इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा
स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)
वंदना
॥ओ३म्॥
अथ सन्तानानुशासनम्
कन्दना
अन ओजिष्ठमा भर च्यु म्मस्मम्यमङ्गिगो। प्र नो राये पनीयसे रत्निस वाजाय पन्थाम्॥
सामवेद १/९/१
सत्य धन की. और ले जाने वाले हे अग्ने! हमें तेजस्वी ज्ञानधन पहुँचा, प्रशंसनीय ऐश्वर्य और उन्नति की ओर गति के लिए मार्ग तैयार (प्रदर्शित) करना ही तुम्हारा कार्य है।
त्वं नश्चित्र ऊर्या वसो राधासि चोदय।
अस्य रायस्त्वमग्ने रथीरसि विद्या गार्ध तुवे तु नः॥
सामवेद १/४/७
हे विलक्षण! रक्षण शक्ति से बसाने वाले। आनन्द साधनों को हमारी ओर भेज। हे शक्ति सम्पन्न! इस समृद्धि का तू अधिष्ठाता एवं वाहक है, हमारी सन्तान के लिए भी कुछ आधार प्राप्त कराओ।
अद्या नो देव सवितः प्रजावत्सावीः सौभागम्।
परा दुष्चण्यं सुव॥
सामवेद २/३/७
हे प्रकृशमान प्रेरक! आप हमारे नाना सन्तान वितान युक्त सौभाग्य को उत्पन्न कर और दुष्ट संकल्प की कारणीभूता तन्त्रा को दूर कर।
इच्छानुसार सन्तान
१९
वीरेन्द्र गुप्तः
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मनुष्य
मनुष्य
संसार के समस्त जीवधारियों में मनुष्य ही एक ऐसा जीव है जो कर्म करने में स्वतंत्र और फल भोगने में परतंत्र है। बाकी जितने जीव हैं वह कर्म करने में स्वतंत्र नहीं, फल भोगने में स्वतंत्र हैं। अर्थात् मनुष्य योनि मुख्य रूप से कर्म करने के लिए है और योनिर्था मुख्य रूप से फल भोगने के लिए।
ते ह्यादपरितापफलाः पुण्यापुण्यहेतुत्वात्।।
योगदर्शन २/१४
अर्थ- वे (जन्म, आयु और भोग) हर्ष और शोकरूप फल को देने वाले होते हैं, क्योंकि उनके पुण्यकर्म और पाप कर्म दोनों ही (पूर्वजन्म का) कारण हैं।
इसीलिए मनुष्य अपने कर्मों द्वारा ऊँचा उठ सकता है और कर्मों द्वारा नीचे भी गिर सकता है। संसार में कौन मनुष्य ऐसा है जो यश, कीर्ति और ऐश्वर्य नहीं चाहता हो। हर कोई चाहता है, कि मुझे यश प्राप्त हो, कीर्ति बढ़े और ऐश्वर्यशाली भी हूँ। पर वह यत्न करने पर भी नहीं हो पाता। क्योंकि उसे नहीं मालूम कि मुझे कौन-सा ऐसा कार्य करना चाहिये जिससे यश और कीर्ति प्राप्त हो।
संसार में ईश्वर, जीव और प्रकृति अनदि हैं। जब मनुष्य प्रकृति की ओर अग्रसर होता है तो वह भोगवाद में अर्थात् सांसारिक माया जाल में फँस जाता है। तब उसे काम, क्रोध और मोह रूपी शत्रु घेर लेते हैं। जैसे ओइम् शब्द 'अ' 'उ' और 'म' से मिलकर बना है। 'अ' ईश्वर का द्योतक है। 'उ' जीव का और 'म' प्रकृति का द्योतक है। जब 'उ' रूपी जीव 'म' रूपी प्रकृति की ओर अग्रसर हो तो जीव अवनति को प्राप्त होता है, जैसे
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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'उ' की मात्रा 'म' के नीचे लगती है। यदि 'उ' रूपी जीव 'अ' रूपी ईश्वर की ओर अग्रसर हो तो जीव उन्नति को प्राप्त होता है जैसे 'उ' की मात्रा 'अ' के ऊपर लगती है अर्थात् 'अ' और 'उ' मिलकर ओ हो जाता है। इसी प्रकार जब जीव प्रकृति की ओर चलता है तो बजाय ऊँचा उठने के नीचे ही गिरता जाता है और जब वह ईश्वर की ओर को अग्रसर होता है तो वह जीव उत्कृष्टता को प्राप्त होता जाता है और शनैः शनैः बढ़ता हुआ परम सौरभ्य को प्राप्त होता है। इसलिए मनुष्य जीवन को सफल बनाने के लिए सुख और शान्ति से जीवन व्यतीत करने के लिए मनुष्यों को चाहिए कि वह भोगों में न फँसकर अपना जीवन सादा, वासनाओं से रहित एवं सत्यनिष्ठ बनावे।
यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्। तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्यबुद्धिप्रसादजम्।।
गीता १८/३७
अर्थ- वह (सुख) प्रथम साधन के आरम्भ काल में (यद्यपि) विष के सदृश भासता है (परन्तु) परिणाम में अमृत के तुल्य है, इसलिए जो ईश्वर विषयक बुद्धि के प्रसाद से उत्पन्न हुआ सुख है वह सात्त्विक कहा गया है।
विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम्।
परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम्।।
गीता १८/३८
अर्थ- जो सुख विषय और इन्द्रियों के संयोग से होता है वह (यद्यपि) भोगकाल में अमृत के सदृश भासता है (परन्तु) परिणाम में विष के सदृश है (बल, वीर्य, धन, उत्साह आदि का नाशक है) इसलिए वह सुख राजस कहा गया है।
पश्चिमी सभ्यता में वह व्यक्ति महान है जिसकी अधिक से अधिक आवश्यकताएँ हों। परन्तु भारतीय सभ्यता में महान वह है जिसकी आवश्यकताएँ कम से कम हों। क्या सादा पहिनावा
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वीरेन्द्र गुप्तः
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पहिरने वाले, सादा भोजन पाने वाले पूज्य बापू महात्मा गांधी महान व्यक्ति नहीं थे? क्या विश्व में उन्हें महानता की दृष्टि से नहीं देखा जाता था? महानता पहिनावे की टीपटाप से नहीं मिलती है। महानता तो विद्या धर्म और सत्यनिष्ठ जीवन से ही मिलती है।
संसार में एक समुदाय ऐसा भी है जो कहता है कि संसार में मनुष्यों के लिए अन्न, वस्त्र की ही आवश्यकता है और ईन्द्रिय भोगों के लिए स्त्री की। इससे इतर धर्म कर्म आदि कुछ नहीं। इस समुदाय ने प्रमुखता अन्न, वस्त्रादि, भौतिक वस्तुओं को ही दी है। ज्ञात होता है कि इस प्रकार के समुदाय को जन्म देने वाला भोगवादी और ज्ञान शून्य व्यक्ति था कहावत है (प्रत्यक्षकिम् प्रमाणम्) प्रत्यक्ष को प्रमाण क्या। जब बच्चा माता के गर्भ में आता है तब उसके जन्म से ठीक ३ मास पूर्व ही परमेश्वर माता के स्तनों में दूध भेज देता है। यह नहीं कि ईश्वर केवल भारत की या मनुष्यों की ही माताओं को दूध भेजता है वरन् संसार भर की माताओं को और समस्त जीव जन्तुओं की माताओं को भी बच्चों के जन्म से पूर्व ही दूध भेज देता है।
नाहारं चिन्तयेत्मात्रो धर्मयेकं हि चिन्तयेत्।
आहारो हि मनुष्याणां जन्मना सह जायते॥
चाणक्य नीति १२/१८
अर्थ- बुद्धिमान पुरुष भोजन की चिन्ता न करे, किन्तु एक धर्म की ही चिन्ता करे। भोजन तो मनुष्य-जन्म के साथ ही उत्पन्न होता है।
प्राकृतिक प्रमाण, माता के स्तन में दूध का आना और चाणक्य जैसे विद्वान के कथन से प्रतीत होता है कि मनुष्य को अन्न वस्त्र की चिन्ता कदाचित् करनी ही नहीं चाहिए, उसे तो धर्म की ही चिन्ता करनी चाहिए। इसका अर्थ यह नहीं कि मनुष्य धन का संघव न करे। मनुष्य धन को धर्म से उल्लब्ध करे और धर्म से ही व्यय करे। देखा गया है कि जब मनुष्य पर धन
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वीरेन्द्र गुप्तः
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अधिक बढ़ जाता है तो वह प्रमादी होकर मद्यपान, पर-स्त्री गमन आदि दोषों में प्रसित हो जाता है और उसी में उसका सर्वनाश भी हो जाता है। सच्चे देश भक्त श्री स्वामी दयानन्द जी सरस्वती सत्यार्थ प्रकाश के ११वें समुल्लास में लिखते हैं- 'और यह संसार की स्वाभाविक प्रवृत्ति है कि जब बहुत सा धन असंख्य प्रयोजन से अधिक होता है तब आलस्य, पुरुषार्थ रहितता, ईर्ष्या, द्वेष विषयासक्ति और प्रमाद बढ़ता है। इससे देश में विघ्ना सुशिक्षा नष्ट होकर दुर्गुण और दुष्ट व्यसन बढ़ जाते हैं।' क्योंकि जीवनेत्यान के लिए शास्त्रों ने चार शब्द कहे हैं। १. धर्म २. अर्थ ३. काम और ४. मोक्ष। जब मनुष्य इन चारों पदार्थों को साथ लेकर चलोगा तभी प्रमाद रहित होकर उत्तमता को प्राप्त हो सकेगा न कि बीच की दो बातों को लेकर (अर्थ और काम को)। अधिकांश मनुष्यों की धारणा है कि मनुष्य धन से ही बड़ा होता है। यह बात सत्य नहीं। ही धर्म के साथ धन ऐसा होता है जैसे सोने में सुगन्ध। जो मनुष्य यह विचारते हैं कि धन से ही मनुष्य बड़ा बनता है वह भ्रम में हैं देखो उन महापुरुषों को। क्या वह धन से बड़े बने अथवा कर्म से।
आपने बाल्मीकि ऋषि का नाम सुना है। जिन्होंने रामायण नाम का ग्रन्थ लिखा है। क्या वह धनी थे, यदि आप उनकी जीवनी उठाकर पढ़ें तो पता चलेगा कि वह पहले एक लुटेरे डाकू थे। जब उनका प्रारब्ध उदय हुआ तो उन्हें एक सन्यासी की संगत मिली और वह ऋषि पद पर पहुँच गये। अब आप कहेंगे कि उनके प्रारब्ध में ही ऐसा लिखा था इसलिए वह ऋषि बन गये। मेरे भाई! प्रारब्ध भी तो आप ही की कमाई है। मनुष्य जो कर्म आज करेगा वह कर्म कल संचित होकर प्रारब्ध रूप में सामने आयेगा। उसी को भाग्य और पिछले कर्म कहते हैं।
यथा धेनुसहस्रेषु वत्सो गच्छति मातरम्। तथा यच्च कृतं कर्म कर्तारमनु गच्छति॥ १३/२४
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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अर्थ- जैसे हजारों गायों की विद्यामानता में बछड़ा माता ही के निकट जाता है, वैसे ही जो कुछ कर्म किया जाता है वह कर्ता को ही मिलता है। अर्थात् जो कर्म करेगा वही फल भोगेगा दूसरा नहीं।
तभी तो कहा है कि मनुष्य को कर्तव्य कर्म करते हुए सौ वर्ष तक जीना चाहिए।
कूर्वन्ने वेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।
एवंतर्विं नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे।।
यजुर्वेद ४०/२
अर्थ- इस लोक में अपने कर्तव्य कर्म करते हुए ही सौ वर्ष जीने की इच्छा करना चाहिए। यही तेरे लिए एक मार्ग है इससे दूसरा कोई मार्ग नहीं, कर्तव्य कर्म करने से मनुष्य में दोष नहीं होते। इस जगत में परम पुरुषार्थ करते हुए ही मनुष्य को दीर्घ जीवन प्राप्त करने की इच्छा करनी चाहिए। पुरुषार्थमय जीवन व्यतीत करना ही मनुष्य का परम धर्म है। कर्तव्य कर्म करने से ही सब दोष दूर हो जाते हैं और मनुष्य निर्दोष होकर उत्तमता को प्राप्त होता है।
जबकि आज का कर्म प्रारब्ध, भाग्य के रूप में हमारे ही सामने आता है तो फिर क्यों न अच्छे कर्म करें जिससे प्रारब्ध भी अच्छा बने। अच्छे कर्म जिसे कर्तव्य कर्म भी कहते हैं करने के लिए धर्म तथा ईश्वर का सहारा लेना ही पड़ेगा। ईश्वर के चिन्तन से बुद्धि पवित्र होकर ही कर्म अकर्म का विचार कर सकोगी।
धनानि भूमौ पशवश्च गोष्ठे,
नारी गृह द्वारि सखा रमशाने।
देहरिचतायां परलोक मार्गं,
धम्मानुगो गच्छति जीव एकाः।
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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धन धरा के बीच सारा ही गड़ा रह जायगा। पशु भी बँधे रह जायंगे जब कूँच का दिन आयेगा।। नार घर के द्वार तक ही साथ देगी लोक में। मित्र दल मरघट से आगे साथ नहीं दिखलायेगा।। देह भी तेरी चिता के बीच जल-भुन जायेगी।। यह दृश्य आगे का तुझे क्या चेत में नहीं लायेगा।। एक वस ध्रुव धर्म ही सच्चा सखा है अन्त का। जोड़ इस में प्रेम अपना नित नये सुख पायेगा।।
बिना धर्म कर्म के मनुष्य पशवत् है।
येषां न विद्या न तपो न दानं, न चापि शीलं न गुणो न धर्मः। ते मृत्युलोकं भुवि भारभूता, मनुष्य रूपेण मृगाश्चरन्ति॥
चाणक्य नीति १०/७
अर्थ- जिन लोगों को न विद्या है, न तप है, न दान है, न शील है, न गुण है, और न धर्म है, वे संसार में पृथ्वी का भार रूप होकर मनुष्य रूप में मृग (पशु) फिर रहे हैं। क्योंकि-
आहार निद्रा भय मैथुनानि, समानि चैतानि नृणां पशूनाम्। ज्ञानन्तराणामधिको विशेषो, ज्ञानेन हीनाः पशुभिः समानाः॥
चाणक्य नीति १७/१७
अर्थ- भोजन, निद्रा, भय और मैथुन मनुष्य और पशुओं में समान ही हैं। मनुष्य में केवल विशेष ज्ञान ही अधिक है। ज्ञान से रहित मनुष्य पशु के समान है।
अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृतमः। सर्वं ज्ञान प्लवेनैव वृजिनं संतीरिष्यसि॥
गीता ४/१६
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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अर्थ- यदि (तू) सब पापियों से भी अधिक पाप करने वाला है (तो भी) ज्ञान रूप नौका द्वारा निःसन्देह सम्पूर्ण पापों को अच्छी प्रकार तज सकेगा।
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।
तत्त्वयं योगससिद्धः कालेनास्मिन् विन्दति॥
गीता ४/३८
अर्थ- इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला निःसन्देह (कृष्ठ) भी नहीं है उस ज्ञान को कितने काल से अपने आप समतत्त्वबुद्धि रूप योग के द्वारा अच्छी प्रकार शुद्धात्मः कारण हुआ पुरुष (अपने आपको शुद्ध) आत्मा (के रूप में) अनुभव करता है।
ईश्वर आराधना से धर्म, धर्म से ज्ञान, ज्ञान से सुकर्म, और सुकर्मों से प्रारब्ध (भाग्य) बनता है। फिर तो पूरा विश्वास हो जाता है कि मनुष्य अपने भाग्य का स्वयं निर्माता है। इसलिए अच्छे कर्म करना ही मनुष्य का धर्म है।
पावमानीर्यो अध्येत्युषिभिः सम्भूतं रसम्।
तस्मै सरस्वती दुहे क्षीरं सर्पिर्मधुदकम्॥
ऋग्वेद ९/६७/३२
अर्थ- जो ऋषियों द्वारा सम्पादित, ज्ञानमय अन्तःकरण को पवित्र करने वाली ज्ञानमयी ऋचाओं का अध्ययन करता है, वेदवाणी और ज्ञानमय प्रभु उसको दूध घी, मधु, जल के तुल्य ऐश्वर्य, बल आनन्द और अभ्युदय प्रदान करता है।
य स्वाध्यायमधीतेशब्दं विधिना नियतः शुचिः।
तस्य नित्यं क्षारत्वेष पयो दधि घृतं मधु॥
मनु २/१०७
अर्थ- जो पुरुष एक वर्ष पर्यन्त विधियुक्त नियम से पवित्र हांकर स्वाध्याय करता है (पढ़ता है) उसके लिए वह (स्वाध्याय) दूध, दही, घी और मधु को वर्षाता है।
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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कर्म प्रधान विश्व रचिराखा
विश्वपति ने कर्म को ही प्रधान माना है, जो जैसे कर्म करता है वैसे ही फल पाता है।
विद्या के सूर्य प्रज्ञा चक्षु श्री दण्डी गुरु विरजानन्द जी के माता-पिता बचपन में ही स्वर्ग सिधार गये थे। इनके ५ वर्ष की आयु में चेचक निकली जिस कारण इनके नेत्र जाते रहे। स्वभाव तेज होने के कारण भाई-भावज से रुष्ट होकर १४वर्ष की आयु में घर से निकल गये। ४ वर्ष तक देशाटन करते रहे। इस भ्रमण से अनुभव हुआ कि बिना ज्ञान के मनुष्य पशु समान है, इसलिए विद्या पढ़कर ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। विद्या प्राप्ति के लिए गुरु की खोज में लगे। यत्न करने पर भी जब कोई अच्छा गुरु नहीं मिला तब चिढ़कर अपने स्वभाव के कारण विद्याध्ययन का दृढ़ संकल्प करके बस्ती से दूर गंगा किनारे बैठ गये।
तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु। यजुर्वेद ३४/१
वह मेरा मन शुभ संकल्पों से युक्त हो।
संकल्पमूलः कर्मावै यज्ञः संकल्पभवाः।
ब्रतानि यमधर्माश्च सर्वे संकल्पजाः स्मृताः॥
मनु २/३
अर्थ- (अमुक कर्म से यह इष्ट फल प्राप्त होगा, इसको संकल्प कहते हैं। फिर जब पूरा विश्वास होता है तब) संकल्प से उसके करने की इच्छा होती है, यथादि सब संकल्प ही से होते हैं। और व्रत, नियम, धर्म ये सब संकल्प ही से होते हैं।
अर्थात् संकल्प बिना कुछ नहीं होता।
सायंकाल के समय एक सन्यासी उधर से निकला उसने इस बालक को एक वृक्ष के नीचे बैठे देखा, चेहरे पर तेज चमक रहा था। सन्यासी ने मन में कहा, मालूम होता है कि यह बालक होनहार विद्वान् होगा। सन्यासी ने बालक से इस तरह एकान्त में इच्छानुसार सन्तान
२७
वीरेन्द्र गुप्तः
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बैठे रहने का कारण पूछा, बालक ने कहा मुझे मत छोड़ो तुम जाओ अपना काम देखो, परन्तु सन्यासी के कई बार कहने पर बालक ने कहा, क्या तुम मेरा दुःख दूर कर सकते हो तो मैं कहूँ। सन्यासी ने कहा - मुझसे जितना हो सकेगा अवश्य ही करूँगा। बताओ क्या बात है? बालक ने कहा मैंने संकल्प किया है कि जब तक मुझे विद्या और ज्ञान प्राप्त न हो जायगा तब तक मैं अन्न-जल कुछ न पाऊँगा। सन्यासी बोला बेटा तुम्हारा संकल्प तो अति सुन्दर है तथापि ऐसे ही पूरा नहीं हो सकता, इसके लिए कुछ प्रयत्न करना पड़ेगा। तुम जल में खड़े होकर ३ वर्ष तक गायत्री मंत्र का जाप करो तुम्हारे मस्तिष्क के ज्ञान तन्तु खुल जायेंगे तो तुम्हें विद्या प्राप्त होगी।
एका क्षरं परं ब्रह्म प्राणायामः परमत्तपः। सावित्र्यास्तु परं नास्ति मौनात्सत्यं विशिष्यते॥
मनु २/८३
अर्थ- ओम् यह एक अक्षर परब्रह्म का वाचक है और प्राणायाम बड़ा तप है और गायत्री से श्रेष्ठ कोई मंत्र नहीं तथा मौन से सत्य भाषण श्रेष्ठ है।
योऽधीतेऽह-न्येतांस्त्रीणि वषाण्यतन्द्रितः।
स ब्रह्म परमभ्येति वायुभूतः खमूर्तिमान्॥
मनु २/८२
अर्थ- जो पुरुष प्रतिदिन आलस्य रहित होकर तीन वर्ष पर्यन्त ३% व्याहृति और गायत्री का जाप करता है वह परब्रह्म को प्राप्त होता है। वायुवत् स्वतंत्रचारी होकर शरीर बन्धन रहित हो जाता है।
चुनीचे बालक ने सन्यासी की आज्ञा का पालन कर ३ वर्ष तक जल में खड़े होकर गायत्री मंत्र का जाप किया जिसके प्रताप से चक्षुहीन होने पर भी अष्टाध्यायी महाभाष्य तथा चारों वेदों को ज्ञाता हुए और वह अपने समय में व्याकरण के दैदीप्यमान,
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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दिवारक के समान थे। यह सब किसके प्रताप से हुआ। यह ईश्वर से ध्यान लगाने और तप के कारण प्राप्त हुआ। ऐसे ही आर्य समाज के प्रवर्तक परिब्राजकाचार्य श्रीमद्द्वयानन्द सरस्वती भी तप और ईश्वर निष्ठा के कारण ही युग निर्माता ऋषि बने।
किं कुलेन विशालेन विद्याहीनेन देहिनाम्।
दुष्कूलं चापि विदुषो देवैरपि सुपूज्यते॥
चाणक्य नीति ८/१८
अर्थ- विद्याहीन बड़े कुल से मनुष्यों को क्या लाभ है? विद्वान का नीच कुल भी देवताओं से पूजा जाता है।
इतरा नाम की एक स्त्री थी। (इतरा नाम से सिद्ध होता है कि यह नीच कुल की स्त्री है) उसके पुत्र का नाम महिदास था। वह इतना विद्वान हुआ कि उसने अपनी माता के नाम से एक ग्रन्थ लिखा। जिसका नाम ऐतरेय ब्राह्मण है। जो विद्वानों में पूजित है तथा ऋग्वेद को समझने के लिए प्रारम्भिक सीढ़ी है। विद्या और धर्म को साथ लेकर जो अग्रसर होगा वह निश्चय ही ऊर्ध्व-गति को प्राप्त होगा। मनुष्य शरीर बड़े ही पुण्य कर्मों से प्राप्त होता है, नहीं मालूम कि अगली बार फिर यह शरीर मिले या न मिले।
पुनर्वितं पुनर्मित्रं पुनर्भार्यां पुनर्मीहो।
एतत्सर्वयं पुनर्लभ्यं न शरीरं पुनः पुनः॥
चाणक्य नीति १४/३
अर्थ- धन, मित्र, स्त्री, पृथ्वी ये सब बार-बार मिलते हैं, परन्तु शरीर फिर-फिर नहीं मिलता। अर्थात् यहाँ योनि मिले व किसी और योनि में जाना पड़े इसका कुछ पता नहीं।
मनुष्य योनि बड़ी ही दुर्लभ है इसमें सब सुकर्म जीव कर सकता है।
किसी भी कार्य को करने से पूर्व यदि कुछ विभागों में विभक्त कर दिया जाए तो वह कार्य सुगमता से पूर्ण हो जाता है।
इच्छानुसार मन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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शरीर को चलाने के लिए परमात्मा ने शरीर के चार भाग किये हैं। जिसे वेद में वर्ण के नाम से कहा है।
ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीदाह्म राजन्यः कृतः।
ऊरु तदस्य यद्वैश्यः पदुभ्यां शुद्रो अजायत॥
ब्रह्मवेद १०/१०/१२
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र यह चार भाग हैं। शरीर में ब्राह्मण सिर है, जो बुद्धि द्वारा सारे शरीर से सत्य कर्म को करता है। क्षत्रिय भुजाओं और वक्षस्थल को कहते हैं जो सारे शरीर की रक्षा का भार अपने ऊपर लिए हुए हैं। वैश्य पेट को कहते हैं, जो भोजन का रस रक्त बनाकर सारे शरीर को विभाजित कर देता है। शुद्र पैरों को कहते हैं, जो सारे शरीर को समस्त स्थानों का भ्रमण करता है। विचार कर ब्राह्मण मुख भोजन खाता है। क्षत्रिय हाथ उसे खिलाता है और मुख उस भोजन को अपने ही पास न रखकर वैश्य रूपी पेट के पास भेज देता है और वैश्य पेट उसे अपने पास न रखकर उसका रस रक्त बनाकर समस्त अंगों को बाँट देता है और शुद्र पैर तीनों वर्णों की सेवा करता हुआ भ्रमण करता है। वेद ने एक छोटे से सूत्र में सारी राष्ट्रियता भर दी। जिस शरीर में, राज्य में, परिवार में इसी प्रणाली से कार्य चलेगा वह धर्म, धन और यश को अवश्य ही प्राप्त करेगा।
न विप्रपादोदककर्दमनि,
न वेद शास्त्र ध्वनिर्गजितानि।
स्वाहा स्वधाकारविवर्जितानि,
शमशानतुल्यानि गृहाणितानि॥
चाणक्य नीति १२/९
अर्थ- जहाँ ब्राह्मण के पगों के जल से न कींचड़ हुई, न वेद शास्त्र के शब्दों की गर्जना, जो स्वाहा स्वाध्याय स्वधा से रहित हों, ऐसे घर शमशान के समान हैं। अर्थात् धर्म कर्म रहित
इच्छानुसार सन्तान
३०
वीरेन्द्र गुप्तः
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राज्य तथा परिवार मुर्दा का निवास है।
मनु जी ने धर्म के १० लक्षण कहे हैं।
चतुर्भिरपि चैवैतैनित्यमाश्रमिभिर्दिजैः।
दशलक्षणको धर्मः सेवितव्य प्रयत्नतः॥
धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयंशौचमिद्विनग्रहः।
धीविद्या सत्यमक्रोधो दशक धर्म लक्षणम्॥
मनु २/११.१२
अर्थ- चारों आश्रम द्विजों को दस लक्षण वाले धर्म का सेवन यत्न से करना चाहिए। १. धैर्य २. दूसरे की करी हुई बुराई को सह लेना ३. मन का रोकना ४. चोरी न करना ५. शुद्ध होना ६. इन्द्रियों का रोकना ७. शास्त्र का ज्ञान ८. आत्मा का ज्ञान ९. सत्य बोलना एवं १०. क्रोध न करना। ये धर्म के दस लक्षण हैं।
मातृवत्परदारांश्च परदव्याणि लोच्छवत्।
आत्मवत्सर्व भूतानि यः पश्यति स पश्यति॥
चाणक्य नीति १२/१३
अर्थ- जो दूसरों की स्त्रियों को माता के समान, दूसरे के धन को मिट्टी के समान और अपने समान सब प्राणियों को देखता है वही ठीक देखता है। जब सब मनुष्य इस प्रकार को आचरण करने लगे तो संसार में स्वयं शान्ति हो जाय। क्लेश युद्ध और वैमनस्य संसार से शीघ्र ही सिधार जायें।
★★★
इच्छानुसार सन्तान
३१
वीरेन्द्र गुप्तः
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स्वास्थ्य
स्वास्थ्य
भद्र पुरुषों! संसार में जन्म लेने के बाद कौन-सा जीव-धारी है जो सुख से न रहना चाहता हो। परन्तु वास्तविक सुख बिना स्वास्थ्य (निरोगता) के मिलना कठिन है। इसलिए हर प्रकार से निरोगता के लिये प्रयत्नशील रहना प्राणी मात्र का कर्तव्य है। यह लाभ हमें तभी प्राप्त हो सकता है जबकि हम सात्विक विचारों से अपने प्राचीन महर्षियों के बताये हुए मार्ग का अनुसरण करें। इसी पर मैं अपने कुछ विचारों को श्रृंखलाबद्ध करके पाठकों के सम्मुख लाने का प्रयत्न करता हूँ।
मनुष्य जीवन में शरीर को स्वस्थ रखना कितना आवश्यक है, इसके सम्बन्ध में कुछ भी कहना व्यर्थ है। बाल युवा और वृद्ध, स्त्री या पुरुष, विद्वान या मुर्ख सब ही इस स्वर्णमय अटल और प्रत्यक्ष नियम के समक्ष सिर झुकाते हैं। परन्तु यह हमारा केवल दुर्भाग्य ही है, कि इस नियम के ध्यान में रहते हुए भी हम अपने स्वास्थ्य को नष्ट कर देते हैं। स्वास्थ्य साधन का त्याग क्षणिक सुख अवश्य देता है परन्तु वास्तव में स्वास्थ्य के प्रचण्ड कोट का ऐसा पतन हो जाता है जिसका पुनरुत्थान कठिन ही नहीं असम्भव हो जाता है। सुख के बदले दुःख वलेश और रोगदि 'राक्षस' ही मनुष्य की अन्त्येष्टि क्रिया के मुख्य कारण होते हैं। स्वास्थ्य विगड़ने पर क्या-क्या हानियाँ नहीं होतीं इसका विचार अपने पर ही घटाकर देख लीजिए। परमेश्वर के प्रदान किये हुए अमूल्य रत्न मनुष्य जीवन का दुखान्त दृश्य ही हमारी आँखें खोलने के लिये पर्याप्त है।
अतएव मनुष्य को चाहिए कि अपनी आयु वृद्धि के हेतु स्वास्थ्य कारक साधनों का सदा अवलम्बन करता रहे जिससे वह
रञ्जानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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ऋतु
सुख और आनन्द पूर्वक अपना जीवन व्यतीत कर सके तथा अपने जीवनोद्देश्य की पूर्ति के लिए भरसक प्रयत्न करने के साथ सफलता प्राप्त कर सके। सांसारिक तथा धार्मिक कर्मों को सम्पादित कर दोनों लोकों में स्वर्गानन्द, यश और कीर्ति लाभ कर सकें। गृहस्थ आश्रम में मनुष्य को सांसारिक सुख भोग के साथ ही साथ किस प्रकार अपने शरीर को स्वस्थ रखते हुए जीवन व्यतीत करना चाहिए। शास्त्रकारों ने मनुष्य जीवन की आयु १०० वर्ष की मानकर उसके चार समान भाग किये हैं प्रत्येक भाग को आश्रम के नाम से पुकारते हैं।
१. ब्रह्मचर्य आश्रम २५ वर्ष की अवस्था तक
२. गृहस्थ आश्रम ५० वर्ष की अवस्था तक
३. वानप्रस्थ आश्रम ७५ वर्ष की अवस्था तक
४. संन्यास आश्रम १०० वर्ष की अवस्था तक
परचातृ तक
★★★
ऋतु
वर्ष के १२ मासों में, १.चैत्र-वैशाख वसन्त ऋतु है। २.ज्येष्ठ-आषाढ़ ग्रीष्म ऋतु है। ३.श्रवण-भाद्रपद वर्षा ऋतु है। ४.आश्विन-कार्तिक शरद ऋतु है। ५.मार्गशीर्ष-पौष हेमन्त ऋतु है। ६.माघ फाल्गुन शिशिर ऋतु है। यह छः ऋतुयें हमारे देश में होती हैं।
ग्रीष्म ऋतु में वात का संचय वर्षा में कोप और शरद ऋतु में शान्ति रहती है। वर्षा ऋतु में पित्त का संचय, शरद में कोप और हेमन्त ऋतु में शान्ति रहती है। इसी प्रकार 'शिशिर ऋतु में कफ का संचय वसन्त में कोप और ग्रीष्म ऋतु में शान्ति होती है। यह वात-पित्त और कफ का संचय कोप और शान्ति आहार-विहार से होती है। इसलिए इन दोषों के प्रकोपकर्ता आहार-विहार
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वीरेन्द्र गुप्तः
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ऋतु आहार विहार
को और ध्यान रखना चाहिये।
वात प्रकोप-कटु, तीक्ष्ण कपैला, रूखी, हल्की थोड़ी वस्तु और बासी (रात्रि का रहा हुआ) अन्न भक्षण, संध्याकालिक मैथुन, शोक, भय, अति परिश्रम, प्रहार, अन्न-जल का परित्याग, अजीर्ण, १४ वेगों के प्रतिरोध, (मल, मूत्र, आँसू आदि वेगों का रोकना) और जल में तैरने से वायु कृपित होती है और उसके यत्नों से शान्त होती है।
पित्त प्रकोप- तिल, काँजी, मध, दही, कटु, तीक्ष्ण नमक, खटाई के भक्षण, शरद ऋतु में अधिक धूप में प्रमण, क्रोध, उपवास, तृष्णा, क्षुधा व रोध और अजीर्ण के होने से, मध्यादि, तथा अर्द्ध-रात्रि में शरद ऋतु के समय पित्त कृपित होता है और उसके यत्न से शान्त होता है।
कफ प्रकोप- दही, दूध, नवीन अन्न, शीतल जल, खटाई, नौन, घी, तिल, भारी वस्तु और मीठी वस्तु भक्षण, दिन में निद्रा, प्रातःकाल ही भोजन करने से कफ कोप को प्राप्त होता है और उसके यत्नों से शान्त होता है। अतः आहार-विहार पर सदैव ध्यान रखना चाहिए।
ऋतु आहार-विहार
वसन्त- इस ऋतु में कृपित कफ रोगों को पैदा कर अग्नि को मन्द कर देता है। इसलिए इस ऋतु में मधु युक्त हर सेवन करें चित्रक चूर्ण तथा कफ हारी पदार्थ सेवन करें।
ग्रीष्म- ग्रीष्म ऋतु में सूर्य अपने तेज से प्राणी मात्र का बल हर लेता है इसलिए खस आदि के पदें लगे हुए शीतल स्थान में तथा वृक्षों की सघन छाया में फूहारे आदि के समीप निवास करना, गुड़ युक्त हर, मधुर भोजन, दाख, क्षार, सत्तु, मिश्री, अनार
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आदि का रस, चिकने और शीतल पदार्थों का भोजन जल क्रीड़ा, खस के पंखों की पवन, चन्दन कपूर आदि का लेपन, दिन में १ घण्टा निद्रा और सुगन्धित पुष्पों का सेवन करना चाहिए। परन्तु इस ऋतु में कटु, तीक्ष्ण, नौन, खटाई, विदाही पदार्थ, मध्य श्रम और घूमना ये हानिकारक हैं।
वर्षा- इस ऋतु में वायु का कोप होता है इसलिए सैन्धव युक्त हर, चिकनी वस्तु, नौन, खटाई, चावल, साँठ, मिर्च काली, पीपल, पीपला मूल, चित्रक और सैन्धव युक्त, दही, उष्ण जल, कूप जल, श्वेत वस्त्र, भ्रमण हल्का भोजन और विरेचन करना चाहिए, परन्तु दिन में सोना श्रम, धूप तालाब का जल, दही, वन में निवास और विशेष मैथुन ये हानिकारक हैं।
शरद्- शरद् ऋतु में पित्त कृषित हो जाता है इसलिए मिश्री युक्त हर, सांठी चावल, मूंग, सरोवर का जल और औटे हुए दूध का सेवन करना चाहिए, परन्तु तीक्ष्ण वस्तु, खटाई, धूप में घूमना पूर्व दिशा की पवन लेना और दिन को सोना ये हानिकारक हैं।
हेमन्त- गौ तथा भैंस का नवीन घी, गुड़, सीठ युक्त हर्ष मीठा दही, तिल, गेहूँ, उर्द और मिश्री आदि मिष्ठान पदार्थ खाना नमक मिलाकर तेल मर्दन करना, निर्वात स्थानों में रहना नवीन गरम ऊन का वस्त्र पहनना चाहिए।
शिशिर-छोटी पीपल युक्त हर्ष, काली मिर्च, अदरक, नवीन घी, सैंधा नौन, उत्तम गुड़, दही भोजन तथा आहार विहार पूर्वोक्त लिखित सेवन करें।
उक्त ऋतुचर्या के नियमानुसार व्यवहार करने से ऋतु जन्य व्याधि का भय नहीं रहता। मनुष्यों को चाहिए कि इन नियमों से ऋतु पर्यन्त निर्वाह न कर सकें तो प्रत्येक ऋतु के अन्तिम सात दिन तक तो अवश्य ही नियम को पालें और आय दिन से अग्रिम ऋतुचर्या के आहार विहारों की ओर ध्यान देकर बर्ताव करें तो सर्वेव रोग रहित रहकर ऋतु जन्य व्याधियों के चक्र से विमुक्त रहेंगे।
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प्रातः काल
प्रातःकाल
उठो देव गण! जागो, सुन्दर प्रभात-वेला आई। निशा-देवी गृह को चली, उषा अरुणिमा नभ छाई॥ नव जीवन की आभा फैली, हुआ प्रकृति का नव श्रृंगार। दिव्य ज्योति का उदय हुआ, फिर चमक उठा सारा संसार॥
देखो कितना सुन्दर और सुहावना समय है। इस समय को अमृतवेला कहा जाता है। इस समय प्रकृति कितनी शान्त और सुहावनी होती है। इस शान्ति और सुहावनेपन को यदि हम अपने हृदय में पान कर लें तो अमृतमय हो सकते हैं। यह तो है ही कि इस सुन्दर अमृतवेला में जो संस्कार हम अपने में डालेंगे, वे हमारे अन्दर अमर हो सकते हैं, स्थायी हो सकते हैं।
ब्राह्मो मुहूर्त उत्तिष्ठे ज्जीर्णाजीर्ण।
निरुपयन् रक्षार्थ मायुषः स्वस्थ्योः॥
अर्थ- रात्रि के अन्त और सूर्योदय के एक घण्टा पूर्व समय को ब्राह्ममुहूर्त कहते हैं। जिस समय मूर्गा बींग (ध्वनि) देता है वही उठने का समय है मूर्गा प्राकृतिक बिगुल, भौंपु, घड़ी का एलार्म है जो ब्राह्ममुहूर्त के समय बोलता है। उसी समय उठकर अंग के जीर्ण-अजीर्ण का ज्ञान करना चाहिए और अजीर्ण मालूम पड़े तो न उठना चाहिए, और धीरे-धीरे अभ्यास बढ़ा लेना चाहिए। अभ्यास से कष्ट नहीं होता। निद्रा त्यागते (चारपाई से उठते) ही पारब्रह्म परमेश्वर का ध्यान करके शय्या से उठो। प्रातः काल वेद मंत्रों का उत्तम रीति से सानन्द पाठ व उच्चारण करने से आत्मा उत्साहित होकर मानसिक दुर्भाव रूपी शत्रुओं का नाश होता है।
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वीरेन्द्र गुप्तः
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ब्रह्ममुहूर्त में पढ़ने योग्य मंत्र पाठ।
ओं प्रातरर्गिन प्रातरिन्द्रं हवामहे प्रातर्भिन्नावरुणा प्रातरशिवना।
प्राभर्गं पृषणं ब्रह्मणस्पतिं प्रातस्सो ममृत रुद्रं हुवेम॥१॥
ओं प्रातर्जितं भगमुग्रं हुवेम वयं पुत्रमदितेतो विधत्ता।
आध्रशिचर्घं मन्य मानस्तुरिचिद्राजा विघ्नां भगं भस्तीत्याह॥२॥
ओं भग प्रणेतर्भग सत्यराधो भगो धियमुदवा ददन्तः।
भगप्रणो जनय गोभिर्शर्वैर्भग प्र नृभिनृं वन्तः स्याम॥३॥
ओं उतेदानीं भगवन्तः स्यामोत प्रपित्त्व उत मध्ये अहहनाम्।
उतोदिता मघवन्सूर्यस्य वयं देवानां सुमती स्याम॥४॥
ओं भग एव भगवीं अस्तु देवास्तेनवयं भगवन्तः स्याम।
तं त्वा भग सर्वं इज्जोहवीति स नो भग पुरएताः
ब्रह्मवेद ७/४१/१ से ५ तक
अर्थ- हे स्त्री पुरुषों! जैसे हम विद्वान् उपदेशक लोग प्रभातवेला में स्वप्रकाशस्वरूप परम ऐश्वर्य के दाता और परमेश्वर्ययुक्त, प्राण उदान के समान प्रिय और सर्वशक्तिमान सूर्य, चन्द्र को जिसने उत्पन्न किया है, उस परमात्मा की स्तुति करते हैं और भजनीय, सेवनीय, ऐश्वर्य युक्त, पुष्टिकर्ता, अपने उपासक, वेद और ब्रह्माण्ड के पालन हारे, अन्तर्धानी प्रेरक और पापियों को रलाने हारे और सर्वरोगनाशक जगदीश्वर की स्तुति प्रार्थना करते हैं, वैसे तुम लोग भी किया करो॥१॥
प्रातः पाँच घड़ी रात्रि रहे, जयशील ऐश्वर्य के दाता, तेजस्वी, अन्तरिक्षस्य सूर्य की उत्पत्ति करने हारे और जो कि सूर्यादि लोकों का विशेष करके धारण कर्ता, सब का जानने हारा, दुष्टों का भी दण्डदाता और सबका प्रकाशक है- उस भजनीय स्वरूप को इस प्रकार सेवन करता है और भगवान् परमेश्वर भी इसी प्रकार सबको उपदेश करता है कि 'जो मैं सूर्यादि जगत् को बनाने और धारण करने हारा हूँ, उस मेरी आज्ञा में तुम चला करो'॥२॥
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वीरेन्द्र गुप्तः
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हं भजनीय स्वरूप! सबके उत्पादक, सत्याचार में प्रेरक, ऐश्वर्यदाता! हमें प्रज्ञा दीजिए और अपने दान पर हमारी रक्षा कीजिए! आप, घोड़े आदि उत्तम पशुओं के योग से राज्यश्री को हमारे लिए प्रकट कीजिए। आपकी कृपा से हम लोग उत्तम मनुष्यों के सहयोग से बहुत वीर मनुष्य होंगे।॥३॥
हे भगवान्! आपकी कृपा और अपने पुरुषार्थ से हम लोग इस समय प्रकर्षता तथा उत्तमता की प्राप्ति में और इन दिनों के मध्य में ऐश्वर्ययुक्त और शक्तिमान होंगे। और हे परमपूजित! असंख्य धन देने हारे! सूर्य लोक के उदय में पूर्ण विद्वान् धार्मिक आप लोगों की अच्छी उत्तम प्रज्ञा और सुमति में हम लोग सदा प्रवृत्त रहें।॥४॥
हे सकलेश्वर्यसम्पन्न जगदीश्वर! जिससे आपकी सब सज्जन निश्चय करके प्रशंसा करते हैं वह आप, हे ऐश्वर्यप्रद! इस संसार और हमारे गृहस्थाश्रम में अग्रगामी और आगे सत्य कर्मों में बढ़ने हारे हजिए और जिससे सम्पूर्ण ऐश्वर्ययुक्त और समस्त ऐश्वर्य के दाता होने से आप ही हमारे पूजनीय देव होंगे, इसी हेतु से हम विद्वान लोग सकलैश्वर्य सम्पन्न होके सब संसार के उपकार में तन, मन, धन से प्रवृत्त हों।॥५॥
ब्रह्ममुहूर्त में उठने के सम्बन्ध में एक पश्चिमी कहावत सत्य है। 'अरलि टु बैड एण्ड अरलि टु राइज, इज द वे टु वि हैलिड वैलिड एण्ड वाइज'। अर्थात् सवारी सोना और सवारी जागना स्वास्थ्य ऐश्वर्य और धन की वृद्धि के लिए उत्तम है। वैद्य भी कहते हैं कि दिन को अधिक सोये रहने तथा रात्रि को अधिक जागे रहने का क्रम मत डालो इससे स्वास्थ्य और धन का नाश होता है।
जिस समय श्री रामचन्द्र जी वन यात्रा को जा रहे थे। और पहला विश्राम पंचवटी में किया। उस समय जब भरत जी उनसे मिलने को गये तब उन्होंने श्री रामचन्द्र जी से कहा भ्राताजी
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