों और उनके पृष्ठभागोंका परस्पर स्पर्श करे)।
हृदयादिन्यास
ॐ ऐं हृदयाय नमः (दाहिने हाथकी पाँचों अँगुलियोंसे हृदयका स्पर्श करे)।
ॐ ह्रीं शिरसे स्वाहा (सिरका स्पर्श करे)।
ॐ क्लीं शिखायै वषट् (शिखाका स्पर्श करे)।
ॐ चामुण्डायै कवचाय हुम् (दाहिने हाथकी अँगुलियोंसे बायें कंधेका और बायें हाथकी अँगुलियोंसे दाहिने कंधेका एक साथ स्पर्श करे)।
ॐ विच्चे नेत्रत्रयाय वौषट् (दाहिने हाथकी अँगुलियोंके अग्रभागसे दोनों नेत्रों और ललाटके मध्यभागका स्पर्श करे)।
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे अस्त्राय फट् (दाहिने हाथकी तर्जनी तथा मध्यमा अँगुलियोंसे बायें हाथकी हथेलीपर ताली बजाये)।
तदनन्तर अपने वामभागमें स्थापित पूजा-कलशमें गन्धाक्षत, पुष्प आदिसे वरुणकी पूजा करे।
| २४ | श्रीमद्देवीभागवत |
|---|
दीपप्रज्वलन तथा प्रार्थना
न्यासके अनन्तर देवीके दक्षिणभागमें घीका दीपक तथा बायें भागमें तिलके तेलका दीपक जलाकर निम्न मन्त्रसे दीपककी प्रार्थना करे—
भो दीप देवीरूपस्त्वं कर्मसाक्षी ह्यविघ्नकृत्।
यावत्कर्मसमाप्तिः स्यात् तावत्त्वं सुस्थिरो भव॥
तदनन्तर अपने वामभागमें स्थापित पूजा-कलशमें गन्धाक्षत, पुष्प आदिसे वरुणकी पूजा करे।
प्रोक्षण
कलशके जलसे अपना तथा सभी सामग्रियोंका प्रोक्षण करे।
शंखपूजन
कलशके जलसे शंखको पूरित करके देवीके वामभागमें त्रिपादुकाधारमें स्थापितकर निम्न मन्त्रसे गन्धाक्षतसे उसका पूजन करे—
ॐ अग्निर्ऋषिः पवमानः पाञ्चजन्यः पुरोहितः। तमीमहे महागयम्॥
तदनन्तर निम्न मन्त्रसे प्रार्थना करे—
त्वं पुरा सागरोत्पन्नो विष्णुना विधृतः करे।
निर्मितः सर्वदेवैश्च पाञ्चजन्य नमोऽस्तु ते॥
घण्टापूजन
घण्टा प्रक्षालितकर उसे अपने वामभागमें स्थापित करके निम्न मन्त्रसे गन्धाक्षतसे उसका पूजन करे—
ॐ सुपर्णोऽसि गरुत्मांस्त्रिवृत्ते शिरो गायत्रं चक्षुर्-बृहद्रथन्तरे पक्षौ। स्तोम आत्मा छन्दाँस्यङ्गानि यजूंषि नाम। साम ते तनूर्वामदेव्यं यज्ञायज्ञियं पुच्छं धिष्ण्याः शफाः। सुपर्णोऽसि गरुत्मान्दिवं गच्छ स्वः पत॥
तदनन्तर निम्न मन्त्रसे प्रार्थना करे—
ॐ आगमार्थं तु देवानां गमनार्थं तु रक्षसाम्।
घण्टानादं प्रकुर्वीत सर्वकामार्थसिद्धये॥
घण्टाध्वनि करके उसे यथास्थान रख दे।
॥ श्रीदुर्गादेवी-पूजनविधि ॥
ध्यान
हाथमें पुष्प लेकर निम्न मन्त्रोंसे दुर्गादेवीका ध्यान करे—
खड्गं चक्रगदेषुचापपरिघाञ्छूलं भुशुण्डीं शिरः
शङ्खं संदधतीं करैस्त्रिनयनां सर्वाङ्गभूषावृताम्।
नीलाश्मद्युतिमास्यपाददशकां सेवे महाकालिकां
यामस्तौत्स्वपिते हरौ कमलजो हन्तुं मधुं कैटभम्॥
अक्षस्रक्परशुं गदेषुकुलिशं पद्मं धनुः कुण्डिकां
दण्डं शक्तिमसिं च चर्म जलजं घण्टां सुराभाजनम्।
शूलं पाशसुदर्शने च दधतीं हस्तैः प्रसन्नाननां
सेवे सैरिभमर्दिनीमिह महालक्ष्मीं सरोजस्थिताम्॥
घण्टाशूलहलानि शङ्खमुसले चक्रं धनुः सायकं
हस्ताब्जैर्दधतीं घनान्तविलसच्छीतांशुतुल्यप्रभाम्।
गौरीदेहसमुद्भवां त्रिजगतामाधारभूतां महा-
पूर्वामत्र सरस्वतीमनुभजे शुम्भादिदैत्यार्दिनीम्॥
ॐ अम्बे अम्बिकेऽम्बालिके न मा नयति कश्चन।
ससस्त्यश्वकः सुभद्रिकां काम्पीलवासिनीम्॥
ॐ श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च पत्न्यावहोरात्रे पार्श्वे नक्षत्राणि रूपमश्विनौ व्यात्तम्। इष्णन्निषाणामुं म इषाण सर्वलोकं म इषाण॥
ॐ पावका नः सरस्वती वाजेभिर्वाजिनीवती।
यज्ञं वष्टु धियावसुः॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः श्रीदुर्गां ध्यायामि। ध्यानार्थे पुष्पाणि समर्पयामि। हाथके फूल चढ़ा दे।
आवाहन
हाथमें पुष्प लेकर श्रीदुर्गादेवीका आवाहन करे—
ॐ हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम्।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आ वह॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः श्रीदुर्गां आवाहयामि। आवाहनार्थे पुष्पाणि समर्पयामि। पुष्प चढ़ाये।
आसन
हाथमें पुष्प लेकर श्रीदुर्गादेवीको आसन प्रदान करे—
तां म आ वह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम्।
यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम्॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः आसनार्थे पुष्पाणि समर्पयामि। पुष्प चढ़ाये।
श्रीमद्देवीभागवतकी पाठविधि २५
पाद्य
अश्वपूर्वां रथमध्यां हस्तिनादप्रमोदिनीम्।
श्रियं देवीमुप ह्वये श्रीर्मा देवी जुषताम्॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः पादयोः पाद्यं समर्पयामि। जल चढ़ाये।
अर्घ्य
कां सोस्मितां हिरण्यप्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम्।
पद्मेस्थितां पद्मवर्णां तामिहोप ह्वये श्रियम्॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः हस्तयोरर्घ्यं समर्पयामि। अर्घ्यका जल चढ़ाये।
आचमनीय
चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देवजुष्टामुदाराम्।
तां पद्मिनीमीं शरणं प्र पद्ये अलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः, आचमनीयं जलं समर्पयामि। जल चढ़ाये।
स्नान
आदित्यवर्णे तपसोऽधि जातो वनस्पतस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः।
तस्य फलानि तपसा नुदन्तु या अन्तरा याश्च बाह्या अलक्ष्मीः॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः, स्थानीयं जलं समर्पयामि। जल चढ़ाये।
पञ्चामृतस्नान
पञ्च नद्यः सरस्वतीमपि यन्ति सस्रोतसः।
सरस्वती तु पञ्चधा सो देशेऽभवत्सरित्॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः, पंचामृतस्नानं समर्पयामि। पंचामृतसे स्नान कराये।
शुद्धोदकस्नान
शुद्धवालः सर्वशुद्धवालो मणिवालस्त आश्विनाः श्येतः श्येताक्षोऽरुणस्ते रुद्राय पशुपतये कर्णा यामा अवलप्ता रौद्रा नभोरूपाः पार्जन्याः॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः पञ्चामृतस्नानान्ते शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि। जलसे स्नान कराये।
महाभिषेकस्नान
श्रीसूक्तके मन्त्रोंद्वारा जलसे स्नान कराये।
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः, महाभिषेकस्नानं समर्पयामि।
वस्त्रोपवस्त्र
उपैतु मां देवसखः कीर्तिश्च मणिना सह।
प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन् कीर्तिमृद्धिं ददातु मे॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः वस्त्रोपवस्त्रं समर्पयामि। तदन्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि। वस्त्र तथा उपवस्त्र चढ़ाये। एक आचमनी जल छोड़े।
यज्ञोपवीत
क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम्।
अभूतिमसमृद्धिं च सर्वां निर्णुद मे गृहात्॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः यज्ञोपवीते समर्पयामि। तदन्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि। यज्ञोपवीत चढ़ाये। एक आचमनी जल छोड़े।
चन्दन
गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम्।
ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोप ह्वये श्रियम्॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः विलेपनार्थे चन्दनं समर्पयामि। भगवती दुर्गादेवीको चन्दन लगाये।
अक्षत
अक्षन्नमीमदन्त ह्यव प्रिया अधूषत। अस्तोषत स्वभानवो विप्रा नविष्ठया मती योजा न्विन्द्र ते हरी॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः चन्दनोपरि अक्षतान् समर्पयामि। भगवती दुर्गादेवीको चन्दनके ऊपर अक्षत लगाये।
पुष्प तथा पुष्पमाला
मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीमहि।
पशूनां रूपमन्नस्य मयि श्रीः श्रयतां यशः॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः पुष्पमालां समर्पयामि।
सौभाग्यद्रव्य
| २६ | श्रीमद्देवीभागवत |
|---|
भगवती दुर्गादेवीको पुष्पमाला चढ़ाये।
सौभाग्यद्रव्य
अहिरिव भोगैः पर्येति बाहुं ज्याया हेतिं परिबाधमानः।
हस्तघ्नो विश्वा वयुनानि विद्वान् पुमान् पुमांसं परि पातु विश्वतः॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः सौभाग्यद्रव्याणि समर्पयामि।
भगवती दुर्गादेवीको हल्दी-रोरी आदि सौभाग्यद्रव्य चढ़ाये।
सिन्दूर
सिन्धोरिव प्राध्वने शूघनासो वात प्रमियः पतयन्ति यह्वाः।
घृतस्य धारा अरुषो न वाजी काष्ठा भिन्दन्नूर्मिभिः पिन्वमानः॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः सिन्दूरं समर्पयामि। भगवती दुर्गादेवीको सिन्दूर चढ़ाये।
धूप
कर्दमेन प्रजा भूता मयि सम्भव कर्दम।
श्रियं वासय मे कुले मातरं पद्ममालिनीम्॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः धूपमाघ्रापयामि। भगवती दुर्गादेवीको धूप निवेदित करे।
दीप
आपः सृजन्तु स्निग्धानि चिक्लीत वस मे गृहे।
नि च देवीं मातरं श्रियं वासय मे कुले॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः दीपं दर्शयामि। भगवती दुर्गादेवीको दीप निवेदित करे।
नैवेद्य
आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं पिङ्गलां पद्ममालिनीम्।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आ वह॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः नैवेद्यं निवेदयामि। भगवती दुर्गादेवीको नैवेद्य निवेदित करे।
करोद्वर्तन
अꣳशुनाते अꣳशुः पृच्यतां परुषा परुः।
गन्धस्ते सोममवतु मदाय रसो अच्युतः॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः करोद्वर्तनकं समर्पयामि।
भगवती दुर्गादेवीको इत्र निवेदित करे।
ऋतुफल
याः फलिनीर्या अफला अपुष्पा याश्च पुष्पिणीः।
बृहस्पति प्रसूतास्तानो मुञ्चन्त्वꣳहसः॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः ऋतुफलानि समर्पयामि।
भगवती दुर्गादेवीको ऋतुफल निवेदित करे।
पूगीफल-ताम्बूल
आर्द्रा यः करिणीं यष्टिं सुवर्णां हेममालिनीम्।
सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आ वह॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः पूगीफलताम्बूलं समर्पयामि।
भगवती दुर्गादेवीको सुपारी तथा ताम्बूल निवेदित करे।
दक्षिणा
हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्।
स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः दक्षिणां समर्पयामि।
भगवती दुर्गादेवीको दक्षिणा चढ़ाये।
नीराजन
इदं हविः प्रजननं मे अस्तु दशवीरꣳ सर्वगणꣳ स्वस्तये।
आत्मसनि प्रजासनि पशुसनि लोकसन्यभयसनि। अग्निः प्रजां बहुलां मे करोत्वन्नं पयो रेतो अस्मासु धत्त॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः नीराजनं दर्शयामि। भगवती दुर्गादेवीकी आरती करे।
प्रदक्षिणा
तां म आ वह जातवेदो लक्ष्मीननपगामिनीम्।
यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान् विन्देयं पुरुषानहम्॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः प्रदक्षिणां समर्पयामि।
भगवती दुर्गादेवीकी प्रदक्षिणा करे।
पुष्पाञ्जलि
यः शुचिः प्रयतो भूत्वा जुहुयादाज्यमन्वहम्।
सूक्तं पञ्चदशर्चं च श्रीकामः सततं जपेत्॥
| श्रीमद्देवीभागवतकी पाठविधि | २७ |
|---|
यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्।
ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः॥
राजाधिराजाय प्रसह्य साहिने नमो वयं वैश्रवणाय कुर्महे। स मे कामान् कामकामाय मह्यं कामेश्वरो वैश्रवणो ददातु॥ कुबेराय वैश्रवणाय महाराजाय नमः॥
ॐ कात्यायन्यै विद्महे कन्याकुमारि धीमहि। तन्नो दुर्गा प्रचोदयात्॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः पुष्पाञ्जलिं समर्पयामि।
भगवती दुर्गादेवीको पुष्पांजलि समर्पित करे।
स्तुतिपाठ
निम्न स्तोत्रसे प्रार्थना करे—
नमस्ते शरण्ये शिवे सानुकम्पे
नमस्ते जगद्व्यापिके विश्वरूपे।
नमस्ते जगद्वन्द्यपादारविन्दे
नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे॥
नमस्ते जगच्चिन्त्यमानस्वरूपे
नमस्ते महायोगिनि ज्ञानरूपे।
नमस्ते नमस्ते सदानन्दरूपे
नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे॥
अनाथस्य दीनस्य तृष्णातुरस्य
भयार्तस्य भीतस्य बद्धस्य जन्तोः।
त्वमेका गतिर्देवि निस्तारकर्त्री
नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे॥
अरण्ये रणे दारुणे शत्रुमध्ये-
ऽनले सागरे प्रान्तरे राजगेहे।
त्वमेका गतिर्देवि निस्तारनौका
नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे॥
अपारे महादुस्तरेऽत्यन्तघोरे
विपत्सगारे मज्जतां देहभाजाम्।
त्वमेका गतिर्देवि निस्तारहेतु-
र्नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे॥
नमश्चण्डिके चण्डदुर्दण्डलीला-
समुत्खण्डिता खण्डिताशेषशत्रो।
त्वमेका गतिर्देवि निस्तारबीजं
नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे॥
त्वमेवाघभावाधृता सत्यवादी-
र्न जाता जितक्रोधनात् क्रोधनिष्ठा।
इडा पिङ्गला त्वं सुषुम्णा च नाडी
नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे॥
नमो देवि दुर्गे शिवे भीमनादे
सरस्वत्यरुन्धत्यमोघस्वरूपे ।
विभूतिः शची कालरात्रिः सती त्वं
नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे॥
शरणमसि सुराणां सिद्धविद्याधराणां
मुनिमनुजपशूनां दस्युभिस्त्रासितानाम्।
नृपतिगृहगतानां व्याधिभिः पीडितानां
त्वमसि शरणमेका देवि दुर्गे प्रसीद॥
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपायै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गायै नमः स्तुतिपाठं निवेदयामि।
अनया पूजया त्रिगुणात्मिका दुर्गा प्रीयताम् न मम। एक आचमनी जल छोड़े।
॥ सूर्यादि ग्रहोंका स्थापन एवं पूजन ॥
तदनन्तर ग्रहपीठके समीप बैठकर नवग्रहोंका स्थापन एवं पूजन करे। अपने दाहिने हाथमें जल, अक्षत तथा पुष्प लेकर पूजनका संकल्प करे—
ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः अद्य यथोक्तगुण-विशिष्टतिथ्यादौ शुभपुण्यतिथौ ॰॰॰॰गोत्रः ॰॰॰॰शर्मा/वर्मा/गुप्तोऽहं ॰॰॰॰कर्मणि निर्विघ्नतासंसिद्ध्यर्थं तथा च सूर्यादिग्रहाणां प्रीतये आदित्यादिनवग्रहाणां स्थापनं पूजनञ्च करिष्ये। हाथका जल आदि तष्टामें छोड़ दे तथा गन्धाक्षत-पुष्प लेकर निम्न मन्त्रोंसे नवग्रहोंका आवाहन तथा स्थापन करे—
सूर्य
ॐ आ कृष्णोन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च।
हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन्॥
ॐ भूर्भुवः स्वः सूर्याय नमः सूर्यमावाहयामि स्थापयामि।
चन्द्रमा
ॐ इमं देवा असपत्नꣳ सुवध्वं महते क्षत्राय महते
| २८ | श्रीमद्देवीभागवत |
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ज्यैष्ठ्याय महते जानराज्यायेन्द्रस्येन्द्रियाय । इमममुष्य
पुत्रममुष्यै पुत्रमस्यै विश एष वोऽमी राजा सोमोऽस्माकं
ब्राह्मणानां राजा ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः चन्द्रमसे नमः चन्द्रमसमावाहयामि
स्थापयामि।
भौम ( मंगल )
ॐ अग्निमूर्धा दिवः ककुत्पतिः पृथिव्या अयम्। अपां
रेतांसि जिन्वति ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः भौमाय नमः भौममावाहयामि
स्थापयामि।
बुध
ॐ उद्बुध्यस्वाग्ने प्रति जागृहि त्वमिष्टापूर्ते संसृजेथा मयं च।
अस्मिन्त्सधस्थे अध्युत्तरस्मिन्विश्वे देवा यजमानश्च सीदत ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः बुधाय नमः बुधमावाहयामि
स्थापयामि।
बृहस्पति
ॐ बृहस्पते अति यदर्यो अर्हाद् द्युमद्विभाति क्रतुमज्जनेषु।
यद्दीदयच्छवस ऋतप्रजात तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम् ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः बृहस्पतये नमः
बृहस्पतिमावाहयामि स्थापयामि।
शुक्र
ॐ अन्नात्परिस्रुतो रसं ब्रह्मणा व्यपिबत्क्षत्रं पयः सोमं
प्रजापतिः। ऋतेन सत्यमिन्द्रियं विपानं शुक्रमन्धस
इन्द्रस्येन्द्रियमिदं पयोऽमृतं मधु ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः शुक्राय नमः शुक्रमावाहयामि
स्थापयामि।
शनि
ॐ शं नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये।
शं योरभि स्रवन्तु नः॥
ॐ भूर्भुवः स्वः शनैश्चराय नमः शनैश्चर-
मावाहयामि स्थापयामि।
राहु
ॐ कया नश्चित्र आ भुवदूती सदावृधः सखा।
कया शचिष्ठया वृता ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः राहवे नमः राहुमावाहयामि
स्थापयामि।
केतु
ॐ केतुं कृण्वन्नकेतवे पेशो मर्या अपेशसे।
समुषद्भिरजायथाः ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः केतवे नमः केतुमावाहयामि
स्थापयामि।
निम्न मन्त्रसे सभीपर अक्षत चढ़ाकर ग्रहोंकी प्रतिष्ठा करे।
ॐ मनो जूतिर्जुषतामाज्यस्य बृहस्पतिर्यज्ञमिमं
तनोत्वरिष्टं यज्ञं समिमं दधातु। विश्वे देवास इह
मादयन्तामो३म्प्रतिष्ठ ॥
सूर्यादिनवग्रहेभ्यो नमः कहकर गन्धाक्षतपुष्प आदि उपचारोंसे पूजन करे। तदनन्तर निम्न प्रार्थना करे—
ब्रह्मा मुरारिस्त्रिपुरान्तकारी भानुः शशी भूमिसुतो बुधश्च।
गुरुश्च शुक्रः शनिराहुकेतवः सर्वे ग्रहाः शान्तिकरा भवन्तु ॥
सूर्यादिनवग्रहेभ्यो नमः मन्त्रपुष्पाञ्जलिं
समर्पयामि। मन्त्रपुष्पांजलि अर्पित करे।
अनया पूजया सूर्यादिनवग्रहाः प्रीयन्तां न मम।
कहकर एक आचमनी जल छोड़े।
॥ असंख्यात रुद्रकलशकी स्थापना ॥
तदनन्तर ग्रहपीठके ईशानकोणमें निम्न मन्त्रसे रुद्रकलशकी स्थापना करे—
ॐ असंख्याता सहस्राणि ये रुद्रा अधि भूम्याम्।
तेषां सहस्रयोजनेऽव धन्वानि तन्मसि ॥
निम्न मन्त्रसे कलशपर अक्षत छोड़कर प्रतिष्ठा करे—
ॐ मनो जूतिर्जुषतामाज्यस्य बृहस्पतिर्यज्ञमिमं
तनोत्वरिष्टं यज्ञं समिमं दधातु। विश्वे देवास इह
मादयन्तामो३म्प्रतिष्ठ ॥
प्रतिष्ठाके अनन्तर गन्धादि उपचारोंसे कलश एवं वरुणका पूजन करे।
प्रार्थना—निम्न मन्त्रसे भगवान् रुद्रकी प्रार्थना करे—
करचरणकृतं वाक्कायजं कर्मजं वा
श्रवणनयनजं वा मानसं वापराधम्।
विहितमविहितं वा सर्वमेतत्क्षमस्व
जय जय करुणाब्धे श्रीमहादेव शम्भो॥
अनेन पूजनाख्येन कर्मणा रुद्रवरुणौ प्रीयेताम्।
| श्रीमद्देवीभागवतकी पाठविधि | २९ |
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कहकर एक आचमनी जल छोड़े।
कुमारीपूजन ( नवकन्यापूजन ) *
जगत्पूज्यां जगद्वन्द्यां सर्वशक्तिस्वरूपिणीम्।
नवदुर्गात्मिकां देवीं कुमारीं पूजयाम्यहम्॥ १॥
ॐ भूर्भुवः स्वः कुमार्यै नमः कुमारीमावाहयामि पूजयामि। कुमारीरूप कन्याका पूजन करे।
त्रिपुरां त्रिपुराधारां त्रिवर्गज्ञानरूपिणीम्।
त्रैलोक्यवन्दितां देवीं त्रिमूर्तिं पूजयाम्यहम्॥ २॥
ॐ भूर्भुवः स्वः त्रिमूर्त्यै नमः त्रिमूर्तिमावाहयामि पूजयामि। त्रिमूर्तिरूप कन्याका पूजन करे।
कलात्मिकां कलातीतां कारुण्यहृदयां शिवाम्।
कल्याणजननीं देवीं कल्याणीं पूजयाम्यहम्॥ ३॥
ॐ भूर्भुवः स्वः कल्याण्यै नमः कल्याणीमावाहयामि पूजयामि। कल्याणीरूप कन्याका पूजन करे।
अणिमादिगुणोपेतामकाराद्यक्षरात्मिकाम् ।
अनन्तां शक्तिसम्पन्नां रोहिणीं पूजयाम्यहम्॥ ४॥
ॐ भूर्भुवः स्वः रोहिण्यै नमः रोहिणीमावाहयामि पूजयामि। रोहिणीरूप कन्याका पूजन करे।
कामचारां शुभां कान्तां कालचक्रस्वरूपिणीम्।
कामदां करुणोपेतां कालिकां पूजयाम्यहम्॥ ५॥
ॐ भूर्भुवः स्वः कालिकायै नमः कालिकामावाहयामि पूजयामि। कालिकारूप कन्याका पूजन करे।
चण्डवीरां चण्डमायां चण्डमुण्डप्रभञ्जिनीम्।
पूजयामि सदा देवीं चण्डिकां चण्डविक्रमाम्॥ ६॥
ॐ भूर्भुवः स्वः चण्डिकायै नमः चण्डिकामावाहयामि पूजयामि। चण्डिकारूप कन्याका पूजन करे।
सदानन्दकरीं शान्तां सर्वदेवनमस्कृताम्।
सर्वभूतात्मिकां देवीं शाम्भवीं पूजयाम्यहम्॥ ७॥
ॐ भूर्भुवः स्वः शाम्भव्यै नमः शाम्भवीमावाहयामि पूजयामि। शाम्भवीरूप कन्याका पूजन करे।
दुर्गमे दुस्तरे कार्ये भवदुःखविनाशिनीम्।
पूजयामि सदा भक्त्या दुर्गां दुर्गतिनाशिनीम्॥ ८॥
ॐ भूर्भुवः स्वः दुर्गायै नमः दुर्गामावाहयामि पूजयामि। दुर्गरूप कन्याका पूजन करे।
सुन्दरीं स्वर्णवर्णाभां सुखसौभाग्यदायिनीम्।
सुभ्रदजननीं देवीं सुभद्रां पूजयाम्यहम्॥ ९॥
ॐ भूर्भुवः स्वः सुभद्रायै नमः सुभद्रामावाहयामि पूजयामि। सुभद्रारूप कन्याका पूजन करे।
इस प्रकार पाद्य, अर्घ्य, आचमन, वस्त्र, अलंकार, गन्ध, अक्षत, माला आदिसे नौ कुमारियोंका पूजन करे, भोजन कराये तथा दक्षिणा प्रदानकर निम्न मन्त्रसे प्रार्थनापूर्वक प्रणाम करे—
नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः।
नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम्॥
दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः
स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि।
दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या
सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता॥
बटुकपूजन
निम्न मन्त्रसे बटुकका ध्यान करे—
ॐ करकलितकपालः कुण्डली दण्डपाणि-
स्तरुणतिमिरनीलव्यालयज्ञोपवीती।
ऋतुसमयसपर्याविघ्नविच्छेदहेतु-
र्जयति बटुकनाथः सिद्धिदः साधकानाम्॥
'ॐ बं बटुकाय नमः' इस मन्त्रसे पाद्य, अर्घ्य, आचमन, वस्त्र, अलंकार, गन्ध, अक्षत, माला आदिसे पूजन करे, भोजन कराये तथा दक्षिणा प्रदानकर प्रणाम करे।
पायसबलि
नर्वाणमन्त्रका उच्चारण करके 'ॐ महालक्ष्म्यै नमः' पायसबलिं समर्पयामि। कहकर जल छोड़ दे।
पुस्तकपूजन
निम्न मन्त्रसे गन्धाक्षतपुष्पसे श्रीमद्देवीभागवत-पुस्तकका ध्यान एवं पूजन करे—
या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।
या ब्रह्माच्युतशङ्करप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा॥
ॐ यदाकूतात्समुस्रुत्रोद्धो वा मनसो वा सम्भृतं चक्षुषो वा।
तदनु प्रेत सुकृतामु लोक यत्र ऋषयो जग्मुः प्रथमजाः पुराणाः॥
कथावाचकका पूजन
कथावाचकका पैर धोकर गन्ध, अक्षत, पुष्पमाला
* (क) कुमार्यश्च प्रतिदिनं अष्टोत्तरशतं नव एका वा यथासम्भवं पूज्याः। (ख) कुमारीपूजने द्विवर्षदारभ्य दशवर्षपर्यन्ता कन्या ग्राह्या। द्विवर्षाद्या दशाब्दाद्याः कुमारीः परिपूजयेत्। एकाब्दायाः प्रीत्यभावो रुद्राब्दा तु विवर्जिता॥