गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
काण्ड ] नीतिसार २०९
संग्रह करना चाहिये। ऐसा करनेसे राजा शत्रुको पराजित कर सकता है। परिस्थितिके अनुसार संधिकी अनिवार्यता होनेपर राजाको शत्रुके साथ छः मास अथवा एक वर्षपर्यन्त ही संधि करनी चाहिये। उसके बाद अपनी संचित सामर्थ्यको देखते हुए शत्रुको पराजित करना चाहिये। जो राजा राज्यकार्यमें मूर्ख व्यक्तिको नियोजित करता है, उस राजाको अपयश, धन-विनाश तथा नरकभोग-ये तीन प्राप्त होते हैं।
जो राजा भृत्योंकी सूक्ष्म कार्यप्रणालीके द्वारा जो कुछ भी शुभाशुभ कर्म करता है, उसीके अनुसार ही वह भविष्यमें अभिवृद्धि या ह्रासको प्राप्त करता है। अतः राजाको धर्म-अर्थ तथा काम-इस त्रिवर्गकी साधना एवं गौ-ब्राह्मणकी अभिरक्षाके लिये राज्यकार्यमें सर्वगुणसम्पन्न विद्वान् व्यक्तिको ही नियुक्त करना चाहिये।
(अध्याय ११२)
नीतिसार
श्रीसूतजीने कहा-राजाको राज्यकार्यमें गुणवान् पुरुषकी नियुक्ति और गुणहीनका परित्याग करना चाहिये। विद्वान् व्यक्तिमें सभी गुण विद्यमान रहते हैं, किंतु मूर्ख व्यक्तिमें तो केवल दोष ही रहते हैं।
निरन्तर सज्जनोंके साथ रहना चाहिये और सज्जनोंकी ही संगति करनी चाहिये। विवाद एवं मैत्री भी सज्जनोंके साथ ही करनी चाहिये। दुर्जनोंके साथ कुछ भी नहीं करना चाहिये। पण्डित, विनीत, धर्मज्ञ एवं सत्यवादी जनोंके साथ बन्धनमें भी रहना श्रेयस्कर है, किंतु दुष्टोंके साथ राज्यका भी उपभोग करना उचित नहीं है-
सद्बिरासीत सततं सद्भिः कुर्वीत संगतिम्।
सद्भिर्विवादं मैत्रीं च नासद्भिः किंचिदाचरेत् ॥
पण्डितैश्च विनीतैश्च धर्मज्ञैः सत्यवादिभिः।
बन्धनस्थोऽपि तिष्ठेच्च न तु राज्ये खलैः सह ॥
(११३।२-३)
सभी कार्योंको पूर्ण कर लेना चाहिये। कोई काम अधूरा नहीं छोड़ना चाहिये। इससे सभी प्रकारके अर्थोंकी प्राप्ति हो जाती है।
जिस प्रकार भ्रमर पुष्पके परागको ग्रहण कर लेता है, किंतु पुष्पको नष्ट नहीं करता; जैसे दूध दुहनेवाला व्यक्ति बछड़ेके हितको ध्यानमें रखते हुए दूधको दुहता है, वैसे ही राजाको प्रजाहितका ध्यान रखते हुए प्रजासे करका दोहन करना चाहिये। जिस प्रकार मधुमक्खी एक-एक पुष्पसे मधुको ग्रहण कर उसे एकत्र करती है, उसी प्रकार राजाको भी प्रजासे धन-संग्रह करना चाहिये।<sup>१</sup> जैसे वल्मीक (बाँबी), मधुमक्खीका छत्ता तथा शुक्लपक्षका चन्द्रमा प्रतिदिन थोड़ा-थोड़ा बढ़ता रहता है, वैसे ही राजाका द्रव्य तथा भिक्षा भी धीरे-धीरे थोड़ा-थोड़ा धर्मपूर्वक संग्रह करनेसे बढ़ते रहते हैं।
समुचित रीतिसे अर्जित किये गये धनका भी क्षय होता ही है और श्रद्धापूर्वक दीयमान दान कोटिगुणित होकर यथासमय मिलता ही है—इस वास्तविकताको ध्यानमें रखते हुए अपना कोई भी दिन दान, अध्ययन या सत्कर्मसे विहीन नहीं होने देना चाहिये।<sup>२</sup> रागी व्यक्तिसे वनमें भी दोष हो जाते हैं। अतः घरमें मनुष्यके द्वारा किया गया पञ्चेन्द्रियोंका निग्रह तप ही है। जो व्यक्ति जितेन्द्रिय होकर अनिन्दित कर्मोंमें प्रवृत्त हो सन्मार्गकी ओर
१-मधुहेव दुहेत् सारं कुसुमं च न घातयेत्। वत्सापेक्षी दुहेत् क्षीरं भूमिं गां चैव पार्थिवः ॥
यथा क्रमेण पुष्पेभ्यश्चिनुते मधु षट्पदः। तथा वित्तमुपादाय राजा कुर्वीत संचयम् ॥ (११३।५-६)
२-अर्जितस्य क्षयं दृष्ट्वा सम्प्रदत्तस्य संचयम्। अवन्ध्यं दिवसं कुर्याद्दानाध्ययनकर्मसु ॥ (११३।८)
९६- नीतिसार
| २०२ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
|---|
बढ़ता जाता है, उस विषयवासनाओंसे दूर निवृत्तमार्गवालेके लिये उसका घर ही तपोवन है।<sup>१</sup>
सत्यके पालनसे धर्मकी रक्षा होती है। सदा अभ्यास करनेसे विद्याकी रक्षा होती है। मार्जनके द्वारा पात्रकी रक्षा होती है और शीलसे कुलकी रक्षा होती है—
सत्येन रक्ष्यते धर्मो विद्या योगेन रक्ष्यते।
मृजया रक्ष्यते पात्रं कुलं शीलेन रक्ष्यते॥
(११३।१०)
विन्ध्याटवीमें निवास करना मनुष्यके लिये अच्छा है, बिना भोजन किये ही मर जाना श्रेयस्कर है, सर्पसे परिव्याप्त भूमिपर सोना तथा कुएँमें गिरकर मृत्युको प्राप्त करना उचित है, जलके आवर्तयुक्त भयंकर भँवरमें डूब मरना श्रेष्ठ है; किंतु अपने ही पक्षके आत्मीय जनसे 'थोड़ा धन मुझे दे दें' इस प्रकार याचना करना अच्छा नहीं है।<sup>२</sup> भाग्यका ह्रास होनेसे मनुष्यकी सम्पदाओंका विनाश होता है, न कि उपभोग करनेसे। पूर्वजन्ममें यदि पुण्य अर्जित है तो सम्पत्तिका नाश कभी नहीं हो सकता।
ब्राह्मणोंका आभूषण विद्या, पृथिवीका आभूषण राजा, आकाशका आभूषण चन्द्र एवं समस्त चराचरका आभूषण शील है—
विप्राणां भूषणं विद्या पृथिव्या भूषणं नृपः।
नभसो भूषणं चन्द्रः शीलं सर्वस्य भूषणम्॥
(११३।१३)
इतिहासप्रसिद्ध ये जो भीमसेन, अर्जुन आदि राजपुत्र हैं—ये सभी चन्द्रके समान कान्तिसम्पन्न, पराक्रमशील, सत्यप्रतिज्ञ, सूर्यके सदृश प्रतापशाली और स्वयं विष्णुके अवतारस्वरूप भगवान् कृष्णसे अभिरक्षित थे, फिर भी इन लोगोंको कृपण धृतराष्ट्रकी परवशताके कारण भिक्षाटन करना पड़ा। इस संसारमें कौन ऐसा है, जिसमें ऐसी सामर्थ्य है, जिसको भाग्यके वशीभूत होनेके कारण कर्मरेखा नहीं घुमाती ?<sup>३</sup>
जिस पूर्वसंचित कर्मके अधीन होकर ब्रह्मा कुम्भकारके समान ब्रह्माण्डरूपी इस महाभाण्डके उदरमें चराचर प्राणियोंकी सृष्टिमें नियमतः लगे रहते हैं, जिस कर्मसे अभिभूत होकर विष्णु दशावतारके कालमें परिव्याप्त असीमित महासंकटमें अपनेको डाल देते हैं, जिस कर्मके अनुसार ही सदाशिव रुद्र हाथमें कपाल धारणकर भिक्षाटन करते हैं और जिस कर्मसे सूर्य नित्य आकाशमें ही चक्कर काटते हैं—उस कर्मको मैं नमस्कार करता हूँ।<sup>४</sup>
राजा बलि उत्कृष्ट कोटिके दाता थे और याचक स्वयं भगवान् विष्णु थे। विशिष्ट ब्राह्मणोंके समक्ष पृथिवीका दान दिया गया, फिर भी दानका फल बन्धन प्राप्त हुआ। यह सब दैवका खेल है, ऐसे इच्छानुसार फल देनेवाले दैवको नमस्कार है।<sup>५</sup>
यदि प्राणीकी माता स्वयं लक्ष्मी हों, पिता साक्षात् भगवान् जनार्दन विष्णु हों, उसके बाद भी प्राणीको यदि कुबुद्धिमें ही विश्वास है तो उसको दण्ड भोगना ही पड़ेगा।
पूर्वजन्ममें प्राणीने जैसा कर्म किया है, उसी कर्मके
१-वनेऽपि दोषाः प्रभवन्ति रागिणां गृहेऽपि पञ्चेन्द्रियनिग्रहस्तपः।
अकुत्सिते कर्मणि यः प्रवर्तते निवृत्तरागस्य गृहं तपोवनम्॥ (११३।९)
२-वरं विन्ध्याटव्यां निवसनमभुक्तस्य मरणं वरं सर्पकीर्णे शयनमथ कूपे निपतनम्।
वरं भ्रान्तावर्ते सभयजलमध्ये प्रविशनं न तु स्वीये पक्षे हि धनमणु देहीति कथनम्॥ (११३।११)
३-एते ते चन्द्रतुल्याः क्षितिपतितनया भीमसेनार्जुनाद्याः शूराः सत्यप्रतिज्ञा दिनकरवपुषः केशवेनोपगूढाः।
ते वै दुष्टग्रहस्थाः कृपणवशगता भैक्ष्यचर्यां प्रयाताः को वा कस्मिन् समर्थो भवति विधिवशाद्भ्रामयेत् कर्मरेखा॥ (११३।१४)
४-ब्रह्मा येन कुलालवन्नियमितो ब्रह्माण्डभाण्डोदरे विष्णुर्येन दशावतारगहने क्षिप्तो महासङ्कटे।
रुद्रो येन कपालपाणिपुटके भिक्षाटनं कारितः सूर्यो भ्राम्यति नित्यमेव गगने तस्मै नमः कर्मणे॥ (११३।१५)
५-दाता बलिर्याचकको मुरारिर्दानं महीं विप्रमुखस्य मध्ये। दत्त्वा फलं बन्धनमेव लब्धं नमोऽस्तु ते दैव यथेष्टकारिणे॥ (११३।१६)
काण्ड ] नीतिसार २०३
अनुसार वह दूसरे जन्ममें फल भोगता है। अतः स्वयमेव प्राणी अपने भोग्य फलका निर्माण करता है, अर्थात् वह कर्मफलका स्वयं ही विधाता है।
हम अपने सुख या दुःखके स्वयं ही हेतु हैं। माताके गर्भाशयमें आकर अपने पूर्वदेहमें किये गये कर्मोंके फल ही हमें भोगने पड़ते हैं। आकाश, समुद्र, पर्वतीय गुफा तथा माताके सिरपर और माताकी गोदमें अवस्थित रहते हुए भी मनुष्य निश्चित ही उन अपने पूर्वसंचित कर्मफलका परित्याग करनेमें समर्थ नहीं होता।
जिसका दुर्ग ही त्रिकूट पर्वत था, जिसकी परिखा समुद्र ही था, राक्षसगणसे जो अभिरक्षित था, स्वयं जो परम विशुद्ध आचरण करनेवाला था, जिसको नीतिशास्त्रकी शिक्षा शुक्राचार्यसे प्राप्त हुई थी, वह रावण भी काल-वश नष्ट हो गया।
जिस अवस्था, जिस समय, जिस दिन, जिस रात्रि, जिस मुहूर्त अथवा जिस क्षण जैसा होना निश्चित है; वह वैसा ही होगा, अन्यथा नहीं हो सकता—
यस्मिन् वयसि यत्काले यद्दिवा यच्च वा निशि।
यन्मुहूर्ते क्षणे वापि तत्तथा न तदन्यथा॥
(११३।२२)
सभी अन्तरिक्षमें जा सकते हैं या भूगर्भमें प्रवेश कर सकते हैं अथवा दसों दिशाओंको अपने ऊपर धारण कर सकते हैं, किंतु अप्रदत्त वस्तुको प्राप्त नहीं कर सकते हैं।
पूर्वजन्ममें अर्जित की गयी विद्या, दिया गया धन तथा सम्पादित कर्म ही दूसरे जन्ममें आगे-आगे मिलते जाते हैं। अर्थात् प्राणीने पूर्वजन्ममें जैसा कर्म किया है, उसको इस जन्ममें वैसा ही प्राप्त होता है<sup>१</sup>। इस संसारमें कर्म ही प्रधान है। सुन्दर नक्षत्र था, ग्रहोंका योग था, स्वयं वसिष्ठ मुनिके द्वारा निर्धारित लग्नमें विवाह-संस्कार कराये जानेपर भी जानकी—सीताको [पूर्वजन्ममें संचित कर्मके अनुसार] दुःख भोगना पड़ा। विशाल जंघाओंवाले श्रीराम, शब्दकी गतिसे चलनेवाले श्रीलक्ष्मण तथा सघन केशवाली शुभलक्षणा श्रीसीताजी—ये भी तीनों जब अपने कर्मके अनुसार दुःखके भाजन हो गये तो सामान्य जनके विषयमें कुछ कहना ही व्यर्थ है। न पिताके कर्मसे पुत्रको सद्गति मिल सकती है और न पुत्रके कर्मसे पिताको सद्गति मिल सकती है। सभी लोग अपने-अपने कर्मसे ही अच्छी गति प्राप्त करते हैं<sup>२</sup>।
पूर्वजन्ममें अर्जित कर्मफलके अनुसार प्राप्त शरीरमें शारीरिक और मानसिक रोग उसी प्रकार आकर अपना दुष्प्रभाव प्रकट करते हैं, जिस प्रकार कुशल वीर धनुर्धरोंके द्वारा छोड़े गये बाण लक्ष्यको बेधकर कष्ट पहुँचाते हैं। बाल-युवा तथा वृद्ध जो भी शुभाशुभ कर्म करता है, वह जन्म-जन्मान्तरमें उसी अवस्थाके अनुसार उस फलका भोग करता है। उस पूर्वार्जित फलको न देखनेवाला एवं विदेशमें रहता हुआ भी मनुष्य अपने कर्मरूपी जहाजके संयमित पवन-वेगके द्वारा उस फलतक पहुँचा दिया जाता है<sup>३</sup>।
मनुष्य अपने प्रारब्धका फल प्राप्त करता है। देवता भी उस फलभोगको रोकनेमें समर्थ नहीं हैं।
१-पुराधीता च या विद्या पुरा दत्तञ्च यद्धनम्। पुरा कृतानि कर्माणि ह्यग्रे धावति धावति॥ (११३।२४)
२-कर्माण्यत्र प्रधानानि सम्यगृक्षे शुभग्रहे। वसिष्ठकृतलग्नाऽपि जानकी दुःखभाजनम्॥
स्थूलजंघो यदा रामः शब्दगामी च लक्ष्मणः। घनकेशी यदा सीता त्रयस्ते दुःखभाजनम्॥
न पितुः कर्मणा पुत्रः पिता वा पुत्रकर्मणा। स्वयं कृतेन गच्छन्ति स्वयं बद्धाः स्वकर्मणा॥ (११३।२५–२७)
३-बालो युवा च वृद्धश्च यः करोति शुभाशुभम्। तस्यां तस्यामवस्थायां भुङ्क्ते जन्मनि जन्मनि॥
अनीक्षमाणोऽपि नरो विदेशस्थोऽपि मानवः। स्वकर्मपोतवातेन नीयते यत्र तत्फलम्॥ (११३।३०-३१)
| २०४ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
|---|
इसीलिये मैं कर्मफलके विषयमें चिन्ता नहीं करता हूँ और न मुझे आश्चर्य ही है, क्योंकि जो मेरा है, उसे दूसरा कोई नहीं ले सकता—
प्राप्तव्यमर्थं लभते मनुष्यो देवोऽपि तं वारयितुं न शक्तः। अतो न शोचामि न विस्मयो मे यदस्मदीयं न तु तत्परेषाम्॥ (११३।३२)
जैसे साँप, हाथी और चूहा—ये शीघ्रतावश क्रमशः कुआँ, अपने वासस्थान तथा बिलतक ही भाग सकते हैं, इससे आगे कहाँतक जा सकते हैं ? इसी तरह अपने कर्म अथवा भाग्यसे कौन भाग सकता है? सब तो उसीके अधीन हैं।
सद्विद्या देनेसे उसी प्रकार बढ़ती रहती है कम नहीं होती, जिस प्रकार कुएँसे जल ग्रहण कर लेनेपर भी कुएँका जल बढ़ता ही रहता है [घटता नहीं]। जो धन धर्मानुसार अर्जित किया जाता है वही [वास्तविक] धन है। अधर्मसे प्राप्त हुआ धन तो मनुष्यके ऐश्वर्यका नाशक होता है। इस संसारमें धर्मार्थी ही महान् होता है। धनकी अपेक्षा करनेवाले मनुष्यको निश्चित ही श्रेष्ठजनोंके दृष्टान्तोंको स्मरण करके धनोपार्जनमें तत्पर होना चाहिये। अन्नार्थी कृपण व्यक्ति जिन दुःखोंको भोगता है, यदि धर्मार्थी होकर वह उन दुःखोंका चिन्तन करे तो पुनः उसको दुःखका पात्र होना ही न पड़े। सभी प्रकारकी शुचितामें अन्नकी शुचिता ही प्रधान है। जो मनुष्य अन्न और अर्थसे पवित्र है [वही शुचि है]। केवल मिट्टी और जलसे शुचिता नहीं आती।*
सत्यपालनमें शुचिता, मनःशुद्धि, इन्द्रियनिग्रह, सभी प्राणियोंमें दया और जलसे प्रक्षालन—ये पाँच प्रकारके शौच माने गये हैं। जिसमें सत्यपालनकी शुचिता है, उसके लिये स्वर्गकी प्राप्ति दुर्लभ नहीं है। जो मनुष्य सत्य ही सम्भाषण करता है, वह अश्वमेधयज्ञ करनेवाले व्यक्तिसे भी बढ़कर है—
सत्यं शौचं मनःशौचं शौचमिन्द्रियनिग्रहः। सर्वभूते दया शौचं जलशौचं च पञ्चमम्॥ यस्य सत्यं हि शौचं च तस्य स्वर्गो न दुर्लभः। सत्यं हि वचनं यस्य सोऽश्वमेधाद्विशिष्यते॥ (११३।३८-३९)
दुष्ट स्वभावसे अपनी आत्माको दबाकर रखनेवाला दुराचारी पुरुष हजारों बार मिट्टीके लेप तथा सैकड़ों बार जलके प्रक्षालनसे पवित्र नहीं हो सकता। जिसके हाथ-पैर एवं मन सुसंयत हैं, जिसे अध्यात्म-विद्या प्राप्त है, जो धर्मपालनके लिये कष्ट सहन करता है तथा जिसने सत्कीर्ति अर्जित की है, वही तीर्थोंका यथार्थ फल भी भोगता है—
यस्य हस्तौ च पादौ च मनश्चैव सुसंयतम्। विद्या तपश्च कीर्तिश्च स तीर्थफलमश्नुते॥ (११३।४१)
जो मनुष्य सम्मानसे प्रसन्न नहीं होता, अपमानसे क्रुद्ध नहीं होता एवं क्रोधके आनेपर मुँहसे कठोर वाक्य नहीं निकालता, ऐसे ही मनुष्यको साधुपुरुष समझना चाहिये—
न प्रहृष्यति सम्मानैर्नावमानैः प्रकुप्यति। न क्रुद्धः परुषं ब्रूयादेतत् साधोस्तु लक्षणम्॥ (११३।४२)
विद्वान्, मधुरभाषी भी कोई व्यक्ति यदि दरिद्र है तो उसके समयोचित हितकारी वचनको सुनकर भी कोई संतुष्ट नहीं होता है। यदि कोई मनुष्य
* येऽर्था धर्मेण ते सत्या येऽधर्मेण गताः श्रियः। धर्मार्थी च महाँल्लोके तत् स्मृत्वा ह्यर्थकारणात्॥
अन्नार्थी यानि दुःखानि करोति कृपणो जनः। तान्येव यदि धर्मार्थी न भूयः क्लेशभाजनम्॥
सर्वेषामेव शौचानामन्नशौचं विशिष्यते। योऽन्नार्थैः शुचिः शौचान्न मृदा वारिणा शुचिः॥ (११३।३५-३७)
काण्ड ] नीतिसार २०५
मन्त्र या बलके प्रभावसे अथवा बुद्धि और पौरुषके बलपर अलभ्य-अदृष्ट वस्तुको प्राप्त नहीं कर पा रहा है तो उस विषयमें मनुष्यको किसी प्रकारका खेद नहीं करना चाहिये।
अयाचित कोई वस्तु मुझे प्राप्त हो और पुनः वह मेरे पाससे चली जाय तो कष्ट होता है, किंतु जो जहाँसे आयी थी वह पुनः वहीं चली गयी तो उसमें कैसा दुःख? दुःख करनेका कोई औचित्य ही नहीं है। रात्रिमें सदैव एक ही वृक्षपर नाना प्रकारके पक्षियोंका समूह शरण लेता है, किंतु प्रातःकाल होते ही वे सभी भिन्न-भिन्न दिशाओंमें चले जाते हैं। उस आश्रयके विषयमें उन लोगोंको कौन-सा दुःख होता है? इसी दृष्टान्तको ध्यानमें रखकर मनुष्योंको वियोगजन्य दुःखमें खिन्न नहीं होना चाहिये। एक साथ सामूहिक रूपमें चलनेवालोंमें यदि कोई एक त्वरित गतिसे चल रहा है तो उससे ईर्ष्या क्यों की जाय?
हे शौनक! सभी प्राणियों या पदार्थोंकी उत्पत्तिके पूर्वमें स्थिति नहीं थी और निधनके अन्तमें भी उनकी स्थिति नहीं रहेगी। सभी पदार्थ मध्यमें ही विद्यमान रहते हैं। इसमें दुःख करनेकी क्या बात है—
अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि शौनक।
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना॥
(११३।४८)
समय प्राप्त न होनेसे पहले प्राणी सैकड़ों बाण लगनेपर भी नहीं मरता और समयके आ जानेपर कुशकी नोंक लग जानेसे भी वह जीवित नहीं रहता¹। प्राप्त होने योग्य वस्तु ही प्राप्त होती है, गन्तव्य स्थानपर ही व्यक्ति जाता है। अतः प्राणीको जो दुःख-सुख प्राप्त होने योग्य है वही उसको प्राप्त होता है।
मनुष्य प्राप्त होने योग्य अमुक-अमुक वस्तुको ही प्राप्त करता है तो वह अभिलषित वस्तुके लिये नाना प्रकारसे प्रयास करके क्या प्राप्त कर लेगा? उसका तो अपनेको अभावग्रस्त समझकर प्रलाप करना व्यर्थ ही है।
जिस प्रकार प्रार्थना आदिके बिना ही यथासमय वृक्षके द्वारा प्राणीको अपने समयपर ही फल-फूलकी प्राप्ति हो जाती है, उसी प्रकार पूर्वजन्मकृत कर्म भी अपने समयके अनुसार यथोचित फल देता है। व्यक्तिमें अवस्थित शील, कुल, विद्या, ज्ञान, गुण तथा कुल-शुद्धि उसको कुछ देनेमें समर्थ नहीं हैं। पूर्वजन्मकृत तपसे प्राप्त हुआ उसका भाग्य ही समयके अनुसार वृक्षकी भाँति उसे फल देता है²।
प्राणीकी मृत्यु वहाँ होती है, जहाँ उसका हन्ता विद्यमान रहता है। लक्ष्मी वहीं निवास करती है, जहाँ सम्पत्तियाँ रहती हैं। ऐसे ही अपने कर्मसे प्रेरित होकर प्राणी स्वयं ही उन-उन स्थानोंपर पहुँच जाता है। पूर्वजन्ममें किया गया कर्म कर्ताके पीछे-पीछे वैसे ही रहता है, जैसे गोष्ठमें हजार गायोंके रहनेपर भी बछड़ा अपनी माताको प्राप्त कर लेता है—
तत्र मृत्युर्यत्र हन्ता तत्र श्रीर्यत्र सम्पदः।
तत्र तत्र स्वयं याति प्रेर्यमाणः स्वकर्मभिः॥
भूतपूर्वं कृतं कर्म कर्तारमनुतिष्ठति।
यथा धेनुसहस्रेषु वत्सो विन्दति मातरम्॥
(११३।५३-५४)
हे मूर्ख प्राणी! इस प्रकार जब पूर्वजन्मकृत कर्म कर्तामें ही अवस्थित रहता है तो अपने
१-नाप्राप्तकालो म्रियते विद्धः शरशतैरपि। कुशाग्रेण तु संस्पृष्टः प्राप्तकालो न जीवति॥
२-आचोद्यमानानि यथा पुष्पाणि च फलानि च। स्वकालं नातिवर्तन्ते तथा कर्म पुराकृतम्॥ (११३।४९)
शीलं कुलं नैव च चैव विद्या ज्ञानं गुणा नैव न बीजशुद्धिः।
भाग्यानि पूर्वं तपसार्जितानि काले फलन्त्यस्य यथैव वृक्षाः॥ (११३।५१-५२)
| २०६ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
|---|
पुण्यका फल भोगो। तुम क्यों संतप्त हो रहे हो ? जैसा पूर्वजन्ममें शुभ अथवा अशुभ कर्म किया गया है, वैसा ही फल जन्मान्तरमें कर्ताका अनुसरण करता है, उसके पीछे-पीछे चलता है।
नीच व्यक्ति दूसरेमें सरसोंके बराबर भी स्थित दोष-छिद्रोंको देखता है, किंतु अपनेमें बेल (फल)-के समान अवस्थित दोषोंको देखते हुए भी नहीं देखता<sup>१</sup>। हे द्विज! राग-द्वेषादिक दोषोंसे युक्त प्राणियोंको कहींपर भी सुख नहीं है। मैं भली प्रकारसे विचार करके यह देखता हूँ कि जहाँ संतोष है, वहाँ सुख है। जहाँ स्नेह है, वहीं भय है। अतः स्नेह ही दुःखका कारण है। प्राणियोंमें स्नेह उत्पन्न करनेके जो मूल हैं, वे ही दुःखके कारण हैं। अतः उनका परित्याग कर देनेपर अर्थात् उनके प्रति अपनी आसक्तिको समाप्त कर देनेसे प्राणीको महान् सुखकी प्राप्ति होती है<sup>२</sup>। यह शरीर ही दुःख और सुखका घर है। उत्पन्न हुए शरीरके साथ ही वह दुःख-सुख भी उत्पन्न होता है।
पराधीनता ही दुःख है और स्वाधीनता ही सुख है। संक्षेपमें यही सुख-दुःखका लक्षण समझना चाहिये। प्राणीको सुखभोगके पश्चात् दुःख और दुःखके बाद सुखका भोग प्राप्त होता है। इस तरह मनुष्योंके सुख-दुःख चक्रके समान परिवर्तित होते रहते हैं। जो मनुष्य भूतकालिक विषयवस्तुको समाप्त हुआ मान लेता है और भविष्यमें होनेवालेको बहुत दूर समझता है एवं वर्तमानमें अनासक्त-भावसे रहता है, वह किसी भी प्रकारके शोकसे दुःखी नहीं होता<sup>३</sup>।
(अध्याय ११३)
नीतिसार
श्रीसूतजीने पुनः कहा— न कोई किसीका मित्र है और न कोई किसीका शत्रु। कारणविशेषसे ही लोग एक-दूसरेके मित्र और शत्रु होते हैं। यह दो अक्षरोंवाला रत्नरूपी 'मित्र' शब्द किसने बनाया? यह दुःख एवं भयसे प्राणियोंका अभिरक्षक है तथा प्राणिमात्रमें प्रेम और विश्वासको उत्पन्न करनेवाला है।
जिस व्यक्तिने एक बार भी 'हरि' इस दो अक्षरसे युक्त शब्दका उच्चारण कर लिया है, वह अपने कटिप्रदेशमें परिकर (फेंटा) बाँधकर मुक्ति प्राप्त करनेके लिये तैयार रहता है। अर्थात् ऐसा मनुष्य मोक्षका अधिकारी हो जाता है—
सकृदुच्चरितं येन हरिरित्यक्षरद्वयम्।
बद्धः परिकरस्तेन मोक्षाय गमनं प्रति॥
(११९।३)
माता, पत्नी, सहोदर बन्धु तथा पुत्रमें पुरुषोंको वैसा विश्वास नहीं होता है, जैसा विश्वास उन्हें स्वाभाविक मित्रमें होता है। यदि मनुष्य किसीके साथ शाश्वत प्रेम करना चाहता है तो उसे उसके साथ द्यूत, अर्थ-व्यवहार (धनका लेन-देन) एवं परोक्षरूपमें उसकी स्त्रीका दर्शन—इन तीन दोषोंका परित्याग कर देना चाहिये। माता, भगिनी अथवा पुत्रीके साथ एकान्तमें एक साथ नहीं बैठना
१-नीचः सर्षपमात्राणि परच्छिद्राणि पश्यति । आत्मनो बिल्वमात्राणि पश्यन्नपि न पश्यति ॥ (११३।५७)
२-रागद्वेषादियुक्तानां न सुखं कुत्रचिद् द्विज । विचार्य खलु पश्यामि तत्सुखं यत्र निर्वृतिः ॥
यत्र स्नेहो भयं तत्र स्नेहो दुःखस्य भाजनम् । स्नेहमूलानि दुःखानि तस्मिंस्त्यक्ते महत्सुखम् ॥ (११३।५८-५९)
३-सर्वं परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम् । एतद्विद्यात् समासेन लक्षणं सुखदुःखयोः ॥
सुखस्यानन्तरं दुःखं दुःखस्यानन्तरं सुखम् । सुखं दुःखं मनुष्याणां चक्रवत् परिवर्तते ॥
यदगतं तदतिक्रान्तं यदि स्यात् तच्च दूरतः । वर्तमानेन वर्तेत न स शोकेन बाध्यते ॥ (११३।६१–६३)
काण्ड ] नीतिसार २०७
चाहिये, क्योंकि इन्द्रियोंका समूह बलवान् होता है, वह विद्वान्को भी [दुराचरणकी ओर] खींच लेता है—
मात्रा स्वस्त्रा दुहित्रा वा न विविक्तासनो वसेत्।
बलवानिन्द्रियग्रामो विद्वांसमपि कर्षति॥ (११४।६)
हे शौनक ! उपयुक्त अवसर न होनेसे, एकान्त स्थान न होनेसे तथा प्रार्थयिता व्यक्तिके सुलभ न होनेसे ही स्त्रियोंमें सतीत्व पाया जाता है।
जो मधुर पदार्थोंसे बालकको, विनम्रभावसे सज्जन पुरुषको, धनसे स्त्रीको, तपस्यासे देवताको और सद्व्यवहारसे समस्त लोकको अपने वशमें कर लेता है, वही पण्डित है। जो लोग कपटसे मित्र बनाना चाहते हैं, पापसे धर्म कमाना चाहते हैं, दूसरेको संतप्त करके धन-संग्रह करना चाहते हैं, बिना परिश्रमके ही सुखपूर्वक विद्या-अर्जन करना चाहते हैं और कठोर व्यवहारके द्वारा स्त्रियोंको वशमें रखनेकी अभिलाषा रखते हैं, वे पण्डित (कुशल) नहीं हैं।
फलकी इच्छा रखनेवाला मनुष्य यदि फल-समन्वित वृक्षका ही मूलोच्छेद कर डालता है तो वह दुर्बुद्धि है। उसे फल कभी नहीं प्राप्त हो सकता। अविश्वसनीय व्यक्तिका कभी विश्वास नहीं करना चाहिये। मित्रका भी [अधिक] विश्वास नहीं करना चाहिये; क्योंकि कदाचित् क्रुद्ध होनेपर मित्र भी समस्त गोपनीयताको प्रकट कर सकता है—
न विश्वसेदविश्वस्ते मित्रस्यापि न विश्वसेत्।
कदाचित् कुपितं मित्रं सर्वं गुह्यं प्रकाशयेत्॥ (११४।२२)
सभी प्राणियोंमें विश्वास करना, सभी प्राणियोंके प्रति सात्त्विक भाव रखना एवं अपने सत्-स्वभावकी रक्षा करना—ये सज्जन पुरुषके लक्षण हैं।
दरिद्रके लिये गोष्ठी* विषके समान है और वृद्ध व्यक्तिके लिये युवती विषके समान है। भलीभाँति आत्मसात् न की गयी विद्या विष है तथा अजीर्ण-दशामें किया गया भोजन विषके समान (अनिष्टकारी) है। अकुण्ठित व्यक्तिको गायन, नीच व्यक्तिको उच्च आसनकी प्राप्ति, दरिद्रको दान तथा युवकको तरुणी प्रिय होती है।
अधिक मात्रामें जलका पीना, गरिष्ठ भोजन, धातुकी क्षीणता, मल-मूत्रका वेग रोकना, दिनमें सोना एवं रात्रिमें जागरण करना—इन छः कारणोंसे मनुष्योंके शरीरमें रोग निवास करने लगते हैं—
अत्यम्बुपानं कठिनाशनं च
धातुक्षयो वेगविधारणं च।
दिवाशयो जागरणं च रात्रौ
षड्भिर्नराणां निवसन्ति रोगाः॥ (११४।२८)
प्रातःकालीन धूप, अतिशय मैथुन, श्मशान-धूमका सेवन, अग्निमें हाथ सेंकना और रजस्वला स्त्रीका मुख-दर्शन—ये दीर्घ आयुका विनाश करनेवाले हैं। शुष्क मांस, वृद्धा स्त्री, बालसूर्य, रात्रिमें दहीका प्रयोग, प्रभातकालमें मैथुन एवं [प्रभातकालीन] निद्रा—ये छः सद्यः प्राणविनाशक होते हैं।
तत्काल पकाया गया घृत (ताजा घी), द्राक्षाफल, बाला स्त्री, दुग्ध-सेवन, गरम जल तथा वृक्षोंकी छाया—ये शीघ्र ही प्राण (शक्ति) प्रदान करनेवाले हैं। कुएँका जल और वटवृक्षकी छाया शीतकालमें गरम तथा गर्मीमें शीतल होते हैं। तैलमर्दन और सुन्दर भोजनकी प्राप्ति—ये सद्यः शरीरमें शक्तिका संचार करते हैं, किंतु
* मित्रोंको आमन्त्रित कर उनके साथ भोजन-जलपानादिकी व्यवस्था वहन कर मनोरंजन करना आदि।
९७- तिथि आदि व्रतोंका वर्णन
| २०८ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
|---|
मार्ग-गमन और मैथुन तथा ज्वर—ये सद्यः पुरुषका बल हर लेते हैं।
जो मलिन वस्त्र धारण करता है, दाँतोंको स्वच्छ नहीं रखता, अधिक भोजन करनेवाला है, कठोर वचन बोलता है, सूर्योदय तथा सूर्यास्तके समय भी सोता है; वह यदि साक्षात् चक्रपाणि विष्णु हो तो उसे भी लक्ष्मी छोड़ देती हैं।<sup>१</sup>
जो मनुष्य नखसे तृणका छेदन करता है, पृथिवीपर लिखता है, चरणोंका प्रक्षालन नहीं करता, दाँत स्वच्छ नहीं रखता, मलिन वस्त्र धारण करता है, केश संस्कारविहीन रखता है, प्रातः एवं सायंकालकी संध्याओंमें सोता है, नग्न शयन करता है, भोजन और परिहास अधिक करता है, अपने अङ्ग और आसनपर बाजा बजाता है तो भगवान् विष्णुके समान होनेपर भी उसे लक्ष्मी त्याग देती हैं। जो पुरुष अपने सिरको जलसे धोकर स्वच्छ रखता है, चरणोंको प्रक्षालित करके मलरहित करता है, वेश्यागमनसे दूर रहता है, अल्पभोजन करता है, नग्न शयन नहीं करता तथा पर्वरहित दिवसोंमें स्त्री-सहवास करता है तो उसके ये षट्कर्म चिरकालसे विनष्ट हुई उसकी लक्ष्मीको पुनः उसके सांनिध्यमें ले आते हैं।
बालसूर्यके तेज, जलती हुई चिताका धुआँ, वृद्ध स्त्री, बासी दही और झाड़ूकी धूलिका सेवन दीर्घ आयुकी कामना करनेवाले पुरुषको नहीं करना चाहिये।
हाथी, अश्व, रथ, धान्य तथा गौकी धूलि शुभ होती है। किंतु गधा, ऊँट, बकरी एवं भेड़की धूलिको अशुभ मानना चाहिये। गौकी धूलि, धान्यकी धूलि और पुत्रके अङ्गमें लगी हुई जो धूलि है, वह महान् कल्याणकारी एवं महापातकोंका विनाशक है।<sup>२</sup>
सूप फटकनेसे निकली हुई वायु, नखाग्र (नाखून)-का जल, स्नान किये हुए वस्त्रसे निचोड़ा हुआ जल, केशसे गिरता हुआ जल तथा झाडूकी धूलि मनुष्यके पूर्वजन्मके अर्जित पुण्यको भी नष्ट कर देती है। ब्राह्मण तथा अग्निके बीचसे, दो ब्राह्मणके बीचसे, पति-पत्नीके बीचसे, स्वामि-स्वामिनीके बीचसे तथा घोड़ा और साँड़के बीचसे नहीं जाना चाहिये।
स्त्री, राजा, अग्नि, सर्प, स्वाध्याय, शत्रुंकी सेवा, भोग और आस्वादमें कौन ऐसा बुद्धिमान् होगा जो विश्वास करेगा?<sup>३</sup> अविश्वसनीयपर विश्वास तथा विश्वस्त प्राणीपर अधिक विश्वास नहीं करना चाहिये, क्योंकि विश्वास करनेसे जो भय उत्पन्न होता है, वह मनुष्यको समूल नष्ट कर देता है। जो मनुष्य शत्रुके साथ संधि करके आश्वस्त रहता है, वह निश्चित ही वृक्षकी शाखाके अग्रभागपर सोये हुए मनुष्यके समान गिरनेके पश्चात् ही जागता है।<sup>४</sup>
प्राणीको अत्यन्त सरल अथवा अत्यन्त कठोर नहीं होना चाहिये, क्योंकि सरल स्वभावसे सरल और कठोर स्वभावसे कठोर शत्रुको नष्ट किया जा सकता है। अत्यन्त सरल तथा अत्यन्त कोमल नहीं होना चाहिये। सरल अर्थात् सीधे वृक्ष ही काटे जाते हैं, टेढ़े तो यथास्थितिमें खड़े रहते हैं। फलसे परिपूर्ण वृक्ष एवं गुणवान् व्यक्ति विनम्र
१-कुचैलिनं दन्तमलोपधारिणं बह्वाशिनं निष्ठुरवाक्यभाषिणम्।
सूर्योदये ह्यस्तमयेऽपि शायिनं विमुञ्चति श्रीरपि चक्रपाणिम्॥ (११४।३५)
२-गवां रजो धान्यरजः पुत्रस्याङ्गोद्भवं रजः। एतद्रजो महाशस्तं महापातकनाशनम्॥ (११४।४२)
३-स्त्रीषु राजाग्निसर्पेषु स्वाध्याये शत्रुसेवने। भोगास्वादेषु विश्वासं कः प्राज्ञः कर्तुमर्हति॥ (११४।४६)
४-न विश्वसेदविश्वस्तं विश्वस्तं नातिविश्वसेत्। विश्वासाद्भयमुत्पन्नं मूलादपि निकृन्तति॥
वैरिणा सह संधाय विश्वस्तो यदि तिष्ठति। स वृक्षाग्रे प्रसुप्तो हि पतितः प्रतिबुध्यते॥ (११४।४७-४८)
९८- अनंगत्रयोदशीव्रत
काण्ड ]
नीतिसार
२०९
हो जाते हैं, किंतु सूखे हुए वृक्ष और मूर्ख मनुष्य टूट सकते हैं पर झुक नहीं सकते; अर्थात् वे विनयावनत नहीं हो सकते।<sup>१</sup>
जिस प्रकार बिना याचना किये ही दुःख जीवनमें आते हैं और स्वतः चले भी जाते हैं [उसी प्रकार सुखकी भी यही स्थिति है], कामना करनेवाला मनुष्य तो मार्जार (बिल्ली)-की तरह दुःखोंको ही प्राप्त करता है। सज्जन पुरुषके आगे-पीछे सम्पदाएँ सर्वदा घूमती रहती हैं, दुर्जनके लिये इससे विपरीत स्थिति होती है। अतः जैसा अच्छा लगे वैसा करें। सज्जनता और दुर्जनताका आचरण करना मनुष्यपर निर्भर है।
छः कानोंतक पहुँची हुई गुप्त मन्त्रणा नष्ट हो जाती है। अतः मन्त्रणाको चार कानोंतक ही सीमित रखना चाहिये। दो कानोंतक स्थित मन्त्रणाको तो ब्रह्मा भी जाननेमें समर्थ नहीं हैं।<sup>२</sup>
उस गायसे क्या लाभ है, जो न दूध देनेवाली है और न गर्भिणी है? उस पुत्रके उत्पन्न होनेसे भी क्या लाभ है, जो न तो विद्वान् है और न धार्मिक? विद्यासम्पन्न एवं बुद्धिमान् तथा पुरुषोंमें श्रेष्ठ एकमात्र सुपुत्रसे भी मनुष्यका कुल वैसे ही सुशोभित हो जाता है, जैसे एक ही चन्द्रमासे आकाश-मण्डल चमकने लगता है। जिस प्रकार एक ही सुपुष्पित और सुगन्धित वृक्षसे सम्पूर्ण वन सुवासित हो जाता है, उसी प्रकार एक ही सुपुत्रसे सम्पूर्ण कुल पवित्र हो जाता है। मनुष्यके लिये गुणवान् एक ही पुत्र अच्छा है, गुणहीन सौ पुत्रोंसे क्या लाभ? चन्द्रमा अकेले ही अन्धकारको नष्ट कर देता है, किंतु हजारों ज्योतिष्पुञ्ज उस अन्धकारको दूर करनेमें असफल रहते हैं।<sup>३</sup>
मनुष्यको पाँच वर्षतक पुत्रका प्यारसे पालन करना चाहिये, दस वर्षतक उसे अनुशासित रखना चाहिये तथा सोलह वर्षकी अवस्था प्राप्त होनेपर उसके साथ मित्रवत् व्यवहार करना चाहिये।<sup>४</sup>
कुछ व्याघ्र हरिणके समान मुखवाले होते हैं, कुछ हरिण व्याघ्रमुखवाले होते हैं। उनके वास्तविक स्वरूपके परिज्ञानमें पद-पदपर अविश्वास बना ही रहता है। इसलिये बाह्य आकृतिसे प्राणीकी अन्तःप्रवृत्तिको नहीं जानना चाहिये।<sup>५</sup>
क्षमाशील व्यक्तियोंमें एक ही दोष है, दूसरा दोष नहीं है। दोष यह है कि जो क्षमाशील होते हैं, मनुष्य उनको अशक्त (असमर्थ) मानता है—
एकः क्षमावतां दोषो द्वितीयो नोपपद्यते।
यदेनं क्षमया युक्तमशक्तं मन्यते जनः॥
(११४।६२)
प्राणीको यह शास्त्रमत स्वीकार कर लेना चाहिये कि संसारके समस्त भोग क्षणभंगुर ही हैं, इसीलिये अपनी ओर आकृष्ट करनेवाले स्निग्ध-सुन्दर सुखोपभोगोंके प्रति विद्वान् पुरुषके विचार स्थिर एवं तटस्थ रहते हैं। उनके मनमें उन विषय-वासनाओंके लिये आकर्षण नहीं होता।
हे शौनक! बड़ा भाई पिताके समान है। पिताकी मृत्युके पश्चात् वह सभी छोटे भाइयोंका
१-नात्यन्तं मृदुना भाव्यं नात्यन्तं क्रूरकर्मणा। मृदुनैव मृदुं हन्ति दारुणेनैव दारुणम्॥
नात्यन्तं सरलैर्भाव्यं नात्यन्तं मृदुना तथा। सरलास्तत्र छिद्यन्ते कुब्जास्तिष्ठन्ति पादपाः॥
नमन्ति फलिनो वृक्षा नमन्ति गुणिनो जनाः। शुष्कवृक्षाश्च मूर्खाश्च भिद्यन्ते न नमन्ति च॥ (११४।४९–५१)
२-षट्कर्णो भिद्यते मन्त्रश्चतुःकर्णश्च धार्यते। द्विकर्णस्य तु मन्त्रस्य ब्रह्माप्यन्तं न बुध्यते॥ (११४।५४)
३-एकेनापि सुपुत्रेण विद्यायुक्तेन धीमता। कुलं पुरुषसिंहेन चन्द्रेण गगनं यथा॥
एकेनापि सुवृक्षेण पुष्पितेन सुगन्धिना। वनं सुवासितं सर्वं सुपुत्रेण कुलं यथा॥
एको हि गुणवान् पुत्रो निर्गुणेन शतेन किम्। चन्द्रो हन्ति तमांस्येको न च ज्योतिः सहस्रकम्॥ (११४।५६–५८)
४-लालयेत् पञ्च वर्षाणि दश वर्षाणि ताडयेत्। प्राप्ते तु षोडशे वर्षे पुत्रं मित्रवदाचरेत्॥ (११४।५९)
५-केचिन्मृगमुखा व्याघ्राः केचिद्व्याघ्रमुखा मृगाः। तत्स्वरूपपरिज्ञाने ह्यविश्वासः पदे पदे॥ (११४।६१)
९९-अखण्डद्वादशीव्रत
| २१० | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
|---|
पिता ही है; क्योंकि वह सभीका पालन-पोषण करता है। वह समस्त छोटोंके प्रति एक-समान भाव रखता है। वह समान उपभोग करनेवाले परिजनोंके विषयमें वैसा ही व्यवहार करता है, जैसा अपने पुत्रोंके प्रति उसका व्यवहार होता है। अतः छोटे भाइयोंको बड़े भाईके प्रति पिताके समान आदर-भाव रखना चाहिये।<sup>१</sup>
कम शक्तिशाली वस्तुओंका समुदाय (संगठन) भी अत्यधिक शक्तिसम्पन्न हो जाता है, जैसे तृणको बटकर बनायी गयी रस्सीसे हाथी भी बाँध लिया जाता है।
जो दूसरेका धन चुराकर दान देता है, वह नरकमें जाता है। जिसका धन है उसीको उस दानका फल प्राप्त होता है। देव-द्रव्य (देवताओंके पूजन आदिमें समर्पित किये जाने योग्य द्रव्यों)-के विनाश करनेसे, ब्राह्मणके धनका अपहरण करनेसे एवं ब्राह्मणका तिरस्कार करनेसे मनुष्योंके वंश नष्ट हो जाते हैं। ब्रह्महन्ता, मद्यपी, चोर तथा व्रतभंग करनेवाले पापियोंके पापका शमन<sup>२</sup> हो सकता है, किंतु सज्जनोंके द्वारा किये गये उपकारके प्रति कृतघ्नता करनेवाले कृतघ्न व्यक्तिका निस्तार सम्भव नहीं है।
मनुष्यको भूलकर भी दुष्ट एवं छोटे शत्रुके भी उपेक्षा नहीं करनी चाहिये; क्योंकि भली प्रकारसे न बुझायी गयी अग्नि भी संसारको भस्म कर सकती है।
जो नयी अवस्थामें अर्थात् युवावस्थामें शान्त रहता है, वही शान्त-स्वभाव है, ऐसा मेरा विचार है; क्योंकि धातुक्षय आदि सब प्रकारकी शक्तियोंके समाप्त हो जानेपर किसमें शान्ति नहीं आ जाती? अर्थात् उस अवस्थामें तो सभी शान्त हो जाते हैं—
नवे वयसि यः शान्तः स शान्त इति मे मतिः।
धातुषु क्षीयमाणेषु शमः कस्य न जायते॥
(११४।७३)
हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! सार्वजनिक मार्गके समान सभी सम्पदाएँ सर्वमान्य हैं। अतएव 'यह सम्पदा मेरी है', ऐसा मानकर मनुष्यको प्रसन्न नहीं होना चाहिये।
(अध्याय ११४)
नीतिसार
सूतजीने कहा—मनुष्यको गुणहीन पत्नी, दुष्ट मित्र, दुराचारी राजा, कुपुत्र, गुणहीन कन्या और कुत्सित देशका परित्याग दूरसे ही कर देना चाहिये।
कलियुगमें धर्म समाजसे निकल जाता है, तपमें स्थिरता नहीं रहती, सत्य प्राणियोंके हृदयसे दूर हो जाता है, पृथिवी वन्ध्या होकर फलहीन हो जाती है, मनुष्य कपट-व्यवहार करने लगते हैं, ब्राह्मणोंमें लालच आ जाता है, पुरुषजन स्त्रीके वशीभूत हो जाते हैं, स्त्रियाँ चंचल हो उठती हैं और नीच प्रवृत्तिके लोग ऊँचे पदोंपर आरूढ़ हो जाते हैं। अतः इस कलिकालमें जीवित रहना निश्चित ही बहुत कष्टसाध्य है। जो प्राणी मर गये हैं, वे ही धन्य हैं। वे लोग धन्य हैं जो राज्यानुशासनसे टूट रहे देश, विनष्ट होते हुए कुल, परासक्त पत्नी तथा दुराचरणमें आसक्त पुत्रको नहीं देखते हैं।
कुपुत्रके होनेपर मनुष्यको सुख-शान्ति नहीं मिलती है। दुराचारिणी पत्नीमें प्रेम कहाँ है? दुर्जन मित्र विश्वासके योग्य नहीं होता है और राज्यके
१-ज्येष्ठः पितृसमो भ्राता मृते पितरि शौनक। सर्वेषां स पिता हि स्यात् सर्वेषामनुपालकः॥
कनिष्ठेषु च सर्वेषु समत्वेनानुवर्तते। समोपभोगजीवेषु यथैवं तनयेषु च॥ (११४।६४-६५)
२-इन पापोंके शमनके लिये शास्त्रोंमें प्रायश्चित्तका विधान है, परंतु कृतघ्नके लिये कोई प्रायश्चित्त नहीं है।
१०१- रम्भातृतीयाव्रत
काण्ड ] \hfill नीतिसार \hfill २११
कुशासनमें जीवित रहना सम्भव नहीं है। दूसरेका अन्न, दूसरेका धन, दूसरेकी शय्या, दूसरेकी स्त्रीका सेवन और दूसरेके घरमें निवास करना—ये सब कृत्य इन्द्रके भी ऐश्वर्यको समाप्त कर देते हैं।<sup>१</sup>
पापी पुरुषसे वार्तालाप करनेसे, उसके शरीरको स्पर्श करनेसे, संसर्गसे, सहभोजनसे, एक आसनपर बैठनेसे, एक शय्यापर शयन करनेसे एवं एक यानसे गमन करनेपर पापीका पाप दूसरे पुरुषमें संक्रमण कर जाता है। स्त्रियाँ रूपसे नष्ट हो जाती हैं। क्रोधसे तपस्या विनष्ट हो जाती है। दूरतक भ्रमण करनेसे गायें नष्ट हो जाती हैं और शूद्रान्नसे श्रेष्ठ ब्राह्मण नष्ट हो जाता है।<sup>२</sup>
पापीके साथ एक आसनपर बैठनेसे, एक शय्यापर शयन करनेसे, पंक्तिमें एक साथ भोजन करनेसे मनुष्यमें पापका संक्रमण वैसे ही होता है जैसे एक घड़ेका जल दूसरे घड़ेमें प्रविष्ट हो जाता है।
दुलारमें बहुत-से दोष हैं और ताड़नामें बहुत-से गुण हैं। अतः शिष्य एवं पुत्रको अनुशासित रखना चाहिये, उन्हें केवल दुलार देना उचित नहीं है।
अधिक पैदल चलना प्राणियोंके लिये बुढ़ापा है। पर्वतोंका जल उसकी वृद्धावस्था है। सम्भोगकी अप्राप्ति स्त्रियोंके लिये वृद्धावस्था है और सदैव धूपमें रहना वस्त्रोंकी जीर्णता है।
नीच व्यक्ति दूसरेसे कलहकी इच्छा करते हैं। मध्यममार्गी दूसरेसे संधि चाहते हैं तथा उत्तम प्रकृतिके व्यक्ति दूसरेसे सम्मानकी अभिलाषा रखते हैं; क्योंकि महापुरुषोंका धन मान ही है। मान ही अर्थका मूल है। यदि सम्मान है तो धनकी क्या आवश्यकता है? मान और दर्पके नष्ट हो जानेपर धनसे और जीवनसे मनुष्यको क्या लाभ? मान तथा स्वाभिमानके विनष्ट हो जानेके पश्चात् प्राणीको धन एवं आयुसे क्या लेना-देना रह जाता है?
नीच प्रकृतिवाले पुरुष धन चाहते हैं। मध्यम प्रकृतिवाले धन और मानकी अभिरुचि रखते हैं तथा उत्तम प्रकृतिवाले मात्र सम्मानकी इच्छा करते हैं; क्योंकि श्रेष्ठजनोंका मान ही धन है—
अधमा धनमिच्छन्ति धनमानौ हि मध्यमाः।
उत्तमा मानमिच्छन्ति मानो हि महतां धनम्॥
(११५।१३)
वनमें भूखे सिंह किसी दूसरेके द्वारा प्राप्त किये गये मांसको देखनेके लिये भी नहीं झुकते हैं। उत्तम कुलमें उत्पन्न व्यक्ति धनहीन होनेपर भी नीच कर्म नहीं करते। वनमें सिंहका अभिषेक नहीं होता है और न तो उसका कोई संस्कार ही होता है, किंतु नित्य सम्यक् पुरुषार्थको करनेसे प्राणीमें स्वयं ही सिंहत्वका भाव आ जाता है—
नाभिषेको न संस्कारः सिंहस्य क्रियते वने।
नित्यमूर्जितसत्त्वस्य स्वयमेव मृगेन्द्रता॥
(११५।१५)
प्रमादी वणिक्, अभिमानी भृत्य, विलासी भिक्षु, निर्धन कामी तथा कटुभाषिणी वेश्या अपने कार्यमें असफल रहते हैं। दरिद्र होकर दाता होना, धनवान् होनेपर कृपण रहना, पुत्रका आज्ञाकारी न होना और दुष्टजनोंकी सेवामें संलग्न होना तथा दूसरेका अहित करते हुए मृत्युको प्राप्त हो जाना—ये पाँच कर्म मानवके दुश्चरित हैं। पत्नी-वियोग, स्वजनोंके द्वारा अपमान, शेष ऋण, दुर्जनसेवा तथा दरिद्रताके कारण मित्रोंकी विमुखता—ये पाँच बातें मनुष्यको बिना अग्निके ही जलाती हैं।<sup>३</sup>
१-परान्नं च परस्वं च परशय्याः परस्त्रियः। परवेश्मनि वासश्च शक्रादपि हरेच्छ्रियम्॥ (११५।५)
२-स्त्रियो नश्यन्ति रूपेण तपः क्रोधेन नश्यति। गावो दूरप्रचारेण शूद्रान्नेन द्विजोत्तमः॥ (११५।७)
३-दाता दरिद्रः कृपणोऽर्थयुक्तः पुत्रोऽविधेयः कुजनस्य सेवा। परोपकारेषु नरस्य मृत्युः प्रजायते दुश्चरितानि पञ्च॥
कान्तावियोगः स्वजनापमानं ऋणस्य शेषः कुजनस्य सेवा। दारिद्र्यभावाद्विमुखाश्च मित्रा विनाग्निना पञ्च दहन्ति तीव्राः॥
(११५।१७-१८)
१०२- चातुर्मास्यव्रतका निरूपण
| २१२ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
|---|
मनुष्यको हजारों चिन्ताएँ होती हैं, किंतु उन चिन्ताओंके मध्य चार चिन्ताएँ ऐसी हैं जो तलवारकी धारके समान अत्यन्त तीक्ष्ण हैं, यथा—नीच व्यक्तिसे प्राप्त अपमानकी चिन्ता, भूखसे पीड़ित पत्नीकी चिन्ता, अनुग्रहहीन भार्याकी चिन्ता तथा कार्यमें स्वाभाविक रूपसे उत्पन्न अवरोधकी चिन्ता। ये मनुष्यके मर्मस्थलपर तलवारकी धारके समान कष्ट पहुँचाती हैं।
अनुकूल पुत्र, अर्थकरी विद्या, आरोग्य शरीर, सत्संगति तथा मनोऽनुकूल वशवर्तिनी पत्नी—ये पाँच पुरुषके दुःखको समूल नष्ट करनेमें समर्थ हैं<sup>१</sup>।
मृग, हाथी, कीट, भ्रमर और मत्स्य—ये पाँच क्रमशः शब्द, स्पर्श, रूप, गन्ध और रस—इन पाँचों प्रमादी विषयोंमें एक-एकका सेवन करनेपर ही नष्ट हो जाते हैं, परंतु जो मनुष्य पाँचों विषयोंका पाँचों इन्द्रियोंसे सेवन करता है, तो वह क्यों नहीं मारा जायगा—
कुरङ्गमातङ्गपतङ्गभृङ्ग-
मीना हताः पञ्चभिरेव पञ्च।
एकः प्रमादी स कथं न घात्यो
यः सेवते पञ्चभिरेव पञ्च॥
(११५। २१)
धैर्यरहित, रूक्ष स्वभाववाले, गतिहीन, मलिन वस्त्राच्छादित और अनाहूत (बिना बुलाये सभा-उत्सवादिमें उपस्थित होनेवाले)—ये पाँच प्रकारके ब्राह्मण बृहस्पतिके समान होनेपर भी पूजे नहीं जाते हैं। आयु, कर्म, धन, विद्या और मृत्यु—ये पाँच जन्मसे ही सुनिश्चित रहते हैं—
आयुः कर्म च वित्तं च विद्या निधनमेव च।
पञ्चैतानि विविच्यन्ते जायमानस्य देहिनः॥
(११५। २३)
मेघकी छाया, दुष्टका प्रेम, परनारीका साथ, यौवन और धन—ये पाँच अस्थिर हैं। संसारमें प्राणीका जीवित रहना अस्थिर है, उसका धन और यौवन अस्थिर है तथा उसके स्त्री-पुत्र आदि अस्थिर हैं, किंतु उसका धर्म, कीर्ति और यश चिरस्थायी होता है—
अभ्रच्छाया खले प्रीतिः परनारीषु संगतिः।
पञ्चैते ह्यस्थिरा भावा यौवनानि धनानि च॥
अस्थिरं जीवितं लोके अस्थिरं धनयौवनम्।
अस्थिरं पुत्रदाराद्यं धर्मः कीर्तियशः स्थिरम्॥
(११५। २४-२६)
सौ वर्षका जीवन भी बहुत कम है, क्योंकि परिमित आयुका आधा भाग रात्रियोंमें ही व्यतीत हो जाता है। शेष बचे हुए समयका आधा भाग व्याधि, दुःख तथा वृद्धावस्थामें निष्क्रियताके कारण व्यतीत हो जाता है। मनुष्यकी आयु सौ वर्ष मानी गयी है। आयुका आधा भाग रात्रियोंमें ही समाप्त हो जाता है। उसकी शेष आधी ही आयु बचती है, जिसमेंसे आधेसे कुछ अधिक भाग बाल्यावस्थामें बीत जाता है, कुछ भाग परिजनोंके वियोग, उनकी दुःखदायी मृत्युसे प्राप्त कष्ट तथा राजसेवामें चला जाता है। इसके बाद जो आयुका शेष भाग बचता भी है, वह जलतरंगके समान चंचल होनेके कारण बीचमें ही विनष्ट हो जाता है। अतः लोगोंको मानसे क्या लाभ हो सकता है?
मृत्यु दिन-रात वृद्धावस्थाके रूपमें लोकमें विचरण करती रहती है। वह प्राणियोंको वैसे ही अपना ग्रास बनाती है, जैसे सर्प वायुका ग्रास करता है।
चलते हुए, रुकते हुए, जागते हुए और सोते हुए भी व्यक्ति यदि सभी प्राणियोंके हितके लिये चेष्टा नहीं करता है तो उसकी समस्त चेष्टा पशुवत् ही है<sup>२</sup>। हित और अहितके विचारसे शून्य बुद्धिवाले, वेद-पुराण तथा शास्त्रोंकी चर्चाके समय अत्यधिक तर्क-वितर्क करनेवाले एवं उदरपूर्तिमात्रमें संतुष्ट-
१-वश्यश्च पुत्रोऽर्थकरी च विद्या अरोगिता सज्जनसङ्गतिश्च। इष्टा च भार्या वशवर्तिनी च दुःखस्य मूलोद्धरणानि पञ्च॥ (११५।२०)
२-गच्छतस्तिष्ठतो वापि जाग्रतः स्वपतो न चेत्। सर्वसत्त्वहितार्थाय पशोरिव विचेष्टितम्॥ (११५।३०)
१०३- मासोपवासव्रतका निरूपण
काण्ड ] नीतिसार २१३
बुद्धिवाले पुरुष और पशुके बीच कौन ऐसा वैशिष्ट्य है जिसके अनुसार उन दोनोंमें अन्तर स्पष्ट किया जा सके ?
पराक्रम, तप, दान, विद्या तथा अर्थ-लाभमें जिस मनुष्यकी कीर्ति संसारमें प्रसिद्ध नहीं हुई, वह माताके द्वारा परित्याग किये गये मलके समान ही है। विज्ञान, पराक्रम, यश और अक्षुण्ण सम्मानसे युक्त होकर क्षणमात्र भी जो मनुष्य जीवन धारण करता है, विज्ञ लोग उसीके जीवनको जीवन मानते हैं। वैसे तो कौआ भी बहुत समयतक बलि-भक्षण करते हुए जीवित रहता ही है। धन-मानसे रहित जीवनसे क्या लाभ ? भयसे सशंकित मित्रसे क्या हो सकता है ? [इसलिये] विषादका परित्यागकर सिंहव्रत अर्थात् पराक्रमका आचरण करना चाहिये। अन्यथा कौआ भी तो बलिका भक्षण करते हुए बहुत समयतक जीवित रहता ही है। जो मनुष्य इस संसारमें अपने प्रति तथा गुरु, नौकर-चाकर और दीन-दुःखीके प्रति दयाभाव नहीं रखता है और मित्रके कार्यमें सहयोग नहीं करता है, मनुष्यलोकमें उसके जीवित रहनेसे क्या लाभ ? अरे, कौआ भी बहुत समयतक जीवित रहता है और मनुष्योंके द्वारा दिये गये बलिभागके अन्नको ही जीवनभर खाता है<sup>१</sup>।
धर्म, अर्थ और काम—इस त्रिवर्गकी क्रियासे रहित जिस मनुष्यके दिन आते हैं और चले जाते हैं, ऐसा व्यक्ति लुहारकी धौंकनीके समान ही है, जो कि श्वास लेते हुए भी जीवित नहीं है।
स्वाधीन रहकर आचरण करनेवाले मनुष्यका जीवन सफल है। पराधीन रहकर जीवन व्यतीत करनेवालेका जीवन तो व्यर्थ है। जो परतन्त्र रहकर जीवन-यापन करते हैं, वे तो जीवित रहते हुए भी मरेके समान हैं<sup>२</sup>।
आकाशमें घिरे हुए बादलोंकी छाया, तिनकेसे आग, नीचकी सेवा, मार्गमें दृष्टिगोचर हुआ जल, वेश्याका प्रेम और दुष्टके अन्तःकरणमें उत्पन्न हुई प्रीति—ये छः जलमें उठने और तत्काल विलुप्त होनेवाले बुलबुलेके सदृश ही क्षणभंगुर होते हैं—
अभ्रच्छाया तृणादग्निर्नीचसेवा पथो जलम्।
<p align="right">(११५।३९)</p>
वेश्यारागः खले प्रीतिः षडेते बुद्बुदोपमाः॥
केवल वाणीके द्वारा किये गये हित-सम्पादनसे मनुष्यको सुख नहीं प्राप्त होता। जीवनका मूल तो मान है। मानके नष्ट हो जानेपर मनुष्यके लिये सुख कहाँ होता है ?
निर्बलका बल राजा है, बालकका बल रोना है, मूर्खका बल मौन धारण कर लेना है और चोरका बल असत्य है<sup>३</sup>। मनुष्य जैसे-जैसे शास्त्र-ज्ञान प्राप्त करता जाता है, वैसे-वैसे उसकी बुद्धि बढ़ती रहती है और विज्ञान प्राप्त करनेमें रुचि होती जाती है। मनुष्य जैसे-जैसे जनकल्याणमें अपनी बुद्धिको संयुक्त करता है, वैसे-वैसे ही वह सर्वत्र सभीका प्रिय पात्र बन जाता है—
यथा यथा हि पुरुषः शास्त्रं समधिगच्छति।
<p align="right">(११५।४२-४३)</p>
तथा तथास्य मेधा स्याद्विज्ञानं चास्य रोचते॥
यथा यथा हि पुरुषः कल्याणे कुरुते मतिम्।
तथा तथा हि सर्वत्र श्लिष्यते लोकसुप्रियः॥
लोभ, प्रमाद और विश्वास—इन तीनके कारण व्यक्तिका विनाश होता है। अतएव प्राणीको लोभ,
१-यो वात्मनीह न गुरौ न च भृत्यवर्गे दीने दयां न कुरुते न च मित्रकार्ये।
किं तस्य जीवितफलेन मनुष्यलोके काकोऽपि जीवति चिरं च बलिं च भुङ्क्ते॥ (११५।३५)
२-स्वाधीनवृत्तेः साफल्यं न पराधीनवर्त्तिता। ये पराधीनकर्माणो जीवन्तोऽपि च ते मृताः॥ (११५।३७)
३-अबलस्य बलं राजा बालस्य रुदितं बलम्। बलं मूर्खस्य मौनं हि तस्करस्यानृतं बलम्॥ (११५।४१)
१०५- शिवरात्रिव्रतकथा तथा व्रत-विधान
२९४ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-
प्रमाद और विश्वास नहीं करना चाहिये। मनुष्यको भयसे उसी समयतक भयभीत रहना चाहिये, जिस समयतक उसका आगमन नहीं हो जाता। तीव्र भयके उपस्थित हो जानेपर तो उसे निर्भीक होकर उसका सामना करना चाहिये<sup>१</sup>।
ऋण, अग्नि तथा व्याधिके शेष रहनेपर वे बार-बार बढ़ते जाते हैं। अतः उनका शेष रखना उचित नहीं है—
ऋणशेषं चाग्निशेषं व्याधिशेषं तथैव च।
पुनःपुनः प्रवर्धन्ते तस्माच्छेषं न कारयेत्॥
(११५।४६)
परोक्ष-रूपमें कार्यको नष्ट करनेवाले तथा सामने मधुर बोलनेवाले मित्रका, मायावी शत्रुके भाँति परित्याग कर देना चाहिये—
परोक्षे कार्यहन्तारं प्रत्यक्षे प्रियवादिनम्।
वर्जयेत् तादृशं मित्रं मायामयमरिं तथा॥
(११५।४८)
दुष्टका साथ करनेसे सज्जन मनुष्य भी विनष्ट हो जाता है, क्योंकि सुन्दर-स्वच्छ पेय जल कीचड़के मिल जानेसे दूषित हो जाता है—
दुर्जनस्य हि संगेन सुजनोऽपि विनश्यति।
प्रसन्नमपि पानीयं कर्दमैः कलुषीकृतम्॥
(११५।४९)
जिस व्यक्तिका धन ब्राह्मणके लिये [समर्पित] होता है, वही [धनका] सम्यक् उपभोग करता है। इसलिये सभी प्रकारसे प्रयत्नपूर्वक द्विजकी पूजा करनी चाहिये। जो द्विजके उपभोगसे बचे हुए पदार्थोंका उपभोग करता है, वही उत्तम भोजन है। जो पाप नहीं करता, वही बुद्धिमान् है। जो पीठ-पीछे हित-सम्पादन किया जाता है, वही मित्र-भाव है और जो दिखावेके बिना (दम्भरहित) धर्म किया जाता है, वही वास्तविक धर्माचरण है<sup>२</sup>।
वह सभा सभा नहीं होती, जिसमें वृद्ध जन नहीं होते। वे [वृद्ध] वृद्ध नहीं माने जाते, जो धर्मका उपदेश नहीं देते। वह [धर्म] धर्म नहीं है, जिसमें सत्यका वास नहीं होता। वह [सत्य] सत्य नहीं है, जो कपटसे अनुप्राणित रहता है—
न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धाः
वृद्धा न ते ये न वदन्ति धर्मम्।
धर्मः स नो यत्र न सत्यमस्ति
नैतत् सत्यं यच्छलेनानुविद्धम्॥
(११५।५२)
मनुष्योंमें ब्राह्मण, तेजमें आदित्य, शरीरमें सिर और व्रतोंमें सत्य ही श्रेष्ठतम व्रत है।
जहाँ मनको प्रसन्नताकी प्राप्ति हो, वहीं प्राणीका मङ्गल है। दूसरेकी सेवामें समर्पित जीवन ही यथार्थ जीवन है। जो उपार्जित धन स्वजनोंके द्वारा उपभोग्य है, वही धन सार्थक है। युद्धभूमिमें शत्रुके सामने की गयी गर्जना ही वास्तविक गर्जना है। स्त्री वही श्रेष्ठ है, जो मदोन्मत्त नहीं हो। तृणारहित व्यक्ति ही सुखी होता है। जिसपर विश्वास किया जाय, वही मित्र है और जो जितेन्द्रिय होता है, वही वास्तविक पुरुष है।
राज्यका ऐश्वर्य क्रुद्ध ब्राह्मणके शापसे विनष्ट हो जाता है, ब्राह्मणका तेज पापाचार करनेसे नष्ट हो जाता है, अशिक्षित गाँवमें निवास करनेसे ब्राह्मणका सदाचार समाप्त हो जाता है और दुष्ट स्त्रियोंके साहचर्यसे कुलका विनाश हो जाता है। सभी संग्रहोंका अन्त क्षय है और सभी उत्कर्षोंका अन्त पतन है। संयोगका अन्त वियोग है और जीवनका अन्त मरण है।
मनुष्यको राजासे रहित राज्यमें और बहुत राजाओंवाले राज्यमें निवास नहीं करना चाहिये। इसी प्रकार जहाँ स्त्रीका नेतृत्व हो या बालनेतृत्व
<sup>१</sup>तावद्भयस्य भेतव्यं यावद्भयमनागतम्। उत्पन्ने तु भये तीव्रे स्थातव्यं वै ह्यभीतवत्॥ (११५।४५)
<sup>२</sup>तद्भुज्यते यद्द्विजभुक्तशेषं स बुद्धिमान् यो न करोति पापम्। तत्सौहृदं यत्क्रियते परोक्षे दम्भैर्विना यः क्रियते स धर्मः॥ (११५।५१)
काण्ड ] नीतिसार २१५
हो वहाँ भी निवास करना अच्छा नहीं होता।
कौमार्य-अवस्थामें स्त्रीकी रक्षा पिता करता है, युवावस्थामें उसकी रक्षाका भार पतिपर होता है, वृद्धावस्थामें उसकी रक्षाका भार पुत्र उठाता है। स्त्री स्वतन्त्र रहने योग्य नहीं है।<sup>१</sup>
अर्थके लिये आतुर मनुष्यका न कोई मित्र है और न कोई बन्धु। कामातुर व्यक्तिके लिये न भय है और न लज्जा ही। चिन्तासे ग्रस्त प्राणीके लिये न सुख है और न नींद ही तथा भूखसे पीड़ित मनुष्यके शरीरमें न बल ही रहता है और न तेज ही रह जाता है—
अर्थातुराणां न सुहृन्न बन्धुः
कामातुराणां न भयं न लज्जा।
चिन्तातुराणां न सुखं न निद्रा
क्षुधातुराणां न बलं न तेजः॥
(११५।६७)
दरिद्र तथा दूसरेके द्वारा प्रेषित दूत, पर-नारीमें आसक्त तथा दूसरेके धन-अपहरणमें लगे हुए व्यक्तिको नींद कहाँ आती है?<sup>२</sup> जो मनुष्य ऋणरहित और रोगमुक्त होता है, वही सुखपूर्वक निद्राका उपभोग करता है। इनके अतिरिक्त वह व्यक्ति भी निद्राका सुख प्राप्त करनेमें सफल होता है, जो स्त्रियोंके संसर्गसे दूर रहता है।
जलके परिमाणके अनुसार ही कमलनाल भी ऊपरकी ओर उठता जाता है और अपने स्वामीके बलके अनुसार भृत्य भी गर्वोन्नत हो जाता है। अपने स्थान जलाशयमें स्थित रहनेपर वरुणदेव एवं सूर्यनारायण कमलके साथ मैत्रीपूर्ण व्यवहार करते हैं, किंतु उस स्थानसे च्युत होनेपर उसी कमलके साथ वे जलासक्त और शोषणका व्यवहार करके कष्ट पहुँचाते हैं। पदासीन रहनेपर जो जिसके मित्र होते हैं, वे पदसे विमुक्त होनेपर वैसे ही शत्रु हो जाते हैं जैसे जलमें कमलके विद्यमान रहनेपर सूर्यकी प्रीति उसके साथ रहती है, किंतु उस जलसे उसको तोड़कर स्थलभागमें लानेपर वही सूर्य उसका शोषण करने लगता है।
अपने स्थान या पदपर अवस्थित रहनेपर ही मनुष्यकी पूजा होती है। स्थान और पदसे च्युत होनेपर उसकी उसी प्रकार पूजा नहीं होती, जिस प्रकार शरीरसे पृथक् होनेपर केश, दाँत और नख शोभित नहीं होते—
स्थानस्थितानि पूज्यन्ते पूज्यन्ते च पदे स्थिताः।
स्थानभ्रष्टा न पूज्यन्ते केशा दन्ता नखा नराः॥
(११५।७३)
आचारको देखकर कुलका ज्ञान होता है। भाषाको सुनकर देशका ज्ञान होता है। सम्भ्रमसे स्नेह प्रकट होता है और शरीरको देखकर भोजनका ज्ञान (अनुमान) होता है।<sup>३</sup>
समुद्रमें वर्षा होना व्यर्थ है। तृप्त हुए प्राणीके लिये भोजनका आग्रह व्यर्थ है। समृद्धको दान देना व्यर्थ है तथा नीचके लिये किया गया सुकृत व्यर्थ है। जो प्राणी जिसके हृदयमें अवस्थित है, वह दूरदेशमें रहते हुए भी उसके संनिकट ही विद्यमान रहता है और जो प्राणी हृदयसे ही निकल चुका है, वह समीपमें ही रहते हुए भी दूरदेशमें निवास करनेवालेके समान है।<sup>४</sup>
मुखकी विकृति, स्वरभंग, दैन्यभाव, पसीनेसे लथपथ शरीर तथा अत्यन्त भयके चिह्न प्राणीमें मृत्युके समय उपस्थित होते हैं, किंतु ये ही चिह्न याचकके जीवित शरीरपर भी दिखायी देते रहते हैं।
१-पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने। पुत्रस्तु स्थविरे काले न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति॥ (११५।६३)
२-कुतो निद्रा दरिद्रस्य परप्रेष्यवरस्य च। परनारीप्रसक्तस्य परद्रव्यहरस्य च॥ (११५।६८)
३-आचारः कुलमाख्याति देशमाख्याति भाषितम्। सम्भ्रमः स्नेहमाख्याति वपुराख्याति भोजनम्॥ (११५।७४)
४-दूरस्थोऽपि समीपस्थो यो यस्य हृदये स्थितः। हृदयादपि निष्क्रान्तः समीपस्थोऽपि दूरतः॥ (११५।७६)
१०६- एकादशीमाहात्म्य
| २१६ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
|---|
कुब्ज होना, कृमिदोषसे पीड़ित रहना, वायुविकारसे ग्रस्त होना, देश, राज्य या गृहसे निष्कासित हो जाना तथा पर्वतके शिखर-भागमें रहना अच्छा है, किंतु याचनाकी वृत्तिको स्वीकार करना उचित नहीं है। संसारके स्वामी होनेपर भी भगवान् विष्णु बलिके यहाँ याचना करके वामन (बौने) हो गये थे। उनसे बढ़कर और कौन ऐसा है, जो याचक होकर लघुताको प्राप्त नहीं होगा?<sup>१</sup>
वे माता-पिता उस बालकके शत्रु होते हैं, जिन्होंने उसे विद्याध्ययन नहीं कराया है। सभाके मध्य मूर्ख वैसे ही शोभा प्राप्त करनेमें सफल नहीं होता, जैसे हंस-समुदायके मध्य बगुला सुशोभित नहीं होता।
विद्या कुरूप व्यक्तिके लिये भी रूप है। विद्या अत्यधिक गुप्त धन है। विद्या प्राणीको साधुवृत्तिवाला तथा सभी लोगोंका प्रियपात्र बना देती है। वह गुरुओंकी भी गुरु है। विद्या बन्धु-बान्धवोंके कष्टोंको दूर करनेवाली है। विद्या परम देवता है। विद्या राजाओंके मध्य पूजनीय है। अतः विद्यासे विहीन मनुष्य पशुके समान है—
विद्या नाम कुरूपरूपमधिकं विद्यातिगुप्तं धनं
विद्या साधुकरी जनप्रियकरी विद्या गुरूणां गुरुः।
विद्या बन्धुजनार्तिनाशनकरी विद्या परं दैवतं
विद्या राजसु पूजिता हि मनुजो विद्याविहीनः पशुः॥
(११५।८१)
घर या उसके गुह्य स्थानोंपर सुरक्षित रखा हुआ द्रव्य देखा जा सकता है और वह समस्त धन-वैभव चोरोंके द्वारा चुराया भी जा सकता है। किंतु विद्या एक ऐसा धन है, जो दूसरेके द्वारा किसी भी प्रकार अपहृत नहीं किया जा सकता।<sup>२</sup>
(अध्याय ११५)
तिथि आदि व्रतोंका वर्णन
ब्रह्माजीने कहा— हे व्यास! अब मैं व्रतोंका वर्णन करूँगा, जिनको करनेसे प्राणीको भगवान् हरि सब कुछ प्रदान करते हैं। सभी मास, सभी नक्षत्र, सभी तिथि और सभी दिनोंमें हरिका पूजन होता है। एकभक्त<sup>३</sup>, नक्त<sup>४</sup>, उपवास अथवा फलाहारव्रत करनेसे व्रतीको भगवान् हरि धन, धान्य, पुत्र, राज्य और विजय आदि प्रदान करते हैं।
प्रतिपदा तिथिमें वैश्वानर तथा कुबेर पूज्य हैं, वे साधकको अर्थलाभ कराते हैं। प्रतिपदा तिथिमें तथा अश्विनी नक्षत्रमें उपवास करनेवाले साधकके द्वारा पूजित ब्रह्मा उसे लक्ष्मी प्रदान करते हैं।
द्वितीया तिथिमें यमराज एवं भगवान् लक्ष्मीनारायण उस व्रतीको अर्थलाभ कराते हैं। तृतीया तिथिमें गौरी, विघ्नविनाशक गणेश तथा शिव—ये तीन देव पूज्य हैं। चतुर्थीको चतुर्व्यूह भगवान् विष्णु, पञ्चमीको हरि, षष्ठीको कार्तिकेय और रवि तथा सप्तमीको भगवान् भास्करकी पूजा करनी चाहिये। ये उपासकको अर्थलाभ कराते हैं।
१-जगत्पतिर्हि याचित्वा विष्णुर्वामनतां यतः। कोऽन्योऽधिकतरस्तस्य योऽर्थी याति न लाघवम्॥ (११५।७९)
२-गृहे चाभ्यन्तरे द्रव्यं लग्नं चैव तु दृश्यते। अशेषं हरणीयं च विद्या न ह्रियते परैः॥ (११५।८२)
३-दिनार्धसमयेऽतीते भुज्यते नियमेन यत्। एकभक्तमिति प्रोक्तं रात्रौ तन्न कदाचन॥
दिनका आधा समय बीत जानेपर २४ घंटेमें केवल एक बार दिनमें किया गया भोजन एकभक्त होता है।
४-दिवसस्याष्टमे भागे मन्दीभूते दिवाकरे। नक्तं तच्च विजानीयान्न नक्तं निशिभोजनम्॥
नक्षत्रदर्शनान्नक्तं गृहस्थेन विधीयते। यतेर्दिनाष्टमे भागे रात्रौ तस्य निषेधनम्॥
दिनके आठवें भागमें सूर्यप्रभाके मन्द होनेपर किया गया २४ घंटेमें एक बारका भोजन नक्तव्रत है। गृहस्थके लिये सूर्यास्तके अनन्तर नक्षत्र-दर्शन करके भोजन करना नक्तव्रत है और यति (संन्यासी)-के लिये सूर्यास्तके पूर्व दिनके आठवें भागमें भिक्षा ग्रहण करना नक्तव्रत है।
१०७- विष्णुमण्डल-पूजाविधि
काण्ड ] अनंगत्रयोदशीव्रत २१७
अष्टमी तिथिमें दुर्गा और नवमी तिथिमें मातृका तथा दिशाएँ पूजित होनेपर अर्थ प्रदान करती हैं। दशमी तिथिमें यमराज और चन्द्र तथा एकादशी तिथिमें ऋषिगणोंकी पूजा करनी चाहिये। द्वादशीको हरि और कामदेव तथा त्रयोदशीको भगवान् शिव पूज्य हैं। चतुर्दशी और पूर्णिमा तिथियोंमें ब्रह्मा तथा अमावास्यामें पितृगणोंकी पूजा करनेसे वे धन-सम्पत्ति प्रदान करते हैं।
रवि, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र और शनि—ये सातों वार, अश्विनी आदि सत्ताईस नक्षत्र तथा योगोंकी पूजा करनेसे ये सब कुछ प्रदान करते हैं। (अध्याय ११६)
अनंगत्रयोदशीव्रत
ब्रह्माजीने कहा—हे व्यास! मार्गशीर्षमासके शुक्लपक्षकी त्रयोदशी तिथिमें अनंगत्रयोदशीव्रत होता है। इस तिथिमें मल्लिका-वृक्षकी दतुअन निवेदितकर धत्तूरके पुष्प एवं फलोंसे शिवकी पूजा करनी चाहिये। तदनन्तर 'अनङ्गायैति०' इस मन्त्रसे भगवान् शिवको मधुका नैवेद्य अर्पित करना चाहिये। पौषमासमें भगवान् योगेश्वरका बिल्वपत्र, कदम्बके दतुअन, चन्दन तथा कृसर आदि नैवेद्यसे पूजन करना चाहिये।
हे मुने! माघमासमें भगवान् नटनागर शिवकी कुन्द-पुष्प तथा मौक्तिक मालासे पूजा करके उन्हें पाकड़वृक्षकी दतुअन और पूरिका (पूड़ी)-का नैवेद्य निवेदित करना चाहिये। फाल्गुनमासमें मरुबक (मंडक) नामक पुष्पोंसे भगवान् वीरेश्वरकी पूजा करनी चाहिये तथा उन्हें शर्करा, शाक, माँड़ और आम्र-वृक्षकी दतुअन निवेदित करे।
चैत्रमासमें भगवान् सुरूपकी पूजा करनी चाहिये और रात्रिमें उन्हें कर्पूरका प्राशन देना चाहिये। दन्तधावनके लिये वटवृक्षकी दतुअन तथा नैवेद्यके निमित्त शष्कुली (पूड़ी) प्रदान करे। वैशाखमासमें अशोकवृक्षके पुष्पोंसे भगवान् शिवका दमनक (संहारकारक) स्वरूप पूजनीय होता है। इन महास्वरूपधारी देवको नैवेद्यमें गुड़ और भात, दन्तधावनके लिये गूलर-वृक्षकी दतुअन और प्राशनके लिये जातिफल अर्पित करना चाहिये।
ज्येष्ठमासमें भगवान् प्रद्युम्नका पूजन चम्पक-पुष्पसे करे और बिल्व-वृक्षकी दतुअन एवं लवङ्गांश (लौंग फलके टुकड़े)-के नैवेद्य समर्पित करना चाहिये। आषाढ़मासमें उमाभद्रकी पूजा करनी चाहिये। इसमें अगुरुकी गन्ध, अपामार्गकी दतुअन उन्हें प्रदान की जाती है।
श्रावणमासमें भगवान् शूलपाणि शिवकी पूजा होती है। उन्हें करवीर-पुष्प, गन्ध, घृतादिसे युक्त भोजन तथा करवीर-वृक्षकी दतुअन निवेदित की जाती है। भाद्रपदमासमें सद्योजात शिवका पूजन बकुल-पुष्प और अपूप (पूए)-के नैवेद्यसे करना चाहिये। आश्विनमासमें चम्पक-पुष्प, स्वर्णकलशके जल और सुवासित मोदकके नैवेद्यसे तथा दमनककी दतुअनसे सुराधिप शिवके पूजनका विधान है। कार्तिकमासमें खदिर (कत्थे)-की दतुअनसे तथा बेरकी दतुअन, मदन-पुष्प, दूध और शाक प्रदान करते हुए वर्षपर्यन्त कमल-पुष्पसे शिवकी पूजा करनी चाहिये।
उपर्युक्त विधिसे पूजन करनेके पश्चात् रतिसहित अनंग—कामदेवको स्वर्णसे निर्मित मण्डलके अन्तर्गत स्थापित करके उनकी गन्धादिसे पुनः पूजा कर तिल और चावल आदिसे संयुक्त हवन-सामग्रीसे उन्हें दस हजार आहुतियाँ प्रदान करनेका विधान है।
१०९- व्रतपरिभाषा तथा व्रतमें पालन करने योग्य नियम और अन्य ज्ञातव्य बातें
| २१८ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
|---|
उस दिन रात्रिमें जागरण करे तथा गीत-वाद्यादिसे आमोद-प्रमोद करते हुए प्रभातकालमें उन देवकी फिरसे पूजा करके ब्राह्मणको शय्या, पात्र, छत्र, वस्त्र तथा पदत्राणके लिये जूतेका दान देकर भक्तिपूर्वक गौ और ब्राह्मणको भोजन देकर मनुष्यको कृतकृत्य होना चाहिये। व्रतकी समाप्तिपर उद्यापन करना चाहिये। ऐसा करनेसे व्रती लक्ष्मी, पुत्र, आरोग्य, सौभाग्य तथा स्वर्ग प्राप्त करता है। (अध्याय ११७)
अखण्डद्वादशीव्रत
**ब्रह्माजीने कहा—**अब मैं मोक्ष तथा शान्तिप्रद अखण्डद्वादशीव्रतका वर्णन करता हूँ। मार्गशीर्षमासके शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथिमें गौके दूध-दही आदिको भोजनरूपमें स्वीकार करके व्रत करनेवाले उपासकको जगत्के स्वामी भगवान् विष्णुकी पूजा करनी चाहिये। चार मासपर्यन्त अर्थात् फाल्गुनमासतक वह व्रती पाँच प्रकारके धान्यसे पूर्ण पात्र ब्राह्मणको दान दे और भगवान् विष्णुकी इस प्रकार प्रार्थना करे—
सप्तजन्मनि हे विष्णो यन्मया हि व्रतं कृतम्।
भगवंस्त्वत्प्रसादेन तदखण्डमिहास्तु मे॥
यथाखण्डं जगत्सर्वं त्वमेव पुरुषोत्तम।
तथाखिलान्यखण्डानि व्रतानि मम सन्तु वै॥
(११८। ३-४)
हे विष्णो! सात जन्मोंमें मैंने जो व्रत किये हैं, हे भगवन्! वे आपकी कृपासे इस जन्ममें पूर्ण हों। हे पुरुषोत्तम! जिस प्रकार आप ही इस सम्पूर्ण अखण्ड ब्रह्माण्डके रूपमें अवस्थित हैं, उसी प्रकार मेरे द्वारा किये गये ये सभी व्रत भी अखण्ड हो जायँ।
चैत्रादि (चार) मासमें सत्तूसे पूर्ण पात्र और श्रावण आदि चार महीनोंमें घृतपूर्ण पात्र ब्राह्मणको दान देना चाहिये।
इस विधिसे वर्षपर्यन्त द्वादशीव्रतका संकल्प लेकर जो व्रती अपने व्रतको पूर्ण करता है, वह स्त्री-पुत्रादिसे सम्पन्न होकर अन्तमें स्वर्गलोकका सुखोपभोग करता है। (अध्याय ११८)
अगस्त्यार्घ्यव्रत-निरूपण
**ब्रह्माजीने पुनः कहा—**हे मुने! भुक्ति-मुक्ति प्रदान करनेवाले अगस्त्यार्घ्यव्रतको कहता हूँ। कन्याराशिपर सूर्यकी संक्रान्तिके तीन दिन पहलेसे काशपुष्पकी बनी हुई अगस्त्यकी मूर्तिका प्रदोषकालमें पूजन करके कुम्भमें अर्घ्य देना चाहिये। (रात्रि) जागरण और उपवास करके दधि-अक्षत और फल-पुष्पसे पूजा करके पाँच वर्णसे युक्त सोने-चाँदीसे समन्वित सप्तधान्यसे भरे पात्रको दही और चन्दनसे रंजित कर ‘अगस्त्यः खननमानः०’* इस मन्त्रसे अगस्त्यको अर्घ्य प्रदान करे।
इसके बाद इस मन्त्रसे उन्हें नमस्कार करना चाहिये—
काशपुष्पप्रतीकाश अग्निमारुतसम्भव।
मित्रावरुणयोः पुत्र कुम्भयोने नमोऽस्तु ते॥
(११९। ५)
अर्थात् काशपुष्पके समान उज्ज्वल, अग्नि और वायुसे उत्पन्न मित्रावरुणके पुत्र हे कुम्भयोनि अगस्त्यजी! आपको नमस्कार है।
शूद्र, स्त्री आदि इसी विधिसे अगस्त्यके लिये
* ऋग्वेद (१। १७९। ६)।
११०- प्रतिपदा, तृतीया, चतुर्थी तथा पञ्चमीमें किये जानेवाले विविध तिथिव्रत
कांड ] रम्भातृतीयाव्रत २१९
धान, फल और रस प्रदान करे तथा ब्राह्मणको स्वर्ण और दक्षिणासे युक्त घट प्रदान करे। सात ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये। इस प्रकार वर्षभर अगस्त्यार्घ्यव्रत करनेवाला सभी प्रकारके श्रेयप्राप्तिका अधिकारी हो जाता है।
(अध्याय ११९)
रम्भातृतीयाव्रत
ब्रह्माजीने कहा— अब मैं सौभाग्य, लक्ष्मी तथा पुत्रादिसे सम्पन्न करनेवाले 'रम्भातृतीयाव्रत'को कहूँगा। यह व्रत मार्गशीर्षमासके शुक्लपक्षकी तृतीया तिथिको किया जाता है। इस तिथिको उपवास रखकर व्रती कुशोदक हाथमें लेकर बिल्वपत्रसे महागौरीकी पूजा करे। इस पूजनमें कदम्ब (वृक्ष)-की दतुअनका प्रयोग करना चाहिये, किंतु पौषमासमें मरुबकके पुष्पोंसे पार्वतीके पूजनका विधान है। व्रती इस मासके व्रतमें मात्र कर्पूरका सेवनकर उपवास करता हुआ उन गौरीको कृसर (तिल-चावलका सिद्धान्न)-का नैवेद्य एवं मल्लिकाओंकी दतुअन अर्पित करे।
माघमासमें व्रतके दिन घृतपानकर उपवास करते हुए व्रतीको कल्हारपुष्प (श्वेतकमल)-से सुभद्रादेवीकी पूजा करके उन्हें मण्डका<sup>१</sup> नैवेद्य समर्पित करना चाहिये।
फाल्गुनमासमें गोमतीकी पूजाका विधान है। कुन्दपुष्पसे उनकी पूजा करके उसीकी नालको दतुअनरूपमें उन्हें निवेदित करे और स्वयं जीवा<sup>२</sup> (जीवन्ती)-का भक्षणकर शष्कुली<sup>३</sup> (पूड़ी)-का नैवेद्य लगाये।
चैत्रमासमें भगवती विशालाक्षीको दमनक-पुष्प, तगर<sup>४</sup> काष्ठकी दतुअन और कृसरान्नका नैवेद्य अर्पित करके स्वयं दहीका प्राशन करे। वैशाखमासमें श्रीमुखीदेवीकी पूजा कर्णिकार (कनैल)-के पुष्प, वटवृक्षकी दतुअनसे करनी चाहिये और व्रतीको अशोककलिकाका प्राशन करना चाहिये।
ज्येष्ठमासमें नारायणीदेवीका पूजन शतपर्णी (छितवन)-के पुष्प एवं दतुअनसे होता है। इस पूजामें देवीको खाँड़का नैवेद्य प्रदानकर स्वयं उपासक लौंगका भक्षण करे। आषाढ़मासमें माधवीकी पूजा करनी चाहिये। इस मासमें व्रती तिलका प्राशन करे और भगवती माधवीकी बिल्वपत्रसे पूजाकर खीर और वटक (घृतपक्व मधुर पिष्टक)-का नैवेद्य अर्पित करे। इस पूजनमें देवीके लिये गूलरकी दतुअन प्रदान करनी चाहिये। श्रावणमासमें क्षीरान्न तथा मल्लिकाकी दतुअन देकर तगरके फूलसे श्रीदेवीकी पूजा करनी चाहिये।
भाद्रपदमासमें सिंघाड़ेका आहारकर व्रतीको उत्तमादेवीके लिये गुड़़का नैवेद्य अर्पित करके पद्मपुष्पोंसे पूजा करनी चाहिये।
आश्विनमासमें राजपुत्रीका पूजन जपापुष्पसे करके उन्हें जीरेसे सुवासित अन्नका नैवेद्य अर्पितकर रात्रिमें प्राशन करना चाहिये। कार्तिकमासमें पद्मजादेवीका जाति नामक पुष्प एवं कृसरान्नके नैवेद्यसे पूजन होता है और उपासकको पञ्चगव्यका प्राशन करना चाहिये।
१-मण्ड—अन्न, दधि आदिका सार।
२-जीवा—शाकविशेष, शर्कराके समान मधुर पुष्पवाली लता।
३-तिल, तण्डुल, उड़दके चूर्णसे बना यवागू भी शष्कुलीका अर्थ है।
४-तगर—पुष्पवृक्ष, सितपुष्प, मदनवृक्ष (टगर)।
| २२० | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
|---|
इस प्रकार मार्गशीर्षसे कार्तिकमासतक वर्षकी समाप्तिपर सपत्नीक ब्राह्मणोंको घृतोदन (घृतमें पका तण्डुल) देकर उनका पूजन करना चाहिये। उसके बाद पार्वती और शिवकी गुड़ आदिसे बने नैवेद्य, वस्त्र, छत्र और सुवर्ण आदिसे पूजा करके गीत-वाद्यादिसे रात्रि-जागरण करते हुए प्रातः गौ आदिका दान देना चाहिये। ऐसा करनेसे व्रतीको सब कुछ प्राप्त हो जाता है। (अध्याय १२०)
चातुर्मास्यव्रतका निरूपण
**ब्रह्माजीने कहा—**अब मैं चातुर्मास्यव्रतको कहता हूँ। इस व्रतका आरम्भ आषाढ़मासकी एकादशी या पूर्णिमा तिथिमें सब प्रकारसे भगवान् हरिका पूजन करके करे। व्रतारम्भके समय इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये—
इदं व्रतं मया देव गृहीतं पुरतस्तव।
निर्विघ्नं सिद्धिमाप्नोतु प्रसन्ने त्वयि केशव॥
गृहीतेऽस्मिन् व्रते देव यद्यपूर्णे म्रियाम्यहम्।
तन्मे भवतु सम्पूर्णं त्वत्प्रसादाज्जनार्दन॥
(१२१।२-३)
हे देव! आपके समक्ष मैंने इस व्रतको ग्रहण किया है। हे केशव! आपके प्रसन्न होनेपर मुझे निर्विघ्न सिद्धि प्राप्त हो। हे देव! ग्रहण किये गये इस व्रतकी अपूर्णतामें ही यदि मैं मृत्युको प्राप्त हो जाता हूँ तो भी हे जनार्दन! आपकी कृपासे यह मेरा व्रत पूर्ण हो।
इस प्रकार हरिका पूजन करके व्रत, पूजन और जपादिका नियम ग्रहण करना चाहिये। जो हरिके व्रतको करनेकी इच्छा करता है, उसके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। साधक स्नान करके भगवान् हरिका पूजन कर इस पूजा तथा जपादिकी विहित क्रियाओंकी पूर्तिका संकल्प ले तथा आषाढ़ आदि चार मासोंतक एकभक्तव्रत करता हुआ विष्णुकी पूजा करे। ऐसा करनेवाला विष्णुके परम पवित्र निर्मल लोकमें चला जाता है।
मधु, मांस, सुरा और तेलका परित्याग करनेवाला जो वेदपारंगत, कृच्छ्रपादव्रती<sup>१</sup> विष्णुभक्त हरिका पूजन करता है, वह विष्णुलोकको प्राप्त हो जाता है। एक रात्रिका उपवास करनेसे वैमानिक (विमानपर चढ़कर भ्रमण करनेवाला) देवता हो जाता है। तीन रात्रिपर्यन्त उपवास कर षष्ठांश भोजन करनेसे साधकको श्वेतद्वीपकी प्राप्ति होती है। चान्द्रायणव्रत<sup>२</sup> करनेसे तो भगवान् हरिका लोक और मुक्ति बिना माँगे ही मिल जाती है। प्राजापत्यव्रत<sup>३</sup> करनेसे विष्णुलोक तथा पराकव्रत<sup>४</sup> करनेसे हरिकी प्राप्ति होती है।
इस व्रतमें सत्तू, यवान्नकी भिक्षा कर, दूध, दही तथा घृतका प्राशन कर, गोमूत्रयावकका आहार कर, पञ्चगव्यका पान कर अथवा सभी प्रकारके रसोंका परित्याग कर शाक-मूल-फलादिका भक्षण करते हुए जो साधक विष्णुकी भक्ति करता है, वह विष्णुलोकको प्राप्त करता है। (अध्याय १२१)
१-**कृच्छ्रपादव्रत—**यह तीन दिनका व्रत है। पहले दिन दिनमें एक बार हविष्यान्न-ग्रहण, दूसरे दिन अयाचितरूपमें हविष्यान्नका एक बार ग्रहण और तीसरे दिन अहोरात्र उपवास। (याज्ञ०स्मृति, प्राय० श्लोक ३१८)
२-**चान्द्रायणव्रत—**यह व्रत अनेक प्रकारका है। मनु० ११।२१६ के अनुसार यह है—प्रतिदिन तीनों काल स्नान। पूर्णिमासे व्रतका आरम्भ। इस दिन पंद्रह ग्रास हविष्यान्नमात्र ग्रहण। पूर्णिमाके बाद कृष्णपक्षकी प्रतिपदासे एक-एक ग्रास कम करते हुए अर्थात् १४, १३, १२ इस संख्यामें ग्रास ग्रहण करते हुए कृष्णपक्षकी चतुर्दशीको एक ग्रास ग्रहण। तदनन्तर अमावास्याको पूर्ण उपवास। पुनः अमावास्याके बाद शुक्ल प्रतिपदासे एक-एक ग्रास बढ़ाकर १, २, ३ इस क्रममें दूसरी पूर्णिमाको पंद्रह ग्रास ग्रहण। इस प्रकार एक मासमें यह व्रत पूर्ण होता है।
३-**प्राजापत्यव्रत—**यह व्रत बारह दिनका होता है। प्रथम तीन दिन केवल दिनमें हविष्यान्न-ग्रहण। तत्पश्चात् तीन दिन केवल रातमें हविष्यान्न-ग्रहण। तदनन्तर तीन दिन बिना माँगे जो मिल जाय, उतनामात्र एक बार ग्रहण। अन्तिम तीन दिन पूर्णरूपमें उपवास। (मनु० ११।२११)
४-**पराकव्रत—**इस व्रतमें बारह दिनतक केवल जल ग्रहण करके रहा जाता है। (याज्ञ०स्मृति, प्राय० श्लोक ३२०, मनु०११।२१५)