भारतकोश
संग्रह पर लौटें

देवी गीता (देवी भागवत महापुराण सप्तम स्कन्ध - हिमालय-जगदम्बा संवाद सटीक)

Devi Gita from Devi Bhagavata Purana with Hindi Commentary

आद्याशक्ति भगवती / महर्षि वेदव्यास / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished40 पृष्ठ

१३७ सप्तमस्कन्ध-अ० ३३. (७४६) क्रूरकर्मा व्याध और सत्कर्मा महाजन तथा मैंही स्त्री पुरुष और नपुंसक हूं इसमें सन्देह नहीं ॥ १५ ॥ हे गिरिवर ! जिस किसी स्थानमें जो कोई वस्तु दिखाई देती अथवा सुनाई देती हैं मैं उस सम्पूर्ण वस्तुके भीतर और बाहर व्याप्त होकर सर्वदा स्थित रहती हूं ॥ १६ ॥ मेरेविना चराचरकी कोई वस्तु विद्यमान नहीं है यदि कुछ है तो वह वन्ध्याके पुत्रकी समान निरर्थक है ॥ १७ ॥ जिसप्रकार एकमात्र रज्जु सर्प और मालादिरूपसे प्रतिभात होती है इसप्रकार एकमात्र मैंही ब्रह्मस्वरूपिणी मैंही ईश्वरादि रूपसे प्रतिभात होती हूं इसमें सन्देह नहीं है ॥ १८ ॥ क्योंकि यह कल्पित जगत् अधिष्ठानसत्ताके अतिरिक्त हेतु प्रतिभात नहीं होता यह मेरी सत्ताद्वाराही सत्तावान् होताहै नहीं तो अन्य किसीप्रकार सम्भव नहींहोसक्ता ॥ १९ ॥ हिमालयने कहा हेदेवि ! यदि मेरे प्रति आपकी कृपा हो तो आपकी समष्ट्यात्मक अर्थात् सर्वसम- ष्टीरूप सर्वाभिमानी विराट्मूर्ति देखनेकी इच्छा करता हूं आप अनुग्रहकरके वह मुझको दिखाइये ॥ २० ॥ व्यासजीने कहा हेमहाराज ! गिरिवरके यह वचन सुनकर विष्णु इत्यादि सम्पूर्ण देवताओंने प्रसन्नचित्त हो अत्यन्त मानसहित उनके उस वचनका अनुमोदन किया ॥ २१ ॥ अनन्तर भक्तोंकी वाञ्छा पूर्ण करनेवाली भक्तोंकी कामधेनु और कल्याणरूपिणी देवी भुवनेश्वरीने अपना रूप देखनेमें देवता- ओंको उत्सुक जानकर अपना विराड्रूप दिखाया ॥ २२ ॥ वह महादेवीके उस विराट्रूपको देखनेलगे. सम्पूर्ण उर्द्धस्थित सत्यलोक उस विराट्रूपिणीका मस्तक चन्द्रमा और सूर्य उसकी दोनों आँखें ॥ २३॥ सम्पूर्ण दिशा श्रोत्र (कान) सम्पूर्ण वेद वाक्य, वायु उसका प्राण, विश्व उसका हृदय, पृथ्वी जघनस्थल, ॥ २४ ॥ नभस्थल अर्थात् भुवर्लोक नाभिसरोवर ज्योतिषकमण्डल ऊरुस्थल महर्लोक ग्रीवा जनलोक मुखमण्डल ॥ २५ ॥ सत्यलोकके अधःस्थित तपोलोक उसका ललाट- फलक इन्द्रादि देवतायुक्त स्वर्गलोक उसकी बाहु, शब्द उस महेश्वरीका श्रवणेन्द्रिय ॥ २६ ॥ दोनों अश्विनीकुमार उसके नासापुट, गन्ध घ्राणेन्द्रिय, मुखके भीतर अग्नि, दिन और रात उसके दोनों पक्षरूपसे प्रकाश पाते थे ॥ २७ ॥ और उनकी दोनों भौंहें चतुर्मुख ब्रह्माजीका स्थान, जल उसका तालु, रस उसकी जिह्वा, यमराज उनकी दाढे ॥ २८ ॥ स्नेह विलास दाँत, माया उसका हास्य, ब्रह्माण्डसृष्टि उसका कटाक्ष, व्रीडा उर्द्ध ओष्ठ ॥ २९ ॥ लोभ अधर और अधर्म उसका पृष्ठभाग, जो जगतीतलमं सृष्टिकर्ता प्रजापति हैं वह उसका मेढ्र ॥ ३० ॥ सम्पूर्ण समुद्र

(७४६) देवीभागवत-भाषा । १३८ कुक्षि समस्त पर्वत उस महेश्वरीके अस्थिस্বরূপ, समस्त नदियें नाडी और सम्पूर्ण वृक्ष उसके केशरूपसे प्रकाश पाते थे ॥ ३१ ॥ हे राजेन्द्र ! कौमार यौवन और जरा उसकी उत्तम गति मेघसमूह उसका केशजाल दोनों सन्ध्या उन परम प्रभुकी दोनों वस्त्रस्वरूप ॥ ३२ ॥ चन्द्रमा उस जगदम्बिकाका मन हरि उसकी विज्ञान शक्ति और रुद्र उसके अन्तःकरण ॥ ३३ ॥ अश्वादि सम्पूर्ण जीव उसको नितम्ब देश और अतलादि सम्पूर्ण महर्लोक उसके कटिदेशसे चरणकमलोंतक स्थिति करते थे॥ ३४॥ देवतागण आश्चर्ययुक्त नेत्रोंसे जगदम्बिकाकी इसप्रकार मूर्त्ति देखने लगे उनकी उस मूर्त्तिसे सहस्र सहस्र ज्वाला माला निकलने लगीं जिह्वाद्वारा सम्पूर्ण जगत्का आस्वादन करने लगी ॥ ३५ ॥ दोनों दशनपंक्तियोंमें कटकटा शब्द होनेलगा सम्पूर्ण अक्षियोंसे अग्नि उद्गार आरम्भ हुआ हाथमें अनेक प्रकारके आयुध ब्राह्मण और क्षत्रिय उस घोरदर्शन वीरपुरुषके ओदनस्वरूप ॥ ३६ ॥ उनकी उस मूर्ति में अनेक मस्तक अनेक नेत्र और अनेक चरण थे जिनकी सीमा नहीं उस मूर्त्तिके देखनेसे बोध होता था कि एक वारही करोड सूर्य उदय हुए हैं मानों अनेक विद्युन्माला एकत्र प्रकाशित होरहीं हैं ॥ ३७ ॥ महादेवीके वह महाभयंकर नेत्रभी मनको त्रासउत्पन्न करते थे इस प्रकार महाघोर विराट्मूर्त्ति देख सम्पूर्ण देवतालोग भीत होकर हाहाकार करनेलगे ॥ ३८ ॥ और उनका हृदय काँपनेलगा वह अत्यन्त मूर्च्छासे आक्रान्त होगये “यही हमारी पालनकरनेवाली जगदम्बिका है” यह ज्ञान एकवारही दूर होगया ॥ ३९ ॥ उससमय उन भुवनेश्वरीके चारोंओर जो सम्पूर्ण वेद स्थिति करतेथे उन्होंने मूर्च्छासे उठायकर देवताओंको समझाया ॥ ४० ॥ अनन्तर वह निर्जरगण वह अत्युत्तम श्रुति प्राप्तकर धैर्यअवलम्बनपूर्वक अन्तर्जनित बाष्पसे रुद्धकण्ठ हो ॥ ४१ ॥ प्रेमविगलित अश्रुपूर्ण नेत्रोंसे गद्गदवचनद्वारा जग- दम्बिकाका स्तव करनेलगे देवताओं ने कहा हे मातः ! हम अत्यन्त दीन और आपसेही हम उत्पन्न हुए हैं आप हमारा अपराध क्षमाकीजिये ॥ ४२ ॥ और हमारे प्रति कोप त्यागकीजिये, हम आपके इस रूपको देखनेसे अत्यन्त भीत हुए हैं हे देवि ! पामर अमरगण आपकी क्या स्तुति करें ? ॥ ४३ ॥ आप स्वयं जब कि अपने पराक्रमकी सीमा करनेमें असमर्थ हैं तब हम आपके पीछे जन्म ग्रहण करके किसप्रकार उसको जानसक्ते हैं॥४४॥ हे प्रणवात्मिके भुवनेश्वरि ! हम आपको नमस्कार करतेहैं हेदेवि ! सम्पूर्ण वेदान्तशास्त्रमें आपको प्रतिपादित किया है हम आपकी

१३९ सप्तमस्कंध-अ० ३४. (७४७) उसी ह्रींकारमूर्तिको नमस्कार करते हैं ॥४५॥ जिनसे अग्नि सूर्य चन्द्रमा और जिनसे सम्पूर्ण ओषधियें उत्पन्न हुई हैं उन्ही सर्वात्मरूपिणीको नमस्कार है ॥४६॥ जिनसे सम्पूर्ण देवतागण साध्यगण पशुगण पक्षीगण और मनुष्यगण उत्पन्न हुए हैं हम उन्हीं सर्वात्मरूपिणी देवीके विराट्रूपको नमस्कार करते हैं॥४७॥ जिनसे प्राण अपान व्रीहि यव तपस्या श्रद्धा सत्य ब्रह्मचर्य और सम्पूर्ण हितकर्तव्यतारूप विधि उत्पन्न हुई है हम उन्हीं सर्वात्मिका महामायाकी महामूर्तिको नमस्कार करते हैं॥४८॥ जिनसे सप्त प्राण सप्त दीप्ति सप्त समाधि सप्त होम और सप्त लोक उत्पन्न हुएहैं हम उन्हीं सर्वस्वरूपिणीको नमस्कार करतेहैं॥४९॥ जिनसे सम्पूर्ण समुद्र सम्पूर्ण पर्वत समस्त नदी सम्पूर्ण औषधि और समस्त रस उत्पन्न हुए हैं हम उन्हीं भुवनेश्वरीकी विराद्रूर्तिको नमस्कार करतेहैं ॥५०॥ जिनसे यज्ञ यूप और दक्षिणा एवं ऋक् यजु और सामवेद उत्पन्न हुए हैं हम महामायाकी उस अखिल विश्वात्मक विराट्रूपको नमस्कार करते हैं॥५१॥हेमातः महामाये ! आपकें पुरोभागमें नमस्कार आपके पृष्ठ भागमें नमस्कार आपके दोनों पार्श्वमें नमस्कार आपके ऊर्द्धभागमें नमस्कार आपके अधोभागमें नमस्कार और आपके चारों ओर वारंवार नमस्कार करते हैं॥५२॥ हे देवि ! आप अपने इस अलौकिक रूपको दूर करके अपना परम सुन्दर मनोहर रूप हमको दिखाईये ॥५३॥व्यासजीने कहा हे राजन् ! करुणाकी अर्णवरूपिणी जगदम्बिकाने सुरगणोंको भीत देख अपना घोर विराद्रूप दूर करके परमसुन्दर भुवनमोहन पूर्वरूप दिखाया ॥ ५४ ॥ उनका सम्पूर्ण शरीर कोमल होगया उन्होंने एक हस्तमें पाश और एक हस्तमें अङ्कुशास्र धारण किया अपर दोनों हाथोंमेंसे एक हस्तमें वरदान और अन्य हस्त अभयदान भङ्गिमामें उद्यत उनके नेत्र देखनेसे बोध होता था कि मानो उनके एकवारही करुणारससे परिपूर्ण मुखकमलमें कुछेक हास्य विराजमान है ॥ ५५ ॥ देवतागण जगदम्बिकाकी इसप्रकार मूर्ति देखकर भयरहित हो शान्तचित्तसे हर्ष और गद्गदशब्दपूर्वक प्रणाम करनेलगे ॥ ५६ ॥ इति श्रीदेवीभागवते महापुराणे सप्तमस्कंधे भाषायां त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३३ ॥ चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ३४. श्रीदेवी बोली कहां तो तुम मंदभाग्य और कहां यह मेरा अद्भुत रूप तौभी भक्ति वत्सलतासे तुमको मैंने यह रूप दिखाया है ॥ १ ॥ वेदाध्ययन योग दान तप यज्ञसे

(७४८) .देवीभागवत-भाषा । १४० यह मेरा रूप नहीं दीखता इसमें केवल मेरी कृपाही कारण है ॥ २ ॥ अब उसी प्रकृत विषयको श्रवणकरो जो परमात्मा उपाधियोगसे जीवताको प्राप्त और कर्तृआ- दिपदसे व्यवहार कियाजाता है ॥ ३ ॥ धर्म अधर्मके कारण अनेकप्रकारकी क्रिया करता है और यह जीव अनेकयोनियोंको प्राप्त होकर सुखदुःख भोगता है ॥ ४ ॥ फिर उन्ही संस्कारोंके वशसे अनेकप्रकारके कर्मोंमें रत होता है अनेक देहोंसे युक्त हो अनेक सुखदुःख पाताहै ॥ ५ ॥ घडीयंत्रकी समान यह सदा विचरताही रहता है इसको कभी विश्राम नहीं मिलता आजतक अनेकसृष्टि प्रलय हुई पर इसका विराम न हुआ इसका मूल अज्ञान है इस अज्ञानसे इच्छा और उससे क्रिया होती है ॥ ६ ॥ इससे अज्ञान नाशके निमित्त क्रिया करनी चाहिये यही जन्मकी सफलता है ॥ ७॥ जो अज्ञाननाश कियाजाय “यो ह्यविदित्वा- त्मानमस्माल्लोकात्प्रैति स कृपणः” इति श्रुतेः। पुरुषार्थकी समाप्ति जीवन्मुक्तकी दशाकी प्राप्ति और अज्ञाननाशनमें एक विद्याही समर्थ है ॥ ८ ॥ हे पर्वतराज ! अज्ञानसे उत्पन्न कर्म अज्ञानसे उत्पन्न हुए कर्मके नाशमें समर्थ नहीं है कारण कि इन दोनोंका परस्पर विरोध नहीं है कर्मद्वारा अज्ञानके नाशकी आशा न करनी चाहिये ॥ ९ ॥ कारण कि यह अनर्थके देनेवाले कर्म वारंवार प्रगट होते हैं फिर राग और फिर दोष इससे महाअनर्थ होता है ॥ १० ॥ इसकारण सब प्रयत्नसे मनुष्यको ज्ञान सम्पादन करना चाहिये और “कुर्वन्नेवेह कर्माणि” इस श्रुतिसे कर्मकोभी सदा करना आवश्यक कहा है॥ ११॥तथा'ज्ञानादेव हि कैवल्यम्'अर्थात् ज्ञानसे ही मुक्ति होतीहै इनका समुच्चय इसप्रकार है कि ज्ञानके होनेमें कर्म सदा सहायक है ॥ १२॥ इसप्र- कार इसविषयमें कोई कहते हैं इस भांतिसे विरोध सम्भव नहीं होता कारण कि ज्ञानसे हृदयकी गांठ खुलती है, और हृदयकी ग्रंथिमें कर्म स्थित है जहां ज्ञानके आगे कर्मकी भावना हो वहां ज्ञानकर्मका समुच्चय कहनाचाहिये ॥ १३ ॥ इसकारण उन ज्ञान और कर्मका तम और प्रकाशकी समान एकसाथ विरोध नहीं संभव होसक्ता, इसकारण यदि ज्ञान उत्पन्न न हो तो यावज्जीव कर्मानुष्ठान करता रहै ॥ १४ ॥ हेमहामते! इस कारण जितने वैदिक कर्म हैं, वह सब चित्तशुद्धिके निमित्त हैं उनको यत्नपूर्वक करनाचाहिये, चित्तशुद्धि होनेसे ज्ञान प्राप्त होकर ज्ञानी होगा ॥ १५ ॥ शम-अन्तर इन्द्रियका निग्रह, दम बाह्य इन्द्रियोंका निग्रह तितिक्षा शीत उष्ण आदिका सहना वैराग्य दोनों लोकके फलमें विराग और अन्तःकरणकी शुद्धि जबतक यह प्राप्त न हो तबतक कर्म करता रहै

१४१ सप्तमस्कन्ध-अ० ३४. (७४९) फिर कर्म करनेकी आवश्यकता नहीं ॥ १६ ॥ ज्ञान होनेपर सब कुछ त्याग आत्मवान् गुरुका आश्रय करै वेदपाठी ब्रह्ममें निष्ठावाले वेदवेदांगके ज्ञातासे छल रहित भक्तिपूर्वक ॥ १७ ॥ सावधान हो नित्य वेदांत श्रवण करै और 'तत्त्वमसि' इत्यादि वाक्योंका नित्यही अर्थ विचारता रहै ॥ १८ ॥ "तत्त्वमसि" इत्यादिवाक्य जीव और ईशकी एकताबोधक हैं इनकी एकता जानकर यह निर्भय होकर मेरा रूप होजाता है ॥ १९ ॥ पहले पदार्थका ज्ञान फिर वाक्यार्थका ज्ञान करै हे पर्वतराज 'तत्' पदका अर्थ षड्गुण ऐश्वर्यसम्पन्न मैं हूं ॥ २० ॥ और 'त्वं' पदका वाच्यार्थ निःसन्देह जीव है, 'असि' पदसे दोनो जीव ईश्वरकी एकता ज्ञात होती है अर्थात् वही तू है ॥ २१ ॥ यदि कहो कि अत्यन्त विरुद्ध धर्मवाले जीवेश्वरकी एकता किसप्रकार होसकती है तो भागलक्षणासे कहते हैं, आशय यह कि, जब वाच्यार्थ विरुद्ध होनेसे दोनोंकी एकता न घटे तो उसमें लक्षणा करनी चाहिये जीवके असर्वज्ञत्व और परिच्छिन्नत्व आदि निकृष्ट धर्म हैं ईश्वरकी सर्वज्ञता व्यापकताआदि उत्कृष्ट धर्म हैं तब इनका अभेद कैसे हो इसपर श्रुतिसम्मत 'तत्, त्वं' पदकी लक्षणा करनी चाहिये ॥ २२ ॥ किस अर्थमें लक्षणा करनी चाहिये तब कहते हैं चिन्मात्रमें लक्षणा होती है, सर्वज्ञत्वा- दिविशिष्ट ब्रह्मचैतन्य ईश्वर है असर्वज्ञत्वादिविशिष्ट ब्रह्मचैतन्य जीव है इनमें दोनों धर्म छोड़कर चिन्मात्र भागत्यागलक्षणासे ग्रहण करना, इसप्रकार लक्षणासे दोनोंकी एकता होगी अपने अभेदसे इनकी एकताका ज्ञान होनेसे अद्वय होगा यह इसका महाफल है ॥ २३ ॥ वही यह देवदत्त है इस वाक्यसे तत्कालविशिष्ट देवदत्तका इसकालविशिष्ट देवदत्तसे भेद होनेपरभी वैशिष्ट्यरूप दोनों धर्मके त्यागसे अविरुद्ध व्यक्तिको भागत्यागलक्षणासे ग्रहणकर अभेद किया जाता है इसीकारण लक्षणा ग्रहण की है इस अनुभवसे स्थूलादिभेदरहित हो यह ब्रह्मभावको प्राप्त होता है ॥ २४ ॥ पंचीकृतमहाभूतसेही यह स्थूलदेह प्रगट हुआ है, यह भोगका स्थान जरा व्याधि तथा सब कर्मोंसे युक्त है ॥ २५ ॥ यह मिथ्या भी है परन्तु मायासे सत्यसा दीखता है हे पर्वतराज ! यह मेरे आत्माकी स्थूलउपाधि है ॥ २६ ॥ ज्ञानकर्मेन्द्रियसे युक्त प्राणपंचकसे संयुक्त तथा मनबुद्धिसे युक्त देह सूक्ष्मउपाधि है ॥ २७ ॥ अपंचीकृत भूतोंसे प्रगट यह आत्माका सूक्ष्म देह है, यह अन्तः करणकी सुखदुःखादिअवबोधक दूसरी उपाधि है ॥ २८ ॥ हे नगेश्वर ! अनादि अनि-

२. अध्याय ४-६: ज्ञान-योग, अष्टाङ्ग-योग व कुण्डलिनी-साधना

(७५०) देवीभागवत-भाषा । १४२ वाच्य अज्ञानयुक्त यह कारणशरीर तीसरा है ॥ २९ ॥ इन स्थूलसूक्ष्मकारण उपाधियोंके लीन होनेमें केवल आत्मा अवशेष रहता है इन तीनों देहोंमें अन्नमय प्राणमय मनोमय विज्ञानमय आनंदमय यह पांच कोश सदा अन्तर स्थित रहते हैं ॥ ३० ॥ इन पंचकोशके त्यागमें ‘ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा’ ब्रह्ममें प्रतिष्ठा प्राप्त होती है जो नेति २ इत्यादि वाक्योंसे मेरा रूप कहा जाता है ॥ ३१ ॥ यह ब्रह्म- रूप न कभी उत्पन्न होता न मरता, न कभी होनेवाला और न कभी हुआ है यह अज नित्य शाश्वत पुरातन छहों विकारोंसे रहित है शरीरके हन्यमान होनेपरभी मरता नहीं हन्यमान नहीं होता ॥ ३२ ॥ जो मारनेवाला मारा ऐसा जानता है हत हुआ अपनेको हत मानता है यह दोनों ही इसको नहीं जानते कारण कि न यह मरता न माराजाता है ॥ ३३ ॥ यह अणुसे अणु और महान्‌से महान्‌ आत्मा होकरभी इस प्राणि के हृदय रूपी गुहा वा बुद्धिमें स्थित है इस आत्माकी महिमाको चित्तकी निर्मलता संकल्पविकल्परहित होनेसे जानता है तब वीतशोक होता है ॥ ॥ ३४ ॥ आत्मा रथी, शरीर रथ, बुद्धि सारथि, मन लगाम, ॥ ३५ ॥ इन्द्रिय घोड़े हैं यह विषयरूपी मार्गमें निरन्तर गमन करते हैं, आत्मा चिदाभास, इन्द्रिय मन यह तीन कूटस्थ मिलित होकर भोक्ता कहा जाता है ॥ ३६ ॥ जो पुरुष अविद्वान् अर्थात् अविवेकी होता है अस्वाधीन अशुचि होता है वह तत्पदको प्राप्त न होकर संसारमें पड़ता है ॥ ३७ ॥ और जो विज्ञानवान् स्वाधीन मन सदा पवित्र होता है वह उस पदको प्राप्त होता है जहांसे फिर आना नहीं होता ॥ ३८ ॥ जिसका विज्ञान सारथि मनकी लगाम रोकेहुए है वह इस संसारके पार हो मेरे परमपदको प्राप्त होता है ॥ ३९ ॥ इसप्रकार श्रुति बुद्धिद्वारा आत्मासे ही आत्माका निश्चय कर विक्षेपादिरहित हो साक्षात्कार होनेसे चित्तकी एकाग्र वृत्तिसे आत्मरूप मेरा ध्यान करे ॥ ४० ॥ इस प्रकार निदिध्यासन अभ्याससे जब चित्तमें समाधिकी योग्यता होजाय तब समाधिसे पहले अपने शरीरमें प्रणवसंज्ञक मायाबीजमंत्रके तीन अक्षरोंका ध्यान करे मंत्रवाच्य मायाबीजमंत्रार्थके समष्टिव्यष्टिके ध्यानार्थ है ॥ ४१ ॥ हकार स्थूलदेह रकार सूक्ष्मदेह ईकार कारणदेहरूप है और मैं जो तुरीयरूप हूं सोई ह्रींकार है ॥ ४२ ॥ जैसे व्यष्टिदेहमें भावना की है इसीप्रकार समष्टिदेहमें क्रमसे तीनों बीजोंको जानकर बुद्धिमान् समष्टिव्यष्टि पिण्ड और ब्रह्माण्डकी एकता ध्यान करे ॥ ४३ ॥ इस

प्रकार आदरपूर्वक समाधिसे पहले ध्यानकर नेत्र मूंद मुझ जगदीश्वरीका ध्यान करै ॥ ४४ ॥ नासिकाके आभ्यन्तर फिरनेवाले प्राण अपानको समानकर विषयादिकी आकांक्षासे निवृत्त हुआ दोष और मत्सरतासे रहित ॥ ४५ ॥ छलरहित भक्तिसे युक्त हुआ गुह्य वा शब्दरहित एकान्त स्थानमें वैश्वानरात्मक हकारको रकारमें लीन करै अर्थात् हकारवाच्य स्थूल देहको रकारवाच्य सूक्ष्मदेहमें लीन करै ॥ ४६ ॥ रकारवाच्य तैजस अर्थात् सूक्ष्मदेहको ईकारवाच्य कारण देहमें लय करै ईकारवाच्य कारणदेहको ह्रींकारवाच्य ब्रह्ममें लय करै ॥ ॥ ४७ ॥ जब वाच्य और वाचकतासे हीन, द्वैतभावसे वर्जित होजाय तब चैतन्य अग्नि दीपशिखान्तरमें अखंड सच्चिदानंदकी भावना करै ॥ ४८ ॥ हे राजन् ! इस प्रकार नरोत्तम ध्यानमें मेरा साक्षात्कार करके मेराही रूप होजाता है कारण कि दोनोंकी एकता सिद्ध है ॥ ४९ ॥ इस प्रकार इस योगयुक्तिसे परात्पर मुझ आत्माको देखते ही अपने कार्यसहित अज्ञान उसीसमय नष्ट होजाता है ॥ ५० ॥ इति श्रीदेवीभागवते महापुराणे सप्तमस्कन्धे भाषायां चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३४ ॥ ॥ पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ३५ ॥ हिमालयने कहा हे महेश्वरि ! जिस योगद्वारा ब्रह्मलाभ होता है उस योगका विषय अंगोंसहित वर्णन करो जिसका अनुष्ठान कर मैं तत्वदर्शनका अधिकारी होऊं॥ १॥ श्रीदेवी बोली आकाश भूमि रसातलादिस्थानोंमें योग नहीं है जीव और आत्माकी अभेदविषयक चित्तवृत्तिको ही योगविशारद योग कहते हैं ॥ २ ॥ हे पापरहित ! काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य यह छः योगके शत्रु हैं जो इसमें विघ्न कि याकरते हैं ॥ ३ ॥ इसकारण योगियोंको आगे लिखे योगके अंगोंसे योगशत्रुओंको विनाश करके योग प्राप्त करना चाहिये यम, नियम, आसन, प्राणायाम ॥ ४ ॥ प्रत्याहार, धारण, ध्यान और समाधि यह आठ अंग योगियोंको योगमें सहायक हैं ॥ ५ ॥ किसीकी हिंसा न करना, सत्य बोलना, चोरी न करना, ब्रह्मचर्य, दया, ऋजुता, क्षमा, धृति, सर्वनाशमें भी धीरता मितभोजन दो भाग अन्नसे पूर्ण करै एक भाग जलसे चौथा भाग वायुके गमनागमनको रक्खे यह अल्पाहार है तथा बाह्य आभ्यन्तरकी शुद्धि करै यह दश यम हैं ॥ ६ ॥ तपस्या, सन्तोष, आस्तिक्य, [वेद, देव, द्विज और गुरुमें विश्वास ] दान, देवपूजा, सिद्धान्त अर्थात् वेदान्तवाक्यका श्रवण, अकार्यकरनेमें

(७५२) देवीभागवत-भाषा । १४४

लज्जा मति (सत्कर्म और सच्छास्त्रविषयक ज्ञान) जप और नित्यहोमादि ॥ ७ ॥ हे पर्वतनायक ! यह मैं ने दश नियम कहे हैं पद्मासन, स्वस्तिक, भद्र, वज्रासन ॥ ८ ॥ और वीरासन यह क्रमसे पांच आसन कहे हैं दोनों पैरोंके तलुए दोनों जंघाओंपर रखकर ॥ ९ ॥ हाथोंको पीठकी ओरसे ले आगे दहिने हाथसे दहिने चरणका बायेंसे बायें चरणका अँगूठा पकडै यह योगियोंको प्रसन्नकरनेवाला पद्मासन कहा है ॥ १० ॥ जानु और ऊरुओंके अन्तर दोनों पैरके तलुए भलीभांति स्थापि- तकर सरलभावसे सुखपूर्वक बैठनेको स्वस्तिकं आसन कहते हैं ॥ ११ ॥ अंडको- शकी शिराके नीचे सीमनके दोनों पार्श्वमें दोनों गुल्फोंको भली प्रकार स्थापित कर दोनों हाथोंसे अंडकोशके अधोभागमें दोनों पैरोंका पार्ष्णिभाग हाथोंसे दृढभावसे बांधकर ॥ १२ ॥ बैठनेका नाम योगियोंने भद्रासन कहा है योगी इसका विशेष आदर करते हैं दोनों चरण क्रमसे दोनों ऊरुओंपर रखकर दोनों जानुओंके निम्नभा- गमें अंगुली रखकर ॥ १३ ॥ दोनों हाथ स्थापनकर बैठनेको वज्रासन कहते हैं योगीजन एक ऊरुके नीचे एक चरण दूसरी ऊरुके नीचे दूसरा पद स्थापनकर ॥ १४ ॥ सरल कायासे जो स्थिति करते हैं इसको वीरासन कहते हैं योगका ज्ञाता प्रथम सोलह वार प्रणव उच्चारण करके इडा अर्थात् बाईं नासिकाद्वारा गुह्य वायुको आकर्षण करै ॥ १५ ॥ फिर जितनी देरमें चौंसठ वार प्रणव उच्चारण हो इतने समयतक यह खेंची हुई वायु धारण करके पूरक करै फिर ३२ वार प्रणवो- च्चारणकालमें शनैः २ सुषुम्नामध्यगत वायुको ॥ १६ ॥ दक्षिणनासापुटद्वारा रेचन करै योगशास्त्रज्ञाता पंडितोंने इसका नाम प्राणायाम कहा है ॥ १७ ॥ इस प्रकार वारंवार बाह्य वायु ग्रहणकरके पूरक कुंभक और रेचकका अभ्यास करै और क्रमानुसार प्रणवोच्चारणकी संख्या बढावै यह प्राणायाम पहले १२ वार फिर १६ वार और फिर क्रमसे और भी अधिक करै ॥ १८ ॥ सगर्भ और अगर्भके भेदसे प्राणायाम दो प्रकारका है इष्ट मंत्रके जप ध्यानादि पूर्वक जो प्राणायाम किया जाता है वह सगर्भ है और जो प्राणायाम इष्ट मंत्रके जप ध्यानादिविना होता है वह विगर्भ प्राणायाम है ॥ १९ ॥ इस प्रकार क्रमसे प्राणायामका अभ्यास करते २ देहमें पसीना आनेसे वह प्राणायाम अधम, कम्प उत्पन्न होनेसे मध्यम और जिस प्राणायाममें साधक भूमि त्यागकर ऊंचा उठता है वह उत्तम प्राणायाम है॥ २०॥ जबतक उत्तम प्राणायामका फल लाभ न हो तबतक अभ्यास करता रहे इन्द्रिय-

१४५ सप्तमस्कंध-अ० ३६. (७५३) सदाही अपने २ विषयोंमें अबाधित भावसे विचरण करती हैं ॥ २१ ॥ उनको विषयोंसे बलपूर्वक रोकनेहीका नाम प्रत्याहार है अंगूठा, गुल्फ, जानु, ऊरु, मूलाधार, लिंग, नाभि ॥२२ ॥ हृदय, ग्रीवा, कंठ, लम्बिका, नासिका, भ्रूमध्य, मस्तक, मूर्धा (ब्रह्मरंध्र) इन द्वादशान्त स्थानमें विधिपूर्वक ॥ २३ ॥ प्राणवायुको रोक रखनेका नाम धारणा है प्रथम ध्यानसे अन्तःकरणको चैतन्यवर्ती अर्थात् आत्मसंस्थ करके ॥ २४ ॥ उसमें अभीष्ट देवताके चिन्तनका नाम ध्यान है जीवात्मा और परमात्मा की एकता भावना संप्रज्ञात समाधिको ॥ २५ ॥ मुनियोंने समाधि कहा है यह अष्टांगलक्षणवाला योग तुमसे वर्णन किया अब मंत्रोंका सिद्धिदायक अति उत्कृष्ट योग तुमसे वर्णन करती हूं ॥ २६ ॥ हे पर्वतराज ! पिण्ड और ब्रह्माण्डकी एकता होनेसे यह शरीर विश्व वा ब्रह्माण्ड कहा जाता है यह पंचभूतात्मक चन्द्र सूर्य और अग्निसे युक्त होकर जीव ब्रह्मके ऐक्यज्ञानदायक होता है ॥ २७ ॥ इस शरीरमें साढेतीन करोड नाडी हैं उनमें दश मुख्य हैं और दशमें भी तीन अतिशय प्रधान हैं ॥ २८ ॥ इनमें भी एक सुषुम्ना नाड़ी प्रधान है चन्द्र सूर्य और अग्निरूपिणी इस नाड़ीने मेरुदण्डके मध्यभागमें स्थित होकर मूलधारसे ब्रह्मरन्ध्र पर्यन्त गमन किया है इसके वामभागमें शुभ्रवर्ण चन्द्र रूपिणी इडा है ॥ ॥ २९ ॥ यह शक्तिरूपा अमृतमयी है और दक्षिणभागमें पुरुषरूपिणी सूर्य स्वरूपा पिंगला नाड़ी स्थित है ॥ ३० ॥ और वह्निप्रधानासुषुम्नानाड़ी सब तेजोमयी है इसके मध्यमें स्थित चित्ररेखानामक नाडीके भीतर इच्छा, ज्ञान और क्रिया त्मक ॥३१॥ कोटिसूर्यके समान प्रभावशाली स्वयंभूलिंग प्रतिष्ठित है उसके ऊपर भागमें हृदात्मा विन्दुनाद अर्थात् हकार, रेफ, ईकार बिन्दुनादात्मक मायाबीज स्थित है ॥ ३२ ॥ उसके ऊपरीभागमें दीपशिखाके समान लाल वर्ण देवीरूपिणी कुंडलिनी शक्ति विराजमान है हे नगेश्वर! यह मुझसे अभिन्न है॥ ३३॥ इसके बहिर्भागमें पीतवर्ण सुवर्णके समान कान्तिवाले कमलकी चिन्ता करै उससे चार दलोंमें श, ष, स, ह, यह चार अक्षर ध्यान करै ॥ ३४॥ इसके ऊपर षट्कोण कमलका ध्यान करै जो अग्निके समान छः दलोंसे युक्त हीरेकेसी कान्तिवाला है इसके छहों दल, ब, भ, म, य, र, ल, इन अक्षरोंसे सम्पन्न हैं स्व शब्दसे परलिंग जानना चाहिये ॥ ३५॥ यह षट्कोण मूलके आधारवाला है इसीसे इसको मूलाधार कहते हैं स्वशब्दसे पर- लिंग और स्वाधिष्ठान जानना चाहिये यही स्वाधिष्ठान पद्म है ॥ ३६ ॥ इसके ऊपर ४८

(७५४) देवीभागवत-भाषा। १४६

नाभिस्थानमें विद्युत् छटा और मेघके समान कान्तिमान् अतितजयुक महा प्रभा- वाला मणिपूर ॥ ३७ ॥ मणिवत्प्रभावृाला होनेसे मणिपद्म कहाता है उसमें दश- दल ड, ढ, ण, त, थ, द, ध, न, प, फ, यह अक्षरयुक्त है ॥ ३८ ॥ यह पद्म विष्णुसे अधिष्ठित होनेसे इसके ध्यानसे विष्णुका साक्षात्कार होता है इसके ऊर्ध्व भागमें बालसूर्यके समान प्रभायुक्त अनाहत पद्म है ॥ ३९ ॥ यह क, ख, ग, घ, ङ, च, छ, ज, झ, ञ, ट, ठ, इन बारहवर्णों युक्त बारहदल सम्पन्न है इसके मध्यमें अयुत १०००० सूर्यके समान प्रभा सम्पन्न बाणलिंग विराजमान है॥४०॥ किसीप्रकारकी ताडनाके विनाही इससे शब्दब्रह्मकी उत्पत्ति होती है इसीसे मुनिजन इसको अना- हत पद्म कहते हैं ॥ ४१ ॥ यह पद्म आनंदका धाम है इसमें रुद्ररूपी पुरुष विराजते हैं इसके ऊपर भुविशुद्धनामक षोडश दल कमल ॥ ४२ ॥ अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ॠ, ऌ, ॡ, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अः इन सोलह स्वरोंसे युक्त धूम्रवर्ण महाकान्तिमान् है परमात्माके अवलोकनसे इसमें जीव शुद्ध होता है अर्थात् दोनोंका अभेद साक्षात्कार होनेसे जीव विशुद्धिको प्राप्त होता है ॥ ४३ ॥ इसीकारण इसको विशुद्ध पद्म कहते हैं यह महाअद्भुत पद्म आकाशनामसे अभिहित है इसके ऊपर भ्रूमध्यमें आत्माका परम अधिष्ठान आज्ञाचक्र है ॥ ४४॥ यह ह और क्ष दो- दलसे युक्त मनोहर है इसमें चित् स्थित होनेसे सब पदार्थोंका साक्षात्कार हो आता है, भूत भविष्य वर्त्तमान् वस्तुओंमें यह तुम्हारा कर्त्तव्य है इसप्रकार परमेश्वरकी आज्ञाका संक्रमण होता है इसीसे इसको आज्ञापद्म कहते हैं ॥ ४५॥ इसके ऊर्ध्वमें कलासचक्र और उसके ऊर्ध्वमें रोधिनीचक्र है हे सुव्रत इसप्रकार आपके निकट आधारचक्रोंका वर्णन किया ॥ ४६ ॥ योगियोंका कथन है उसके ऊर्ध्वमें सह स्रारचक्र है यह बिन्दु अर्थात् परमात्माका स्थान है यह आपसे सम्पूर्ण योगमार्ग वर्णन किया ॥ ४७ ॥ यह जानकर जो करना चाहिये सोई कहती हूं, पहले पूरक प्राणायाम द्वारा आधारचक्रमें मन संयुक्त करै, गुदा और मेढ़के भीतर मूला- धारमें विराजमान कुंडलिनी शक्तिको मूलाधारमें प्राप्त वायुद्वारा आकुंचित करके प्रबोधित करै ॥ ४८ ॥ अनन्तर लिंगभेद क्रमसे अर्थात् पूर्वोक्त चक्रस्थित तेजो- मय स्वयंभू इत्यादि लिंगकां भेदकर उस उस मार्गमें उस कुंडलिनी शक्तिको सहस्रार स्थानमें लावै फिर उस परमशक्तिको सहस्रारमें स्थित शंभुके सहित एकीभूत रूपसे चिन्तन करै ॥ ४९ ॥ अनन्तर शिवशक्तिके संगमसे लाक्षारसकेसमान जो अमृत

निर्गत होता है उसी आनंदस्वरूप अमृतसे योगसिद्धिकरी मायानामिनी कुंडलिनी शक्तिको तृप्त करै ॥ ५० ॥ और छहों चक्रोंमें स्थित देवसमूहोंको उस अमृत धाराद्वारा तृप्त करके पूर्वोक्त मार्गसे उस शक्तिको मूलाधार पद्ममें लावै ॥ ५१ ॥ जो प्रतिदिन इसप्रकार योगका अभ्यास करते हैं उनके सम्बन्धमें छिन्नादिदोष दूषित सब मंत्र सिद्ध होते हैं इसमें अन्यथा नहीं है ॥ ५२ ॥ और इसीसे जरा- मरणादि दुःखवाले संसार बंधनसे मुक्त होता है और मुझ जगन्मातामें जो सब गुण विद्यमान् हैं॥५३॥ऐसे साधकको वह समस्त गुण प्राप्त होते हैं इसमें सन्देह नहीं हे तात! यह तुमसे अति उत्तम वायुधारणयोग कथन किया ॥५४॥ अब सावधान होकर चित्तधारणाख्ययोग सुनो दिक् काल और देशादिद्वारा अपरिच्छिन्न देवीमूर्तिमें चित्तको स्थिरकर सकनेसे ॥५५॥ तन्मय होनेसे शीघ्रही जीवब्रह्मकी एकताका ज्ञान होता है उस समय साधक ब्रह्ममय हो जाता है और यदि चित्त रज तम द्वारा मलीन हो तो शीघ्र योगसिद्धि नहीं होती ॥ ५६ ॥ तब योगी अवयवयोगसे योगाभ्यास करै अर्थात् मेरे हस्तपादादि किसी मनोहर अंगमें ॥ ५७॥ चित्तको लगाय एक एक स्थानको जय करता हुआ,चित्तकी शुद्धता होनेसे मेरे सब स्वरूपमें मनको स्थापन करै ॥ ५८ ॥ हे नगेन्द्र ! जबतक मुझ ब्रह्मरूपिणीमें चित्तका लय न हो तबतक मंत्रयोग- परायण साधक जप और होमके द्वारा इष्टमंत्रसाधनका अभ्यास करै ॥ ५९ ॥ मंत्राभ्यास योगद्वारा ब्रह्मज्ञान प्राप्त होता है योगके विना मंत्र सिद्धि नहीं होती, और मंत्रके विना योगसिद्ध नहीं होता मंत्र और योग दोनोंका अभ्यास ही ब्रह्मज्ञा- नका कारण है ॥ ६० ॥ घरमें रक्खा हुआ अंधकारसे आच्छन्न घड़ा जिसप्रकार दीपकसे दिखाई देता है इसीप्रकार मायासे आवृत्त जीवात्माभी मंत्रद्वारा प्रकाशित होता है अर्थात् मंत्र मायाअंधकारको दूरकरके आत्माका स्वरूप प्रकाश कर देता है ॥ ६१ ॥ हे पर्वतराज ! यह मैंने तुम्हारे समीप अंगके सहित सब योग विधिका वर्णन किया ॥ ६२ ॥ यह विद्या गुरुके निकट उपदेश प्राप्तकरकेही जानी जाती है अन्यथा कोटिशास्त्रद्वारा भी इसका लाभ नहीं होसक्ता है ॥ ६३ ॥ इति श्रीदेवीभागवते महापुराणे सप्तमस्कंधे भाषायां पंचत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥

(७५६) देवीभागवत-भाषा । १४८ षट्त्रिंशोऽध्यायः ३६.॥ श्रीदेवी बोलीं हे गिरिराज ! योगीजन इस प्रकार योगयुक्त हो आसनमें बैठ छलरहित भक्तिसे मुझ ब्रह्मरूपिणीका ध्यान करैं ॥१॥ अब ब्रह्मस्वरूपका वर्णन करती हूं सुनो यह ब्रह्म आवि अर्थात् प्रकाशमान वस्तु अति समीपवर्ती और गुहाचर अर्थात् सर्व व्यापक होकर भी केवल बुद्धिरूप गुहामेंही इसकी प्राप्ति होती है यह योगादि साधन गम्य है इस ब्रह्मसेही आकाशादि समस्त पदार्थ कल्पित होते हैं इसमेंही पक्षी मनुष्य निमेषादिक्रियावान् सब पदार्थ स्थापित हैं ॥ २ ॥ हे देवताओ ! मेरे इस ब्रह्मरूपको जानो जो माया और जगत् इन दोनोंसे श्रेष्ठ है लोकमें ज्ञानातीत और वरिष्ठ अर्थात् सम्पूर्ण बुद्धियोंको भी गम्य नहीं है जो सूर्यादितेजका भी प्रकाशक है इससे वह सूर्यादितेजसे भी अत्यन्त दीप्तिमान् और अणुसे भी अणु अर्थात् अति सूक्ष्म है जिसमें भूरादि लोक और उन लोकनिवासियोंकी स्थिति है ॥ ३ ॥ वह अक्षर अविनाशी पदार्थही ब्रह्म है यही प्राण, वाणी और मन स्वरूप है वही सत्य और अमृत स्वरूप है हे सौम्य ! मनरूपी बाणसे उसको विद्धकरना चाहिये अर्थात् उसमें मन समाधान करै ॥ ४ ॥ हे सौम्य ! उसके विद्ध करनेका उपाय कहती हूं उपनिषद्शास्त्र रूपी महाधनुष ग्रहणकर उसमें ध्यान और उपासनाका तीक्ष्ण बाण संधान और सब इन्द्रियोंको अपने अपने ॥ २ ॥ विषयसे खींचकर तद्गत चित्तसे उस ब्रह्मरूप लक्ष्यको विद्ध करै ॥ ५ ॥ जिस धनुआदिका विषय कहा है वह भली भांति वर्णन करती हूं इस ब्रह्मरूप लक्ष्यवेधमें ॐकार वा देवी प्रणवही धनु है जिसप्रकार लक्ष्यमें बाणप्रवे- शका कारण धनुषही है इसीप्रकार चित्तरूपी लक्ष्यमें प्रवेशसम्बन्धका प्रण वही कारण है प्रणवका अभ्यास करते २ उससे संस्कृत हो प्रणवको अवलम्बनपूर्वक अप्रतिबद्ध भावसे ब्रह्ममें स्थिति कीजाती है, इसमें आत्मा अर्थात् अन्तःकरणही शर है जिस प्रकार शर लक्ष्यको विद्ध करताहै इसीप्रकार अन्तःकरणही आत्माको विद्ध करताहै इसीकारण अन्तःकरणको शर कहागया है इस स्थलमें ब्रह्मही लक्ष्यवस्तु है साधक अप्रमत्त चित्तसे इस लक्ष्यको विद्ध करै तो बाण जिस प्रकार लक्ष्यभेद करके उसके संग एकात्मताको प्राप्त होता है इसीप्रकार साधकभी ब्रह्मके संग एकात्माको प्राप्त होसक्ते हैं ॥ ॥ ६ ॥ वह ब्रह्मपदार्थ अतिदुर्लक्ष्य वस्तु है इससे भलीभांति लक्ष्य करनेको फिर कहा जाता है, जिसमें स्वर्ग, पृथ्वी, अन्तरिक्ष, सब इन्द्रियें और प्राणोंके सहित

१४९ सप्तमस्कंध-अ० ३६. (७५७) मन स्थित है, उसीको आत्मा जानना चाहिये, हे देवताओ ! इसको जानकर अन्य अपर विद्यारूप वाक्योंका त्याग करै यह ब्रह्मज्ञान ही मुक्तिका सेतु अर्थात् संसार सागरसे तारनेका हेतु है ॥ ७ ॥ जिसप्रकार रथकी नाभिमें सब आरे मिलकर सन्नि विष्ट रहते हैं इसीप्रकार जिस हृदयमें नाड़ियें प्रविष्ट हुई हैं उसी हृदयमें बुद्धिवृत्तिका साक्षीरूप आत्मा बुद्धिवृत्तिके द्वारा अनेकरूपयुक्त होकर स्थिति करता है ॥ ८ ॥ ॐकारका अवलम्बन कर यथोक्त प्रकारसे उसी आत्माकी चिन्ता करनी चाहिये संसारसागरके पार जानेकी प्राप्तिमें तुम निर्विघ्न हो यह भगवतीका आशीर्वाद है, तुम अविद्यारहित ब्रह्मस्वरूपको अवगत हो, वह ब्रह्म जिस स्थानमें प्रतिष्ठित है सुनो जो सर्वज्ञ सर्ववित् और जिसके जगत्सृष्टि आदिरूपकी विभूति पृथ्वीमें प्रसिद्ध है, वह प्रकाशशाली आत्मा दिव्य हृदयकमलमें प्रतिष्ठित होनेसे प्राप्त होता है ॥ ९ ॥ उस आत्माकी मनोवृत्तिद्वारा भावना होती है, इसी कारण उसको मनोमय कहते हैं, यही प्राण और शरीरका नेता यही अन्नमय हृदयपिण्डमें बुद्धिको स्थित कर प्रतिष्ठित है, विवेकी पुरुष इसको भलीभांति जानसकते हैं वह आनन्दरूप दुःखसे परे है, अविनाशीरूपसे प्रकाशित होता है ॥ १० ॥ आत्मज्ञानका फल कहती हैं उस परमात्माका साक्षात् कार होनेसे हृदयग्रंथि अर्थात् चैतन्य और अहंकारका तादात्म्यभाव नष्ट होजाता है, समस्त ज्ञेयवस्तु विषयक सन्देह दूर होजाता है प्रारब्ध के अतिरिक्त सब कर्म नष्ट होजाते हैं जब उस परात्परका साक्षात्कार होता है ॥ ॥ ११ ॥ फिर पूर्वोक्त विषयको संक्षेपसे कहती हूं यह ब्रह्म ज्योतिर्मय परकोश अर्थात् आनंदमयकोशमें प्रतिष्ठित है यह सत्त्वादि तीनों गुणरहित निष्फल (मायार- हित) स्वच्छवस्तु है, यह सर्वप्रकाशक सूर्यादिकाभी प्रकाशक है आत्मवित् जिसको बड़े परिश्रमसे जानते हैं वह हिरण्मय परकोशमें स्थित है ॥ १२ ॥ उस ब्रह्मको सूर्य प्रकाश नहीं करसक्ते, चन्द्र तारा बिजली वा अग्निभी उसके प्रकाश करनेमें समर्थ नहीं, बहुत क्या यह सम्पूर्ण जगत् उस स्वप्रकाश आत्मासेही प्रकाशित होता है उससेही यह सब प्रकाशित है ॥ १३ ॥ यह अमृतमय ब्रह्मही आगे पीछे दक्षिण उत्तर नीचे और ऊपर भागमें स्थित है अधिक क्या इस सब जगत्कोही ब्रह्ममय जानना चाहिये ॥१४॥ हे गिरिराज ! जो पुरुष श्रेष्ठ इसप्रकार अनुभव कर सक्ते हैं वही कृतार्थ हैं वह ब्रह्मस्वरूप प्रसन्नस्वभाव होकर शोक और विषयकी कांक्षा रहित होते हैं ॥ १५॥ हे गिरिराज ! द्वैतभावही भयका कारण है द्वैतभाव दूर होनेसे

(७५८) देवीभागवत-भाषा । १५० फिर संसारभय नहीं रहता, मैं अद्वैतभावनिष्ठसे वियुक्त नहीं हूं और वह मुझसे पृथक् नहीं है॥ १६॥ हे पर्वतराज ! यह निश्चय जानो, वह ज्ञानी व्यक्ति मैं हूं, जो मैं हूं सो वह ज्ञानी है, जिस किसी स्थानमें ज्ञानी क्यों न रहै उसी स्थानमें उसको मेरा दर्शन प्राप्त होता है ॥ १७॥ मैं तीर्थ कैलास और वैकुण्ठमें निवास नहीं करती परन्तु जो ज्ञानी मुझमें परायण है उसीके हृदयकमलमें वास करती हूं ॥ १८ ॥ जो कोई मुझमें निष्ठावाले ज्ञानीकी एकवार पूजा करता है उसको मेरी पूजाका कोटिगुण फल होता है, जिसका चित्त चैतन्यस्वरूप ब्रह्ममें लीन हुआ है उसका वंश पवित्र है उसकी माता कृतकृत्य ॥ १९ ॥ और उस पुरुषसे पृथिवी पुण्यशालिनी होती है हे पर्वतराज ! आपने जो मुझसे ब्रह्मज्ञानका विषय पूँछा ॥२०॥ वह मैंने सब कह दिया इस विषयमें अब कुछ कहना नहीं है यह ज्येष्ठपुत्र भक्तिमान् शीलसम्पन्न ॥ २१ ॥ यथोक्त शिष्यसे कहना अन्यसे नहीं कहना जिसकी इष्टदेवमें पराभक्ति होती है और देवताके समान गुरुमें भक्ति होती है ॥ २२ ॥ उसीके निमित्त श्रेष्ठ पुरुष यह ब्रह्मविद्या प्रकाशकरते हैं अर्थात् उसी महात्माको यह विद्या प्रकाशित होतीहै जो इस ब्रह्मविद्याका उपदेश करते हैं वह साक्षात् परमेश्वरस्वरूप हैं॥२३॥ इस विद्या- को प्राप्त होकर शिष्य प्रत्युपकारमें असमर्थ होता है इससे जीवनपर्यन्त गुरुके समीप ऋणी रहता है, जो ब्रह्मरूपमें युक्त करते हैं वह ब्रह्मजन्मदाता गुरु माता पिता सेभी अधिक पूज्य हैं ॥ २४ ॥ पितासे प्रगट होकर जन्म मरण होनेसे नष्ट होते हैं परन्तु ब्रह्मरूप जन्मसे फिर कभी नष्ट नहीं होता, हे पर्वतराज! “तस्मै न द्रुह्येत्कृतमस्य जानन्” इस श्रुतिनेभी कहाहै कि ब्रह्मदाता गुरुका कार्य स्मरण कर कभी उससे द्रोह न करै ॥ २५ ॥ इसकारण शास्त्रके सिद्धान्तअनुसार ब्रह्मदाता गुरु सबसे श्रेष्ठ है। शिवके रुष्ट होनेपर गुरु रक्षक होसक्ताहै पर गुरुके रुष्ट होनेपर शिव कभी उसकी रक्षा नहीं करते ॥ २६ ॥ हे पर्वतराज ! इसकारण काय मन वचनसे सर्वदा यत्नपूर्वक श्रीगुरूको संतुष्ट करै ॥ २७ ॥ अन्यथा वह कृतघ्नी होगा और कृतघ्न पुरुषकी निष्कृति नहीं होती गुरुके वचन उल्लंघन करनेसे क्या दशा होती है सो कहते हैं दध्यङ्नामक आथर्वण मुनिने इन्द्रसे प्रार्थना की कि आप मुझे ब्रह्मविद्या दीजिये इन्द्रने कहा विद्या तो दूंगा पर यदि आप अन्य किसीको यह विद्या दोगे तो मैं तुम्हारा मस्तक छेदन करूंगा उनके स्वीकारकरनेपर इन्द्रने ब्रह्मविद्या दी ॥ २८ ॥ तब कुछ काल उपरान्त दोनों अश्विनीकुमारोंने मुनिके पास आय विद्याकी प्रार्थना की

१६१ सप्तमस्कंध-अ० ३७. (७५९) मुनिने कहा विद्या देनेसे इन्द्र मेरा मस्तक छेदन करेगा तब अश्विनीकुमार बोले हम आपका यह मस्तक छेदनकर आपके देहमें अश्वका मस्तक लगाये देते हैं उस मस्तकसे आप हमको विद्या उपदेश कीजिये, जब इन्द्र आपका यह मस्तक छेदन करेगा तब हम आपका पूर्वशिर संयुक्त करदेंगे मुनिने सम्मत हो उनको ब्रह्मविद्याका उपदेश किया तब इन्द्रने आकर उनका वह मस्तक छेदन किया, तब अश्विनीकुमारोंने ॥२९॥ उनका मुख्य शिर जोडकर फिर उनके मुख्य शिरसे ब्रह्मविद्या सुनी यह कथा श्रुतिसिद्ध है इस प्रकार संकटसे प्राप्त होनेवाली विद्याको जिसने प्राप्त किया. हे पर्वतराज ! वह धन्य और कृत कृत्य हैं ॥ ३० ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणे सप्तमस्कन्धे भाषायां षट्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३६ ॥ ॥ सप्तत्रिंशोऽध्यायः ३७.॥ हिमालय बोले हे मातः ! अधिरागी मध्यम अधिकारी पुरुषको जिस प्रकार सुख पूर्वक ज्ञानलाभ होसके इस समय आप वही अपना भक्तियोग कहो ॥ १ ॥ देवीने कहा हे नगेन्द्र ! मुक्ति प्राप्तिके निमित्त तीन मार्ग हैं कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्ति योग ॥ २ ॥ इन तीनोंमें भक्तियोगही सहजमें सिद्ध होता है कारण कि, यह योग द्रव्यव्यय और शरीरकी पीडाके विना केवल मनकी वृत्तिसेही संपादित होता है, इससे सुलभ है ॥ ३ ॥ सत्व, रज, तम इन तीन प्रकारके गुणभेदसे मनुष्यकी भक्ति सात्विकी राजसी और तामसी ऐसी तीन प्रकारकी होती है जो दम्भप्रकाशपूर्वक दूसरेको पीडा देनेके निमित्त ॥ ४ ॥ मात्सर्य और क्रोधादियुक्त होकर उपासना करताहै उसकी तामसी भक्ति है और जो परपीडादिसे रहित हो अपने कल्याणके निमित्तही ॥ ५ ॥ सकाम भावसे यश और भोगमें लोलुप हो अतिभक्तिसे उस उस फलप्रा- प्तिक निमित्त अत्यन्त भक्तिसे उपासना करते हैं ॥ ६ ॥ और अपनी अज्ञतासे हुई भेदबुद्धिद्वारा मुझे अपनेसे अन्य जानते हैं हे नगाधिप ! उस पामरकी भक्ति राजसी है ॥ ७ ॥ परमात्माको अर्पण किये कर्मही पापनाश करनेमें समर्थ होते हैं वह वेदोक्त कर्म दिन रात मुझे अवश्य कर्तव्य हैं ॥ ८ ॥ इसप्रकार निश्चय कर जो भेदबुद्धिसे मेरी प्रसन्नताके निमित्त नित्यकर्मानुष्ठान करताहै हे पर्वतराज ! उसकी सात्विकी भक्ति हैं ॥ ९ ॥ यह सात्विकी भक्ति परम प्रेमरूपा और पराभक्तिकी प्राप्तिका है किन्तु यह स्वयही परा भक्ति नहीं है कारण कि, इसमें भेदबुद्धि वर्तमान रहती है

(७६०) देवीभागवत-भाषा । ५६२

परन्तु राजसी और तामसी भक्ति पराभक्तिकी प्राप्तिका नहीं इससे तामसी और राजसी भक्तिका त्यागकरके इसकाही आश्रय करै ॥ १० ॥ हे नगेन्द्र ! अब मैं पराभक्तिको वर्णन करतीहूं तुम सुनो जो कोई सदा मेरे गुणश्रवण और सदा मेरे नामको कीर्तन करताहै ॥ ११ ॥ जिसका मन कल्याण और गुण रत्नका आकर मुझमेंही तेलधाराके समान अविच्छिन्नभावसे सदा स्थित रहता है ॥ १२ ॥ और उसमें किसी फलके हेतु व किसी फलकी आकांक्षा नहीं करता तथा सामीप्य, सार्ष्टि सायुज्य और सालोक्य मुक्तिकी भी कामना नहीं करता ॥ १३ ॥ और जो प्राणी मेरी सेवासे अधिक और कुछ नहीं जानता, जो सेव्य- सेवकभाव त्यागकर मोक्षकी भी आकांक्षा नहीं करता ॥ १४ ॥ जो जितेन्द्रिय हो परानुरक्तिपूर्वक मेरीही आकांक्षा करता है और मुझको अपनेसे पृथक् न करके मैंही सच्चिदानंदरूप हूं ऐसा जानता है ॥ १५ ॥ और जो सब जीवोंमें मेराही रूप जानता है अपने परायेमें समान प्रीतियुक्त है ॥ १६ ॥ जो चैतन्यके समानत्वसे सर्वत्र विद्यमान् सर्वस्वरूपिणी मेरे सहित सदा सब जीवोंका अभिन्नत्व जानता है ॥ १७ ॥ हे नगेश्वर ! जो भेद बुद्धि त्यागके कारण चण्डालपर्यन्त सब जीवोंको नमस्कार और सत्कार करता है और भेदवर्जनसे कहीं भी जिसकी द्रोहबुद्धि नहीं है ॥ १८ ॥ जो मेरा मेरे भक्तोंका दर्शन मेरा शास्त्रश्रवण और मेरे मंत्रादिविषयमें श्रद्धायुक्त है ॥ १९ ॥ मेरेहीमें प्रेमसे आकुलमति हो मेरी कथामात्र सुननेसे रोमांचित शरीर होता है प्रेमके आंसुओंसे जिसके नेत्र पूर्ण और गद्गद कण्ठ होता है ॥२०॥ हे नगेश्वर! जो अनन्यभावसे जगत्‌की योनि सर्व कारणोंकी कारण मुझ परमेश्वरीकी पूजा करता है॥२१॥जो भक्तिपूर्वक कृपणता त्याग मेरे नित्य नैमित्तिक के दिव्यव्रत करता है ॥२२॥ जिसको स्वभावसे ही मेरे उत्सव करने और देखनेकी इच्छा रहती है हे भूधर ! ॥२३॥ जो मेरे नाम ऊंचे स्वरसे लेकर गाते और नृत्य करते हैं जो अहंकार और देहके तादात्म्यभावसे रहित हैं ॥ २४ ॥ जो कोई यह समस्त ही प्रारब्धकर्मानुसार होता हैं यह जानकर मेरे ध्यानके अतिरिक्त देहरक्षादि विषयमेंभी चिन्ता नहीं करते ॥ २५ ॥ उन पुरुषोंकी यह भक्ति परा भक्ति कहाती है, जिसमें देवीविचारके अतिरिक्त अन्य किसी विषयकी चिन्ता नहीं रहती ॥ ॥ २६ ॥ हे पर्वतराज ! इसप्रकार तत्त्वसे जिसको पराभक्ति प्राप्त हुई है वह तत्काल ही मेरे चिद्रूपमें लीन हो जाता है ॥ २७ ॥ जिस ज्ञानसे भक्ति और

१५३ सप्तमस्कंध-अ० ३७. (७६१) ज्ञानकी पूर्णता होती है इस कारण वैराग्य और भक्तिकी पराकाष्ठाकाही नाम ज्ञान है ज्ञानमें यह दोनों ही हैं ॥ २८ ॥ हे पर्वतराज ! जो भक्तिकरकेभी प्रारब्धवश मेरे ज्ञानके अधिकारी नहीं होते वह मणिद्वीपमें गमनकरते हैं॥ २९॥हे पर्वतराज! वहां जाकर इच्छा न करनेसे भी अनेक भोगोंकी प्राप्ति होती है, उसके अन्तमें मेरा चिद्रूप ज्ञानलाभ करके ॥ ३० ॥ उस ज्ञानसे मुक्त होजाता है.कारण कि,ज्ञानके विना मुक्ति नहीं होती यहां जिसको संवित् स्वरूप हृदयमें प्राप्त प्रत्यगात्माका ज्ञान होता है ॥ ३१॥तो मेरे संवित् रूपका ज्ञान होनेसे उसके प्राण उत्क्रान्त नहीं होते इस शरीरमेंही लय होजाते हैं “न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति” इतिश्रुतेः उसका ब्रह्मके साथ अभेद होता है “ब्रह्मविद्ब्रह्मैव भवति” इति श्रुतेः ॥ ३२ ॥ जिस प्रकार कंठमें स्थित सुवर्णका भ्रमवश नष्ट होना जानाजाता है और भ्रमके नष्ट होनेसे प्राप्त वस्तुकीही प्राप्ति मानी जाती है ॥ ३३ ॥ हे नगसत्तम ! मेरे चिद्रूपतनुविहित घटादिकार्य अविदित माया- रूपसे भिन्न हैं जिसप्रकार दर्पणमें प्रतिबिम्ब पडता है इसीप्रकार इस देहमें आत्माका अनुभव होता है और जिसप्रकार जलमें प्रतिबिम्ब पूर्वकी अपेक्षा विविक्तरूपसे प्रकाशित होता है इसीप्रकारसे पितृलोकमें देहसे विविक्तभावमें आत्माका अनुभव होता है ॥ ३४ ॥ जैसे छाया और आतपका भेद प्रकाशस्वरूपसे स्वच्छरूपसे दीखता है इसीप्रकार मणिद्वीपमें द्वैतभाववर्जित ज्ञान होता है ॥ ॥ ३५ ॥ जो वैराग्यवान् होकर पूर्णज्ञान प्राप्त हुये विना प्राणत्याग करते हैं वह प्रलयपर्यन्त ब्रह्मलोकमें निवास करके ॥ ३६ ॥ फिर पवित्र श्रीमान् पुरुषोंके घर जन्म ग्रहणकर साधन करने उपरान्त फिर ज्ञानलाभ करते हैं ॥ ३७ ॥ हे राजन् ! एक जन्ममें नहीं अनेक जन्मोंमें ज्ञान होता है इसकारण सब प्रयत्नसे ज्ञानको आश्रय करै ॥ ३८ ॥ यदि मनुष्यजन्म प्राप्त होकर ज्ञानलाभ न किया तो विनाश होगा. कारण कि, मनुष्यजन्म बड़ा दुर्लभ है उसमें भी ब्राह्मण और उसमें भी वेदप्राप्ति बहुतहीं दुर्लभ है ॥ ३९ ॥ शम, दम, उपरति, तितिक्षा, समाधान, और श्रद्धा यह षट्सम्पत्ति, योगसिद्धि और उत्तम गुरुकी प्राप्ति यह इस लोकमें बडी दुर्लभ है ॥ ४० ॥ इन्द्रियोंकी पटुता शरीरका संस्कार और अनेक जन्मोंके पुण्योदयसे मोक्षमें इच्छा होती है ॥ ४१ ॥ जो मनुष्य साधनसे सफल होनेवाले इस शरीरको प्राप्त करके ज्ञानके निमित्त यत्न नहीं करता उसका जन्म निरर्थक है ॥ ४२ ॥ हे राजन् ! इसकारण यथाशक्ति ज्ञानप्राप्तिके निमित्त यत्न करें तो

३. अध्याय ७-१०: पराभक्ति, देवी-पूजन विधि व मोक्ष-निरूपण

( ७६२ ) देवीभागवत-भाषा । १६४

अवश्य उसको पदपदमें अश्वमेधका फल प्राप्त होता है ॥ ४३ ॥ जैसे दूधमें घृत निमग्न है इसीप्रकार सब भूतोंमें ज्ञान निवास करता है, उसकी मंथानभूत मनसे सदा मथना चाहिये ॥ ४४ ॥ ज्ञानको प्राप्त होकरही यह प्राणी कृतार्थ होता है यह वेदान्तकी घोषणा है यह संक्षेपसे आपके प्रति सब वर्णन किया अब क्या सुननेकी इच्छा है ॥ ४५ ॥ इति श्री देवीभागवते महापुराणे सप्तमस्कन्धे भाषायां सप्तत्रिंशोऽध्याय ॥ ३७ ॥

अष्टत्रिंशोऽध्यायः ३८. हिमालय बोले हे देवि ! इस पृथ्वीमें तुम्हारे मुख्य और प्रिय कितने स्थान हैं सो तुम मुझसे कहो ॥ १ ॥ हे मातः ! जिन सब व्रत और उत्सवका अनुष्ठान करनेसे मनुष्य कृतकृत्य होते हैं अपने प्रीतिदायक उन सब व्रत और उत्सवका वर्णन कीजिये ॥ २ ॥ श्रीदेवी बोलीं हे पर्वतराज ! मैं सर्वाधिष्ठानस्वरूपिणी हूं इसकारण भूमण्डलमें जितने स्थान विद्यमान हैं वह सबही मेरी अधिष्ठान भूमि है और मैं सब कालमयी हूं इसकारण सब कालही मेरा व्रत और उत्सवात्मक है. इस कारण जिस समय जिसका अनुष्ठान करै उसकोही मेरी प्रीतिप्रद जाने ॥ ३ ॥ पर तथापि भक्तव- त्सलतासे कुछ तुमसे कहती हूं. हे नगराज ! वह सावधान होकर मुझसे सुनो ॥ ४ ॥ दक्षिणदेशमें कोलापुर ( करवीर ) स्थानमें लक्ष्मीनामसे सदा स्थित हूं सह्यनाम पर्वतमें मातृपुरस्थानमें रेणुकारूपसे निवास करती हूं ॥ ५ ॥ तुलजापुर और सप्तशृंग स्थानमें हिंगुला और ज्वालामुखी निवासकरती हैं ॥ ६ ॥ यह शाकम्भरी, भ्रामरी, श्रीरक्तदन्तिका और दुर्गाका स्थान है ॥ ७ ॥ विन्ध्याचल निवासि- नीका सर्वोत्तम स्थान है, कांचीपुरमें अन्नपूर्णाका महास्थान ॥ ८ ॥ यही पुर भीम देवी विमला श्रीचन्द्रकला और कौशिकीका महास्थान है ॥ ९ ॥ नीलपर्वतके शृंगमें नीलाम्बरीका परमस्थान और सुन्दर श्रीनगरको जाम्बूनदेश्वरीका परम स्थान जानो ॥ १० ॥ नेपालमें गुह्यकालीका उत्कृष्ट स्थान है. चिदम्बरदेशमें मीनाक्षीका परमस्थान है ॥ ११ ॥ वेदारण्यक महास्थानमें सुन्दरी देवी, एकाम्बर महास्थानमें पराशक्ति स्थित रहतीहै ॥ १२ ॥ महालसा, योगेश्वरी और नीलसर स्वतीका स्थान चीनदेशमें है ॥ १३ ॥ वैद्यनाथमें बगलाका सर्वोत्तमस्थान है मणि- द्वीपमें मुझ भुवनेश्वरीका परम स्थान है ॥ १४ ॥ जिस कामरूपदेशमें सतीका

१६५ सप्तमस्कन्ध-अ० ३८. (७६३) योनिमंडल गिराहै, वह कामाख्या योनिमंडल त्रिपुरभैरवीका महास्थान है भूमण्डलमें यह क्षेत्ररत्न है इसकारण ऐसा दूसरा स्थान नहीं है ॥ १५ ॥ इससे अधिक पृथ्वीमें ऐसा कोई स्थान नहीं है इस स्थानमें महामाया प्रत्येक मासमें रजस्वला होती है ॥ १६ ॥ यहांके सब देवता पर्वतभावको प्राप्त हो वहां निवास करते हैं ॥ १७ ॥ वहांकी सब पृथिवी देवीरूप है ऐसा पंडित कहते हैं. इस कामाख्या योनि- मण्डलसे श्रेष्ठ दूसरा स्थान नहीं है ॥ १८ ॥ पुष्करक्षेत्र गायत्रीका परम स्थान है अमरेशमें चण्डिका और प्रभासमें पुष्करेक्षिणी निवास करती हैं ॥ १९ ॥ नैमिषमहा- स्थानमें लिंगधारिणी देवी, पुष्कराक्षमें पुरहूता और आषाढी स्थानमें रति निवास करतीहैं॥ २०॥ चण्डमुण्डके महास्थानमें दण्डिनी, परमेश्वरी, भारभूतिस्थानमें भूति नकुलस्थानमें नकुलेश्वरी निवासकरतीहैं॥ २१॥ हरिश्चन्द्रस्थानमें चन्द्रिका, श्रीपर्वतमें शांकरी जप्येश्वरमें त्रिशुला और आम्रातकेश्वरमें सूक्ष्मा निवास करती हैं ॥ २२ ॥ उज्जैनीमें शांकरी मध्यमेेश्वरमें शर्वाणी केदार महाक्षेत्रमें प्रसिद्धमार्गदायिनी ॥ २३ ॥ भैरवस्थानमें भैरवी गयामें मंगला कुरुक्षेत्रमें स्थाणुप्रिया नाकुलमें स्वाय- म्भुवी ॥ २४ ॥ कनखलमें उग्रा विमलेश्वरमें विश्वेशा अट्टहासमें महानन्दा महेन्द्र पर्वतमें महान्तका ॥ २५ ॥ भीम स्थानमें भीमेश्वरी वस्त्रापथमें भवानी शांकरी अर्धकोटिस्थानमें रुद्राणी ॥ २६ ॥ अविमुक्त स्थानमें विशालाक्षी महालयमें महाभागा गोकर्णमें भद्रकर्णी भद्रकर्णमें भद्रा ॥ २७ ॥ सुवर्णारूप्य स्थानमें उत्पलाक्षी स्थाणुस्थानमें स्थाण्वीशा, कमलालयेमें कमला छगलंडस्थान [ दक्षिण देशमें समु- द्रके निकट है ] में प्रचण्डा ॥ २८ ॥ कुरण्डमें त्रिसंध्या माकोटमें मुकुटेश्वरी मण्डलेशमें शाण्डकी कालंजरेमें काली ॥ २९ ॥ शंकुकर्णमें ध्वनि स्थूलकेश्वरमें स्थूला और ज्ञानियोंके हृदयकमलमें परमेश्वरी देवी हृल्लेखा प्राणशक्ति रूपसे निवास करती हैं ॥ ३० ॥ हे नगेश्वर ! यह सब स्थान देवीके प्रिय हैं उन उनक्षेत्रोंका माहात्म्य सुनकर ॥ ३१ ॥ उसमें कहीं विधिके अनुसार देवीकी पूजा कर. हे नगोत्तम ! अथवा सब पुण्यक्षेत्र काशीमें विद्यमान हैं ॥ ३२ ॥ देवीकी भक्तिमें तत्पर मनुष्य नित्य काशीमें निवास करै उन स्थानोंको देख- ताहुआ निरन्तर देवीका जप करै ॥ ३३ ॥ और भगवतीके चरणकमलका ध्यान करताहुआ भवबंधनसे छूटजाता है. यह देवीके नाम जो प्रभातकाल उठकर पढताहै ॥ ३४ ॥ हे नगसत्तम ! उसीसमय उसके पाप नष्ट होजाते हैं और ब्राह्मणोंके समीप श्राद्धकालमें जो निर्मल नाम पढता है ॥ ३५ ॥ उसके सब पितर मुक्त होकर पर-

गतिको प्राप्त होते हैं. हे सुव्रत ! अब तुमसे व्रतोंको कहती हूं ॥ ३६॥ नरनारियोंको यत्नपूर्वक व्रतानुष्ठान करना चाहिये अनन्तर तृतीयाव्रत, रसकल्याणीव्रत ॥ ३७॥ आर्द्रानन्दकरव्रत यह तृतीयाके व्रत हैं शुक्रवारका व्रत कृष्णचतुर्दशीका व्रत ॥ ३८ ॥ भौमवारव्रत प्रदोषव्रतं यह चारप्रकारके व्रत हैं इन व्रत और प्रदोषसमय देवदेव महादेव देवीको आसनमें बैठाय ॥ ३९ ॥ देवताओंके सहित देवीके सन्मुख नृत्य करतेहैं इन व्रतोंमें उपवास कर प्रदोषके समय मंगलमयी शिवाका पूजन करें ॥ ४० ॥ और जो प्रति पखवारेमें ऐसा करताहै उसपर देवी अधिक प्रसन्न होतीहै हे नग ! सोमवारका व्रत मुझको अतिप्रिय है ॥ ४१ ॥ उसमेंभी देवीको पूजनकर रात्रिमें भोजन करें दोनों नवरात्रियोंमें व्रत मेरा प्रसन्न करनेवाला है ॥ ४२ ॥ इस- प्रकारसे और भी जो मत्सर हीन होकर मेरी प्रीतिके निमित्त नित्यनैमित्तिक व्रत करता है वह वे उपांगकलितादि व्रत हैं ॥ ४३ ॥ इनके करनेसे मेरी सायुज्य मिलती है वह मेरा भक्त और मुझे प्रियहै फिर चैत्र शुक्ल तीजको दोला उत्सव करै शंकर सहित देवीकी कुंकुम, अगर, कपूर, मणि, वस्त्र, सुगंध, माला, धूप, दीपादिसे पूजाकर झुलावै इत्यादि और भी उत्सव करें ॥ ४४ ॥ आषाढपूर्णिमाको शयनोत्सव वा इसके आगेकी तीज कार्त्तिक पूर्णिमाको जागरणोत्सव, आषाढ शुक्लतृतीयाको रथोत्सव करै इसमें पृथ्वीको रथ, चन्द्रसूर्य्यको चक्र वेदोंको अश्व ब्रह्माको सारथि माने अनेक मणियोंसे जटिल फूलमालायुक्त रथकी कल्पना कर उसमें शिवाको बैठावै और लोकोंकी रक्षा तथा लोकोंके देखनेको अम्बा रथपर चढी हैं यह भावना करे रथके चलनेमें शत २ जय शब्द करै. हे भगवती ! हम दीन जनोंकी रक्षा करो. इसप्रकार स्तोत्र पढ बाजे बजाय सीमाके समीप रथ लेजाय पूजा करै. फिर घर लावै उमा संहिता (शिवपुराण) में यह कथा वर्णन की है. चैत्रपूर्णिमामें दमनोत्सव ॥ ४५ ॥ श्रावणपूर्णिमाको पवित्रोत्सव मेरा प्रियकारक है, इसप्रकार मेरे भक्त दूसरे उत्सवोंकोभी सदा करें ॥ ४६ ॥ प्रीतिसे मेरे भक्त सुवासिनी कुमारी और बटुकोंको मेरा स्वरूप जानकर तद्गतचित्त हो भोजन करावे ॥ ४७ ॥ वित्तशाठ्य कृपणता छोडकर कुसुमादिद्वारा इनकी पूजा करै जो सावधान हो प्रतिवर्ष भक्तिसे ऐसा करता है ॥ ४८ ॥ वह धन्य कृतकृत्य और मेरी प्रीतिका पात्र है इसमें सन्देह नहीं. यह अपनी प्रियकर वस्तुओंका संक्षेपसे वर्णन किया ॥ ४९ ॥ यह वार्त्ता अशेष्य और अभक्तको कभी न देनी चाहिये ॥ ५० ॥ इति श्रीदेवीभागवते महापुराणे सप्तमस्कंधे भाषायां अष्टत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३८ ॥