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हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

खोखलेमें दुर्भाग्यसे एक अंधा तथा नखहीन जरद्गव नामक गिद्ध रहता था, और

३२ हितोपदेशः [ मित्रलाभः ५७- स्वाहारात्किंचित्किंचिदुद्धृत्य ददति । तेनासौ जीवति । अथ कदाचिद्दीर्घकर्णनामा मार्जारः पक्षिशावकान्भक्षितुं तत्रागतः । ततस्तमायान्तं दृष्ट्वा पक्षिशावकैर्भयातैः कोलाहलः कृतः । तच्छ्रुत्वा जरद्गवेनोक्तम्—'कोऽयमायाति ?'। दीर्घकर्णो गृध्रमव- लोक्य सभयमाह—'हा, हतोऽस्मि' । गंगाजीके किनारे गृध्रकूट नाम पर्वत पर एक बड़ा पाकड़का पेड़ था। उसके खोखलेमें दुर्भाग्यसे एक अंधा तथा नखहीन जरद्गव नामक गिद्ध रहता था, और उस वृक्षके वासी कृपा करके उसके पालनके लिये अपने आहारमेंसे थोड़ा थोड़ा निकाल कर देते थे; उससे वह जीता था। फिर एक दिन दीर्घकर्ण नाम बिलाव पक्षियोंके बच्चे खानेके लिये वहां आया। पीछे उसे आया हुआ देख कर डरसे घबरा कर पक्षियोंके बच्चे चिंहचिंहाने लगे. यह सुन जरद्गवने कहा—'यह कौन आ रहा है?'. दीर्घकर्ण गिद्धको देख डर कर बोला—'हाय, मैं मारा गया.' यतः,— तावद्भयस्य भेतव्यं यावद्भयमनागतम् । आगतं तु भयं वीक्ष्य नरः कुर्याद्यथोचितम् ॥ ५७ ॥ क्योंकि—भयसे तभी तक डरना चाहिये जब तक वह पास न आवे, परन्तु भयको पास आया देख कर मनुष्यको जो उचित हो सो करना चाहिये ॥ ५७ ॥ अधुनास्य संनिधाने पलायितुमक्षमः । तद्यथा भवितव्यं तद्भवतु । तावद्विश्वासमुत्पाद्यास्य समीपं गच्छामि ।' इत्यालोच्योपसृ- त्याब्रवीत्—'आर्य ! त्वामभिवन्दे ।' गृध्रोऽवदत्—'कस्त्वम् ?' । सोऽवदत्—'मार्जारोऽहम्' । गृध्रो ब्रूते—'दूरमपसर । नो चेद्ध- न्तव्योऽसि मया' । मार्जारोऽवदत्—'श्रूयतां तावदस्मद्वचनम् । ततो यद्यहं वध्यस्तदा हन्तव्यः । अब इसके पाससे भाग नहीं सकता हूं, इसलिये जो होनहार है सो हो । पहले विश्वास पैदा कर इसके पास जाऊं । यह विचार उसके पास जाकर बोला—'हे महाराज ! मैं आपको प्रणाम करता हूं'. गिद्ध बोला—'तू कौन है ?'. वह बोला—'मैं बिलाव हूं'. गिद्ध बोला—'दूर हट जा; नहीं तो मैं तुझे मार डालूंगा'. बिलाव बोला—'पहले मेरी बात तो सुन, लो पीछे जो मैं मारनेके योग्य होऊं तो मार डालना ।

-५९ ] बिलावकी धर्मके बहानेसे आश्रययाचना ३३ यतः,- जातिमात्रेण किं कश्चिद्धन्यते पूज्यते क्वचित् ? । व्यवहारं परिज्ञाय वध्यः पूज्योऽथवा भवेत् ॥ ५८ ॥ क्योंकि-केवल जातिसे क्या कभी कोई मारने अथवा सत्कार करने लायक होता है ? परंतु व्यवहारको जान कर मारने अथवा पूजनेके योग्य होता है॥५८॥ गृध्रो ब्रूते—'ब्रूहि, किमर्थमागतोऽसि ?' । सोऽवदत्—'अहमत्र गङ्गातीरे नित्यस्नायी निरामिषाशी ब्रह्मचारी चान्द्रायणव्रतमा- चरंस्तिष्ठामि । 'यूयं धर्मज्ञानरता विश्वासभूमयः' इति पक्षिणः सर्वे सर्वदा ममाग्रे प्रस्तुवन्ति । अतो भवद्भ्यो विद्यावयोवृद्धेभ्यो धर्मं श्रोतुमिहागतः । भवन्तश्चैतादृशा धर्मज्ञा यन्मामतिथिं हन्तुमुद्यताः । गिद्ध बोला-'कह, किसलिये आया है ?' वह बोला-'मैं यहां पर गंगाजीके किनारे नित्य स्नान करता हूं। मांसका भक्षण न करने वाला ब्रह्मचारी हूं और चान्द्रायण व्रत करता हूं । 'तुम्हारी धर्म तथा ज्ञानमें प्रीति है और विश्वासपात्र हो', इस प्रकार सब पक्षी सदा मेरे सामने तुम्हारी प्रशंसा किया करते हैं। तुम विद्या और अवस्थामें बड़े हो, इसलिये आपसे धर्म सुननेके लिये यहां आया हूं और आप ऐसे धर्मी हैं कि मुझ अतिथिको मारनेके लिये तैयार हैं। गृहस्थधर्मश्चैषः- अरावप्युचितं कार्यमातिथ्यं गृहमागते । छेत्तुः पार्श्वगतां छायां नोपसंहरते द्रुमः ॥ ५९ ॥ परन्तु गृहस्थधर्म तो यह है कि-अपने घर पर वैरीभी आवे तो उसका यथोचित आदर करना चाहिये, जैसे वृक्ष अपने (पास आये हुए) काटने वालेके पास गई अपनी छायाको समेट नहीं लेता है ॥ ५९ ॥ यदि वा धनं नास्ति तदा प्रीतिवचसाप्यतिथिः पूज्य एव । जो धन न हो तो मीठे २ वचनोंसेही अतिथिका सत्कार करना चाहिये । १ त्रिकाल-स्नान कर सावधान और जितेन्द्री होकर कृष्णपक्षमें एक २ ग्रास कम करे और शुक्लपक्षमें एक २ ग्रास बढावे इसीको मनुने 'चान्द्रायण-व्रत' कहा है. हि० ३

३४ हितोपदेशः [मित्रलाभः ६०- यतः,— तृणानि भूमिरुदकं वाक् चतुर्थी च सूनृता । एतान्यपि सतां गेहे नोच्छिद्यन्ते कदाचन ॥ ६० ॥ क्यों कि-कुशाका आसन, बैठनेकी भूमि, जल, और चौथी सत्य और मीठी वाणी इनका सज्जनोंके घरमें कभी टोटा नहीं होता है ॥ ६० ॥ अपरं च,— निर्गुणेष्वपि सत्त्वेषु दयां कुर्वन्ति साधवः । न हि संहरते ज्योत्स्नां चन्द्रश्चाण्डालवेश्मनः ॥ ६१ ॥ और दूसरे-सज्जन लोग, गुणहीन प्राणियों परभी दया करते हैं। जैसे चन्द्रमा चाण्डालके घर पर पड़ी चांदनीको नहीं समेट लेता है ॥ ६१ ॥ अन्यच्च,— अतिथिर्यस्य भग्नाशो गृहात्प्रतिनिवर्तते । स तस्मै दुष्कृतं दत्त्वा पुण्यमादाय गच्छति ॥ ६२ ॥ और जिसके घरसे अतिथि विमुख लौट जाता है, वह अतिथि अपने पापको देकर और उस गृहस्थका पुण्य लेकर चला जाता है ॥ ६२ ॥ अन्यच्च,— उत्तमस्यापि वर्णस्य नीचोऽपि गृहमागतः । पूजनीयो यथायोग्यं सर्वदेवमयोऽतिथिः१ ॥ ६३ ॥ और उत्तम वर्णके घर नीच वर्णकाभी अतिथि आवे तो उसका यथोचित सत्कार करना चाहिये, क्योंकि अतिथि सर्वदेवमय है ॥ ६३ ॥ गृध्रोऽवदत्—'मार्जारो हि मांसरुचिः । पक्षिशावकाश्चात्र निव- सन्ति । तेनाहमेवं ब्रवीमि ।' तच्छ्रुत्वा मार्जारो भूमिं स्पृष्ट्वा कर्णौ स्पृशति । ब्रूते च—'मया धर्मशास्त्रं श्रुत्वा वीतरागेणेदं दुष्करं व्रतं चान्द्रायणमध्यवसितम् । परस्परं विवदमानानामपि धर्मशास्त्रा- णाम् 'अहिंसा परमो धर्मः' इत्यत्रैकमत्यम् । गिद्ध बोला-'बिलावकी मांसमें जरूर रुचि होती है, और यहां पक्षियोंके छोटे २ बच्चे रहते हैं. इसलिये मैं ऐसे कहता हूं'। यह सुन कर बिलावने भूमिको १ कहा है कि, जो फल सब देवताओंकी सेवासे मिलता है वही फल अतिथिकी सेवासे मिलता है ।

-६८ ] बिलावकी चाटुता पर आश्रय दे देना ३५

छूकर कानोंको छुआ, और बोला-‘मैंने धर्मशास्त्र सुन कर और विषयवासनाको छोड़ यह कठिन चान्द्रायण व्रत किया है । आपसमें धर्मशास्त्रोंका विरोध होने परभी “हिंसा न करना यही परम धर्म है” इस मंतव्यमें सब एकमत हैं,— यतः,— सर्वहिंसानिवृत्ता ये नराः सर्वसहाश्च ये । सर्वस्याश्रयभूताश्च ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ ६४ ॥ क्योंकि—जो मनुष्य सब प्रकारकी हिंसासे रहित हैं, सब( असह्य )को सहते हैं और सबको सहारा देते हैं वे स्वर्गको जाते हैं ॥ ६४ ॥ एक एव सुहृद्धर्मो निधनेऽप्यनुयाति यः । शरीरेण समं नाशं सर्वमन्यत्तु गच्छति ॥ ६५ ॥ एक धर्मही मित्र है जो मरने परभी ( आत्माके ) साथ जाता है, अन्य सब वस्तु शरीरके साथ ( यहां ) ही नाश हो जाती हैं ॥ ६५ ॥ योऽत्ति यस्य यदा मांसमुभयोः पश्यतान्तरम् । एकस्य क्षणिका प्रीतिरन्यः प्राणैर्विमुच्यते ॥ ६६ ॥ जो प्राणी जिस समय, जिस प्राणिका मांस खाता है उन दोनोंमें अन्तर देखो—एकको तो केवल क्षणभरका संतोष होता है और दूसरा प्राणोंसे जाता है ॥ ६६ ॥ मर्त्तव्यमिति यद्दुःखं पुरुषस्योपजायते । शक्यते नानुमानेन परेण परिवर्णितुम् ॥ ६७ ॥ “मुझे अवश्य मरना होगा” ऐसी चिन्तासे मनुष्यको जो ( प्रत्यक्ष ) दुःख होता है वह दुःख ( केवल ) अनुमानसे दूसरा मनुष्य वर्णन नहीं कर सकता है ॥ ६७ ॥ शृणु पुनः,— स्वच्छन्दवनजातेन शाकेनापि प्रपूर्यते । अस्य दग्धोदरस्यार्थे कः कुर्यात्पातकं महत् ? ॥ ६८ ॥ फिर सुनो–जो पेट अपने आप उगी हुई साग-भाजीसे भी भरा जा सकता है, उस जले पेटके लिये ऐसा बड़ा ( भयंकर ) पाप कौन करे ? ॥ ६८ ॥ एवं विश्वास्य स मार्जारस्तरुकोटरे स्थितः । इस प्रकार विश्वास पैदा कर वह बिलाव वृक्षके खोडरमें रहने लगा । ततो दिनेषु गच्छत्सु पक्षिशावकानाक्रम्य कोटरमानीय प्रत्यहं खादति । येषामपत्यानि खादितानि तैः शोकातैर्विलपद्भिरितस्ततो

३६ हितोपदेशः [ मित्रलाभः ६९- जिज्ञासा समारब्धा । तत्परिज्ञाय मार्जारः कोटरान्निःसृत्य बहिः पलायितः । पश्चात्पक्षिभिरितस्ततो निरूपयद्भिस्तत्र तरुकोटरे शा- वकास्थीनि प्राप्तानि । अनन्तरं त ऊचुः—“अनेनैव जरद्गवेनास्माकं शावकाः खादिताः” इति सर्वैः पक्षिभिर्निश्चित्य गृध्रो व्यापा- दितः । अतोऽहं ब्रवीमि—“अज्ञातकुलशीलस्य-” इत्यादि’ ॥ इत्या- कर्ण्य स जम्बुकः सकोपमाह—‘मृगस्य प्रथमदर्शनदिने भवान- प्यज्ञातकुलशील एव, तत्कथं भवता सहैतस्य स्नेहानुवृत्तिरुत्त- रोत्तरं वर्धते ? और थोड़े दिन बीत जाने पर वह पक्षियोंके बच्चोंको पकड़ खोडरमें लाकर नित्य खाने लगा । जिन पक्षियोंके बच्चे खाये गये थे वे शोकसे व्याकुल विलाप करते हुए इधर उधर ढूंढ़ने लगे । बिलाव यह जान कर खोडरसे निकल कर बाहर भाग गया । उसके पीछे इधर उधर ढूंढते हुए पक्षियोंने उस पेड़की खोह- ड़में बच्चोंकी हड्डियां पाईं । फिर उन्होंने कहा कि—“इस जरद्गवने हमारे बच्चे खाये हैं” । यह बात सब पक्षियोंने निश्चय करके उस बूढे गिद्धको मार डाला । इसीलिये मैं कहता हूं कि—“जिसका कुल और स्वभाव” इत्यादि’. यह सुन वह सियार झुंझल कर बोला-‘मृगसे पहलेही मिलनेके दिन तुम्हाराभी तो कुल और स्वभाव नहीं जाना गया था, फिर किस प्रकार तुम्हारे साथ इसकी गाढ़ी मित्रता क्रम क्रमसे बढ़ती जाती है ? यत्र विद्वज्जनो नास्ति श्लाघ्यस्तत्राल्पधीरपि । निरस्तपादपे देशे एरण्डोऽपि द्रुमायते ॥ ६९ ॥ जहां पंडित नहीं होता है वहां थोड़े पढ़ेकीभी बड़ाई होती है । जैसे कि जिस देशमें पेड़ नहीं होता है वहां अरण्डाका वृक्षही पेड़ गिना जाता है ॥ ६९ ॥ अन्यच्च,— अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम् । उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ॥ ७० ॥ और दूसरे यह अपना है या पराया है, यह अल्पबुद्धियोंकी गिनती ( समझ ) है । उदारचरित वालोंको तो सब पृथ्‍वीही कुटुंब है ॥ ७० ॥ यथायं मृगो मम बन्धुस्तथा भवानपि’ । मृगोऽब्रवीत्—‘किमनेनो- त्तरेण ? सर्वैरेकत्र विश्रम्भालापैः सुखिभिः स्थीयताम् ।

-७१ ] सियारकी चालसे हरिणका बंधन ३७ जैसा यह मृग मेरा बन्धु ( दोस्त ) है वैसेही तुमभी हो' । मृग बोला-'इस उत्तर-प्रत्युत्तरसे क्या है ? सब एक स्थानमें विश्वासकी बातचीत कर सुखसे रहो । यतः,— न कश्चित्कस्यचिन्मित्रं न कश्चित्कस्यचिद्रिपुः । व्यवहारेण मित्राणि जायन्ते रिपवस्तथा' ॥ ७१ ॥ क्योंकि-न तो कोई किसीका मित्र है, और न कोई किसीका शत्रु है । व्यवहारसे मित्र तथा शत्रु बन जाते हैं' ॥ ७१ ॥ काकेनोक्तम् -'एवमस्तु ।' अथ प्रातः सर्वे यथाभिमतदेशं गताः । कौवेने कहा-'ठीक है' । फिर प्रातःकाल सब अपने २ मनमाने देशको गये ॥ एकदा निभृतं शृगालो ब्रूते - 'सखे ! अस्मिन्वनेकदेशे सस्यपूर्ण- क्षेत्रमस्ति । तदहं त्वां नीत्वा दर्शयामि ।' तथा कृते सति मृगः प्रत्यहं तत्र गत्वा सस्यं खादति । अथ क्षेत्रपतिना तद्दृष्ट्वा पाशो योजितः । अनन्तरं पुनरागतो मृगः पाशैर्बद्धोऽचिन्तयत्—'को मामितः कालपाशादिव व्याधपाशान्त्रातुं मित्रादन्यः समर्थः ?' अत्रान्तरे जम्बुकस्तत्रागत्योपस्थितोऽचिन्तयत्—'फलिता तावद- स्माकं कपटप्रबन्धेन मनोरथसिद्धिः । एतस्योत्कृत्यमानस्य मांसा- सृग्लिप्तान्यस्थीनि मयावश्यं प्राप्तव्यानि । तानि बाहुल्येन भोजनानि भविष्यन्ति ।' मृगस्तं दृष्ट्वोल्लासितो ब्रूते—'सखे ! छिन्धि तावन्मम बन्धनम्, सत्वरं त्रायस्व माम् । एक दिन एकांतमें सियारने कहा-'मित्र मृग ! इस वनमें एक दूसरे स्थानमें अनाजसे भरा हुआ खेत है, सो चल तुझे दिखाऊं' । वैसा करने पर मृग वहां जा कर नित्य अनाज खाता रहा । एक दिन उसे खेत वालेने देख कर फंदा लगाया । इसके अनन्तर जब वहां मृग फिर चरनेको आया सोही जालमें फँस गया और सोचने लगा-'मुझे इस कालकी फांसीके समान व्याधके फंदेसे मित्रको छोड़ कौन बचा सकता है?' इस बीचमें शृगाल वहां आकर उपस्थित हुआ, और सोचने लगा-'मेरे छलकी चाल (सफाई)से मेरा मनोरथ सिद्ध हुआ और इस उधड़े हुएकी मांस और लोहू लगी हुई हड्डियां मुझे अवश्य मिलेंगी और वे मनमानी खानेके लिये होंगी.' मृग उसे देख प्रसन्न होकर बोला-'हे मित्र ! मेरा बन्धन काटो और मुझे शीघ्र बचाओ ।

३८ हितोपदेशः [ मित्रलाभः ७२- यतः,— आपत्सु मित्रं जानीयाद्युद्धे शूरमृणे शुचिम् । भार्याँ क्षीणेषु वित्तेषु व्यसनेषु च बान्धवान् ॥ ७२ ॥ आपत्तिमें मित्र, युद्धमें शूर, उधार(ऋण)में सच्चा व्यवहार, निर्धनतामें स्त्री और दुःखमें भाई ( या कुटुंबी ) परखे जाते हैं ॥ ७२ ॥ अपरं च,— उत्सवे व्यसने चैव दुर्भिक्षे राष्ट्रविप्लवे । राजद्वारे श्मशाने च यस्तिष्ठति स बान्धवः’ ॥ ७३ ॥ और दूसरे-विवाहादि उत्सवमें, आपत्तिमें, अकालमें, राज्यके पलटनेमें, राज- द्वारमें तथा श्मशानमें, जो साथ रहता है वह बान्धव है' ॥ ७३ ॥ जम्बुको मुहुर्मुहुः पाशं विलोक्याचिन्तयत्—'दृढस्तावदयं बन्धः ।' ब्रूते च—'सखे ! स्नायुनिर्मिता एते पाशाः । तदद्य भट्टारकवारे कथमेतान्दन्तैः स्पृशामि ? मित्र ! यदि चित्ते नान्यथा मन्यसे तदा प्रभाते यत्त्वया वक्तव्यं तत्कर्तव्यम् ।' इत्यु- क्त्वा तत्समीप आत्मानमाच्छाद्य स्थितः सः । अनन्तरं स काकः प्रदोषकाले मृगमनागतमवलोक्येतस्ततोऽन्विष्य तथाविधं दृष्ट्वोवाच—'सखे ! किमेतत् ?' । मृगेणोक्तम्-‘अवधीरितसुहृ- द्वाक्यस्य फलमेतत् । सियार जालको वार वार देख सोचने लगा-‘यह बड़ा कड़ा बंधा है’. और बोला-‘मित्र ! ये फंदे तांतके बने हुए हैं, इसलिये आज रविवारके दिन इन्हें दांतोंसे कैसे छुऊं ? मित्र ! जो बुरा न मानो तो प्रातःकाल जो कहोगे सो करूंगा’। ऐसा कह कर उसके पासही वह अपनेको छिपा कर बैठ गया । पीछे वह कौवा सांझ होने पर मृगको नहीं आया देख कर इधर उधर ढूंढते ढूंढते उस प्रकार उसे ( बंधनमें ) देख कर बोला-‘मित्र ! यह क्या है?'. मृगने कहा-‘मित्रका वचन नहीं माननेका फल है; तथा चोक्तम्,— सुहृदां हितकामानां यः शृणोति न भाषितम् । विपत्सन्निहिता तस्य स नरः शत्रुनन्दनः’ ॥ ७४ ॥

-७७] सियारको कौवेका हार्दिक धिक्कार ३९ जैसा कहा है कि-जो मनुष्य अपने हितकारी मित्रोंका वचन नहीं सुनता है उसके पासही विपत्ति है, और वह अपने शत्रुओंको प्रसन्न करने वाला है' ॥७४॥ काको ब्रूते—‘स वञ्चकः क्वास्ते ?’ । मृगेणोक्तम्—‘मन्मांसार्थी तिष्ठत्यत्रैव’ । काको ब्रूते—‘उक्तमेव मया पूर्वम्,- कौवा बोला-‘वह ठग कहां है ?’. मृगने कहा-‘मेरे मांसका लोभी यहांही कहाँ बैठा होगा ?’. कौवा बोला-‘मैंने पहलेही कहा था,— अपराधो न मेऽस्तीति नैतद्विश्वासकारणम् । विद्यते हि नृशंसेभ्यो भयं गुणवतामपि ॥ ७५ ॥ ‘मेरा कुछ अपराध नहीं है' अर्थात् मैने इसका कुछ नहीं बिगाड़ा है, अत एव यहभी मेरे संग विश्वासघात न करेगा यह बात कुछ विश्वासका कारण नहीं है। क्योंकि गुण और दोषको बिना सोचे शत्रुता करने वाले नीचोंसे सज्जनोंको अवश्य भय होता ही है ॥ ७५ ॥ दीपनिर्वाणगन्धं च सुहृद्वाक्यमरुन्धतीम् । न जिघ्रन्ति न शृण्वन्ति न पश्यन्ति गतायुषः ॥ ७६ ॥ और जिनकी मृत्यु पास आ लगी है, ऐसे मनुष्य न तो बुझे हुए दियेकी चिरांद सूंघ सकते हैं, न मित्रका वचन सुनते हैं और न अरुन्धतीके तारेको देख सकते हैं ॥ ७६ ॥ परोक्षे कार्यहन्तारं प्रत्यक्षे प्रियवादिनम् । वर्जयेत्तादृशं मित्रं विषकुम्भं पयोमुखम्' ॥ ७७ ॥ पीठ पीछे काम बिगाड़ने वाले और मुख पर मीठी २ बातें करने वाले मित्रको, मुखपर दूध वाले विषके घड़ेके समान छोड़ देना चाहिये' ॥ ७७ ॥ ततः काको दीर्घं निःश्वस्य ‘अरे वञ्चक ! किं त्वया पापकर्मणा कृतम् ? कौवेने लंबी सांस भर कर कहा कि-‘अरे ठग ! तुझ पापीने यह क्या किया ? यतः,— संलापितानां मधुरैर्वचोभि- र्मिथ्योपचारैश्च वशीकृतानाम् । १ आकाशमें सप्त ऋषियोंके तारोंके पास एक बहुत छोटासा तारा है ।

४० हितोपदेशः [ मित्रलाभः ७८- आशावतां श्रद्दधतां च लोके किमर्थिनां वञ्चयितव्यमस्ति ? ॥ ७८ ॥ क्यों कि-अच्छे प्रकारसे बोलने वालोंको, मीठे २ वचनों तथा मिथ्या कपटसे वशमें किये हुओंको, आशा रखने वालोंको, भरोसा रखने वालोंको, और धनके याचकोंको, ठगना क्या बड़ी बात है ? ॥ ७८ ॥ उपकारिणि विश्रब्धे शुद्धमतौ यः समाचरति पापम् । तं जनमसत्यसंधं भगवति वसुधे ! कथं वहसि ? ॥ ७९ ॥ और-हे पृथ्बी ! जो मनुष्य उपकारी, विश्वासी तथा भोले भाले मनुष्यके साथ छल ( ठगाई ) करता है उस ठग पुरुषको हे भगवति पृथ्बी ! तू कैसे धारण करती है ? ॥ ७९ ॥ दुर्जनेन समं सख्यं प्रीतिं चापि न कारयेत् । उष्णो दहति चाङ्गारः शीतः कृष्णायते करम् ॥ ८० ॥ दुष्टके साथ मित्रता और प्रीति नहीं करनी चाहिये । क्योंकि गरम अंगार। हाथको जलाता है और ठंडा हाथको काला कर देता है ॥ ८० ॥ अथवा स्थितिरियं दुर्जनानाम् ,— अथवा दुर्जनोंका यही आचरण है,— प्राक् पादयोः पतति खादति पृष्ठमांसं कर्णे कलं किमपि रौति शनैर्विचित्रम् । छिद्रं निरूप्य सहसा प्रविशत्यशङ्कः सर्वं खलस्य चरितं मशकः करोति ॥ ८१ ॥ मच्छर, दुष्टके समान सब चरित्र करता है, अर्थात् जैसे दुष्ट पहले पैरों पर गिरता है वैसेही यहभी गिरता है । जैसे दुष्ट पीठ पीछे बुराई करता है वैसेही यह भी पीठमें काटता है । जैसे दुष्ट कानके पास मीठी २ बात करता है वैसेही यह भी कानके पास मधुर विचित्र शब्द करता है । और जैसे दुष्ट आपत्तिको देख कर निडर हो बुराई करता है वैसेही मच्छर भी छिद्र अर्थात् रोमके छेदमें प्रवेश कर काटता है ॥ ८१ ॥ दुर्जनः प्रियवादी च नैतद्विश्वासकारणम् । मधु तिष्ठति जिह्वाग्रे हृदि हालाहलं विषम्' ॥ ८२ ॥

-८३ ] हरिणकी मुक्तता, सियारकी मृत्यु ४१ और दुष्ट मनुष्यका प्रियवादी होना यह विश्वासका कारण नहीं है । उसकी जीभके आगे मिठास और हृदयमें हालाहल विष भरा है' ॥ ८२ ॥ अथ प्रभाते क्षेत्रपतिर्लगुडहस्तस्तं प्रदेशमागच्छन् काकेनाव- लोकितः । तमालोक्य काकेनोक्तम्—'सखे मृग ! त्वमात्मानं मृतवत्संदर्श्य वातेनोदरं पूरयित्वा पादान्स्तब्धीकृत्य तिष्ठ। यदाहं शब्दं करोमि तदा त्वमुत्थाय सत्वरं पलायिष्यसि।' मृगस्तथैव काकवचनेन स्थितः। ततः क्षेत्रपतिना हर्षोत्फुल्लोचनेन तथा- विधो मृग आलोकितः। 'आः, स्वयं मृतोऽसि' इत्युक्त्वा मृगं बन्धनान्मोचयित्वा पाशान्ग्रहीतुं सयत्नो बभूव । ततः काकशब्दं श्रुत्वा मृगः सत्वरमुत्थाय पलायितः। तमुद्दिश्य तेन क्षेत्रपतिना क्षिप्तेन लगुडेन शृगालो हतः। पीछे प्रातःकाल कौवेने उस खेत वालेको लकडी हाथमें लिये उस स्थान पर आता हुआ देखा. उसे देख कर कौवेने मृगसे कहा—'मित्र हरिण ! तू अपने शरीरको मरेके समान दिखा कर पेटको हवासे फुला कर और पैरोंको ठिठिया कर बैठ जा। जब मैं शब्द करूं तब तू झट उठ कर जल्दी भाग जाना'. मृग उसी प्रकार कौवेके वचनसे पड गया ! फिर खेत वालेने प्रसन्नतासे आंख खोल कर उस मृगको इस प्रकार देखा.'आहा ! यह तो आपही मर गया' ऐसा कह कर मृगकी फांसीको खोल कर जालको समेटनेका यत्न करने लगा. पीछे कौवेका शब्द सुन कर मृग तुरंत उठ कर भाग गया. इसको देख उस खेत वालेने ऐसी फेंक कर लकड़ी मारी कि उससे सियार मारा गया; तथा चोक्तम् ,— त्रिभिर्वर्षैस्त्रिभिर्मासैस्त्रिभिः पक्षैस्त्रिभिर्दिनैः । अत्युत्कटैः पापपुण्यैरिहैव फलमश्नुते ॥ ८३ ॥ जैसा कहा है—प्राणी तीन वर्ष, तीन मास, तीन पक्ष, और तीन दिनमें, अधिक (बेहद) पाप और पुण्यका फल यहां ही भोगता है ॥ ८३ ॥ अतोऽहं ब्रवीमि—"भक्ष्यभक्षकयोः प्रीतिः" इत्यादि' ॥ इसी लिये मैं कहता हूं-"भोजन और भोजन करने वालेकी प्रीति" इत्यादि' ।

४२ हितोपदेशः [ मित्रलाभः ८४- काकः पुनराह— 'भक्षितेनापि भवता नाहारो मम पुष्कलः । त्वयि जीवति जीवामि चित्रग्रीव इवानघ ! ॥ ८४ ॥ फिर कौवा बोला—'तुझे खा लेनेसे भी तो मेरा बहुत आहार नहीं होगा. मैं निष्कपट चित्रग्रीवके समान तेरे जीनेसे जीता रहूंगा ॥ ८४ ॥ अन्यच्च,— तिरश्चामपि विश्वासो दृष्टः पुण्यैककर्मणाम् । सतां हि साधुशीलत्वात्स्वभावो न निवर्तते ॥ ८५ ॥ और (पुण्यात्मामें) मृग-पक्षियोंकाभी विश्वास देखा जाता है; क्योंकि, पुण्यही करने वाले सज्जनोंका स्वभाव सज्जनताके कारण कभी नहीं पलटता है ॥ ८५ ॥ किंच,— साधोः प्रकोपितस्यापि मनो नायाति विक्रियाम् । न हि तापयितुं शक्यं सागराम्भस्तृणोल्कया' ॥ ८६ ॥ और चाहे जैसे क्रोधमें क्यों न हो सज्जनका स्वभाव कभी डामाडोल न होगा, जैसे (जलते हुए) तनकोंकी आंचसे समुद्रका जल कौन गरम कर सकता है ?' ॥ ८६ ॥ हिरण्यको ब्रूते—'चपलस्त्वम् । चपलेन सह स्नेहः सर्वथा न कर्तव्यः । हिरण्यकने कहा—'तू चंचल है. ऐसे चंचलके साथ स्नेह कभी नहीं करना चाहिये. तथा चोक्तम्,— मार्जारो महिषो मेषः काकः कापुरुषस्तथा । विश्वासात्प्रभवन्त्येते विश्वासस्तत्र नोचितः ॥ ८७ ॥ जैसा कहा है कि—बिल्ली, भैंसा, भेड़, काक और ओछा (नीच) आदमी विश्वास करनेसे ये अपनी प्रभुता दिखाते हैं, इसलिये इनमें विश्वास करना उचित नहीं है ॥ ८७ ॥ किं चान्यत्, शत्रुपक्षो भवानस्माकम् । और दूसरा—तुम मेरे वैरीयोंके पक्षके हो;

-९२ ] कौवेकी प्रीति-याचना ४३ उक्तं चैतत्,― शत्रुना न हि संदध्यात् सुश्लिष्टेनापि संधिना । सुतप्तमपि पानीयं शमयत्येव पावकम् ॥ ८८ ॥ और यह कहा है कि वैरी चाहे जितना मीठा बन कर मेल करे परन्तु उसके साथ मेल न करना चाहिये, क्योंकि पानी चाहे जितनाभी गरम हो आगको बुझाही देता है ॥ ८८ ॥ दुर्जनः परिहर्त्तव्यो विद्ययालंकृतोऽपि सन् । मणिना भूषितः सर्पः किमसौ न भयंकरः ? ॥ ८९ ॥ दुर्जन विद्यावान्भी हो परन्तु उसे छोड़ देना चाहिये, क्योंकि रत्नसे शोभायमान सर्प क्या भयंकर नहीं होता है ? ॥ ८९ ॥ यदशक्यं न तच्छक्यं यच्छक्यं शक्यमेव तत् । नोदके शकटं याति न च नौर्गच्छति स्थले ॥ ९० ॥ जो बात नहीं हो सकती है वह कदापि नहीं हो सकती है, और जो हो सकती है वह हो ही सकती है; जैसे पानी पर गाड़ी नहीं चलती और जमीन पर नाव नहीं चल सकती है ॥ ९० ॥ अपरं च,― महताप्यर्थसारेण यो विश्वसिति शत्रुपु । भार्यासु च विरक्तासु तदन्तं तस्य जीवनम्' ॥ ९१ ॥ और दूसरे-जो मनुष्य अधिक प्रयोजनसे शत्रुओं और व्यभिचारिणी स्त्रियों पर विश्वास करता है उसके जीनेका अंत आपहुँचा है ( मृत्यु संनिध है)' ॥९१॥ लघुपतनको ब्रूते—'श्रुतं मया सर्वम् । तथापि मम चैतावान्संक- ल्पः-'त्वया सह सौहृद्यमवश्यं करणीयम्' इति । नो चेदनाहा- रेणात्मानं व्यापादयिष्यामि । लघुपतनक कौवा बोला-'मैंने सब सुन लिया, तोभी मेरा इतना संकल्प है कि तेरे संग मित्रता अवश्य करनी चाहिये. नहीं तो भूखा मर अपघात करूंगा. तथा हि,― मृद्धटवत् सुखभेद्यो दुःसंधानश्च दुर्जनो भवति । सुजनस्तु कनकघटवद्दुर्भेद्यश्चाशु संधेयः ॥ ९२ ॥

४४ हितोपदेशः [ मित्रलाभः ९३- और देख-दुर्जन मनुष्य मट्टीके घड़ेके समान सहज टूटा जा सकता है और फिर उसका जुड़ना कठिन है. और सजन सोनेके घड़ेके समान है कि कभी टूट नहीं सकता और जो टूटे भी तो शीघ्र जुड़ सकता है ॥ ९२ ॥ किंच,— द्रवत्वात्सर्वलोहानां निमित्तान्मृगपक्षिणाम् । भयाल्लोभाच्च मूर्खाणां संगतं दर्शनात्सताम् ॥ ९३ ॥ और सोना, चांदी आदि धातुओंका गलानेसे, पशुपक्षियोंका पूर्वजन्मके संस्कारसे, मूर्खोंका भय और लोभसे, और सज्जनोंका केवल दर्शनसेही मेल होता है ॥ ९३ ॥ किंच,— नारिकेलसमाकारा दृश्यन्ते हि सुहृज्जनाः । अन्ये बदरिकाकारा बहिरेव मनोहराः ॥ ९४ ॥ और सजन पुरुष नारियलके समान बाहरसे दीखते हैं अर्थात ऊपरसे सख्त और भीतरसे मीठे, और दुर्जन बेरफलके आकारके समान बाहरहीसे मनोहर होते हैं ॥ ९४ ॥ स्नेहच्छेदेऽपि साधूनां गुणा नायान्ति विक्रियाम् । भङ्गेऽपि हि मृणालानामनुबध्नन्ति तन्तवः ॥ ९५ ॥ स्नेह टूट जाय तो भी सज्जनोंके गुण नहीं पलटते हैं, जैसे कमलकी डंडीके टूटने परभी उसके तंतु जुड़ेही रहते हैं ॥ ९५ ॥ अन्यच्च,— शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः । दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः ॥ ९६ ॥ और दूसरे-पवित्रता अर्थात् निष्कपटता, दानशीलता, शूरता, सुख-दुःखमें समानता, अनुकूलता, प्रीति और सत्यता ये मित्रोंके गुण हैं ॥ ९६ ॥ एतैर्गुणैरुपैतो भवदन्यो मया कः सुहृत्प्राप्तव्यः ?' इत्यादि तद्वचन- माकर्ण्य हिरण्यको बहिर्निःसृत्याह—'आप्यायितोऽहं भवतामनेन वचनामृतेन । इन गुणोंसे युक्त तुम्हें छोड़ और किसको मित्र पाऊंगा' उसकी ऐसी (मीठी) बातें सुन कर हिरण्यक बाहर निकल कर बोला-'तुम्हारे वचनरूपी अमृतसे मैं तृप्त हुआ;

-१०१ ] मैत्रीपथमें कौवेकी सफलता ४५ तथा चोक्तम्,- घर्मार्तं न तथा सुशीतलजलैः स्नानं न मुक्तावली न श्रीखण्डविलेपनं सुखयति प्रत्यङ्गमप्यर्पितम् । प्रीत्या सज्जनभाषितं प्रभवति प्रायो यथा चेतसः सद्युक्त्या च पुरस्कृतं सुकृतिनामाकृष्टिमन्त्रोपमम् ॥ ९७ ॥ जैसा कहा है कि-सुन्दर २ युक्तियोंसे शोभायमान, पुण्यात्माओंके आकर्षण मंत्रके समान प्रीतिसे कहा हुआ सज्जनोंका वचन जैसा चित्तको अत्यन्त सुख- कारी होता है वैसा शीतल जलसे स्नान, मोतियोंकी माला और अंगअंगमें लगा हुआ लेपन किया हुआ चंदन भी धूपके सताये हुएको सुख नहीं देता है ॥९७॥ अन्यच्च,- रहस्यभेदो याञ्ज्ञा च नैष्ठुर्यं चलचित्तता । क्रोधो निःसत्यता द्यूतमेतन्मित्रस्य दूषणम् ॥ ९८ ॥ और दूसरे-गुप्त बातको प्रकट करना, धन आदिकी याचना, कठोरता, चित्तकी चंचलता, क्रोध, झूठ और जुआ, ये मित्रके दूषण हैं ॥ ९८ ॥ अनेन वचनक्रमेण तदेकमपि दूषणं त्वयि न लक्ष्यते । सो तुम्हारी बातोंके ढंगसे उनमेंसे एकभी दोष तुममें नहीं दीखता है. यतः,- पटुत्वं सत्यवादित्वं कथायोगेन बुध्यते । अस्तब्धत्वमचापल्यं प्रत्यक्षेणावगम्यते ॥ ९९ ॥ क्योंकि-चातुर्य और सत्य यह बातचीतसे जान लिये जाते हैं, और नम्रता और शांतता ये प्रत्यक्ष जानी जाती हैं ॥ ९९ ॥ अपरं च,- अन्यथैव हि सौहार्दं भवेत्स्वच्छान्तरात्मनः । प्रवर्ततेऽन्यथा वाणी शाठ्योपहतचेतसः ॥ १०० ॥ और दूसरे-निष्कपट चित्त वालेकी मित्रता अन्यही तरहकी होती है और जिसका हृदय शठतासे बिगड़ रहा है उसकी वाणी औरही प्रकारकी होती है ॥ मनस्यन्यद्वचस्यन्यत् कार्यमन्यद्दुरात्मनाम् । मनस्येकं वचस्येकं कर्मण्येकं महात्मनाम् ॥ १०१ ॥

४६ हितोपदेशः [ मित्रलाभः १०२- दुर्जनोंके मनमें कुछ, वचनमें और काममें कुछ; और सज्जनोंके जीमें, बच- नमें और काममें एक बात होती है ॥ १०१ ॥ तद्भवतु भवतोऽभिमतमेव।' इत्युक्त्वा हिरण्यको मैत्र्यं विधाय भोजनविशेषैर्वायसं संतोष्य विवरं प्रविष्टः । वायसोऽपि स्वस्थानं गतः। ततः प्रभृति तयोरन्योन्याहारप्रदानेन कुशलप्रश्नैर्विश्रम्भा- लापैश्च कालोऽतिवर्तते । इसलिये तेरा ही मनोरथ हो।' यह कह कर हिरण्यक मित्रता करके विविध प्रकारके भोजनसे कौवेको संतुष्ट करके बिलमें घुस गया। और कौवाभी अपने स्थानको चला गया। उस दिनसे उन दोनोंका आपसमें भोजनके देने-लेनेसे, कुशल पूछनेसे और विश्वासयुक्त बातचीतसे समय कटने लगा। एकदा लघुपतनको हिरण्यकमाह - 'सखे ! कष्टतरलभ्याहार- मिदं स्थानं परित्यज्य स्थानान्तरं गन्तुमिच्छामि।' हिरण्यको ब्रूते-'मित्र ! क्व गन्तव्यम् ? एक दिन लघुपतनकने हिरण्यकसे कहा-'मित्र ! इस स्थानमें बड़ी मुश्किलीसे भोजन मिलता है, इसलिये इस स्थानको छोड़ कर दूसरे स्थानमें जाना चाहता हूं'। हिरण्यकने कहा-'मित्र ! कहां जाओगे ? तथा चोक्तम् ,— चलत्येकेन पादेन तिष्ठत्येकेन बुद्धिमान् । नाऽसमीक्ष्य परं स्थानं पूर्वमायतनं त्यजेत्' ॥ १०२ ॥ ऐसा कहा है कि-बुद्धिमान् एक पैरसे चलता है और दूसरेसे ठहरता है । इसलिये दूसरा स्थान निश्चय किये विना पहला स्थान नहीं छोड़ना चाहिये ॥ १०२ ॥ वायसो ब्रूते-'अस्ति सुनिरूपितस्थानम् ।' हिरण्यकोऽवदत्- 'किं तत् ?' । वायसो ब्रूते - 'अस्ति दण्डकारण्ये कर्पूरगौराभिधानं सरः । तत्र चिरकालोपार्जितः प्रियसृहन्मे मन्थराभिधानः कच्छपो धार्मिकः प्रतिवसति । कौवा बोला- 'एक अच्छी भांति देखा भाला स्थान है'। हिरण्यक बोला- 'कौनसा है ?'. कौआ कहने लगा - 'दण्डकवनमें कर्पूरगौर नाम एक सरोवर है, उसमें मन्थरनाम एक धर्मशील कछुआ मेरा बड़ा पुराना और प्यारा मित्र रहता है.

-१०६ ] सबका स्थानत्याग और कछुएसे मिलन ४७ यतः,- परोपदेशे पाण्डित्यं सर्वेषां सुकरं नृणाम् । धर्मे स्वीयमनुष्ठानं कस्यचित्तु महात्मनः ॥ १०३ ॥ क्योंकि-दूसरोंको उपदेश करना सब मनुष्योंको सहज है, परन्तु आपका धर्म पर चलना किसी विरलेही महात्मासे होता है ॥ १०३ ॥ स च भोजनविशेषैर्मां संवर्धयिष्यति ।' हिरण्यकोऽप्याह—'तत्कि- मत्रावस्थाय मया कर्तव्यम् ? और वह विविध प्रकारके भोजनोंसे मेरा सत्कार करेगा' । हिरण्यक भी बोला—'तो मैं यहां रह कर क्या करूंगा ? यतः,- यस्मिन्देशे न संमानो न वृत्तिर्न च बान्धवः । न च विद्यागमः कश्चित्तं देशं परिवर्जयेत् ॥ १०४ ॥ क्योंकि—जिस देशमें न सन्मान, न जीविकाका साधन, न भाई ( या संबंधी ) और कुछ विद्याका भी लाभ न हो उस देशको छोड़ देना चाहिये ॥ १०४ ॥ अपरं च,- लोकयात्राऽभयं लज्जा दाक्षिण्यं त्यागशीलता । पञ्च यत्र न विद्यन्ते न कुर्यात्तत्र संस्थितिम् ॥ १०५ ॥ और दूसरे-जीविका, अभय, लज्जा, सज्जनता तथा उदारता, ये पांच बातें जहां न हो वहां नहीं रहना चाहिये ॥ १०५ ॥ तत्र मित्र ! न वस्तव्यं यत्र नास्ति चतुष्टयम् । ऋणदाता च वैद्यश्च श्रोत्रियः सजला नदी ॥ १०६ ॥ और हे मित्र ! जहां ऋण देने वाला, वैद्य, वेदपाठी और सुन्दर जलसे भरी नदी, ये चार न हो वहां नहीं रहना चाहिये ॥ १०६ ॥ ततो मामपि तत्र नय ।' अथ वायसस्तत्र तेन मित्रेण सह विचि- त्रालापैः सुखेन तस्य सरसः समीपं ययौ । ततो मन्थरो दूरादव- लोक्य लघुपतनकस्य यथोचितमातिथ्यं विधाय मूषकस्यातिथि- सत्कारं चकार । इसलिये मुझे भी वहां ले चल ।' पीछे कौवा उस मित्रके साथ अच्छी अच्छी बातें करता हुआ बेखटके उस सरोवरके पास पहुंचा । फिर मन्थरने उसे

४८ हितोपदेशः [ मित्रलाभः १०७-

दूरसे देखतेही लघुपतनकका यथोचित अतिथिसत्कार करके चूहेकाभी अतिथि- सत्कार किया। यतः,- बालो वा यदि वा वृद्धो युवा वा गृहमागतः । तस्य पूजा विधातव्या सर्वस्याभ्यागतो गुरुः ॥ १०७ ॥ क्योंकि-बालक, बूढ़ा तथा युवा इनमेंसे घर पर कोई आया हो उसका आदर सत्कार करना चाहिये, क्योंकि अभ्यागत सब (चारों वर्णों) का पूज्य है ॥१०७॥ गुरुरग्निर्द्विजातीनां वर्णानां ब्राह्मणो गुरुः । पतिरेको गुरुः स्त्रीणां सर्वस्याभ्यागतो गुरुः ॥ १०८ ॥ ब्राह्मणोंको अग्नि, चारों वर्णोंको ब्राह्मण, स्त्रियोंको पति और सबको अभ्यागत सर्वदा पूजनीय है ॥ १०८ ॥ वायसोऽवदत्—'सखे मन्थर ! सविशेषपूजामस्मै विधेहि । यतो- ऽयं पुण्यकर्मणा धुरीणः कारुण्यरत्नाकरो हिरण्यकनामा मूषिक- राजः । एतस्य गुणस्तुतिं जिह्वासहस्रद्वयेनापि सर्पराजो न कदाचित्कथयितुं समर्थः स्यात् ।' इत्युक्त्वा चित्रग्रीवोपाख्यानं वर्णितवान् । मन्थरः सादरं हिरण्यकं संपूज्याह—'भद्र ! आत्मनो निर्जनवनागमनकारणमाख्यातुमर्हसि ।' हिरण्यकोऽवदत्—'कथ- यामि । श्रूयताम्,— कौआ बोला—'मित्र मन्थर ! इसका अधिक सत्कार कर, क्योंकि यह पुण्या- त्माओंका मुखिया और करुणाका समुद्र हिरण्यक नाम चूहोंका राजा है । इसके गुणोंकी बड़ाई दो सहस्र जीभोंसे शेष नागभी कभी नहीं कर सकता है' । यह कह कर चित्रग्रीवका वृत्तान्त कह सुनाया । मन्थर बड़े आदरसे हिरण्यकका सत्कार करके पूछने लगा—'हे मित्र । इस निर्जन वनमें अपने आनेका भेद तो कहो' । हिरण्यक बोला—'मैं कहता हूँ, सुनो— कथा ४ [ संन्यासी और धनिक चूहेकी कहानी ४ ] अस्ति चम्पकाभिधानायां नगर्य्यां परिव्राजकावसथः । तत्र चूडाकर्णो नाम परिव्राट् प्रतिवसति । स च भोजनावशिष्टभिक्षा- ऽन्नसहितं भिक्षापात्रं नागदन्तकेऽवस्थाप्य स्वपिति । अहं च तद- ऽन्नमुत्प्लुत्य प्रत्यहं भक्षयामि। अनन्तरं तस्य प्रिय सुहृद्वीणाकर्णो नाम-

-१०९ ] बूढा बनिया और उसकी स्त्रीकी कहानी ४९

-१०९ ] बूढा बनिया और उसकी स्त्रीकी कहानी ४९

परिव्राजकः समायातः। तेन सह कथाप्रसङ्गावस्थितो मम त्रासार्थं जर्जरवंशखण्डेन चूडाकर्णो भूमिमताडयत्। वीणाकर्ण उवाच— ‘सखे ! किमिति मम कथाविरक्तोऽन्यासक्तो भवान् ?’ चूडाकर्णे- नोक्तम्—‘मित्र ! नाहं विरक्तः। किंतु पश्यायं मूषिको ममापकारी सदा पात्रस्थं भिक्षान्नमुत्प्लुत्य भक्षयति।’ वीणाकर्णो नागदन्तकं विलोक्याह—‘कथं मूषिकः स्वल्पबलोऽप्येतावद्दूरमुत्पतति ? तदत्र केनापि कारणेन भवितव्यम् । चम्पका नाम नगरीमें संन्यासियोंकी एक वस्ती है । वहां चूडाकर्ण नाम संन्यासी रहता था। और वह भोजनसे बचेखुचे भिक्षाके अन्नसहित भिक्षा- पात्रको खूंटीपर टांग कर सोजांया करता था। और मैं उस भोजनके पदार्थको उछल उछल कर नित्य खाया करता था । उसके उपरान्त उसका प्रिय मित्र वीणाकर्ण नाम संन्यासी आया । चूडाकर्णने उसके साथ नानाभांतिकी कथाके प्रसंगमें लग कर मुझको डरानेके लिये एक पुराने बाँसके टुकड़ेसे पृथिवी खटखटायी. वीणाकर्ण बोला—‘मित्र ! यह क्या बात है ? कि (तुम) मेरी कथामें विरक्त और दूसरीमें लगे हो’॥ चूडाकर्णने कहा कि ‘मित्र ! मैं विरक्त नहीं हूं। परन्तु देखो—यह चूहा मेरा अपकारी है, पात्रमें धरे हुए भिक्षाके अन्नको सदा उछल उछल कर खा जाता है.’ वीणाकर्णने खूंटीकी ओर देख कर कहा—‘यह दुबला पतला-सा भी चूहा कैसे इतना ऊपर उछलता है ? इसलिये इसमें कुछ न कुछ कारण होना चाहिए । तथा चोक्तम्— अकस्माद्युवती वृद्धं केशेष्वाकृष्य चुम्बति । पतिं निर्दयमालिङ्ग्य हेतुरत्र भविष्यति’ ॥ १०९ ॥ जैसा कहा है कि—यकायक एक जवान स्त्रीने केश पकड़ कर और प्रेमसे आलिंगन करके अपने बूढ़े पतिका मुख चुम्बन किया (वैसाही) इसमें कोई कारण होगा’ ॥ १०९ ॥ चूडाकर्णः पृच्छति—‘कथमेतत् ?’ । वीणाकर्णः कथयति— चूडाकर्ण पूछने लगा—‘यह कथा कैसे है?’ वीणाकर्ण कहने लगा— कथा ५ [ बूढा बनिया और उसकी व्यभिचारिणी स्त्रीकी कहानी ५ ] अस्ति गौडीये कौशाम्बी नाम नगरी । तस्यां चन्दनदासनामा वणिङ्महाधनो निवसति । तेन पश्चिमे वयसि वर्तमानेन कामाधि- हि० ४

ष्टितचेतसा धनदर्पल्लीलावती नाम वणिक्पुत्री परिणीता। सा च मकरकेतोर्विजयवैजयन्तीव यौवनवती बभूव । स च वृद्धपति- स्तस्याः संतोषाय नाभवत् । बंगाल देशमें कौशाम्बी नाम एक नगरी है । उसमें चन्दनदास नाम एक बड़ा धनवान् बनिया रहता था । उसने बुढ़ापेमें कामातुर हो कर धनके मदसे लीलावती नाम एक बनियेकी बेटीसे विवाह कर लिया । वह लीलावती काम- देवकी विजयपताकाके समान तारुण्यतरङ्गिता हुई. पर वह बूढ़ा पति उसके संतोष करनेके लिये योग्य नहीं था । यतः,— शशिनीव हिमार्तानां घर्मार्तानां रवाविव । मनो न रमते स्त्रीणां जराजीर्णेन्द्रिये पत्यौ ॥ ११० ॥ क्योंकि—जैसे पालेसे मरे हुओंका चित्त चन्द्रमामें, और धूपसे दुःखियों का सूरजमें नहीं लगता है वैसेही स्त्रियोंका मन शिथिल इन्द्रियोंवाले पतिमें नहीं लगता है ॥ ११० ॥ अन्यच्च,— पतितेषु हि दृष्टेषु पुंसः का नाम कामिता ? । भेषज्यमिव मन्यन्ते यदन्यमनसः स्त्रियः ॥ १११ ॥ और दूसरे—जब बाल श्वेत हो गये तब पुरुषको कामकी योग्यता कहां ? क्योंकि जिन स्त्रियोंका दिल अन्य पुरुषोंसे लग रहा है वे (ऐसे पतिको) औषधके समान समझती हैं ॥ १११ ॥ स च वृद्धपतिस्तस्यामतीवानुरागवान् । और वह बूढ़ा पति उस पर अत्यंत आसक्त था. यतः,— धनाशा जीविताशा च गुर्वी प्राणभृतां सदा । वृद्धस्य तरुणी भार्या प्राणेभ्योऽपि गरीयसी ॥ ११२ ॥ क्योंकि-प्राणधारियोंको धन और जीवनकी बड़ी आशा होती है, लेकिन बूढ़ेको तरुण स्त्री प्राणोंसेभी अधिक प्यारी होती है ॥ ११२ ॥ नोपभोक्तुं न च त्यक्तुं शक्नोति विषयाञ्जरी । अस्थि निर्दशनः श्वेव जिह्वया लेढि केवलम् ॥ ११३ ॥

बूढ़ा मनुष्य न तो विषयोंको भोग सकता है और न त्यागभी कर सकता है। जैसे दंतहीन कुत्ता हड्डीको चबा नहीं सकता है, (पर आसक्त होनेसे) केवल जीभसे चाटता है ॥ ११३ ॥ अथ सा लीलावती यौवनदर्पादतिक्रान्तकुलमर्यादा केनापि वणिक्पुत्रेण सहानुरागवती बभूव । फिर उस लीलावतीने यौवनके मदसे अपनी कुलकी मर्यादाको छोड़ किसी बनियेके पुत्रसे प्रेमवश हुई. यतः,— स्वातन्त्र्यं पितृमन्दिरे निवसतिर्यात्रोत्सवे संगति- र्गोष्ठी पुरुषसंनिधावनियमो वासो विदेशे तथा । संसर्गः सह पुंश्चलीभिरसकृद्वृत्तेर्निजायाः क्षतिः पत्युर्वार्धकमीर्षितं प्रवसनं नाशस्य हेतुः स्त्रियः ॥ ११४ ॥ क्योंकि-स्वतन्त्रता, पिताके घरमें (ज्यादह काल) रहना, यात्रा आदि उत्सवमें किसीका संग, पुरुषके साथ गप लडाना, नियममें न रहना, परदेशमें रहना, व्यभिचारिणी स्त्रियोंके सहवासमें रहना, वार वार अपने सच्चरित्रका खोना, पतिका बूढ़ा होना, ईर्ष्या करना, और स्वामीका परदेशमें रहना ये स्त्रियोंके नाश(बिगड़ने)के कारण हैं ॥ ११४ ॥ अपरं च,— पानं दुर्जनसंसर्गः पत्या च विरहोऽटनम् । स्वप्नश्चान्यगृहे वासो नारीणां दूषणानि षट् ॥ ११५ ॥ और दूसरे—मद्यपान, दुष्ट लोगोंका सहवास, पतिका विरह, इधर उधर घूमते रहना, दूसरेके घरमें सोना अगर रहना, ये छः स्त्रियोंके दूषण हैं ॥११५॥ स्थानं नास्ति क्षणं नास्ति नास्ति प्रार्थयिता नरः । तेन नारद ! नारीणां सतीत्वमुपजायते ॥ ११६ ॥ हे नारद ! (व्यभिचारके लिये) ऐकांत स्थान, मौका और प्रार्थना करने वाला मनुष्य इनके न होनेसे स्त्रियोंका पतिव्रतधर्म रहता है ॥ ११६ ॥ न स्त्रीणामप्रियः कश्चित्प्रियो वापि न विद्यते । गावस्तृणमिवारण्ये प्रार्थयन्ति नवं नवम् ॥ ११७ ॥