भारतकोश
संग्रह पर लौटें

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ
९४संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

वह भोगोंका उपभोग करते हुए गायक और वेश्या आदिको धन देता है।

नन्दनिधिसे युक्त व्यक्ति राजस और तामस गुणोंवाला होता है। वही कुलका आधार बनता है। वह स्तुति करनेपर प्रसन्न होता है तथा बहुत-सी स्त्रियोंका पति होता है। पूर्वकालके मित्रोंमें उसकी प्रीति शिथिल होती है और वह अन्य नये मित्रोंके साथ प्रेम करने लगता है।

नीलनिधिके चिह्नसे सुशोभित मानव सात्त्विक तेजसे संयुक्त होता है। वह वस्त्र-धान्यादिका संग्रह तथा तडागादिका निर्माण करता है। उसके द्वारा (जनहितमें) आम्रादिके उद्यान भी लगवाये जाते हैं। उसकी सम्पत्ति तीन पीढ़ी तक रहती है।

शङ्खनिधि एक ही पुरुष (पीढ़ी)-के लिये होती है। इससे समन्वित मनुष्य धनादिका स्वयं तो उपभोग करता है, किंतु उसके परिजन कुत्सित अन्नका भोजन तथा अच्छे न लगनेवाले मैले-कुचैले वस्त्रोंसे जीवनयापन करते हैं। वह स्वयंके भरण-पोषणमें सदैव तत्पर रहता है। यदि वह किसीको कुछ वस्तु देता भी है तो वह व्यर्थकी वस्तु होती है (जिसका कोई उपयोग नहीं होता)।

मिश्र (मिली-जुली)-निधिके चिह्नसे युक्त होनेपर मनुष्यके स्वभावमें मिश्रित फल दिखलायी देते हैं।

भगवान् विष्णुने भी निधियोंके ऐसे ही स्वरूपका वर्णन शिव आदि देवोंसे किया था (उसको मैंने आप सभीको सुना दिया)। अब हरिने भुवनकोशादिका जैसा वर्णन किया था, वैसा ही मैं कह रहा हूँ। (अध्याय ५३)


भुवनकोशवर्णनमें राजा प्रियव्रतके वंशका निरूपण

श्रीहरिने कहा— राजा प्रियव्रतके आग्नीध्र, अग्निबाहु, वपुष्मान्, द्युतिमान्, मेधा, मेधातिथि, भव्य, शबल, पुत्र और ज्योतिष्मान् नामके दस पुत्र हुए थे।

इन पुत्रोंमेंसे मेधा, अग्निबाहु तथा पुत्र नामक तीन पुत्र योगपरायण (योगी), जातिस्मर (इन्हें पूर्वजन्मका वृत्तान्त विस्मृत नहीं हुआ था) तथा महासौभाग्यशाली थे। इन लोगोंने राज्यके प्रति अपनी कोई अभिरुचि प्रकट नहीं की, अतः राजाने सप्तद्वीपा पृथिवीको अपने अन्य सात पुत्रोंमें विभक्त कर दिया।

पचास करोड़ योजनमें विस्तृत सम्पूर्ण पृथिवी नदीकी जलराशिमें तैरती हुई नौकाके समान चारों ओर अवस्थित अथाह जलके ऊपर स्थित है।

हे शिव! जम्बू, प्लक्ष, शाल्मल, कुश, क्रौञ्च, शाक तथा पुष्कर नामक ये सात द्वीप हैं, जो सात समुद्रोंसे घिरे हुए हैं। उन सात समुद्रोंके नाम लवण, इक्षु, सुरा, घृत, दधि, दुग्ध और जलके सागररूपमें प्रसिद्ध हैं। हे वृषभध्वज! ये सभी द्वीप तथा समुद्र उक्त क्रममें एक-दूसरेसे द्विगुण परिमाणमें अवस्थित हैं।

जम्बूद्वीपमें मेरु नामक पर्वत है, जो एक लाख योजनके परिमाणमें फैला हुआ है। इसकी ऊँचाई चौरासी हजार योजन है। इसका अधोभाग पृथिवीमें सोलह हजार योजन धँसा हुआ है और शिखरदेश बत्तीस हजार योजन विस्तृत है। इसका अधोभाग जो पृथिवीके ऊपर सन्निहित है, वह भी सोलह हजार योजनके विस्तारमें कर्णिकाके रूपमें अवस्थित है। इसके दक्षिणमें हिमालय, हेमकूट तथा निषध, उत्तरमें नील, श्वेत और शृंगी नामक वर्षपर्वत हैं।

हे रुद्र! प्लक्ष आदि द्वीपोंके निवासी मरणादिसे मुक्त हैं। उनमें युग या अवस्थाके आधारपर कोई विषमता नहीं है।

जम्बूद्वीपके राजा आग्नीध्रके नौ पुत्र उत्पन्न हुए। उन सभीका नाम क्रमशः—नाभि, किम्पुरुष,

४३- ग्रहोंके शुभ एवं अशुभ स्थान तथा उनके अनुसार शुभाशुभ फलका संक्षिप्त विवेचन

काण्ड ] भारतवर्षका वर्णन ९५

हरिवर्ष, इलावृत, रम्य, हिरण्मय, कुरु, भद्राश्व और केतुमाल था। राजाने उन सभी पुत्रोंको उनके नामसे ही अभिहित (प्रसिद्ध) एक-एक भूखण्ड प्रदान किया। हे हर ! राजा नाभि और उनकी पत्नी मेरुदेवीसे ऋषभ नामक पुत्र हुए थे, उनसे भरत नामके पुत्र हुए, जो शालग्रामतीर्थमें स्थित रहकर विभिन्न व्रतोंके पालनमें ही निरत रहते थे। उन भरतसे सुमति नामक पुत्र हुआ और उसका पुत्र तैजस हुआ।

तैजसके इन्द्रद्युम्न, इन्द्रद्युम्नसे परमेष्ठी, परमेष्ठीके प्रतीहार तथा प्रतीहारसे प्रतिहर्ता नामक पुत्र कहे गये हैं।

प्रतिहर्ताके पुत्र प्रस्तार, प्रस्तारके पुत्र विभु, विभुके पुत्र नक्त और नक्तके पुत्र गय नामके राजा हुए।

गयका पुत्र नर हुआ। नरसे विराट्, विराट्से महातेजस्वी धीमान्, धीमान्से भौवन नामके पुत्रकी उत्पत्ति हुई। भौवनके त्वष्टा, त्वष्टाके विरजा, विरजाके रज, रजके शतजित् तथा शतजित्के विष्वग्ज्योति नामक पुत्र हुआ था। (अध्याय ५४)

भारतवर्षका वर्णन

श्रीहरिने कहा— हे वृषभध्वज ! जम्बूद्वीपके मध्यभागमें इलावृत नामक वर्ष है। उसके पूर्वमें अद्भुत भद्राश्ववर्ष तथा उसके पूर्व-दक्षिण (अग्निकोण)-में हिरण्वान् नामक वर्ष है।

मेरुके दक्षिणभागमें किम्पुरुषवर्ष कहा गया है। उसके दक्षिणभागमें भारतवर्ष कहा गया है। मेरुके दक्षिण-पश्चिममें हरिवर्ष, पश्चिममें केतुमालवर्ष, पश्चिमोत्तरमें रम्यक् और उत्तरमें कुरुवर्ष स्थित हैं, जिनके भू-भाग कल्पवृक्षोंसे आच्छादित हैं।

हे रुद्र ! भारतवर्षको छोड़कर अन्य सभी वर्षोंमें सिद्धि स्वभावसे ही प्राप्त हो जाती है। यहाँ इन्द्रद्वीप, कशेरुमान्, ताम्रवर्ण, गभस्तिमान्, नागद्वीप, कटाह, सिंहल और वारुण नामक आठ वर्ष हैं। नवाँ वर्ष भारतवर्ष है, जो चतुर्दिक समुद्रसे घिरा हुआ है।

इस (भारतवर्ष)-के पूर्वमें किरात तथा पश्चिममें यवन देश स्थित हैं। हे रुद्र ! दक्षिणमें आन्ध्र, उत्तरमें तुरुष्का आदि देश हैं। इस भारतवर्षमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्रवर्णके लोग रहते हैं।

यहाँ महेन्द्र, मलय, सह्य, शुक्तिमान्, ऋक्ष, विन्ध्य और पारियात्र—ये सात कुलपर्वत हैं। इस वर्षमें वेद, स्मृति, नर्मदा, वरदा, सुरसा, शिवा, तापी, पयोष्णी, सरयू, कावेरी, गोमती, गोदावरी, भीमरथी, कृष्णवेणी, महानदी, केतुमाला, ताम्रपर्णी, चन्द्रभागा, सरस्वती, ऋषिकुल्या, कावेरी, मत्तगङ्गा, पयस्विनी, विदर्भा, शतद्रू नामक मङ्गल प्रदान करनेवाली तथा पापविनाशिनी नदियाँ हैं, जिनके जलका पान मध्यदेशादिके निवासीजन करते हैं।

पाञ्चाल, कुरु, मत्स्य, यौधेय, पटच्चर, कुन्त तथा शूरसेन देशके निवासी मध्यदेशीय हैं। पाद्म, सूत, मागध, चेदि, काशेय तथा विदेह पूर्वमें स्थित हैं। कोशल, कलिंग, वंग, पुण्ड्र, अंग और विदर्भ-मूलकजनोंके देश और विन्ध्यपर्वतके अन्तर्गत विद्यमान देश पूर्व तथा दक्षिणके तटवर्ती भूभागमें स्थित हैं। पुलिन्द, अश्मक, जीमूत, नय राष्ट्रमें निवास करनेवाले, कर्णाटक, कम्बोज तथा घण—ये दक्षिणापथ भूभागके निवासी हैं। अम्बष्ठ, द्रविड़, लाट, कम्बोज, स्त्रीमुख, शक और आनर्तवासी दक्षिण-पश्चिमके निवासी हैं।

स्त्रीराज्य, सैन्धव, म्लेच्छ, नास्तिक, यवन, मथुरा तथा निषधके रहनेवाले लोगोंके देश पश्चिमी

४४- लग्न-फल, राशियोंके चर-स्थिर आदि भेद, ग्रहोंका स्वभाव तथा सात वारोंमें किये जाने योग्य प्रशस्त कार्य

९६संक्षिप्त गरुड़पुराण[ आचार-

भूभाग हैं। माण्डव्य, तुषार, मूलिका, अश्ममुख, खश, महाकेश, महानास देश उत्तर-पश्चिमभागमें स्थित हैं।

लम्बक, स्तननाग, माद्र, गान्धार, बाह्निक तथा म्लेच्छ देश हिमाचलके उत्तरतटवर्ती भूभागमें स्थित हैं। त्रिगर्त, नील, कोलात, ब्रह्मपुत्र, सटङ्गण, अभीषाह और कश्मीर देश उत्तर-पूर्व-दिशामें अवस्थित कहे गये हैं। (अध्याय ५५)


प्लक्ष तथा पुष्कर आदि द्वीपों एवं पाताल आदिका निरूपण

श्रीहरिने कहा—प्लक्षद्वीपके स्वामी मेधातिथिके सात पुत्र थे। उन सबमें शान्तभव नामक पुत्र ज्येष्ठ था। उससे छोटा शिशिर था। तदनन्तर सुखोदय, नन्द, शिव और क्षेमक हुए। उनका जो सातवाँ भाई था, वह ध्रुव नामसे प्रसिद्ध हुआ—ये सभी प्लक्षद्वीपके राजा बने।

इस द्वीपमें गोमेद, चन्द्र, नारद, दुन्दुभि, सोमक, सुमनस और वैभ्राज नामक सात पर्वत हैं। यहाँ अनुप्ता, शिखी, विपाशा, त्रिदिवा, क्रमु, अमृता तथा सुकृता नामकी सात नदियाँ प्रवाहित होती रहती हैं।

वपुष्मान् शाल्मकद्वीपके स्वामी थे। उस द्वीपमें अवस्थित सात वर्षोंके नामसे ही प्रसिद्ध उनके सात पुत्र थे, जिनके नाम श्वेत, हरित, जीमूत, रोहित, वैद्युत, मानस और सुप्रभ हैं।

यहाँ कुमुद, उन्नत, द्रोण, महिष, बलाहक, क्रौञ्च तथा ककुद्मान् नामक सात पर्वत हैं। योनि, तोया, वितृष्णा, चन्द्रा, शुक्ला, विमोचनी और विधृति—ये सात नदियाँ हैं। ये पापोंका प्रशमन करनेवाली हैं।

कुशद्वीपमें ज्योतिष्मान्‌का स्वामित्व था। उनके भी सात पुत्र उत्पन्न हुए थे। वे उद्भिद, वेणुमान्, द्वैरथ, लम्बन, धृति, प्रभाकर और कपिल नामसे प्रसिद्ध थे। उन्हींके नामसे इस द्वीपके जो सात वर्ष थे, वे प्रसिद्ध हुए। यहाँ विद्रुम, हेमशैल, द्युमान्, पुष्पवान्, कुशेशय, हरि तथा मन्दराचल नामक सात वर्षपर्वत हैं। यहाँ धूतपापा, शिवा, पवित्रा, सन्मति, विद्युद्दभ्र, मही और काशा नामकी ये सात नदियाँ हैं, जो सब प्रकारके पापोंको विनष्ट करनेवाली हैं।

हे शिव! क्रौञ्चद्वीपके अधीश्वर महात्मा द्युतिमान्‌के भी सात पुत्र हुए। कुशल, मन्दग, उष्ण, पीवर, अन्धकारक, मुनि और दुन्दुभि—ये उनके नाम हैं।

यहाँ क्रौञ्च, वामन, अन्धकारक, दिवावृत्, महाशैल, दुन्दुभि तथा पुण्डरीकवान् नामके सात वर्षपर्वत हैं। यहाँपर गौरी, कुमुद्वती, संध्या, रात्रि, मनोजवा, ख्याति और पुण्डरीका—ये सात नदियाँ (प्रवाहित होती रहती) हैं।

शाकद्वीपके राजा भव्यके भी सात पुत्र उत्पन्न हुए। वे जलद, कुमार, सुकुमार, अरूणीबक, कुसुमोद, समोदार्कि तथा महाद्रुम नामसे ख्यातिप्राप्त थे। यहाँ सुकुमारी, कुमारी, नलिनी, धेनुका, इक्षु, वेणुका और गभस्ति नामसे प्रसिद्ध सात नदियाँ हैं।

पुष्करद्वीपके स्वामी महाराज शबलके महावीर तथा धातकि नामक दो पुत्र हुए। उन्हींके नामसे यहाँपर दो वर्ष हैं। इन दोनोंके मध्य एक ही मानसोत्तर नामक वर्षपर्वत है। यह पचास सहस्र योजनमें विस्तृत तथा इतना ही ऊँचा है। यह चतुर्दिक् विस्तारमें भी उसी परिमाणको प्राप्तकर मण्डलाकार अवस्थित है। इस पुष्करद्वीपको स्वादिष्ट जलवाला समुद्र चारों ओरसे घेरकर स्थित है। उस

४५- सामुद्रिक शास्त्रके अनुसार स्त्री-पुरुषके शुभाशुभ लक्षण, मस्तक एवं हस्तरेखासे आयुका परिज्ञान

काण्ड ] भुवनकोश-वर्णनमें सूर्य तथा चन्द्र आदि नौ ग्रहोंके रथोंका विवरण ९७

स्वादिष्ट जलवाले समुद्रके सामने उससे द्विगुण जनजीवनसे रहित स्वर्णमयी भूमिवाली जगत्की स्थिति दिखायी देती है। वहाँपर दस हजार योजनमें फैला हुआ लोकालोक नामक पर्वत है। वह अन्धकारसे आच्छादित है और वह अन्धकार भी अण्डकटाहसे आवृत है।

श्रीहरिने कहा—हे वृषभध्वज ! इस भूमिकी ऊँचाई सत्तर हजार योजन है। इसमें दस-दस सहस्र योजनकी दूरीपर एक-एक पाताललोक स्थित हैं, जिन्हें अतल, वितल, नितल, गभस्तिमान्, महातल, सुतल तथा पाताल कहा जाता है।

इन लोकोंकी भूमि कृष्ण, शुक्ल, अरुण, पीत, शर्करा-सदृश, शैलमयी तथा स्वर्णमयी है। वहाँपर दैत्य तथा नागोंका निवास है। हे रुद्र! दारुण पुष्करद्वीपमें जो नरक स्थित हैं, उनके विषयमें आप सुनें। वहाँ रौरव, सूकर, रोध, ताल, विशसन, महाज्वाल, तप्तकुम्भ, लवण, विमोहित, रुधिर, वैतरणी, कृमिश, कृमिभोजन, असिपत्रवन, कृष्ण, नानाभक्ष (लालाभक्ष), दारुण, पूयवह, पाप, वह्निज्वाल, अधःशिरा, संदंश, कृष्णसूत्र, तमस्, अवीचि, श्वभोजन, अप्रतिष्ठ तथा उष्णवीचि नामक नरक हैं। उनमें विष देनेवाले, शस्त्रसे हत्या करनेवाले तथा अग्निसे जलाकर मारनेवाले पापीजन अपने-अपने पापका फलभोग करते हैं।

हे रुद्र! यथाक्रम उनके ऊपर अन्य लोकोंकी स्थिति है। उन लोकोंको क्रमशः—जल, अग्नि, वायु तथा आकाश घेरे हुए है। इस प्रकार अवस्थित ब्रह्माण्ड प्रधान तत्त्वसे आवेष्टित है। वह ब्रह्माण्ड अन्य ब्रह्माण्डोंकी अपेक्षा दस गुना अधिक है। इसे परिव्याप्तकर स्वयं नारायण अवस्थित रहते हैं।

(अध्याय ५६-५७)


भुवनकोश-वर्णनमें सूर्य तथा चन्द्र आदि नौ ग्रहोंके रथोंका विवरण

श्रीहरिने कहा—हे वृषभध्वज ! अब मैं सूर्यादि ग्रहोंकी स्थिति एवं उनके परिमाणसे सम्बन्धित विषयका वर्णन कर रहा हूँ।

सूर्यदेवके रथका विस्तार नौ हजार योजन है। उसका ईषादण्ड अर्थात् जुआ तथा रथके बीचका जो भाग है, वह उस रथ-विस्तारका दुगुना है। उसकी धुरी एक करोड़ सत्तावन लाख योजन लम्बी है तथा उसमें चक्र लगा हुआ है। उस चक्रकी (पूर्वाह्न, मध्याह्न तथा अपराह्नरूप) तीन नाभियाँ हैं, (परिवत्सरादिक) पाँच अरे हैं, (वसन्तादि षड्ऋतुरूपी) छः नेमियाँ हैं तथा अक्षयस्वरूपवाले संवत्सरसे युक्त उस चक्रमें सम्पूर्ण कालचक्र सन्निहित है। सूर्यके रथकी दूसरी धुरी चालीस हजार योजन लम्बी है।

हे वृषभध्वज! रथके जो पहियोंके अक्ष हैं, वे साढ़े पाँच हजार योजन लम्बे हैं। रथके कहे गये प्रधान दोनों अक्षोंके परिमाणके समान जुएके दोनों अर्द्धोंकी लम्बाई है। सबसे छोटा अक्ष जुएके अर्द्धभाग-परिमाणवाला है, जो रथके ध्रुवाधारपर अवस्थित है। रथके दूसरे अक्षमें चक्र लगा हुआ है, जो मानसोत्तर पर्वतपर स्थित है।

गायत्री, बृहती, उष्णिक्, जगती, त्रिष्टुप्, अनुष्टुप् तथा पंक्ति नामक—ये सात छन्द ही सूर्यके सात घोड़े कहे गये हैं।

चैत्रमासमें सूर्यके इस रथपर धाता नामक आदित्य, क्रतुस्थला नामक अप्सरा, पुलस्त्य

४६- स्त्रियोंके शुभाशुभ लक्षण

९८संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

ऋषि, वासुकि नाग, रथकृत् ग्रामणी, हेति नामका राक्षस और तुम्बुरु गन्धर्व स्थित रहते हैं। वैशाखमासमें इस रथपर अर्यमा नामवाले आदित्य, पुलह ऋषि, रथौजा यक्ष, पुञ्जिकस्थला अप्सरा, प्रहेति राक्षस, कच्छनीर सर्प तथा नारद नामक गन्धर्व आसीन रहते हैं। ज्येष्ठमासमें सूर्यके इस रथमें मित्र नामक आदित्य, अत्रि ऋषि, तक्षक नाग, पौरुषेय राक्षस, मेनका अप्सरा, हाहा नामक गन्धर्व और रथस्वन यक्षका वास रहता है।

आषाढ़मासमें इस रथके ऊपर वरुण नामसे प्रसिद्ध आदित्य, वसिष्ठ ऋषि, रम्भा तथा सहजन्या नामक अप्सरा, हूहू गन्धर्व, रथचित्र नामक यक्ष एवं राक्षसगुरु शुक्र निवास करते हैं। श्रावणमासमें इस रथपर इन्द्र नामसे विख्यात आदित्य, विश्वावसु गन्धर्व, स्रोत नामक यक्ष, एलापत्र सर्प, अङ्गिरा ऋषि, प्रम्लोचा अप्सरा और सर्प नामक राक्षसोंका निवास रहता है। भाद्रपदमासमें विवस्वान् नामक आदित्य, उग्रसेन गन्धर्व, भृगु ऋषि, आपूरण नामक यक्ष, अनुम्लोचा नामक अप्सरा, शंखपाल नामक सर्प तथा व्याघ्र राक्षसका सूर्य-रथमें निवास रहता है।

आश्विनमासमें इस रथपर पूषा नामक आदित्य, सुरुचि नामक गन्धर्व, धाता एवं गौतम ऋषि, धनञ्जय नाग, सुषेण तथा घृताची अप्सराका वास होता है। कार्तिकमासमें पर्जन्य नामके आदित्य, विश्वावसु गन्धर्व, भरद्वाज ऋषि, ऐरावत सर्प, विश्वाची अप्सरा, सेनजित् यक्ष एवं आप नामक राक्षसका निवास उस रथपर रहता है। मार्गशीर्षमासमें अंशु नामक आदित्य, कश्यप ऋषि, तार्क्ष्य, महापद्म नाग, उर्वशी अप्सरा, चित्रसेन गन्धर्व और विद्युत् नामक राक्षस उस रथमें संचरण करते हैं।

पौषमासमें भर्ग नामके आदित्य, क्रतु ऋषि, ऊर्णायु गन्धर्व, स्फूर्ज राक्षस, कर्कोटक नाग, अरिष्टनेमि यक्ष तथा पूर्वचित्ति नामक अप्सरा सूर्यमण्डलमें निवास करते हैं। माघमासमें त्वष्टा नामक आदित्य, जमदग्नि ऋषि, कम्बल सर्प, तिलोत्तमा अप्सरा, ब्रह्मापेत राक्षस, ऋतजित् यक्ष और धृतराष्ट्र नामक गन्धर्व सूर्यमण्डलमें रहते हैं। फाल्गुनमासमें विष्णु नामक आदित्य, अश्वतर सर्प, रम्भा अप्सरा, सूर्यवर्चा गन्धर्व, सत्यजित् यक्ष, विश्वामित्र ऋषि और यज्ञापेत राक्षसका उस रथमें वास रहता है।

हे ब्रह्मन्! भगवान् विष्णुकी शक्तिसे तेजोमय बने मुनिगण सूर्यमण्डलके सामने उपस्थित रहकर उनकी स्तुति करते हैं, गन्धर्वजन यशोगान करते हैं। अप्सराएँ नृत्य करती हैं। राक्षस उस रथके पीछे-पीछे चलते हैं। सर्प उस रथको वहन करते हैं और यक्षगण उसकी बागडोर सँभालनेका कार्य करते हैं। बाल्यखिल्य नामक ऋषिगण उस रथको सब ओरसे घेरकर स्थित रहते हैं।

चन्द्रमाका रथ तीन पहियोंवाला है। उसके घोड़े कुन्द-पुष्पके समान श्वेतवर्णवाले हैं। वे रथके जुएमें बायें और दाहिने दोनों ओर जुतकर उसे खींचते हैं। उनकी संख्या दस है।

चन्द्रमाके पुत्र बुधका रथ जल तथा अग्निसे मिश्रित द्रव्यका बना हुआ है। उसमें वायुके समान वेगशाली पिशंग (भूरे) वर्णके आठ घोड़े जुते रहते हैं।

शुक्रका महान् रथ सैन्यबलसे युक्त, अनुकर्ष (रथको सुदृढ बनानेके लिये सम्पन्न रथके नीचे लगा काष्ठविशेष), ऊँचे शिखरवाला, पृथिवीपर उत्पन्न होनेवाले घोड़ोंसे संयुक्त, उपासङ्ग (तरकश) तथा ऊँची पताकासे विभूषित है।

भूमिपुत्र मंगलका महान् रथ तपाये गये स्वर्णके सदृश काञ्चन वर्णवाला है। उसमें आठ घोड़े लगे रहते हैं, जो अग्निसे प्रादुर्भूत हैं तथा पद्मरागमणिके समान अरुण वर्णके हैं।

४७- स्त्री एवं पुरुषोंके शुभाशुभ लक्षण

काण्ड ] ज्योतिश्चक्रमें वर्णित नक्षत्र, उनके देवता एवं कतिपय शुभ-अशुभ योगोंका वर्णन ९९


आठ पाण्डुर (कुछ पीलापन लिये हुए सफेद) वर्णके घोड़ोंसे युक्त स्वर्णके रथपर विद्यमान बृहस्पति एक-एक राशिमें एक-एक वर्ष स्थित रहते हैं।

शनिका रथ आकाशसे उत्पन्न हुए चितकबरे घोड़ोंसे युक्त है। वे उसमें चढ़कर धीरे-धीरे चलते हैं। उनका मन्दगामी भी नाम है।

स्वर्भानु अर्थात् राहुके [रथमें] आठ घोड़े हैं, जो भ्रमरके सदृश काले हैं। उसका रथ धूसर* वर्णका है। हे भूतेश शिव! उन घोड़ोंको एक बार रथमें जोत दिये जानेपर वे निरन्तर चलते रहते हैं। इसी प्रकार केतुके रथमें भी वायुके समान वेगवाले आठ घोड़े हैं। उनके वर्णोंकी आभा पुवालसे निकलनेवाले धुएँके सदृश तथा लाक्षारसकी भाँति अरुण रंगकी है।

[हे शिव! इस प्रकार सूर्य-चन्द्रादि उपर्युक्त ग्रहोंसे युक्त] द्वीप, नदी, पर्वत, समुद्र आदिसे समन्वित समस्त भुवन-मण्डल भगवान् विष्णुका विराट् शरीर ही है। (अध्याय ५८)


ज्योतिश्चक्रमें वर्णित नक्षत्र, उनके देवता एवं कतिपय शुभ-अशुभ योगों तथा मुहूर्तोंका वर्णन

श्रीसूतजीने कहा— [ऋषियो!] केशवने भगवान् शिवसे पृथिवीका परिमाण बताकर कहा कि हे रुद्र! ज्योतिष्-शास्त्रकी गणना चार लाखमें है, पर उनमेंसे मैं अब ज्योतिश्चक्र अर्थात् नक्षत्रोंसे युक्त राशिचक्रका संक्षेपसे वर्णन करूँगा, जो सब कुछ देनेवाला है।

श्रीहरिने कहा— हे शिव! कृत्तिका नक्षत्रके देवता अग्नि हैं। रोहिणी नक्षत्रके देवता ब्रह्मा हैं। मृगशिराके चन्द्रमा तथा आर्द्राके रुद्र देवता कहे गये हैं। इसी प्रकार पुनर्वसुके आदित्य तथा तिष्य पुष्यके गुरु हैं। आश्लेषा नक्षत्रके सर्प तथा मघा नक्षत्रके देवता पितृगण हैं। पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्रके देवता भाग्य (भग), उत्तराफाल्गुनीके अर्यमा, हस्तके सविता और चित्राके देवता त्वष्टा हैं। स्वाती नक्षत्रके देवता वायु और विशाखा नक्षत्रके देवता इन्द्राग्नि हैं। अनुराधा नक्षत्रके देवता मित्र और ज्येष्ठाके शक्र (इन्द्र) देवता कहे गये हैं। नक्षत्रज्ञ विद्वानोंने मूल नक्षत्रका देवता निर्ऋतिको बताया है। पूर्वाषाढ नक्षत्रके देवता आप तथा उत्तराषाढके विश्वेदेव हैं। अभिजित्के देवता ब्रह्मा और श्रवणके विष्णु कहे गये हैं। धनिष्ठा नक्षत्रके देवता वसु तथा शतभिषाके वरुण कहे गये हैं। पूर्वाभाद्रपद नक्षत्रके देवता अजपाद, उत्तराभाद्रपदके अहिर्बुध्न्य, रेवतीके पूषा, अश्विनीके अश्विनीकुमार और भरणीके यम देवता कहे गये हैं।

प्रतिपदा तथा नवमी तिथिमें ब्रह्माणी नामकी योगिनी पूर्व दिशामें अवस्थित रहती है। द्वितीया और दशमी तिथिमें माहेश्वरी नामक योगिनी उत्तर दिशामें रहती है। पञ्चमी तथा त्रयोदशी तिथिमें वाराही नामक योगिनी दक्षिण दिशामें स्थित रहती है।

षष्ठी और चतुर्दशी तिथिमें इन्द्राणी नामकी योगिनीका वास पश्चिममें होता है। सप्तमी और पौर्णमासी तिथिमें चामुण्डा नामसे अभिहित योगिनीका निवास वायुगोचर अर्थात् वायव्यकोणमें रहता है। अष्टमी तथा अमावास्यामें महालक्ष्मी नामकी योगिनी ईशानकोणमें रहती है। एकादशी एवं तृतीया तिथिमें वैष्णवी नामकी योगिनी अग्निकोणमें वास करती है। द्वादशी और चतुर्थी


* थोड़े पाण्डु वर्णको धूसर और कुछ पीलापन लिये सफेद वर्णको पाण्डुरवर्ण कहते हैं।

१००संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

तिथिमें कौमारी नामवाली योगिनीका निवास नैर्ऋत्यकोणमें रहता है। योगिनीके सम्मुख रहनेपर यात्रा नहीं करनी चाहिये।

अश्विनी, अनुराधा, रेवती, मृगशिरा, मूल, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त और ज्येष्ठा नक्षत्र प्रस्थान (यात्रा)-के लिये प्रशस्त कहे गये हैं।

हस्त, चित्रा, स्वाती, विशाखा, अनुराधा—ये पाँच नक्षत्र तथा उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ, उत्तराभाद्रपद, अश्विनी, रोहिणी, पुष्य, धनिष्ठा और पुनर्वसु नक्षत्र नवीन वस्त्र धारण करनेके लिये श्रेष्ठ हैं।

कृत्तिका, भरणी, अश्लेषा, मघा, मूल, विशाखा तथा पूर्वाभाद्रपद, पूर्वाषाढ और पूर्वाफाल्गुनी—इन नक्षत्रोंको अधोमुखी कहा गया है। इन अधोमुखी नक्षत्रोंमें वापी, तडाग, सरोवर, कूप, भूमि, तृण आदिका खनन, देवालयके लिये नींवआदिके खननका शुभारम्भ, भूमि आदिमें गड़ी हुई धन-सम्पत्तिकी खुदाई, ज्योतिश्चक्रका गणनारम्भ और सुवर्ण, रजत, पन्ना तथा अन्य धातुओंको प्राप्त करनेके लिये भू-खदानोंमें प्रविष्ट होना आदि अन्य अधोमुखी कार्य इन अधोमुखी नक्षत्रोंमें करने चाहिये। रेवती, अश्विनी, चित्रा, स्वाती, हस्त, पुनर्वसु, अनुराधा, मृगशिरा एवं ज्येष्ठा नक्षत्र पार्श्वमुखी हैं। इन पार्श्वमुखी नक्षत्रोंमें हाथी, ऊँट, अश्व, बैल तथा भैंसेको वशमें करनेका उपाय करना चाहिये। (अर्थात् इनके नाक आदिमें छेद करके छल्ला या रस्सी डालनेका कार्य करना चाहिये।)

खेतोंमें बीज बोना, गमनागमन, चक्रयन्त्र (चरखी, चरसा, रहट आदि यन्त्र) अथवा रथ एवं नौकादिका क्रय और निर्माण उक्त पार्श्वमुखी नक्षत्रोंमें करना चाहिये और अन्य पार्श्व कार्योंको भी इन पार्श्व नक्षत्रोंमें करना चाहिये।

रोहिणी, आर्द्रा, पुष्य, धनिष्ठा, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ, उत्तराभाद्रपद, शतभिष (वारुण) तथा श्रवण—ये नौ नक्षत्र ऊर्ध्वमुखी कहे गये हैं। इन नक्षत्रोंमें राज्याभिषेक और पट्टबन्ध आदि शुभ कार्य करवाने चाहिये। ऊर्ध्वमुखी अर्थात् अभ्युदय प्रदान करनेवाले अन्य विशिष्ट कार्योंको भी इन नक्षत्रोंमें कराना प्रशस्त होता है।

चतुर्थी, षष्ठी, अष्टमी, नवमी, द्वादशी, चतुर्दशी, अमावास्या तथा पूर्णिमा तिथि अशुभ होती है। इन तिथियोंमें शुभ कार्य नहीं करने चाहिये। कृष्णपक्षकी प्रतिपदा तथा बुधवारसे युक्त द्वितीया तिथि शुभ होती है। यदि भूमिपुत्र मंगलसे युक्त तृतीया हो, शनैश्चरको चतुर्थी हो, गुरुवारको पञ्चमी पड़ रही हो, षष्ठीको मंगल या शुक्रवार हो तो वे तिथियाँ भी शुभ होती हैं। बुधवारको सप्तमी, मंगल तथा रविवारको अष्टमी, सोमवारको नवमी और गुरुवारको पड़नेवाली दशमी तिथि शुभ होती है। एकादशी तिथिमें गुरु तथा शुक्र होनेपर, बुधवारको द्वादशी तिथि पड़नेपर, शुक्र तथा मंगलवारको त्रयोदशी और शनिवारको चतुर्दशी तिथि शुभ होती है। इसी प्रकार बृहस्पतिवारको पूर्णिमा या अमावास्या तिथिका होना भी शुभ होता है।

द्वादशी तिथि रविवार, एकादशी सोमवार, दशमी मंगलवार, नवमी बुधवार, अष्टमी गुरुवार, सप्तमी शुक्रवार और षष्ठी तिथि शनिवारसे दग्ध होती है। ऐसे तिथि-दग्ध-योगमें यात्रादिका शुभारम्भ नहीं करना चाहिये। प्रतिपदा, नवमी, चतुर्दशी और अष्टमी तिथियोंमें यदि बुधवारका संयोग हो तो उस तिथिमें प्रस्थानके विचारका दूरसे ही परित्याग करना चाहिये। मेष और कर्क-संक्रान्तिकी षष्ठी, कन्या और मिथुन-संक्रान्तिकी अष्टमी, वृष तथा कुम्भ-संक्रान्तिकी चतुर्थी, मकर और तुला-संक्रान्तिकी द्वादशी, वृश्चिक और सिंह-संक्रान्तिकी दशमी तथा धनु और मीन-संक्रान्तिकी चतुर्दशी—ये दग्ध तिथियाँ हैं। इन तिथियोंमें यात्रादि नहीं करनी चाहिये। ये कष्टदायक होती हैं।

काण्ड ] ग्रहदशा, यात्राशकुन, छींकका फल तथा सूर्यचक्र आदिका निरूपण १०१


हे शिव ! रविवारको विशाखा, अनुराधा और ज्येष्ठाका योग, सोमवारके दिन पूर्वाषाढ, उत्तराषाढ तथा श्रवण नक्षत्रका योग, मंगलवारको धनिष्ठा, शतभिष और पूर्वाभाद्रपदका योग, बुधवारमें रेवती, अश्विनी तथा भरणीका योग, बृहस्पतिवारको रोहिणी, मृगशिरा और आर्द्राका योग, शुक्रवारमें पुष्य, अश्लेषा एवं मघाका योग, शनिवारको उत्तराफाल्गुनी, हस्त तथा चित्रा नक्षत्रका योग होनेपर औत्पातिक योग होता है। इन योगोंमें गमनादि कार्य करनेसे उत्पात, मृत्यु और रोगकी उत्पत्ति होती है।

हे रुद्र ! रविवारको मूल, सोमवारको श्रवण, मंगलवारको उत्तराभाद्रपद, बुधवारको कृत्तिका, बृहस्पतिके दिन पुनर्वसु, शुक्रवारको पूर्वाफाल्गुनी तथा शनिवारको स्वाती नक्षत्र हो तो अमृत योग होता है। ये सभी कार्योंको सिद्ध करनेवाले हैं।

विष्कम्भ योगकी पाँच घटी, शूल योगकी सात घटी, गण्ड तथा अतिगण्ड योगकी छः-छः घटी, व्याघात और वज्र योगकी नौ-नौ घटी एवं व्यतीपात, परिघ और वैधृति योग—ये मृत्युतुल्य कष्टदायी होते हैं, इनमें सभी कर्मोंका परित्याग करना चाहिये।

रविवारको हस्त, गुरुवारको पुष्य, बुधवारको अनुराधा नक्षत्र—ये शुभ होते हैं। शनिवारको रोहिणी उत्तम और सोमवारको मृगशिरा नक्षत्र शुभ है। उसी प्रकार शुक्रवारको रेवती तथा मंगलवारको अश्विनी नक्षत्र शुभ फल देता है। इस प्रकारका योग होनेपर सिद्धि योग बनता है। ये सिद्धि योग सभी प्रकारके दोषोंका विनाश करनेवाले होते हैं।

हे वृषभध्वज ! शुक्रवारको भरणी, सोमवारको चित्रा, मंगलवारको उत्तराषाढ, बुधवारको धनिष्ठा, बृहस्पतिको शतभिष, शुक्रवारको रोहिणी और शनिवारको रेवती नक्षत्र होनेपर विषयोग होता है।

पुष्य, पुनर्वसु, रेवती, चित्रा, श्रवण, धनिष्ठा, हस्त, अश्विनी, मृगशिरा एवं शतभिष नक्षत्र होनेपर जातकर्म आदि संस्कार करनेके लिये उत्तम माने गये हैं।

हे शिव ! विशाखा, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ, उत्तराभाद्रपद, मघा, आर्द्रा, भरणी, अश्लेषा और कृत्तिका नक्षत्रमें यात्रा करनेपर मृत्युका भय रहता है। (अध्याय ५९)


ग्रहदशा, यात्राशकुन, छींकका फल तथा सूर्यचक्र आदिका निरूपण

श्रीहरिने कहा—[हे शिव ! अब मैं ग्रहोंकी महादशाका वर्णन कर रहा हूँ।] सूर्यकी दशा छः वर्ष, चन्द्रकी दशा पंद्रह वर्ष, मंगलकी दशा आठ वर्ष, बुधकी दशा सत्रह वर्ष, शनिकी दशा दस वर्ष, बृहस्पतिकी दशा उन्नीस वर्ष, राहुकी दशा बारह वर्ष तथा शुक्रकी दशा इक्कीस वर्ष रहती है*।

सूर्यकी दशा दुःख देनेवाली होती है और उद्वेगको पैदा करती है तथा राजाका नाश करती है। चन्द्रकी दशा ऐश्वर्य देनेवाली, सुख पैदा करनेवाली तथा (इष्ट) मनोऽनुकूल अन्न देनेवाली होती है।


* यहाँपर ग्रहोंकी महादशाओंका जो योग्य समय तथा उनका क्रम दिया गया है, वह महर्षि पराशर आदि द्वारा निर्दिष्ट विंशोत्तरी महादशासे भिन्न है। इसमें केतुकी दशा भी नहीं दिखलायी गयी है। महर्षि पराशरके अनुसार ग्रहोंका क्रम तथा उनकी भोग्यवर्ष-संख्या इस प्रकार है—सूर्यकी महादशा छः वर्ष रहती है, चन्द्रदशा दस वर्ष रहती है। इसी प्रकार मंगल सात वर्ष, राहु अठारह वर्ष, बृहस्पति सोलह वर्ष, शनि उन्नीस वर्ष, बुध सत्रह वर्ष, केतु सात वर्ष तथा शुक्र बीस वर्षतक भोग करता है। इनका योग एक सौ बीस वर्ष होता है, जो महर्षि पराशरद्वारा मानव-आयुका परिमाण है, इसीलिये यह विंशोत्तरी महादशा कहलाती है, इसी प्रकार दूसरा अष्टोत्तरी महादशा क्रम भी है, किंतु गरुडपुराणमें निर्दिष्ट क्रम तथा दशा-वर्ष सर्वथा भिन्न है।

१०२ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-

मंगलकी दशा दुःख देनेवाली तथा राज्यादिका विनाश करनेवाली है। बुधकी दशा दिव्य स्त्रीका लाभ, राज्य-प्राप्ति एवं कोषवृद्धि करनेवाली है। शनिकी दशा राज्यका नाश और बन्धु-बान्धवोंको कष्ट प्रदान करनेवाली है। बृहस्पतिकी दशा राज्य-लाभ और सुख-समृद्धि तथा धर्म देनेवाली है। राहुकी दशा राज्यका नाश करती है, व्याधियोंकी प्राप्ति कराती है और दुःख पैदा करती है। शुक्रकी दशामें हाथी, घोड़ा, राज्य तथा स्त्रीका लाभ होता है।

मेष मंगलका, वृष शुक्रका, मिथुन बुधका और कर्क चन्द्रमाका क्षेत्र कहा गया है। सूर्यका क्षेत्र सिंह एवं बुधका क्षेत्र कन्याराशि है। तुलाराशि शुक्रका क्षेत्र है और वृश्चिक मंगलका क्षेत्र है। बृहस्पतिका क्षेत्र धनु, शनिका क्षेत्र मकर एवं कुम्भ और मीन बृहस्पतिका क्षेत्र कहा गया है।

कर्कराशिमें सूर्य आ जानेपर भगवान् विष्णु शयन करते हैं।

अश्विनी, रेवती, चित्रा, धनिष्ठा—ये नक्षत्र आभूषण धारण करनेमें उत्तम माने गये हैं।

यात्रामें यदि दाहिने हरिण, साँप, बन्दर, बिलाव, कुत्ता, सुअर, पक्षी (नीलकण्ठ आदि), नेवला तथा चूहा दिखायी दें तो यात्रा मङ्गलकारी होती है। यात्रामें ब्राह्मणकी कन्याका दर्शन हो जाना मङ्गल होनेका सूचक है तथा शङ्ख और मृदंगकी आवाज सुनना एवं सदाचारी श्रीमन्त व्यक्तिका दर्शन हो जाना, वेणु, स्त्री, जलसे भरा कलश दिखायी देना कल्याण-प्राप्तिका सूचक है।

यात्रामें बायीं ओर शृगाल, ऊँट और गदहा आदिका दिखायी देना मङ्गलकारी होता है। यात्रामें कपास, ओषधि, तेल, दहकते अंगारे, सर्प, बाल बिखेरे, लाल माला पहने और नग्न अवस्थामें यदि कोई व्यक्ति दिखायी दे तो अशुभ होता है।

अब मैं हिक्का (छींक)-के शुभ-अशुभ फलोंका वर्णन कर रहा हूँ। पूर्व दिशामें छींक होनेपर बहुत बड़ा फल प्राप्त होता है। अग्निकोणमें छींक होनेपर शोक और संताप तथा दक्षिणमें छींक होनेपर हानि उठानी पड़ती है। नैर्ऋत्यकोणमें छींक होनेपर शोक और संताप तथा पश्चिममें छींक होनेपर मिष्टान्नकी प्राप्ति होती है। वायव्यकोणमें छींक होनेपर धनकी प्राप्ति और उत्तरमें छींक होनेपर कलह होता है। ईशानकोणमें छींक होनेपर मरणके समान कष्ट प्राप्त होना बतलाया गया है।

मनुष्यके आकारमें भगवान् सूर्यकी प्रतिमाका चित्रण करे। सूर्यकी प्रतिमा बनानेके दिन सूर्य जिस नक्षत्रपर हों, उस नक्षत्रसे तीन नक्षत्र उस प्रतिमाके मस्तकपर अंकित करे। मुखके मध्यमें अंकित सूर्यनक्षत्रसे आगे तीन नक्षत्र लिखे और उससे आगे एक-एक नक्षत्र दोनों कन्धोंपर लिखे। फिर उससे आगे एक-एक नक्षत्र दोनों भुजाओंपर लिखे और उससे आगेके एक-एक नक्षत्र दोनों हाथोंपर लिखे। उससे आगे पाँच नक्षत्र हृदय-प्रदेशपर लिखे तथा उससे आगे एक नक्षत्र नाभिमण्डलमें लिखे। उससे आगे गुह्यस्थानमें एक नक्षत्र लिखे। उससे आगे एक-एक नक्षत्र दोनों घुटनोंपर लिखे। शेष नक्षत्र सूर्यके चरणोंपर लिखे।

सूर्यचक्रके चरणोंमें जातकका जन्मनक्षत्र पड़ता हो तो जातक अल्पायु होता है। वही नक्षत्र यदि घुटनोंपर पड़ता है तो जातक विदेश यात्रावाला होता है और यदि गुह्यस्थानपर पड़े तो पर-स्त्रीगामी होता है। नाभिस्थानमें पड़नेपर थोड़ेमें ही प्रसन्न हो जानेवाला होता है। यदि हृदयस्थानमें पड़ता है तो महेश्वर होता है। यदि पाणिस्थानमें पड़ता है तो चोर होता है। वही यदि भुजाओंपर पड़ता है तो उसका कहीं निश्चित स्थान नहीं रहता। यदि कन्धोंपर पड़ जाय तो वह धनपति—कुबेर होता है। यदि मुखपर पड़ जाय तो मिष्टान्न प्राप्त करता रहता है और यदि मस्तकपर जातक-नक्षत्र पड़ जाय तो जातक रेशम-वस्त्रधारी होता है।

(अध्याय ६०)

काण्ड ] ग्रहोंके शुभ एवं अशुभ स्थान तथा उनके अनुसार शुभाशुभ फलका संक्षिप्त विवेचन १०३

ग्रहोंके शुभ एवं अशुभ स्थान तथा उनके अनुसार शुभाशुभ फलका संक्षिप्त विवेचन

श्रीहरिने कहा—लग्नसे सप्तम भाव तथा उपचयमें स्थित चन्द्रमा सर्वत्र मङ्गलकारी होता है। शुक्लपक्षकी द्वितीया तिथि तथा पञ्चम और नवम भावमें स्थित चन्द्रमा गुरुके सदृश पूज्य है।

हे शिव! चन्द्रमाकी बारह अवस्थाएँ हैं। आप उनके विषयमें भी सुनें। अश्विनी आदि तीन-तीन नक्षत्रोंसे एक-एक अवस्था बनती है। अतः उन अश्विनी आदि तीन-तीन नक्षत्रोंके क्रमसे 'प्रवासावस्था, दृष्टावस्था, मृतावस्था, जयावस्था, हास्यावस्था, नतावस्था, प्रमोदावस्था, विषादावस्था, भोगावस्था, ज्वरावस्था, कम्पावस्था तथा सुखावस्था'—ये चन्द्रकी बारह अवस्थाएँ होती हैं।

इन्हीं अवस्थाओंके क्रममें चन्द्रकी स्थिति होनेपर क्रमशः—प्रवास, हानि, मृत्यु, जय, हास, रति, सुख, शोक, भोग, ज्वर, कम्प तथा सुख—ये फल प्राप्त होते हैं।

चन्द्रके जन्मलग्नमें होनेपर तुष्टि, द्वितीय भावमें रहनेपर सुख-हानि, तृतीय भावमें रहनेपर राजसम्मान, चतुर्थ भावमें कलह और पञ्चम भावमें रहनेपर स्त्रीका लाभ होता है। यदि चन्द्र षष्ठ (स्थान) भावमें रहता है तो धन-धान्यकी प्राप्ति, सप्तम भावमें रहनेपर प्रेम तथा सम्मानकी प्राप्ति होती है। चन्द्रमाके अष्टम भाव (स्थान)-में रहनेपर मनुष्यके प्राणोंको संकट बना रहता है। नवम भावमें उसकी स्थिति रहनेपर कोषमें धनकी वृद्धि होती है। दशम भावमें चन्द्रके रहनेपर कार्यसिद्धि और एकादश भावमें होनेपर विजय निश्चित है। जब वह द्वादश भावमें रहता है तो जातककी निश्चित ही मृत्यु होती है। इसमें संदेह नहीं है।

कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, अश्लेषा—इन सात नक्षत्रोंमें पूर्व दिशाकी यात्रा करनी चाहिये। मघा, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाती तथा विशाखा—इन सात नक्षत्रोंमें दक्षिणकी यात्रा करनी चाहिये। अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढ, उत्तराषाढ, श्रवण और धनिष्ठा—इन सात नक्षत्रोंमें पश्चिमकी यात्रा करनी चाहिये। धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद, रेवती, अश्विनी और भरणी—इन सात नक्षत्रोंमें उत्तरकी यात्रा प्रशस्त होती है।

अश्विनी, रेवती, चित्रा तथा धनिष्ठा नक्षत्र नवीन अलंकारोंको धारण करनेके लिये श्रेष्ठ हैं। मृगशिरा, अश्विनी, चित्रा, पुष्य, मूल और हस्त नक्षत्र कन्यादान, यात्रा तथा प्रतिष्ठादि कार्योंमें शुभप्रद होते हैं।

जन्मलग्नमें शुक्र और चन्द्रके रहनेपर शुभ फलकी प्राप्ति होती है। उसी प्रकार ये दोनों ग्रह द्वितीय भावमें रहनेपर भी शुभ फल प्रदान करते हैं। तृतीय भावमें स्थित चन्द्र, बुध, शुक्र और बृहस्पति, चतुर्थ भावमें मंगल, शनि, चन्द्र, सूर्य और बुध श्रेष्ठ होते हैं। पञ्चम भावमें शुक्र, बृहस्पति, चन्द्रमा और केतुके रहनेपर शुभ होता है। षष्ठ भावमें शनि, सूर्य और मंगल, सप्तम भावमें बृहस्पति तथा चन्द्रमा शुभ हैं। इसी प्रकार अष्टम भावमें बुध और शुक्र तथा नवम भावमें स्थित गुरु शुभ फल देनेवाला है। जन्मके दशम भावमें स्थित सूर्य, शनि एवं चन्द्रमा तथा एकादश भावमें सभी ग्रह शुभ फल देते हैं। ऐसे ही जन्मके द्वादश भावमें स्थित बुध और शुक्र सब प्रकारके सुखोंको प्रदान करते हैं।

४८- चक्राङ्कित शालग्रामशिलाओंके विविध नाम, तीर्थमाहात्म्य तथा साठ संवत्सरोंके नाम

१०४संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

सिंहके साथ मकर, कन्याके साथ मेष, तुलाके साथ मीन, कुम्भके साथ कर्क, धनुके साथ वृष और मिथुनके साथ वृश्चिकराशिका योग श्रेष्ठ होता है। यह षडष्टक योग है। यह योग प्रीतिकारक होता है,<sup></sup> इसमें संशय नहीं है।
(अध्याय ६१)


लग्न-फल, राशियोंके चर-स्थिर आदि भेद, ग्रहोंका स्वभाव तथा सात वारोंमें किये जाने योग्य प्रशस्त कार्य

श्रीहरिने कहा—हे शिव! सूर्य उदयकालसे मेषादि राशियोंपर अवस्थित रहते हैं। वे दिनमें क्रमशः छः राशियोंको पारकर रात्रिमें शेष छः राशियोंको पार करते हैं।

मेषलग्नमें कन्याका जन्म होनेपर वह वन्ध्या होती है। वृषलग्नमें उत्पन्न हुई कन्या कामिनी होती है, मिथुनलग्नवाली सौभाग्यशालिनी तथा कर्कलग्नमें उत्पन्न हुई कन्या वेश्या होती है। सिंहलग्नमें जन्म-प्राप्त कन्या अल्पपुत्रोंवाली, कन्यालग्नवाली रूपसे सम्पन्न, तुलालग्नवाली रूप और ऐश्वर्यसे युक्त तथा वृश्चिकलग्नवाली कर्कश स्वभावकी होती है। धनुलग्नमें उत्पन्न हुई कन्या सौभाग्यवती तथा मकरलग्नवाली निम्न पुरुषोंके साथ गमन करनेवाली होती है। कुम्भलग्नमें जन्म-प्राप्त कन्या अल्पपुत्रों तथा मीनलग्नवाली वैराग्ययुक्त होती है<sup></sup>

तुला, कर्क, मेष और मकर—ये चर राशियाँ हैं, इनमें यात्रादि चर कार्य करने चाहिये। सिंह, वृष, कुम्भ और वृश्चिक स्थिर राशि हैं। इनमें स्थिर कार्य करने चाहिये। कन्या, धनु, मीन एवं मिथुनराशि द्विस्वभावकी होती हैं। विद्वान् व्यक्तिको इन राशियोंमें द्विस्वभावसे युक्त कर्म करने चाहिये। यात्रा चरलग्नमें तथा गृह-प्रवेशादिका कार्य स्थिरलग्नमें करना चाहिये। देवताओंकी स्थापना और वैवाहिक संस्कारको द्विस्वभावके लग्नमें करना श्रेयस्कर है।

हे वृषभध्वज! प्रतिपदा, षष्ठी तथा एकादशी तिथियाँ नन्दा मानी जाती हैं। द्वितीया, सप्तमी और द्वादशी तिथियाँ भद्रा कही गयी हैं। तृतीया, अष्टमी और त्रयोदशी तिथियाँ जया कही गयी हैं। चतुर्थी, नवमी तथा चतुर्दशी—ये तीन रिक्ता तिथि हैं। ये शुभ कार्यके लिये वर्जित हैं।

सौम्य स्वभाववाला बुध ग्रह चर स्वभाव है। गुरु क्षिप्र, शुक्र मृदु और रवि ध्रुव स्वभावका है। शनि दारुण, मंगल उग्र तथा चन्द्रको समस्वभावका जानना चाहिये।

चर और क्षिप्र स्वभाववाले (अर्थात् बुध एवं बृहस्पति) वारमें यात्रा करनी चाहिये तथा मृदु और ध्रुव स्वभावसे संयुक्त शुक्र अथवा रविवारको गृह-प्रवेशादिका कार्य करना चाहिये। दारुण और उग्र स्वभाववाले शनि तथा मंगलवारको विजय प्राप्त करनेकी अभिलाषासे क्षत्रियादि वीरोंको युद्धके लिये प्रस्थान करना चाहिये।


१-यहाँ षडष्टक योगको शुभ बताया गया है, किंतु मतान्तरसे वर-वधूके मेलापक चक्रमें यह षडष्टक योग अशुभ माना गया है। वर या वधूकी परस्पर जन्म-राशि एक-दूसरेसे छठी या आठवीं होना ही षडष्टक योग है। अर्थात् यदि एककी सिंह राशि हो और दूसरेकी मकरराशि तो ये राशियाँ गणना करनेपर एक-दूसरेसे छठी या आठवीं पड़ेंगी, ऐसे ही मेष-कन्या, वृष-तुला, मिथुन-वृश्चिक, कर्क-धनु आदिके विषयमें समझना चाहिये। प्रायः ऐसेमें विवाहादि नहीं किया जाता। षडष्टकके समान ही द्विर्द्वादश योग तथा नवम-पञ्चम योगपर भी विचार किया जाता है।
२-ज्योतिष-शास्त्रके अनुसार अन्य सभी योग एवं ग्रह-स्थितियोंको ध्यानमें रखकर ही इस फलपर विचार करना चाहिये। यहाँ दिग्दर्शनमात्र है।

४९- स्वरोदय-विज्ञान

काण्ड ] सामुद्रिक शास्त्रके अनुसार स्त्री-पुरुषके शुभाशुभ लक्षण १०५


राज्याभिषेक और अग्निकार्य सोमवारको प्रशस्त माना गया है। सोमवारमें लिपाईका कार्य एवं गृहका शुभारम्भ करना श्रेयस्कर है। मंगलवारको सेनापतिका पद-भार वहन करना, शौर्य, पराक्रमका कार्य तथा शस्त्राभ्यासका प्रारम्भ करना शुभ है। बुधके दिन किसी कार्यकी सिद्धिके लिये प्रयत्न करना, मन्त्रणा करना और यात्रा करना सफलतादायक माना गया है। बृहस्पतिवारको वेदपाठ, देवपूजा, वस्त्र तथा अलंकारादि धारणके कार्य करने चाहिये। शुक्रवारको कन्यादान, गजारोहण तथा स्त्रीसहवास उचित है। शनिवारको गृहारम्भ, गृहप्रवेश और गजबन्धनके कार्य शुभ माने गये हैं। (अध्याय ६२)

सामुद्रिक शास्त्रके अनुसार स्त्री-पुरुषके शुभाशुभ लक्षण, मस्तक एवं हस्तरेखासे आयुका परिज्ञान

श्रीहरिने कहा— हे शिव ! अब मैं स्त्री-पुरुषके लक्षणोंका वर्णन संक्षेपमें कर रहा हूँ, आप सुनें।

जिनके हाथ-पाँवके तल पसीनेसे रहित हों, कमलके भीतरी भागकी तरह मृदु एवं रक्त हों, अँगुलियाँ सटी हुई हों, नाखून ताँबेके वर्णके समान थोड़े रक्त हों, पाँव सुन्दर गुल्फवाले, नसोंसे रहित और कूर्मके समान उन्नत हों, उन्हें नृपश्रेष्ठ समझना चाहिये।

रूक्ष एवं थोड़ा पीलापन लिये, श्वेत नखवाले, वक्र तथा नसोंसे भरे हुए और विरल अँगुलियोंसे युक्त शूर्पाकार चरणोंवाले मनुष्य दुःखी एवं दरिद्र होते हैं।

अल्परोमसे युक्त, गलशुण्डके समान सुन्दर जंघाप्रदेश तथा एक-एक रोमसे भरे हुए रोमकूपोंवाला शरीर राजाओं और महात्माओंका माना गया है। प्रत्येक रोमकूपमें दो-दो रोम होनेपर मनुष्य श्रोत्रिय या पण्डित होता है। तीन-तीन रोमोंसे व्याप्त रोमकूप दरिद्रोंके होते हैं।

मांसरहित, अत्यन्त कृश जानुयुगलवाला मनुष्य रोगी होता है। समान उदरभागसे सुशोभित मनुष्य अतिशय भोगसे समृद्ध और कुम्भके सदृश उन्नत या सर्पके समान उदरभागवाले लोग अत्यन्त दरिद्र होते हैं।

रेखाओंके द्वारा आयुका निर्णय किया जाता है। जिसके ललाटपर समान आकारवाली तीन रेखाएँ स्पष्ट दिखायी देती हैं, वह पुत्रादिसे सम्पन्न रहकर सुखपूर्वक साठ वर्षतक जीवित रहता है। मस्तकपर दो रेखाओंके दृष्टिगोचर होनेपर मनुष्यकी आयु चालीस वर्षकी होती है। एक रेखाके होनेपर उस मनुष्यका जीवन बीस वर्ष मानना चाहिये, किंतु कर्णपर्यन्त एक रेखाके होनेपर वह शतायु होता है।

ललाटपर कानतक विस्तृत दो रेखाओंके होनेसे मनुष्यकी आयु सत्तर वर्ष तथा वैसी ही तीन रेखाओंके रहनेपर उसकी आयु साठ वर्ष होती है। ललाटपर रेखाओंकी व्यक्त (प्रकट)-अव्यक्त (अप्रकट) स्थिति होनेपर मनुष्य बीस वर्षकी अल्पायुको ही प्राप्त करता है। रेखाविहीन ललाटके होनेपर मनुष्य चालीस वर्षतक जीवित रहता है। रेखाओंके छिन्न-भिन्न रहनेपर मनुष्यकी अकालमृत्यु होती है।

जिसके मस्तकपर त्रिशूल अथवा फरसेके समान चिह्न दिखायी देता है, वह धन-पुत्रादिसे परिपूर्ण होकर सौ वर्षतक जीवित रहता है।

हे रुद्र ! तर्जनी और मध्यमा अंगुलीके मध्यभागतक

५०- रत्नोंके प्रादुर्भावका आख्यान तथा वज्र (हीरे)-की परीक्षा

१०६संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

आयुरेखाके पहुँचनेपर मनुष्य शतायु होता है। अंगुष्ठके मूलभागसे निकलनेवाली प्रथम रेखा ज्ञानरेखा है। मध्यमा अंगुलीके मूलसे जो रेखा जाती है, वह आयुरेखा है। यह रेखा कनिष्ठा अंगुलीके मूलसे निकलकर मध्यमाके मूल भागको पार करती है। यदि यह रेखा विच्छिन्न या किसी अन्य रेखासे विभक्त नहीं होती है तो ऐसे व्यक्तिकी आयु सौ वर्ष होती है।

हे रुद्र! जिसके हाथमें यह आयुरेखा स्पष्ट दिखायी देती है उसकी आयु सौ वर्ष अवश्य होती है, इसमें संदेह नहीं। जो रेखा कनिष्ठा अंगुलीके मूलसे होकर मध्यमा अंगुलीके मूलतक विस्तारको प्राप्त करती है, वह रेखा मनुष्यको साठ वर्ष आयु प्रदान करनेमें सक्षम होती है। (अध्याय ६३)

स्त्रियोंके शुभाशुभ लक्षण

श्रीहरिने कहा—जिस कन्याके केश घुँघराले, मुख मण्डलाकार अर्थात् गोल एवं नाभि दक्षिणावर्त होती है, वह कुलकी वृद्धि करनेवाली होती है। जो स्वर्णसदृश आभावाली होती है, जिसके हाथ लाल कमलके समान सुन्दर होते हैं, वह हजारों स्त्रियोंमें अद्वितीय तथा पतिव्रता होती है।

जो कन्या वक्र केशोंवाली और गोल नेत्रवाली होती है, वह निश्चित ही दुःख भोगनेवाली होती है तथा उसका पति शीघ्र ही मर जाता है।

पूर्णचन्द्रके सदृश मुखमण्डलसे सुशोभित, बालसूर्यके समान लाल-लाल कान्तिवाली, विशाल नेत्रोंसे युक्त, बिम्बाफलकी भाँति ओष्ठवाली कन्या चिरकालतक सुखका उपभोग करती है। हस्ततलमें बहुत-सी रेखाओंके होनेपर कष्ट तथा अल्प रेखाओंके होनेपर वह धनहीनताका दुःख भोगती है। हाथमें रक्तवर्णकी रेखाओंके होनेसे वह सुखी जीवन व्यतीत करती है, किंतु कृष्णवर्णकी रेखाओंके होनेपर वह दास्यवृत्तिवाली दूतीका जीवन व्यतीत करती है।

अच्छी स्त्री वह है, जो पतिके कार्योंमें मन्त्रीके समान परामर्श देनेवाली होती है। सहयोगमें मित्रके समान बर्ताव करती है। स्नेहके व्यवहारमें भार्या अथवा माता तथा शयनकालमें वेश्याके समान सुख प्रदान करती है।

जिस कन्याके हाथमें अंकुश, कुण्डल और चक्रके चिह्न विद्यमान रहते हैं, वह पुत्रसे सम्पन्न होती है और राजाको पतिके रूपमें वरण करती है।

जिस स्त्रीके दोनों पार्श्व और स्तन-प्रदेश रोमसमन्वित होते हैं तथा अधरोष्ठ-भाग ऊँचा उठा हुआ होता है, वह निश्चित ही शीघ्र पतिका नाश करनेवाली होती है। जिसके हाथमें प्राकार और तोरणकी रेखाएँ दिखायी देती हैं, वह दासकुलमें भी उत्पन्न होकर रानीके पदको प्राप्त करती है। जिस कन्याकी नाभि ऊपरकी ओर उठी हुई, मण्डलाकार एवं कपिलवर्णकी रोमावलियोंसे आवृत्त रहती है, वह कन्या राजकुलमें उत्पन्न होकर दासीकी वृत्तिसे जीवनयापन करती है।

जिस स्त्रीके चलनेपर दोनों पैरकी अनामिका तथा अंगुष्ठ पृथिवीतलका स्पर्श नहीं करते हैं, वह शीघ्र ही पतिका नाश करती है तथा स्वयं स्वेच्छाचार-पूर्वक जीवन बितानेवाली होती है। जिस स्त्रीके चलनेसे पृथिवीमें कम्पन हो उठता है, वह शीघ्र ही पतिका नाश करके स्वेच्छाचारिणी बन जाती है।

सुन्दर मनोहारी नेत्रोंके होनेसे स्त्री सौभाग्यशालिनी, उज्ज्वल चमकते हुए दाँतोंके होनेपर उत्तम भोजन प्राप्त करनेवाली, शरीरकी त्वचा सुन्दर एवं कोमल होनेसे उत्तम प्रकारकी शय्या तथा कोमल स्निग्ध चरणोंके होनेपर वह श्रेष्ठ वाहनका सुख प्राप्त करती है।

काण्ड ] स्त्री एवं पुरुषोंके शुभाशुभ लक्षण १०७

चिकने, ऊँचे उठे हुए ताम्रवर्णके समान लाल-लाल नखोंसे युक्त, मत्स्य, अंकुश, पद्म, चक्र तथा लाङ्गल (हल)-चिह्नसे सुशोभित एवं पसीनेसे रहित और कोमल तलवाले स्त्रीके चरण सौभाग्यशाली होते हैं।

सुन्दर रोमविहीन जंघा, गजशुण्डके सदृश ऊरु, पीपलपत्रके समान विशाल उत्तम गुह्यभाग, दक्षिणावर्त गम्भीर नाभि, रोमरहित त्रिवली और हृदयपर सुशोभित रोमरहित स्तन-प्रदेश—ये उत्तम स्त्रीके शुभ लक्षण हैं। (अध्याय ६४)


स्त्री एवं पुरुषोंके शुभाशुभ लक्षण

**श्रीहरिने कहा—**अब मैं सामुद्रिकशास्त्रमें कहे गये स्त्री और पुरुषके शुभाशुभ लक्षणोंका वर्णन करता हूँ, जिन्हें जान लेनेसे भूत तथा भविष्यका ज्ञान हो जाता है।

मार्गमें गमन करनेपर विषम रूपसे पड़नेवाले, कषाय वर्णसे युक्त विचित्र प्रकारके बने हुए चरण वंशका नाश करते हैं। शङ्ख्वाकार चरणोंसे युक्त मनुष्य ब्रह्महत्या करता है तथा अगम्या स्त्रीके साथ रमण करनेकी इच्छा रखता है।

विरल रोमभागयुक्त जंघा तथा हाथीके सूँडके समान सुन्दर ऊरु भागोंवाले अंग राजाके शरीरमें सुशोभित होते हैं।

दरिद्रकी जंघाएँ सियारकी जंघाओंके समान होती हैं। कुंचित केशराशिवाले मनुष्यकी मृत्यु विदेशमें होती है।

मांसरहित जानु-प्रदेशवाला व्यक्ति सौभाग्यशाली होता है। अल्प और छोटी-छोटी जानुओंके होनेसे मनुष्य स्त्री-प्रेमी तथा विशाल विकटाकार होनेपर दरिद्र होता है। मांससे भरपूर जानुओंके होनेपर मनुष्यको राज्यकी प्राप्ति होती है। बड़ी जानुओंके होनेपर मनुष्य दीर्घायु होता है।

मांसल स्फिक् (कूल्हा)-प्रदेशवाला व्यक्ति सुखी तथा सिंहके समान स्फिक् होनेपर वह राजपुरुष माना गया है। इसी प्रकार सिंहके सदृश कटिप्रदेशके होनेपर वह राजा होता है, किंतु कपिके समान कटिभागवाला व्यक्ति निर्धन होता है।

समान कक्ष (काँख)-प्रदेशवाले अत्यधिक भोग-विलासी होते हैं। निम्न कक्षाओंवाले धनहीन तथा उन्नत एवं विषम कक्षाओंवाले कुटिल होते हैं।

मत्स्यके समान उदरवाले प्रचुर धनवान् होते हैं। विस्तीर्ण नाभिप्रदेशसे सुशोभित जन सुखी एवं अत्यधिक गहरी नाभिके होनेपर कष्ट भोगनेवाले होते हैं।

त्रिवलीके मध्यभागमें नाभिके अवस्थित होनेपर प्राणी शूलरोगसे ग्रसित होते हैं। वामावर्त नाभिके होनेपर शक्तिसम्पन्न और दक्षिणावर्त होनेपर मेधावी होते हैं। पार्श्वदेशमें नाभिके विस्तृत होनेसे मनुष्य चिरंजीवी, उन्नत होनेपर ऐश्वर्यशाली, अधोमुख होनेपर गोधनसे सम्पन्न एवं पद्मकर्णिकाके सदृश सुन्दर होनेपर वे राजत्वको प्राप्त करते हैं।

उदरभागपर एक वलिके रहनेपर मनुष्य शतायु होता है। दो वलियोंके होनेसे वह ऐश्वर्यका भोग करनेवाला तथा त्रिवलियोंके होनेपर राजा या आचार्यकी पदवीको प्राप्त करता है। सरल वलियोंवाला मनुष्य सुखी होता है। वक्र वलिवाला व्यक्ति अगम्यागामी होता है।

जिसके दोनों पार्श्वभाग मांसल होते हैं, वह राजा होता है। मृदु, कोमल, सुन्दर और समभागकी दूरियोंपर अवस्थित दक्षिणावर्तीय रोमराशियोंसे सुशोभित व्यक्ति भी राजा होते हैं। यदि उदर-

१०८संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

प्रदेशपर इन लक्षणोंके विपरीत रोम-राशियाँ होती हैं तो ऐसे मनुष्य दूत-कर्म करनेवाले, निर्धन तथा सुखसे रहित होते हैं।

समुन्नत, मांसल तथा कम्पनरहित विशाल वक्षःस्थल राजाओंका होता है। अधमजनोंका वक्षःस्थल तो गर्दभोंकी रोमराशिके समान, कर्कश तथा रोमावलियोंसे युक्त स्पष्ट परिलक्षित होनेवाली नसोंसे व्याप्त रहता है।

समतल वक्षःस्थलवाले मनुष्य धन-सम्पन्न होते हैं। पीन (मांसल) वक्षःस्थलोंसे युक्त प्राणी शक्तिसम्पन्न होता है। विषम वक्षःस्थलके होनेपर मनुष्य निर्धन होता है और उसकी मृत्यु शस्त्राघातसे होती है।

स्कन्ध-प्रदेशके सन्धिस्थान (पखुरा)-में विषमता तथा अस्थि-संलग्नताके होनेपर भी मनुष्य निर्धन होते हैं। उन्नत स्कन्ध-प्रदेशके रहनेसे व्यक्ति भोगी, निम्न होनेपर धनहीन तथा स्थूल होनेपर धनी होते हैं।

चिपटाकार कण्ठसे युक्त मनुष्य निर्धन, शुष्क एवं उन्नत शिराओंसे व्याप्त गलेवाला सुखी होता है। महिषके सदृश ग्रीवावाला वीर तथा मृगके समान कण्ठवाला शास्त्रोंमें पारंगत होता है। शंखके समान ग्रीवावाला मनुष्य राजा और लम्बे कण्ठवाला बहुत भोजन करनेवाला होता है।

रोमरहित एवं मुड़ा हुआ पृष्ठ-प्रदेश शुभ तथा उसके विपरीत रहनेपर अशुभ माना गया है।

पीपल-पत्रके सदृश, सुगन्धित तथा मृगके सदृश रोमावलियोंवाली कक्षाएँ उत्तम होती हैं। इसके विपरीत कक्षाओंके जो लक्षण होते हैं, वे निर्धनोंकी दरिद्रताके कारण हैं।

मांसल, श्लिष्ट, विशाल, बलिष्ठ, वृत्ताकार तथा जानुपर्यन्त लम्बी सुन्दर भुजाएँ राजाकी होती हैं। प्रचुर रोमावलियोंसे युक्त छोटे-छोटे हाथ निर्धनके होते हैं। हाथीकी शुण्डके समान सुन्दर भुजाएँ श्रेष्ठ मानी गयी हैं।

भवनमें वायु-प्रवेशके लिये बने द्वारके समान बनी हुई अंगुलियाँ शुभ होती हैं। मेधावीजनोंकी अंगुलियाँ छोटी होती हैं। चिपटाकार अंगुलियाँ भृत्योंमें पायी जाती हैं। स्थूल अंगुलियोंके होनेपर मनुष्य निर्धन होते हैं। जब मनुष्यकी अंगुलियाँ कृश होती हैं तो वे विनयी होते हैं। बन्दरके सदृश हाथके होनेपर मनुष्य निर्धन और बाघके समान हाथ होनेपर बलवान् होते हैं।

करतल भागके निम्न होनेसे मनुष्य पिताके द्वारा संचित धनको नष्ट करनेवाले होते हैं। मणिबन्धके सुगठित, श्लिष्ट तथा सुगन्धयुक्त होनेपर व्यक्तियोंको राजपदकी प्राप्ति होती है। कटे-फटे कर-भागसे युक्त, शब्द करनेवाले मणिबन्धोंके रहनेसे मनुष्य धनहीन और नीच प्रकृतिके माने जाते हैं।

संवृत्त अर्थात् गोलाकार एवं गहरे करतलोंके होनेसे मनुष्योंको धनवान् कहा गया है। उन्नत करतलोंके होनेपर व्यक्ति दानी और विषम भागवाले व्यक्ति कठोर होते हैं। लाक्षारसके समान करतलोंके होनेसे प्राणी राजा होते हैं। पीतवर्णवाले करतलोंसे युक्त व्यक्ति परस्त्रीके साथ रमण करनेवाले होते हैं। जिनके हाथ और तल-प्रदेश रूखे हैं, वे मनुष्य निर्धन होते हैं।

तुष (भूसी)-के समान रंगसे युक्त नखवाले लोग नपुंसक, कुटिल तथा फटे हुए नखवाले धनहीन होते हैं। विवर्ण नखवाले दूसरेके साथ तर्क करनेवाले होते हैं।

ताम्रवर्णके सदृश रक्ताभ नखवाले मनुष्य राजा होते हैं। यव-चिह्नसे युक्त अंगुष्ठवाले व्यक्ति अत्यधिक धन-वैभवसे युक्त होते हैं। अंगुष्ठके मूलभागमें यव-चिह्नके होनेसे व्यक्ति पुत्रवान् होता है। लम्बे पर्वोंसे युक्त अँगुलियोंके होनेपर दीर्घायु तथा पुत्र-

५१- मुक्ताके विविध भेद, लक्षण और परीक्षण-विधि

काण्ड ] | स्त्री एवं पुरुषोंके शुभाशुभ लक्षण | १०९

पौत्रादिसे परिपूर्ण होता है, किंतु विरल अँगुलियोंवाला व्यक्ति निर्धन होता है। सघन अँगुलियोंके होनेसे मनुष्य धन-सम्पन्न होता है। मणिबन्धसे निकलकर तीन रेखाएँ जिसके करतल भागको पार कर जाती हैं, वह राजा होता है।

दो मत्स्याङ्कित करतलभागवाला पुरुष यज्ञकर्ता एवं दानी होता है। वज्राकार चिह्नवाले करतल धनीजनोंके होते हैं। विद्वान्‌का करतलभाग मीन-पुच्छके चिह्नसे अङ्कित होता है।

राजाके करतलमें शङ्ख, छत्र, शिविका (डोली), गज और पद्माकार चिह्न रहते हैं। अतुलनीय ऐश्वर्यसम्पन्न राजाके करतलमें कुम्भ, अङ्कुश, पताका तथा मृणालके समान चिह्न रहते हैं। गोधनके स्वामीजनोंके करतलोंमें रस्सीके चिह्न होते हैं। जिसके हाथमें स्वस्तिकका चिह्न होता है, वह सम्राट् होता है। राजाके हाथमें चक्र, कृपाण, तोमर, धनुष और भालेके आकारके चिह्न होते हैं।

ओखलीके चिह्नसे युक्त व्यक्ति यज्ञादिक कर्मकाण्डोंमें निष्णात होता है। जिनके हाथोंमें वेदिकाकार रेखा होती है, वे अग्निहोत्री होते हैं। वापी, देवकुल्या तथा त्रिकोण रेखाओंके रहनेपर मनुष्य धार्मिक होता है।

अंगुष्ठ-मूलतक रेखाके होनेसे व्यक्ति पुत्रवान् होते हैं। यदि वे रेखाएँ सूक्ष्म होती हैं तो उन्हें कन्याएँ होती हैं। कनिष्ठिकाके मूलसे निकलकर तर्जनीके मूलतक रेखाका विस्तार होनेपर मनुष्य शतायु होता है, किंतु किसी स्थानपर उसके विच्छिन्न होनेपर प्राणीको वृक्षसे गिरकर मृत्युका भय बना रहता है। बहुत-सी रेखाओंके होनेसे मनुष्य दरिद्र होते हैं। चिबुक (ठुड्डी)-के कृश होनेपर भी मनुष्योंको धनहीन समझना चाहिये, किंतु जिनकी ठुड्डियाँ मांसल होती हैं, वे धन-सम्पदाओंसे परिपूर्ण होते हैं। अरुणाभ, बिम्बाफलके समान सुन्दर अधरोंसे सुशोभित मुख राजाओंका माना गया है; किंतु जिसके ओष्ठ रूखे, खण्डित, फटे हुए तथा विषम होते हैं, वे निर्धन होते हैं।

स्निग्ध (चिकने), चमकते हुए, सघन एवं समान भागवाले सुन्दर तीक्ष्ण दाँतोंका होना शुभ है। रक्तवर्णकी समतल, चिकनी एवं दीर्घ जिह्वा श्रेष्ठ होती है। राजाओंका मुख कठोर, सम, सौम्य, गोल, मलरहित तथा स्निग्ध होता है। दुःख भोगनेवाले लोगोंमें इन लक्षणोंके विपरीत लक्षण होते हैं। कुत्सित एवं भाग्यहीनोंको स्त्रीमुखी पुत्र प्राप्त होता है। धनी लोगोंका मुख गोलाकार तथा निर्धनोंका मुख लम्बा होता है। पापकर्मका मुख भयाक्रान्त होता है। धूर्तोके मुख चौकोर, पुत्रहीनोंके निम्न एवं कंजूसोंके छोटे मुख होते हैं। भोगीजनोंका मुख सुन्दर, आभामय, मूँछोंसे युक्त, स्निग्ध, शुभ तथा कोमल होता है।

चौर-वृत्तिवाले व्यक्ति निस्तेज, मुरझायी हुई लालवर्णकी दाढ़ी और मूँछोंवाले होते हैं। रक्तवर्णके थोड़े तथा कड़े बालयुक्त दाढ़ीवाले और छोटे-छोटे कानोंवाले मनुष्योंकी मृत्यु पापकर्म करनेसे होती है। मांसरहित, चिपटे कानोंवाले लोग भोगी और अत्यन्त छोटे-छोटे कानोंसे युक्त मनुष्य कंजूस होते हैं। शङ्खाकार कानोंके होनेपर मनुष्य राजा होता है तथा रोमराशिसे भरे होनेपर उसे क्षीण आयुकी प्राप्ति होती है। बड़े कानोंवाले धनी अथवा राजा माने जाते हैं। स्निग्ध, विस्तृत, मांसल तथा दीर्घ कानोंवाले राजा होते हैं। निम्न गण्डस्थलवाला भोगी और पूर्ण सुडौल एवं सुन्दर होनेपर मनुष्य मन्त्री होता है।

सुग्गेकी नासिकाके समान सुन्दर नासिकावाला व्यक्ति सुखी और शुष्क नासिकावाला दीर्घजीवी होता है। नासिकाका अग्रभाग छिन्न तथा कूपके समान नासिकाके होनेपर मनुष्य अगम्या स्त्रीके

११० संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-

साथ सहवास करता है। दीर्घ नासिकाके रहनेपर सौभाग्यवान् एवं आकुंचित अर्थात् टेढ़ी नासिका होनेसे व्यक्ति चौरकार्यमें प्रवृत्त होता है। नासिकाके चिपटी होनेपर मनुष्यकी अकालमृत्यु होती है। भाग्यवान्‌की नासिका छोटी होती है। चक्रवर्ती सम्राट्‌की नासिकामें छोटे-छोटे गोल और सीधे छिद्र होते हैं। दक्षिणभागकी ओर नासिकाके वक्र होनेपर मनुष्योंमें क्रूर-स्वभाव होता है।

वक्र उपान्तभागोंसे युक्त तथा पद्म-पत्रके समान सुन्दर नेत्र सुखी लोगोंके होते हैं। बिल्लीके सदृश नेत्रोंके होनेपर मनुष्य पापात्मा तथा मधु- पिंगलवर्णवाले नेत्रोंके होनेपर वह दुरात्मा होता है। केकड़ेके नेत्रोंकी भाँति नेत्र होनेसे व्यक्ति क्रूर और हरितवर्णके नेत्रवाले पापकर्ममें अनुरक्त होते हैं। वक्र नेत्र बलवान् पुरुषोंका लक्षण है। हाथीके समान नेत्रोंवाले मनुष्य सेनानी होते हैं। गम्भीर नेत्रोंवाला पुरुष राजा तथा स्थूल नेत्रोंवाला मन्त्री होता है। नीलकमलके सदृश नेत्रोंके होनेपर व्यक्ति विद्वान् तथा श्यामवर्णके नेत्रवाले सौभाग्यशाली होते हैं। कृष्णवर्णके तारक विन्दुओंसे युक्त नेत्रोंवाले पुरुषोंमें उत्पाटन-क्षमता होती है। मण्डलाकार नेत्रोंके होनेपर व्यक्ति पापी तथा दैन्यभावयुक्त नेत्रवाले मनुष्य दरिद्र होते हैं। सुन्दर एवं विशाल नेत्रोंवाले संसारमें विभिन्न प्रकारके सुखोंका उपभोग करते हैं। जिनके नेत्र अधिक उन्नत अर्थात् ऊपरकी ओर अधिक उठे होते हैं, वे अल्पायु होते हैं। विशाल और उन्नत नेत्रोंके होनेपर मनुष्य सुखी होते हैं।

विषम भौंहोंवाले दरिद्र होते हैं तथा दीर्घ, सघन, एक-दूसरेसे संयुक्त, बालचन्द्रके सदृश पतले, वक्र एवं उन्नत सुन्दर भौंहोंसे सुशोभित प्राणी धन-वैभवसे सम्पन्न होते हैं। मध्यभागमें कटी हुई भौंहोंके होनेपर मनुष्य निर्धन तथा झुकी हुई भौंहोंके होनेसे अगम्या स्त्रियोंमें रत रहनेवाले और पुत्रसे रहित होते हैं।

उन्नत, विशाल, शङ्खाकार एवं विषम मस्तक होनेपर पुरुषोंमें निर्धनता और अर्द्धचन्द्राकार ललाटके होनेपर वे धनसम्पन्नतासे परिपूर्ण रहते हैं। सीपके समान आभावाले तथा विशाल मस्तकवाले आचार्यके पदको सुशोभित करते हैं, जिनके मस्तकोंपर शिराएँ स्पष्ट प्रतीत होती रहती हैं, वे पापकर्ममें लगे रहते हैं। उन्नत शिराओंसे युक्त स्वस्तिकाकार, सुन्दर ललाटके होनेपर मनुष्य धनवान् तथा निम्न ललाटके होनेपर बन्दी बनाये जानेयोग्य होते हैं और क्रूर कर्मोंको करते हैं। गोल ललाटवाले कृपण और उन्नत भालवाले राजा होते हैं।

लोगोंका अश्रुरहित, दीनतारहित, स्निग्ध रुदन मङ्गलकारी होता है तथा अविरल अश्रुधारवाला, दैन्यभावको प्रकट करता हुआ रूखा रुदन सुखकारी होता है।

कम्पनरहित हँसी श्रेष्ठ होती है। आँख मूँदकर हँसनेवाला व्यक्ति पापी होता है। बार-बार हँसनेवाला दुष्ट होता है और उन्मत्तकी हँसी अनेक प्रकारकी होती है।

सौ वर्षतक जीवन प्राप्त करनेवाले लोगोंके मस्तकपर तीन रेखाएँ होती हैं। मस्तकपर चार रेखाओंके होनेपर मनुष्य राजा होता है और उसकी आयु पंचानबे वर्षतक होती है। रेखारहित ललाटवाला व्यक्ति नब्बे वर्ष जीवित रहता है। विच्छिन्न रेखाओंसे व्याप्त मस्तकवाले पुरुष लम्पट होते हैं। मस्तकपर केशपर्यन्त रेखाओंके होनेसे मनुष्यकी आयु अस्सी वर्षकी होती है। पाँच, छः अथवा सात रेखाओंके होनेसे प्राणीकी आयु पचास वर्ष तथा सातसे अधिक रेखाओंके होनेपर चालीस वर्षकी आयु माननी चाहिये। मस्तकपर रेखाओंकी वक्रता एवं भौंहपर्यन्त स्थिति होनेसे पुरुष तीस

काण्ड ] स्त्री एवं पुरुषोंके शुभाशुभ लक्षण १११


वर्ष तथा बाँयी ओर वक्र होनेपर बीस वर्षकी अल्पायुको प्राप्त करते हैं। रेखाओंके क्षुद्र होनेपर मनुष्य अल्पायु होता है।

छत्राकार सिरवाले मनुष्य राजा और निम्न सिरवाले धनी होते हैं। चिपटे सिरसे युक्त पुरुषोंके पिताकी मृत्यु शीघ्र होती है। मण्डलाकार सिर होनेपर व्यक्ति गौ आदि प्राणियोंसे सम्पन्न होते हैं। घटाकार मूर्द्धाभागके होनेपर मनुष्य पापमें अभिरुचि रखनेवाला तथा धनहीन होता है।

काले-काले घुँघराले, स्निग्ध, एक छिद्रमें एक-एक उत्पन्न, अभिन्न अग्रभागवाले, अत्यधिक, न छोटे न बड़े, सुन्दर केशोंवाले राजा होते हैं। एक छिद्रमें अनेक बालवाले, विषम, स्थूलाग्र तथा कपिलवर्णके केशोंसे युक्त पुरुष निर्धन होते हैं। अत्यन्त कुटिल, सघन एवं काले बालवाले भी निर्धन होते हैं।

मनुष्यके जो अङ्ग अतिशय रूक्ष, शिराओंसे व्याप्त तथा मांसरहित होते हैं, वे सभी अशुभ हैं। यदि वे अङ्ग इसके विपरीत होते हैं तो उन्हें शुभ मानना चाहिये।

मानव-शरीरमें तीन अङ्ग विशाल और तीन अङ्ग गम्भीर, पाँच अङ्ग दीर्घ तथा सूक्ष्म, छः अङ्ग उन्नत, चार ह्रस्व एवं सात अङ्ग रक्तवर्णके होनेपर वह राजा होता है।

नाभि, स्वर तथा सत्त्व (स्वभाव)*—ये तीन गम्भीर होने चाहिये। ललाट, मुख तथा वक्षःस्थल विशाल, नेत्र, कक्षा (काँख), नासिका तथा कृकाटिका अर्थात् गरदनका उठा हुआ भाग, सिर और गरदनका जोड़—इन छःको उन्नत होना चाहिये, ऐसा होनेपर मनुष्य राजा होता है। जंघा, ग्रीवा, लिङ्ग तथा पृष्ठभाग—ये चार अङ्ग ह्रस्व होने चाहिये। करतल, तालु, अधर और नख—ये चार रक्ताभ होने चाहिये। नेत्रान्तभाग, चरणतल, जिह्वा और दोनों ओष्ठ—ये पाँच सूक्ष्म होने चाहिये। दाँत, अँगुली, पर्व, नख, केश और त्वचा—ये पाँच अङ्ग दीर्घ होनेपर शुभकारी हैं। दोनों स्तनोंका मध्यभाग, दोनों भुजाएँ, दाँत, नेत्र और नासिकाका भी दीर्घ होना शुभ है।

इस प्रकार मनुष्योंका लक्षण कहकर अब स्त्रियोंका लक्षण कह रहा हूँ।

रानीके दोनों चरण स्निग्ध, समान पदतलवाले, ताम्रवर्णकी आभासे सुशोभित नखोंसे युक्त, सघन अँगुलियोंवाले तथा उन्नत अग्रभागवाले होते हैं। ऐसी स्त्रीको प्राप्तकर मनुष्य राजा बन जाता है।

गूढ गुल्फ-प्रदेशसे युक्त पद्मपत्रके समान चरणतल शुभ होते हैं। जिसके चरणतलोंमें पसीना नहीं छूटता है और वे कोमल होते हैं, उनमें मत्स्य, अंकुश, ध्वज, वज्र, पद्म तथा हलका चिह्न हो तो वह रानी होती है। इन लक्षणोंसे रहित चरणवाली स्त्री दासी होती है। स्त्रियोंकी रोमरहित, सुन्दर, शिराविहीन, गोल-गोल जंघाएँ शुभ हैं। सन्धिस्थान तथा दोनों जानु समान होने चाहिये, ऐसा शुभ होता है। गजशुण्डके सदृश, रोमरहित तथा समान भागवाले दोनों ऊरु श्रेष्ठ माने जाते हैं।

विस्तीर्ण, मांसल, गम्भीर, विशाल तथा दक्षिणावर्त नाभि तथा मध्यभागमें त्रिवलियाँ श्रेष्ठ होती हैं। स्त्रियोंके रोमरहित, विशाल, भरे हुए, सघन एवं समान भागवाले कठोर स्तन-प्रदेश शुभ हैं। रोमरहित, शङ्खके आकारवाली सुन्दर ग्रीवा प्रशस्त होती है। अरुणाभ अधरोष्ठवाला तथा वर्तुलाकार मांसल भरा हुआ मुख श्रेष्ठ होता है। कुन्द-पुष्पके समान दन्तपंक्ति तथा कोयलकी भाँति वाणी शुभ होती है, जो सदैव दाक्षिण्य भावसे परिपूर्ण रहती है, उसमें शठता नहीं होती, अपितु हंसोंके समान


* किरातार्जुनीय १२। ३९ के अनुसार 'सत्त्व' का अर्थ स्वभाव भी होता है।

५२-पद्मरागके विविध लक्षण एवं उसकी परीक्षा-विधि

११२संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

मधुर शब्दोंका प्रयोग करके वह दूसरोंको सुख प्रदान करती है, वही स्त्री श्रेष्ठ होती है। स्त्रियोंकी नासिका और नासिका-छिद्र समान होना मनोहर और मङ्गलदायी होता है।

स्त्रियोंके नीलकमलके समान नेत्र अच्छे होते हैं। बालचन्द्रके सदृश भौंहोंका होना शुभ है, किंतु उनका मोटा होना अच्छा नहीं है। उनका मस्तक अर्द्धचन्द्रके समान सुन्दर, समतल तथा रोमविहीन होना शुभ है।

सुन्दर, समान, मांसल एवं कोमल कान श्रेष्ठ होते हैं। स्त्रियोंके चिकने, नीलवर्णवाले, मृदु और घुँघराले केश प्रशस्त माने गये हैं। उनका सम आकारवाला सिर शुभ होता है। चरणतल अथवा करतलमें अश्व, हस्ति, श्री, वृक्ष, यूप, बाण, यव, तोमर, ध्वज, चामर, माला, पर्वत, कुण्डल, वेदी, शङ्ख, छत्र, पद्म, स्वस्तिक, रथ तथा अङ्कुश आदि चिह्नवाली स्त्रियाँ राजवल्लभा होती हैं।

स्त्रियोंके मांसल मणिबन्धवाले तथा कमलदलके समान हाथोंको शुभ माना जाता है। स्त्रियोंके करतलोंका न तो अधिक निम्न और न अधिक उन्नत होना अच्छा होता है। शुभ रेखाओंसे व्याप्त करतलवाली स्त्रियाँ आजीवन सधवा रहकर विभिन्न प्रकारके सुखोंका उपभोग करती हैं। हाथमें जो रेखा मणिबन्धसे निकलकर मध्यमा अँगुलीतक जाती है, वह ऊर्ध्वरेखा कही जाती है। ऐसी रेखा यदि स्त्री या पुरुषके करतल अथवा चरणतलमें अवस्थित रहती है तो वे स्त्री या पुरुष राज्य अथवा अन्य प्रकारके सुखोंका उपभोग करते हैं।

कनिष्ठिका अँगुलीके मूलसे निकलकर तर्जनी और मध्यमा अँगुलियोंके मध्यभागतक रेखाके पहुँचनेपर स्त्री या पुरुषकी आयु सौ वर्षकी होती है। यदि इन अँगुलियोंके बीचतक आनेवाली रेखाका परिमाण उसकी अपेक्षा कम हो तो उसी अनुपातमें मनुष्यकी आयु भी कम होती है।

अङ्गुष्ठमूलक रेखाओंके रहनेपर स्त्री या पुरुष बहुत-से पुत्रों या कन्याओंवाले होते हैं। स्थान-स्थानपर आयुरेखाके छिन्न-भिन्न होनेसे मनुष्यकी आयु अल्प हो जाती है। यदि वह रेखा दीर्घ एवं अविच्छिन्न हो तो उस पुरुष अथवा स्त्रीको दीर्घायु माना जाता है। स्त्रियोंके विषयमें कहे गये ये सभी लक्षण शुभ हैं। इनके विपरीत लक्षणोंके होनेपर उन्हें अशुभ मानना चाहिये। (अध्याय ६५)


चक्राङ्कित शालग्रामशिलाओंके विविध नाम, तीर्थमाहात्म्य तथा साठ संवत्सरोंके नाम

**श्रीहरिने कहा—**हे शिव! चक्राङ्कित शालग्राम-शिलाकी पूजा सब प्रकारके कल्याण-मङ्गल प्रदान करती है।

प्रथम शालग्राम-शिलाका नाम सुदर्शन है। (इसमें एक चक्रका चिह्न अङ्कित होता है।) दूसरी शिलाका नाम लक्ष्मीनारायण है। (इसमें दो चक्रोंके चिह्न होते हैं।) तीन चक्रोंवाली शिलाको अच्युत तथा चार चक्रोंवाली शिलाको चतुर्भुज कहा जाता है। इस प्रकार चक्रसमन्वित अन्य शालग्राम-शिलाओंको क्रमशः—वासुदेव, प्रद्युम्न, संकर्षण तथा पुरुषोत्तमके नामसे अभिहित किया गया है। नौ चक्रोंवाली शिलाको नवव्यूह और दस चक्रोंवाली शिलाको दशात्मक कहते हैं। एकादश चक्रोंसे युक्त शिलाको अनिरुद्ध एवं द्वादश चक्रोंसे समन्वित शिलाका नाम द्वादशात्मक है। उसके ऊपर चक्रोंकी चाहे जितनी संख्या हो, उनसे लक्षित शिलामूर्तिका

काण्ड ] स्वरोदय-विज्ञान ११३


नाम भगवान् अनन्त कहा गया है। जो शिलामूर्ति सबसे सुन्दर हो, उसका पूजन करना चाहिये, ऐसी सुदर्शन मूर्तियाँ पूजित होनेपर सभी कामनाओंको पूर्ण करती हैं।

जहाँ शालग्राम और द्वारका-शिला रहती हैं और इन दोनों शिलाओंका जहाँ संगम है, वहाँ मुक्ति रहती है, इसमें संशय नहीं है—

शालग्रामशिला यत्र देवो द्वारवतीभवः।
उभयोः संगमो यत्र तत्र मुक्तिर्न संशयः॥

<div align="right">(६६। ५)</div>

हे शंकर! शालग्राम, द्वारका, नैमिष, पुष्कर, गया, वाराणसी, प्रयाग, कुरुक्षेत्र, सूकरक्षेत्र, गङ्गा, नर्मदा, चन्द्रभागा, सरस्वती, पुरुषोत्तमक्षेत्र तथा महाकालका अधिष्ठान उज्जयिनी—ये सभी तीर्थ सब प्रकारके पापोंका विनाश करनेवाले एवं भुक्ति-मुक्ति प्रदान करनेवाले हैं।*

प्रभव, विभव, शुक्ल, प्रमोद, प्रजापति, अंगिरा, श्रीमुख, भाव, युवा, धाता, ईश्वर, बहुधान्य, प्रमाथी, विक्रम, विषु, चित्रभानु, स्वभानु, तारण, पार्थिव, व्यय, सर्वजित्, सर्वधारी, विरोधी, विकृति, खर, नन्दन, विजय, जय, मन्मथ, दुर्मुख, हेमलम्ब, विलम्ब, विकार, शर्वरी, प्लव, शुभकृत्, शोभन, क्रोधी, विश्वावसु, पराभव, प्लवंग, कीलक, सौम्य, साधारण, विरोधकृत्, परिधावी, प्रमादी, आनन्द, राक्षस, नल, पिंगल, काल, सिद्धार्थ, रौद्रि, दुर्मति, दुन्दुभि, रुधिरोद्गारी, रक्ताक्ष, क्रोधन एवं अक्षय—ये साठ संवत्सर अपने नामके अनुसार शुभ और अशुभ फल प्रदान करनेवाले हैं। (अध्याय ६६)


स्वरोदय-विज्ञान

स्वरके उदयसे कार्योंके शुभ और अशुभका ज्ञान होता है। शरीरमें बहुत प्रकारकी नाड़ियोंका विस्तार है। नाभि-प्रदेशके नीचे जो कन्दस्थान अर्थात् मूलाधार है, वहींसे उन नाड़ियोंका अङ्कुरण होकर सम्पूर्ण शरीरमें विस्तार होता है। बहत्तर हजार नाडियाँ नाभिके मध्यमें चक्राकार अवस्थित रहती हैं। उन नाड़ियोंमें वामा, दक्षिणा और मध्यमा नामक तीन श्रेष्ठ नाडियाँ हैं। (उन्हींको क्रमशः—इडा, पिंगला और सुषुम्णा कहा जाता है।) इनमें वामा सोमात्मिका, दक्षिणा सूर्यके समान तथा मध्यमा नाडी अग्निके समान फलदायिनी एवं कालरूपिणी है।

वामा नाडी अमृतरूपा है, वह जगत्को आप्यायित करती रहती है। दक्षिणा नाडी अपने रौद्रगुणसे सदैव जगत्का शोषण करती रहती है। जब शरीरमें इन दोनोंका एक साथ प्रवाह होता है, उस समय समस्त कार्योंका विनाश करनेवाली मृत्यु आ पहुँचती है।

यात्रादिके लिये प्रस्थानकालमें वामा तथा प्रवेशके अवसरपर दक्षिणा नाडीप्रवाहको शुभ माना गया है। इडा अर्थात् वामाके श्वास-प्रवाह-कालमें ऐसा सौम्य शुभकारी कार्य करना चाहिये, जो चन्द्रके समान जगत्के लिये भी शुभकारी हो तथा पिंगला अर्थात् दक्षिणा नाडीमें प्राणवायुके प्रवाहित होनेके समय सूर्यके समान तेजस्वी क्रूर कार्य करना चाहिये। यात्रामें, सभी कार्योंमें तथा विषको दूर करनेमें इडा नाडीका चलना अच्छा होता है। भोजन, मैथुन, युद्धारम्भमें, पिंगला नाडी सिद्धिदायक


* शालग्रामो द्वारका च नैमिषं पुष्करं गया। वाराणसी प्रयागश्च कुरुक्षेत्रं च सूकरम्॥
गङ्गा च नर्मदा चैव चन्द्रभागा सरस्वती। पुरुषोत्तमो महाकालस्तीर्थान्येतानि शङ्कर॥
सर्वपापहराण्येव भुक्तिमुक्तिप्रदानि वै।

<div align="right">॥ (६६। ६–८)</div>