गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| काण्ड ] | भीष्मपञ्चकव्रत | २२१ |
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मासोपवासव्रतका निरूपण
**ब्रह्माजीने पुनः कहा—**अब मैं आपसे मासोपवास नामक उस सर्वोत्तम व्रतका वर्णन करूँगा, जिसका पालन वानप्रस्थ, संन्यासी और नारीको करना चाहिये।
आश्विनमासके शुक्लपक्षकी एकादशी तिथिमें उपवास रखकर तीस दिनपर्यन्त इस व्रतको धारण करनेका विधान है। व्रतारम्भके समय सर्वप्रथम भगवान् विष्णुसे इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये—
अद्यप्रभृत्यहं विष्णो यावदुत्थानकं तव।
अर्चये त्वामनश्नंस्तु दिनानि त्रिंशदेव तु॥
कार्तिकाश्विनयोर्विष्णो द्वादश्योः शुक्लयोरहम्।
म्रिये यद्यन्तराले तु व्रतभङ्गो न मे भवेत्॥
(१२२। ३-४)
हे विष्णो! आजसे लेकर जबतक आपका शयनोत्थान नहीं हो जाता है, तबतक तीस दिनपर्यन्त बिना भोजन किये ही मैं आपका पूजन करता रहूँगा। हे विष्णो! यदि मैं आश्विन और कार्तिकमासके शुक्लपक्षमें द्वादशीसे लेकर दूसरी द्वादशी तिथिके मध्य मर जाता हूँ तो मेरा यह व्रत भंग न हो।
इस प्रकार प्रार्थना करनेके पश्चात् प्रातः, मध्याह्न तथा संध्याकालमें स्नान करके उपासक गन्धादिसे भगवान् हरिका देवालयमें पूजन करे, किंतु व्रतीको शरीरमें उबटन तथा सुगन्धित गन्धलेप आदि नहीं करना चाहिये।
द्वादशी तिथिमें भगवान् हरिकी पूजा करके व्रती ब्राह्मणोंको भोजन कराये। एक मासतक हरिका व्रत करनेके पश्चात् व्रती पारणा करे। यदि व्रतधारी इस अवधिके मध्य मूर्च्छित हो जाता है तो उसे दुग्धादिका प्राशन कर लेना चाहिये; क्योंकि दुग्धादिका पान करनेसे व्रत विनष्ट नहीं होता। इस प्रकार मासव्रत करनेसे भुक्ति और मुक्ति दोनों प्राप्त होती हैं। (अध्याय १२२)
भीष्मपञ्चकव्रत
**ब्रह्माजीने कहा—**अब मैं कार्तिकमासमें होनेवाले व्रतोंको कहूँगा। इस मासमें स्नान करके व्रतीको भगवान् विष्णुकी पूजा करनी चाहिये। व्रती एक मासतक एकभक्तव्रत कर, नक्तव्रत कर, अयाचितव्रत कर, दुग्ध, फल, शाक आदिका आहार कर अथवा उपवास कर भगवान् विष्णुकी पूजा करे। ऐसा करनेसे वह व्रती सभी पापोंसे मुक्त होकर समस्त कामनाओंके साथ-साथ भगवान् हरिको प्राप्त कर लेता है।
भगवान् हरिका व्रत करना सदैव श्रेष्ठ है, किंतु सूर्यके दक्षिणायनमें चले जानेपर यह व्रत अधिक प्रशस्त होता है। उसके बाद इस व्रतका काल चातुर्मासमें श्रेयस्कर है। तदनन्तर इस व्रतका उचित काल कार्तिकमास है। इसके बाद भीष्मपञ्चक इस व्रतके लिये श्रेष्ठ समय है किंतु कार्तिकमासके शुक्लपक्षकी एकादशी तिथि इस व्रतके शुभारम्भके लिये सर्वश्रेष्ठ काल होता है। अतः इसी तिथिसे इस व्रतका शुभारम्भ करना चाहिये। उपासक इस दिन प्रातः, मध्याह्न एवं सायंकालीन—इन तीनों सन्ध्याओंमें स्नान कर यवादि पदार्थोंसे पितृगण आदिकी नैत्यिक पूजा करनेके पश्चात् भगवान् हरिका पूजन करे। वह मौन होकर घृत, मधु, शर्करादि तथा पञ्चगव्य एवं जलसे हरिकी मूर्तिको स्नान कराये और कर्पूरादि सुगन्धित द्रव्यसे श्रीहरिके शरीरका अनुलेपन करे।
तदनन्तर व्रतीको घृतसमन्वित गुग्गुलसे पूर्णिमापर्यन्त पाँच दिनोंतक श्रीहरिको धूप देना चाहिये और सुन्दर-सुन्दर पक्वान्न तथा मिष्टान्नका
१११-षष्ठी तथा सप्तमीके विविध व्रत
२२२ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-
नैवेद्य अर्पितकर 'ॐ नमो वासुदेवाय' इस मन्त्रका एक सौ आठ बार जप करना चाहिये।
तत्पश्चात् स्वाहायुक्त अष्टाक्षर-मन्त्र (ॐ नमो वासुदेवाय)-से घृतसहित चावल तथा तिलकी आहुति प्रदान करनी चाहिये।
व्रती पहले दिन कमलपुष्पसे भगवान् हरिके दोनों चरणोंका पूजन करे। दूसरे दिन बिल्वपत्रसे उनके जानु (जंघा)-प्रदेशकी पूजाकर तीसरे दिन गन्धसे नाभिदेशकी पूजा करे। चौथे दिन बिल्वपत्र तथा जवापुष्पसे उनके स्कन्धभागका पूजन करके पाँचवें दिन मालतीके पुष्पोंसे उनके शिरोभागका पूजन करना चाहिये। व्रती भूमिपर ही शयन करे और उक्त पाँच दिनोंतक क्रमशः पहले दिन गोमय, दूसरे दिन गोमूत्र, तीसरे दिन दही, चौथे दिन दुग्ध और पाँचवें दिन घृत—इन पाँचों पदार्थोंसे निर्मित पञ्चगव्यका प्राशन रात्रिमें करे। ऐसा व्रत करनेवाला व्रती भोग और मोक्ष दोनोंका अधिकारी हो जाता है।
कृष्ण एवं शुक्ल दोनों पक्षोंकी एकादशीका व्रत हमेशा करना चाहिये। यह व्रत उस समस्त पापसमूहका विनाश करता है, जो प्राणीको नरक देनेवाला है। यह व्रतीको सभी अभीष्ट फल प्रदान करता है और अन्त समयमें उसे विष्णुलोक भी दे देता है।
पहले दिन शुद्ध एकादशी, दूसरे दिन शुद्ध द्वादशी तथा द्वादशीकी निशा (रात्रि)-के अन्तमें अर्थात् तीसरे दिन त्रयोदशी हो तो ऐसी एकादशी तिथिमें सदा श्रीहरिका संनिधान रहता है। यदि दशमी और एकादशी तिथि एक ही दिन होती है तो इसमें असुरोंका निवास रहता है। अतः यह एकादशी व्रतके लिये उपयुक्त नहीं मानी जाती। एकादशीको उपवासकर द्वादशीमें पारणा करनी चाहिये। सूतक (वंशमें किसीकी उत्पत्ति) और मृतक (वंशमें किसीके मरण)-की स्थितिसे होनेवाले अशौचकालमें भी यह व्रत करना चाहिये।
हे मुने! यदि चतुर्दशी और प्रतिपदा तिथि पूर्व तिथिसे विद्ध है तो इन तिथियोंमें भी उपवास करना चाहिये।
प्रतिपदासे मिश्रित पौर्णमासी और अमावास्या तिथि, तृतीयासे मिश्रित द्वितीया तिथि, चतुर्थीसे संगत तृतीया तिथि, तृतीयासे युक्त चतुर्थी तिथिको उपवास करे। षष्ठीसे असंयुक्त पञ्चमी तिथि और षष्ठीसे युक्त सप्तमी तिथिको उपवास किया जाना चाहिये। (अध्याय १२३)
शिवरात्रिव्रतकथा तथा व्रत-विधान
**ब्रह्माजीने कहा—**अब मैं शिवरात्रिव्रत और उस कथाका वर्णन करूँगा, जो व्रत करनेवालोंकी समस्त अभीष्ट कामनाओंको पूर्ण करनेमें समर्थ है। जैसे पूर्वकालमें पार्वती ने भगवान् महेश्वर शिवसे इस परमश्रेष्ठ व्रतको सुननेकी इच्छा की थी और सुना था, वैसे ही आप भी सुनें।
**भगवान् महेश्वरने कहा—**हे गौरि! माघ और फाल्गुन-मासके मध्यमें जो कृष्णा चतुर्दशी होती है, उस चतुर्दशी तिथिमें उपवास तथा जागरण करनेसे और भगवान् रुद्रकी पूजा करनेसे पूजित रुद्र भुक्ति और मुक्ति दोनों प्रदान करते हैं। जिस प्रकार द्वादशी तिथिको विष्णुकी पूजा होती है, उसी प्रकार कामनासे युक्त होकर इस चतुर्दशी तिथिमें महादेव हरकी पूजा करनी चाहिये। उपवाससहित विधि-विधानसे पूजित शिव विष्णुके समान भक्तको नरकभोगसे बचाते हैं। शिवरात्रिव्रतकी कथा इस प्रकार है—
बहुत पहले अर्बुद देशमें एक सुन्दरसेन नामक
काण्ड ] शिवरात्रिव्रतकथा तथा व्रत-विधान २२३
पापात्मा निषाद राजा रहता था। वह एक बार अपने कुत्तोंको साथ लेकर आखेट करनेके लिये वनमें गया, किंतु दैववशात् उस पर्वतीय वनप्रान्तमें उसको कोई भी मृगादि जीव आखेटरूपमें प्राप्त नहीं हो सका। भूख-प्याससे पीड़ित वह रात्रिमें जलाशय और तडागोंके तटपर अवस्थित वृक्ष-लताओंके झुरमुटोंमें भटकता हुआ जागता ही रह गया। वहींपर उसे एक शिवलिंगका दर्शन हुआ। अतः उसने अपने शरीरकी रक्षाके लिये एक वृक्षकी शरण ली और निढाल होकर वहीं गिर गया, किंतु उसकी जानकारीके बिना शिवलिंगपर वृक्षके पत्ते गिर पड़े। उसने उन पत्तोंको हटाकर जलसे उस शिवलिंगके ऊपर स्थित धूलिको दूर करनेके लिये शिवलिंगको प्रक्षालित किया। प्रमादवश उसी समय शिवलिंगके पास ही उसके हाथसे एक बाण छूटकर भूमिपर गिर गया। अतः घुटनोंको भूमिपर टेककर एक हाथसे शिवलिंगको स्पर्श करते हुए उसने उस बाणको उठा लिया। इस प्रकार उस व्याधके द्वारा रात्रि-जागरण, शिवलिंगका स्नान, स्पर्श और पूजन भी हो गया।
प्रातःकाल होनेपर वह व्याध अपने घर चला गया और पत्नीके द्वारा दिये गये भोजनको ग्रहणकर क्षुधासे निवृत्त हुआ। यथोचित समयपर उसकी मृत्यु हुई तो यमराजके दूत उसको पाशमें बाँधकर जब यमलोक ले जाने लगे, तब मेरे गणोंने उन यमदूतोंको युद्धमें जीतकर व्याधको उसके पाशसे मुक्त करा दिया। अतः अपने कुत्तोंके साथ निष्पाप होकर वह व्याध मेरा पार्षद बन गया।
इस प्रकार प्राणीके द्वारा अज्ञानवश अथवा ज्ञानपूर्वक किये गये पुण्य अक्षय ही होते हैं। उपासकको चाहिये कि त्रयोदशी तिथिमें शिवका पूजन करे तथा व्रतका नियम ग्रहण करते हुए इस प्रकार प्रार्थना करे—
प्रातर्देव चतुर्दश्यां जागरिष्याम्यहं निशि।
पूजां दानं तपो होमं करिष्याम्यात्मशक्तितः॥
चतुर्दश्यां निराहारो भूत्वा शम्भो परेऽहनि।
भोक्ष्येऽहं भुक्तिमुक्त्यर्थं शरणं मे भवेश्वर॥
(१२४।१२-१३)
हे देव! मैं रात्रिभर जागरण करूँगा। प्रातः चतुर्दशी तिथिमें यथासामर्थ्य आपकी पूजा, दान और हवन भी करूँगा। हे शम्भो! चतुर्दशी तिथिमें निराहार रहकर दूसरे दिन भोजन करूँगा। हे महादेव! भुक्ति और मुक्तिकी प्राप्तिके लिये मैं आपकी शरणमें हूँ।
व्रतीको पञ्चामृतसे महादेवको स्नान कराकर 'ॐ नमो नमः शिवाय' इस मन्त्रसे उनकी पूजा करनी चाहिये। तदनन्तर घृतसमन्वित तिल, तण्डुल एवं व्रीहिसे निर्मित चरुकी आहुति अग्निमें देकर पूर्णाहुति करे। व्रती गीतवाद्यके साथ सत्कथाओंका श्रवण करे। उसके बाद वह अर्धरात्रि, तीसरे प्रहर और चौथे प्रहरमें पुनः उनकी पूजाकर मूलमन्त्रका जप करे। तत्पश्चात् प्रातःकाल आ जानेपर उनके सामने इस प्रकार क्षमा-प्रार्थना करे—
अविघ्नेन व्रतं देव त्वत्प्रसादान्मयार्चितम्।
क्षमस्व जगतां नाथ त्रैलोक्याधिपते हर॥
यन्मयाद्य कृतं पुण्यं यद्द्रव्यस्य निवेदितम्।
त्वत्प्रसादान्मया देव व्रतमद्य समापितम्॥
प्रसन्नो भव मे श्रीमन् गृहं प्रति च गम्यताम्।
त्वदालोकनमात्रेण पवित्रोऽस्मि न संशयः॥
(१२४।१७-१९)
हे देव! हे नाथ! हे त्रैलोक्याधिपति स्वामिन् शिव! आपकी कृपासे मैं व्रतको निर्विघ्न सम्पन्न कर सका हूँ और आपकी यह पूजा भी पूर्ण हो सकी है। आप मुझे क्षमा करें। हे देव! मैंने जो कुछ आज पुण्य किया है, भगवान् रुद्रको जो कुछ निवेदित किया है, वह सब आपकी कृपासे ही
११३- बुधाष्टमीव्रत-कथा
२२४ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-
हुआ है। आपकी ही कृपासे यह व्रत भी आज समाप्त किया जा रहा है। श्रीमन्! आप मेरे ऊपर प्रसन्न हों। आप अपने लोकको अब प्रस्थान करें। आपका दर्शनमात्र प्राप्तकर मैं निस्संदेह पवित्र हो गया हूँ।
व्रती ध्याननिष्ठ ब्राह्मणको भोजनसे संतृप्त कर वस्त्र-छत्रादि दे। तदनन्तर वह पुनः इस प्रकार प्रार्थना करे—
देवादिदेव भूतेश लोकानुग्रहकारक॥
यन्मया श्रद्धया दत्तं प्रीयतां तेन मे प्रभुः।
(१२४। २०-२१)
हे देवादिदेव! समस्त प्राणिजगत्के स्वामिन्, संसारपर कृपा रखनेवाले प्रभो! श्रद्धापूर्वक मैंने जो कुछ आपको समर्पित किया है, उससे आप प्रसन्न हों।
इस प्रकार क्षमापन-स्तुति करनेके पश्चात् व्रतीको द्वादश-वार्षिक व्रतका संकल्प लेना चाहिये। ऐसा करके व्रती कीर्ति, लक्ष्मी, पुत्र तथा राज्यादिके सुख-वैभवको प्राप्तकर अन्तमें शिवलोकको प्राप्त करता है। व्रतधारी बारहों मासमें भी इस व्रतके जागरणको पूर्ण करके यदि द्वादश ब्राह्मणोंको भोजन प्रदान करे और दीपदान करे तो उसे स्वर्गकी प्राप्ति होती है।
(अध्याय १२४)
एकादशीमाहात्म्य
पितामहने कहा— मान्धाता नामके एक राजा थे, जिन्होंने एकादशीव्रत करके उसके पुण्यसे चक्रवर्ती सम्राट्की उपाधि धारण की थी। अतः कृष्ण एवं शुक्ल दोनों पक्षकी एकादशी तिथिमें मनुष्यको भोजन नहीं करना चाहिये।
गान्धारीने दशमीविद्धा एकादशीका व्रत किया था, जिसके फलस्वरूप उसके सौ पुत्रोंका विनाश उसके जीवनकालमें ही हो गया था। इसलिये दशमीसे युक्त एकादशीका व्रत नहीं करना चाहिये। द्वादशीके साथ एकादशी होनेपर उस एकादशीमें भगवान् हरिका संनिधान रहता है। जिस मास दशमीवेधसे युक्त एकादशी होती है, उसमें असुरोंका संनिधान होता है। जब विभिन्न शास्त्रोंमें कहे गये वाक्योंकी बहुलतासे अज्ञातावश संदेह बढ़ जाता है तो उस परिस्थितिमें द्वादशी तिथिको व्रत करके त्रयोदशी तिथिमें पारणा कर लेनी चाहिये।* यदि एकादशी एक कलामात्र भी कालगणनामें रहती है तो द्वादशी (युक्त एकादशी) तिथिको यह व्रत उपास्य है। यदि एकादशी, द्वादशी और विशेष रूपसे त्रयोदशी तिथि भी एक ही दिन आ जाती है तो इन तीन तिथियोंसे मिश्रित वह तिथि व्रत करने योग्य होती है, क्योंकि वह तिथि माङ्गलिक एवं सभी पापोंका विनाश करनेमें समर्थ होती है।
हे द्विजराज! एकादशी अथवा द्वादशीका व्रत करके तीन तिथियोंसे मिश्रित अर्थात् एकादशी, द्वादशी और त्रयोदशी तिथिसे समन्वित तिथिपर व्रत कर लेना उचित है, किंतु दशमीवेधसे युक्त एकादशीका व्रत कभी नहीं करना चाहिये।
रातमें जागरण तथा पुराणका श्रवण एवं गदाधर विष्णुकी पूजा करते हुए दोनों पक्षोंकी एकादशीका व्रत कर महाराज रुक्माङ्गदने मोक्ष प्राप्त किया था। अन्य एकादशी व्रतकर्ताओंने भी मोक्ष प्राप्त किया है।
(अध्याय १२५)
* यहाँ केवल वैष्णव एकादशीकी चर्चा की गयी है।
११४- अशोकाष्टमी, महानवमी तथा नवमीके अन्य व्रत और ऋष्येकादशीव्रत-माहात्म्य
काण्ड ] भीमा-एकादशीव्रत एवं माहात्म्य तथा पूजन-विधि २२५
विष्णुमण्डल-पूजाविधि
ब्रह्माजीने कहा—जिस पूजाको करनेसे लोग परमगतिको प्राप्त हो गये हैं, मैं उसी भुक्ति एवं मुक्ति देनेमें समर्थ श्रेष्ठ पूजाका विधिवत् वर्णन करूँगा।
व्रतीको सर्वप्रथम एक सामान्य पूजामण्डलका निर्माण कर द्वारदेशसे उसमें पूजा प्रारम्भ करनी चाहिये। मण्डलके द्वारदेशमें धाता, विधाता और महानदी गङ्गा, यमुनाकी पूजा करनी चाहिये। तदनन्तर द्वारदेशपर ही श्री, दण्ड, प्रचण्ड और वास्तुपुरुषकी पूजाकर मध्यभागमें आधारशक्ति, कूर्मदेव एवं अनन्तका पूजन करे। इसके बाद पूजक पृथिवी, धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य, अनैश्वर्यकी पूजा कन्द, नाल, पद्म, कर्णिका तथा केसरादि भागोंपर करे। तदनन्तर सत्त्व, रजस् और तमस् गुणोंकी पूजा करके उस व्रतीको यथाविहित स्थानपर सूर्यादि ग्रहमण्डलोंकी और विमलादि शक्तियोंकी भी पूजा करनी चाहिये।
इसके बाद मण्डलके कोणभागमें दुर्गा, गणेश, सरस्वती और क्षेत्रपाल देवोंकी तथा आसन और मूर्तिकी पूजा कर व्रती भगवान् वासुदेव और बलभद्रका स्मरण करता हुआ महात्मा अनिरुद्ध तथा नारायणकी पूजा करे। वह उनके हृदयादि सम्पूर्ण अङ्ग, शंख, चक्र तथा गदादि आयुधकी पूजाकर श्री, पुष्टि, गरुड, गुरु और परम गुरुकी पूजा करे। तदनन्तर उसे इन्द्रादि आठों दिक्पालकी पूजा उनकी ही दिशाओंमें करके अधोभागमें नाग तथा ऊर्ध्वभागमें ब्रह्माकी पूजा करनी चाहिये। आगमशास्त्रमें निर्दिष्ट विधिके अनुसार विष्वक्सेन देवकी पूजा ईशानकोणमें करके उस मण्डलकी पूजाको पूर्ण करना चाहिये।
जो मनुष्य इस विधिके अनुसार एक बार भी भगवान् विष्णुकी पूजा करता है, उस महात्माका पुनर्जन्म इस संसारमें नहीं होता। पुण्डरीकाक्ष गदाधर भगवान् विष्णु एवं ब्रह्माकी पूजा करनेसे पुनः जन्म नहीं होता। (अध्याय १२६)
भीमा-एकादशीव्रत एवं माहात्म्य तथा पूजन-विधि
ब्रह्माजीने कहा—प्राचीनकालमें माघमासके शुक्लपक्षमें हस्तनक्षत्रसे युक्त एक एकादशीका व्रत भीमने किया था। इसलिये इस एकादशीको भीमा-एकादशी कहा जाता है। यह आश्चर्य है कि मात्र इसी एकादशीका व्रत करनेसे भीमसेन पितृऋणसे मुक्त हो गये थे।
प्राणियोंके पुण्योंकी अभिवृद्धि करनेवाली भीमा-द्वादशी तिथि भीमसेनके नामसे ही प्रसिद्ध भी है। यह तिथि तो बिना हस्तनक्षत्रके संयोगसे ही ब्रह्महत्यादि पापोंका विनाश कर देती है।
यह द्वादशी तिथि महापापोंको तो वैसे ही नष्ट कर देती है, जैसे कुमार्गगामी राजासे राज्य, कुपुत्रसे कुल, दुष्टपत्नीसे पति, अधर्मसे धर्म, कुमन्त्रीसे राजा, अज्ञानसे ज्ञान, अशौचसे शौच, अश्रद्धासे श्राद्ध, असत्यसे सत्य, उष्णतासे शीतलता, अनाचारसे सम्पत्ति, कहनेमात्रसे दान, विस्मय करनेसे तप, अशिक्षासे पुत्र, दूर चली जानेसे गौ, क्रोधसे शान्ति, नहीं बढ़ानेसे धन, ज्ञानसे अविद्या और निष्कामतासे फल विनष्ट हो जाते हैं। उसी प्रकार पापनाशके लिये द्वादशी तिथि शुभ कही गयी है।
ब्रह्महत्या, सुरापान, सुवर्ण-चोरी तथा गुरुपत्नी-गमन—ये महापातक मनुष्यमें यदि एक साथ उत्पन्न हो जायें तो इनको त्रिपुष्कर तीर्थ भी नष्ट नहीं कर सकते हैं (किंतु यह द्वादशी उस समस्त पापसमूहको
२२६ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-
नष्ट कर देती है)। नैमिषक्षेत्र, कुरुक्षेत्र, प्रभासक्षेत्र, कालिन्दी (यमुना), गङ्गा तथा सभी तीर्थ भी एकादशीके समान नहीं हैं। कोई भी दान, जप, होम या अन्य पुण्य इसके तुल्य नहीं है। यदि एक ओर पृथिवीके दानका सत्कर्म रखकर दूसरी ओर भगवान् हरिकी इस पवित्र एकादशी तिथिकी तुलना की जाय तो भी यही एक महापुण्यशालिनी एकादशी तिथि सर्वश्रेष्ठ सिद्ध होगी।
इस व्रतमें भगवान् वराहदेवकी स्वर्णप्रतिमा बनाकर नये ताम्रपात्रमें घटके ऊपर स्थापित करना चाहिये। तदनन्तर ब्राह्मणजन समस्त विश्वके बीजभूत विष्णुदेवकी उस प्रतिमाको श्वेत वस्त्रसे आच्छादितकर स्वर्णनिर्मित दीपादिक उपचारोंसे प्रयत्नपूर्वक उनकी पूजा करे।
'ॐ वराहाय नमः' इस मन्त्रसे उन विष्णुके चरणकमलोंकी पूजाकर 'ॐ क्रोडाकृतये नमः' इस मन्त्रसे उनके कटिप्रदेशका पूजन करे। तदनन्तर 'ॐ गम्भीरघोषाय नमः' इस मन्त्रसे उनकी नाभिकी पूजा कर 'ॐ श्रीवत्सधारिणे नमः' इस मन्त्रसे उनके वक्षःस्थलका पूजन करे। उसके बाद 'ॐ सहस्रशिरसे नमः' इस मन्त्रसे उन विष्णुभगवान्की भुजाओंकी पूजा करके भक्तको 'ॐ सर्वेश्वराय नमः' इस मन्त्रसे उन देवके ग्रीवाभागकी पूजा करनी चाहिये। तदनन्तर व्रती 'ॐ सर्वात्मने नमः' इस मन्त्रसे मुखकी और 'ॐ प्रभवाय नमः' इस मन्त्रसे हरिके ललाटभागकी पूजाकर 'ॐ शतमयूखाय नमः' इस मन्त्रसे उन चक्रधारी हरिकी केशराशिकी विधिवत् पूजा करनी चाहिये।
इस प्रकार भगवान् विष्णुकी विधिपूर्वक पूजाको समाप्तकर व्रती रात्रिमें जागरण करते हुए भगवान् हरिके माहात्म्यको प्रतिपादित करनेवाले पुराणकी कथाका श्रवण करे। तदनन्तर प्रातःकाल स्वर्णनिर्मित वराह-सहित सपरिवार भगवान्की उस मूर्तिको अपेक्षा रखनेवाले ब्राह्मणको दे करके पारणा करे।
इस विधि-विधानसे व्रत करनेसे मनुष्य पुनः माताके गर्भसे उत्पन्न होकर स्तनका दूध नहीं पान करता है अर्थात् वह पुनर्जन्मसे मुक्त हो जाता है। इस पुण्यशालिनी एकादशीका व्रत करनेसे प्राणीको पितृ, गुरु एवं देव—इन तीनों ऋणोंसे मुक्ति प्राप्त हो जाती है। यह व्रत सभी व्रतोंका आदि स्थान है। इस व्रतको करके मनुष्य अपने समस्त मनोवाञ्छित फलोंको प्राप्त करनेमें सफल रहता है।
(अध्याय १२७)
व्रतपरिभाषा तथा व्रतमें पालन करनेयोग्य नियम और अन्य ज्ञातव्य बातें
ब्रह्माजीने कहा— हे व्यास! जिन व्रतोंको करनेसे नारायण संतुष्ट होकर सब कुछ प्रदान करते हैं, उन व्रतोंको मैं कहूँगा। शास्त्रके द्वारा वर्णित नियम-पालन व्रत कहलाता है और वही तप है। व्रतीके कुछ सामान्य नियम इस प्रकार हैं—
व्रतीको नित्य तीनों संध्याओंमें स्नान करना चाहिये। उसे जितेन्द्रिय होकर भूमिपर शयन करना चाहिये। स्त्री, शूद्र और पतितजनोंके साथ बातचीत करना उसके लिये वर्जित है। वह पवित्र बना रहे और प्रतिदिन हवन करे।
सुकृत करनेवाले मनुष्यको चाहिये कि वह नियमोंका पालन करे। (व्रताचरणके पूर्व) क्षौर न कराना चाहे तो दुगुना व्रत करना चाहिये।
व्रतीके लिये कांस्यपात्र, उड़द, मसूर, चना,
११५- श्रवणद्वादशीव्रत
काण्ड ] प्रतिपदा, तृतीया, चतुर्थी तथा पञ्चमीमें किये जानेवाले विविध तिथिव्रत २२७
कोदो, दूसरेका अन्न, शाक और मधुका सेवन वर्जित है। पुष्प, अलंकार, नवीन वस्त्र, धूप-गन्धादि लेप, दन्तधावन और अञ्जनका प्रयोग त्याज्य है। पञ्चगव्य पान कर व्रतका आचरण करना चाहिये। एकसे अधिक बार जलपान, ताम्बूल-भक्षण, दिनमें शयन तथा मैथुन करनेसे व्रतभंग हो जाता है।
क्षमा, सत्य, दया, दान, शौच, इन्द्रियनिग्रह, देवपूजा, अग्निमें हवन, संतोष और चोरी न करना—ये दस सभी व्रतोंके सामान्य धर्म हैं।
क्षमा सत्यं दया दानं शौचमिन्द्रियनिग्रहः ॥
देवपूजाग्निहवने संतोषोऽस्तेयमेव च।
सर्वव्रतेष्वयं धर्मः सामान्यो दशधा स्मृतः ॥
(१२८। ८-९)
(चौबीस घण्टेमें केवल एक बार) नक्षत्रदर्शनके समय किया जानेवाला भोजन नक्तव्रत कहा जाता है और जो रात्रिमें भोजन किया जाता है, वह नक्तव्रत नहीं है। एक पल गोमूत्र, आधे अँगूठेके बराबर गोमय, सात पल गोदुग्ध, तीन पल गोधधि, एक पल गोघृत और एक पल कुशोदक—यह पञ्चगव्यका परिमाण है। गायत्रीमन्त्रसे गोमूत्र, 'गन्धद्वारा०' इस मन्त्रसे गोमय, 'आप्यायस्व०' मन्त्रसे दूध, 'दधि०' मन्त्रसे दही, 'तेजोऽसि०' मन्त्रसे घृत और 'देवस्य०' इस मन्त्रसे कुशोदकको अभिमन्त्रितकर पञ्चगव्यका निर्माण करना चाहिये।
अग्न्याधान, प्रतिष्ठा, यज्ञ, दान, व्रत, वेदव्रत, वृषोत्सर्ग, चूडाकरण, उपनयन, विवाहादिक माङ्गलिक कृत्य और राज्याभिषेक आदि कर्म मलमासमें नहीं करना चाहिये।
अमावास्यासे अमावास्यातक चान्द्रमास होता है। सूर्योदयसे लेकर दूसरे सूर्योदयतक एक दिन, इस प्रकार तीस दिनका सावनमास होता है। एक राशिसे दूसरे राशिपर सूर्यके संक्रमणकालको सौरमास कहते हैं। नक्षत्र सत्ताईस होते हैं। उनके अनुरोधसे जो मास होता है, उसे नाक्षत्रमास कहते हैं। विवाहकार्यमें सौरमास, यज्ञादिमें सावनमास ग्रहण किया जाता है।
द्वितीयाके साथ तृतीया, चतुर्थीके साथ पञ्चमी, षष्ठीके साथ सप्तमी, अष्टमीके साथ नवमी, एकादशीके साथ द्वादशी, चतुर्दशीके साथ पूर्णिमा तथा प्रतिपदाके साथ अमावास्याका युग्म हो तो ऐसी युग्म-तिथि महाफलदायक होती है। इसके विपरीत यदि युग्म-तिथियाँ हों तो वह महाघोर काल है। वह पूर्वजन्मके किये हुए पुण्यको भी नष्ट कर देता है।
यदि व्रत प्रारम्भ करनेके पश्चात् व्रतकालमें ही स्त्रियोंमें रजोदर्शन हो जाता है तो उससे उनका व्रत नष्ट नहीं होता है। ऐसी स्थितिमें उन्हें चाहिये कि वे दान-पूजा आदि कार्य किसी अन्यसे सम्पन्न करायें और स्नान, उपवासादि कायिक कार्य स्वयं करें।
यदि क्रोध, प्रमाद अथवा लोभवश किसीका व्रत भंग हो जाता है तो उसको तीन दिनतक उपवास करके शिरोमुण्डन करा देना चाहिये। शरीरके असमर्थ हो जानेपर व्रतीको अपने पुत्रादिसे व्रत कराना चाहिये। यदि व्रतकालमें व्रती मूर्च्छित हो जाता है तो उसे जल आदि पिला देना चाहिये। इससे व्रतभंग नहीं होता। (अध्याय १२८)
प्रतिपदा, तृतीया, चतुर्थी तथा पञ्चमीमें किये जानेवाले विविध तिथिव्रत
**ब्रह्माजीने कहा—**हे व्यास! अब मैं प्रतिपदादि तिथियोंके व्रतोंकी विधियोंका वर्णन करूँगा। आप उनका श्रवण करें। प्रतिपदा तिथिके एक विशेष व्रतका नाम शिखिव्रत है। इस व्रतको करनेसे व्रती वैश्वानर-पद प्राप्त करता है। प्रतिपदा तिथिमें एकभक्तव्रत करके दिनमें एक बार भोजन करना चाहिये। व्रतकी समाप्तिपर कपिला गौका दान करे। चैत्रमासके प्रारम्भमें विधिपूर्वक सुन्दर
११६- तिथिव्रत, वारव्रत एवं नक्षत्रादिव्रत-निरूपण और प्रतिपदादि तिथियोंमें पूजनीय देवता
| २२८ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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गन्ध, पुष्प, माला आदिसे ब्रह्माकी पूजा और हवन करनेसे सभी अभीष्ट फलोंकी प्राप्ति होती है। कार्तिकमासमें शुक्लपक्षकी अष्टमी तिथिको व्रती पुष्प और उनसे बनी हुई मालाका दान करे। यह क्रम वर्षपर्यन्त चलना चाहिये। ऐसा करनेसे रूपकी इच्छा करनेवाले व्रतीको रूप-सौन्दर्यकी प्राप्ति होती है।
श्रावणमासके कृष्णपक्षकी तृतीया तिथिमें लक्ष्मीके साथ भगवान् श्रीधरविष्णुको सुसज्जित शय्यापर स्थापित कर उनकी पूजा करे और फलकी भेंट चढ़ाये। इसके बाद उस शय्यादिका दान ब्राह्मणको करके व्रती 'श्रीधराय नमः, श्रियै नमः' यह प्रार्थना करे। इसी तृतीया तिथिको उमा-शिव और अग्निकी पूजा करनी चाहिये। व्रती इन सभीको हविष्यान्न, नैवेद्य और दमनक (श्वेत कमल)-का निवेदन करे।
फाल्गुनादिमें तृतीयाका व्रत करनेवाले मनुष्यको नमक नहीं खाना चाहिये। व्रतके समाप्त होनेपर सपत्नीक ब्राह्मणकी पूजा करके अन्न, शय्या, पात्रादि उपस्करोंसे युक्त घरका दान 'भवानी प्रीयताम्' 'भवानी प्रसन्न हों' ऐसा कहकर करना चाहिये। ऐसा करनेसे व्रतीको अन्त समयमें भवानीका लोक प्राप्त होता है और इस लोकमें श्रेष्ठ सुख तथा सौभाग्यकी प्राप्ति होती है।
मार्गशीर्षमासकी तृतीया तिथिमें गौरी तथा चतुर्थी आदि तिथियोंमें क्रमशः—काली, उमा, भद्रा, दुर्गा, कान्ति, सरस्वती, मंगला, वैष्णवी, लक्ष्मी, शिवा तथा नारायणीदेवीकी पूजा करनी चाहिये। इनकी पूजा करनेसे व्रती प्रियजनोंसे होनेवाले वियोगादि कष्टोंसे मुक्त हो जाता है।
माघमासके शुक्लपक्षमें चतुर्थी तिथिको निराहार रहकर व्रत करते हुए व्रती ब्राह्मणको तिलका दानकर स्वयं तिल एवं जलका आहार करे। इस प्रकार प्रतिमास व्रत करते हुए दो वर्ष बीतनेपर इस व्रतको समाप्त कर देना चाहिये। ऐसा करनेसे जीवनमें किसी प्रकारका विघ्न आदि प्राप्त नहीं होता। चतुर्थी तिथिमें गणोंके अधिनायक गणपतिदेवकी यथाविधि पूजा करनी चाहिये—पूजामें 'ॐ गः स्वाहा' यह प्रणवसे युक्त मूल मन्त्र है। पूजामें अङ्गन्यास इस प्रकारसे करना चाहिये—
ॐ ग्लौं ग्लां हृदयाय नमः (दाहिने हाथकी पाँचों अँगुलियोंसे हृदयका स्पर्श)। ॐ गां गीं गूं शिरसे स्वाहा (सिरका स्पर्श)। ॐ हूं हीं हीं शिखायै वषट् (शिखाका स्पर्श)। ॐ गूं कवचाय वर्मणे हुम् (दाहिने हाथकी अँगुलियोंसे बायें कंधेका और बायें हाथकी अँगुलियोंसे दाहिने कंधेका साथ ही स्पर्श)। ॐ गौं नेत्रत्रयाय वौषट् (दाहिने हाथकी अँगुलियोंके अग्रभागसे दोनों नेत्रों और ललाटके मध्यभागका स्पर्श)। ॐ गों अस्त्राय फट् (यह वाक्य पढ़कर दाहिने हाथको सिरके ऊपरसे बायीं ओरसे पीछेकी ओर ले जाकर दाहिनी ओरसे आगेकी ओर ले आये और तर्जनी तथा मध्यमा अँगुलियोंसे बायें हाथकी हथेलीपर ताली बजाये)।
आवाहनादिमें निम्नाङ्कित मन्त्रोंका प्रयोग करना चाहिये। यथा—
आगच्छोल्काय गन्धोल्कः पुष्पोल्को धूपकोल्ककः।
दीपोल्काय महोल्काय बलिश्चाथ विस (मा) र्जनम्॥
हे गन्धोल्क, हे पुष्पोल्क, हे धूपकोल्क अर्थात् हे गन्ध, पुष्प तथा धूपमें तेजःस्वरूप विद्यमान रहनेवाले देव! आप इस रचित पूजामण्डलमें स्थित दीपकमें तेज प्रदान करनेके लिये, महातेज देनेके लिये, बलि और विसर्जनतक विद्यमान रहनेके लिये यहाँ उपस्थित हों।
आवाहनके पश्चात् गायत्रीमन्त्रसे अंगुष्ठादिका न्यास करना चाहिये। वह गायत्रीमन्त्र इस प्रकार है—
११७- सूर्यवंशवर्णन
| काण्ड ] | प्रतिपदा, तृतीया, चतुर्थी तथा पञ्चमीमें किये जानेवाले विविध तिथिव्रत | २२९ |
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ॐ महाकर्णाय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि तन्नो दन्तिः प्रचोदयात्।
करन्यासके पश्चात् इसी मन्त्रसे उनका ध्यान करके व्रतीको तिलादिसे उनकी पूजा करके आहुति देनी चाहिये। गणपतिके साथ रहनेवाले गणोंकी पूजा भी करनी चाहिये। व्रतीको 'ॐ गणाय नमः', 'ॐ गणपतये नमः' तथा 'ॐ कूष्माण्डकाय नमः' इस प्रकार कहकर उनकी पूजा करनी चाहिये। उसके बाद स्वाहान्त शब्दका प्रयोग कर इन्हीं मन्त्रोंसे आहुति दे। इसी प्रकार अमोघोल्क, एकदन्त, त्रिपुरान्तकरूप, श्यामदन्त, विकरालास्य, आह्वेष और पद्मदंष्ट्र गणोंको भी 'नमः' और अन्तमें 'स्वाहा' शब्दसे यथापेक्षित नमन और आहुति प्रदान करनी चाहिये। उसके बाद व्रती गणदेवके लिये मुद्रा-प्रदर्शन, नृत्य, हस्तताल तथा हास्यभाव प्रदर्शित करे। ऐसा करनेसे उसे सौभाग्यादि फलोंकी प्राप्ति होती है।
मार्गशीर्षमासके शुक्लपक्षकी चतुर्थी तिथिमें गणकी पूजा करनी चाहिये। वर्षपर्यन्त ऐसा करनेसे विद्या, लक्ष्मी, कीर्ति, आयु और संतानकी प्राप्ति होती है। सोमवार, चतुर्थी तिथिको उपवास रखकर व्रतीको विधि-विधानसे गणपतिदेवकी पूजा कर उनका जप, हवन और स्मरण करना चाहिये। इस व्रतको करनेसे उसे विद्या, स्वर्ग तथा मोक्ष प्राप्त होता है।
शुक्लपक्षकी चतुर्थीको खांडके लड्डू और मोदकसे विघ्नेश्वरकी पूजा करनेपर व्रतीकी समस्त कामनाओंकी सिद्धि तथा सौभाग्यकी प्राप्ति होती है। यदि दमनक (श्वेतकमल)-से इनकी पूजा होती है तो साधकको पुत्रादिकका फल प्राप्त होता है, इसीलिये इस चतुर्थीका नाम दमना है।
'ॐ गणपतये नमः' इस मन्त्रसे गणपतिकी पूजा करनी चाहिये। जिस किसी भी मासमें इन गणपतिदेवकी पूजा करने तथा होम, जप और स्मरण करनेसे व्रतीकी सभी इच्छाएँ पूर्ण हो जाती हैं तथा समस्त विघ्नोंका विनाश हो जाता है। मनुष्यको विभिन्न नामोंका उच्चारण करके भी भगवान् आद्यदेव विनायककी पूजा करनी चाहिये। ऐसा करनेसे उसको भी सद्गतिकी प्राप्ति होती है। जबतक वह इस लोकमें रहता है, तबतक समस्त सुखोंका उपभोग करता है और अन्त समयमें उसे स्वर्ग और मोक्षकी भी प्राप्ति होती है। विनायकके निम्नलिखित ये बारह नाम हैं—
गणपूज्यो वक्रतुण्ड एकदंष्ट्री त्रियम्बकः।
<div style="text-align: right;">(१२९। २५-२६)</div>
नीलग्रीवो लम्बोदरो विकटो विघ्नराजकः॥
धूम्रवर्णो भालचन्द्रो दशमस्तु विनायकः।
गणपतिर्हस्तिमुखो द्वादशारे यजेद्गणम्॥
गणपूज्य, वक्रतुण्ड, एकदंष्ट्र, त्रियम्बक (त्र्यम्बक), नीलग्रीव, लम्बोदर, विकट, विघ्नराज, धूम्रवर्ण, भालचन्द्र, विनायक और हस्तिमुख—इन बारह नामोंसे गणदेवकी पूजा करनी चाहिये।
पृथक्-पृथक् इन नामोंसे जो बुद्धिमान् प्राणी इनकी पूजा करता है, उसकी सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं।
श्रावण, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिकमासके शुक्लपक्षकी पञ्चमी तिथिमें वासुकि, तक्षक, कालीय, मणिभद्रक, ऐरावत, धृतराष्ट्र, कर्कोटक तथा धनञ्जय—इन आठ नागोंकी घृतादिसे स्नान कराकर पूजा करनी चाहिये। ये नाग अपने भक्तको आयु-आरोग्य और स्वर्ग प्रदान करते हैं। अनन्त, वासुकि, शंख, पद्म, कम्बल, कर्कोटक, धृतराष्ट्र, शंखक, कालीय, तक्षक और पिंगल—इन नागोंकी पूजा प्रत्येक मासमें करनी चाहिये। भाद्रपदमासके शुक्लपक्षमें आठों नागोंकी पूजा करनेसे साधकको मृत्युके पश्चात् स्वर्ग और मोक्षकी प्राप्ति होती है।
२३० | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार-
श्रावणमासके शुक्लपक्षमें पञ्चमीको द्वारके दोनों ओर इन नागोंका चित्र बनाकर पूजन करना चाहिये। इसी दिन अनन्त आदि महानागोंकी पूजा करके नैवेद्यमें दूध तथा घी देना चाहिये, इससे सभी विषदोष दूर हो जाते हैं। नाग अभय वरदान देनेवाले होते हैं और यह पञ्चमी सर्पदंष्ट्री प्राणीको मुक्ति देनेवाली होती हैं। इसलिये दंष्ट्रोद्धार पञ्चमी कहलाती है। (अध्याय १२९)
षष्ठी तथा सप्तमीके विविध व्रत
ब्रह्माजीने कहा— भाद्रपदमासमें भगवान् कार्तिकेयकी पूजा करनी चाहिये<sup>१</sup>। इसमें स्नानादि जो कृत्य किये जाते हैं, वे सभी अक्षय फल प्रदान करनेवाले हो जाते हैं।
व्रती (षष्ठी तिथिको उपवासकर) सप्तमी तिथिको ब्राह्मणभोजन कराकर 'ॐ खखोल्काय नमः' इस मन्त्रसे सूर्यदेवकी पूजा करे और अष्टमी तिथिको मरिचका भोजनकर पारणा करे। इससे व्रती अन्तमें स्वर्ग प्राप्त करता है। मरिच-प्राशनके कारण इस व्रतका नाम मरिचसप्तमी है। इस व्रतको करनेसे प्रियजनोंसे मिलन होता है, उनसे वियोग नहीं होता। सप्तमी तिथिको संयमपूर्वक स्नानादि करके सूर्यकी पूजा करे। 'मार्तण्डः प्रीयताम्'— 'सूर्यदेव मुझपर प्रसन्न हों' यह कहते हुए ब्राह्मणोंके लिये फलोंका दान करे और खजूर, नारियल, बिजौरा नींबू आदि फलोंको प्रदान करे। यह प्रार्थना करे कि हे देव! मेरे सभी अभीष्ट चारों ओरसे सफल हों। फलदान एवं प्राशनके कारण इस सप्तमीका नाम 'फलसप्तमीव्रत' है।
सप्तमीको सूर्यदेवकी पूजा कर यदि ब्राह्मणोंको दक्षिणासहित पायसका भोजन कराया जाय, तदनन्तर व्रती स्वयं पयका पानकर व्रत समाप्त करे तो पुण्य-लाभ होता है। ओदन, भक्ष्य, चोष्य और लेह्य पदार्थ इस व्रतमें ग्राह्य नहीं है। धन-पुत्रकी कामना करनेवाला ओदनका परित्याग कर इस व्रतको करे। इसी वैशिष्ट्यके कारण इसे अनौदक सप्तमी कहा गया है।
विजयकी कामना करनेवालेको वायुमात्र पान कर विजयसप्तमीव्रत करना चाहिये। जो कामेच्छुक हैं, वे मात्र अर्कका प्राशनकर इस व्रतको करें। इस प्रकार व्रतकर वे कामपर विजय प्राप्त कर लेते हैं।
इस सप्तमीव्रतमें गेहूँ, उड़द, यव, साठी धान, तिल, कांस्यपात्र, पाषाणपात्र, पिसी हुई वस्तु, मधु, मैथुन, मद्य, मांस, तैल-मर्दन और अञ्जन त्याज्य है। जो मनुष्य इनका परित्याग कर व्रत करता है, उसकी सभी अभिलाषाएँ पूर्ण हो जाती हैं। इसीलिये इसे विजयसप्तमी कहा गया है। (अध्याय १३०)
दूर्वाष्टमी तथा श्रीकृष्णमाष्टमीव्रत
ब्रह्माजीने कहा—हे ब्रह्मन्! भाद्रपदमासमें शुक्लपक्षकी अष्टमी तिथिको दूर्वाष्टमीव्रत होता है। इस दिन उपवास रहकर दूर्वासे गौरी-गणेशकी और शिवकी फल-पुष्प आदिसे पूजा करनी चाहिये। फल, धान्य आदि सभी प्रयोज्य वस्तुओंसे 'शम्भवे नमः, शिवाय नमः' कहकर शिवका पूजन करे। तदनन्तर 'त्वं दूर्वेऽमृतजन्मासि<sup>२</sup> इस मन्त्रसे दूर्वाकी पूजा करनी चाहिये। ऐसा करनेसे
१- कार्तिकेयकी तिथि षष्ठी कही गयी है।
२- त्वं दूर्वेऽमृतजन्मासि वन्दिता च सुरासुरैः। सौभाग्यं संततिं कृत्वा सर्वकार्यकरी भव॥
यथा शाखाप्रशाखाभिर्विस्तृतासि महीतले। तथा ममापि संतानं देहि त्वमजरामरे॥
११८- चन्द्रवंशवर्णन
काण्ड ] दूर्वाष्टमी तथा श्रीकृष्णजन्माष्टमीव्रत २३१
यह अष्टमीव्रत निश्चित ही साधकको सर्वस्व प्रदान कर देता है। इस व्रतमें जो अग्निमें न पकाये गये पदार्थोंका भोजन करता है, वह ब्रह्महत्याके पापसे मुक्त हो जाता है।
इसी भाद्रपदके कृष्णपक्षकी अष्टमी तिथिको अर्द्धरात्रिमें रोहिणीनक्षत्रमें भगवान् हरिकी पूजाका विधान है। यह श्रीकृष्णजन्माष्टमीव्रत कहलाता है। सप्तमी तिथिसे विद्ध अष्टमी तिथि भी व्रतके योग्य होती है। इस प्रकारके अष्टमीका व्रत करनेसे प्राणीके तीन जन्मके पाप नष्ट हो जाते हैं। अतः उपवास रखकर मन्त्रसे भगवान् हरिकी पूजा करके तिथि और नक्षत्रके अन्तमें पारणा करनी चाहिये।
‘ॐ योगाय योगपतये योगेश्वराय योगसम्भवाय गोविन्दाय नमो नमः।’ इस मन्त्रसे योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्णका ध्यान कर ‘ॐ यज्ञाय यज्ञेश्वराय यज्ञपतये यज्ञसम्भवाय गोविन्दाय नमो नमः।’ इस मन्त्रसे उन्हें स्नान कराना चाहिये।
उसके बाद ‘ॐ विश्वाय विश्वेश्वराय विश्वपतये विश्वसम्भवाय गोविन्दाय नमो नमः’ इस मन्त्रसे श्रीहरिकी पूजा करनी चाहिये। तत्पश्चात्—‘ॐ सर्वाय सर्वेश्वराय सर्वपतये सर्वसम्भवाय गोविन्दाय नमो नमः।’ इस मन्त्रसे उन्हें शयन कराना चाहिये।
स्थण्डिल (वेदी)-में चन्द्रमा और रोहिणीके साथ भगवान् कृष्णकी पूजा करे। पुष्प, फल और चन्दनसे युक्त जलको शंखमें लेकर अपने दोनों घुटनोंको पृथिवीसे लगाते हुए चन्द्रमाको निम्न मन्त्रद्वारा अर्घ्य प्रदान करे—
क्षीरोदार्णवसम्भूत अत्रिनेत्रसमुद्भव॥
गृहाणार्घ्यं शशाङ्केश रोहिण्या सहितो मम।
(१३१।८-९)
हे क्षीरसागरसे उत्पन्न देव! हे अत्रिमुनिके नेत्रसे समुद्भूत! हे चन्द्रदेव! रोहिणीदेवीके साथ मेरे द्वारा प्रदत्त इस अर्घ्यको आप स्वीकार करें।
तदनन्तर व्रतीको महालक्ष्मी, वसुदेव, नन्द, बलराम तथा यशोदाको फलयुक्त अर्घ्य प्रदानकर इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये—
अनन्तं वामनं शौरिं वैकुण्ठं पुरुषोत्तमम्॥
वासुदेवं हृषीकेशं माधवं मधुसूदनम्।
वराहं पुण्डरीकाक्षं नृसिंहं दैत्यसूदनम्॥
दामोदरं पद्मनाभं केशवं गरुडध्वजम्।
गोविन्दमच्युतं देवमनन्तमपराजितम्॥
अधोक्षजं जगद्बीजं सर्गस्थित्यन्तकारणम्।
अनादिनिधनं विष्णुं त्रिलोकेशं त्रिविक्रमम्॥
नारायणं चतुर्बाहुं शङ्खचक्रगदाधरम्।
पीताम्बरधरं दिव्यं वनमालाविभूषितम्॥
श्रीवत्साङ्कं जगद्धाम श्रीपतिं श्रीधरं हरिम्।
यं देवं देवकी देवी वसुदेवादजीजनत्॥
भौमस्य ब्रह्मणो गुप्त्यै तस्मै ब्रह्मात्मने नमः।
(१३१।१०-१६)
वे देव जो अनन्त, वामन, शौरि, वैकुण्ठनाथ, पुरुषोत्तम, वासुदेव, हृषीकेश, माधव, मधुसूदन, वराह, पुण्डरीकाक्ष, नृसिंह, दैत्यसूदन, दामोदर, पद्मनाभ, केशव, गरुडध्वज, गोविन्द, अच्युत, अनन्तदेव, अपराजित, अधोक्षज, जगद्बीज, सर्गस्थित्यन्तकारण, अनादिनिधन, विष्णु, त्रिलोकेश, त्रिविक्रम, नारायण, चतुर्भुज, शङ्खचक्रगदाधर, पीताम्बरधारी, दिव्य, वनमालासे विभूषित, श्रीवत्साङ्क, जगद्धाम, श्रीपति और श्रीधरादि नामसे प्रसिद्ध हैं, जिनको देवकीसे वसुदेवने उत्पन्न किया है, जो पृथिवीपर निवास करनेवाले ब्राह्मणोंकी रक्षाके लिये संसारमें अवतरित होते हैं, उन ब्रह्मरूप भगवान् श्रीकृष्णको मैं नमन करता हूँ।
इस प्रकार भगवान्के नामोंका संकीर्तन करके अपनी सद्गतिके लिये पुनः यह प्रार्थना करनी चाहिये—
त्राहि मां देवदेवेश हरे संसारसागरात्।
त्राहि मां सर्वपापघ्न दुःखशोकार्णवात् प्रभो॥
| २३२ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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देवकीनन्दन श्रीश हरे संसारसागरात् ।
दुर्वृत्तांस्त्रायसे विष्णो ये स्मरन्ति सकृत्सकृत् ॥
सोऽहं देवातिदुर्वृत्तस्त्राहि मां शोकसागरात् ।
पुष्कराक्ष निमग्नोऽहं महत्यज्ञानसागरे ॥
त्राहि मां देवदेवेश त्वामृतेऽन्यो न रक्षिता ।
स्वजन्मवासुदेवाय गोब्राह्मणहिताय च ॥
जगद्धिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः ।
शान्तिरस्तु शिवं चास्तु धनविख्यातिराज्यभाक् ॥
(१३१ । १७-२१)
हे देवदेवेश्वर ! हे हरे ! इस संसारसागरसे मेरी रक्षा करें। हे सर्वपापहन्ता प्रभो ! दुःख तथा शोकसे परिपूर्ण इस संसारसागरसे मेरी रक्षा करें। हे देवकीनन्दन ! हे श्रीपते ! हे हरे ! इस संसारसागरसे मेरी रक्षा करें। हे विष्णो ! जो एक बार भी आपका स्मरण करते हैं, उन सभीको आप दुराचरणके दुःखसे उबार लेते हैं। हे देव ! मैं भी वैसा ही इस संसारके अत्यन्त दुराचरणमें फँसा हुआ हूँ, आप मेरा भी इस शोकरूपी सागरसे उद्धार करें। हे राजीवलोचन ! मैं इस गहन अज्ञानरूपी संसारसागरमें डूबा हुआ हूँ। आप मेरी रक्षा करें। हे देवदेवेश ! आपके अतिरिक्त मेरा अन्य कोई रक्षक नहीं है। हे स्वजन्मा ! वासुदेव ! गोद्विजहितकारी ! जगत्त्राता ! कृष्ण ! गोविन्द ! आपको बारम्बार नमस्कार है। आपकी कृपासे मुझे शान्ति प्राप्त हो, मेरा कल्याण हो और धन, यश तथा राज्यवैभवका मैं अधिकारी बनूँ।
(अध्याय १३१)
बुधाष्टमीव्रत-कथा
**ब्रह्माजीने कहा—**जो मनुष्य अष्टमी तिथिको दिनभर व्रत रखकर नक्तव्रतकी विधिसे एक बार भोजन करता है और इस व्रतकर्मको वर्षपर्यन्त चलाकर व्रतकी समाप्तिपर गोदान करता है, उसे इन्द्रपदकी प्राप्ति होती है। इस व्रतको सद्गतिव्रत कहा गया है। पौषमासकी शुक्लाष्टमी तिथिके व्रतका नाम महारुद्रव्रत है। जब दोनों पक्षकी अष्टमी तिथि बुधवारसे युक्त हो तो नियमपूर्वक बुधाष्टमीव्रत करनेवालेकी सम्पत्ति कभी भी खण्डित नहीं होती। मुक्तिकी इच्छा रखनेवाला जो मनुष्य दो अंगुलियोंको हटाकर शेष तीन अंगुलियोंसे बाँधी गयी मुट्ठीके द्वारा आठ मुट्ठी चावल लेकर श्रद्धा-भक्तिपूर्वक भात बनाता है और कुशासे वेष्टित आम्रपत्रके दोनेमें करेमूके साग और इमलीके साथ उस भातको इस व्रतकी समाप्तिके बाद ग्रहण करता है और बुधाष्टमीकी कथा सुनता है, उसकी सभी इच्छाएँ पूर्ण हो जाती हैं।
बुधाष्टमीको जलाशयमें पञ्चोपचार-विधिसे बुधदेवकी पूजा करनी चाहिये। तदनन्तर यथाशक्ति दक्षिणासे युक्त ककड़ी और चावलका दान देना चाहिये। इस देवके पूजनका बीजमन्त्र 'ॐ बुं बुधाय नमः' है। इस देवपूजाके पश्चात् कमलगट्टे आदिकी आहुति देनेके लिये इसी बीजमन्त्रके अन्तमें 'स्वाहा' शब्दका प्रयोग करना चाहिये। जलाशयके मध्य जिस पूजामण्डलकी कल्पना करे, उस मण्डलके मध्य कल्पित पद्मदलके ऊपर धनुष-बाणसे युक्त श्यामवर्णवाले इन देवकी भावना कर उनके अङ्गोंकी पूजा करे।
इस बुधाष्टमीकी कथा बड़ी ही पुण्यदायिनी है। इस व्रतकी कथा व्रत करनेवाले जनोंको अवश्य सुननी चाहिये। वह कथा इस प्रकार है—
प्राचीनकालमें पाटलिपुत्र नामक नगरमें वीर नामका एक श्रेष्ठ ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नीका नाम रम्भा और पुत्रका नाम कौशिक था। उसके विजया नामकी एक पुत्री थी तथा धनपाल नामका एक बैल था। ग्रीष्म-ऋतुमें एक बार कौशिक उस
काण्ड ] अशोकाष्टमी, महानवमी तथा नवमीके अन्य व्रत और ऋष्येकादशी व्रत-माहात्म्य २३३
बैलको लेकर गङ्गामें स्नान करते समय जलक्रीडा करने लगा और उसी समय चोर गोपालकोंने आकर बलात् उस धनपाल नामक बैलका अपहरण कर लिया। कौशिक दुःखी होकर वनमें भ्रमण करने लगा। उसी समय संयोगवश अपनी माताके साथ गङ्गाजल लेनेके लिये विजया वहींपर आ गयी। कौशिक भूख-प्याससे व्याकुल हो कमलनालको भक्षण करनेकी इच्छासे एक जलाशयके पास जा पहुँचा। जहाँपर दिव्यलोककी कुछ स्त्रियाँ पूजा कर रही थीं। उन्हें देखकर उसके आश्चर्यका ठिकाना न रहा। अतः विस्मयाभिभूत कौशिकने उन सबके पास जाकर कुछ अन्नके लिये याचना करते हुए कहा—मैं अपनी छोटी बहनके साथ भूखा हूँ, किंतु स्त्रियोंने कहा कि तुमको इस पूजन-सामग्रीमेंसे व्रत करनेके लिये ही कुछ द्रव्य मिल सकता है। तुम भी यहींपर व्रत करो। तत्पश्चात् कौशिकने वहींपर धनपाल बैलकी प्राप्तिके लिये और विजयाने पति-प्राप्तिके लिये बुधदेवकी व्रत-पूजा की। व्रत-पूजन करनेके पश्चात् स्त्रियोंके द्वारा दोनेमें दिये गये प्रसादको उन दोनोंने ग्रहण किया। उसके बाद वे स्त्रियाँ वहाँसे चली गयीं। कुछ समयके बाद चोरोंके साथ वहींपर धनपाल बैल भी दिखायी पड़ गया। चोरोंके द्वारा दिये हुए धनपाल बैलको लेकर प्रदोषकालमें वे दोनों घर वापस चले आये। घरमें दुःखित पिता वीरको प्रणामकर रात्रिमें कौशिक सुखपूर्वक सो गया।
इधर युवा हुई पुत्री विजयाको देखकर वीरको यह चिंता हो गयी कि मैं इस पुत्रीको किसे दूँ। दुःखित पिताने यमराजको पुत्री देनेका निश्चय किया। दैवयोगसे इसी बीच वीरकी मृत्यु हो गयी। पिताके स्वर्ग चले जानेके बाद कौशिकने राज्य-प्राप्तिके लिये पुनः बुधाष्टमीका व्रत किया, जिसके फलस्वरूप कौशिकको अयोध्याका विशाल राज्य प्राप्त हुआ। उसने अपनी उस बहन विजयाका विवाह भी पिताके द्वारा कहे गये वचनके अनुसार यमराजके साथ ही करनेकी बात मनमें ठान ली थी। व्रतके प्रभावसे यमराजने वहाँ स्वयं आकर विजयाको पत्नीके रूपमें स्वीकार किया और विजयासे कहा—'तुम चलकर मेरे घरमें गृहस्वामिनी बनकर रहो।' उसने भी वैसा ही स्वीकार कर लिया और पतिके घर जाकर रहने लगी। एक दिन यमने उसे सावधान करते हुए कहा—देवि! ये जो बंद कमरे हैं, इन्हें कभी खोलना नहीं। विजयाने कभी भी बंद कमरेका किंवाड़तक नहीं खोला और न तो अपने पतिके विरुद्ध कोई आचरण ही किया। वह एक सद्गृहिणीके समान ही उनके साथ रही, किंतु एक दिन जिज्ञासावश उसने पतिके न रहनेपर कमरा खोलनेपर वहाँ अपनी माताको पति यमके ही कष्टकारी पाशमें बँधा हुआ देखा, जिससे वह अत्यन्त दुःखित हो उठी। उसी समय कौशिकके द्वारा बताये गये मुक्ति प्रदान करनेवाले बुधाष्टमी-व्रतकी याद उसे हो आयी। अतः उसने पुनः उस व्रतको किया, जिसके फलस्वरूप माता उस यमपाशसे मुक्त हो गयी। तदनन्तर उसने भी उस व्रतका पालन किया और अन्तमें व्रतके पुण्यके प्रभावसे स्वर्गलोक प्राप्तकर वहाँ सुखपूर्वक निवास करने लगी।
(अध्याय १३२)
अशोकाष्टमी, महानवमी तथा नवमीके अन्य व्रत और ऋष्येकादशी व्रत-माहात्म्य
**ब्रह्माजीने कहा—**चैत्रमासमें पुनर्वसु नक्षत्रसे युक्त शुक्लाष्टमीको 'अशोकाष्टमी' व्रत होता है, इस दिन जो अशोकमञ्जरीकी आठ कलियोंका पान करते हैं, वे शोकको नहीं प्राप्त होते। अशोककलिकाओंका पान करते समय यह प्रार्थना करनी चाहिये—
| २३४ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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त्वामशोक हराभीष्ट मधुमाससमुद्भव।
पिबामि शोकसन्तप्तो मामशोकं सदा कुरु॥
(१३३।२)
हे शिवप्रिय! वसंतोद्भव! शोकसंतप्त मैं आपका सेवन कर रहा हूँ। हे अशोक! आप मुझे सदैव शोक-विमुक्त रखें।
**ब्रह्माजीने पुनः कहा—**आश्विनमासमें उत्तराषाढ नक्षत्र तथा शुक्लपक्षकी अष्टमीसे युक्त जो नवमी होती है, उसे महानवमी कहा जाता है। इस तिथिको स्नान-दानादि करनेसे अक्षय पुण्यकी प्राप्ति होती है। यदि केवल नवमी हो तो भी दुर्गाकी पूजा करनी चाहिये। भगवान् शिव आदिने इस व्रतको किया था। यह महाव्रत अत्यधिक पुण्यलाभ देनेवाला है। शत्रुपर विजय प्राप्त करनेके लिये राजाको यह व्रत करना चाहिये। उसे जप-होमके बाद कुमारियोंको भोजन कराना चाहिये।
इस व्रतमें देवीके पूजनादिक कृत्योंमें प्रयुक्त होनेवाला 'ॐ दुर्गे दुर्गे रक्षिणि स्वाहा' यह मन्त्र है।
व्रतीको चाहिये कि वह अष्टमी तिथिको लकड़ियोंसे देवीके लिये नौ अथवा एक भवन (मण्डप)-का निर्माण करे। उसमें देवीकी सुवर्ण या रजतमूर्ति स्थापित करे। देवीकी पूजा शूल, खड्ग, पुस्तक, पट अथवा मण्डलमें करनी चाहिये। अठारह हाथोंवाली दुर्गादेवी अपनी बायीं ओरके हाथोंमें कपाल, खेटक, घण्टा, दर्पण, तर्जनी, धनुष, ध्वज, डमरू और पाश धारण करती हैं। उनके दाहिनी ओरके हाथोंमें शक्ति, मुद्गर, शूल, वज्र, खड्ग, अंकुश, शर, चक्र और शलाका नामक आयुध रहते हैं। दुर्गादेवीके अतिरिक्त अन्य देवियोंकी जो प्रतिमाएँ होती हैं, उनके सोलह हाथ माने गये हैं। अञ्जन और डमरू उनके हाथोंमें नहीं रहता।
रुद्रचण्डा, प्रचण्डा, चण्डोग्रा, चण्डनायिका, चण्डा, चण्डवती, चण्डरूपा तथा अतिचण्डिका—इन आठ देवियोंके अतिरिक्त नवीं देवी उग्रचण्डा हैं। ये उग्रचण्डादेवी अन्य आठ देवियोंके बीच प्रज्वलित अग्निकी प्रभाके समान सुशोभित होती हैं। रुद्रचण्डाका वर्ण रोचनाके समान, प्रचण्डाका अरुण, चण्डोग्राका कृष्ण, चण्डनायिकाका नील, चण्डाका धूम्र, चण्डवतीका शुक्ल, चण्डरूपाका पीत, अतिचण्डिकाका वर्ण पाण्डुर और उग्रचण्डाका वर्ण अग्निकी ज्वालाके समान है। देवी उग्रचण्डा सिंहपर स्थित रहती हैं। इनके आगे हाथमें खड्ग लिये हुए महिषासुर स्थित रहता है। देवी अपने एक हाथसे उस महिषासुरका (मुण्डयुक्त) कच (केश) पकड़े हुई स्थित रहती हैं।
इन भगवती उग्रचण्डाके दशाक्षरी विद्या-मन्त्र ('ॐ दुर्गे दुर्गे रक्षिणि स्वाहा')-का जप करके मनुष्य किसी भी बाधासे बाधित नहीं होता। पंद्रह अंगुलवाले खड्ग तथा त्रिशूलके साथ ही देवीकी उग्र शक्तियों—पूतना, पापराक्षसी, चरकी तथा विदारिकाकी भी नैर्ऋत्य आदि कोणोंमें यथाविधि पूजा करनी चाहिये।
राजाओंको शत्रु आदिपर विजय प्राप्त करनेके लिये विविध मन्त्रोंसे इस महानवमीको देवीकी विशेष पूजा करनी चाहिये। ब्रह्माणी, माहेशी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही आदि मातृकाओंको दूधसे स्नपन आदि कराकर देवीकी रथयात्रा निकालनी चाहिये, इससे उन्हें विजय तथा राज्य आदिकी प्राप्ति होती है।
आश्विनमासकी शुक्ला नवमीको एकभक्तव्रत करते हुए देवी और ब्राह्मणोंकी पूजा करके एक लाख बीजमन्त्रका जप करना चाहिये। इसे वीरनवमीव्रत कहा गया है। चैत्रशुक्ला नवमीको देवीकी पूजा दमनक नामक पुष्पसे करनी चाहिये। ऐसा करनेसे आयु, आरोग्य और सौभाग्यकी प्राप्ति होती है तथा व्रती शत्रुसे अपराजित रहता
काण्ड ] श्रवणद्वादशीव्रत २३५
है। इसे दमनकनवमीव्रत कहा जाता है। इसी मासकी शुक्ला दशमीको एकभक्तव्रत करके वर्षके अन्तमें दस गौओंका दान तथा दिक्पालोंको स्वर्णमेखलाका निवेदन करनेवाला समस्त ब्रह्माण्डका स्वामी हो जाता है। इसका नाम दिग्दशमीव्रत है। एकादशी तिथिको ऋषिपूजा करनेका विधान है। इससे व्रतीका सब प्रकारसे उपकार होता है। वह इस लोकमें धनवान् और पुत्रवान् होकर रहता है और अन्तमें उसे ऋषिलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। चैत्रमासमें दमनक-पुष्प तथा इन्हीं पुष्पोंसे बनी मालाद्वारा मरीचि, अत्रि, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, प्रचेता, वसिष्ठ, भृगु और नारद—इन ऋषियोंकी पूजा करनी चाहिये।
(अध्याय १३३—१३५)
श्रवणद्वादशीव्रत
ब्रह्माजीने कहा—अब मैं प्राणियोंको भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले श्रवणद्वादशीव्रतका वर्णन करूँगा। श्रवण नक्षत्रसे युक्त एकादशी और द्वादशी तिथि जब एक ही दिन पड़ती है तो उसे विजया तिथि कहा जाता है। इस दिन हरिकी पूजा आदि करनेसे प्राप्त पुण्यका फल अक्षय होता है। एकभुक्तव्रत करनेसे अथवा नक्तव्रत करनेसे या अयाचितव्रत करनेसे अथवा उपवास या भिक्षाचार करनेसे इस द्वादशीव्रतका पुण्य क्षीण नहीं होता है। व्रतीको इस द्वादशीके दिन कांस्यपात्र, मांस, शहद, लोभ, असत्यभाषण, व्यायाम, मैथुन, दिनमें सोना, अञ्जन, पत्थरपर पिसे हुए द्रव्य तथा मसूरका प्रयोग नहीं करना चाहिये।
यदि भाद्रपदमासमें शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथि श्रवण नक्षत्रसे युक्त हो तो वह द्वादशी बहुत ही महत्त्वपूर्ण होती है। उस दिन उपवास करनेसे महान् फलोंकी प्राप्ति होती है। यदि यह तिथि बुधवारसे भी युक्त हो तो इस दिन नदियोंके संगममें स्नान करनेसे महनीय फल प्राप्त होते हैं। इस दिन रत्न एवं जलसे परिपूर्ण कुम्भमें दो श्वेतवस्त्रोंसे आच्छादित भगवान् वामनकी स्वर्णमयी प्रतिमाका छत्र और जूता-समन्वित पूजन करना चाहिये।
विद्वान्को चाहिये कि ‘ॐ नमो वासुदेवाय’ इस मन्त्रसे भगवान् वामनके सिरकी पूजा करके, ‘ॐ श्रीधराय नमः’ मन्त्रसे उनके मुखमण्डलकी, ‘ॐ कृष्णाय नमः’ मन्त्रसे उनके कण्ठकी, ‘ॐ श्रीपतये नमः’ मन्त्रसे उनके वक्षःस्थलकी, ‘ॐ सर्वास्त्रधारिणे नमः’ मन्त्रसे उनकी भुजाओंकी, ‘ॐ व्यापकाय नमः’ मन्त्रसे उनके कुक्षिप्रदेशकी, ‘ॐ केशवाय नमः’ मन्त्रसे उनके उदरकी, ‘ॐ त्रैलोक्यपतये नमः’ मन्त्रसे उनके मेढ्र (गुह्य)-भागकी तथा ‘ॐ सर्वभूते नमः’ मन्त्रसे उनकी जंघाओंकी और ‘ॐ सर्वात्मने नमः’ मन्त्रसे उनके पैरोंकी पूजा करनी चाहिये। उन्हें घृत और पायसका नैवेद्य समर्पित करे। कुम्भ और मोदक दे करके रात्रिमें जागरण करना चाहिये। तदनन्तर प्रातःकाल होनेपर स्नान और आचमन करे और उनकी पुनः पूजा करके पुष्पाञ्जलिसहित इस प्रकार प्रार्थना करे—
नमो नमस्ते गोविन्द बुधश्रवणसंज्ञक॥
अघौघसंक्षयं कृत्वा सर्वसौख्यप्रदो भव।
(१३६। ११-१२)
हे गोविन्द! ज्ञानस्वरूप! श्रवण नामवाले देव! आपको बारम्बार नमस्कार है। आप मेरे समस्त पापसमूहोंका विनाश करके मेरे लिये सभी सुखोंको प्रदान करनेवाले होवें।
प्रार्थनाके बाद ‘प्रीयतां देवदेवेश’—ऐसा कहते हुए ब्राह्मणोंको कलशोंका दान दे। इस व्रत-पूजाको नदीतट अथवा अन्य किसी पवित्र स्थानपर करनेसे सभी इच्छाएँ पूर्ण हो जाती हैं। (अध्याय १३६)
११९- भविष्यके राजवंशका वर्णन
| २३६ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
|---|
तिथिव्रत, वारव्रत एवं नक्षत्रादिव्रत-निरूपण और प्रतिपदादि तिथियोंमें पूजनीय देवता
**ब्रह्माजीने कहा—**कामदेवत्रयोदशी तिथिको श्वेतकमल आदिके पुष्पोंसे रति और प्रीतिसे युक्त मणिविभूषित शोकरहित कामदेवकी पूजा करनी चाहिये, इस व्रतका नाम मदनत्रयोदशी है। जो वर्षपर्यन्त प्रत्येक मासके शुक्ल और कृष्णपक्षकी चतुर्दशी एवं अष्टमी तिथिमें उपवास करके शिवपूजन करता है, वह मुक्ति प्राप्त करता है। इसे शिवचतुर्दशी तथा शिवाष्टमीव्रत कहा गया है। तीन रात्रियोंतक उपवास रखकर व्रतीको कार्तिकमासमें एक शुभ भवनका दान देना चाहिये। ऐसा करनेसे सूर्यलोककी प्राप्ति होती है, यह कल्याणकारी धामव्रत है। अमावास्या तिथिमें पितरोंको दिया गया जल आदि अक्षय होता है। नक्तव्रत करके वारोंके नामसे सूर्यादिकी पूजा करके व्रती सभी फलोंको प्राप्त करनेका अधिकारी हो जाता है। ये वारव्रत कहलाते हैं।
हे ब्रह्मर्षि ! प्रत्येक मासके नामकरणके प्रयोजक बारहोंने नक्षत्रसे युक्त उन-उन महीनोंकी पूर्णिमा तिथि हो तो उन नक्षत्रोंके नामसे मनुष्यको सम्यक्-रूपसे भगवान् अच्युतकी पूजा करनी चाहिये। इस व्रतको कार्तिकमाससे प्रारम्भ करना चाहिये। कृत्तिका नक्षत्रयुक्त कार्तिकमासमें केशवकी पूजा करनी चाहिये। क्रमशः चार महीनों (कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष तथा माघ)-में घृतका हवनकर तिल-चावल (कृसरान्न)-की खिचड़ीका भोग निवेदित करना चाहिये। आषाढ आदि चार महीनोंमें पायस निवेदन करके ब्राह्मणोंको पायसका ही भोजन निवेदित करना चाहिये। पञ्चगव्य, जलस्नान और नैवेद्यसे पूजन करना चाहिये। इस प्रकार संवत्सरके अन्तमें विशेषरूपसे भगवान्की पूजा करके निम्नलिखित मन्त्रोंसे प्रार्थना करनी चाहिये—
नमो नमस्तेऽच्युत संक्षयोऽस्तु
पापस्य वृद्धिं समुपैतु पुण्यम्।
ऐश्वर्यवित्तादिसदाऽक्षयं मे
तथास्तु मे सन्ततिरक्षयैव॥
यथाच्युत त्वं परतः परस्मात्
स ब्रह्मभूतः परतः परस्मात्।
तथाच्युतं मे कुरु वाञ्छितं सदा
मया कृतं पापहराप्रमेय॥
अच्युतानन्त गोविन्द प्रसीद यदभीप्सितम्।
तदक्षयममेयात्मन् कुरुष्व पुरुषोत्तम॥
(१३७।१०-१२)
हे अच्युत ! आपको बार-बार प्रणाम है। हे देव ! मेरे पापोंका विनाश हो और पुण्यकी वृद्धि हो। मेरे ऐश्वर्य और धनादि सदैव अक्षय रहें। मेरी सन्तान-परम्परा अक्षुण्ण हो। हे अच्युत ! जिस प्रकार आप परात्पर ब्रह्म हैं, वैसे ही मेरे मनोऽभिलषित फलको अविनाशी बना दें। हे अप्रमेय ! सदैव मेरे द्वारा किये जानेवाले पापका विनाश करते रहें। हे अच्युत ! हे अनन्त ! हे गोविन्द ! आप मुझपर प्रसन्न हों। हे अमेयात्मन् ! हे पुरुषोत्तम ! जो मेरे लिये अभीष्ट है, आप उसको भी अक्षय बना दें।
यह मास-नक्षत्रव्रत सात वर्षतक करना चाहिये। ऐसा करनेसे मनुष्यको आयु, लक्ष्मी तथा सद्गति प्राप्त होती है। यदि स्वच्छ हृदयसे उपवाससहित एक वर्षपर्यन्त यथाक्रम एकादशी, अष्टमी, चतुर्दशी और सप्तमी तिथियोंमें विष्णु, दुर्गा, शिव और सूर्यकी पूजा हो तो प्राणीको उन देवोंके लोक तो प्राप्त होते ही हैं, सभी निर्मल अभिलाषाएँ भी पूर्ण हो जाती हैं। व्रतकालमें एकभुक्त, नक्त अथवा
काण्ड ] सूर्यवंशवर्णन २३७
अयाचित एवं उपवास करते हुए शाकादिके द्वारा इन सभी तिथियोंमें सभी देवताओंकी पूजा करनेसे भोग और मोक्ष दोनोंकी प्राप्ति हो जाती है। प्रतिपदा तिथिमें कुबेर, अग्नि, नासत्य और दस्र नामक देव पूज्य हैं। द्वितीया तिथिमें लक्ष्मी तथा यमराज, पञ्चमीमें श्रीसमन्वित पार्वती और नागगणोंकी पूजा करनी चाहिये। षष्ठी तिथिमें कार्तिकेय तथा सप्तमीमें अर्थदाता सूर्यदेवकी पूजा विहित है। अष्टमी तिथिमें दुर्गा, नवमीमें मातृकाओं एवं तक्षककी पूजाका विधान है। दशमीमें इन्द्र और कुबेर तथा एकादशीमें सप्तर्षियोंकी पूजा करनी चाहिये। द्वादशी तिथिमें हरि, त्रयोदशीमें कामदेव, चतुर्दशीमें महेश्वर शिव, पूर्णिमामें ब्रह्मा तथा अमावास्यामें पितरोंकी पूजा करनी चाहिये। (अध्याय १३७)
सूर्यवंशवर्णन
श्रीहरिने कहा—हे रुद्र! अब मैं राजाओंके वंश और उनके चरितका वर्णन करता हूँ। सर्वप्रथम सूर्यवंशका वर्णन सुनें।
भगवान् विष्णुके नाभिकमलसे ब्रह्मा उत्पन्न हुए। ब्रह्माके अङ्गुष्ठभागसे दक्षका जन्म हुआ। दक्षसे उनकी पुत्री अदितिका प्रादुर्भाव हुआ, जो देवमाता कहलाती हैं। उन्हीं अदितिसे विवस्वान् (सूर्य), विवस्वान्से वैवस्वत मनु हुए और उन मनुसे इक्ष्वाकु, शर्याति, नृग, धृष्ट, पृषध्र, नरिष्यन्त, नभग, दिष्ट तथा शशक (करूष) नामक नौ पुत्रोंकी उत्पत्ति हुई। हे रुद्र! मनुकी इला नामकी कन्या थी और सुद्युम्न नामक पुत्र था। इलाके बुधसे राजा पुरूरवा उत्पन्न हुए। सुद्युम्नसे उत्कल, विनत तथा गय नामक तीन पुत्रोंका जन्म हुआ।
गोवध करनेके कारण मनुका पुत्र पृषध्र शूद्र हो गया था। करूष (शशक)-से क्षत्रिय लोगोंकी उत्पत्ति हुई, जो कारूष नामसे विख्यात हुए। मनुके पुत्र दिष्टसे जो नाभाग नामका पुत्र हुआ वह वैश्य हो गया था। उससे एक भलन्दन नामक पुत्र हुआ। भलन्दनसे वत्सप्रीति नामक पुत्रकी उत्पत्ति हुई। वत्सप्रीतिसे पांशु और खनित्र—दो पुत्रोंका जन्म हुआ। खनित्रसे भूप, भूपसे क्षुप, क्षुपसे विंश और विंशसे विविंशकने जन्म लिया।
विविंशकसे खनिनेत्र और खनिनेत्रसे विभूति नामक पुत्रका जन्म हुआ। विभूतिसे करन्धम नामक पुत्र हुआ। करन्धमसे अविक्षित, अविक्षितसे मरुत् और मरुत्से नरिष्यन्तकी उत्पत्ति मानी जाती है। नरिष्यन्तसे तम, तमसे राजवर्धन, राजवर्धनसे सुधृति, सुधृतिसे नर, नरसे केवल तथा केवलसे बन्धुमान् हुआ।
बन्धुमान्के वेगवान्, वेगवान्के बुध और बुधके तृणबिन्दु नामक पुत्र हुआ। तृणबिन्दुने अलम्बुषा नामकी अप्सरासे इलविला नामकी कन्या तथा विशाल नामक पुत्र उत्पन्न किया। विशालके हेमचन्द्र नामक पुत्र हुआ। हेमचन्द्रसे चन्द्रक, चन्द्रकसे धूम्राश्व, धूम्राश्वसे सृञ्जय, सृञ्जयसे सहदेवकी उत्पत्ति हुई। सहदेवके कृशाश्व नामक पुत्र हुआ। कृशाश्वसे सोमदत्त और सोमदत्तसे जनमेजय हुआ। जनमेजयसे सुमन्ति नामक पुत्रकी उत्पत्ति हुई। इन सभी (राजाओं)-को वैशालक कहा गया है।
वैवस्वत मनुके पुत्र शर्यातिके सुकन्या नामकी पुत्री हुई, जो च्यवन ऋषिकी भार्या बनी। शर्यातिके अनन्त नामक पुत्र भी था। उससे रेवत नामका पुत्र हुआ। रेवतके भी रैवत नामक पुत्र हुआ। उससे रेवती नामकी कन्या हुई।
वैवस्वत मनुके पुत्र धृष्टके धार्ष्ट हुआ, जो वैष्णव हो गया था। उन्हीं मनुके पुत्र नभगके
१२१- रामचरितवर्णन (रामायणकी कथा)
२३८ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-
नेदिष्ठ नामक एक पुत्रकी उत्पत्ति हुई। उससे अम्बरीष हुआ। अम्बरीषके विरूप, विरूपके पृषदश्व और उसके रथीनर हुआ, जो वासुदेवका भक्त था। मनुपुत्र इक्ष्वाकुके विकुक्षि, निमि और दण्डक तीन पुत्र हुए। विकुक्षि यज्ञीय शशक (खरगोश)- का भक्षण करनेके कारण शशाद नामसे विख्यात हुआ। शशादसे पुरञ्जय और ककुत्स्थ नामक दो पुत्र हुए। इसी ककुत्स्थसे अनेनस् (वेण) तथा अनेनस्से पृथु उत्पन्न हुआ। पृथुके विश्वरात नामक पुत्र हुआ। विश्वरातसे आर्द्रकी उत्पत्ति हुई। आर्द्रसे युवनाश्व, युवनाश्वके श्रीवत्स, श्रीवत्सके बृहदश्व, बृहदश्वके कुवलाश्व और कुवलाश्वके दृढाश्व हुआ, जिसकी प्रसिद्धि धुन्धुमारके नामसे हुई थी। दृढाश्वके चन्द्राश्व, कपिलाश्व और हर्यश्व नामक तीन पुत्र थे। हर्यश्वके निकुम्भ, निकुम्भके हिताश्व, हिताश्वके पूजाश्व और उसके युवनाश्व हुआ। युवनाश्वके मान्धाता हुए। मान्धाता एवं उनकी पत्नी बिन्दुमतीसे मुचुकुन्द, अम्बरीष तथा पुरुकुत्स नामक तीन पुत्रोंका जन्म हुआ। उनकी पचास कन्याएँ भी थीं। जिनका विवाह सौभरि मुनिके साथ हुआ था। अम्बरीषके युवनाश्व तथा युवनाश्वके हरित हुआ। पुरुकुत्सके नर्मदा नामक पत्नीसे त्रसदस्यु नामक पुत्रकी उत्पत्ति हुई। उससे अनरण्य, अनरण्यसे हर्यश्व, हर्यश्वसे वसुमना हुआ। उसीका पुत्र त्रिधन्वा था। उसके त्रय्यारुण नामक पुत्र हुआ। त्रय्यारुणके सत्यरत हुआ, जो त्रिशंकु नामसे प्रसिद्ध है। हरिश्चन्द्र इसीसे उत्पन्न हुए थे। हरिश्चन्द्रके रोहिताश्व और रोहिताश्वके हारीत हुआ। हारीतके चंचु, चंचुके विजय, विजयके रुरुक, रुरुकके वृक, वृकके राजा बाहु और बाहुके पुत्र राजा सगर माने जाते हैं। हे शिव! सगरसे सुमति नामक पत्नीके साठ हजार पुत्र हुए। उनकी दूसरी पत्नी केशिनीसे असमंजस नामक एक पुत्र हुआ। उस असमंजससे अंशुमान् तथा अंशुमान्से दिलीप नामक एक विद्वान् पुत्रने जन्म लिया। दिलीपसे भगीरथ हुए, जिनके द्वारा पृथिवीपर गङ्गा लायी गयी हैं। भगीरथका पुत्र श्रुत था। श्रुतसे नाभाग हुआ। नाभागसे अम्बरीष, अम्बरीषसे सिन्धुद्वीप, सिन्धुद्वीपसे अयुतायु हुआ। अयुतायुका पुत्र ऋतुपर्ण था, ऋतुपर्णसे सर्वकाम और सर्वकामसे सुदास, सुदाससे सौदास हुआ। जिसका नाम मित्रसह भी माना जाता है। कल्माषपाद उसीका पुत्र है, जो दमयन्तीके गर्भसे उत्पन्न हुआ था। कल्माषपादके अश्मक, अश्मकके मूलक, मूलकके दशरथ हुआ। दशरथके ऐलविल, ऐलविलके विश्वसह, विश्वसहके खट्वाङ्ग, खट्वाङ्गके दीर्घबाहु, दीर्घबाहुके अज तथा अजके दशरथ हुए। इनके महापराक्रमी चार पुत्र हुए, जो राम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न नामसे प्रसिद्ध हैं। रामसे कुश और लव, भरतसे तार्क्ष तथा पुष्कर, लक्ष्मणसे चित्राङ्गद एवं चन्द्रकेतु और शत्रुघ्नसे सुबाहु तथा शूरसेन नामक पुत्र हुए। कुशके अतिथि, अतिथिके निषध नामक पुत्र हुआ। निषधके नल तथा नलके नभस नामका पुत्र माना गया है। नभसके पुण्डरीक और पुण्डरीकसे क्षेमधन्वा नामक पुत्रने जन्म लिया। उसका पुत्र देवानीक था, उससे अहीनक, अहीनकसे रुरु तथा रुरुसे पारियात्र नामक पुत्रका जन्म हुआ। पारियात्रसे दलकी उत्पत्ति हुई और दलसे छल, छलसे उक्थ, उक्थसे वज्रनाभ और वज्रनाभसे गण, गणसे उषिताश्व, उषिताश्वसे विश्वसहकी उत्पत्ति हुई। हिरण्यनाभ उसीका पुत्र था। उसका पुत्र पुष्प्य माना गया है। पुष्प्यसे ध्रुवसन्धि, ध्रुवसन्धिसे सुदर्शन, सुदर्शनसे अग्निवर्ण, अग्निवर्णसे पद्मवर्ण हुआ। पद्मवर्णसे शीघ्र और शीघ्रसे मरु हुए। मरुसे सुश्रुत और
काण्ड ] चन्द्रवंशवर्णन २३९
उससे उदावसु नामका पुत्र उत्पन्न हुआ। उदावसुसे नन्दिवर्धन, नन्दिवर्धनसे सुकेतु, सुकेतुसे देवरातकी उत्पत्ति हुई। देवरातका पुत्र बृहदुक्थ था। बृहदुक्थके महावीर्य, महावीर्यके सुधृति, सुधृतिके धृष्टकेतु, धृष्टकेतुके हर्यश्व, हर्यश्वके मरु, मरुके प्रतीन्धक हुआ। प्रतीन्धकसे कृतिरथ और कृतिरथके देवमीढ नामक पुत्र हुआ। देवमीढसे विबुध, विबुधसे महाधृति, महाधृतिसे कीर्तिरात तथा कीर्तिरातसे महारोमा नामक पुत्र हुआ।
महारोमाके स्वर्णरोमा हुए। स्वर्णरोमाके ह्रस्वरोमा नामका पुत्र था। ह्रस्वरोमाके सीरध्वज हुआ। उसके सीता नामकी एक पुत्री हुई। सीरध्वजके कुशध्वज नामका एक भाई भी था। सीताके अतिरिक्त सीरध्वजके भानुमान् नामका एक पुत्र भी हुआ। उस भानुमान्से शतद्युम्न, शतद्युम्नसे शुचि नामक पुत्रकी उत्पत्ति हुई। शुचिके ऊर्ज नामक पुत्र था। उस ऊर्जसे सनद्वाज उत्पन्न हुआ। सनद्वाजसे कुलिने जन्म लिया। उस कुलिस अनञ्जन नामक पुत्र हुआ। अनञ्जनसे कुलजित्की उत्पत्ति हुई। उसके भी आधिनमिक नामका पुत्र था। उसका पुत्र श्रुतायु हुआ और उस श्रुतायुसे सुपार्श्व नामक पुत्रने जन्म ग्रहण किया। सुपार्श्वसे सृञ्जय, सृञ्जयसे क्षेमारि, क्षेमारिसे अनेना और उस अनेनाका पुत्र रामरथ माना गया है।
रामरथका पुत्र सत्यरथ, सत्यरथका पुत्र उपगुरु, उपगुरुका उपगुप्त तथा उपगुप्तका पुत्र स्वागत था। स्वागतसे स्ववरकी उत्पत्ति हुई। सुवर्चा उसीका पुत्र था। सुवर्चासे सुपार्श्व और सुपार्श्वसे सुश्रुत, सुश्रुतसे जयकी उत्पत्ति हुई। जयसे विजय, विजयसे ऋत, ऋतसे सुनय, सुनयसे वीतहव्य, वीतहव्यसे धृतिकी उत्पत्ति मानी गयी है। धृतिके बहुलाश्व और बहुलाश्वके कृति नामक पुत्र था। उस कृतिके जनक हुए। जनकके दो वंश कहे गये हैं, जिन्होंने योगमार्गका अनुसरण किया था। (अध्याय १३८)
चन्द्रवंशवर्णन
**श्रीहरिने कहा—**हे रुद्र! सूर्यके वंशका वर्णन तो मैंने कर दिया। अब मुझसे चन्द्रवंशका वर्णन आप सुनें।
नारायण (विष्णु)-से ब्रह्मा प्रादुर्भूत हुए। ब्रह्मासे अत्रिकी उत्पत्ति हुई। अत्रिसे सोम हुए। उनकी पत्नी तारा थी, जो पहले बृहस्पतिकी भी प्रियतमा थी। ताराने चन्द्र (सोम)-से बुधको उत्पन्न किया। उसी बुधका पुत्र पुरूरवा हुआ। बुधपुत्र पुरूरवासे उर्वशीके छः पुत्र हुए, जिनके नाम श्रुतात्मक, विश्वावसु, शतायु, आयु, धीमान् और अमावसु थे।
अमावसुके भीम, भीमके काञ्चन, काञ्चनसे सुहोत्र और सुहोत्रके जह्नु हुए। जह्नुसे सुमन्तु, सुमन्तुसे उपजापक हुआ। उसका पुत्र बलाकाश्व था। बलाकाश्वसे कुश, कुशसे कुशाश्व, कुशनाभ, अमूर्तरय और वसु नामक चार पुत्र हुए। कुशाश्वसे गाधिका जन्म हुआ। विश्वामित्र उसीके पुत्र थे। गाधिकी सत्यवती नामकी एक कन्या थी। उसको उन्होंने ब्राह्मण ऋचीकको सौंप दिया। ऋचीकके जमदग्नि नामक पुत्र हुआ। जमदग्निसे परशुराम हुए। विश्वामित्रसे देवरात तथा मधुच्छन्दा आदि अनेक पुत्रोंका जन्म हुआ।
बुधके पुत्र आयुसे नहुषकी उत्पत्ति हुई। नहुषके अनेना, राजि, रम्भक तथा क्षत्रवृद्ध नामक चार पुत्र हुए। क्षत्रवृद्धका सुहोत्र नामक पुत्र राजा हुआ। सुहोत्रके काश्य, काश और गृत्समद नामक तीन पुत्र हुए। गृत्समदसे शौनक तथा काश्यसे दीर्घतमा हुआ। दीर्घतमासे वैद्य धन्वन्तरिका जन्म हुआ। केतुमान् उन्हींका पुत्र था। केतुमान्से भीमरथ,
२४० संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-
भीमरथसे दिवोदास, दिवोदाससे प्रतर्दन हुआ, जो शत्रुजित् नामसे विख्यात हुआ।
ऋतध्वज उसी शत्रुजित्का पुत्र था। ऋतध्वजसे अलर्क, अलर्कसे सन्नति, सन्नतिसे सुनीत, सुनीतसे सत्यकेतु, सत्यकेतुसे विभु नामक पुत्र हुआ। विभुसे सुविभु, सुविभुसे सुकुमार, सुकुमारसे धृष्टकेतुकी उत्पत्ति हुई। उस धृष्टकेतुका पुत्र वीतिहोत्र था। वीतिहोत्रके भर्ग और भर्गके भूमिक नामका पुत्र हुआ। ये सभी विष्णुधर्मपरायण राजा थे।
नहुषपुत्र राजि या रजिके पाँच सौ पुत्र थे, जिनका संहार इन्द्रने किया था। नहुषके पुत्र क्षत्रवृद्धसे प्रतिक्षत्र हुए। उसका पुत्र संजय था। संजयके भी विजय हुआ। विजयका पुत्र कृत था। कृतके वृषधन, वृषधनसे सहदेव, सहदेवसे अदीन और अदीनके जयत्सेन हुआ। जयत्सेनसे संकृति और संकृतिसे क्षत्रधर्माकी उत्पत्ति हुई।
नहुषके क्रमशः यति, ययाति, संयाति, अयाति तथा विकृति नामक अन्य पाँच पुत्र थे। ययातिसे देवयानीने यदु और तुर्वसु नामक दो पुत्रोंको जन्म दिया। राजा वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठाने ययातिसे द्रुह्यु, अनु और पूरु नामक तीन पुत्रोंको उत्पन्न किया।
यदुके सहस्त्रजित्, क्रोष्टुमना और रघु नामक तीन पुत्र थे। सहस्त्रजित्से शतजित्, शतजित्से हय तथा हैहय नामक दो पुत्र हुए। हयसे अनरण्य तथा हैहयसे धर्म हुआ। धर्मका पुत्र धर्मनेत्र हुआ। उस धर्मनेत्रका पुत्र कुन्ति था। कुन्तिसे साहंजि हुआ। साहंजिसे महिष्मान्, महिष्मान्से भद्रश्रेण्य, भद्रश्रेण्यसे दुर्दमकी उत्पत्ति हुई। दुर्दमसे धनक, कृतवीर्य, जानकि, कृताग्नि, कृतवर्मा और कृतौजा नामक छह बलवान् पुत्र हुए। कृतवीर्यसे अर्जुन तथा अर्जुनसे शूरसेन नामक पुत्र हुआ। उस पुत्रके अतिरिक्त कृतवीर्यके जयध्वज, मधु, शूर और वृषण नामक चार पुत्र हुए। शूरसेनसहित ये पाँचों पुत्र बड़े ही सुव्रती थे। जयध्वजसे तालजंघ, तालजंघसे भरत हुआ। कृतवीर्य वृषणका पुत्र मधु था। मधुसे वृष्णि हुआ, जिससे वृष्णिवंशियोंकी उत्पत्ति हुई।
क्रोष्टुके विजज्ञिवान् हुआ। उस विजज्ञिवान्का पुत्र आहि था। आहिसे उशंकु हुआ। उसका पुत्र चित्ररथ था। चित्ररथसे शशबिन्दु हुआ, जिसके एक लाख पत्नियाँ तथा पृथुकीर्ति, पृथुजय, पृथुदान, पृथुश्रवा आदि श्रेष्ठ दस लाख पुत्र थे। पृथुश्रवासे तम, तमसे उशना हुआ। उसका पुत्र शितगु था। तत्पश्चात् उसके श्रीरुक्मकवच हुआ। श्रीरुक्मकवचसे रुक्म, पृथुरुक्म, ज्यामघ, पालित और हरि—ये चार पुत्र हुए। ज्यामघसे विदर्भका जन्म हुआ।
विदर्भकी शैब्या नामकी एक पत्नी थी, उससे विदर्भने क्रथ, कौशिक तथा रोमपाद नामक तीन पुत्रोंको जन्म दिया। रोमपादसे बभ्रु और बभ्रुसे धृति हुआ।
कौशिकके ऋचि नामक पुत्र था। उसीसे चेदि नामका राजा हुआ। इसका पुत्र कुन्ति था। कुन्तिसे वृष्णि नामक पुत्र हुआ। वृष्णिसे निवृत्ति, निवृत्तिसे दशार्ह, दशार्हसे व्योम और व्योमसे जीमूत नामका पुत्र हुआ। जीमूतसे विकृतिका जन्म हुआ। उस विकृतिका पुत्र भीमरथ था। भीमरथसे मधुरथ और मधुरथसे शकुनि उत्पन्न हुआ। शकुनिका पुत्र करम्भि था। उस करम्भिका पुत्र देवमान् माना जाता है। देवमान् या देवनतसे देवक्षत्र तथा देवक्षत्रसे मधु नामक पुत्र हुआ। मधुसे कुरुवंश, कुरुवंशसे अनु, अनुसे पुरुहोत्र, पुरुहोत्रसे अंशु, अंशुसे सत्त्वश्रुत और उससे सात्वत नामका राजा हुआ।
सात्वतके भजिन्, भजमान्, अन्धक, महाभोज, वृष्णि, दिव्यावन्य तथा देवावृध नामक सात पुत्र हुए। भजमान्से निमि, वृष्णि, अयुताजित्, शतजित्, सहस्त्राजित्, बभ्रु, देव और बृहस्पति नामके पुत्र हुए।