विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
( १४ )
१०८-हंस और डिम्भकद्वारा संन्यासकी निन्दा तथा जनार्दनद्वारा संन्यास-आश्रमका मण्डन .... १०४९
१०९-दुर्वासाका रोष, हंसद्वारा उनका तिरस्कार, दुर्वासाद्वारा उन दोनोंके लिये शाप और जनार्दनके लिये वरदान ... ... १०५०
११०-दुर्वासा आदि मुनियोंका द्वारकागमन .... १०५२
१११-श्रीकृष्णकी गोलक्रीडा, सुधर्मा सभामें दुर्वासा आदि मुनियोंका आगमन तथा यादवों और श्रीकृष्णद्वारा उनका सत्कार, श्रीकृष्णका उनसे वहाँ आनेका कारण पूछना और दुर्वासाका भगवान्की स्तुति एवं उपालम्भपूर्वक उनके प्रश्नका प्रतिवाद करके अपनी दुर्दशाका वृत्तान्त सुनाना ... .... १०५३
११२-भगवान् श्रीकृष्णकी हंस और डिम्भकके वधके लिये प्रतिज्ञा तथा क्षमा-प्रार्थनापूर्वक उनका यतियोंको भोजन कराना ... १०५८
११३-जनार्दनका हंसको समझाना; किंतु हंसका उनकी बात न मानकर उन्हें दूत बनाकर द्वारकाको भेजना ,.... ... १०५९
११४-जनार्दनकी भगवद्दर्शनविषयक उत्कण्ठा ... १०६१
११५-जनार्दनका सुधर्मा-सभामें जाकर भगवान् श्रीकृष्णके दर्शनसे संतुष्ट हो उनकी आज्ञासे भगवत्स्तवनपूर्वक हंस और डिम्भकका संदेश सुनाना और उसे सुनकर यादवोंका उपहास करना .... .... .... १०६४
११६-श्रीकृष्णका जनार्दनको संदेश देकर लौटाना १०६७
११७-सात्यकिसहित जनार्दनका शाल्वनगरमें जाना, हंससे मिलना तथा हंसका जनार्दनसे कार्य-सिद्धिके विषयमें पूछना .... .... १०६७
११८-जनार्दनका हंसको श्रीकृष्णदर्शनजनित अपना उल्लास बताना, द्वारकामें हंसके संदेशकी प्रतिक्रियाका वर्णन करके उसे राजसूय न करनेकी सलाह देना, हंसका उसे रोषपूर्वक तिरस्कृत करके चले जानेके लिये कहना, फिर सात्यकिका हंसको श्रीकृष्णका संदेश सुनाते हुए फटकारना ... .... १०६८
११९-हंस और डिम्भकके सात्यकिके प्रति रोषपूर्ण वचन तथा सात्यकिका उन्हें वैसा ही उत्तर देकर द्वारकाको प्रस्थान .... ... १०७२
१२०-भगवान् श्रीकृष्ण तथा यादवसेनाका पुष्कर-तीर्थमें जाकर हंस और डिम्भककी प्रतीक्षा करना १०७३
१२१-हंस और डिम्भककी सेनाओंका पुष्करतीर्थमें प्रवेश .... = .... १०७५
१२२-उभयपक्षकी सेनाओंका घमासान युद्ध ... १०७७
१२३-श्रीकृष्ण और विचक्रका घोर युद्ध तथा विचक्रका वध .... ... १०७८
१२४-हंस और बलभद्रका युद्ध ... .... १०८०
१२५-सात्यकि और डिम्भकका युद्ध .... १०८१
१२६-हिडिम्बके साथ वसुदेव और उग्रसेनका युद्ध तथा बलभद्रके द्वारा हिडिम्बका वध .... १०८३
१२७-गोवर्धन पर्वतके समीप हंस और डिम्भकके साथ यादवोंका युद्ध, श्रीकृष्णद्वारा भूतेश्वरोंकी पराजय तथा श्रीकृष्ण और हंसका घोर युद्ध १०८६
१२८-श्रीकृष्णद्वारा हंसका वध .... .... १०८९
१२९-डिम्भककी आत्महत्या .... .... १०९०
१३०-गोप-गोपियोंसहित यशोदा और नन्दका गोवर्धन पर्वतपर आकर श्रीकृष्ण और बलभद्रसे मिलना .... .... १०९१
१३१-द्वारका जाते हुए श्रीकृष्णका पुष्करमें ऋषियोंसे मिलना तथा ऋषियोंद्वारा उनका स्तवन १०९२
१३२-महाभारत और हरिवंशके श्रवणकी विधि और फल, वाचकके गुण, प्रत्येक पर्वपर दान देने योग्य वस्तु, एकसे लेकर दस पारणाओंकी महत्ता तथा महाभारत एवं हरिवंशका माहात्म्य .... .... १०९३
१३३-त्रिपुर-वधकी कथा .... .... ११०४
१३४-हरिवंशमें वर्णित वृत्तान्तोंका संग्रह .... ११०५
( १५ )
१३५-हरिवंश-श्रवणकी दक्षिणा, फल एवं माहात्म्यका वर्णन ... ... ११०७
श्रीहरिवंश-माहात्म्य
१-हरिवंश-श्रवणका माहात्म्य, नारीके पाँच दोष और हरिवंश-श्रवणसे उनकी निवृत्ति, पाठके उत्तम, मध्यम आदि भेद तथा गोव्रतकी विधि ११०९
२-(१) हरिवंश-श्रवणकी विधि और फल ... ११११
३-(२) हरिवंश-श्रवणकी विधि और फल .... १११४
४-नवाहव्रती श्रोताओंके पालन करने योग्य नियम, उनके द्वारा त्याज्य वस्तुओंका उल्लेख, न्यायविरुद्ध कथा-श्रवण करनेवालोंकी दुर्गति, कथामें विघ्न डालनेके कारण एक नारीको नरक-यातना एवं राक्षसयोनिकी प्राप्ति तथा श्रोताओंके चौदह भेद .... ... १११६
५-हरिवंशके नवाह-पारायणका उद्यापन, उसमें किये जानेवाले दान, पुस्तक-पूजा और वाचकपूजन आदिका विधान एवं माहात्म्य ... ११२१
६-हरिवंश आरम्भ करनेके लिये उत्तम मास, तिथि, नक्षत्र आदिका निर्देश, देवपूजन, व्यासपूजन तथा कथा-समाप्तिपर दी जानेवाली दक्षिणा एवं दान आदिका उल्लेख तथा श्रवणका माहात्म्य ११२४
( संतानगोपाल-मन्त्रविधि )
१-संतानगोपालमन्त्रविधिः (१) .... ११२९
२-संतानगोपालमन्त्र (२) ... ११२९
३-सनत्कुमारोक्त संतानगोपालमन्त्र (३) .... ११३०
४-संतानगोपालस्तोत्रम् ... ११३२
५-श्रीविष्णुशतनामस्तोत्रम् ... ११३९
६-वन्ध्यानां पुत्रोत्पत्त्यर्थे संतानगोपालमन्त्रविधिः ११४०
श्रीनन्दनन्दन
भगवान् शिव (पृष्ठ-संख्या १)
ॐ
श्रीपरमात्मने नमः
श्रीमहाभारतम्
तस्य खिलभागो हरिवंशः
तत्र हरिवंशपर्व
प्रथमोऽध्यायः
मङ्गलाचरण, शौनक-उग्रश्रवा-संवाद, वृष्णिवंशियोंका विस्तृत चरित्र सुननेके लिये जनमेजयकी प्रार्थना और आदिसृष्टिका वर्णन
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥ १ ॥
बदरिकाश्रमनिवासी प्रसिद्ध ऋषि श्रीनारायण (अथवा अन्तर्यामी नारायण), नर (नारायणसखा अर्जुन अथवा आदि जीव हिरण्यगर्भ) तथा नरोत्तम (इन हिरण्यगर्भ एवं अन्तर्यामीसे भी श्रेष्ठ शुद्ध सच्चिदानन्दघन पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण) को और (इन नर-नारायण तथा नरोत्तमके तत्त्वको प्रकट करनेवाली) देवी सरस्वतीको एवं (देवी सरस्वतींने संसारपर अनुग्रह करनेके लिये जिनके शरीरमे प्रवेश किया है, उन) व्यासजीको प्रणाम करके अविद्यारूपी अज्ञानान्धकारको जीतनेवाले इतिहास-पुराणादि ग्रन्थोंका पाठ आरम्भ करे ॥ १ ॥
द्वैपायनोष्ठपुटनिःसृतमप्रमेयं
पुण्यं पवित्रमथ पापहरं शिवं च।
यो भारतं समधिगच्छति वाच्यमानं
किं तस्य पुष्करजलैरभिषेचनेन ॥ २ ॥
(सौति कहते हैं—) जो व्यासजीके मुखसे निकले हुए इस अप्रमेय (अतुलनीय), पुण्यदायक, पवित्र, पापहारी और कल्याणमय महाभारतको दूसरोंके मुखसे सुनता है, उसे पुष्कर तीर्थके जलमें स्नान करनेकी क्या आवश्यकता है? (महाभारत-कथा उससे भी अधिक पावन है) ॥ २ ॥
जयति पराशरसूनुः
सत्यवतीहृदयनन्दनो व्यासः।
यस्यास्यकमलगलितं
वाङ्मयाममृतं जगत् पिबति ॥ ३ ॥
माता सत्यवतीके हृदयको आनन्द प्रदान करनेवाले उन पराशर-पुत्र व्यासकी जय हो, जिनके मुखारविन्दसे निकले हुए वाङ्मयरूपी अमृतका सारा संसार पान करता है ॥ ३ ॥
यो गोशतं कनकश्शृङ्गमयं ददाति
विप्राय वेदविदुषे बहुविश्रुताय ।
पुण्यां च भारतकथां शृणुयाच्च तद्वत्
तुल्यं फलं भवति तस्य च तस्य चैव ॥ ४ ॥
जो गौओंके सींगमें सोना मढ़ाकर वेदवेत्ता एवं बहुज्ञ ब्राह्मणको प्रतिदिन सौ गौएँ दान देता है और जो पुण्यदायिनी महाभारत-कथाका श्रवणमात्र करता है—इन दोनोंमेंसे प्रत्येकको बराबर ही फल मिलता है ॥ ४ ॥
शताश्वमेधस्य यदत्र पुण्यं
चतुःसहस्रस्य शतक्रतोश्च।
भवेदनन्तं हरिवंशदानात्
प्रकीर्तितं व्यासमहर्षिणा च ॥ ५ ॥
जो चार हजार अक्षय अन्नसत्रोंसे युक्त तथा इन्द्रपदकी प्राप्ति करानेवाले हैं, उन सौ अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान करनेसे इस लोकमे जो पुण्य प्राप्त होता है, वही अनन्त पुण्य इस हरिवंश ग्रन्थका दान करनेसे उपलब्ध होता है। यह बात महर्षि व्यासजीने कही है ॥ ५ ॥
यद् वाजपेयेन तु राजसूयाद्
दृष्टं फलं हस्तिरथेन चान्यत्।
तल्लभ्यते व्यासवचः प्रमाणं
गीतं च वाल्मीकिमहिर्षणा च ॥ ६ ॥
म० ह० १—
| २ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
वाजपेय और राजसूय यज्ञोंके अनुष्ठानसे तथा हाथी जुते हुए रथके दानसे जिस फलकी प्राप्ति देखी या बतायी गयी है, वही फल हरिवंश-ग्रन्थका दान करनेसे मिल जाता है। इसमें व्यासजीका वचन प्रमाण है तथा महर्षि वाल्मीकि-ने भी इसी माहात्म्यका गान किया है ॥ ६ ॥
यो हरिवंशं लेखयति यथाविधिना महातपाः सपदि ।
स जयति हरिपदकमलं मधुपो हि यथा रसेन लुब्धः ॥ ७ ॥
जो महातपस्वी पुरुष शास्त्रीय विधिके अनुसार हरिवंशको लिखता या लिखवाता है, वह रसपर लुभाये हुए भँवरेके समान भगवान् श्रीकृष्णके चरण-कमलोंपर पहुँच जाता है ॥ ७ ॥
पितामहाद्यं प्रवदन्ति षष्ठं महर्षिमक्षय्यविभूतियुक्तम् ।
नारायणस्यांशजमेकपुत्रं द्वैपायनं वेद महानिधानम् ॥ ८ ॥
ब्रह्माजीके आदि कारण श्रीनारायणको जिनसे उनकी छठी* पीढ़ीका पुरुष बताते हैं, जो अक्षय्य विभूतियोंसे युक्त तथा नारायणके अंशसे प्रकट हैं, एकमात्र शुकदेव ही जिनके पुत्र हैं (अथवा जो अपने पिता पराशरके एक ही पुत्र हैं), वैदिक ज्ञानकी महानिधिरूप उन महर्षि श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासकी मैं उपासना करता हूँ ॥ ८ ॥
आद्यं पुरुषमीशानं पुरुहूतं पुरुष्टुतम् ।
ऋतमेकाक्षरं ब्रह्म व्यक्ताव्यक्तं सनातनम् ॥ ९ ॥
असच सदसच्चैव यद्विश्वं सदसत्परम् ।
परावराणां स्रष्टारं पुराणं परमव्ययम् ॥ १० ॥
माङ्गल्यं मङ्गलं विष्णुं वरेण्यमनघं शुचिम् ।
नमस्कृत्य हृषीकेशं चराचरगुरुं हरिम् ॥ ११ ॥
नैमिषारण्ये कुलपतिः शौनकस्तु महामुनिः ।
सौतिं पप्रच्छ धर्मात्मा सर्वशास्त्रविशारदः ॥ १२ ॥
नैमिषारण्यकी बात है, सम्पूर्ण शास्त्रोंके विशेषज्ञ, धर्मात्मा एवं कुलपति† महामुनि शौनक ने सबके आदि कारण, अन्तर्यामी पुरुष, पुरुहूत (बहुत-से यजमानोंद्वारा दी गयी आहुतिको ग्रहण करनेवाले), पुरुष्टुत (बहुसंख्यक उपासकोंद्वारा स्तुत्य), ऋत (सत्यस्वरूप), एकाक्षर (प्रणवमय अथवा एक, अविनाशी), ब्रह्म (परमात्मा), व्यक्ताव्यक्तरूप, सनातन, असत् (कार्यरूप), सदसत् (कारण और कार्यरूप), अखिल विश्वमय, सत् और असत्—दोनोंसे पर (विलक्षण), कारण और कार्य दोनोंके स्रष्टा, पुरातन, सर्वोत्कृष्ट, अविकारी, मङ्गलकारी, मङ्गलरूप, सर्वव्यापी, सबके द्वारा वरणीय, पापरहित, परम पवित्र, इन्द्रियोंके प्रेरक तथा समस्त चराचर जगत्के गुरु श्रीहरिको प्रणाम करके लोमहर्षण सूतके पुत्र उग्रश्रवासे इस प्रकार पूछा ॥ ९–१२ ॥
शौनक उवाच
सौते सुमहदाख्यानं भवता परिकीर्तितम् ।
भारतानां च सर्वेषां पार्थिवानां तथैव च ॥ १३ ॥
देवानां दानवानां च गन्धर्वोरगरक्षसाम् ।
दैत्यानामथ सिद्धानां गुह्यकानां तथैव च ॥ १४ ॥
शौनकजीने कहा—सूतनन्दन ! आपने भरतवंशियों, अन्य सब राजाओं, देवताओं, दानवों, गन्धर्वों, नागों, राक्षसों, दैत्यों, सिद्धों तथा गुह्यकोंसे सम्बन्ध रखनेवाला यह बहुत बड़ा उपाख्यान (महाभारत) कह सुनाया ॥ १३-१४ ॥
अत्यद्भुतानि कर्माणि विक्रमा धर्मनिश्चयाः ।
विचित्राश्च कथायोगा जन्म चाग्र्यमनुत्तमम् ॥ १५ ॥
कथितं भवता पुण्यं पुराणं श्लक्ष्णया गिरा ।
मनःकर्णसुखं सौते प्रीणात्यमृतसम्मितम् ॥ १६ ॥
आपने (ऋषि-महर्षियोंके) अद्भुत कर्म, (शूरवीरोंके) बल-विक्रम, धर्मतत्त्वके निर्णय, विचित्र-विचित्र कथा-प्रसङ्ग तथा (द्रोण आदिके) श्रेष्ठ एवं परम उत्तम जन्म-वृत्तान्त आदि प्राचीन एवं पुण्यप्रद विषयोंका अपनी मधुर वाणीद्वारा वर्णन किया है। उग्रश्रवाजी ! मन और कानोंको सुख देनेवाला यह प्रसङ्ग मुझे अमृतके समान तृप्ति प्रदान करता है ॥ १५-१६ ॥
तत्र जन्म कुरूणां वै त्वयोक्तं लोमहर्षणे ।
न तु वृष्ण्यन्धकानां च तद् भवान् वक्तुमर्हति ॥ १७ ॥
लोमहर्षणकुमार ! आपने महाभारत सुनाते समय कुरुवंशियोंके ही जन्मका विशेषरूपसे वर्णन किया है, वृष्णि तथा अन्धकवंशके वीरोंके जन्मका नहीं; अतः अब आप इन सबके जन्म-कर्मका भी वर्णन कीजिये ॥ १७ ॥
सौतिरुवाच
जनमेजयेन यत् पृष्टः शिष्यो व्यासस्य धर्मवित् ।
तद् तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि वृष्णीनां वंशमादितः ॥ १८ ॥
सूत-पुत्र उग्रश्रवाने कहा—शौनकजी ! जनमेजयने व्यासजीके धर्मवेत्ता शिष्य वैशम्पायनजीसे जो कुछ पूछा था, उसीके अनुसार मैं आरम्भसे ही वृष्णियोंके वंशका आपसे वर्णन करता हूँ ॥ १८ ॥
* व्यास, पराशर, शक्ति, वसिष्ठ, ब्रह्मा तथा भगवान् नारायण—इस प्रकार गणना करनेपर श्रीमन्नारायणदेव व्यासजीसे छठी पीढ़ी ऊपरके पूर्वज ज्ञात होते हैं।
† जो ग्यारह हजार तपस्वियोंको अन्न आदि देकर पालन करता है, वह वेद-वेदाङ्गपारगामी ऋषि 'कुलपति' कहलाता है।
हरिवंशपर्व ] प्रथमोऽध्यायः ३
श्रुत्वेतिहासं कार्त्स्न्येन भारतानां स भारतः ।
जनमेजयोग महाप्राज्ञो वैशम्पायनमब्रवीत् ॥ १९ ॥
भरतवंशी राजाओंके इतिहासको पूर्णरूपसे सुनकर भरतनन्दन महाबुद्धिमान् जनमेजयने वैशम्पायनजीसे कहा ॥
जनमेजय उवाच
महाभारतमाख्यानं बह्वर्थं श्रुतिविस्तरम् ।
कथितं भवता पूर्वं विस्तरेण मया श्रुतम् ॥ २०॥
जनमेजयने कहा— मुने ! आपने पहले वेदके अर्थको स्पष्ट करके विस्तृत रूपमें वर्णन करनेवाली, (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष आदि) अनेक अर्थोंसे भरी हुई जो महाभारतकी कथा विस्तारपूर्वक कही, उसको मैंने सुन लिया ॥ २० ॥
तत्र शूराः समाख्याता बहवः पुरुषर्षभाः ।
नामभिः कर्मभिश्चैव वृष्ण्यन्धकमहारथाः ॥ २१ ॥
उस महाभारत-कथामें आपने बहुत-से पुरुषश्रेष्ठ शूरोंका वर्णन किया तथा बहुत-से वृष्णि और अन्धकवंशी महारथियोंके नाम और कर्म भी बताये ॥ २१ ॥
तेषां कर्मावदातानि त्वयोक्तानि द्विजोत्तम ।
तत्र तत्र समासेन विस्तरेणैव मे प्रभो ॥ २२ ॥
द्विजोत्तम ! उनके उत्तम कर्मोंका भी आपने उन-उन स्थलोंमें संक्षिप्त रूपसे वर्णन किया है। प्रभो ! अब आप उनको विस्तारपूर्वक सुनाइये ॥ २२ ॥
न च मे तृप्तिरस्तीह कथ्यमाने पुरातने ।
एकश्चैव मतो राशिर्वृष्णयः पाण्डवास्तथा ॥ २३ ॥
आपने पहले जो संक्षिप्तरूपसे वर्णन किया, उससे मेरी तृप्ति नहीं हुई है। ये वृष्णि और पाण्डव एक ही राशि (कुटुम्ब) के माने जाते हैं ॥ २३ ॥
भवांश्च वंशकुशलस्तेषां प्रत्यक्षदर्शिवान् ।
कथयस्व कुलं तेषां विस्तरेण तपोधन ॥ २४ ॥
तपोधन ! आप वंशोंकी कथा कहनेमें चतुर हैं और उनकी सब बातोंको आपने प्रत्यक्ष देखा है। अतएव उनके कुलका आप विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये ॥ २४ ॥
यस्य यस्यान्वये ये ये तांस्तानिच्छामि वेदितुम् ।
स त्वं सर्वमशेषेण कथयस्व महामुने ।
तेषां पूर्वविसृष्टिं च विचिन्त्येमां प्रजापतेः ॥ २५ ॥
महामुने ! जिस-जिसके कुलमें जो-जो उत्पन्न हुए हों, उन सबको मैं जानना चाहता हूँ; अतएव प्रजापतिसे आरम्भ करके पूर्वकालमें उनकी जिस प्रकार सृष्टि हुई है, उस सबका विचार करके आप मुझे पूर्णरूपसे सब कथा सुनाइये ॥ २५ ॥
सौतिरुवाच
सत्कृत्य परिपृष्टस्तु स महात्मा महातपाः ।
विस्तरेणानुपूर्व्या च कथयामास तां कथाम् ॥ २६ ॥
उग्रश्रवाने कहा— जब सत्कारपूर्वक उनसे यह बात पूछी गयी, तब वे महातपस्वी महात्मा वैशम्पायन क्रमशः और विस्तारके साथ उस वंशावलीकी कथा कहने लगे ॥
वैशम्पायन उवाच
शृणु राजन् कथां दिव्यां पुण्यां पापप्रमोचनीम् ।
कथ्यमानां मया चित्रां बह्वर्थां श्रुतिसम्मिताम् ॥ २७ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— राजन् ! सुनो, यह (वृष्णिवंशियोंके जन्मकी) कथा अलौकिक, पुण्यमयी और पापोंसे मुक्त करनेवाली है, इसमें (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष आदि) अनेक पुरुषार्थोंका उपदेश है, इस वेदके समान माननीय तथा आश्चर्यमयी कथाका मैं आपसे वर्णन करता हूँ ॥ २७ ॥
यश्चेमां धारयेद् वापि शृणुयाद् वाऽप्यभीक्ष्णशः ।
स्ववंशधारणं कृत्वा स्वर्गलोके महीयते ॥ २८ ॥
जो इस कथाको अपने हृदयमें धारण करता है या इसको पुस्तकके रूपमें अपने घरमें स्थापित करता है अथवा बार-बार इसको सुनता है, वह (इस लोकमें) अपने वंशको स्थापित कर अन्तमे स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ २८ ॥
अव्यक्तं कारणं यत् तन्नित्यं सदसदात्मकम् ।
प्रधानं पुरुषं तस्मान्निर्ममे विश्वमीश्वरम् ॥ २९ ॥
जो नित्य, सदसत्स्वरूप तथा कारणभूत अव्यक्त प्रकृति है, उसीको 'प्रधान' कहते हैं। सर्वशक्तिमान् पुरुषने उसीसे इस विश्वका निर्माण किया है ॥ २९ ॥
तं वै विद्धि महाराज ब्रह्माणममितौजसम् ।
स्रष्टारं सर्वभूतानां नारायणपरायणम् ॥ ३० ॥
महाराज ! तुम अमित तेजस्वी ब्रह्माजीको ही पुरुष समझो। वे समस्त प्राणियोंकी सृष्टि करनेवाले तथा भगवान् नारायणके आश्रित हैं ॥ ३० ॥
अहङ्कारस्तु महतस्तस्माद् भूतानि जज्ञिरे ।
भूतभेदाश्च भूतेभ्य इति सर्गः सनातनः ॥ ३१ ॥
(प्रकृतिसे महत्तत्त्व,) महत्तत्त्वसे अहंकार तथा अहंकारसे सब सूक्ष्म भूत उत्पन्न हुए। भूतोंके जो स्थूल भेद हैं, वे भी उन सूक्ष्म भूतोंसे ही प्रकट हुए हैं। यह (अनादिकालसे प्रवाहरूपसे चला आनेवाला) सनातन सर्ग है ॥ ३१ ॥
विस्तरावयवं चैव यथाप्रज्ञं यथाश्रुति ।
कीर्त्यमानं शृणु मया पूर्वेषां कीर्तिवर्धनम् ॥ ३२ ॥
अब जैसी मेरी बुद्धि है और जैसा मैंने गुरुजनोंसे सुन
४ श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
रखा है, उसके अनुसार मैं भूतसर्गका विस्तारपूर्वक वर्णन आरम्भ करता हूँ, सुनो। यह प्रसंग पूर्वजोंकी कीर्तिका विस्तार करनेवाला है ॥ ३२ ॥
धन्यं यशस्यं शत्रुघ्नं स्वर्ग्यमायुःप्रवर्धनम्।
कीर्तनं स्थिरकीर्तीनां सर्वेषां पुण्यकर्मणाम् ॥ ३३॥
स्थिर कीर्तिवाले उन समस्त पुण्यकर्मा पूर्वजोंके यशका कीर्तन धन और यशकी वृद्धि करनेवाला, शत्रुओंका नाशक, स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला तथा आयु बढ़ानेवाला है ॥ ३३ ॥
तस्मात् कल्पाय ते कल्पः समग्रं शुचये शुचिः।
आ वृष्णिवंशाद् वक्ष्यामि भूतसर्गमनुत्तमम् ॥ ३४ ॥
तुम इस विषयको हृदयंगम करनेमें समर्थ और शुद्ध हो और मैं इसका वर्णन करनेमें समर्थ हूँ। अतः पवित्र होकर आरम्भसे वृष्णिवंशपर्यन्त परम उत्तम भूतसर्गका वर्णन करूँगा ॥ ३४ ॥
ततः स्वयम्भूर्भगवान् सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः ।
अप एव ससर्जादौ तासु वीर्यमवासृजत् ॥ ३५॥
तदनन्तर स्वयम्भू भगवान् नारायणने नाना प्रकारकी प्रजा उत्पन्न करनेकी इच्छासे सबसे पहले जलकी ही सृष्टि की। फिर उस जलमें अपनी शक्तिका आधान किया ॥ ३५॥
आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनवः ।
अयनं तस्य ताः पूर्वं तेन नारायणः स्मृतः ॥ ३६ ॥
जलका दूसरा नाम है नार, क्योंकि उसकी उत्पत्ति भगवान् नरसे हुई है। वह जल पूर्वकालमें भगवान्का अयन हुआ, इसलिये वे 'नारायण' कहलाते हैं ॥ ३६ ॥
हिरण्यवर्णमभवत् तदण्डमुदकेशयम् ।
तत्र जज्ञे स्वयं ब्रह्मा स्वयम्भूरिति नः श्रुतम् ॥ ३७॥
भगवान्ने जलमें जो अपनी शक्तिका आधान किया था, उससे एक बहुत विशाल सुवर्णमय अण्ड प्रकट हुआ, वह दीर्घकालतक जलमें ही स्थित था। उसीमें स्वयम्भू ब्रह्माजी उत्पन्न हुए—ऐसा हमने सुना है ॥ ३७॥
हिरण्यगर्भो भगवानुषित्वा परिवत्सरम् ।
तदण्डमकरोद् द्वैधं दिवं भुवमथापि च ॥ ३८ ॥
भगवान् हिरण्यगर्भने उस अण्डमें एक वर्षतक निवास करके उसके दो टुकड़े कर दिये। फिर एक टुकड़ेसे द्युलोक बनाया और दूसरेसे भूलोक ॥ ३८ ॥
तयोः शकलयोर्मध्ये आकाशमसृजत् प्रभुः ।
अप्सु पारिप्लवां पृथ्वीं दिशश्च दशधा दधे ॥ ३९ ॥
उन दोनों टुकड़ोंके बीचमें भगवान् ब्रह्माने आकाश (अवकाश) की सृष्टि की। जलके ऊपर तैरती हुई पृथ्वीको स्थापित किया। फिर दसों दिशाएँ निश्चित कीं ॥ ३९ ॥
तत्र कालं मनो वाचं कामं क्रोधमथो रतिम् ।
ससर्ज सृष्टिं तद्रूपां स्रष्टुमिच्छन् प्रजापतीन् ॥ ४० ॥
उस ब्रह्माण्डके भीतर ही उन्होंने काल, मन, वाणी, काम, क्रोध तथा रति आदि भावोंकी सृष्टि की। फिर इन भावोंके अनुरूप सृष्टिकारनेकी इच्छावाले ब्रह्माजीने निम्नाङ्कित (सात) प्रजापतियोंको उत्पन्न किया ॥ ४० ॥
मरीचिमत्र्यङ्गिरसं पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम् ।
वसिष्ठं च महातेजाः सोऽसृजत् सप्त मानसान्॥ ४१ ॥
उनके नाम इस प्रकार हैं—मरीचि, अत्रि, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और वसिष्ठ। महातेजस्वी ब्रह्माने इन सातोंकी अपने मन (संकल्प) से सृष्टि की (अतः ये उनके मानस पुत्र हैं) ॥ ४१ ॥
सप्त ब्रह्माण इत्येते पुराणे निश्चयं गताः ।
नारायणात्मकानां वै सप्तानां ब्रह्मजन्मनाम् ॥ ४२ ॥
ततोऽसृजत् पुनर्ब्रह्मा रुद्रं रोषात्समुद्भवम् ।
सनत्कुमारं च विभुं पूर्वेषामपि पूर्वजम् ॥ ४३ ॥
पुराणोंमें ये सात ब्रह्मा निश्चित किये गये हैं। भगवान् नारायणमें मन लगाये रहनेवाले इन सात ब्राह्मणोंकी सृष्टिके अनन्तर ब्रह्माजीने अपने रोषसे रुद्रको प्रकट किया। फिर पूर्वजोंके भी पूर्वज भगवान् सनत्कुमारजीको उत्पन्न किया ॥ ४२-४३ ॥
सप्तैते जनयन्ति स्म प्रजा रुद्रश्च भारत ।
स्कन्दः सनत्कुमारश्च तेजः संक्षिप्य तिष्ठतः ॥ ४४ ॥
भरतनन्दन ! ये मरीचि आदि सात ऋषि तथा रुद्रदेव प्रजाकी सृष्टि करने लगे। स्कन्द और सनत्कुमार—ये दोनों अपने तेजका संवरण करके रहते हैं ॥ ४४ ॥
तेषां सप्त महावंशा दिव्या देवगणान्विताः ।
क्रियावन्तः प्रजावन्तो महर्षिभिरलंकृताः ॥ ४५ ॥
उक्त सात महर्षियोंके सात बड़े-बड़े दिव्य वंश हैं। देवता भी इन्हीं वंशोंके अन्तर्गत हैं। उन सातों वंशोंके लोग कर्मनिष्ठ एवं सन्तानवान् हैं। उन वंशोंको बड़े-बड़े ऋषियोंने सुशोभित किया है ॥ ४५ ॥
विद्युतोऽशनिमेघांश्च रोहितेन्द्रधनूंषि च ।
वयांसि च ससर्जादौ पर्जन्यं च ससर्ज ह ॥ ४६ ॥
इसके बाद ब्रह्माजीने पहले विद्युत्, वज्र, मेघ, रोहित (सीधा) इन्द्र-धनुष, पक्षिसमुदाय तथा पर्जन्यकी सृष्टि की ॥ ४६॥
ऋचो यजूंषि सामानि निर्ममे यज्ञसिद्धये ।
मुखाद् देवानजनयत् पितॄंश्चेशोऽपि वक्षसः॥ ४७ ॥
फिर ब्रह्माजीने यज्ञकी सिद्धिके लिये (नित्यसिद्ध) ऋक्, यजुः और सामका आविष्कार किया । फिर
हरिवंशपर्व ] द्वितीयोऽध्यायः ५
ऐश्वर्यशील ब्रह्मा ने अपने मुखसे देवताओंको और वक्षःस्थलसे पितरोंको प्रकट किया ॥ ४७ ॥
प्रजानाच्च मनुष्यान् वै जघनान्निर्ममेऽसुरान् ।
साध्यानजनयद् देवानित्येवमनुशुश्रुम ॥ ४८ ॥
फिर उन्होंने उपस्थेन्द्रियसे मनुष्योंको और जंघाओंसे असुरोंको उत्पन्न किया। तदनन्तर उन्होंने साध्य नामक प्राचीन देवताओंको प्रकट किया, ऐसा हमने सुना है ॥ ४८ ॥
उचावचानि भूतानि गात्रेभ्यस्तस्य जज्ञिरे ।
आपवस्य प्रजासर्गे सृजतो हि प्रजापतेः ॥ ४९ ॥
इस प्रकार प्रजाकी सृष्टि रचते हुए उन आपव (अर्थात् जलमें प्रकट हुए) प्रजापति ब्रह्माके अङ्गोंमेंसे उच्च तथा साधारण श्रेणीके बहुत-से प्राणी प्रकट हुए ॥ ४९ ॥
सृज्यमानाः प्रजा नैव विवर्धन्ते यदा तदा ।
द्विधा कृत्वाऽऽत्मनो देहमर्धेन पुरुषोऽभवत् ॥ ५० ॥
अर्धेन नारी तस्यां स ससृजे विविधाः प्रजाः ।
दिवं च पृथिवीं चैव महिम्ना व्याप्य तिष्ठतः ॥ ५१ ॥
इस प्रकार वे आपव-प्रजापति (मानसिक) प्रजाओंको रच रहे थे; परंतु वे प्रजाएँ जब (अधिक) न बढ़ीं, तब वे अपने शरीरके दो भाग कर, एक भागसे पुरुष और दूसरे भागसे नारी हो गये और (उस नारीने गाय, घोड़ी आदि जिस-जिस रूपको धारण किया, पुरुषने उसी जातिके बैल, घोड़े आदिका रूप धारण किया, ) इस प्रकार उन्होंने उस नारीमें अनेक प्रकारकी मैथुनी-प्रजाओंको रचा। इस प्रकार वे पुरुष और नारी अपनी महिमासे स्वर्ग और पृथ्वीपर व्याप्त हो गये ॥ ५०-५१ ॥
विराजमसृजद् विष्णुः सोऽसृजत् पुरुषं विराट् ।
पुरुषं तं मनुं विद्धि तद् वै मन्वन्तरं स्मृतम् ॥ ५२ ॥
भगवान् विष्णुने विराट् पुरुष (आपव प्रजापति या ब्रह्मा) की सृष्टि की थी और विराट्ने पुरुषकी। उस वैराज पुरुषको तुम मनु समझो (और उनकी स्त्रीको शतरूपा)। मनुके समयको ही मन्वन्तरकाल कहा गया है ॥ ५२ ॥
द्वितीयमापवस्यैतन्मनोरन्तरमुच्यते ।
स वैराजः प्रजासर्गे ससर्ज पुरुषः प्रभुः ।
नारायणविसर्गः स प्रजास्तस्याप्ययोनिजाः ॥ ५३ ॥
आपवपुत्र मनुकी जो यह दूसरी योनिज सृष्टि है, यहीं- से मन्वन्तरका आरम्भ बताया जाता है। इस प्रकार शक्तिशाली वैराज पुरुष (मनु) ने प्रजासर्गकी सृष्टि की। आपव प्रजापतिको नारायणसर्ग कहा गया है (क्योंकि वे नारायण- से ही प्रकट हुए हैं)। उनकी अयौनिजा प्रजा प्रथम सर्ग है (और मनुकी योनिजा प्रजा द्वितीय सर्ग) ॥ ५३ ॥
आयुष्मान् कीर्तिमान् धन्यः प्रजावाञ्छ्रुतवांस्तथा ।
आदिसर्गे विदित्वेमं यथेष्टां गतिमाप्नुयात् ॥ ५४ ॥
जो इस आदि सृष्टिको इस प्रकार जान लेता है, वह आयुष्मान्, कीर्तिमान्, धन्यवादका पात्र, संतानवान् और विद्वान् होता है, उसे इच्छानुसार उत्तम गति प्राप्त होती है ॥ ५४ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि आदिसर्गकथने प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें आदिसृष्टिका वर्णनविषयक पहला अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ॥
द्वितीयोऽध्यायः
स्वायम्भुव मनुके वंश और दक्ष प्रजापतिकी-उत्पत्तिको वर्णन
वैशम्पायन उवाच
| स सृष्ट्वासु प्रजास्वेवमापवो वै प्रजापतिः ।<br>लेभे वै पुरुषः पत्नीं शतरूपामयोनिजाम् ॥ १ ॥ | सा तु वर्षायुतं तप्त्वा तपः परमदुश्वरम् ।<br>भर्तारं दीप्ततपसं पुरुषं प्रत्यपद्यत ॥ ३ ॥ |
| **वैशम्पायनजीने कहा—**जनमेजय ! इस प्रकार (अयोनिन-मानसिक) प्रजाओंकी रचना हो जानेपर वह आपव प्रजापति (ब्रह्मा) ही (अपनी देहके दो भाग करके एक भागसे मनु नामक) पुरुष बन गये और उन्होंने देहके दूसरे भागसे बनी हुई अयोनिया शतरूपाको पत्नीरूपमें स्वीकार किया ॥ | वह शतरूपा दस हजार वर्षोतक परम दुष्कर तप करके (संतानकी कामनासे) तपसे चमकते हुए अपने स्वामी वैराज पुरुषके पास आयीं ॥ ३ ॥ |
| आपवस्य महिम्ना तु दिवमावृत्य तिष्ठतः ।<br>धर्मेणैव महाराज शतरूपा व्यजायत ॥ २ ॥ | स वै स्वायम्भुवस्तात पुरुषो मनुरुच्यते ।<br>तस्यैकसप्ततियुगं मन्वन्तरमिहोच्यते ॥ ४ ॥ |
| महाराज ! अपनी महिमासे द्युलोकको व्याप्त करके स्थित हुए मनुके धर्मसे ही उनकी पत्नी शतरूपाकी उत्पत्ति हुई ॥ २ ॥ | तात ! वे पुरुष ही स्वायम्भुव मनु कहे जाते हैं। उन (के अधिकार) का (सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुगरूप) इकहत्तर चतुर्युगोंका समय इस संसारमें मन्वन्तर कहलाता है (यह मन्वन्तर संध्या और संध्यांशके कारण इकहत्तर चतुर्युगोंसे भी कुछ अधिक समयका होता है ।) ॥ ४ ॥ |
६ श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
वैराजात् पुरुषाद् वीरं शतरूपा व्यजायत ।
प्रियव्रतोत्तानपादौ वीरात् काम्या व्यजायत ॥ ५ ॥
वैराज पुरुष मनुसे उनकी पत्नी शतरूपाने वीर नामक पुत्रको जन्म दिया और वीरसे उनकी पत्नी काम्याने प्रियव्रत तथा उत्तानपादको उत्पन्न किया ॥ ५ ॥
काम्या नाम महाबाहो कर्दमस्य प्रजापतेः ।
काम्यापुत्रांस्तु चत्वारः सम्राट् कुक्षिर्विराट् प्रभुः।
प्रियव्रतं समासाद्य पतिं सा सुपुवे सुतान् ॥ ६ ॥
महाबाहो ! कर्दम प्रजापतिकी एक काम्या नामवाली पुत्री थी, उस काम्याके सम्राट्, कुक्षि, विराट् और प्रभु नामक चार पुत्र उत्पन्न हुए। उस काम्याने प्रियव्रतको पतिरूपमें पाकर इन पुत्रोंको उत्पन्न किया था ॥ ६ ॥
उत्तानपादं जग्राह पुत्रमत्रिः प्रजापतिः ।
उत्तानपादाच्चतुरः सूनृताजनयत् सुतान् ॥ ७ ॥
प्रजापति अत्रिने उत्तानपादको पुत्ररूपमे ग्रहण कर लिया। उत्तानपादसे उनकी पत्नी सूनृताने चार पुत्रोंको उत्पन्न किया ॥ ७ ॥
धर्मस्य कन्या सुश्रोणी सूनृता नाम विश्रुता ।
उत्पन्ना वाजिमेधेन ध्रुवस्य जननी शुभा ॥ ८ ॥
धर्मकी एक सूनृता नामसे प्रसिद्ध सुन्दर कटिवाली पुत्री थी, वह धर्मके यहाँ अश्वमेध यज्ञसे प्रकट हुई थी, यही कल्याणकारिणी सूनृता ध्रुवकी माता थी ॥ ८ ॥
ध्रुवं च कीर्तिमन्तं च शिवं शान्तमयस्पतिम् ।
उत्तानपादोऽजनयत् सूनृतायां प्रजापतिः ॥ ९ ॥
प्रजापति उत्तानपादने सूनृता नामवाली पत्नीमें ध्रुव, कीर्तिमान्, शान्तस्वरूप शिव और अयस्पति नामक पुत्रको उत्पन्न किया था ॥ ९ ॥
ध्रुवो वर्षसहस्राणि त्रीणि दिव्यानि भारत ।
तपस्तेपे महाराज प्रार्थयन् सुमहद् यशः ॥ १० ॥
भरतवंशी महाराज ! ध्रुवने जिनका नाम महायश* है, उन भगवान् नारायणको पानेकी इच्छासे तीन हजार दिव्य† वर्षोंतक तप किया था ॥ १० ॥
तस्मै ब्रह्मा ददौ प्रीतः स्थानमप्रतिमं भुवि ।
अचलं चैव पुरतः सप्तर्षीणां प्रजापतिः ॥ ११ ॥
प्रजापालक भगवान् ब्रह्मा (विष्णु) ने ध्रुवपर प्रसन्न होकर उनको सप्तर्षियोंके सम्मुख एक अलौकिक, अचल स्थान प्रदान किया ॥ ११ ॥
तस्यातिमात्रां समृद्धिं च महिमानं निरीक्ष्य च ।
देवासुराणामाचार्यः श्लोकमप्युशना जगौ ॥ १२ ॥
ध्रुवकी बड़ी भारी समृद्धि और महिमाको देखकर देवता* और असुरोंके आचार्य शुक्राचार्यने इस श्लोकका गान किया—॥
अहोऽस्य तपसो वीर्यमहो श्रुतमहो बलम् ।
यदेनं पुरतः कृत्वा ध्रुवं सप्तर्षयः स्थिताः ॥ १३ ॥
'इन ध्रुवके तपोबलको देखकर आश्चर्य होता है, इनका शास्त्रज्ञान भी विस्मयविमुग्ध कर देता है और इनकी शक्ति भी अद्भुत है, तभी तो ये सप्तर्षि भी इनको अपने आगे स्थापित करके स्थित हैं' ॥ १३ ॥
तस्माच्छ्लिष्टिश्च भव्यं च ध्रुवाच्छम्भुर्व्यजायत ।
श्लिष्टेराधत्त सुच्छाया पञ्च पुत्रानकल्मषान् ॥ १४ ॥
रिपुं रिपुञ्जयं पुण्यं वृकलं वृकतेजसम् ।
रिपोराधत्त बृहती चाक्षुषं सर्वतेजसम् ॥ १५ ॥
उन ध्रुवसे शम्भु नामवाली स्त्रीने श्लिष्ट तथा भव्य नामक पुत्रोंको उत्पन्न किया। श्लिष्टसे सुच्छाया (नामकी पत्नी) ने रिपु, रिपुञ्जय, पुण्य, वृकल और वृकतेजा—पाँच निष्पाप पुत्रोंको उत्पन्न किया। रिपुसे उनकी बृहती नामकी पत्नीने सब देवताओंके तेजसे परिपूर्ण चाक्षुष नामक पुत्रको उत्पन्न किया ॥ १४-१५ ॥
अजीजनत् पुष्करिण्यां वीरण्यां चाक्षुषो मनुम् ।
प्रजापतेरात्मजायामरण्यस्य महात्मनः ॥ १६ ॥
मनोरजायन्त दश नड्वलायां महौजसः ।
कन्यायामभवच्छ्रेष्ठा वैराजस्य प्रजापतेः ॥ १७ ॥
चाक्षुषने वीरणकी पुत्री पुष्करिणीके गर्भसे मनु नामक पुत्रको उत्पन्न किया। वैराज प्रजापतिके वंशमें उत्पन्न हुए इन परम तेजस्वी मनुसे महात्मा अरण्यकी पुत्री नड्वलामें दस श्रेष्ठ पुत्र उत्पन्न हुए ॥ १६-१७ ॥
ऊरुः पुरुः शतद्युम्नस्तपस्वी सत्यवान् कविः ।
अग्निष्टुदतिरात्रश्च सुद्युम्नश्चेति ते नव ॥ १८ ॥
अभिमन्युश्च दशमो नड्वलायाः सुताः स्मृताः।
ऊरोजनयत् पुत्रान् षडाग्नेयी महाप्रभान् ।
अङ्गं सुमनसं ख्यातिं क्रतुमङ्गिरसं गयम् ॥ १९ ॥
ऊरु, पुरु, शतद्युम्न, तपस्वी, सत्यवान्, कवि, अग्निष्टुत्, अतिरात्र और सुद्युम्न—ये नौ और दसवाँ अभिमन्यु, ये नड्वलाके पुत्र कहे जाते हैं। ऊरुसे अग्निकी कन्याने अङ्ग, सुमना, ख्याति, क्रतु, अङ्गिरा और गय नामक उत्तम कान्तिवाले छः पुत्रोंको उत्पन्न किया था ॥ १८-१९ ॥
* यस्य नाम महत् यशः । (महानारायणोपनिषद् १ । १०)
† मनुष्योंका एक वर्ष देवताओंका एक दिव्य दिन होता है।
* मैत्रायणीय-उपनिषद्में कहा है कि इन्द्रको अभय देनेके लिये और असुरोंका क्षय करनेके लिये बृहस्पति ही दूसरे शरीरसे शुक्रके रूपमें प्रकट हो गये और उन्होंने अविद्याको रचकर असुरोंको मोहमें डाल रखा है।
हरिवंशपर्व ] द्वितीयोऽध्यायः
अङ्गात् सुनीथापत्यं वै वेनमेकमजायत ।
अपचारात् तु वेनस्य प्रकोपः सुमहानभूत् ॥ २० ॥
अङ्गसे (मृत्युकी पुत्री) सुनीथाने वेन नामक एक पुत्रको उत्पन्न किया था। वेन अत्याचारी था (देवता, धर्म आदिसे द्रोह रखता था), अतएव ऋषियोंको उसपर बड़ा क्रोध आया॥ २०॥
प्रजार्थमृषयो यस्य ममन्थुर्दक्षिणं करम् ।
वेनस्य पाणौ मथिते बभूव मुनिभिः पृथुः ॥ २१ ॥
(ऋषियोंके कोपसे नष्ट हुए) वेनके दाहिने हाथको मुनियोंने संतान उत्पन्न करनेके लिये मथा, तब मुनियोंके मथे हुए वेनके दाहिने हाथसे पृथुकी उत्पत्ति हुई ॥ २१ ॥
तं दृष्ट्वा ऋषयः प्राहुर्हेषा वै मुदिताः प्रजाः ।
करिष्यति महातेजा यशश्च प्राप्स्यते महत् ॥ २२ ॥
ऋषियोंने उसको देखकर कहा—‘यह पृथु प्रजाओंको प्रसन्न करेगा और इस महातेजस्वीको उत्तम यशकी प्राप्ति होगी’ ॥ २२ ॥
स धन्वी कवची खङ्गी तेजसा निर्दहन्निव ।
पृथुर्वैन्यस्तदा चेमां ररक्ष क्षत्रपूर्वजः ॥ २३ ॥
तब वे क्षत्रिय-जातिमें प्रथम उत्पन्न हुए वेनके पुत्र पृथु धनुष, कवच और तलवार धारण कर अपने तेजसे (डाकू, अधर्मी आदि दुष्ट पुरुषोंको) भस्म-सा करते हुए इस पृथ्वीकी रक्षा करने लगे ॥ २३ ॥
राजसूयाभिषिक्तानामाद्यः स वसुधाधिपः ।
तस्माच्चैव समुत्पन्नौ निपुणौ सूतमागधौ ॥ २४ ॥
पृथु राजसूय यज्ञमें अभिषिक्त होनेवाले राजाओंमें प्रथम भूपति हैं। (उन्हींके यज्ञमें अग्निसे राजाओंकी स्तुति करनेमे) चतुर सूत तथा (राजाओंकी वंशावली पढ़नेमें) प्रवीण मागध प्रकट हुए थे ॥ २४ ॥
तेनेयं गौर्महाराज दुग्धा सस्यानि भारत ।
प्रजानां वृत्तिकामेन देवैः सर्षिगणैः सह ॥ २५ ॥
भरतवंशी महाराज ! प्रजाओंको आजीविका देनेकी इच्छावाले पृथुने देवता और ऋषियोंकी मण्डलियोंको साथमें ले गौरूपिणी पृथ्वीसे अन्न (आदि सकल वस्तुओं) को दुहा था॥
पितृभिर्दानवैश्चैव गन्धर्वैः साप्सरोगणैः ।
सर्पैः पुण्यजनैश्चैव वीरुद्भिः पर्वतैस्तथा ॥ २६ ॥
तेषु तेषु च पात्रेषु दुह्यमाना वसुन्धरा ।
प्रादाद् यथेप्सितं क्षीरं तेन प्राणानधारयन् ॥ २७ ॥
(पृथुके समय) पितर, दानव, गन्धर्व, अप्सरा, सर्प, यक्ष, वृक्ष और पर्वतोंने अपने-अपने पात्रों*में दुहा था। पृथ्वीने उनको इच्छानुसार दूध दिया था और उस दूधसे उन सबने अपने प्राणोंको धारण किया था ॥ २६-२७ ॥
* उनके कैसे-कैसे पात्र थे, कैसे-कैसे बछड़े थे और उन्होंने कौन-कौन-सा दूध दुहा था, इसका विस्तृत वर्णन आगे ५ वें अध्यायमें आयेगा।
पृथुपुत्रौ तु धर्मज्ञौ जज्ञातेऽन्तर्द्धिपालितौ ।
शिखण्डिनी हविर्धानमन्तर्धानाद् व्यजायत ॥ २८ ॥
पृथुके अन्तर्धान और पालित—ये दो धर्मज्ञ पुत्र हुए और अन्तर्धानसे शिखण्डिनीने हविर्धान नामक पुत्रको उत्पन्न किया ॥ २८ ॥
हविर्धानात् षडाग्नेयी धिषणाजनयत् सुतान् ।
प्राचीनबर्हिषं शुक्रं गयं कृष्णं व्रजाजिनौ ॥ २९ ॥
हविर्धानसे अग्निकी पुत्री धिषणाने प्राचीनबर्हि, शुक्र, गय, कृष्ण, व्रज और अजिन नामवाले छः पुत्रोंको उत्पन्न किया ॥ २९ ॥
प्राचीनबर्हिर्भगवान् महानासीत् प्रजापतिः ।
हविर्धानान्महाराज येन संवर्द्धिताः प्रजाः ॥ ३० ॥
महाराज ! भगवान्* प्राचीनबर्हि, जिन्होंने प्रजाओंका पालन एवं संवर्धन किया था, अपने पिता हविर्धानसे बढ़कर प्रजापालक हुए ॥ ३० ॥
प्राचीनाग्राः कुशास्तस्य पृथिव्यां जनमेजय ।
प्राचीनबर्हिर्भगवान् पृथिवीतलचारिणः ॥ ३१ ॥
जनमेजय ! उनके यज्ञ करते समय बिछे हुए प्राचीनाग्र कुश समस्त भूमण्डलपर फैलकर उनके महत्त्वको प्रकट कर रहे थे, अतएव उनका नाम भगवान् प्राचीनबर्हि है ॥ ३१ ॥
समुद्रतनयायां तु कृतदारोऽभवत् प्रभुः ।
महत्तस्तपसः पारे सवर्णायां महीपतिः ॥ ३२ ॥
महीपति प्रभु प्राचीनबर्हिने बड़ा भारी तप करनेके पश्चात् समुद्रकी पुत्री सवर्णाके साथ विवाह किया ॥ ३२ ॥
सवर्णाऽऽधत्त सामुद्री दश प्राचीनबर्हिषः ।
सर्वे प्रचेतसो नाम धनुर्वेदस्य पारगाः ॥ ३३ ॥
प्राचीनबर्हिसे समुद्रकी पुत्री सवर्णानि दस पुत्र उत्पन्न किये, उन दसोंका ‘प्रचेता’ यह एक ही नाम था। वे सब धनुर्वेदके पारगामी थे ॥ ३३ ॥
अपृथग्धर्मचरणास्तेऽतप्यन्त महत्तपः ।
दशवर्षसहस्राणि समुद्रसलिलेशयाः ॥ ३४ ॥
वे सब प्रचेतागण एक साथ समान धर्म-कर्मका आचरण करते थे और एक-से शीलवाले थे, उन्होंने समुद्रके जलमें प्रवेश करके दस हजार वर्षोंतक बड़ी भारी तपस्या की ॥३४॥
* ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसः श्रियः ।
ज्ञानवैराग्ययोश्चैव षण्णां भग इतीरणा ॥
पूर्ण ऐश्वर्य, धर्म, यश, लक्ष्मी, ज्ञान और वैराग्यका नाम भग है। ये छः वस्तुएँ जिनमें पूर्णरूपसे हों ऐसे योगी महात्मा आदिके साथ भी भगवान् शब्दका प्रयोग किया जा सकता है।
| ८ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
तपश्वरत्सु पृथिवीं प्रचेतःसु महीरुहाः।
अरक्ष्यमाणामवावृण्वन्बभूवाथ प्रजाक्षयः ॥ ३५ ॥
जब प्रचेतागण तप कर रहे थे, तब अरक्षित पड़ी हुई पृथ्वीको वृक्षोंने चारों ओरसे ढक दिया, इससे प्रजाओंका नाश होने लगा ॥ ३५ ॥
नाशकन्मारुतो वातुं वृतं खमभवद् द्रुमैः।
दशवर्षसहस्राणि न शेकुश्चेष्टितुं प्रजाः ॥ ३६ ॥
दस हजार वर्षोंमें वृक्षोंने आकाशतकको घेर लिया, तब वायुका चलना बंद हो गया और प्रजाओंका चेष्टा करना (हाथ-पैर हिलाना) भी बंद होने लगा ॥ ३६ ॥
तदुपश्रुत्य तपसा युक्ताः सर्वे प्रचेतसः।
मुखेभ्यो वायुमग्निं च तेऽसृजञ्जातमन्यवः ॥ ३७ ॥
अपनी तपस्या (ज्ञानदृष्टि) से इन सब बातोंको जानकर सब प्रचेता इसका उपाय करनेके लिये उद्यत हो गये और उन्होंने क्रोधमें भरकर अपने मुखोंसे वायु और अग्निको प्रकट किया ॥ ३७ ॥
उन्मूलानथ तान् कृत्वा वृक्षान् वायुरशोषयत्।
तानग्निरदहद्धोरं एवमासीद् द्रुमक्षयः ॥ ३८ ॥
वायुने वृक्षोंको जड़से उखाड़कर उनको सुखा दिया, तब अग्नि प्रचण्ड होकर उन वृक्षोंको जलाने लगी, इस प्रकार वृक्षोंका नाश होने लगा ॥ ३८ ॥
द्रुमक्षयमथो बुद्ध्वा किंचिच्छिष्टेषु शाखिषु।
उपगम्याब्रवीदेतान् राजा सोमः प्रजापतीन् ॥ ३९ ॥
इस प्रकार जलते-जलते जब कुछ ही वृक्ष बाकी बचे, तब वृक्षोंके संहारकी बातको जानकर इन वृक्षोंके राजा सोम प्रजापति प्रचेताओंके पास जाकर बोले— ॥ ३९ ॥
कोपं यच्छत राजानः सर्वे प्राचीनबर्हिषः।
वृक्षशून्या कृता पृथिवी शाम्यतामग्निमारुतौ ॥ ४० ॥
'प्राचीनबर्हिके पुत्र प्रचेताओ! तुमने तो पृथ्वीको वृक्षोंसे शून्य ही कर डाला। राजाओ! अब अपने क्रोधको रोको तथा इन अग्नि और पवनको शान्त करो ॥ ४० ॥
रत्नभूता च कन्येयं वृक्षाणां वरवर्णिनी।
भविष्यं जानता तत्त्वं धृता गर्भेण वै मया ॥ ४१ ॥
'यह वृक्षोंकी रत्नस्वरूपा सुन्दरी कन्या है। मैंने भविष्यके तत्त्वको जानकर इसे अपने गर्भमें स्थापित कर लिया था * ॥ ४१ ॥
मारिषा नाम कन्येयं वृक्षाणामिति निर्मिता।
भार्या वोऽस्तु महाभागाः सोमवंशविवर्द्धिनी ॥ ४२ ॥
'यह मारिषा नामवाली कन्या वृक्षोंके वीर्य अर्थात् सारांशसे रची गयी है। महाभाग! इस सोमवंशकी वृद्धि करनेवाली वृक्षोंकी कन्याको तुम भार्यारूपमें ग्रहण करो ॥ ४२ ॥
युष्माकं तेजसोऽर्द्धेन मम चार्द्धेन तेजसः।
अस्यामुत्पत्स्यते पुत्रो दक्षो नाम प्रजापतिः ॥ ४३ ॥
'तुम्हारे और मेरे दोनोंके तेजके आधे-आधे भागके द्वारा इस कन्याके गर्भसे एक पुत्र उत्पन्न होगा, जिसका नाम होगा—दक्ष प्रजापति ॥ ४३ ॥
य इमां दग्धभूयिष्ठां युष्मत्तेजोमयेन वै।
अग्निनाग्निसमो भूयः प्रजाः संवर्धयिष्यति ॥ ४४ ॥
'तुम्हारे तपरूपी अग्निसे अग्निके समान ही प्रतापी वह दक्ष अधिकांश जली हुई इस पृथ्वीपर फिर प्रजाओंकी वृद्धि करेगा' ॥ ४४ ॥
ततः सोमस्य वचनाज्जगृहुस्ते प्रचेतसः।
संहृत्य कोपं वृक्षेभ्यः पत्नीं धर्मेण मारिषाम् ॥ ४५ ॥
चन्द्रमाके इस प्रकार कहनेपर उन प्रचेताओंने वृक्षोंकी ओरसे अपने क्रोधको समेट लिया और मारिषाको विवाहरूपी धर्मके द्वारा पत्नीरूपमें ग्रहण कर लिया ॥ ४५ ॥
मारिषायां ततस्ते वै मनसा गर्भमादधुः।
दशभ्यस्तु प्रचेतोभ्यो मारिषायां प्रजापतिः।
दक्षो जज्ञे महातेजाः सोमस्यांशेन भारत ॥ ४६ ॥
तदनन्तर उन प्रचेताओंने अपने मनसे मारिषामें गर्भ स्थापित किया। भरतवंशी राजन्! इस प्रकार चन्द्रमाके अंशसे दस प्रचेताओंके द्वारा मारिषाके गर्भसे महातेजस्वी दक्ष प्रजापति उत्पन्न हुए ॥ ४६ ॥
पुत्रानुत्पादयामास सोमवंशविवर्धनान्।
अचरांश्च चरांश्चैव द्विपदोऽथ चतुष्पदः।
स दृष्ट्वा मनसा दक्षः पश्चादप्यसृजत् स्त्रियः ॥ ४७ ॥
तब उन दक्षप्रजापतिने चन्द्रमाके वंशको बढ़ानेवाले पुत्र उत्पन्न किये और स्थावर, जङ्गम, दो पैरवाले, चार पैरवाले रचनेयोग्य प्राणियोंकी सृष्टिके लिये मनमें विचारकर पीछे स्त्रियोंकी भी रचना की ॥ ४७ ॥
* वायुने वृक्षोंको सुखाते समय उनका जलीय सारांश जलके कारण सूर्यमें पहुँचा दिया, इसी प्रकार पृथ्वीका सारभूत अंश जलमय चन्द्रमामें पहुँचा दिया। इस प्रकार कन्यारूप वृक्षोंका वीर्य सोमने अपने गर्भमें धारण कर लिया, यह बात ठीक ही है।
'वृष्टिर्वै वृष्टा चन्द्रमसमनु प्रविशति—वृष्टि बरसकर चन्द्रमामें प्रविष्ट हो जाती है' इस श्रुतिसे भी ओषधियोंके साररूपसे वृष्टिका चन्द्रमामें प्रवेश करना सिद्ध होता है। इस प्रकार चन्द्रमाका यह वचन ठीक ही है कि 'मैंने इस वृक्षोंकी कन्याको अपने गर्भमें धारण कर लिया था।'
हरिवंशपर्व ] तृतीयोऽध्यायः ९
ददौ स दश धर्माय कश्यपाय त्रयोदश।
शिष्टाः सोमाय राज्ञेऽथ नक्षत्राख्या ददौ प्रभुः॥ ४८॥
प्रभु दक्षने उनमेंसे दस कन्याएँ धर्मको, तेरह कन्याएँ कश्यपको और शेष बची हुई नक्षत्रसम्बन्धी नामवाली सत्ताईस कन्याएँ राजा चन्द्रमाको दे दीं ॥ ४८ ॥
तासु देवाः खगा नागा गावो दितिजदानवाः।
गन्धर्वाप्सरसश्चैव जज्ञिरेऽन्याश्च जातयः ॥ ४९ ॥
उन कन्याओंसे देवता, पक्षी, सर्प, गौएँ, दैत्य-दानव-गन्धर्व, अप्सराएँ तथा अन्य जातियोंके प्राणी उत्पन्न हुए ॥ ४९ ॥
ततः प्रभृति राजेन्द्र प्रजा मैथुनसम्भवाः।
संकल्पाद् दर्शनात् स्पर्शात् पूर्वेषां सृष्टिरुच्यते॥ ५० ॥
राजेन्द्र ! तभीसे प्रजाएँ मैथुनद्वारा उत्पन्न होने लगीं । इससे पहले प्राणियोंकी उत्पत्ति संकल्प,* दर्शन और स्पर्शसे होती थी—ऐसा कहा जाता है ॥ ५० ॥
जनमेजय उवाच
देवानां दानवानां च गन्धर्वोरगरक्षसाम् ।
सम्भवः कथितः पूर्वं दक्षस्य च महात्मनः ॥ ५१ ॥
जनमेजयने कहा--मुने ! आपने पहले भी देवता, दानव, गन्धर्व, सर्प और राक्षस तथा महात्मा दक्षकी उत्पत्तिका वर्णन किया है ॥ ५१ ॥
अङ्गुष्ठाद् ब्रह्मणो जातो दक्षः प्रोक्तस्त्वयानघ।
वामाङ्गुष्ठात् तथा चैव तस्य पत्नी व्यजायत ॥ ५२ ॥
निष्पाप महर्षे ! वहाँ आपने कहा है कि ब्रह्माजीके (दाहिने) अंगूठेसे दक्ष प्रजापति उत्पन्न हुए और ब्रह्माजीके बायें अंगूठेसे दक्षकी पत्नी उत्पन्न हुईं ॥ ५२ ॥
कथं प्राचेतसत्वं स पुनर्लेभे महातपाः।
एतन्मे संशयं विप्र सम्यगाख्यातुमर्हसि ।
दौहित्रश्चैव सोमस्य कथं श्वशुरतां गतः ॥ ५३ ॥
वे महातपस्वी दक्ष फिर प्रचेताओँके पुत्र कैसे हुए ? चन्द्रमाके नाती दक्ष फिर उनके श्वशुर कैसे बन गये ? विप्रवर ! मेरे इन संदेहोंको भली प्रकार व्याख्या करके आप दूर कर दीजिये ॥ ५३ ॥
वैशम्पायन उवाच
उत्पत्तिश्च निरोधश्च नित्यौ भूतेषु पार्थिव ।
ऋषयोऽत्र न मुह्यन्ति विद्वांसश्चैव ये जनाः ॥ ५४ ॥
वैशम्पायनजीने कहा—पृथ्वीनाथ ! जन्म और मृत्यु—ये समस्त प्राणियोंके लिये नित्य ( स्वाभाविक ) हैं। इस विषयमें ऋषियोंको कभी मोह नहीं होता । जो विद्वान् पुरुष हैं, वे भी इस विषयमें मोहित नहीं होते ॥ ५४ ॥
युगे युगे भवन्त्येते सर्वे दक्षादयो नृप ।
पुनश्चैव निरुध्यन्ते विद्वांस्तत्र न मुह्यति ॥ ५५ ॥
नरेश्वर ! ये दक्ष आदि सब लोग प्रत्येक युगमें उत्पन्न होते और मरते रहते हैं, अतः विद्वान् पुरुष इस विषयमें मोहको नहीं प्राप्त होते हैं ॥ ५५ ॥
ज्यैष्ठ्यं कनिष्ठत्वमप्येषां पूर्वं नासीज्जनाधिप।
तप एव गरीयोऽभूत् प्रभावश्चैव कारणम् ॥ ५६ ॥
राजन् ! पहले इनमें ज्येष्ठता और कनिष्ठताका अर्थात् पहले-पीछे उत्पन्न होनेका कोई विचार नहीं था, तप ही इनकी दृष्टिमें गरिष्ठ था और प्रभाव ही इनमें सम्बन्ध होनेका कारण होता था ॥ ५६ ॥
इमां विसृष्टिं दक्षस्य यो विद्यात् सचराचराम् ।
प्रजावानापदुत्तीर्णः स्वर्गलोके महीयते ॥ ५७ ॥
जो मनुष्य चर तथा अचर प्राणियोंसहित इस दक्ष प्रजापतिकी सृष्टिके तत्त्वको जानता है, वह संतानवान् होता है और आपत्तियोंके पार हो स्वर्गमें प्रतिष्ठा-पूर्वक रहता है ॥ ५७ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि प्रजासर्गे दक्षोत्पत्तिकथने द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें प्रजासर्गके प्रसंगमें दक्षकी उत्पत्तिका वर्णनविषयक दूसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ २ ॥
तृतीयोऽध्यायः
दक्ष प्रजापतिद्वारा सृष्टि-विस्तार, नारदजीका दक्षके पुत्रोंको विरक्त कर देना, दक्षकी साठ कन्याओं और उनकी संततिका वर्णन
| जनमेजय उवाच <br> देवानां दानवानां च गन्धर्वोरगरक्षसाम् । <br> उत्पत्तिं विस्तरेणेमां वैशम्पायन कीर्तय ॥ १ ॥ | जनमेजयने कहा—वैशम्पायनजी ! आप इस देवता, दानव, गन्धर्व, सर्प और राक्षसोंकी उत्पत्तिको विस्तारपूर्वक कहिये ॥ १ ॥ |
* उन दस प्रचेताओँके एक ही औरस पुत्र कैसे हुआ ? इस शङ्काका उत्तर इस श्लोकके संकल्प शब्दसे मिलता है । अर्थात् उन दसोंका संकल्प एक-सा था, अतः उनके एक ही औरस पुत्र हुआ ।
१० श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे
वैशम्पायन उवाच
प्रजाः सृजेति व्यादिष्टः पूर्वं दक्षः स्वयम्भुवा।
यथा ससर्ज भूतानि तथा शृणु महीपते ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी बोले--राजन् ! पहले स्वयम्भू ब्रह्माजीने दक्षको आज्ञा दी कि 'तुम प्रजाओंकी सृष्टि करो'। उस समय दक्षने (जरायुज आदि) प्राणियोंकी सृष्टि जिस प्रकार की थी, उसे सुनो ॥ २ ॥
मानसान्येव भूतानि पूर्वमेवासृजत् प्रभुः।
ऋषीन् देवान् सगन्धर्वांस्तुरगानथ राक्षसान्।
यक्षभूतपिशाचांश्च वयःपशुसरीसृपान् ॥ ३ ॥
प्रभु दक्षने पहले ऋषि, देवता, गन्धर्व, असुर, राक्षस, यक्ष, भूत, पिशाच, पशु, पक्षी और सर्पोंकी मानसी सृष्टि रची अर्थात् इनको अपने संकल्पमात्रसे ही उत्पन्न कर दिया ॥
यदास्य तास्तु मानस्यो न व्यवर्द्धन्त वै प्रजाः।
अपध्याता भगवता महादेवेन धीमता ॥ ४ ॥
ततः संचिन्त्य तु पुनः प्रजाहतोः प्रजापतिः।
स मैथुनेन धर्मेण सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः ॥ ५ ॥
असिक्नीमावहत् पत्नीं वीरणस्य प्रजापतेः।
सुतां सुतपसा युक्तां महतीं लोकधारिणीम् ॥ ६ ॥
परंतु (पूर्वकल्पके वैरको स्मरणकर) बुद्धिमान् भगवान् महादेवने जब यह विचार किया कि दक्षकी मानसी प्रजाएँ न बढ़ें, और तदनुसार जब उनकी मनसे उत्पन्न की हुई प्रजाएँ अधिक उन्नति न कर सकीं, तब दक्ष प्रजापति विचारमें पड़ गये और फिर उन्होंने प्रजाकी वृद्धि करनेके लिये मैथुनधर्मसे अनेक प्रकारकी प्रजाओंको रचनेका विचार किया। इस विचारके अनुसार वे परम तप करनेके कारण संसारको धारण करनेमें समर्थ वीरण प्रजापतिकी महामहिम पुत्री असिक्नीको पत्नीरूपमें विवाह कर लाये ॥ ४-६ ॥
अथ पुत्रसहस्राणि वीरण्यां पञ्च वीर्यवान्।
असिक्न्यां जनयामास दक्ष एव प्रजापतिः ॥ ७ ॥
इसके बाद वीर्यवान् दक्ष प्रजापतिने वीरणकी पुत्री असिक्नीमें पाँच हजार पुत्रोंको उत्पन्न किया ॥ ७ ॥
तांस्तु दृष्ट्वा महाभागान् संविवर्धयिषून् प्रजाः।
देवर्षिः प्रियसंचारो नारदः प्राब्रवीदिदम्।
नाशाय वचनं तेषां शापायैवात्मनस्तथा ॥ ८ ॥
परंतु उन महाभाग्यवान् दक्षपुत्रोंको प्रजाकी वृद्धि करनेके लिये उत्सुक देख प्रियवादी देवर्षि नारदजीने उनको (ज्ञानका अधिकारी समझकर आत्मज्ञानका) उपदेश दिया। नारदजीके उस वचनसे दक्षपुत्र नष्ट हो गये (अथवा उनकी संसारमें आसक्ति नष्ट हो गयी), परंतु नारदजीका यह ज्ञानोपदेश देना स्वयं शाप पानेमें ही एक कारण बन गया ॥ ८ ॥
यं कश्यपः सुतवरं परमेष्ठी व्यजीजनत्।
दक्षस्य वै दुहितरि दक्षशापभयान्मुनिः ॥ ९ ॥
ब्रह्माजीने जिन श्रेष्ठ पुत्र नारदको उत्पन्न किया था, उनको ही कश्यप मुनिने दक्षके शापके भयसे (दक्षकी पत्नीकी छोटी बहिन अतएव) उनकी (पुत्रीके समान) कन्यामें उत्पन्न किया था ॥ ९ ॥
पूर्वं स हि समुत्पन्नो नारदः परमेष्ठिना।
असिक्न्यामथ वीरण्यां भूयो देवर्षिसत्तमः।
तं भूयो जनयामास पितेव मुनिपुङ्गवम् ॥ १० ॥
नारदजी पहले ब्रह्माजीसे उत्पन्न हुए थे, फिर वे ही देवर्षिसत्तम नारद वीरणकी पुत्री असिक्नी (की छोटी बहिन) में उत्पन्न हुए थे। उन मुनिपुङ्गव नारदजीको कश्यपने ब्रह्माजीके समान ही फिर प्रकट किया था ॥ १० ॥
तेन दक्षस्य पुत्रा वै हर्यश्वा इति विश्रुताः।
निर्मथ्य नाशिताः सर्वे विधिना च न संशयः ॥ ११ ॥
(इस घटनाको स्पष्ट करते हैं--) दक्षके हर्यश्व नामसे प्रसिद्ध (जो पाँच हजार) पुत्र थे, नारदजीने उनको शास्त्रोक्त रीतिसे देहाभिमानसे मुक्त कर इस संसारसे नष्ट कर दिया था (अर्थात् वे सब नारदजीसे चेतावनी पाकर संसारको त्याग परमात्माकी खोज करनेके लिये वनमें चले गये), इसमें कुछ संदेह नहीं है ॥ ११ ॥
तस्योद्यतस्तदा दक्षो नाशायमितविक्रमः।
महर्षीन् पुरतः कृत्वा याचितः परमेष्ठिना ॥ १२ ॥
तब अनुपम पराक्रमी दक्ष प्रजापति नारदजीको नष्ट करनेके लिये उद्यत हो गये। उस समय ब्रह्माजीने मरीचि आदि महर्षियोंके साथ जाकर दक्षसे ऐसा न करनेके लिये प्रार्थना की ॥
ततोऽभिसंधिं चक्रुस्ते दक्षस्तु परमेष्ठिना।
कन्यायां नारदो मह्यं तव पुत्रो भवेदिति ॥ १३ ॥
तब महर्षियोंने दक्ष और ब्रह्माजीमें संधि करा दी। दक्षने कहा कि 'आपका पुत्र नारद मेरी पुत्री (अर्थात् छोटी साली) का पुत्र बनकर उत्पन्न हो' ॥ १३ ॥
ततो दक्षस्तु तां प्रादात् कन्यां वै परमेष्ठिने।
स तस्यां नारदो जज्ञे दक्षशापभयादृषिः ॥ १४ ॥
तब दक्षने प्रजापति कश्यपको (तेरह कन्याएँ अर्पण करते समय) उस कन्याका दान कर दिया था। इस प्रकार दक्षके शापके भयसे नारद ऋषि उस कन्यासे फिर उत्पन्न हुए थे ॥
जनमेजय उवाच
कथं विनाशिताः पुत्रा नारदेन महर्षिणा।
प्रजापतेर्द्विजश्रेष्ठ श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ १५ ॥
हरिवंशपर्व ] तृतीयोऽध्यायः ११
**जनमेजयन पृच्छा—**द्विजश्रेष्ठ ! महर्षि नारदने प्रजापति दक्षके पुत्रोंको किस प्रकार नष्ट किया था ? इसको मैं स्पष्ट-रूपसे सुनना चाहता हूँ ॥ १५ ॥
वैशम्पायन उवाच
दक्षस्य पुत्रा हर्यश्वा विवर्धयिषवः प्रजाः ।
समागता महावीर्या नारदस्तानुवाच ह ॥ १६ ॥
**वैशम्पायनजीने कहा—**राजन् ! दक्षके हर्यश्व नामक पुत्र महावीर्यवान् थे, जब वे प्रजाओंकी वृद्धिका विचार करनेके लिये उद्यत हुए, तब नारदजीने उनसे कहा—॥ १६ ॥
बालिशा बत यूयं वै नास्या जानीथ वै भुवः ।
प्रमाणं स्रष्टुकामाः स्म प्रजाः प्राचेतसात्मजाः ।
अन्तरूर्ध्वमधश्चैव कथं स्रक्ष्यथ वै प्रजाः ॥ १७ ॥
‘प्राचेतस (दक्ष) के पुत्रो ! खेदके साथ कहना पड़ता है कि तुम बड़े नादान हो। तुम्हें प्रजाकी सृष्टि करनेकी इच्छा हुई है; किंतु तुम इतना भी नहीं जानते कि जहाँ सृष्टि करनी है, उस पृथ्वीकी लंबाई-चौड़ाई कितनी है ? यह ऊपर-नीचे और भीतरसे कैसी है ? ऐसी दशामें तुमलोग प्रजाओंकी सृष्टि कैसे करोगे ?’ ॥ १७ ॥
ते तु तद्वचनं श्रुत्वा प्रयाताः सर्वतोदिशम् ।
प्रमाणं द्रष्टुकामास्ते गताः प्राचेतसात्मजाः ॥ १८ ॥
नारदजीकी इस बातको सुनकर वे प्राचेतस दक्षके पुत्र (इस पृथ्वीका) प्रमाण अर्थात् माप देखनेके लिये सब दिशाओंकी ओर चल दिये ॥ १८ ॥
वायोरनशनं प्राप्य गतास्ते वै पराभवम् ।
अद्यापि न निवर्तन्ते समुद्रेभ्य इवापगाः ॥ १९ ॥
प्राणवायुके लिये आहार न पाकर वे सबके सब पराभव (विनाश) को प्राप्त हो गये। जैसे नदियाँ समुद्रमें मिल जानेपर फिर वहाँसे पीछे नहीं लौटती हैं, उसी प्रकार वे जाकर अबतक नहीं लौटे ॥ १९ ॥
हर्यश्वेष्वथ नष्टेषु दक्षः प्राचेतसः पुनः ।
वैरण्यामेव पुत्राणां सहस्रमसृजत् प्रभुः ॥ २० ॥
प्रचेताओँके पुत्र प्रभु दक्षने हर्यश्वोंके नष्ट हो जानेपर वैरण-की पुत्रीमे ही फिर सहस्र पुत्रोंको उत्पन्न किया ॥ २० ॥
विवर्धयिषवस्ते तु शबलाश्वाः प्रजास्तदा ।
पूर्वोक्तं वचनं तात नारदेनैव नोदिताः ॥ २१ ॥
तात ! वे दक्षके पुत्र शबलाश्व जब प्रजाकी वृद्धिके लिये इच्छुक हुए, तब नारदजीने पूर्वोक्त वचन कहकर उनको भी पृथ्वीका प्रमाण जाननेके लिये प्रेरित किया ॥ २१ ॥
अन्योन्यमूचुस्ते सर्वे सम्यगाह महामुनिः ।
भ्रातॄणां पदवीं ज्ञातुं गन्तव्यं नात्र संशयः ॥ २२ ॥
तब वे सब आपसमें कहने लगे—‘महामुनि नारदजी ठीक कहते हैं, अपने भाइयोंके मार्गको जाननेके लिये निःसंदेह हमें भी अवश्य प्रयत्न करना चाहिये ॥ २२ ॥
ज्ञात्वा प्रमाणं पृथ्व्याश्च सुखं स्रक्ष्यामहे प्रजाः ।
एकाग्राः स्वस्थ्यमनसा यथावदनुपूर्वशः ॥ २३ ॥
‘हम पृथ्वीके प्रमाणको जानकर एकाग्र और स्वस्थ-चित्तसे सुखपूर्वक प्रजाओंकी क्रमानुसार सृष्टि करेंगे ॥ २३ ॥
तेऽपि तेनैव मार्गेण प्रयाताः सर्वतोदिशम् ।
अद्यापि न निवर्तन्ते समुद्रेभ्य इवापगाः ॥ २४ ॥
ऐसा निश्चय करके वे भी उसी मार्गसे चारों दिशाओंकी ओर चल दिये और समुद्रोंसे उनमें मिली हुई नदियोंके समान अभीतक नहीं लौटे ॥ २४ ॥
नष्टेषु शबलाश्वेषु दक्षः क्रुद्धोऽवदद् वचः ।
नारदं नाशमेहीति गर्भवासं वसेति च ॥ २५ ॥
शबलाश्वोंके भी नष्ट हो जानेपर दक्ष प्रजापतिने क्रोधमें भरकर, नारदजीसे यह बात कही कि ‘तुम्हारी देह नष्ट हो जाय और तुम फिर गर्भमें निवास करो’ ॥ २५ ॥
तदाप्रभृति वै भ्राता भ्रातुरन्वेषणं नृप ।
प्रयातो नश्यति क्षिप्रं तन्न कार्यं विपश्चिता ॥ २६ ॥
राजन् ! उस दिनसे जो भाई भाईको खोजनेके लिये जाता है, वह शीघ्र ही नष्ट हो जाता है, अतएव विद्वान्को ऐसा न करना चाहिये अर्थात् भाईको ढूँढ़नेके लिये भाईको नहीं जाना चाहिये ॥ २६ ॥
तांश्चापि नष्टान् विज्ञाय पुत्रान् दक्षः प्रजापतिः।
षष्टिं भूयोऽसृजत् कन्या वीरण्यामिति नः श्रुतम् ॥
हमने सुना है कि अपने उन पुत्रोंको भी नष्ट हुआ जान-कर दक्ष प्रजापतिने वीरणकी पुत्रीमें फिर साठ कन्याओंको उत्पन्न किया (क्योंकि कन्याएँ स्त्री होनेसे नारदजीके आत्म-ज्ञानके उपदेशकी पात्र नहीं थीं ) ॥ २७ ॥
तास्तदा प्रतिजग्राह भार्यार्थे कश्यपः प्रभुः ।
सोमो धर्मश्च कौरव्य तथैवान्ये महर्षयः ॥ २८ ॥
कुरुकुलोत्पन्न जनमेजय ! उन (मेसे कुछ कन्याओं) को प्रभु कश्यपजीने अपनी पत्नीके रूपमे स्वीकार कर लिया एवं चन्द्रमा, धर्म तथा दूसरे महर्षियोंने भी उन (मेसे कितनी ही कन्याओ) को अपनी पत्नीके रूपमें स्वीकार कर लिया ॥ २८ ॥
ददौ स दश धर्माय कश्यपाय त्रयोदश ।
सप्तविंशतिं सोमाय चतस्रोऽरिष्टनेमिने ॥ २९ ॥
द्वे चैव भृगुपुत्राय द्वे चैवाङ्गिरसे तथा ।
द्वे कृशाश्वाय विदुषे तासां नामानि मे शृणु ॥ ३० ॥
दक्षने धर्मको दस, कश्यपजीको तेरह, चन्द्रमाको सत्ताईस, अरिष्टनेमिको चार, भृगुपुत्रको दो, अङ्गिराको दो
| १२ | श्रीमद्भारते खिलभागे | [ हरिवंश |
|---|
और विद्वान् कृशाश्व ऋषिको दो कन्याएँ दीं, उनके नामों-
को मुझसे सुनो—॥ २९-३० ॥
अरुन्धती वसुर्यामी लम्बा भानुर्मरुत्वती ।
संकल्पा च मुहूर्ता च साध्या विश्वा च भारत ।
धर्मपत्न्यो दश त्वेतास्तास्वपत्यानि मे शृणु ॥ ३१ ॥
भरतवंशी राजन् ! अरुन्धती, वसु, यामी, लम्बा, भानु, मरुत्वती, संकल्पा, मुहूर्ता, साध्या तथा विश्वा—ये दस धर्मकी पत्नियां हैं। इनमें जो संतान उत्पन्न हुई, उनके नामोंको मुझसे सुनो—॥ ३१ ॥
विश्वेदेवाश्च विश्वायाः साध्यान् साध्या व्यजायत ।
मरुत्वत्यां मरुत्वन्तो वसोस्तु वसवस्तथा ॥ ३२ ॥
विश्वाने विश्वेदेव नामक पुत्रोंको और साध्याने साध्य नामवाले पुत्रोंको उत्पन्न किया, मरुत्वतीसे मरुत्वान् और वसुसे वसु प्रकट हुए ॥ ३२ ॥
भानोस्तु भानवस्तात मुहूर्ताया मुहूर्तजाः ॥ ३३ ॥
और तात ! भानुसे भानुदेवता और मुहूर्तासे ( क्षण, लव आदि कालाभिमानी देवता ) मुहूर्तज उत्पन्न हुए ॥३३॥
लम्बायाश्चैव घोषोऽथ नागवीथी च यामिजा ।
पृथिवीविषयं सर्वमरुन्धत्यां व्यजायत ॥ ३४ ॥
घोष नामक ( मन्त्राभिमानी ) देवता लम्बासे उत्पन्न हुआ तथा यामीसे ( स्वर्गाभिमानिनी ) नागवीथी उत्पन्न हुई तथा अरुन्धतीमें ( धृत, पशु, औषध आदि ) सब पृथ्वीके विषय उत्पन्न हुए ॥ ३४ ॥
संकल्पायास्तु सर्वात्मा जज्ञे संकल्प एव हि ।
नागवीथ्याश्च यामिन्या वृषलम्बा व्यजायत ॥ ३५ ॥
तथा संकल्पासे सर्वात्मा संकल्प अर्थात् मानसक्रियाभिमानी देवता उत्पन्न हुआ और यामिपुत्री नागवीथीसे वृषलम्बा ( कालान्तरमें फलवृष्टि करनेवाले धर्म या ईश्वरका अवलम्बन करनेवाला देवता ) उत्पन्न हुआ ॥ ३५ ॥
या राजन् सोमपत्न्यस्तु दक्षः प्राचेतसो ददौ ।
सर्वा नक्षत्रनामन्यस्ता ज्योतिषे परिकीर्तिताः ॥ ३६ ॥
राजन् ! प्राचेतस दक्षने चन्द्रमाको जो कन्याएँ दी थीं, वे सब सोमपत्नियां नक्षत्रोंके नामसे ज्योतिषशास्त्रमे प्रसिद्ध हैं ॥ ३६ ॥
ये त्वन्ये ख्यातिमन्तो वै देवा ज्योतिःपुरोगमाः ।
वसवोऽष्टौ समाख्यातास्तेषां वक्ष्यामि विस्तरम् ॥३७॥
अब जो ज्योति आदि दूसरे प्रसिद्ध देवता हैं और जो विख्यात आठ वसु देवता हैं, उनका विस्तृत वर्णन मैं आपसे करूँगा ॥ ३७ ॥
आपो ध्रुवश्च सोमश्च धरश्चैवानिलानलौ ।
प्रत्यूषश्च प्रभासश्च वसवो नामभिः स्मृताः ॥ ३८ ॥
आप, ध्रुव, सोम, धर, अनिल, अनल, प्रत्यूष और प्रभास (—ये आठ ) वसु नामसे प्रसिद्ध हैं ॥ ३८ ॥
आपस्य पुत्रो वैतण्ड्यः श्रमः शान्तो मुनिस्तथा ।
ध्रुवस्य पुत्रो भगवान् कालो लोकप्रकालनः ॥ ३९ ॥
आपके वैतण्ड्य, श्रम, शान्त और मुनिनामक पुत्र उत्पन्न हुए और संसारको अपने अंकुशमें रखनेवाले भगवान् काल ध्रुवके पुत्र हैं ॥ ३९ ॥
सोमस्य भगवान् वर्चो वर्चस्वी येन जायते ।
धरस्य पुत्रो द्रविणो हुतहव्यवहस्तथा ।
मनोहरायाः शिशिरः प्राणोऽथ रमणस्तथा ॥ ४० ॥
और सोम नामक वसुके पुत्र भगवान् वर्चो हैं, जिन ( का पूजन करने ) से मनुष्य वर्चस्वी हो जाता है। धर वसुके द्रविण और हुतहव्यवह नामक दो पुत्र हुए तथा ( धरकी दूसरी पत्नी ) मनोहरासे शिशिर, प्राण और रमण नामक पुत्र हुए ॥ ४० ॥
अनिलस्य शिवा भार्या यस्याः पुत्रो मनोजवः ।
अविज्ञातगतिश्चैव द्वौ पुत्रावनिलस्य तु ॥ ४१ ॥
अनिलकी पत्नीका नाम शिवा था, उसके पुत्र मनोजव और अविज्ञातगति थे, ये दोनों अनिलके पुत्र थे ॥ ४१ ॥
अग्निपुत्रः कुमारस्तु शरस्तम्बे श्रियान्वितः ।
तस्य शाखो विशाखश्च नैगमेयश्च पृष्ठजाः ॥ ४२ ॥
अग्निके पुत्र श्रीमान् कुमार सरकंडोंके झुंडमें प्रकट हुए थे । उनके पीछे शाख, विशाख और नैगमेय हुए ( इस प्रकार अग्निके चार पुत्र थे ) ॥ ४२ ॥
अपत्यं कृत्तिकानां तु कार्तिकेय इति स्मृतः ।
स्कन्दः सनत्कुमारश्च सृष्टः पादेन तेजसः ॥ ४३ ॥
(ये कुमार ही) कृत्तिकाओंकी संतान कार्तिकेय (और ) स्कन्द कहलाते हैं और ये ही सनत्कुमार हैं। अग्निने इन्हें अपने तेजके एक अंशसे प्रकट किया है ( और शाख आदि तीनको भी अपने तेजके एक-एक चौथाई अंशसे प्रकट किया है । छान्दोग्य-उपनिषद्में लिखा है कि 'तं स्कन्द इत्याचक्षते' यह सनत्कुमार ही स्कन्द हैं। इससे प्रतीत होता है कि सनत्कुमार इनका उपनाम है ) ॥ ४३ ॥
प्रत्यूषस्य विदुः पुत्रमृषिं नाम्ना च देवलम् ।
द्वौ पुत्रौ देवलस्यापि क्षमावन्तौ तपस्विनौ ॥ ४४ ॥
प्रत्यूषके पुत्रका नाम देवल और ( पुत्रीका नाम ) ऋषि था। देवलके भी दो पुत्र थे, जो क्षमावान् तथा तपस्वी थे ॥ ४४ ॥
हरिवंशपर्व] तृतीयोऽध्यायः ३७
बृहस्पतेस्तु भगिनी वरस्त्री ब्रह्मचारिणी।
योगसिद्धा जगत् कृत्स्नमसक्ता विचचार ह॥ ४५॥
बृहस्पतिकी बहिनका नाम ब्रह्मचारिणी था, वह योग-सिद्ध श्रेष्ठ स्त्री आसक्तिको त्यागकर सारे संसारमें विचरण किया करती थी॥ ४५॥
प्रभासस्य च सा भार्या वसूनामष्टमस्य च।
विश्वकर्मा महाभागस्तस्यां जज्ञे प्रजापतिः॥ ४६॥
वह प्रभास नामवाले आठवें वसुकी भार्या बन गयी। उसके गर्भसे विश्वकर्मा नामवाले महाभाग्यवान् प्रजापति उत्पन्न हुए॥ ४६॥
कर्ता शिल्पसहस्राणां त्रिदशानां च वर्धकिः।
भूषणानां च सर्वेषां कर्ता शिल्पवतां वरः॥ ४७॥
उन्होंने हजारों शिल्पो (कलाओं) की रचना की है और वे देवताओंके बढ़ई हैं तथा वे शिल्पियोंमें श्रेष्ठ विश्वकर्मा सब आभूषणोंके बनानेवाले हैं॥ ४७॥
यः सर्वासां विमानानि देवतानां चकार ह।
मनुष्याश्चोपजीवन्ति यस्य शिल्पं महात्मनः॥ ४८॥
उन्होंने सब देवताओंके विमानोंको बनाया है और उन महात्माके शिल्पसे मनुष्य भी अपनी आजीविका चलाते हैं॥
सुरभी कश्यपाद् रुद्रानैकादश विनिर्ममे।
महादेवप्रसादेन तपसा भाविता सती॥ ४९॥
अजैकपादहिर्बुध्न्यस्त्वष्टा रुद्रश्च भारत।
त्वष्टुश्चैवात्मजःश्रीमान् विश्वरूपो महायशाः॥ ५०॥
(अब दक्षने कश्यप मुनिको जो तेरह कन्याएँ दी थीं, उनमेंसे सुरभिकी संतानका वर्णन करते हैं—) तपमें मग्न हुई सुरभिने महादेवजीसे वर पाकर कश्यपजीके द्वारा ग्यारह रुद्रोंको उत्पन्न किया था। भरतवंशी राजन्! अजैकपाद, अहिर्बुध्न्य, त्वष्टा तथा रुद्र—ये सब सुरभिकी ही संतानें हैं। त्वष्टाके महा-यशस्वी और श्रीमान् पुत्रका नाम विश्वरूप था॥ ४९-५०॥
हरश्च बहुरूपश्च त्र्यम्बकश्चापराजितः।
वृषाकपिश्च शम्भुश्च कपर्दी रैवतस्तथा॥ ५१॥
मृगव्याधश्च सर्पिश्च कपाली च विशांपते।
एकादशैते कथिता रुद्रास्त्रिभुवनेश्वराः॥ ५२॥
राजन्! हर, बहुरूप, त्र्यम्बक, अपराजित, वृषाकपि, शम्भु, कपर्दी, रैवत, मृगव्याध, सर्प और कपाली—ये तीनों भुवनोंके ईश्वर ग्यारह रुद्र कहे गये हैं॥ ५१-५२॥
शतं त्वेवं समाख्यातं रुद्राणाममितौजसाम्।
पुराणे भरतश्रेष्ठ यैर्व्याप्ताः सचराचराः॥ ५३॥
लोका भरतशार्दूल कश्यपस्य निबोध मे।
अदितिर्दितिर्दनुश्चैव अरिष्टा सुरसा खशा॥ ५४॥
सुरभिर्विनता चैव ताम्रा क्रोधवशा इरा।
कद्रुर्मुनिश्श्व राजेन्द्र तारूपत्यानि मे शृणु॥ ५५॥
भरतश्रेष्ठ! पुराणोंमें इन अमित पराक्रमी रुद्रोंके सैकड़ों रूप बताये गये हैं। इनसे चराचर लोक भरे हुए हैं। भरतशार्दूल! अब तुम मुझसे कश्यपकी (स्त्रियोंके नाम) सुनो। (वे हैं—) अदिति, दिति, दनु, अरिष्टा, सुरसा, खशा, सुरभि, विनता, ताम्रा, क्रोधवशा, इरा, कद्रू और मुनि। राजेन्द्र! अब इनसे जो संतानें उत्पन्न हुईं, उनका वर्णन मुझसे सुनो—॥ ५३-५५॥
पूर्वमन्वन्तरे श्रेष्ठा द्वादशासन् सुरोत्तमाः।
तुषिता नाम तेऽन्योन्यमूचुर्वैवस्वतेऽन्तरे॥ ५६॥
उपस्थितेऽतियशसि चाक्षुषस्यान्तरे मनोः।
हितार्थं सर्वसत्त्वानां समागम्य परस्परम्॥ ५७॥
पहले चाक्षुष मन्वन्तरमें तुषित नामवाले बारह श्रेष्ठ देवता थे। वे उस अत्यन्त यशस्वी मन्वन्तरका अन्त आनेपर वैवस्वत मन्वन्तरके आरम्भमें सब प्राणियोंका हित करनेके लिये परस्पर मिलकर कहने लगे—॥ ५६-५७॥
आगच्छत द्रुतं देवा अदितिं सम्प्रविश्य वै।
मन्वन्तरे प्रसूयामस्तन्नः श्रेयो भविष्यति॥ ५८॥
'देवताओ! शीघ्र आओ! हम अदितिमें प्रवेश करके अगले (वैवस्वत) मन्वन्तरमें उत्पन्न होंगे, यह कार्य हमारे लिये श्रेयस्कर होगा'॥ ५८॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा तु ते सर्वे चाक्षुषस्यान्तरे मनोः।
मारीचात् कश्यपाज्जातास्तेऽदित्या दक्षकन्यया॥ ५९॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—वे सभी देवता चाक्षुष मन्वन्तरके अन्तमें इस प्रकार वार्तालाप कर मरीचिपुत्र कश्यप-से दक्षकी कन्या अदितिके गर्भसे उत्पन्न हो गये॥ ५९॥
तत्र विष्णुश्च शक्रश्च जज्ञाते पुनरेव हि।
अर्यमा चैव धाता च त्वष्टा पूषा च भारत॥ ६०॥
विवस्वान् सविता चैव मित्रो वरुण एव च।
अंशो भगश्चातितोजा आदित्या द्वादश स्मृताः॥ ६१॥
भारत! वहाँ विष्णु और इन्द्र फिर उत्पन्न हुए। वे तथा अर्यमा, धाता, त्वष्टा, पूषा, विवस्वान्, सविता, मित्र, वरुण, अंश और परम तेजस्वी भग—ये बारह आदित्य कहलाते हैं॥ ६०-६१॥
चाक्षुषस्यान्तरे पूर्वमासन् ये तुषिताः सुराः।
वैवस्वतेऽन्तरे ते वै आदित्या द्वादश स्मृताः॥ ६२॥
पहले चाक्षुष मन्वन्तरमें जो तुषित नामवाले देवता थे, वे अब वैवस्वत मन्वन्तरमें बारह आदित्य कहलाते हैं॥ ६२॥
सप्तविंशतिर्याः प्रोक्ताः सोमपत्न्योऽथ सुव्रताः।
तासामपत्यान्यभवन् दीप्तान्यमिततेजसाम्॥ ६३॥
| २५ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंश |
|---|
और जो सुन्दर व्रत धारण करनेवाली चन्द्रमाकी सत्ताईस पत्नियाँ कही गयी हैं, उन अमित तेजस्विनी पत्नियोंकी ज्योतिर्मयी संतानें उत्पन्न हुईं ॥ ६३ ॥
अरिष्टनेमिपत्नीनामपत्यानीह षोडश ।
बहुपुत्रस्य विदुषस्तस्रो विद्युत: स्मृताः ॥ ६४ ॥
अनेक पुत्रवाले विद्वान् अरिष्टनेमिकी विद्युत् नामवाली चार पत्नियाँ थीं । उनसे सोलह संतानें उत्पन्न हुईं ॥ ६४ ॥
प्रत्यङ्गिरसजाः श्रेष्ठा ऋचो ब्रह्मर्षिसत्कृताः।
कृशाश्वस्य तु राजर्षेर्देवप्रहरणानि च ॥ ६५ ॥
राजर्षि कृशाश्वके ब्रह्मर्षियोंसे सत्कृत श्रेष्ठ प्रत्यङ्गिरसजा ऋचाएँ और देवताओंके आयुध प्रकट हुए ॥ ६५ ॥
एते युगसहस्रान्ते जायन्ते पुनरेव हि ।
सर्वैदेवगणास्तात त्रयस्त्रिंशत् तु कामजाः ॥ ६६ ॥
तात ! ईश्वरकी कामनासे उत्पन्न होनेवाले तैंतीस देवता सत्ययुग आदि चारों युगोंके एक हजार बार बीतनेपर (प्रत्येक कल्पमें) पुनः उत्पन्न हुआ करते हैं ॥ ६६ ॥
तेषामपि च राजेन्द्र निरोधोत्पत्तिरुच्यते ॥ ६७ ॥
राजेन्द्र ! उन देवताओंकी भी उत्पत्ति और नाशका वर्णन उपलब्ध होता है ॥ ६७ ॥
यथा सूर्यस्य गगने उदयास्तमने इह।
एवं देवनिकायास्ते सम्भवन्ति युगे युगे ॥ ६८ ॥
जैसे आकाशमें सूर्यका उदय और अस्त बारंबार होता रहता है, इसी प्रकार ये देवताओंके समूह प्रत्येक युगमें उत्पन्न ( तथा नष्ट ) होते हैं ॥ ६८ ॥
दित्याः पुत्रद्वयं जज्ञे कश्यपादिति नः श्रुतम् ।
हिरण्यकशिपुश्चैव हिरण्याक्षश्च वीर्यवान् ॥ ६९ ॥
(इस प्रकार आदित्योंका वर्णन करके अब दैत्योंका वर्णन करते हैं—) हमने सुना है, कश्यप ऋषिसे दितिके दो पुत्र उत्पन्न हुए थे, (उनमेंसे एक) हिरण्यकशिपु और (दूसरा) वीर्यवान् हिरण्याक्ष था ॥ ६९ ॥
सिंहिका चाभवत् कन्या विप्रचित्तेः परिग्रहः।
सैंहिकेया इति ख्यातास्तस्याः पुत्रा महाबलाः।
गणैश्च सह राजेन्द्र दशसाहस्रमुच्यते ॥ ७० ॥
(इन कश्यप और दितिकी) एक सिंहिका नामवाली कन्या भी थी, वह विप्रचित्तिको विवाही गयी थी। उसके महाबली पुत्र सैंहिकेय नामसे प्रसिद्ध हैं। राजेन्द्र ! वे अपने गणोंसहित दस हजार हैं ॥ ७० ॥
तेषां पुत्राश्च पौत्राश्च शतशोऽथ सहस्रशः ।
असंख्याता महाबाहो हिरण्यकशिपोः श्रृणु ॥ ७१ ॥
और उनके सैकड़ों पुत्र और हजारों पौत्र हैं, उनकी गिनती नहीं की जा सकती । महाबाहो ! अब हिरण्यकशिपु-की (संतानोंका वर्णन) सुनो ॥ ७१ ॥
हिरण्यकशिपोः पुत्राश्चत्वारः प्रथितौजसः ।
अनुह्लादश्च ह्लादश्च प्रह्लादश्चैव वीर्यवान् ॥ ७२ ॥
संह्लादश्च चतुर्थोऽभूद्ध्लादपुत्रो हृदस्तथा ।
संह्लादपुत्रः सुन्दश्च निसुन्दस्तावुभौ स्मृतौ ॥ ७३ ॥
हिरण्यकशिपुके अनुह्लाद, ह्लाद, वीर्यवान् प्रह्लाद और चौथा संह्लाद—ये चार प्रसिद्ध पराक्रमी पुत्र उत्पन्न हुए। ह्लादका पुत्र हृद हुआ। सुन्द और निसुन्द—ये दोनों संह्लादके पुत्र कहलाते हैं ॥ ७२-७३ ॥
अनुह्लादसुतौ ह्यायुः शिविकालस्तथैव च ।
विरोचनश्च प्राह्लादिर्बलिर्जज्ञे विरोचनात् ॥ ७४ ॥
अनुह्लादके आयु और शिविकाल नामक दो पुत्र थे। प्रह्लादके विरोचन नामक पुत्र हुआ और विरोचनसे बलि नामवाला पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ ७४ ॥
बलेः पुत्रशतं त्वासीद् बाणज्येष्ठं नराधिप ।
धृतराष्ट्रश्च सूर्यश्च चन्द्रमाश्चेन्द्रतापनः ॥ ७५ ॥
कुम्भनाभो गर्दभाक्षः कुक्षिरित्येवमादयः ।
बाणस्तेषामतिबलो ज्येष्ठः पशुपतेः प्रियः ॥ ७६ ॥
बलिके सौ पुत्र थे। उनमें बाण (सबसे) बड़ा था। राजन् ! धृतराष्ट्र, सूर्य, चन्द्रमा, इन्द्रतापन, कुम्भनाभ, गर्दभाक्ष और कुक्षि आदि (बलिके सौ पुत्र थे)। इनमें अतिबली बाण बड़ा था और वह शिवका प्रिय भक्त था ॥ ७५-७६ ॥
पुराकल्पे हि बाणेन प्रसाद्योमापतिं प्रभुम् ।
पार्श्वतो विहरिष्यामि इत्येवं याचितो वरः ॥ ७७ ॥
पहले कल्पमें बाणासुरने उमापति शंकरको प्रसन्न करके यह वर माँगा था कि 'मैं आपके पास विहार करूँ' ॥ ७७ ॥
बाणस्य चेन्द्रदमनो लोहित्यामुपपद्यत ।
गणस्तस्यासुरा राजञ्छतसाहस्रसम्मिताः ॥ ७८ ॥
बाणके लोहिती नामकी पत्नीमें इन्द्रदमन नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। राजन् ! लाखों असुर उसके गण थे ॥ ७८ ॥
हिरण्याक्षसुताः पञ्च विद्वांसः सुमहावलाः।
झर्झरः शकुनिश्चैव भूतसंतापनस्तथा ।
महानाभश्च विक्रान्तः कालनाभस्तथैव च ॥ ७९ ॥
हिरण्याक्षके झर्झर, शकुनि, भूतसंतापन, महानाभ और पराक्रमी कालनाभ नामक पाँच पुत्र हुए, वे विद्वान् और परम पराक्रमी थे ॥ ७९ ॥
अभवन् दनुपुत्राश्च शतं तीव्रपराक्रमाः ।
तपस्विनो महावीर्याः प्राधान्येन निबोध तान् ॥ ८० ॥
(अब दनुके वंशका वर्णन करते हैं—) दनुके सौ पुत्र हुए। वे सब परम पराक्रमी, तपस्वी और महावीर्यवान् थे। उनमेंसे मुख्य-मुख्य असुरोंका वर्णन सुनिये ॥ ८० ॥
[ हरिवंशपर्व ] तृतीयोऽध्यायः १५
द्विमूर्धा शकुनिश्चैव तथा शङ्कुशिरा विभुः।
शङ्कुकर्णो विराघश्च गवेष्ठी दुन्दुभिस्तथा।
अयोमुखः शम्बरश्च कपिलो वामनस्तथा ॥ ८१ ॥
मरीचिर्मघवांश्चैव इरा शङ्कुशिरा वृकः।
विक्षोभणश्च केतुश्च केतुवीर्यशतह्रदौ ॥ ८२ ॥
इन्द्रजित् सत्यजिच्चैव वज्रनाभस्तथैव च।
महानाभश्च विक्रान्तः कालनाभस्तथैव च ॥ ८३ ॥
एकचक्रो महाबाहुस्तारकश्च महाबलः।
वैश्वानरः पुलोमा च विद्रावणमहासुरौ ॥ ८४ ॥
स्वर्भानुर्वृषपर्वा च तुहुण्डश्च महासुरः।
सूक्ष्मश्चैवातिचन्द्रश्च ऊर्णनाभो महागिरिः ॥ ८५ ॥
असिलोमा च केशी च शठश्च बलको मदः।
तथा गगनमूर्धा च कुम्भनाभो महासुरः ॥ ८६ ॥
प्रमदो मयश्च कुपथो हयग्रीवश्च वीर्यवान्।
वैसृपः सविरूपाक्षः सुपथोऽथ हराहरौ ॥ ८७ ॥
हिरण्यकशिपुश्चैव शतमायश्च शम्बरः।
शरभः शलभश्चैव विप्रचित्तिश्च वीर्यवान् ॥ ८८ ॥
एते सर्वे दनोः पुत्राः कश्यपादभिजज्ञिरे।
विप्रचित्तिप्रधानास्ते दानवाः सुमहाबलाः ॥ ८९ ॥
द्विमूर्धा, शकुनि तथा विभु, शङ्कुशिरा, शङ्कुकर्ण, विराध और गवेष्ठी, दुन्दुभि तथा अयोमुख, शम्बर और कपिल, वामन तथा मरीचि, मघवान् और इरा, शङ्कुशिरा, वृक; विक्षोभण और केतु तथा केतुवीर्य, शतह्रद, इन्द्रजित्, सत्यजित् और वज्रनाभ तथा महानाम और विक्रान्त, कालनाम, महाभुज एकचक्र और महाबली तारक, वैश्वानर, पुलोमा, विद्रावण और महासुर, स्वर्भानु, वृषपर्वा और महान् असुर तुहुण्ड, सूक्ष्म और अतिचन्द्र तथा ऊर्णनाभ, महागिरि, असिलोमा और केशी एवं शठ तथा बलक, मद तथा गगनमूर्धा और महान् असुर कुम्भनाभ, प्रमद, मय और कुपथ, हयग्रीव और वीर्यवान् वैसृप, विरूपाक्षसहित सुपथ और हर, अहर, हिरण्यकशिपु तथा सैकड़ों प्रकारकी माया जाननेवाला शम्बर, शरभ, शलभ और वीर्यवान् विप्रचित्ति—ये सब दनुके पुत्र कश्यपजीसे उत्पन्न हुए थे। इनमें विप्रचित्ति प्रधान था। ये सब दानव बड़े बलवान् थे॥८१-८९॥
एतेषां यदपत्यं तु तन्न शक्यं नराधिप।
प्रसंख्यातुं महीपाल पुत्रपौत्रायनन्तकम् ॥ ९० ॥
नराधिप ! इनकी जो संतानें हुईं, उनकी गिनती नहीं की जा सकती। महीपाल ! इनके अनन्त पुत्र-पौत्र उत्पन्न हुए ॥ ९० ॥
स्वर्भानोस्तु प्रभा कन्या पुलोम्नश्च सुतात्रयम्।
उपदानवी हयशिराः शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी ॥ ९१ ॥
उपदानवी, हयशिरा ( तथा शची ) तीन कन्याएँ उत्पन्न हुईं। वृषपर्वाके शर्मिष्ठा नामकी पुत्री उत्पन्न हुई ॥ ९१ ॥
पुलोमा कालिका चैव वैश्वानरसुते उभे।
बह्वपत्ये महावीर्ये मारीचेस्तु परिग्रहः ॥ ९२ ॥
वैश्वानर दानवकी पुलोमा और कालिका नामकी दो पुत्रियाँ हुईं। ये दोनों मरीचिनन्दन कश्यपको विवाही गयीं, ये बड़ी शक्तिशालिनी थीं। इन कन्याओंके बहुत-सी संतानें उत्पन्न हुईं ॥ ९२ ॥
तयोः पुत्रसहस्राणि षष्टि दानवनन्दनान्।
चतुर्दशशतान्यान्य हिरण्यपुरवासिनः ॥ ९३ ॥
मारीचिर्जनयामास महता तपसान्वितः।
पौलोमाः कालकेयाश्च दानवास्ते महाबलाः ॥ ९४ ॥
अवध्या देवतानां च हिरण्यपुरवासिनः।
कृताः पितामहेनाजौ निहताः सव्यसाचिना ॥ ९५ ॥
परम तपस्वी मारीचि ( कश्यप ) ने उन दोनों स्त्रियोंमें दानवोंको आनन्द देनेवाले साठ हजार पुत्रोंको जन्म दिया। फिर चौदह सौ पुत्र और उत्पन्न किये। ये सब हिरण्यपुरमें रहते थे। इन हिरण्यपुरमें रहनेवाले महाबली पौलोम और कालकेय दानवोंको ब्रह्माजीने ( वर देकर ) देवताओंसे भी अवध्य ( न मारे जानेयोग्य ) कर दिया था। अर्जुनने इनको रणमें मार डाला था ॥९३-९५॥
प्रभाया नहुषः पुत्रः संजयश्च शचीसुतः।
पूरूं जज्ञेऽथ शर्मिष्ठा दुष्मन्तमपदानवी ॥ ९६ ॥
प्रभाके नहुष नामक पुत्र हुआ और शचीके संजय। शर्मिष्ठाने पूरुको उत्पन्न किया और उपदानवीने दुष्मन्तको ॥
ततोऽपरे महावीर्या दानवास्त्वतिदारुणाः।
सिंहिकायामथोत्पन्ना विप्रचित्तेः सुतास्तदा॥ ९७ ॥
दैत्यदानवसंयोगाज्जातास्तीव्रपराक्रमाः।
सैंहिकेया इति ख्यातास्त्रयोदश महाबलाः ॥ ९८ ॥
तदनन्तर और भी बहुत-से महावीर्यवान् अतिदारुण दानव सिंहिकामें विप्रचित्तिसे उत्पन्न हुए, फिर दैत्य-दानवोंके संयोगसे विप्रचित्तिके बहुत-से तीव्र पराक्रमी पुत्र हुए। इनमें तेरह महाबली दानव 'सैंहिकेय' नामसे प्रसिद्ध हैं ॥९७-९८॥
व्यंशः शल्यश्च बलिनौ नभश्चैव महाबलः।
वातापिर्नमुचिश्चैव इल्वलः खसृमस्तथा ॥ ९९ ॥
आञ्जिको नरकश्चैव कालनाभस्तथैव च।
शुकः पोतरणश्चैव वज्रनाभश्च वीर्यवान् ॥ १०० ॥
( उनके नाम इस प्रकार हैं—) बलवान् व्यंश और शल्य, महाबली नभ, वातापि और नमुचि, इल्वल तथा खसृम, आञ्जिक और नरक तथा कालनाभ, शुक और पोतरण तथा वीर्यवान् वज्रनाभ ॥ ९९-१०० ॥
| १४ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंश |
|---|
राहुर्ज्येष्ठस्तु तेषां वै सूर्यचन्द्रविमर्दनः।
मूकश्चैव तुहुण्डश्च ह्रादपुत्रौ बभूवतुः॥१०१॥
हिन्दी टीका: इनमें राहु सबसे बड़ा है, जो सूर्य तथा चन्द्रमाको पीड़ा देता रहता है। ह्रादके मूक और तुहुण्ड नामवाले दो पुत्र उत्पन्न हुए॥ १०१ ॥
मारीचः सुन्दपुत्रश्च ताड़कायां व्यजायत।
शिवमाणस्तथा चैव सुरकल्पश्च वीर्यवान् ॥१०२॥
हिन्दी टीका: सुन्दके ताड़कामें मारीच नामक पुत्र उत्पन्न हुआ तथा (सुन्द और ताड़काके) शिवमाण और वीर्यवान् सुरकल्प नामक पुत्र भी उत्पन्न हुए॥ १०२ ॥
एते वै दानवाः श्रेष्ठा दनुवंशविवर्द्धनाः।
तेषां पुत्राश्च पौत्राश्च शतशोऽथ सहस्रशः ॥१०३॥
हिन्दी टीका: ये सभी दानव श्रेष्ठ और दनुके वंशका विस्तार करनेवाले हैं, इनके सैकड़ों पुत्र और हजारों पौत्र हैं॥१०३॥
संह्रादस्य तु दैत्यस्य निवातकवचाः कुले।
समुत्पन्नाः सुतपसा महान्तो भावितात्मनः॥१०४॥
हिन्दी टीका: संह्राद दैत्यके कुलमें निवातकवच उत्पन्न हुए, वे सब उदार थे और उन्होंने बड़ा भारी तप करके अपने चित्तको पवित्र कर लिया था॥ १०४ ॥
तिस्रः कोट्यः सुतास्तेषां मणिमत्यां निवासिनाम्।
तेऽप्यवध्यास्तु देवानामर्र्जुनेन निपातिताः॥१०५॥
हिन्दी टीका: वे मणिमती नगरीमें निवास करते थे। उनके तीन करोड़ पुत्र थे। वे भी देवताओंसे अवध्य थे, उनको भी अर्जुनने मार डाला था॥ १०५ ॥
षट् सुताः सुमहामत्त्वास्ताम्रायाः परिकीर्त्तिताः।
काकी श्येनी च भासी च सुग्रीवी शुचि गृध्रिका॥१०६॥
हिन्दी टीका: ताम्राके काकी, श्येनी, भासी, सुग्रीवी, शुचि और गृध्रिका नामकी अत्यन्त बलशालिनी छः पुत्रियाँ कही जाती हैं॥ १०६॥
काकी काकानजनयदुलूकी प्रत्युलूककान्।
श्येनी श्येनांस्तथा भासी भासान् गृध्रांश्च गृध्र्यपि॥
शुचिरौदकान् पक्षिगणान् सुग्रीवी तु परंतप।
अश्वानुष्ट्रान् गर्दभांश्च ताम्रावंशः प्रकीर्तितः॥१०८॥
हिन्दी टीका: परंतप ! काकीने कौओंको, उलूकीने उल्लुओंको, श्येनीने श्येनों (बाजों) को, भासीने भास नामक पक्षियोंको और गृध्रीने गीधोंको उत्पन्न किया। शुचिने जलमें रहनेवाले पक्षियोंको और सुग्रीवीने घोड़े, ऊँट तथा गधोंको जन्म दिया। यह मैंने ताम्राके वंशका वर्णन किया है॥१०७-१०८॥
विनतायास्तु पुत्रौ द्वावरुणो गरुडस्तथा।
सुपर्णः पततां श्रेष्ठो दारुणः स्वेन कर्मणा ॥१०९॥
हिन्दी टीका: विनताके अरुण और गरुड नामक दो पुत्र हुए। इनमेंसे पक्षियोंमें श्रेष्ठ गरुड अपने कर्मके कारण बड़े दारुण माने गये हैं॥ १०९ ॥
सुरसायाः सहस्रं तु सर्पाणाममितौजसाम्।
अनेकnames/अनेकnames
अनेकnames/अनेकशिरसां तात खेचराणां महात्मनाम् ॥११०॥
हिन्दी टीका: सुरसाके हजारों सर्प उत्पन्न हुए। तात ! वे सब सर्प अमितपराक्रमी, अनेक फनोंवाले, आकाशमें विचरण करनेवाले तथा विशालकाय हैं॥ ११० ॥
काद्रवेयाश्च बलिनः सहस्रममितौजसः।
सुपर्णवशगा नागा जज्ञिरेऽनेकमस्तकाः ॥१११॥
तेषां प्रधानाः सततं शेषवासुकितक्षकाः।
ऐरावतो महापद्मः कम्बलाश्वतरावुभौ ॥११२॥
एलापत्रस्तथा शंखः कर्कोटकधनंजयौ।
महानीलमहाकर्णौ धृतराष्ट्रबलाहकौ ॥११३॥
कुहरः पुष्पद्रंष्ट्रश्च दुर्मुखः सुमुखस्तथा।
शङ्खश्च शङ्खपालश्च कर्पलो वामनस्तथा ॥११४॥
नहुषः शङ्खरोमा च मणिरित्येवमादयः।
तेषां पुत्राश्च पौत्राश्च गरुडेन निपातिताः ॥११५॥
हिन्दी टीका: कद्रूके भी परम पराक्रमी हजारों सर्प उत्पन्न हुए। उन बलवान् सर्पोंके अनेक मस्तक हैं और वे सर्वदा गरुडके अधीन रहते हैं। उनमें शेष, वासुकि, तक्षक, ऐरावत, महापद्म, कम्बल, अश्वतर, एलापत्र, शङ्ख, कर्कोटक, धनंजय, महानील, महाकर्ण, धृतराष्ट्र, बलाहक, कुहर, पुष्पद्रंष्ट्र, दुर्मुख, सुमुख, शङ्ख, शङ्खपाल, कपिल, वामन, नहुष, शङ्खरोमा तथा मणि आदि प्रधान हैं। इनके पुत्र और पौत्रोंको गरुडने मार डाला था॥ १११-११५ ॥
चतुर्दश सहस्राणि क्रूराणां पवनाशिनाम्।
गणं क्रोधवशं विद्धि तस्य सर्वे च दंष्ट्रिणः ॥११६॥
हिन्दी टीका: वायु पीकर रहनेवाले चौदह हजार क्रूर सर्पोंका क्रोधवश नामवाला एक गण है। उस गणके समस्त सर्प दाढ़ोंवाले हैं॥ ११६ ॥
स्थलजाः पक्षिणोऽब्जांश्च धरायाः प्रसवाः स्मृताः।
गास्तु वै जनयामास सुरभिर्महिषांस्तथा ॥११७॥
हिन्दी टीका: थल और जलके पक्षी धराकी संतान कहलाते हैं। सुरभिने गौ, बैल और भैंसोंको उत्पन्न किया॥ ११७ ॥
इरा वृक्षलतावल्लीस्तृणजातींश्च सर्वशः।
खशा तु यक्षरक्षांसि मुनिरप्सरसस्तथा ॥११८॥