भारतकोश
संग्रह पर लौटें

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

अ० २४] पञ्चम स्कन्ध ६५७

अ० २४] पञ्चम स्कन्ध ६५७

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
श्रुत्वा शुम्भगुणानत्र प्राप्तास्म्यद्य दिदृक्षया।<br>गच्छ दूत महाभाग ब्रूहि शुम्भं महाबलम् ॥ ५७<br><br>निर्जने श्लक्ष्णया वाचा वचनं वचनान्मम।<br>त्वां ज्ञात्वा बलिनां श्रेष्ठं सुन्दराणां च सुन्दरम् ॥ ५८<br><br>दातारं गुणिनं शूरं सर्वविद्याविशारदम्।<br>जेतारं सर्वदेवानां दक्षं चोग्रं कुलोत्तरम् ॥ ५९<br><br>भोक्तारं सर्वरत्नानां स्वाधीनं स्वबलोन्नतम्।<br>पतिकामास्म्यहं सत्यं तव योग्या नराधिप ॥ ६०<br><br>स्वेच्छया नगरे तेऽत्र समायाता महामते।<br>ममास्ति कारणं किञ्चिद्विवाहे राक्षसोत्तम ॥ ६१<br><br>बालभावाद् व्रतं किञ्चित्कृतं राजन् मया पुरा।<br>क्रीडन्त्या च वयस्याभिः सहैकान्ते यदृच्छया ॥ ६२<br><br>स्वदेहबलदर्पेण सखीनां पुरतो रहः।<br>मत्समानबलः शूरो रणे मां जेष्यति स्फुटम् ॥ ६३<br><br>तं वरिष्याम्यहं कामं ज्ञात्वा तस्य बलाबलम्।<br>जहसुर्वचनं श्रुत्वा सख्यो विस्मितमानसाः ॥ ६४<br><br>किमेतया कृतं क्रूरं व्रतमद्भुतमाशु वै।<br>तस्मात्त्वमपि राजेन्द्र ज्ञात्वा मे हीदृशं बलम् ॥ ६५<br><br>जित्वा मां स्वबलेनात्र वाञ्छितं कुरु चात्मनः।<br>त्वं वा तवानुजो भ्राता समेत्य समराङ्गणे।<br>जित्वा मां समरेणात्र विवाहं कुरु सुन्दर ॥ ६६शुम्भके गुण सुनकर उन्हें देखनेकी इच्छासे मैं इस समय यहाँ आयी हुई हूँ। हे महाभाग्यशाली दूत! तुम जाओ और महाबली शुम्भसे एकान्त स्थानमें मधुर वाणीमें मेरे शब्दोंमें यह बात कहो—हे राजन्! आपको बलवानोंमें सबसे बली, सुन्दरोंमें अति सुन्दर, दानी, गुणी, पराक्रमी, सभी विद्याओंमें पारंगत, सभी देवताओंको जीत लेनेवाला, कुशल, प्रतापी, श्रेष्ठ कुलवाला, समस्त रत्नोंका भोग करनेवाला, स्वतन्त्र तथा अपनी शक्तिसे समृद्धिशाली बना हुआ जानकर मैं आपको पति बनानेकी इच्छुक हूँ। हे नराधिप! मैं भी निश्चितरूपसे आपके योग्य हूँ। हे महामते! मैं आपके इस नगरमें अपनी इच्छासे आयी हूँ। किंतु हे राक्षसश्रेष्ठ! मेरे विवाहमें कुछ शर्त है। हे राजन्! पूर्वमें मैंने सखियोंके साथ खेलते समय बालस्वभाववश अपने शारीरिक बलके अभिमानके कारण संयोगसे उन सखियोंके समक्ष एकान्तमें यह प्रतिज्ञा कर ली थी कि मेरे समान पराक्रम रखनेवाला जो वीर रणमें मुझे स्पष्टरूपसे जीत लेगा, उसके बलाबलको जानकर ही मैं पतिरूपमें उसका वरण करूँगी। मेरी यह बात सुनकर सखियोंके मनमें बड़ा विस्मय हुआ और वे जोर-जोरसे हँसने लगीं। [वे कहने लगीं] ‘इसने शीघ्रतापूर्वक यह कैसी भीषण तथा अद्भुत प्रतिज्ञा कर ली।’ अतएव हे राजेन्द्र! आप भी मेरे ऐसे पराक्रमको जानकर यहींपर अपने बलसे मुझे जीतकर अपना मनोरथ पूर्ण कर लीजिये। हे सुन्दर! आप अथवा आपका छोटा भाई समरांगणमें आकर युद्धके द्वारा मुझे जीतकर [मेरे साथ] विवाह कर लें॥ ५७—६६॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे
देव्या सुग्रीवदूताय स्वव्रतकथनं नाम त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥
~ ० ~

अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

शुम्भका धूम्रलोचनको देवीके पास भेजना और धूम्रलोचनका देवीको समझानेका प्रयास करना

व्यास उवाचव्यासजी बोले—
देव्यास्तद्वचनं श्रुत्वा स दूतः प्राह विस्मितः।<br>किं ब्रूषे रुचिरापाङ्गि स्त्रीस्वभावाद्धि साहसात् ॥ १भगवतीका वह वचन सुनकर वह दूत विस्मित हो गया और उसने देवीसे कहा—हे सुन्दर कटाक्षवाली! तुम स्त्रीस्वभावके कारण साहसपूर्वक यह क्या बोल रही हो?॥ १॥
६५८श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २४
श्लोकअर्थ
इन्द्राद्या निर्जिता येन देवा दैत्यास्तथापरे।<br>तं कथं समरे देवि जेतुमिच्छसि भामिनि॥ २हे भामिनि! हे देवि! जिन्होंने इन्द्र आदि देवताओं तथा अन्य दैत्योंको पराजित कर दिया है, उन्हें तुम संग्राममें जीतनेकी अभिलाषा कैसे रखती हो?॥ २॥
त्रैलोक्ये तादृशो नास्ति यः शुम्भं समरे जयेत्।<br>का त्वं कमलपत्राक्षि तस्याग्रे युधि साम्प्रतम्॥ ३त्रिलोकीमें वैसा कोई नहीं है, जो शुम्भको संग्राममें जीत सके; तब हे कमलसदृश नेत्रोंवाली! तुम कौन-सी सामर्थ्यशालिनी हो जो इस समय युद्धमें उनके सामने टिक सको?॥ ३॥
अविचार्य न वक्तव्यं वचनं क्वापि सुन्दरि।<br>बलं स्वपरयोर्ज्ञात्वा वक्तव्यं समयोचितम्॥ ४हे सुन्दरि! बिना सोचे-समझे कोई बात नहीं बोलनी चाहिये, अपितु अपने तथा शत्रुके बलको जानकर ही समयके अनुसार बोलना चाहिये॥ ४॥
त्रैलोक्याधिपतिः शुम्भस्तव रूपेण मोहितः।<br>त्वाञ्च प्रार्थयते राजा कुरु तस्येप्सितं प्रिये॥ ५तीनों लोकोंके अधिपति महाराज शुम्भ तुम्हारे रूपपर मोहित हो गये हैं और तुमसे प्रार्थना कर रहे हैं। अतः हे प्रिये! उनका मनोरथ पूर्ण करो॥ ५॥
त्यक्त्वा मूर्खस्वभावं त्वं सम्मान्य वचनं मम।<br>भज शुम्भं निशुम्भं वा हितमेतद् ब्रवीमि ते॥ ६मूर्खतापूर्ण स्वभाव त्यागकर मेरी बातको मान करके तुम शुम्भ अथवा निशुम्भ किसीको [पतिरूपमें] स्वीकार कर लो; मैं तुम्हारे लिये यह हितकर बात कह रहा हूँ॥ ६॥
शृङ्गारः सर्वथा सर्वैः प्राणिभिः परया मुदा।<br>सेवनीयो बुद्धिमद्भिर्नवानामुत्तमो यतः॥ ७सभी बुद्धिमान् प्राणियोंको चाहिये कि बड़े हर्षके साथ शृंगाररसका उपभोग करें; क्योंकि यह सभी नौ रसोंमें उत्तम माना गया है॥ ७॥
नागमिष्यसि चेद् बाले संक्रुद्धः पृथिवीपतिः।<br>अन्यानाज्ञाकरान्प्रेष्य बलान्नेष्यति साम्प्रतम्॥ ८हे बाले! यदि तुम मेरे साथ नहीं चलोगी तो राजा शुम्भ अत्यन्त कुपित होकर अन्य बहुत-से सेवकोंको अभी भेजकर तुम्हें बलपूर्वक पकड़वाकर ले जायँगे॥ ८॥
केशेष्वाकृष्य ते नूनं दानवा बलदर्पिताः।<br>त्वां नयिष्यन्ति वामोरु तरसा शुम्भसन्निधौ॥ ९हे वामोरु! वे बलाभिमानी दानव तुम्हारे केश-पाश पकड़कर बलपूर्वक तुम्हें निश्चय ही शुम्भके पास ले जायँगे॥ ९॥
स्वलज्जां रक्ष तन्वङ्गि साहसं सर्वथा त्यज।<br>मानिता गच्छ तत्पार्श्वे मानपात्रं यतोऽसि वै॥ १०अतः हे कोमलांगी! अपनी लज्जाकी रक्षा करो और इस दुस्साहसको पूर्णरूपसे छोड़ दो। तुम सम्मानित होकर उनके पास चलो; क्योंकि तुम सम्मानकी पात्र हो॥ १०॥
क्व युद्धं निशितैर्बाणैः क्व सुखं रतिसङ्गजम्।<br>सारासारं परिच्छेद्य कुरु मे वचनं पटु॥ ११<br>भज शुम्भं निशुम्भं वा लप्स्यसि परमं सुखम्।कहाँ तीक्ष्ण बाणोंसे होनेवाला युद्ध और कहाँ रतिक्रीड़ासे उत्पन्न होनेवाला सुख! सार-असार बातपर सही-सही विचार करके तुम मेरे हितकर वचनको मान लो और शुम्भ अथवा निशुम्भको अपना पति स्वीकार कर लो; इससे तुम परम सुख प्राप्त करोगी॥ ११ १/२ ॥

अ० २४] पञ्चम स्कन्ध ६५९

अ० २४] पञ्चम स्कन्ध ६५९

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
देव्युवाच<br>सत्यं दूत महाभाग प्रवक्तुं निपुणो ह्यसि॥ १२<br><br>निशुम्भशुम्भौ जानामि बलवन्ताविति ध्रुवम्।<br>प्रतिज्ञा मे कृता बाल्यादन्यथा सा कथं भवेत्॥ १३<br><br>तस्माद् ब्रूहि निशुम्भञ्च शुम्भं वा बलवत्तरम्।<br>विना युद्धं न मे भर्ता भविता कोऽपि सौष्ठवात्॥ १४<br><br>जित्वा मां तरसा कामं करं गृह्णातु साम्प्रतम्।<br>युद्धेच्छया समायातां विद्धि मामबलां नृप॥ १५<br><br>युद्धं देहि समर्थोऽसि वीरधर्मं समाचर।<br>बिभेषि मम शूलाच्चेत्पातालं गच्छ मा चिरम्॥ १६<br><br>त्रिदिवं च धरां त्यक्त्वा जीवितेच्छा यदस्ति ते।<br>इति दूत वदाशु त्वं गत्वा स्वपतिमादरात्॥ १७<br><br>स विचार्य यथायुक्तं करिष्यति महाबलः।<br>संसारे दूतधर्मोऽयं यत्सत्यं भाषणं किल॥ १८<br><br>शत्रौ पत्यौ च धर्मज्ञ तथा त्वं कुरु मा चिरम्।देवी बोलीं—हे महाभाग दूत! तुम बात करनेमें निपुण हो; यह सत्य है। शुम्भ और निशुम्भ निश्चय ही बलवान् हैं—यह मैं जानती हूँ। किंतु मैंने बाल्यकालसे ही जो प्रतिज्ञा कर रखी है, उसे मिथ्या कैसे किया जाय? अतः तुम निशुम्भसे अथवा उससे भी बलवान् शुम्भसे कह दो कि बिना युद्ध किये मात्र सौन्दर्यके बलपर कोई भी मेरा पति नहीं बन सकेगा। मुझे अपने बलसे जीतकर वह अभी पाणिग्रहण कर ले। हे राजन्! आप यह जान लीजिये कि मैं अबला होती हुई भी युद्धकी इच्छासे यहाँ आयी हूँ। यदि तुम समर्थ हो तो मेरे साथ युद्ध करो और वीरधर्मका पालन करो। इसके अतिरिक्त यदि मेरे त्रिशूलसे डरते हो और यदि जीनेकी तुम्हारी अभिलाषा है तो स्वर्ग और पृथ्वीलोकको छोड़कर अविलम्ब पाताललोक चले जाओ। हे दूत! अभी जाकर अपने स्वामीसे आदरपूर्वक ये बातें कह दो। इसके बाद वे महाबली शुम्भ विचार करके जो उचित होगा, उसे करेंगे। संसारमें यही दूतधर्म है कि जो सच्ची बात हो, उसे वैसा-का-वैसा शत्रु और स्वामी—दोनोंके प्रति अवश्य कह दे। हे धर्मज्ञ! तुम भी वैसा ही व्यवहार करो; विलम्ब मत करो॥ १२—१८ ½ ॥
व्यास उवाच<br>अथ तद्वचनं श्रुत्वा नीतिमद् बलसंयुतम्॥ १९<br><br>हेतुयुक्तं प्रगल्भञ्च विस्मितः प्रययौ तदा।<br>गत्वा दैत्यपतिं दूतो विचार्य च पुनः पुनः॥ २०<br><br>प्रणम्य पादयोः प्रह्वः प्रत्युवाच नृपञ्च तम्।<br>राजनीतिकरं वाक्यं मृदुपूर्वं प्रियं वचः॥ २१व्यासजी बोले—उस समय भगवती जगदम्बाके नीतियुक्त, शक्तिसम्पन्न, हेतुपूर्ण और ओजस्वी वचन सुनकर वह दूत आश्चर्यचकित हो गया और वहाँसे लौट गया। दैत्यपति शुम्भके पास पहुँचकर बार-बार विचार करके वह दूत विनम्र भावसे अपने राजाको प्रणाम करके उनसे नीतिपूर्ण, मधुरतासे युक्त तथा मनोहर बात कहने लगा॥ १९—२१॥
दूत उवाच<br>सत्यं प्रियं च वक्तव्यं तेन चिन्तापरो ह्यहम्।<br>सत्यं प्रियं च राजेन्द्र वचनं दुर्लभं किल॥ २२<br><br>अप्रियं वदतां कामं राजा कुप्यति सर्वथा।<br>साक्षात्कृतः समायाता कस्य वा किंबलाबला॥ २३दूत बोला—हे राजेन्द्र! सत्य और प्रिय बात कहनी चाहिये, इसीलिये मैं अत्यन्त चिन्तामें पड़ा हुआ हूँ; क्योंकि जो सत्य हो और प्रिय भी हो, वैसा वचन निश्चय ही दुर्लभ है। अप्रिय बोलनेवाले दूतोंपर राजा सर्वथा कुपित हो सकते हैं, [तथापि अपना धर्मपालन करते हुए मैं सच्ची बात कह रहा हूँ] वह स्त्री कहाँसे आयी है, किसकी पुत्री है और कितनी

| ६६० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २४ | | :--- | :--- |

संस्कृतहिन्दी
न ज्ञानगोचरं किञ्चित्किं ब्रवीमि विचेष्टितम्।<br>युद्धकामा मया दृष्टा गर्विता कटुभाषिणी॥ २४<br><br>तया यत्कथितं सम्यक् तच्छृणुष्व महामते।<br>मया बाल्यात्प्रतिज्ञेयं कृता पूर्वं विनोदतः॥ २५<br><br>सखीनां पुरतः कामं विवाहं प्रति सर्वथा।<br>यो मां युद्धे जयेद्बद्धा दर्पञ्च विधुनोति वै॥ २६<br><br>तं वरिष्याम्यहं कामं पतिं समबलं किल।<br>न मे प्रतिज्ञा मिथ्या सा कर्तव्या नृपसत्तम॥ २७सबल अथवा निर्बल है—इनमेंसे कुछ भी मैं नहीं जान सका, तब मैं उसके मनकी बात क्या बताऊँ! मुझे तो वह घमण्डी, कटु बोलनेवाली और सदा युद्धके लिये उत्सुक दिखायी पड़ती थी॥ २२—२४॥<br><br>हे महामते! उस स्त्रीने जो कुछ कहा है, उसे आप भलीभाँति सुनें—'मैंने पहले ही बाल्यावस्थामें सखियोंके समक्ष विनोदवश विवाहके विषयमें यह प्रतिज्ञा कर ली थी कि जो युद्धमें मुझे जीत लेगा और मेरे अभिमानको चूर्ण कर देगा, उसी समान बलवालेका मैं पतिरूपसे वरण करूँगी। हे नृपश्रेष्ठ! मेरी वह प्रतिज्ञा मिथ्या नहीं की जानी चाहिये। अतः हे धर्मज्ञ! मेरे साथ युद्ध करो और मुझे जीतकर अपने अधीन कर लो'॥ २५—२७ १/२॥
तस्माद्युध्यस्व धर्मज्ञ जित्वा मां स्ववशं कुरु।<br>तयेति व्याहृतं वाक्यं श्रुत्वाहं समुपागतः॥ २८<br><br>यथेच्छसि महाराज तथा कुरु तव प्रियम्।<br>सा युद्धार्थं कृतमतिः सायुधा सिंहगामिनी॥ २९<br><br>निश्चला वर्तते भूप यद्योग्यं तद्विधीयताम्।उस स्त्रीके द्वारा कही गयी यह बात सुनकर मैं आपके पास आया हूँ। हे महाराज! अब आप जैसे भी अपना हित समझते हों, वैसा ही करें। आयुधोंसे सुसज्जित तथा सिंहपर सवार वह युद्धके लिये दृढ़ संकल्प किये हुए है। हे भूप! वह अपनी बातपर अडिग है, अतः जो उचित हो उसे आप करें॥ २८–२९ १/२॥
व्यास उवाच<br>इत्याकर्ण्य वचस्तस्य सुग्रीवस्य नराधिपः॥ ३०<br><br>पप्रच्छ भ्रातरं शूरं समीपस्थं महाबलम्।**व्यासजी बोले—**अपने दूत सुग्रीवका यह वचन सुनकर राजा शुम्भने पासमें ही बैठे हुए शूरवीर तथा महाबली भाई निशुम्भसे पूछा॥ ३० १/२॥
शुम्भ उवाच<br>भ्रातः किमत्र कर्तव्यं ब्रूहि सत्यं महामते॥ ३१<br><br>नार्यैका योद्धुकामास्ति समाह्वयति साम्प्रतम्।<br>अहं गच्छामि संग्रामे त्वं वा गच्छ बलान्वितः॥ ३२<br><br>यद्रोचते निशुम्भात्र तत्कर्तव्यं मया किल।**शुम्भ बोला—**हे भाई! इस स्थितिमें मुझे क्या करना चाहिये, हे महामते! सच-सच बताओ। एक स्त्री युद्ध करनेकी अभिलाषा रखती है, इस समय [हमें युद्धके लिये] बुला रही है। अतः युद्धस्थलमें मैं जाऊँ अथवा सेना लेकर तुम जाओगे? हे निशुम्भ! इस विषयमें तुम्हें जो अच्छा लगेगा, निश्चय ही मैं वही करूँगा॥ ३१–३२ १/२॥
निशुम्भ उवाच<br>न मया न त्वया वीर गन्तव्यं रणमूर्धनि॥ ३३<br><br>प्रेषयस्व महाराज त्वरितं धूम्रलोचनम्।<br>स गत्वा तां रणे जित्वा गृहीत्वा चारुलोचनाम्॥ ३४<br>आगमिष्यति शुम्भात्र विवाहः संविधीयताम्।**निशुम्भ बोला—**हे वीर! अभी रणक्षेत्रमें न मुझे और न तो आपको ही जाना चाहिये। हे महाराज! शीघ्र ही धूम्रलोचनको भेज दीजिये। वहाँ जाकर युद्धमें उस सुन्दर नेत्रोंवाली स्त्रीको जीतकर और उसे पकड़कर वह यहाँ ले आयेगा। तत्पश्चात् हे शुम्भ! आप उसके साथ सम्यक् विवाह कर लीजिये॥ ३३–३४ १/२॥

| अ० २४ ] | पञ्चम स्कन्ध | ६६१ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
व्यास उवाच<br>तन्निशम्य वचस्तस्य शुम्भो भ्रातुः कनीयसः ॥ ३५<br>कोपात्सम्प्रेषयामास पार्श्वस्थं धूम्रलोचनम्।व्यासजी बोले—अपने छोटे भाईकी वह बात सुनकर शुम्भने पासमें ही बैठे हुए धूम्रलोचनको जानेके लिये क्रोधपूर्वक आदेश दिया॥ ३५ १/२॥
शुम्भ उवाच<br>धूम्रलोचन गच्छाशु सैन्येन महतावृत्तः ॥ ३६<br>गृहीत्वानय तां मुग्धां स्ववीर्यमदमोहिताम्।<br>देवो वा दानवो वापि मनुष्यो वा महाबलः ॥ ३७<br>तत्पार्ष्णिग्राहतां प्राप्तो हन्तव्यस्तरसा त्वया।<br>तत्पार्श्ववर्तिनीं कालीं हत्वा संगृह्य तां पुनः ॥ ३८<br>शीघ्रमत्र समागच्छ कृत्वा कार्यमनुत्तमम्।<br>रक्षणीया त्वया साध्वी मुञ्चन्ती मृदुमार्गणाम् ॥ ३९<br>यत्नेन महता वीर मृदुदेहा कृशोदरी।<br>तत्सहायाश्च हन्तव्या ये रणे शस्त्रपाणयः ॥ ४०<br>सर्वथा सा न हन्तव्या रक्षणीया प्रयत्नतः।शुम्भ बोला—हे धूम्रलोचन! तुम एक विशाल सेना लेकर अभी जाओ और अपने बलके मदमें चूर रहनेवाली उस मूढ़ स्त्रीको पकड़कर ले आओ। देवता, दानव या महाबली मनुष्य—कोई भी जो उसकी सहायताके लिये उपस्थित हो, उसे तुम तुरंत मार डालना। उसके साथमें रहनेवाली कालीको भी मारकर पुनः उस सुन्दरीको पकड़ करके और इस प्रकार मेरा यह अत्युत्तम कार्य सम्पन्नकर यहाँ शीघ्र आ जाओ। हे वीर! कोमल बाणोंको छोड़ती हुई उस सुकोमल शरीरवाली कृशोदरी साध्वी स्त्रीकी तुम प्रयत्नपूर्वक रक्षा करना। हाथमें शस्त्र धारण किये हुए उसके जो भी सहायक रणमें हों, उन्हें मार डालना, किंतु उसे मत मारना; सब तरहसे प्रयत्नपूर्वक उसकी रक्षा करना॥ ३६—४० १/२॥
व्यास उवाच<br>इत्यादिष्टस्तदा राज्ञा तरसा धूम्रलोचनः ॥ ४१<br>प्रणम्य शुम्भं सैन्येन वृतः शीघ्रं ययौ रणे।<br>असाधूनां सहस्राणां षष्ट्या तेषां वृतस्तथा ॥ ४२व्यासजी बोले—अपने राजा शुम्भका यह आदेश पाकर धूम्रलोचन उसे प्रणाम करके सेना साथ लेकर तुरंत युद्धभूमिकी ओर चल पड़ा। उसके साथमें साठ हजार राक्षस थे॥ ४१-४२॥
स ददर्श ततो देवीं रम्योपवनसंस्थिताम्।<br>दृष्ट्वा तां मृगशावाक्षीं विनयेन समन्वितः ॥ ४३<br>उवाच वचनं श्लक्ष्णं हेतुमद्रसभूषितम्।<br>शृणु देवि महाभागे शुम्भस्त्वद्विरहातुरः ॥ ४४<br>दूतं प्रेषितवान्पार्श्वे तव नीतिविशारदः।<br>रसभङ्गभयोद्विग्नः सामपूर्वं त्वयि स्वयम् ॥ ४५वहाँ पहुँचकर उसने एक मनोहर उपवनमें विराजमान भगवती जगदम्बाको देखा। हरिणके बच्चेके समान नेत्रोंवाली देवीको देखकर वह विनम्रतापूर्वक उनसे मधुर, हेतुयुक्त तथा सरस वचन कहने लगा—हे महाभाग्यवती देवि! सुनो, शुम्भ तुम्हारे विरहसे अत्यन्त व्याकुल हैं। नीतिनिपुण महाराजने रसभंग होनेके भयसे उद्विग्न होकर शान्तिपूर्वक तुम्हारे पास स्वयं एक दूत भेजा था॥ ४३—४५॥
तेनागत्य वचः प्रोक्तं विपरीतं वरानने।<br>वचसा तेन मे भर्ता चिन्ताविष्टमना नृपः ॥ ४६<br>बभूव रसमार्गज्ञे शुम्भः कामविमोहितः।<br>दूतेन तेन न ज्ञातं हेतुगर्भं वचस्तव ॥ ४७<br>यो मां जयति संग्रामे यदुक्तं कठिनं वचः।<br>न ज्ञातस्तेन संग्रामो द्विविधः खलु मानिनि ॥ ४८हे सुमुखि! उसने लौटकर विपरीत बात कह दी। उस बातसे मेरे स्वामी महाराज शुम्भके मनमें बहुत चिन्ता व्याप्त हो गयी है। हे रसतत्त्वको जाननेवाली! शुम्भ इस समय कामसे विमोहित हो गये हैं। वह दूत तुम्हारे सहेतुक वचनोंको नहीं समझ सका। तुमने जो यह कठिन वचन कहा था कि 'जो मुझे संग्राममें जीतेगा', उस संग्रामका

६६२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २४

६६२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २४

श्लोकअर्थ
रतिजोऽथोत्साहजश्च पात्रभेदे विवक्षितः।<br>रतिजस्त्वयि वामोरु शत्रोरुत्साहजः स्मृतः॥ ४९तात्पर्य वह नहीं जान सका। हे मानिनि! संग्राम दो प्रकारका होता है—कामजनित और उत्साहजनित। पात्रभेदसे समय-समयपर इनका अलग-अलग अर्थ किया जाता है। हे वामोरु! उन दोनोंमें आप-जैसी युवतीके साथ होनेवाले संग्रामको कामजनित संग्राम और शत्रुके साथ होनेवाले संग्रामको उत्साहजनित संग्राम कहा गया है॥ ४६—४९॥
सुखदः प्रथमः कान्ते दुःखदश्चारिजः स्मृतः।<br>जानाम्यहं वरारोहे भवत्या मानसं किल॥ ५०<br><br>रतिसंग्रामभावस्ते हृदये परिवर्तते।<br>इति तज्ज्ञं विदित्वा मां त्वत्सकाशं नराधिपः॥ ५१<br><br>प्रेषयामास शुम्भोऽद्य बलेन महतावृत्तम्।हे कान्ते! उनमें प्रथम रतिजन्य संग्राम सुखदायक और शत्रुके साथ किया जानेवाला उत्साहजन्य संग्राम दुःखदायक कहा गया है। हे सुन्दरि! मैं तुम्हारे मनकी बात जानता हूँ; तुम्हारे मनमें रतिजन्य संग्रामका भाव है। मुझको यह सब जाननेमें निपुण समझकर ही महाराज शुम्भने विशाल सेनाके साथ इस समय मुझे आपके पास भेजा है॥ ५०-५१ १/२॥
चतुरासि महाभागे शृणु मे वचनं मृदु॥ ५२<br><br>भज शुम्भं त्रिलोकेशं देवदर्पनिबर्हणम्।<br>पट्टराज्ञी प्रिया भूत्वा भुंक्ष्व भोगाननुत्तमान्॥ ५३हे महाभागे! तुम बड़ी चतुर हो। मेरे मधुर वचन सुनो। देवताओंका अभिमान चूर्ण कर देनेवाले त्रिलोकाधिपति शुम्भको [पतिरूपसे] स्वीकार कर लो और उनकी प्रिय पटरानी बनकर अत्युत्तम सुखोंका उपभोग करो॥ ५२-५३॥
जेष्यति त्वां महाबाहुः शुम्भः कामबलार्थवित्।<br>विचित्रान्कुरु भावांस्त्वं सोऽपि भावान्करिष्यति॥ ५४<br><br>भविष्यति कालिकेयं तत्र वै नर्मसाक्षिणी।<br>एवं सङ्गरयोगेन पतिर्मे परमार्थवित्॥ ५५<br><br>जित्वा त्वां सुखशय्यायां परिश्रान्तां करिष्यति।<br>रक्तदेहां नखाघातैर्दन्तैश्च खण्डिताधराम्॥ ५६<br><br>स्वेदक्लिन्नां प्रभग्नां त्वां संविधास्यति भूपतिः।<br>भविता मानसः कामो रतिसंग्रामजस्तव॥ ५७कामसम्बन्धी बलका रहस्य जाननेवाले विशालबाहु शुम्भ तुम्हें जीत लेंगे। तुम उनके साथ विचित्र हाव-भाव करो, वे भी वैसे ही हाव-भाव प्रदर्शित करेंगे। यह कालिका [उस अवसरपर] हास-विलासकी साक्षी रहेगी। इस प्रकार कामतत्त्वके परमवेत्ता मेरे स्वामी शुम्भ कामयुद्धके द्वारा तुम्हें सुखशय्यापर जीतकर शिथिल कर देंगे। वे महाराज शुम्भ अपने नखोंके आघातसे तुम्हें रक्तरंजित शरीरवाली बना देंगे, दाँतोंसे काटकर तुम्हारे ओठोंको खण्डित कर देंगे, तुम्हें पसीनेसे तर कर देंगे और मर्दित कर डालेंगे; तब तुम्हारा रतिसंग्रामसम्बन्धी मनोरथ पूर्ण हो जायगा॥ ५४—५७॥
दर्शनाद्वश एवास्ते शुम्भः सर्वात्मना प्रिये।<br>वचनं कुरु मे पथ्यं हितकृच्चापि पेशलम्॥ ५८<br><br>भज शुम्भं गणाध्यक्षं माननीयातिमानिनी।<br>मन्दभाग्याश्च ते नूनं ह्यस्त्रयुद्धप्रियाश्च ये॥ ५९हे प्रिये! तुम्हें देखते ही शुम्भ पूर्णरूपसे तुम्हारे वशीभूत हो जायेंगे। अतएव मेरी उचित, कल्याणकारी और सुखकर बात मान लो। तुम माननीयोंमें अत्यन्त मानिनी हो, अतः गणाध्यक्ष शुम्भको स्वीकार कर लो। जो शस्त्रयुद्धसे प्रेम रखते हैं, वे अवश्य ही मन्दभाग्य हैं। रतिक्रीड़ामें प्रीति रखनेवाली हे कान्ते!
अ० २५ ]पञ्चम स्कन्ध६६३

| न तदर्हासि कान्ते त्वं सदा सुरतवल्लभे।<br>अशोकं कुरु राजानं पादाघातविकासितम्॥ ६०<br><br>बकुलं सीधुसेकेन तथा कुरबकं कुरु॥ ६१ | तुम शस्त्रयुद्धके योग्य नहीं हो। जैसे कामिनीके पदप्रहारसे अशोक, मुख मदिराके सेचनसे मौलसिरी और कुरबक प्रफुल्लित हो उठता है, उसी प्रकार तुम भी महाराज शुम्भको शोकरहित और आह्लादित करो॥ ५८-६१॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे देवीमाहात्म्ये देवीपार्श्वे धूम्रलोचनदूतप्रेषणं नाम चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥


अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

भगवती काली और धूम्रलोचनका संवाद, कालीके हुंकारसे धूम्रलोचनका भस्म होना तथा शुम्भका चण्ड-मुण्डको युद्धहेतु प्रस्थानका आदेश देना

व्यास उवाचव्यासजी बोले—[हे महाराज!] यह बात कहकर धूम्रलोचन चुप हो गया। तब भगवती काली हँसकर सुन्दर वचन बोलीं—धूर्त! तुम तो पूरे विदूषक हो और नटों-जैसी बात करते हो। मधुर बोलते हुए तुम व्यर्थ ही मनमें अनेकविध कामनाएँ कर रहे हो॥ १-२॥
इत्युक्त्वा विररामासौ वचनं धूम्रलोचनः।<br>प्रत्युवाच तदा काली प्रहस्य ललितं वचः॥ १<br><br>विदूषकोऽसि जाल्म त्वं शैलूष इव भाषसे।<br>वृथा मनोरथांश्चित्ते करोषि मधुरं वदन्॥ २
बलवान्बलसंयुक्तः प्रेषितोऽसि दुरात्मना।<br>कुरु युद्धं वृथा वादं मुञ्च मूढमतेऽधुना॥ ३हे मूढमते! दुष्टात्मा शुम्भने तुझ बलवान्‌को सेनासे सुसज्जित करके युद्धहेतु भेजा है, अतः अब युद्ध करो और व्यर्थकी बातें छोड़ दो॥ ३॥
हत्वा शुम्भं निशुम्भञ्च त्वदन्यान्वा बलाधिकान्।<br>देवी क्रुद्धा शराघातैर्व्रजिष्यति निजालयम्॥ ४ये देवी कुपित होकर शुम्भ, निशुम्भ तथा तुम्हारे अन्य बलवान् दैत्योंका अपने बाणोंके प्रहारसे संहार करके अपने धामको चली जायँगी॥ ४॥
क्वासौ मन्दमतिः शुम्भः क्व वा विश्वविमोहिनी।<br>अयुक्तः खलु संसारे विवाहविधिरेतयोः॥ ५कहाँ वह मन्दमति शुम्भ और कहाँ ये विश्वमोहिनी जगदम्बा! इन दोनोंका विवाह इस संसारमें सर्वथा अनुपयुक्त है॥ ५॥
सिंही किं त्वतिकामार्ता जम्बुकं कुरुते पतिम्।<br>करिणी गर्दभं वापि गवयं सुरभिः किमु॥ ६क्या अत्यधिक कामार्त होनेपर भी सिंहिनी सियारको, हथिनी किसी गर्दभको अथवा सुरभि किसी सामान्य वृषभको अपना पति बना सकती है?॥ ६॥
गच्छ शुम्भं निशुम्भं च वद सत्यं वचो मम।<br>कुरु युद्धं न चेद्याहि पाताल तरसाधुना॥ ७अब तुम शुम्भ-निशुम्भके पास चले जाओ और उनसे मेरी यह सच्ची बात कह दो कि 'तुम मेरे साथ युद्ध करो; अन्यथा इसी समय शीघ्र पाताललोक चले जाओ'॥ ७॥
व्यास उवाच<br>कालिकाया वचः श्रुत्वा स दैत्यो धूम्रलोचनः।<br>तामुवाच महाभाग क्रोधसंरक्तलोचनः॥ ८**व्यासजी बोले—**हे महाभाग! देवी कालिकाका यह वचन सुनते ही वह दैत्य धूम्रलोचन क्रोधके मारे आँखें लाल करके उनसे कहने लगा—

६६४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २५

६६४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २५

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
दुर्दर्शं त्वां निहत्याजौ सिंहञ्च मदगर्वितम्।<br>गृहीत्वैनां गमिष्यामि राजानं प्रत्यहं किल॥ ९दुर्दर्श ! अभी तुझे तथा इस मदोन्मत्त सिंहको युद्धमें मारकर और इस स्त्रीको लेकर मैं राजा शुम्भके पास अवश्य चला जाऊँगा॥ ८-९॥
रसभङ्गभयात्कालि बिभेमि त्विह साम्प्रतम्।<br>नोचेत्त्वां निशितैर्बाणैर्हन्म्यद्य कलहप्रिये॥ १०कलहमें अनुराग रखनेवाली हे काली ! रसमें भंग पड़नेकी शंकासे मैं इस समय डर रहा हूँ, नहीं तो मैं अपने तीक्ष्ण बाणोंसे तुम्हें अभी मार डालता ॥ १०॥
कालिकोवाच<br>किं विकत्थसि मन्दात्मन्नायं धर्मो धनुष्मताम्।<br>स्वशक्त्या मुञ्च विशिखानन्तासि यमसंसदि॥ ११**कालिका बोलीं—**हे मन्दबुद्धि! तुम अनर्गल प्रलाप क्यों कर रहे हो, धनुर्धर वीरोंका यह धर्म नहीं है। तुम अपनी पूरी शक्तिसे बाण चलाओ। तुम तो अभी यमलोक जानेवाले हो॥ ११॥
व्यास उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं दैत्यः संगृह्य कार्मुकं दृढम्।<br>कालिकां तां शरासारैर्ववर्षार्तिशिलाशितैः॥ १२**व्यासजी बोले—**यह वचन सुनकर वह दैत्य धूम्रलोचन अपना सुदृढ़ धनुष लेकर भगवती कालिकाके ऊपर पत्थरकी सानपर चढ़ाकर तेज किये गये बाणोंकी घोर वर्षा करने लगा॥ १२॥
देवास्तु प्रेक्षकास्तत्र विमानवरसंस्थिताः।<br>तां स्तुवन्तो जयेत्यूचुर्देवीं शक्रपुरोगमाः॥ १३उस समय इन्द्र आदि प्रधान देवता उत्तम विमानोंमें बैठकर यह युद्ध देख रहे थे। वे देवीकी स्तुति करते हुए उनकी जयकार कर रहे थे॥ १३॥
तयोः परस्परं युद्धं प्रवृत्तं चातिदारुणम्।<br>बाणखड्गगदाशक्तिमुसलादिभिरुत्कटम्॥ १४परस्पर उन दोनोंमें बाण, खड्ग, गदा, शक्ति तथा मुसल आदि शस्त्रोंसे अत्यन्त भीषण तथा उग्र युद्ध होने लगा॥ १४॥
कालिका बाणपातैस्तु हत्वा पूर्वं खरानथ।<br>बभञ्ज तद्रथं व्यूढं जहासा च मुहुर्मुहुः॥ १५भगवती कालिकाने पहले अपने बाण-प्रहारोंसे [उसके रथमें जुते] खच्चरोंको मारकर बादमें उसके सुदृढ़ रथको भी चूर्ण कर दिया, फिर वे बार-बार अट्टहास करने लगीं॥ १५॥
स चान्यं रथमारूढः कोपेन प्रज्वलन्निव।<br>बाणवृष्टिं चकारोग्रां कालिकोपरि भारत॥ १६हे भारत! क्रोधाग्निमें जलता हुआ-सा वह दानव धूम्रलोचन दूसरे रथपर सवार हो गया और कालिकाके ऊपर भयंकर बाण-वृष्टि करने लगा॥ १६॥
सापि चिच्छेद तरसा तस्य बाणानसङ्गतान्।<br>मुमोचान्यानुग्रवेगान्दानवोपरि कालिका॥ १७उसके बाण भगवतीके पास पहुँच भी नहीं पाते थे कि वे उन बाणोंको काट डालती थीं। तत्पश्चात् वे कालिका अन्य तीव्रगामी बाण उस दानवके ऊपर छोड़ने लगीं॥ १७॥
तैर्बाणैर्निहतास्तस्य पाष्णिग्राहाः सहस्रशः।<br>बभञ्ज च रथं वेगात्सूतं हत्वा खरानपि॥ १८<br><br>चिच्छेद तद्धनुः सद्यो बाणैरुरगसन्निभैः।<br>मुदं चक्रे सुराणां सा शङ्खनादं तथाकरोत्॥ १९उन बाणोंसे उसके हजारों सहायक सैनिक मारे गये। तत्पश्चात् देवी कालिकाने उसके खच्चरों तथा सारथिको शीघ्रतापूर्वक मारकर उस रथको भी नष्ट कर दिया। उसके बाद देवीने अपने सर्प-सदृश बाणोंसे शीघ्रतापूर्वक उसका धनुष काट डाला। ऐसा करके देवीने देवताओंको आनन्दित कर दिया और वे शंखनाद करने लगीं॥ १८-१९॥

| अ० २५ ] | पञ्चम स्कन्ध | ६६५ | | :--- | :--- | | विरथः परिघं गृह्य सर्वलोहमयं दृढम्।<br>आजगाम रथोपस्थं कुपितो धूम्रलोचनः॥ २० | अब रथसे विहीन वह धूम्रलोचन कुपित होकर एक लोहमय मजबूत परिघ लेकर देवीके रथके सन्निकट आ गया॥ २०॥ | | वाचा निर्भर्त्सयन्कालीं करालः कालसन्निभः।<br>अद्यैव त्वां हनिष्यामि कुरूपे पिङ्गलोचने॥ २१<br><br>इत्युक्त्वा सहसागत्य परिघं क्षिपते यदा।<br>हुङ्कारेणैव तं भस्म चकार तरसाम्बिका॥ २२ | कालसदृश भयंकर वह धूम्रलोचन वाणीसे भगवती कालीको फटकारते हुए कहने लगा—‘कुरूपा तथा पिंगलनेत्रोंवाली! मैं तुम्हें अभी मार डालूँगा’ ऐसा कहकर वह ज्यों ही कालिकापर परिघ चलानेको उद्यत हुआ, देवीने अपने हुंकारमात्रसे उसे तुरंत भस्म कर दिया॥ २१-२२॥ | | दृष्ट्वा भस्मीकृतं दैत्यं सैनिका भयविह्वलाः।<br>चक्रुः पलायनं सद्यो हा तातेत्यब्रुवन्पथि॥ २३ | तब दैत्य धूम्रलोचनको भस्म हुआ देखकर सभी सैनिक भयाक्रान्त होकर ‘हा तात’—ऐसा कहते हुए तुरंत मार्ग पकड़कर भाग चले॥ २३॥ | | देवास्तं निहतं दृष्ट्वा दानवं धूम्रलोचनम्।<br>मुमुचुः पुष्पवृष्टिं ते मुदिता गगने स्थिताः॥ २४ | उस धूम्रलोचनको मारा गया देखकर आकाशमें विद्यमान देवगण प्रसन्न होकर भगवतीपर पुष्प बरसाने लगे॥ २४॥ | | रणभूमिस्तदा राजन् दारुणा समपद्यत।<br>निहतैर्दानवैरश्वैः खरैश्च वारणैस्तथा॥ २५<br><br>गृध्राः काका वटाः श्येना वरफा जम्बुकास्तथा।<br>ननृतुश्चक्रुशुः प्रेतान्पतितान् रणभूमिषु॥ २६ | हे राजन्! मरे हुए दानवों, घोड़ों, खच्चरों और हाथियोंसे [पट जानेके कारण] वह रणभूमि उस समय बड़ी भयानक लग रही थी। युद्धभूमिमें पड़े हुए मृत दानवोंको देखकर गीध, कौए, बाज, सियार और पिशाच नाचने तथा कोलाहल करने लगे॥ २५-२६॥ | | अम्बिका तद्रणस्थानं त्यक्त्वा दूरं स्थलान्तरे।<br>गत्वा चकार चाप्युग्रं शङ्खनादं भयप्रदम्॥ २७ | अब भगवती अम्बिकाने उस रणभूमिको छोड़कर वहाँसे कुछ दूरीपर जाकर अत्यन्त तीव्र तथा भयदायक शंखनाद किया॥ २७॥ | | तं श्रुत्वा दरशब्दं तु शुम्भः सद्मनि संस्थितः।<br>दृष्ट्वाथ दानवाम्भग्नानागतान् रुधिरोक्षितान्॥ २८<br><br>छिन्नपादकराक्षांश्च मञ्चकारोपितानपि।<br>भग्नपृष्ठकटिग्रीवान्क्रन्दमानाननेकंशः ॥ २९<br><br>वीक्ष्य शुम्भो निशुम्भश्च क्व गतो धूम्रलोचनः।<br>कथं भग्नाः समायाता नानीता किं वरानना॥ ३०<br><br>सैन्यं कुत्र गतं मन्दाः कथयन्तु यथोचितम्।<br>कस्यायं शङ्खनादोऽद्य श्रूयते भयवर्धनः॥ ३१ | अपने महलमें स्थित शुम्भको भी वह भयानक शंख-ध्वनि सुनायी पड़ी। उसी समय उसने भागकर आये हुए बहुत-से दैत्योंको देखा। उनमेंसे बहुतोंके अंग भंग हो गये थे और वे रक्तसे लथपथ थे। अनेक दैत्योंके हाथ-पैर कट गये थे और नेत्र भग्न हो गये थे। कुछ दैत्य तो शय्या आदिपर लादकर लाये जा रहे थे; बहुतोंकी पीठ, कमर और गर्दन टूट गयी थी। सब-के-सब जोर-जोरसे चीख रहे थे। उन्हें देखकर शुम्भ-निशुम्भने सैनिकोंसे पूछा—‘धूम्रलोचन कहाँ गया? तुमलोग इस तरह अंग-भंग होकर क्यों आये हो और उस सुन्दर मुखवाली स्त्रीको क्यों नहीं ले आये? हे मूर्खो! सही-सही बताओ कि मेरी सेना कहाँ गयी और भयको बढ़ानेवाला यह किसका शंखनाद इस समय सुनायी पड़ रहा है?’॥ २८—३१॥ |

६६६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २५
गणा ऊचुःगण बोले—
बलञ्च पतितं सर्वं निहतो धूम्रलोचनः।<br>कृतं कालिकया कर्म रणभूमावमानुषम्॥ ३२सम्पूर्ण सेना मार डाली गयी और धूम्रलोचनका भी संहार कर दिया गया। रणभूमिमें यह अमानुषिक कार्य कालिकाके द्वारा किया गया है॥ ३२॥
शङ्खनादोऽम्बिकायास्तु गगनं व्याप्य राजते।<br>हर्षदः सुरसङ्घानां दानवानाञ्च शोककृत्॥ ३३उसी अम्बिकाकी यह शंखध्वनि है, जो सम्पूर्ण नभमण्डलको व्याप्त करके सुशोभित हो रही है। यह ध्वनि देवगणोंके लिये हर्षप्रद और दानवोंके लिये कष्टदायक है॥ ३३॥
यदा निपातिताः सर्वे तेन केसरिणा विभो।<br>रथा भग्ना हयाश्चैव बाणपातैर्विनाशिताः॥ ३४<br><br>गगनस्थाः सुराश्चक्रुः पुष्पवृष्टिं मुदान्विताः।<br>दृष्ट्वा भग्नं बलं सर्वं पतितं धूम्रलोचनम्॥ ३५हे विभो! जब देवीके सिंहने सारे सैनिकोंका विनाश कर डाला और उनके बाण-प्रहारोंसे दैत्योंके रथ टूट गये तथा घोड़े मार डाले गये, तब आकाशमें स्थित देवता प्रसन्न होकर पुष्प-वृष्टि करने लगे॥ ३४ १/२॥
निश्चयस्तु कृतोऽस्माभिर्जयो नैव भवेदिति।<br>विचारं कुरु राजेन्द्र मन्त्रिभिर्मन्त्रवित्तमैः॥ ३६<br><br>विस्मयोऽयं महाराज यदेका जगदम्बिका।<br>भवद्भिः सह युद्धाय संस्थिता सैन्यवर्जिता॥ ३७<br><br>निर्भयैकाकिनी बाला सिंहारूढा मदोत्कटा।<br>चित्रमेतन्महाराज भासतेऽद्भुतमञ्जसा॥ ३८<br><br>सन्धिर्वा विग्रहो वाद्य स्थानं निर्याणमेव च।<br>मन्त्रयित्वा महाराज कुरु कार्यं यथारुचि॥ ३९इस प्रकार समस्त सेनाका विनाश तथा धूम्रलोचनका वध देखकर हमलोगोंने निश्चय कर लिया कि अब हमारी विजय नहीं हो सकती। अतएव हे राजेन्द्र! अब आप मन्त्रणाका उत्तम ज्ञान रखनेवाले अपने मन्त्रियोंसे इस विषयपर विचार कर लीजिये। हे महाराज! यह आश्चर्य है कि जगदम्बास्वरूपिणी वह मदमत्त बाला बिना किसी सेनाके ही सिंहपर सवार होकर निर्भयभावसे आपसे युद्ध करनेके लिये रणभूमिमें अकेली खड़ी है। हे महाराज! हमें तो यह सब बड़ा विचित्र और अद्भुत प्रतीत हो रहा है। अतएव अब आप शीघ्र मन्त्रणा करके सन्धि, युद्ध, उदासीन होकर स्थित रहना अथवा पलायन—इनमेंसे अपनी रुचिके अनुसार जो चाहें, वह कार्य करें॥ ३५-३९॥
तत्सन्निधौ बलं नास्ति तथापि शत्रुतापन।<br>पाष्णिग्राहाः सुराः सर्वे भविष्यन्ति किलापदि॥ ४०<br><br>समये तत्समीपस्थौ ज्ञातौ च हरिशङ्करौ।<br>लोकपालाः समीपेऽद्य वर्तन्ते गगने स्थिताः॥ ४१<br><br>रक्षोगणाश्च गन्धर्वाः किन्नरा मानुषास्तथा।<br>तत्सहायाश्च मन्तव्याः समये सुरतापन॥ ४२हे शत्रुतापन! यद्यपि उसके पास सेना नहीं है फिर भी उसकी विपत्तिमें सभी देवता उसके सहायक बनकर उपस्थित हो जायँगे। ज्ञात हुआ है कि भगवान् विष्णु और शिव भी समयानुसार उसके पासमें विद्यमान रहते हैं; सभी लोकपाल आकाशमें रहते हुए भी इस समय उस देवीके पास विद्यमान हैं। हे सुरतापन! राक्षसगण, गन्धर्व, किन्नर और मनुष्य—इन सबको समय आनेपर उसका सहायक समझना चाहिये॥ ४०-४२॥
अस्माकं मतिमानेन ज्ञायते सर्वथेदृशम्।<br>अम्बिकायाः सहायाशा तत्कार्याशा न काचन॥ ४३<br><br>एका नाशयितुं शक्ता जगत्सर्वं चराचरम्।<br>का कथा दानवानां तु सर्वेषामिति निश्चयः॥ ४४हमारी बुद्धिसे तो हर तरहसे ऐसा जान पड़ता है कि वे अम्बिका किसीसे भी कोई सहायता अथवा कार्यकी अपेक्षा नहीं रखतीं। वे अकेली ही सम्पूर्ण चराचर जगत्का नाश करनेमें समर्थ हैं, तो फिर सब दानवोंकी बात ही क्या—यह सत्य है॥ ४३-४४॥
अ० २५ ]पञ्चम स्कन्ध६६७
संस्कृतहिन्दी अनुवाद
इति ज्ञात्वा महाभाग यथारुचि तथा कुरु।<br>हितं सत्यं मितं वाक्यं वक्तव्यमनुयायिभिः॥ ४५हे महाभाग! यह सब भलीभाँति समझ-बूझकर आपकी जैसी रुचि हो, वैसा कीजिये। सेवकोंको तो अपने स्वामीसे हितकर, सत्य और नपी-तुली बात कहनी चाहिये॥ ४५॥
व्यास उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं तेषां शुम्भः परबलार्दनः।<br>कनीयांसं समानीय पप्रच्छ रहसि स्थितः॥ ४६<br><br>भ्रातः कालिकयाद्यैव निहतो धूम्रलोचनः।<br>बलञ्च शातितं सर्वं गणा भग्नाः समागताः॥ ४७<br><br>अम्बिका शङ्खनादं वै करोति मदगर्विता।व्यासजी बोले—उनकी बात सुनकर शत्रुसेनाको विनष्ट कर डालनेवाले शुम्भने अपने छोटे भाई निशुम्भको एकान्त स्थानमें ले जाकर वहाँ स्थित हो उससे पूछा—हे भाई! आज कालिकाने अकेले ही धूम्रलोचनको मार डाला, सारी सेना नष्ट कर दी और शेष सैनिक अंग-भंग होकर भाग आये हैं। अभिमानमें चूर रहनेवाली वही अम्बिका शंखनाद कर रही है॥ ४६-४७½॥
ज्ञानिनां चैव दुर्ज्ञेया गतिः कालस्य सर्वथा॥ ४८<br><br>तृणं वज्रायते नूनं वज्रं चैव तृणायते।<br>बलवान्बलहीनः स्याद्दैवस्य गतिरीदृशी॥ ४९कालकी गतिको पूर्णरूपसे समझना ज्ञानियोंके लिये भी अत्यन्त कठिन है। [कालकी प्रेरणासे] तृण वज्र बन जाता है, वज्र तृण बन जाता है और बलशाली प्राणी बलहीन हो जाता है; दैवकी ऐसी विचित्र गति है॥ ४८-४९॥
पृच्छामि त्वां महाभाग किं कर्तव्यमितः परम्।<br>अभोग्या चाम्बिका नूनं कारणादत्र चागता॥ ५०हे महाभाग! मैं तुमसे पूछता हूँ कि अब आगे मुझे क्या करना चाहिये? ऐसा लगता है कि यह अम्बिका किसी उद्देश्यसे यहाँ आयी हुई है। अतः निश्चय ही वह हमारे भोगके योग्य नहीं है॥ ५०॥
युक्तं पलायनं वीर युद्धं वा वद सत्वरम्।<br>लघुं ज्येष्ठं विजानामि त्वामहं कार्यसङ्कटे॥ ५१हे वीर! तुम मुझे शीघ्र बताओ कि इस समय भाग जाना उचित है या युद्ध करना? यद्यपि तुम छोटे हो, फिर भी इस संकटके समय मैं तुम्हें बड़ा मान रहा हूँ॥ ५१॥
निशुम्भ उवाच<br>न वा पलायनं युक्तं न दुर्गग्रहणं तथा।<br>युद्धमेव परं श्रेयः सर्वथैवानयानघ॥ ५२निशुम्भ बोला—हे अनघ! इस समय न तो भागना उचित है और न तो किलेमें छिपना ही ठीक है। अब तो इस स्त्रीके साथ हर प्रकारसे युद्ध करना ही श्रेयस्कर है॥ ५२॥
ससैन्योऽहं गमिष्यामि रणे तु प्रवराश्रितः।<br>हत्वा तामागमिष्यामि तरसा त्वबलामिमाम्॥ ५३<br><br>अथवा बलवद्दैवादन्यथा चेद्भविष्यति।<br>मृते मयि त्वया कार्यं विमृश्य च पुनः पुनः॥ ५४श्रेष्ठ सेनापतियोंको लेकर मैं अपनी सेनाके साथ युद्धभूमिमें जाऊँगा और उस कालिकाको मारकर तथा अबला अम्बिकाको पकड़कर शीघ्र यहाँ ले आऊँगा और यदि बलवान् दैवके कारण इसके विपरीत हो जाय तो मेरे मर जानेपर बार-बार सोच-विचारकर ही आप कोई कार्य कीजियेगा॥ ५३-५४॥

६६८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २६

६६८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २६

इति तस्य वचः श्रुत्वा शुम्भः प्रोवाच चानुजम्।<br>तिष्ठ त्वं चण्डमुण्डौ द्वौ गच्छेतां बलसंयुतौ ॥ ५५<br><br>शशकग्रहणायत्र न युक्तं गजमोचनम्।<br>चण्डमुण्डौ महावीरो तां हन्तुं सर्वथा क्षमौ ॥ ५६छोटे भाई निशुम्भकी यह बात सुनकर शुम्भने उससे कहा—अभी तुम ठहरो, पहले पराक्रमी चण्ड-मुण्ड जायँ। खरगोश पकड़नेके लिये हाथी छोड़ना उचित नहीं है। चण्ड-मुण्ड बड़े वीर हैं, अतः ये दोनों उसे मार डालनेमें हर तरहसे समर्थ हैं॥ ५५-५६॥
इत्युक्त्वा भ्रातरं शुम्भः सम्भाष्य च महाबलौ।<br>उवाच वचनं राजा चण्डमुण्डौ पुरःस्थितौ ॥ ५७<br><br>गच्छतं चण्डमुण्डौ द्वौ स्वसैन्यपरिवारितौ।<br>हन्तुं तामबलां शीघ्रं निर्लज्जां मदगर्विताम् ॥ ५८<br><br>गृहीत्वाथ निहत्याजौ कालिकां पिङ्गलोचनाम्।<br>आगम्यतां महाभागौ कृत्वा कार्यं महत्तरम् ॥ ५९<br><br>सा नायाति गृहीतापि गर्विता चाम्बिका यदि।<br>तदा बाणैर्महातीक्ष्णैर्हन्तव्याहवमण्डिता ॥ ६०अपने भाई निशुम्भसे ऐसा कहकर और उससे परामर्श करके राजा शुम्भने समक्ष बैठे हुए महान् बलशाली चण्ड-मुण्डसे कहा—हे चण्ड-मुण्ड! तुम दोनों अपनी सेना लेकर उस निर्लज्ज और मदोन्मत्त अबलाका वध करनेके लिये शीघ्र जाओ। हे महाभागो! रणभूमिमें पिंग-नेत्रोंवाली उस कालिकाको मारकर और अम्बिकाको पकड़कर—यह महान् कार्य करके यहाँ लौट आओ। यदि वह मदोन्मत्त अम्बिका पकड़ी जानेपर भी नहीं आती तो अपने अत्यन्त तीक्ष्ण बाणोंसे उस रणभूषिताका भी वध कर देना॥ ५७—६०॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे देव्या सह युद्धाय चण्डमुण्डप्रेषणं नाम पञ्चविंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥


अथ षड्विंशोऽध्यायः

भगवती अम्बिकासे चण्ड-मुण्डका संवाद और युद्ध, देवी कालिकाद्वारा चण्ड-मुण्डका वध

व्यास उवाचव्यासजी बोले—
इत्याज्ञप्तौ तदा वीरौ चण्डमुण्डौ महाबलौ।<br>जग्मतुस्तरसैवाजौ सैन्येन महतान्वितौ ॥ १[हे महाराज!] तदनन्तर शुम्भसे ऐसा आदेश पाकर महाबली चण्ड-मुण्ड विशाल सेनाके साथ बड़े वेगसे रणभूमिकी ओर चल पड़े॥ १ ॥
दृष्ट्वा तत्र स्थितां देवीं देवानां हितकारिणीम्।<br>ऊचतुस्तौ महावीर्यौ तदा सामान्वितं वचः ॥ २तब देवताओंका हित करनेवाली देवीको वहाँ युद्धभूमिमें विद्यमान देखकर वे दोनों महापराक्रमी दानव उनसे सामनीतियुक्त वचन बोले— ॥ २ ॥
बाले त्वं किं न जानासि शुम्भं सुरबलार्दनम्।<br>निशुम्भञ्च महावीर्यं तुराषाड्विजयोद्धतम् ॥ ३हे बाले! क्या तुम देवताओंकी सेनाका नाश करनेवाले शुम्भ तथा इन्द्रपर विजय प्राप्त करनेके कारण उद्धत स्वभाववाले महापराक्रमी निशुम्भको नहीं जानती हो? ॥ ३ ॥
त्वमेकासि वरारोहे कालिकासिंहसंयुता।<br>जेतुमिच्छसि दुर्बुद्धे शुम्भं सर्वबलान्वितम् ॥ ४हे सुन्दरि! तुम यहाँ अकेली हो। हे दुर्बुद्धे! तुम मात्र कालिका और सिंहको साथ लेकर सभी प्रकारकी सेनाओंसे सम्पन्न शुम्भको जीतना चाहती हो! ॥ ४ ॥

| अ० २६ ] | पञ्चम स्कन्ध | ६६९ | | :--- | :--- | | मतिदः कोऽपि ते नास्ति नारी वापि नरोऽपि वा।<br>देवास्त्वां प्रेरयन्त्येव विनाशाय तवैव ते॥ ५ | क्या कोई स्त्री या पुरुष तुम्हें सत्परामर्श देनेवाला नहीं है ? देवतालोग तो तुम्हारे विनाशके लिये ही तुम्हें प्रेरित कर रहे हैं॥ ५॥ | | विमृश्य कुरु तन्वङ्गि कार्यं स्वपरयोर्बलम्।<br>अष्टादशभुजत्वात्त्वं गर्वञ्च कुरुषे मृषा॥ ६ | हे सुकुमार अंगोंवाली ! तुम अपने तथा शत्रुके बलके विषयमें सम्यक् विचार करके ही कार्य करो। अठारह भुजाओंके कारण तुम अपनेपर व्यर्थ ही अभिमान करती हो ॥ ६ ॥ | | किं भुजैर्बहुभिर्व्यर्थैरायुधैः किं श्रमप्रदैः।<br>शुम्भस्याग्रे सुराणां वै जेतुः समरशालिनः॥ ७<br><br>ऐरावतकरच्छेत्तुर्दन्तिदारणकारिणः ।<br>जयिनः सुरसङ्घानां कार्यं कुरु मनोगतम्॥ ८ | देवताओंको जीतनेवाले तथा समरभूमिमें पराक्रम दिखानेवाले शुम्भके समक्ष तुम्हारी इन बहुत-सी व्यर्थ भुजाओं तथा श्रम प्रदान करनेवाले आयुधोंसे क्या लाभ ? अतः तुम ऐरावतकी सूँड़ काट डालनेवाले, हाथियोंको विदीर्ण करनेवाले और देवताओंको जीत लेनेवाले शुम्भका मनोवांछित कार्य करो ॥ ७-८ ॥ | | वृथा गर्वायसे कान्ते कुरु मे वचनं प्रियम्।<br>हितं तव विशालाक्षि सुखदं दुःखनाशनम्॥ ९ | हे कान्ते ! तुम वृथा गर्व करती हो। हे विशालाक्षि ! तुम मेरी प्रिय बात मान लो, जो तुम्हारे लिये हितकर, सुखद तथा दुःखोंका नाश करनेवाली है ॥ ९ ॥ | | दुःखदानि च कार्याणि त्याज्यानि दूरतो बुधैः।<br>सुखदानि च सेव्यानि शास्त्रतत्त्वविशारदैः॥ १० | शास्त्रोंका तत्त्व जाननेवाले विद्वान् तथा बुद्धिमान् पुरुषोंको चाहिये कि दुःख देनेवाले कार्योंका दूरसे ही त्याग कर दें और सुख प्रदान करनेवाले कार्योंका सेवन करें ॥ १० ॥ | | चतुरासि पिकालापे पश्य शुम्भबलं महत्।<br>प्रत्यक्षं सुरसङ्घानां मर्दनेन महोदयम्॥ ११<br><br>प्रत्यक्षञ्च परित्यज्य वृथैवानुमितिः किल।<br>सन्देहसहिते कार्ये न विपश्चित्प्रवर्तते॥ १२ | हे कोयलके समान मधुर बोलनेवाली ! तुम तो बड़ी चतुर हो। तुम देवताओंके मर्दनसे अभ्युदयको प्राप्त तथा महान् शुम्भबलको प्रत्यक्ष देख लो। प्रत्यक्ष प्रमाणका त्याग करके अनुमानका आश्रय लेना बिलकुल व्यर्थ है। किसी सन्देहात्मक कार्यमें विद्वान् पुरुष प्रवृत्त नहीं होते ॥ ११-१२ ॥ | | शत्रुः सुराणां परमः शुम्भः समरदुर्जयः।<br>तस्मात्त्वां प्रेरयन्त्यत्र देवा दैत्येशपीडिताः॥ १३ | शुम्भ देवताओंके महान् शत्रु हैं। वे संग्राममें अजेय हैं। इसीलिये दैत्येन्द्र शुम्भके द्वारा प्रताड़ित किये गये देवता तुम्हें युद्धके लिये प्रेरित कर रहे हैं॥ १३॥ | | तस्मात्तद्वचनैः स्निग्धैर्वञ्चितासि शुचिस्मिते।<br>दुःखाय तव देवानां शिक्षा स्वार्थस्य साधिका॥ १४ | हे सुन्दर मुसकानवाली ! तुम देवताओंके मधुर वचनोंसे ठग ली गयी हो। तुम्हारे प्रति देवताओंकी यह शिक्षा उनका कार्य सिद्ध करनेवाली तथा तुम्हें दुःख प्रदान करनेवाली है॥ १४॥ |

| ६७० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २६ | | :--- | :--- |

श्लोकअर्थ
कार्यमित्रं परिक्षिप्य धर्ममित्रं समाश्रयेत्।<br>देवाः स्वार्थपराः कामं त्वामहं सत्यमब्रवम्॥ १५<br><br>भज शुम्भं सुरेशानं जेतारं भुवनेश्वरम्।<br>चतुरं सुन्दरं शूरं कामशास्त्रविशारदम्॥ १६<br><br>ऐश्वर्यं सर्वलोकानां प्राप्स्यसे शुम्भशासनात्।<br>निश्चयं परमं कृत्वा भर्तारं भज शोभनम्॥ १७अपना ही कार्य साधनेमें तत्पर रहनेवाले मित्रका त्यागकर धर्ममार्गपर चलनेवाले मित्रका ही अवलम्बन करना चाहिये। देवता बड़े ही स्वार्थी हैं, मैंने तुमसे यह सत्य कहा है, अतः तुम देवताओंके शासक, विजेता, तीनों लोकोंके स्वामी, चतुर, सुन्दर, वीर और कामशास्त्रमें प्रवीण शुम्भको स्वीकार कर लो। शुम्भके अधीन रहनेसे तुम समस्त लोकोंका वैभव प्राप्त करोगी। अतएव दृढ़ निश्चय करके तुम सौन्दर्यसम्पन्न शुम्भको अपना पति बना लो॥ १५-१७॥
व्यास उवाच<br>इति तस्य वचः श्रुत्वा चण्डस्य जगदम्बिका।<br>मेघगम्भीरनिनदं जगर्ज पुनरब्रवीत्॥ १८<br><br>गच्छ जाल्म मृषा किं त्वं भाषसे वञ्चकं वचः।<br>त्यक्त्वा हरिहरादींश्च शुम्भं कस्माद्भजे पतिम्॥ १९व्यासजी बोले— चण्डकी यह बात सुनकर जगदम्बाने मेघके समान गम्भीर ध्वनिमें गर्जना की और वे बोलीं— धूर्त! भाग जाओ; तुम यह छलयुक्त बात व्यर्थ क्यों बोल रहे हो? विष्णु, शिव आदिको छोड़कर मैं शुम्भको अपना पति किसलिये बनाऊँ?॥ १८-१९॥
न मे कश्चित्पतिः कार्यों न कार्यं पतिना सह।<br>स्वामिनी सर्वभूतानामहमेव निशामय॥ २०न तो मुझे किसीको पति बनाना है और न तो पतिसे मेरा कोई काम ही है; क्योंकि जगत्के सभी प्राणियोंकी स्वामिनी मैं ही हूँ; इसे तुम सुन लो॥ २०॥
शुम्भा मे बहवो दृष्टा निशुम्भाश्च सहस्रशः।<br>घातिताश्च मया पूर्वं शतशो दैत्यदानवाः॥ २१मैंने हजारों-हजार शुम्भ तथा निशुम्भ देखे हैं और पूर्वकालमें मैंने सैकड़ों दैत्यों तथा दानवोंका वध किया है॥ २१॥
ममाग्रे देववृन्दानि विनष्टानि युगे युगे।<br>नाशं यास्यन्ति दैत्यानां यूथानि पुनरद्य वै॥ २२<br><br>काल एवागतोऽस्त्यत्र दैत्यसंहारकारकः।<br>वृथा त्वं कुरुषे यत्नं रक्षणायात्मसन्ततेः॥ २३प्रत्येक युगमें अनेक देवसमुदाय मेरे सामने ही नष्ट हो चुके हैं। दैत्योंके समूह अब फिर विनाशको प्राप्त होंगे। दैत्योंका विनाशकारी समय अब आ ही गया है। अतएव तुम अपनी सन्ततिकी रक्षाके लिये व्यर्थ प्रयत्न कर रहे हो॥ २२-२३॥
कुरु युद्धं वीरधर्मरक्षायै त्वं महामते।<br>मरणं भावि दुस्त्याज्यं यशो रक्ष्यं महात्मभिः॥ २४हे महामते! तुम वीरधर्मकी रक्षाके लिये मेरे साथ युद्ध करो। मृत्यु तो अवश्यम्भावी है, इसे टाला नहीं जा सकता। अतः महात्मा लोगोंको यशकी रक्षा करनी चाहिये॥ २४॥
किं ते कार्यं निशुम्भेन शुम्भेन च दुरात्मना।<br>वीरधर्मं परं प्राप्य गच्छ स्वर्गं सुरालयम्॥ २५दुराचारी शुम्भ तथा निशुम्भसे तुम्हारा क्या प्रयोजन सिद्ध हो सकता है? अतः अब तुम श्रेष्ठ वीरधर्मका आश्रय लेकर देवलोक स्वर्ग चले जाओ॥ २५॥
शुम्भो निशुम्भश्चैवान्ये ये चात्र तव बान्धवाः।<br>सर्वे तवानुगाः पश्चादागमिष्यन्ति साम्प्रतम्॥ २६अब शुम्भ, निशुम्भ तथा तुम्हारे जो अन्य बन्धु-बान्धव हैं, वे सब भी बादमें तुम्हारा अनुसरण करते हुए वहाँ पहुँचेंगे॥ २६॥
अ० २६ ]पञ्चम स्कन्ध६७१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
क्रमशः सर्वदैत्यानां करिष्याम्यद्य संक्षयम्।<br>विषादं त्यज मन्दात्मन् कुरु युद्धं विशांपते॥ २७हे मन्दात्मन्! मैं अब क्रमशः सभी दैत्योंका संहार कर डालूँगी। हे विशांपते! अब विषाद त्यागो और मेरे साथ युद्ध करो॥ २७॥
त्वामहं निहनिष्यामि भ्रातरं तव साम्प्रतम्।<br>ततः शुम्भं निशुम्भं च रक्तबीजं मदोत्कटम्॥ २८<br><br>अन्यांश्च दानवान्सर्वान्‌हत्त्वाहं समराङ्गणे।<br>गमिष्यामि यथास्थानं तिष्ठ वा गच्छ वा द्रुतम्॥ २९मैं इसी समय तुम्हारा तथा तुम्हारे भाईका वध कर दूँगी। तत्पश्चात् शुम्भ, निशुम्भ, मदोन्मत्त रक्तबीज तथा अन्य दानवोंको रणभूमिमें मारकर मैं अपने धामको चली जाऊँगी। अब तुम यहाँ ठहरो अथवा शीघ्र भाग जाओ॥ २८-२९॥
गृहाणास्त्रं वृथापुष्ट कुरु युद्धं मयाधुना।<br>किं जल्पसि मृषा वाक्यं सर्वथा कातरप्रियम्॥ ३०व्यर्थ ही स्थूल शरीर धारण करनेवाले हे दैत्य! तुरंत शस्त्र उठा लो और मेरे साथ अभी युद्ध करो। कायरोंको सदा प्रिय लगनेवाली व्यर्थ बातें क्यों बोल रहे हो?॥ ३०॥
व्यास उवाच<br>तयेत्थं प्रेरितौ दैत्यौ चण्डमुण्डौ क्रुधान्वितौ।<br>ज्याशब्दं तरसा घोरं चक्रतुर्बलदर्पितौ॥ ३१व्यासजी बोले— देवीके इस प्रकार उत्तेजित करनेपर दैत्य चण्ड-मुण्ड क्रोधसे भर उठे और अपने बलके अभिमानमें चूर उन दोनोंने वेगपूर्वक अपने धनुषकी प्रत्यंचाकी भीषण टंकार की॥ ३१॥
सापि शङ्खस्वनं चक्रे पूरयन्ती दिशो दश।<br>सिंहोऽपि कुपितस्तावन्नादं समकरोद् बली॥ ३२<br><br>तेन नादेन शक्राद्या जहर्षुरमरास्तदा।<br>मुनयो यक्षगन्धर्वाः सिद्धाः साध्याश्च किन्नराः॥ ३३उसी समय दसों दिशाओंको गुंजित करती हुई भगवतीने भी शंखनाद किया और बलवान् सिंहने भी कुपित होकर गर्जन किया। उस गर्जनसे इन्द्र आदि देवता, मुनि, यक्ष, गन्धर्व, सिद्ध, साध्य और किन्नर बहुत हर्षित हुए॥ ३२-३३॥
युद्धं परस्परं तत्र जातं कातरभीतिदम्।<br>चण्डिकाचण्डयोस्तीव्रं बाणखड्गगदादिभिः॥ ३४तदनन्तर चण्डिका और चण्डमें परस्पर बाण, तलवार, गदा आदिके द्वारा भीषण संग्राम होने लगा; जो कायरोंके लिये भयदायक था॥ ३४॥
चण्डमुक्ताञ्छरान्देवी चिच्छेद निशितैः शरैः।<br>मुमोच पुनरुग्रान्सा बाणांश्च पन्नगानिव॥ ३५चण्डिकाने दैत्य चण्डके द्वारा छोड़े गये बाणोंको अपने तीक्ष्ण बाणोंसे काट दिया और फिर वे चण्डपर अपने सर्पसदृश भयंकर बाण छोड़ने लगीं॥ ३५॥
गगनं छादितं तत्र संग्रामे विशिखैस्तदा।<br>शलभैरिव मेघान्ते कर्षकाणां भयप्रदैः॥ ३६उस समय संग्राममें आकाशमण्डल बाणोंसे उसी प्रकार आच्छादित हो गया, जैसे वर्षारितुके अन्तमें किसानोंको भय प्रदान करनेवाली टिड्डियोंसे आकाश छा जाता है॥ ३६॥
मुण्डोऽपि सैनिकैः सार्धं पपात तरसा रणे।<br>मुमोच बाणवृष्टिं वै क्रुद्धः परमदारुणः॥ ३७उसी समय अतीव भयंकर मुण्ड भी सैनिकोंके साथ बड़ी तेजीसे रणभूमिमें आ पहुँचा और क्रोधित होकर बाणोंकी वर्षा करने लगा॥ ३७॥
बाणजालं महत् दृष्ट्वा क्रुद्धा तत्राम्बिका भृशम्।<br>कोपेन वदनं तस्या बभूव घनसन्निभम्॥ ३८<br>कदलीपुष्पनेत्राञ्च भृकुटीकुटिलं तदा।तब [मुण्डके द्वारा प्रक्षिप्त] महान् बाण-समूहको देखकर अम्बिका बहुत कुपित हुईं। क्रोधके कारण उनका मुख मेघके समान काला, आँखें केलेके पुष्पके समान लाल और भौंहें टेढ़ी हो गयीं॥ ३८ ½॥

| ६७२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २६ | | :--- | :--- |

निष्क्रान्ता च तदा काली ललाटफलकाद् द्रुतम्॥ ३९<br><br>व्याघ्रचर्माम्बरा क्रूरा गजचर्मोत्तरीयाका।<br>मुण्डमालाधरा घोरा शुष्कवापीसमोदरा॥ ४०<br><br>खड्गपाशधरातीव भीषणा भयदायिनी।<br>खट्वाङ्गधारिणी रौद्रा कालरात्रिरिवापरा॥ ४१उसी समय देवीके ललाटपटलसे सहसा भगवती काली प्रकट हुईं। अत्यन्त क्रूर वे काली व्याघ्रचर्म पहने थीं और गजचर्मके उत्तरीय वस्त्रोंसे सुशोभित थीं। उन भयानक कालीने गलेमें मुण्डमाला धारण कर रखी थी और उनका उदर सूखी बावलीके समान प्रतीत हो रहा था। अत्यन्त भीषण तथा भय प्रदान करनेवाली वे भगवती काली हाथमें खड्ग, पाश तथा खट्वांग धारण किये हुई थीं। रौद्र रूपवाली वे काली साक्षात् दूसरी कालरात्रिके समान प्रतीत हो रही थीं॥ ३९–४१॥
विस्तीर्णवदना जिह्वां चालयन्ती मुहुर्मुहुः।<br>विस्तारजघना वेगाज्जघानासुरसैनिकान्॥ ४२विशाल मुख तथा विस्तृत जघनप्रदेशवाली वे भगवती काली बार-बार जिह्वा लपलपाती हुई बड़े वेगसे असुर-सैनिकोंका संहार करने लगीं॥ ४२॥
करे कृत्वा महावीरांस्तरसा सा रुषान्विता।<br>मुखे चिक्षेप दैत्यान्यपेष दशनैः शनैः॥ ४३वे कुपित होकर बड़े-बड़े दैत्यवीरोंको हाथमें पकड़कर अपने मुखमें डाल लेती थीं और धीरे-धीरे उन्हें दाँतोंसे पीस डालती थीं॥ ४३॥
गजान्घण्टान्वितान्हस्ते गृहीत्वा निदधौ मुखे।<br>सारोहान्भक्षयित्वाजौ साट्टहासं चकार ह॥ ४४घंटा तथा आरोहियोंसमेत हाथियोंको अपने हाथमें पकड़कर वे देवी उन्हें मुखमें डाल लेती थीं और उन्हें चबा-चबाकर अट्टहास करने लगती थीं।
तथैव तुरगानुष्ट्रांस्तथा सारथिभिः सह।<br>निक्षिप्य वक्त्रे दशनैश्चर्वयत्यतिभैरवम्॥ ४५उसी प्रकार वे घोड़ों, ऊँटों और सारथियोंसहित रथोंको अपने मुखमें डालकर दाँतोंसे अत्यन्त भयानक रूपसे चबाने लगती थीं॥ ४४–४५॥
हन्यमानं बलं प्रेक्ष्य चण्डमुण्डौ महासुरौ।<br>छादयामासतुर्देवीं बाणासारैरनन्तरैः॥ ४६अपनी सेनाको मारे जाते देखकर महान् असुर चण्ड-मुण्डने निरन्तर बाण-वृष्टिके द्वारा भगवतीको आच्छादित कर दिया॥ ४६॥
चण्डश्चण्डकरच्छायं चक्रं चक्रधरायुधम्।<br>चिक्षेप तरसा देवीं ननाद च मुहुर्मुहुः॥ ४७चण्डने सूर्यके समान तेजस्वी तथा भगवान् विष्णुके सुदर्शनचक्रके तुल्य प्रभाववाला चक्र बड़े वेगसे देवीपर चला दिया और वह बार-बार गरजने लगा॥ ४७॥
नदन्तं वीक्ष्य तं काली रथाङ्गञ्च रविप्रभम्।<br>बाणेनैकेन चिच्छेद सुप्रभं तत्सुदर्शनम्॥ ४८उसे गर्जन करते देखकर कालीने अपने एक ही बाणसे उसके सूर्य-तुल्य तेजस्वी तथा सुदर्शनचक्र-सदृश प्रभाववाले चक्रको काट डाला॥ ४८॥
तं जघान शरैस्तीक्ष्णैश्चण्डं चण्डी शिलाशितैः।<br>मूर्च्छितोऽसौ पपातोर्व्यां देवीबाणार्दितो भृशम्॥ ४९तत्पश्चात् भगवती चण्डिकाने पत्थरकी सानपर चढ़ाये हुए अपने तीक्ष्ण बाणोंसे उस चण्डपर प्रहार किया। देवीके बाणोंसे अत्यधिक घायल होकर वह मूर्च्छित हो गया और पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ ४९॥

अ० २६ ] पञ्चम स्कन्ध [ ६७३

अ० २६ ] पञ्चम स्कन्ध [ ६७३

संस्कृत श्लोकहिन्दी टीका
पतितं भ्रातरं वीक्ष्य मुण्डो दुःखार्दितस्तदा।<br>चकार शरवृष्टिश्च कालिकोपरि कोपतः॥ ५०उस समय अपने भाईको पृथ्वीपर गिरा हुआ देखकर मुण्ड दुःखसे व्याकुल हो उठा और कुपित होकर कालिकाके ऊपर बाणोंकी वर्षा करने लगा॥ ५०॥
चण्डिका मुण्डनिर्मुक्तां शरवृष्टिं सुदारुणाम्।<br>ईषिकास्त्रैर्बलान्मुक्तैश्चकार तिलशः क्षणात्॥ ५१भगवती चण्डिकाने मुण्डके द्वारा की गयी अत्यन्त भीषण बाणवर्षाको अपने द्वारा छोड़े गये ईषिकास्त्रोंसे बलपूर्वक तिल-तिल करके क्षणभरमें ही नष्ट कर डाला॥ ५१॥
अर्धचन्द्रेण बाणेन ताडयामास तं पुनः।<br>पतितोऽसौ महावीर्यो मेदिन्यां मदवर्जितः॥ ५२तत्पश्चात् चण्डिकाने एक अर्धचन्द्राकार बाणसे मुण्डपर पुनः प्रहार किया, जिससे वह महाशक्तिशाली दैत्य मदहीन होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ ५२॥
हाहाकारो महानासीद्दानवानां बले तदा।<br>जहर्षुरमराः सर्वे गगनस्था गतव्यथाः॥ ५३[यह देखकर] उस समय दानवोंकी सेनामें महान् हाहाकार मच गया। आकाशमें विद्यमान सभी देवताओंकी व्यथा दूर हो गयी और वे हर्षसे भर उठे॥ ५३॥
विहाय मूर्च्छां चण्डस्तु संगृह्य महतीं गदाम्।<br>तरसा ताडयामास कालिकां दक्षिणे भुजे॥ ५४इसके बाद कुछ देरमें मूर्च्छा दूर होनेपर चण्डने एक विशाल गदा लेकर बड़े वेगसे कालिकाकी दाहिनी भुजापर प्रहार किया॥ ५४॥
वञ्चयित्वा गदाघातं तं बबन्ध महासुरम्।<br>तरसा बाणपाशेन मन्त्रमुक्तेन कालिका॥ ५५भगवती कालिकाने उसके गदाप्रहारको रोककर अभिमन्त्रित करके छोड़े गये बाण-पाशसे उस महान् असुरको शीघ्र ही बाँध लिया॥ ५५॥
उत्थितस्तु तदा मुण्डो बद्धं दृष्ट्वानुजं बलात्।<br>आजगाम सुसन्नद्धः शक्तिं कृत्वा करे दृढाम्॥ ५६उधर जब मुण्ड चेतनामें आया तब अपने अनुजको पाशास्त्रमें बलपूर्वक बँधा देखकर कवच पहने हुए वह अपने हाथमें एक सुदृढ़ शक्ति लेकर आ गया॥ ५६॥
आगच्छन्तं तदा काली दानवं वीक्ष्य सत्वरम्।<br>बबन्ध तरसा तं तु द्वितीयं भ्रातरं भृशम्॥ ५७तब भगवती कालीने उस दूसरे भाई दानव मुण्डको बड़े वेगसे अपनी ओर आता हुआ देखकर उसे भी बड़ी मजबूतीसे बाँध लिया॥ ५७॥
गृहीत्वा तौ महावीर्यौ चण्डमुण्डौ शशाविव।<br>कुर्वती विपुलं हासमाजगामाम्बिकां प्रति॥ ५८<br><br>आगत्य तामथोवाच गृहाणेमौ पशू प्रिये।<br>रणयज्ञार्थमानीतौ दानवौ रणदुर्जयौ॥ ५९इस प्रकार महाबली चण्ड-मुण्डको खरगोशकी तरह पकड़कर जोर-जोरसे हँसती हुई वे कालिका अम्बिकाके पास जा पहुँची। उनके पास आकर कालिका कहने लगीं—हे प्रिये! मैं रणयज्ञमें पशुबलिके लिये इन रणदुर्जय दानवोंको यहाँ ले आयी हूँ, आप इन्हें स्वीकार करें॥ ५८-५९॥
तावानीतौ तदा वीक्ष्य चण्डिका तौ वृकाविव।<br>अम्बिका कालिकां प्राह माधुरीसंयुतं वचः॥ ६०<br><br>वधं मा कुरु मा मुञ्च चतुरासि रणप्रिये।<br>देवानां कार्यसंसिद्धिः कर्तव्या तरसा त्वया॥ ६१तब उन लाये गये दोनों दानवोंको भेड़ियेकी तरह दीन-हीन देखकर भगवती अम्बिकाने कालिकासे मधुरताभरी वाणीमें कहा—हे रणप्रिये! न इनका वध करो और न छोड़ो ही। तुम चतुर हो अतः किसी उपायसे अब तुम्हें शीघ्र ही देवताओंका कार्य सिद्ध करना चाहिये॥ ६०-६१॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—22 A

६७४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २७

| व्यास उवाच | व्यासजी बोले—अम्बिकाकी यह बात सुनकर कालिकाने उनसे पुनः कहा—जिस प्रकार यज्ञभूमिमें यूप स्थापित किये जाते हैं, उसी प्रकार विख्यात युद्धयज्ञमें बलिदान-स्तम्भके रूपमें प्रतिष्ठित खड्गके द्वारा मैं आलम्भनपूर्वक इस तरह इनका वध करूँगी, जिससे हिंसा नहीं होगी॥ ६२ ½ ॥ | | इति तस्या वचः श्रुत्वा कालिका प्राह तां पुनः।<br>युद्धयज्ञेऽतिविख्याते खड्गयूपे प्रतिष्ठिते॥ ६२ | | | आलम्भञ्च करिष्यामि यथा हिंसा न जायते।<br>इत्युक्त्वा सा तदा देवी खड्गेन शिरसी तयोः॥ ६३ | ऐसा कहकर देवी कालिकाने तुरंत तलवारसे उन दोनोंका सिर काट लिया और वे आनन्दपूर्वक रुधिरपान करने लगीं॥ ६३ ½ ॥ | | चकर्त तरसा काली पपौ च रुधिरं मुदा।<br>एवं दैत्यौ हतौ दृष्ट्वा मुदितोवाच चाम्बिका॥ ६४ | इस प्रकार उन दोनों दैत्योंको मारा गया देखकर अम्बिकाने प्रसन्न होकर कहा—तुमने आज देवताओंका महान् कार्य किया है इसीलिये मैं तुम्हें एक शुभ वरदान दे रही हूँ। हे कालिके! चूँकि तुमने चण्ड-मुण्डका वध किया है, इसलिये अब तुम इस पृथ्वीलोकमें 'चामुण्डा'—इस नामसे अत्यधिक विख्यात होओगी॥ ६४-६५॥ | | कृतं कार्यं सुराणां ते ददाम्यद्य वरं शुभम्।<br>चण्डमुण्डौ हतौ यस्मात्तस्मात्ते नाम कालिके।<br>चामुण्डेति सुविख्यातं भविष्यति धरातले॥ ६५ | |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे चण्डमुण्डवधेन देव्याश्चामुण्डेतिनामवर्णनं नाम षड्विंशोऽध्यायः॥ २६॥


अथ सप्तविंशोऽध्यायः

शुम्भका रक्तबीजको भगवती अम्बिकाके पास भेजना और उसका देवीसे वार्तालाप

| व्यास उवाच | व्यासजी बोले—[हे राजन्!] उन दोनों दैत्योंको मारा गया देखकर मरनेसे बचे सभी सैनिक भागकर राजा शुम्भके पास गये। कुछ सैनिकोंके अंग बाणोंसे छिद गये थे, कुछके हाथ कट गये थे, उनके पूरे शरीरसे रक्त बह रहा था; वे सब रोते हुए नगरमें पहुँचे॥ १-२॥ | | हतौ तौ दानवौ दृष्ट्वा हतशेषाश्च सैनिकाः।<br>पलायनं ततः कृत्वा जग्मुः सर्वे नृपं प्रति॥ १<br><br>भिन्नाङ्गा विशिखैः केचित्केचिच्छिन्नकरास्तथा।<br>रुधिरस्रावदेहाश्च रुदन्तोऽभिययुः पुरे॥ २ | | | गत्वा दैत्यपतिं सर्वे चक्रुर्बुम्बारवं मुहुः।<br>रक्ष रक्ष महाराज भक्षयत्यद्य कालिका॥ ३<br><br>तया हतौ महावीरो चण्डमुण्डौ सुरार्दनौ।<br>भक्षिताः सैनिकाः सर्वे वयं भग्ना भयातुराः॥ ४ | दैत्यराज शुम्भके पास जाकर वे सब बार-बार चीख-पुकार करने लगे—हे महाराज! हमें बचा लीजिये, बचा लीजिये; नहीं तो आज हमें कालिका खा जायगी। उसने देवताओंका मर्दन करनेवाले महावीर चण्ड-मुण्डको मार डाला और वह बहुत-से सैनिकोंको खा गयी। अंग-भंग हुए हमलोग इस समय भयसे व्याकुल हैं॥ ३-४॥ | | भीतिदञ्च रणस्थानं कृतं कालिकया प्रभो।<br>पातितैर्गजवीराश्वैर्दासेरकपदातिभिः॥ ५ | हे प्रभो! मरे पड़े हाथियों, घोड़ों, ऊँटों तथा पैदल सैनिकोंसे उस कालिकाने युद्धभूमिको अत्यन्त डरावना बना दिया है॥ ५॥ |

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—22 B

अ० २७]पञ्चम स्कन्ध६७५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
शोणितौघवहा कुल्या कृता मांसातिकर्दमा।<br>केशशैवलिनी भग्नरथचक्रविराजिता॥ ६<br>छिन्नबाह्वादिमत्स्याढ्या शीर्षतुम्बीफलान्विता।<br>भयदा कातराणां वै सुराणां मोदवर्धिनी॥ ७उसने समरभूमिमें रक्तकी नदी बना डाली है, जिसमें मांस कीचड़की भाँति, मस्तकके केश सेवारके सदृश और टूटे हुए रथोंके पहिये भँवरके समान, सैनिकोंके कटे हाथ आदि मछलीके समान और सिर तुम्बीके फलके तुल्य प्रतीत हो रहे हैं। वह [रुधिर-नदी] कायरोंको भयभीत करनेवाली तथा देवताओंके हर्षको बढ़ानेवाली है॥ ६-७॥
कुलं रक्ष महाराज पातालं गच्छ सत्वरम्।<br>क्रुद्धा देवी क्षयं सद्यः करिष्यति न संशयः॥ ८हे महाराज! अब आप दैत्यकुलकी रक्षा कीजिये और शीघ्र पाताललोक चले जाइये; अन्यथा क्रोधमें भरी वह देवी आज ही [सभी दानवोंका] विनाश कर डालेगी; इसमें सन्देह नहीं है॥ ८॥
सिंहोऽपि भक्षयत्याजौ दानवान्दनुजेश्वर।<br>तथैव कालिका देवी हन्ति बाणैरनेकधा॥ ९<br>तस्मात्त्वमपि राजेन्द्र मरणाय मृषा मतिम्।<br>करोषि सहितो भ्रात्रा शुम्भेन कुपिताशयः॥ १०हे दानवेन्द्र! अम्बिकाका वाहन सिंह भी युद्धभूमिमें दानवोंको खाता जा रहा है और कालिकादेवी अपने बाणोंसे [दैत्य सैनिकोंका] अनेक तरहसे वध कर रही है। अतएव हे राजेन्द्र! आप भी कोपके वशीभूत होकर अपने भाई निशुम्भसहित मरनेका व्यर्थ विचार कर रहे हैं॥ ९-१०॥
किं करिष्यति नार्यैषा क्रूरा कुलविनाशिनी।<br>यस्या हेतोर्महाराज हन्तुमिच्छसि बान्धवान्॥ ११हे महाराज! राक्षसकुलका नाश करनेवाली यह क्रूर स्त्री, जिसके लिये आप अपने बन्धुओंको मरवा डालना चाहते हैं, यदि आपको प्राप्त हो ही गयी तो यह आपको क्या सुख प्रदान करेगी?॥ ११॥
दैवाधीनौ महाराज लोके जयपराजयौ।<br>अल्पार्थाय महद्दुःखं बुद्धिमान्न प्रकल्पयेत्॥ १२हे महाराज! जगत्में जय तथा पराजय दैवके अधीन होती है। बुद्धिमान्‌को चाहिये कि अल्प प्रयोजनके लिये भारी कष्ट न उठाये॥ १२॥
चित्रं पश्य विधेः कर्म यदधीनं जगत् प्रभो।<br>निहता राक्षसाः सर्वे स्त्रिया पश्यैकयानया॥ १३हे प्रभो! जिसके अधीन यह सारा जगत् रहता है, उस विधाताका अद्भुत कर्म देखिये कि इस स्त्रीने अकेले ही सम्पूर्ण राक्षसोंका संहार कर डाला॥ १३॥
जेता त्वं लोकपालानां सैन्ययुक्तो हि साम्प्रतम्।<br>एका प्रार्थयते बाला युद्धायेति सुसम्भ्रमः॥ १४आप लोकपालोंको जीत चुके हैं और इस समय आपके पास बहुत-से सैनिक भी हैं तथापि एक स्त्री युद्धके लिये आपको ललकार रही है; यह महान् आश्चर्य है!॥ १४॥
पुरा त्वया तपस्तप्तं पुष्करे देवतायने।<br>वरदानाय सम्प्राप्तो ब्रह्मा लोकपितामहः॥ १५<br>धात्रोक्तस्त्वं महाराज वरं वरय सुव्रत।<br>तदा त्वयामृत्वं च प्रार्थितं ब्रह्मणः किल॥ १६पूर्वकालमें आपने पुष्कर तीर्थमें एक देवालयमें तप किया था। उस समय वर प्रदान करनेके लिये लोकपितामह ब्रह्माजी आपके पास आये थे। हे महाराज! जब ब्रह्माजीने आपसे कहा—‘हे सुव्रत! वर माँगो’ तब आपने ब्रह्माजीसे अमर होनेकी यह

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—22 C

६७६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २७

| देवदैत्यमनुष्येभ्यो न भवेन्मरणं मम।<br>सर्पकिन्नरयक्षेभ्यः पुंल्लिङ्गवाचकादपि ॥ १७ | प्रार्थना की थी—‘देवता, दैत्य, मनुष्य, सर्प, किन्नर, यक्ष और पुरुषवाचक जो भी प्राणी हैं—इनमें किसीसे भी मेरी मृत्यु न हो’ ॥ १५–१७ ॥ | | तस्मात्त्वां हन्तुकामैषा प्राप्ता योषिद्वरा प्रभो।<br>युद्धं मा कुरु राजेन्द्र विचार्यैवं धियाधुना ॥ १८ | हे प्रभो! इसी कारणसे यह श्रेष्ठ स्त्री आपका वध करनेकी इच्छासे आयी हुई है। अतएव हे राजेन्द्र! बुद्धिसे ऐसा विचार करके अब आप युद्ध मत कीजिये ॥ १८ ॥ | | देवी ह्येषा महामाया प्रकृतिः परमा मता।<br>कल्पान्तकाले राजेन्द्र सर्वसंहारकारिणी ॥ १९ | इन देवी अम्बिकाको ही महामाया और परमा प्रकृति कहा गया है। हे राजेन्द्र! कल्पके अन्तमें ये भगवती ही सम्पूर्ण सृष्टिका संहार करती हैं ॥ १९ ॥ | | उत्पादयित्री लोकानां देवानामेश्वरी शुभा।<br>त्रिगुणा तामसी देवी सर्वशक्तिसमन्विता ॥ २०<br><br>अजय्या चाक्षया नित्या सर्वज्ञा च सदोदिता।<br>वेदमाता च गायत्री सन्ध्या सर्वसुरालया ॥ २१<br><br>निर्गुणा सगुणा सिद्धा सर्वसिद्धिप्रदाव्यया।<br>आनन्दानन्दा गौरी देवानामभयप्रदा ॥ २२ | सबपर शासन करनेवाली ये कल्याणमयी देवी सम्पूर्ण लोकों तथा देवताओंको भी उत्पन्न करनेवाली हैं। ये देवी तीनों गुणोंसे युक्त हैं, फिर भी ये विशेषरूपसे तमोगुणसे युक्त और सभी प्रकारकी शक्तियोंसे सम्पन्न हैं। ये अजेय, विनाशरहित, नित्य, सर्वज्ञ तथा सदा विराजमान रहती हैं। वेदमाता गायत्री और सन्ध्याके रूपमें प्रतिष्ठित ये देवी सम्पूर्ण देवताओंको आश्रय प्रदान करती हैं। ये देवी निर्गुण तथा सगुण-रूपवाली, स्वयं सिद्धस्वरूपिणी, सम्पूर्ण सिद्धियोंको देनेवाली, अविनाशिनी, आनन्दस्वरूपा, सबको आनन्द देनेवाली, गौरी नामसे विख्यात तथा देवताओंको अभय प्रदान करनेवाली हैं ॥ २०–२२ ॥ | | एवं ज्ञात्वा महाराज वैरभावं त्यजानया।<br>शरणं व्रज राजेन्द्र देवी त्वां पालयिष्यति ॥ २३<br><br>आज्ञाकरो भवैतस्याः सञ्जीवय निजं कुलम्।<br>हतशेषाश्च ये दैत्यास्ते भवन्तु चिरायुषः ॥ २४ | हे महाराज! ऐसा जानकर आप इनके साथ वैरभावका परित्याग कर दीजिये। हे राजेन्द्र! आप इनकी शरणमें चले जाइये; ये भगवती आपकी रक्षा करेंगी। आप इनके सेवक बन जाइये [और इस प्रकार] अपने कुलका जीवन बचा लीजिये; मरनेसे बचे हुए जो दैत्य हैं, वे भी दीर्घजीवी हो जायँ ॥ २३–२४ ॥ | | व्यास उवाच<br>इति तेषां वचः श्रुत्वा शुम्भः सुरबलार्दनः।<br>उवाच वचनं तथ्यं वीरवर्यगुणान्वितम् ॥ २५ | व्यासजी बोले—उनका यह वचन सुनकर देवसेनाका मर्दन करनेवाले शुम्भने महान् वीरोंके पराक्रम-गुणसे सम्पन्न यथार्थ वचन कहना आरम्भ किया ॥ २५ ॥ | | शुम्भ उवाच<br>मौनं कुर्वन्तु भो मन्दा यूयं भग्ना रणाजिरात्।<br>शीघ्रं गच्छत पातालं जीविताशा बलीयसी ॥ २६ | शुम्भ बोला—अरे मूर्खो! चुप रहो; तुमलोग युद्धभूमिसे भाग आये हो। तुम्हें यदि जीवित रहनेकी प्रबल अभिलाषा है तो तुम सब अभी पाताललोक चले जाओ ॥ २६ ॥ |

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—22 D