हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
[ ४५ ] हम यहां पर जोधपुर की राजकुमारी इन्द्राकुमारी की घटना का उल्लेख भी कर देना अनुचित नहीं समझते । उसका विवाह मुग़ल सम्राट् के साथ हुआ था । पर जब वह कई सालों के पश्चात् वापिस आई तो राजपूतों ने उसे शुद्ध करके हिंदू धर्म मे मिला लिया था । यह स्वाभाविक बात थी कि जिन लोगों ने राजनैतिक बुराईयों को—जिसने कि हमारी मातृभूमि को इतना पीड़ित किया था—दूर करने का कार्य अपने हाथ मे लिया था वे उसके साथ-साथ धार्मिक और सामाजिक बुराईयों को भी दूर करें, क्योंकि वे राजनैतिक बुराइयों से अधिक हानिकारक थीं । हिन्दुओं की स्वतन्त्रता और हिंदुओं के पुनरु- द्धार के जिस आन्दोलन ने राजनैतिक और सैनिक क्षेत्रों में इतनी सफ- लता प्राप्त की उसने हमारे धार्मिक, सामाजिक पवित्रता और सभ्यता सम्बन्धी कार्यों को भी, जो शताब्दियों से बिगड़ते चले आते थे, ठीक रास्ते पर लाने मे कुछ उठा नहीं रक्खा । मुसलमान लोगों ने केवल एक सौ वर्ष के भीतर सारे दक्षिण मे अपने धर्म और राज्य को फैलाया, लाखों मनुष्यों को मुसलमान बनाया, परन्तु खेद का विषय है कि हिन्दू- जाति, हिन्दू-साम्राज्य रहने पर भी दो-चार सौ भी मुसलमानों को हिन्दूधर्म में नहीं ला सकी; किन्तु यदि उन्होंने ऐसा करना चाहा होता और इसके यहां यदि ऐसी प्रथा प्रचलित होती तो वे अवश्य सफलीभूत हुए होते । इसका मुख्य कारण यह है कि मनुष्यों की दासता की राजनैतिक बेड़ी कभी २ शीघ्र तोड़ी जा सकती है, किन्तु अन्धविश्वास को मनुष्यों के भीतर से हटाना एक बड़ा ही कठिन कार्य है । इसके साथ-ही-साथ इस बात पर भी ध्यान रखना चाहिये कि मरहठों की सारी शक्ति पहले हिन्दुओं की राजनैतिक स्वतन्त्रता प्राप्त करने में और हिन्दू-साम्राज्य स्थापित करने ही मे लग गई, इसलिये उन्होंने यदि सामाजिक सुधारों की ओर, जो परमावश्यक थे, यदि विशेष उन्नति नहीं की तो हमे इसके ऊपर कोई आश्चर्य करने की आवश्यकता नहीं है ।
[ ४६ ] किन्तु आश्चर्यजनक बात तो यह है कि उन्होंने झूठे अंधविश्वासों को, जो हिन्दुओं के मस्तिष्कों में भरे हुए थे, हटाकर उनकी जगह पर शुद्धि की प्रथा को उनके भीतर स्थान दिलाया, जिसकी स्थापना करना उस समय कठिन ही नहीं वरन् असम्भव था । ६. प्रेम और कृतज्ञता का ऋण । ॐ सौख्य स्मरुनि राज्याचें मीनापरि अखंड तळमलती --प्रभाकर अब हमारे अंतिम और--जहां तक हमारी जाति के भूतकालिक इतिहास का सम्बन्ध है--हमारे हिन्दू साम्राज्यों में से सर्वश्रेष्ठ साम्राज्य पर एकाएक पर्दा गिरता है । जिस अशुभ दिन सिन्ध नदी के किनारे, हमारे शूरवीर सिन्धराज दाहिर की पराजय हुई, उसी दिन हमारे भाग्य की भी पराजय हो गई । काबुल के हिंदू महाराज त्रिलोचनपाल, पंजाब के राजा जैपाल और अनंगपाल, दिल्ली के महाराज पृथ्वीराज और कन्नौज के जयचंद, चित्तौर के महाराना सांगा, बंगाल के महाराजा लक्ष्मण सेन, रामदेव राव्रो और देवगिरि के राजा हरपाल, विजयनगर के सारे राजे और रानियां, राज- सिंहासन और मुकुट--सिंध से लेकर समुद्र पर्यंत एक-एक करके सब मिट्टी में मिल गये । निडर, धृष्ट और अजेय शत्रु हमारी हिंदू-जाति की हांपती हुई छाती को अपने घुटने से दबाये हुए खड़ा हो गया । चित्तौर ही नहीं, किन्तु सारे भारतवर्ष की हिंदू-राजधानियां राख की ढेर बन गईं । कभी-कभी उसी राख के ढेर से बलिदान की चिनगारियां एक क्षण के लिये प्रज्वलित हो उठती थीं । शाही तख्तताऊस पर ॐ राज्य के वैभव को देख कर ( शत्रु ) मछली की तरह तड़पते थे ।
[ ४७ ] औरङ्गजेब बादशाह हमारी जाति की सारी आशाओं को पायों तले रौंदे हुए निश्चिन्त बैठा हुआ था और लाखों तलवारें उसके क्रोध भरे पैरों की ठोकर के इशारे पर मृत्यु की भयंकर लीला रचाने के लिये सदा तय्यार रहती थीं। ठीक उसी समय 'या सकल भूमंडलाचिये ठायीं, हिन्दू ऐसा उरला नाहीं' ❄ हिन्दू युवकों का एक दल 'एका लहानशा कोनात' एक कोने में गुप्तसभा मे एकत्रित हुआ, और अपने स्वर्गीय राजाओं और रानियों, धूल में मिले उन सिंहासनों और राज्यमुकुटों तथा अपनी जाति की स्मारक राख की ढेर को साक्षी करके उन्होंने अपने धर्म और जाति के ऊपर किये गये अपमान का बदला लेने तथा हिन्दूशास्त्रों और ध्वजा का मान रखने के लिये उस अजेय शत्रु के विरुद्ध विद्रोह करने की शपथ खाई। जिस समय नवयुवकों का यह झुंड बाहर निकला तो उनके पास कुछ जंग (मुर्चा) लगी तलवारों के अतिरिक्त कुछ न था। दुनियां ने उनकी अवस्था का अनुमान करके कहा--'यह मूर्खतापूर्ण कार्य है'। बुद्धिमानों ने कहा "यह आत्महत्या है" और औरंगजेब ने कहा "छिः, छिः"। इन का अनुमान गलत नहीं था क्योंकि शिवाजी पहला व्यक्ति न था जिस ने विद्रोह किया हो । उससे पहले कई साहसी वीरों ने विद्रोह किया था पर वे असफल रहे जिस के कारण उन को विद्रोह का भयङ्करतम मूल्य देना पड़ा था। पर इस दल ने बदला लेने का दृढ़ निश्चय किया । उनका यह दृढ़ विश्वास था कि यदि ये अपने उद्देश्य मे सफल भी न हो सके और विद्रोह के परिणाम स्वरूप उन्हें बलिवेदी पर अपने प्राणों की आहुति डालनी पड़ी तो वे अपने बलिदान द्वारा एक ऐसा बीज बो जाएगे कि आने वाली संताने देश को मुक्त कराने का अविश्रांत प्रयत्न करती रहेगी और सदैव दासता की बेड़ी मे न पड़ी रहेगी । ❄ जब कि एक भी ऐसा हिन्दू भूमण्डल पर न बचा था (जो मुसल- मानों से पद-दलित न हुआ हो)।
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बीस वर्ष बीत गये। अब औरंगज़ेब का चेहरा मलिन और उसकी आवाज़ धीमी पड़ गई। वह मरहठों के नवयुवकों का झुंड हिन्दू-राज्य का हृदय बन गया। औरङ्गजेब बादशाह ने फिर प्रण किया 'मैं काफ़िरों के झुंड को पहाड़ ही में नष्ट कर दूंगा'। सहस्रों चमचमाती हुई तलवारों के साथ क्रोध से भरे हुए औरङ्गजेब बादशाह ने शिवाजी के छोटे से राज्य पर आक्रमण कर ही दिया और उस देश को पावों तले कुचल दिया पर इसके कारण वहां ऐसे विद्रोह को जन्म मिला जो उसके पावों को चिपट गया। शक्तिशाली मुसलमानी राज्य लड़खड़ाया। अब वह न तो स्थिर ही रह सकता था और न ही उन से पीछा छुड़ा सकता था। इस प्रकार खाई चौड़ी और गहरी होती गई। बाहर निकलने के लिये वह जितना ज़ोर लगाता उतना नीचे धंसता जाता। अंत में वह ऐसा फंसा कि वह फिर कभी उभर न सका। उसकी मृत्यु तथा लाखों चमकती हुई तलवारों की समाप्ति होने के बाद मरहठों ने फिर शक्ति ग्रहण की और उस शाही मक़बरे के समीप हिंदुओं का छोटा सा राज्य एक महान् हिन्दू- साम्राज्य में परिणत हो गया। क्योंकि अब शीघ्र ही मरहठों का झुंड अपनी गेरुआ ध्वजा लिये बाहर निकला और हिन्दू-धर्म की स्वतन्त्रता की लड़ाई को सारे भारत- वर्ष में फैला दिया। मरहठों ने गुजरात, खानदेश, मालवा और बुन्देल- खंड में प्रवेश किया, उन्होंने चम्बल, गोदावरी, कृष्णा, तुंगभद्रा नदियों को पार किया। उन्हों ने चित्तौड़, नागपुर, उड़ीसा को अधीन किया और धीरे २ बढ़ कर एक २ पत्थर जोड़ कर यमुना से तुंगभद्रा तक और द्वारिका से जगन्नाथ तक तमाम देश को मुसलमानों के शासन से मुक्त करा कर शक्तिशाली हिन्दू-राज्य में परिणत कर दिया। वे यमुना, गंगा और गंडकी आदि नदियों को पार करके पटना पहुंचे, जो महाराज चन्द्रगुप्त की राजधानी थी, कलकत्ता में काली जी की और काशी में विश्वनाथ जी की पूजा की। इन दस, बारह नवयुवकों के उत्तराधिकारी
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अब लाखों की संख्य, में अपने झंडे को फहराते हुए और बाजा बजाते हुए मुसलमानी राज्य की राजधानी की ओर चल पड़े और उसके फाटकों को जा खटखटाया। उन्हें देख कर मौलवी और मौलाने आश्चर्य में पड़ गये। अभी तक उनका यही दृढ़ विचार था और वे दूसरों को भी यही विश्वास करने पर बाध्य कर रहे थे कि कुरान सच्चा है क्यों इस्लामी सेनाओं द्वारा पुराणों के मानने वाले हिन्दुओं पर राजनैतिक विजय प्राप्त हुई है। पर अब जब उन्हों ने देखा कि पुराणों के मानने वाले हिन्दू भिन्न २ सम्प्रदाय और जाति में विभक्त, मूर्ति-पूजक और बिना दाढ़ी के होते हुए भी, असीम सेना के साथ दिल्ली की ओर बढ़ रहे हैं और उन्होंने अपना गेरुआ झंडा मुसलमानी क़िलों पर गाड़ दिया है, तो ये निराशा के सागर मे डूब गये। इस बार जब्राईल कुरान के विरुद्ध 'पुराण' की सफलता देख कर लड़ने को न आया। उनका विश्वास था कि भूतकाल मे वह ऐसे समयों पर आया करता था अब कोई यह नहीं कह सकता कि क्योंकि मुसलमान धर्म सच्चा है इसी लिये उस की विजय होती रही है; और क्योंकि हिन्दू-मन्दिर गिराये गये थे इसलिये उनका धर्म झूठा है। मुसलमानों का वह ऊपरिलिखित दावा, जिस पर कि वे असंख्य हिन्दुओं को मुसलमान बनाते थे, अब झूठा प्रमाणित हुआ। अब मन्दिरों की चोटियां मसजिदों से ऊपर उठी दिखाई देने लगीं। चांद की रोशनी फ़ीकी पड़ गई और उनका झंडा अन्तिम सांस लेने लगा और हिन्दू राज्य का सुनहरा झंडा फहराने लगा। दिल्ली पर फिर पृथ्वीराज के वंशजो का शासन हो गया और हस्तिनापुर फिर एक बार हिन्दुओं के हाथ में आ गया। औरङ्गज़ेब ने शिवाजो को चूहा कहा था, लेकिन उसी चूहे ने शेर को उस की मांद में जा ललकारा और उसके पंजे और दांतों को एक २ करके उखाड़ लिया। गुरु गोविन्दसिंह जी के "चिड़ियों से मैं बाज मरवाऊं" कथनानुसार गौधों ने गौ-वधिकों को मार डाला।
[ ५० ] वे शूरवीर कुरुक्षेत्र में स्नान करके अपनी विजयी सेना को लाहौर ले गये। अफ़गानों ने उन्हें रोकना चाहा, पर अटक के पार भगा दिये गये। वहां पर मरहठा वीर ने लगामें खींची और घोड़े से उतर कर थोड़ा विश्राम किया क्योंकि उसके सेनापति और नेता पूना में एकत्र होकर काबुल पार के हिन्दूकुश के ऊपर आक्रमण करने का विचार कर रहे थे। फ़ारस, इंगलैंड, पुर्तगाल, फ्रांस, हालैंड और आस्ट्रिया के राजदूत पूना में पहुंचे और उन्होंने प्रार्थना की कि वे लोग अपने राष्ट्रों की ओर से महाराष्ट्र के शाही दरबार में राजदूत बन कर रहना चाहते हैं। बंगाल के मुसलमान नवाब, लखनऊ के मुस्लिम वायसराय, मैसूर के मुसलमान सुलतान, हैदराबाद के मुस्लिम निज़ाम और रुहेलखंड और अर्काट इत्यादि के छोटे बड़े सरदार अब मरहठों को कर, “चौथ” और “सर- देशमुखी”–देने लगे। और भी सब कुछ देने को तय्यार थे। वे तो अब केवल जीना ही चाहते थे। निज़ाम अब नाममात्र के निज़ाम रह गये और जो कुछ मालगुज़ारी राज्य में एकत्र करते थे, वह किसी न किसी प्रकार मरहठा-राजकोष में आ ही जाया करती थी। मरहठों के शत्रु भारतवर्ष के यवन ही नहीं थे, वरन् हम देखते हैं कि ईरानी, काबुली, तुर्क, मुग़ल, रुहेले और पठान, पुर्तगेज़, फ्रेंच, इंगलिश और अबेसीनियन लोग सभी एक-एक करके मरहठों से स्थल और जल पर लड़े, किन्तु हिन्दू-सेना ने देश और धर्म के नाम पर लड़कर उन्हें पराजित कर दिया। रंगाना, विशालगढ़, चाकन, राजापुर वैनगुरला, बरसीनूर, पुरंधर, सिंहगढ़, साल्हेर, ऊम्बरानी, सवनूर, संगमनेर, फोंडा, वाई, फाल्टन, जिनजी, सितारा, दिनदोरी, पालखेड़, पेटलाद, चिपलून, विजयगढ़,
[ ५१ ] श्रीगांव, थाना, तारापुर, वसाई, सरंगपुर, जैतपुर, दिल्ली, दुगई, सेराई, भूपाल, अरकाट, त्रिचनापली, फादिग्गंज, फरुखाबाद, उद्रिग, कुञ्जपुर, पानीपत, राक्षसभुवन, उनावदी, मोतीतलाओ, धारवाड़, शुकताल, नसीबगढ, बडगाओं, घोरघाट, बादामी, आगरा, सास्डा, इत्यादि स्थानों में मरहठों की स्थल और समुद्र में ऐसी भारी विजय हुई कि यदि ऐसी हमारे पुराने इतिहास में हुई होती या किसी दूसरे देश के राष्ट्र की हुई होती तो वहां पर उन्हें स्मरण करने के लिये विजय-स्तम्भ खड़ा किया गया होता । शिवाजी के जन्म से लेकर नाना फड़नवीस के समय तक हरिभक्तों को कहीं पराजय नहीं हुई। ज्यों २ वे उन्नति करते गये, छोटी २ जागीरें, जितने बड़े कि दूसरे देशों में बहुत से राज्य हैं, देते गये, सतारा, नागपुर, कोल्हापुर, तंजोर, मांगली. मिराज, गुन्नी, बड़ौदा, धार, इंदौर, झांसी, ग्वालियर, और भी बहुत से स्थान सूत्रों की राज- धानियां थीं; जो कि इतने बड़े २ हैं जितने बड़े यूरोप में बहुत से राज्य हैं। उन्होंने हरिद्वार, कुरुक्षेत्र, मथुरा, डाकोर, आबु और अवन्ती, परशुराम और प्रभास, नासिक, त्र्यम्बक, द्वारिका, जगन्नाथ, मालिकार्जुन, मदुरा, गोकुल, गोकर्ण इत्यादि स्थानों को विदेशियों के पंजे से मुक्त किया। काशी, प्रयाग और रामेश्वर फिर से गर्वपूर्ण से निर्भय होकर अपने कलस उठाने के योग्य बन गये और वे मन में परमात्मा को धन्यवाद देने लगे कि एक हिन्दू-राज्य अब भी उनके शत्रुओं से बदला लेने के लिये जीवित है। इस हिन्दू साम्राज्य में पुराने समय के मउखरि, चालुक्य, पल्लव, पांड्य, चोल, केराल, राष्ट्रकूट, अंध्रा, केसरी, भोज, मालवा, हर्ष और पुलकेशिन के राज्य, राठोड़ और च्यवन आदि सभी पुराने वंशों के राज्य सम्मिलित थे। इनके गवर्नर और सेनापति इतने बड़े २ देशों पर शासन करते थे कि पुराने समय में उतने बड़े राज्य पर शासन करने वाले अश्वमेध यज्ञ किया करते थे। पहले और दूसरे चन्द्रगुप्त के राज्यों को छोड़ कर कोई हिंदूराज्य इतना विशाल और विस्तृत नहीं हुआ,
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और न उतना गौरव प्राप्त कर सका । और जहां तक जातीय सेवाओं, आत्म बलिदानों का संबंध है, किसी को भी मरहठों की तरह भयंकर आपदाओं और विपत्तियों का सामना नहीं करना पड़ा और ऐसी कठि- नाइयों का सामना करते रहने पर भी कोई भी राज्य मरहठा राज्य की तुलना नहीं कर सकता । शायद हमारे इतिहासों में, जो मनुष्य सब हिंदू राजाओं को परास्त कर देता था, वह चक्रवर्त्ती कहलाता था और जो विदेशियों से देश और धर्म की रक्षा करता था उसे 'विक्रमादित्य' कहा करते थे । पहले विक्र- मादित्य ने सीदियन लोगों को देश से निकाला, दूसरे ने शक लोगों को और तीसरे ने, जिन्हें यशोधर्मा विक्रमादित्य कहते हैं; हूण लोगों को हटाकर उनके राजा को एक महान् युद्ध में मार डाला । यदि हमारी यह कल्पना सत्य है कि विक्रमादित्य का महान् पद उसे ही मिलता था जो धर्मयुद्ध में लड़कर विदेशियों को मार भगाता था, तो जो दिग्विजय करने के लिये अपनी सैनिक शक्ति के उत्कर्ष के लिये नहीं अपितु देश और धर्म दोनों को विदेशियों की पराधीनता से स्वतन्त्रता कराने के लिये लड़े हों और उन्होंने उन पर विजय पाई हो तब उनके कार्य, जिन्होंने यह सब से आखिरी हिन्दू-साम्राज्य स्थापित किया, कई प्राचीन चक्रवर्तियों और विक्रमादित्यों के कार्यों और उनके उद्देश्यों की दृष्टि से किसी प्रकार भी कम महत्त्वशाली नहीं। इसलिये वे भी चक्रवर्ती और विक्रमादित्य दोनों पदों से विभूषित किये जाने के अधिकारी हैं और प्रत्येक हिन्दू का धर्म है कि वह उनके प्रति वही भाव रक्खे जो पुराने भारतीय अपने चक्रवर्ती राजाओं और विक्रमादित्य राजाओं के प्रति रखा करते थे। क्योंकि उन्होंने जातीय पताका राजपूतों के शिथिल हाथों से पकड़ी और हिंदुओं से घृणा करने वाले सभी के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी तथा दाहिर, अनंगपाल, जैपाल, पृथ्वीराज, हरपाल, प्रताप इत्यादि राजाओं के बलि -
[ ५३ ] दानों और चित्तौड़ और विजयनगर की राजधानियों पर किये गये अत्या- चारों का बदला अच्छी तरह लिया । मरहठों ने छः शताब्दियों में प्राप्त की हुई मुमलमलानों की विजय को एक शताब्दी में मिटा दिया । यदि वे पूर्ण रीति से जगे होते तो अर्द्ध-शताब्दी भी न लगी होती । अब हम हिन्दुओं को उचित है कि इन शूरवीरों के द्वारा किये गये हिंदू-जाति के उपकारों के लिये सदैव उन्हें श्रद्धाभक्ति की दृष्टि से देखते रहें, सदैव कृतज्ञता प्रकट करते रहें और जिस बड़े राज्य को उन्होंने स्थापित किया था उसपर एक बार दृष्टिपात करलें, क्योंकि शीघ्र ही और अकस्मात् इस विशाल साम्राज्य के ऊपर परदा पड़ने वाला है और यह हम लोगों के सजल नेत्रों से ओझल हो जाने वाला है । ७. पटाक्षेप ॐ हिंमत सोडू नये सूर्य पुन्हा येइल उदयाला" —प्रभाकर यह सिंहावलोकन हमने सन् १७९५ ई० अर्थात् खारदा की लड़ाई तक किया है । पहले के सब वर्णन इसी काल से सम्बन्ध रखते हैं । हमारा उद्देश्य घटनाओं की गणना करने का नहीं था । हमारा उद्देश्य यही रहा है कि मरहठों के मुख्य - आदर्शों और सिद्धान्तों को जनता के सामने लायें और उनके उन मनोरथों और उद्देश्यों का पता लगायें जिनके लिये मरहठे देश की धर्मवेदी पर बलिदान देने के लिये प्रस्तुत हुए । और इन ही आदर्शों के प्रकाश में हिंदू जाति के इतिहास में मरहठों के इतिहास का स्थान निश्चित करें । यह कार्य समाप्त होगया। ॐ इस आशा को दृष्टि में रख कर कि भले दिन फिर कभी न कभी अवश्य उदय होंगे, हिम्मत नहीं हारनी चाहिए ।
[ ५४ ] उसपर भी सन् १७९५ ई० से लेकर १८१८ ई० तक का समय, जिसमें महाराष्ट्र राज्य का विध्वंस हुआ, अभी शेष रह गया है और वह ऐसा रोमाञ्चकारी है कि उसका वर्णन बिना आंसू बहाये नहीं हो सकता। हम ऊपर देख आये हैं कि मरहठे, मुसलमानों के छः शताब्दियों के बढ़े हुए प्रभाव को सत्यानास करके थके हुए हैं और आराम करने के लिये जा रहे हैं। ठीक इसी समय एक शक्तिशाली राष्ट्र उसपर आक्रमण करता है जो पहले दो बार नीचा देखकर चुप होगया था। मरहठे तीसरी बार भी उन पर विजित हुए होते या उन्हें अवश्य भगा देते, किन्तु अभाग्यवश उसी समय नाना फड़नवीस मर गया और बाजीराओ दूसरा मरहठों का पेशवा हुआ जो कि शत्रुओं का निस्सन्देह दास था। यह दो व्यक्ति-नाना और बाजीराओ-द्वितीय परस्पर विरुद्ध वृत्तियों के प्रतीक थे—सारे महाराष्ट्र आन्दोलन में इन दो परस्पर विरुद्ध वृत्तियों का सदा संघर्ष चलता रहा है--एक वृत्ति तो स्वार्थ और राष्ट्रीय हित विरोधी आत्म-उन्नति की ओर बढ़ाती रही और दूसरी वृत्ति स्वार्थ त्याग तथा परोपकार का पाठ पढ़ाती रही जिस में मनुष्य आप राज्य मुकुट प्राप्त न करके अपने देश के गौरव के उत्कर्ष बढ़ाने और अपनी जाति को स्वतन्त्र कराने में सफल होता था। यद्यपि मरहठे इस कुवृत्ति को पूर्णतया नष्ट न कर सके तो भी उन्होंने नाना फड़नवीस के समय तक इसे विकसित नहीं होने दिया--इसी के फलस्वरूप वे हिन्दू-पद- पादशाही की स्थापना कर सके थे। बाजीराव द्वितीय अति स्वार्थी पेशवा था और किसी प्रकार और मरहठों से मेल और सहानुभूति नहीं रखता था। ज्योंही शासन की बागडोर इसके हाथ में पहुंची, इस पर विदेशी राष्ट्र के द्वारा आक्रमण हुआ। यदि वह राष्ट्र भारतवर्ष का होता या एशिया महाद्वीप के अन्तर्गत किसी राष्ट्र का होता तो मरहठे अवश्य विजयी हुए होते, क्योंकि एशिया के राज्यों में मरहठे सब से
[ ५५ ] संगठित थे। परन्तु यह शत्रु इंगलैंड का था। अब इस युद्ध का फल वही निकला जिसकी सम्भावना थी। उस समय इंगलैंड के पास, मरहठों की अपेक्षा राज्यों के विजय करने के साधन अधिक श्रेष्ठ थे। उनके देश में बड़ी-बड़ी गृह कलहयें, वार आफ रोजज़ धार्मिक उपद्रव और स्टार चैम्बर की क्रूरता की घटनाएं हो चुकी थीं जिन के कारण उन में युद्ध-सम्बन्धी उन्नति अधिक हो गई थी। मरहठों मे आज्ञा-पालन, शासन करना, अपने देश और राजा के प्रति भक्ति रखना, अपने झंडे पर अभिमान करना, जातीय- मिलाप, और दृढ़ विचार इत्यादि गुण एशिया वासियों के अन्य लोगों से अधिक थे, किन्तु अङ्गरेजों की अपेक्षा बहुत ही कम थे। उस पर भी वे बड़ी वीरता से लड़े, क्योंकि वे भली भांति जानते थे कि इस समय जीवन-मरण का प्रश्न है। किसी-किसी देश-भक्त ने जैसे बापू गोकुल ने, प्रण कर लिया था कि वे मर जायेंगे, किन्तु हथियार नहीं रक्खेंगे। उन्होंने अङ्गरेजी सेनापति से कह दिया कि--'हम अपने कफ़न को अपने सिरों पर लिये हुए हैं और हमने हाथ में तलवार लिये लड़ कर मर जाने का दृढ़ निश्चय कर लिया है'। जिस समय सारे योग्य और राजनीतिज्ञ सेनापति-महादाजी, नाना फडनवीस, राघोजी, तुकोजी और फाड़के काम करते-करते मृत्यु की भेंट हो चुके थे, उस समय निकम्मा बाजीराव द्वितीय मरहठों का सेनापति था और इंगलैंड जैसा शक्तिशाली था उनका शत्रु इस लिए युद्ध का फल पहले ही से ज्ञात हो गया था। मरहठे पराजित हुए, उनके साथ-साथ भारत के अन्तिम हिन्दू-साम्राज्य का अन्त हो गया। केवल पञ्जाब में सिक्ख हिन्दू- स्वतन्त्रता के चिराग की बत्ती की भांति टिमटिमा रहे थे, पर वह भी इन्हीं कारणों से बुझने ही वाले थे। हम यह मानते हैं कि हम दुःख का अनुभव करते हुए अपने महान राष्ट्रीय साम्राज्य की समाधि पर स्मरणलेख लिख रहे हैं। किंतु हम
[ ५६ ] इंग्लैंड की विजय पर ईर्ष्या नहीं करते। हम तो खिलाड़ियों की तरह निष्पक्ष हो कर उन की चतुराई और शक्ति की प्रशंसा करते हैं जिस के कारण उसने समुद्रों, द्वीपों और प्रदेशों पर हाथ फैलाते हुए हमारे संघर्षमय हाथों से भारत साम्राज्य को छीन लिया और उसकी नींव पर उस ने एक शानदार विश्वव्यापी अद्वितीय साम्राज्य की स्थापना कर ली, जिसका कि इतिहास में कोई और उदाहरण नहीं मिलता। सन् १८१८ में हमारे सब से अंतिम और सब से शानदार हिन्दू साम्राज्य की समाधि बन गई। इस की रखवाली करो। निराश मत बनो और ईसाकी माता मेरी की तरह चिंतायुक्त होने पर भी प्रार्थना करते रहो — क्योंकि पता नहीं कि कब यह हिंदू साम्राज्य पुनर्जीवित हो जाये। ॥ ओम् शम् ॥ :——-: