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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

५४ [ १.१३ १२३ "आचार्य्य ! आज हमने ऊस खाया।" "ऊस कैसा होता है ?" "हल की फाल की तरह।" थोड़ी सीधी बात कहता है, सोच आचार्य्य चुप रहे। फिर एक दिन निमन्त्रण में कुछ विद्यार्थियो ने दही के साथ गुड़ खाया, कुछ ने दूध के साथ। उसने आकर कहा—'आज' हमने दही दूध के साथ खाया। "दूध दही कैसा होता है ?" "हल की फाल की तरह।" आचार्य्य ने सोचा—इस विद्यार्थी ने साँप की हल की फाल से उपमा दी, सो तो ठीक रहा। हाथी की हल की फाल से उपमा दी, वह भी सुण्ड का ख्याल करके कहा, इससे कुछ ठीक रहा। ऊस को हल की फाल के सदृश कहा, उसमे भी खैर कुछ ठीक है। लेकिन दूध दही तो सफेद होते हे, जैसा बरतन होता है वैसा ही उनका आकार हो जाता है। यहाँ तो उपमा सर्वथा गलत है। इस मूर्ख को न सिखा सकूँगा। यह कह, यह गाथा कही— असव्वत्थगामि वाच बालो सव्वत्थ भासति, नायं दधिं वेदि न नङ्गलीसं दधिम्पय मञ्जति नङ्गलीसं ॥ [ मूर्ख सब जगह ठीक न बैठनेवाली बात सब जगह कहता है। न यह दही को जानता है, न हल के फाल को। यह दही को भी हल की फाल समझता है।] ——— सक्षिप्तार्थ यूं है—जो वाणी उपमारूप स सर्वत्र लागू नहीं होती, वह असव्यत्थ गामिं वाच बालो जड आदमी सव्वत्थ भासति । दधि कैसा होता है पूछने पर कहता है जैसे हल की फाल। इस प्रकार कहता हुआ नायं दधिं वेदि न नङ्गलीसं । क्या ? क्योकि दधिम्पय मञ्जति नङ्गलीसं, यह दही को भी हल की फाल मानता है। अथवा दधि कहते हं दही को। पय कहते हैं दूध को। दधि ओर पय दधिप्पय, यह दही और दूध को भी हल की फाल मानता है,

शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का सारांश निकाला। उस समय

अम्ब ] ५५ ऐसा है यह मूर्ख। इससे क्या होगा ? अपने शिष्यो को गाथा कह, उसे खर्चा दे विदा किया। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का सारांश निकाला। उस समय मूर्ख विद्यार्थी लाळुदायि था। चारो दिशाओ में प्रसिद्ध आचार्य्य तो मैं ही था। १२४. अम्ब जातक “वायमेयेव पुरिसो” यह धर्मोपदेश बुद्ध ने जेतवन मे रहते समय एक कर्त्तव्य-निष्ठ ब्राह्मण के सम्बन्ध में दिया। क. वर्तमान कथा वह श्रावस्ती निवासी तरुण बुद्ध शासन में बडी श्रद्धा से प्रव्रजित हो बहुत कर्तव्य-परायण था। आचार्य्य, उपाध्याय की सेवा का कार्य्य; पीने का पानी तथा खाद्य सामग्री आदि तैयार रखने का कार्य्य, उपोसथ घर¹ तथा जन्ताघर² आदि साफ रखने का कार्य्य—सभी अच्छी तरह से करता। चौदह बडे कर्तव्यो और अस्सी छोटे छोटे कर्तव्यो—सभी को पूरा करता। विहार में झाडू लगाता। परिवेण मे झाडू लगाता। घूमने फिरने की जगह³ में झाडू लगाता। विहार जाने के रास्ते को साफ रखता। मनुष्यों को पानी देता। ¹ जहां भिक्षु एकत्र होकर उपोसथ करते हैं। ² अग्नि-शाला, जिसमें आग तापकर पसीना बहाया जाता है। ³ सिंहल प्रति में 'जिक्कम-मालक' का 'वित्कममालक' है; जो अशुद्ध प्रतीत होता है।

५६ [ १.१३.१२४ लोगो ने उसकी कर्तव्य-निष्ठा पर प्रसन्न हो, उसे पाँच सौ स्थिर निमन्त्रण दिए। बहुत लाभ-सत्कार की प्राप्ति हुई। उसके कारण बहुता को सुख मिला। धर्मसभा में बैठे हुए भिक्षुओ ने बात चलाई—'आयुष्मानो ! उस भिक्षु ने अपनी कर्तव्य निष्ठा से बहुत लाभ-सत्कार प्राप्त किया। इस एक के कारण बहुतो को सुख मिला। शास्ता ने आकर पूछा—"भिक्षुओ, बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ?" 'यह बातचीत' कहने पर "भिक्षुओ, केवल अभी नही, पहले भी यह भिक्षु कर्तव्य निष्ठ रहा है। इस अकेले के कारण पाँच सौ ऋषि फल-फूल के लिए न जाकर इस एक के द्वारा मँगवाए गए फलो से ही गुजारा चलाते रहे हैं।" यह कह पूर्वजन्म की बात कही— ख. अतीत कथा पूर्वकाल में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व उदीच्य ब्राह्मण कुल में पैदा हो सयाने होने पर ऋषियो के प्रव्रज्या-क्रम से प्रव्रजित हो पाँच सौ ऋषियो के साथ पर्वत के नीचे रहने लगे। उस समय हिमालय प्रदेश में बडी गर्मी पडी। जहाँ तहाँ पानी सूख गया। पशु पानी न मिलने से कष्ट पाने लगे। उन तपस्वियो में से एक तपस्वी ने उन (पशुओ) के प्यास-कष्ट को देख एक वृक्ष काट, उसमें से एक द्रोणि बना, पानी उलीच कर द्रोणि भर, उन्हें पानी दिया। बहुत से पशुओ के इकट्ठे होकर पानी पीने लगने पर तपस्वी को फल-मूल लाने के लिए जाने का समय न मिला। वह निराहार रहकर भी पानी पिलाता ही रहा। पशुओं ने सोचा यह हमें पानी पिलाने के कारण फल-मूल के लिए जाने का समय नही पाता। निराहार रहने के कारण बहुत कष्ट पाता है। हम लोग एक निर्णय करें। उन्होने सलाह की कि इसके बाद जो पानी पीने आए वह अपनी सामर्थ्य के अनुसार कुछ फल-मूल अवश्य लाए। उसके बाद प्रत्येक पशु अपनी अपनी शक्ति के अनुसार मीठे मीठे आम, जामुन, कटहल आदि अवश्य लाता। उसके लिए लाया हुआ फल ढाई गाडियाँ भर होता। पाँच सौ तपस्वी उसे ही खाते। अधिक होता, छोड़ देते।

अम्ब ] ५७ बोधिसत्त्व ने यह देख कहा—एक कर्त्तव्य-निष्ठ आदमी के कारण इतने तपस्वियों का बिना फल-मूल के लिए गए गुज़ारा चलता है। प्रयत्न करना ही चाहिए। इतना कह यह गाथा कही— वायमेथेव पुरिसो न निब्बिन्देय्य पण्डितो, वायामस्स फल पस्स भुत्ता अम्बा अनीतिह ॥ [ आदमी को चाहिए कि प्रयत्न अवश्य करे। पण्डित आदमी विमुख न हो। प्रयत्न के फल को देखो—आम प्रत्यक्ष खाने को मिले।] संक्षिप्तार्थ—पण्डितो, अपने कर्तव्य की पूर्ति में वायमेथेव, विमुख न हो। क्यो ? प्रयत्न के कभी निष्फल न होने के कारण। बोधिसत्त्व ने 'प्रयत्न सफल होता ही है' ऋषियो को इस प्रकार सम्बोधन करते हुए कहा वायामस्स फल पस्स। कैसा ? भुत्तो अम्बा अनीतिह, अम्ब, कहने के लिए है, मतलब है नाना प्रकार के फल लाए गए, आम उनम श्रेष्ठ होने से अम्ब कहा गया। यह जो पांच सौ ऋषियो ने स्वय जगल न जा एक के लिए आए फला को खाया, सो यह प्रयत्न का ही फल है। ओर यह अनीतिह। इति ह (आप्त) इतिहास से। इतिह से ही ग्रहण करना नही होता, उस फल को प्रत्यक्ष देखो। बोधिसत्त्व ने ऋषियो को उपदेश दिया। शास्ता ने यह धर्म-देशना ला, जातक का मेल बैठाया। उस समय का कर्तव्य-निष्ठ तपस्वी यह भिक्षु था। गण-शास्ता में ही था।

१२५. कटाहक जातक

५८ [ १.१३.१२५

१२५. कटाहक जातक

“बहुम्पि सो विकत्थेय्य . ” यह (धर्मोपदेश) शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय एक शेखी बघारने वाले भिक्षु के बारे में कहा। उसकी कथा पूर्वोक्त सदृश ही है¹।

ख. अतीत कथा

पूर्व समय में वाराणसो में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व महाधनशाली सेठ हुए। उसकी भार्या ने पुत्र को जन्म दिया। उसकी दासी ने भी उसी दिन पुत्र उत्पन्न किया। वे दोनो साथ साथ बढ़ने लगे। सेठ के लड़के के लिखना सीखते समय, दास ने भी उसकी तख्ती ढोने हुए जाकर उसी के साथ लिखना सीखा, गिनना सीखा। दो तीन भाषाएँ (बोहार) सीखी। क्रम से बढ़कर वह वचन-कुशल, भाषाविद, सुन्दर तरुण हुआ। उसका नाम था कटाहक। सेठ के घर में भण्डारी का काम करते हुए वह सोचने लगा कि यह लोग मुझसे हमेशा भण्डारी का काम नहीं लेंगे। कुछ भी दोष देखेंगे, तो डाटेंगे, बांध कर दाग देगे और दास बनाकर काम लग। इलाके मे सेठ का मित्र एक सेठ है। क्यो न मैं सेठ की तरफ से एक चिट्ठी लेकर, वहाँ पहुँच 'मैं सेठ का लडका हूँ कह उस सेठ को धोखा दे, उसकी लड़की से शादी कर सुखपूर्वक रहूँ। उसने कागज ले उस पर अपने ही लिखा—मैं अमुक नाम का (सेठ) अपने पुत्र को तुम्हारे पास भेजता हूँ। मेरा तुम्हारे ओर तुम्हारा मेर साथ


¹ भीमसेन जातक (८०)।

कटाहक ] ५६

शादी का सम्बन्ध करना योग्य है। इसलिए आप इस लडके को अपनी लडकी देकर वही बसा ले, मै भी समय मिलने पर आऊँगा। फिर इस चिट्ठी पर सेठ की अँगूठी की मुहर लगा इच्छानुसार मार्ग- व्यय तथा सुगन्धियाँ और वस्त्रादि ले प्रत्यन्त देश में जा सेठ के यहाँ पहुँच प्रणाम किया। सेठ ने उसे पूछा—तात, कहाँ से आया है ? "बाराणसी से।" "किसका पुत्र है ?" "वाराणसी सेठ का।" "किस प्रयोजन से आया है ?" कटाहक ने कहा—यह पत्र देखकर जान ले। सेठ ने पत्र बाँच प्रसन्न हो 'अब मेरा जीवन सफल हुआ' कह उसे लडकी दे प्रतिष्ठित किया। कटाहक का बडा परिवार था। वह यवागु-खाद्य अथवा वस्त्र गंध आदि के लाने पर झिडकता था—'इस तरह भी कही यवागु पकाया जाता है ? इस तरह भी कही खाद्य पकाया जाता है। और इस तरह भात ? ओह ! यह प्रत्यन्त देश के रहनेवाले। शहरी न होने से ही यह लोग न कपडो पर स्त्री करना जानते है, न सुगन्धित पदार्थो को पीसना और न फूलो को गूँथना ?' —इस प्रकार वह दर्जियो आदि की निन्दा करता। बोधिसत्त्व ने दास को न देख पूछा—'कटाहक नही दिखाई देता। कहाँ गया ?' फिर उसे ढूँढने के लिए आदमियो को चारो ओर भेजा। एक आदमी ने वहाँ जा उसे देख, पहचान अपने आप को छिपाए रख लौटकर बोधिसत्त्व से कहा। बोधिसत्त्व वह वृत्तान्त सुन, 'उसने अनुचित किया, जाकर उसे लेकर आता हूँ' सोच राजाज्ञा ले बहुत से लोगो को साथ ले चले। सेठ प्रत्यन्त देश को जा रहे हैं, यह बात सब जगह फैल गई। कटाहक ने जब यह सुना कि सेठ आ रहा है, तो सोचा कि वह और किसी कारण से नही आ रहा है। मेरे ही कारण वह आ रहा है। यदि मै अब भाग जाऊँ तो फिर नही आ सकूँगा। इसलिए एक यही उपाय है कि मै आगे जाकर स्वामी की सेवा कर उसे प्रसन्न करूँ।

६० [ १.१३.१२५ उस समय से वह लोगो में बैठकर इस प्रकार बातें बनाने लगा—दूसरे मूर्ख लोग मातापिता के किए उपकार को भूल, उनके भोजन करने के समय उनके प्रति अपने कर्तव्य को पूरा न कर उनके साथ ही भोजन करने बैठ जाते हैं। हम तो मातापिता के भोजन करने के समय पानी का बर्तन ले जाते हैं, थूकने का बर्तन ले जाते हैं, (दूसरे) पाय ले जाते हैं, पानी और पखा लेकर खड़े रहते हैं। शौच के लिए जाते समय परदे की जगह तक पानी का बरतन लेकर जाते हैं। इस प्रकार स्वामी के प्रति जो जो दास के कर्तव्य होते हैं, उन सबको प्रगट किया। इस तरह लोगो को समझा बोधिसत्त्व के प्रत्यन्त देश के समीप पहुँच जाने के समय अपने श्वसुर से कहा—"तात ! मेरे पिता आपके दर्शन के लिए आ रहे हैं। आप खाद्य भोज तैयार कराएँ। मैं भेंट लेकर आगे जाता हूँ।" उसने "तात ! अच्छा" कह स्वीकार किया। कटाहक ने बहुत सी भेंट ले जाकर बहुत से लोगो के साथ जा बोधिसत्त्व को प्रणाम कर भेंट अर्पण की। बोधिसत्त्व ने भेंट स्वीकार कर कुशल समाचार पूछ हाजरी के समय तम्बू लगवा शौच के लिए परदे की जगह में प्रवेश किया। कटाहक ने अपने अनु- यायियों को पीछे छोड़ा। पानी ले बोधिसत्त्व के पास पहुँचे। वहाँ उनके पानी छू चुकने पर पैरो में गिर कर कहा—'स्वामी मैं आपको जितना चाहे उतना धन दूंगा। मुझे बदनाम न करे।' बोधिसत्त्व उसकी सेवा से प्रसन्न हो बोले— 'मत डरो। मुझ से तुम्हें कुछ हानि न होगी।' इस प्रकार उसे तसल्ली दे प्रत्यन्त-नगर में प्रवेश किया। बड़ा आदर-सत्कार हुआ। कटाहक दास की तरह से उसकी सब प्रकार की सेवा करता रहा। एक बार जब बोधिसत्त्व सुखपूर्वक बैठे हुए थे प्रत्यन्त-देश के सेठ ने कहा— "महासेठ ! मैंने तुम्हारे पत्र को देखकर ही तुम्हारे लड़के को अपनी लड़की दे दी।" बोधिसत्त्व ने कटाहक को पुत्र ही बना उस (अवसर) के योग्य प्रिय वचन कह सेठ को सन्तुष्ट किया। लेकिन फिर उसके बाद से वह कटाह का मुँह नहीं देख सका। एक दिन बोधिसत्त्व ने सेठ की लड़की को बुलाकर कहा—अम्म ! आ ! मेरे सिर में जुएं हैं, उन्हें चुन। उसके आकर जुएं चुनती हुई खड़ी होने पर

कटाहक ] ६१

पूछा—'अम्म ! क्या मेरा पुत्र तेरे दुःख-सुख मे आलस्य रहित हो साथ देता हैं ? दोनो जने मिलकर प्रसन्नता-पूर्वक रहते हो न ?'' "तात ! सेठ के पुत्र में और कोई दोष नही। केवल आहार की निन्दा करता है।" "अम्म ! वह सदैव से दुख देनेवाला है। लेकिन मै तुझे उसका मुंह बन्द करने का मन्त्र देता हूँ। तू उसे अच्छी तरह सीख। मेरे पुत्र के भोजन की निन्दा करने के समय, जैसे सीखा वैसे ही उसके सामने खडी होकर कहना'— इस प्रकार एक गाथा सिखा कुछ दिन रह वाराणसी चले गए। कटाहक भी बहुत सा खाद्य-भोज्य ले, उनके पीछे पीछे जा बहुत सा धन देकर लौट आया। बोधिसत्त्व के जाने के बाद से कटाहक और भी अभिमानी हो गया। एक दिन जब सेठ की लडकी नाना प्रकार के अच्छे अच्छे भोजन ले कडछी से परोस रही थी उसने भोजन की निन्दा आरम्भ की। सेठ की लडकी ने जैसे बोधिसत्त्व से सीखी थी, उसी प्रकार यह गाथा कही— बहुम्पि सो विकत्थेय्य अञ्ञ जनपद गतो, अन्वागन्त्वान दूसेय्य भुञ्ज भोगे कटाहक ॥ [ दूसरे देश में जाकर वह बहुत बकता है। फिर आकर उसे दोषी ठहरा दे, (इसका ख्याल कर) कटाहक जो भोग मिल रहा है, उसका उपभोग कर । ]

बहुम्पि सो विकत्थेय्य अञ्ञ जनपद गतो, जो अपने जन्म-स्थान से किसी ऐसे दूसरे देश मे गया रहता है, जहाँ उसकी जाति नही जानते, वह बहुत बकता हैं। धोका देने की ठगने की बात करता है। अन्वागन्त्वान दूसेय्य, इस वार स्वामी की अगवानी करके दास कर्म करने के कारण चाबुक से पीटे जा कर पीठ की चमडी उधेडी जाने से और दाग दिए जाने से बच गया। यदि अनाचार करेगा तो दोबारा आने पर तेरा स्वामी तुझे दोषी ठहरायेगा, इस डर से आकर चाबुक से सजा देगा। दाग देकर तथा तेरी जाति प्रकट करके तुझे खराब करेगा, पीटेगा। इसलिए इस अनाचार को छोड भुञ्ज भोगे कटाहक ! फिर बाद

६२ [ १.१३ १२६ में अपना दासत्व प्रगट कराकर मत पछताना, यही यहाँ सेठ के कहने का मतलब है । —•— सेठ की लड़की यह सब नही जानती थी । वह जैसे सीखा था वैसे शब्द- मात्र कहती थी । कटाहक ने सोचा, निश्चय से सेठ ने मेरा नाम बताकर इसे सब कह दिया होगा । उसके बाद से फिर उसकी भोजन की निन्दा करने की हिम्मत न हुई । मान-मर्दित होकर वह यथा प्राप्त भोजन करता हुआ कर्मानुसार परलोक सिधारा । शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया । उस समय कटाहक बकवादी भिक्षु था । वाराणसी सेठ तो में ही था ।

१२६. असिलक्खण जातक

"तथेवेकस्स कल्याण" यह (धर्मोपदेश) शास्ता ने जेतवन में रहते समय कोशल-नरेश के तलवार के लक्षण कहनेवाले ब्राह्मण के बारे में दिया ।

क. वर्तमान कथा

यह (ब्राह्मण) राजा के पास लोहारों के तलवार लाने के समय तलवार को सूंघकर तलवार का लक्षण बताता था । जिनके हाथ से कुछ प्राप्त हो जाता उन की तलवार को वह सुलक्षण और माङ्गलिक कहता, जिनके हाथ से कुछ न मिलता उनकी तलवार को अमाङ्गलिक बता निन्दा करता । एक शिल्पी तलवार बना उसके म्यान में मिर्चों का बारीक चूर्ण भर राजा के पास तलवार लाया । राजा ने ब्राह्मण को बुलवाकर कहा—तलवार की परीक्षा कर ।

असिलक्खण ] ६३ जब ब्राह्मण तलवार निकालकर सूँघने लगा तो मिर्चों के चूर्ण के उसकी नाक को लगने से उसे छींक आई । छींक आने से उसकी नाक तलवार से लगी; और उसके दो टुकड़े हो गए । उसकी इस तरह नाक कटने की बात भिक्षु-सघ में प्रकट हो गई । एक दिन धर्म-सभा मे बैठे हुए भिक्षुओं ने बात चलाई—आयुष्मानो ! राजा के तलवार का लक्षण बतानेवाले ने तलवार का लक्षण बताते हुए नाक कटवा ली। शास्ता ने आकर पूछा—भिक्षुओ, इस समय बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ? 'अमुक बातचीत' कहने पर 'भिक्षुओ, इस ब्राह्मण ने न केवल अभी तल- वार सूँघते हुए नाक कटवाई, पहले भी कटवाई है' कह पूर्व जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्व समय में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय, उसके यहाँ तलवार का लक्षण कहनेवाला एक ब्राह्मण था। (इसके आगे की सारी कथा 'वर्तमान-कथा' की तरह ही है) । राजा ने उसे वैद्य के पास भेजकर उसकी नाक की चिकित्सा कराई । फिर लाख से उसकी नाक के सदृश ही एक नाक बनवाकर उसे फिर अपनी सेवा में नियुक्त किया । वाराणसी नरेश को कोई पुत्र न था । एक लडकी और एक भानजा था । उन दोनो को भी उसने अपने पास ही रखकर पाला था । एक साथ रहने के कारण वह् परस्पर प्रेम में बँध गए । राजा ने आमात्यों को बुलाकर सलाह की कि मेरा भानजा राज्य का उत्तराधिकारी है ही, इसे ही लडकी देकर इसका राज्याभिषेक कर दिया जाए । लेकिन फिर सोचा, भानजा तो हर तरह से आत्मीय है ही, इसके लिए कोई दूसरी राजकुमारी लाकर दी जाए । फिर इसका अभिषेक किया जाए । और अपनी लडकी किसी दूसरे राजा को दी जाए । इस प्रकार हमारे रिश्तेदार बहुत होगे; और हम ही दोनो राज्यो के स्वामी होगे । उसने मन्त्रियो की सलाह से निश्चय किया कि दोनो को पृथक पृथक रखना चाहिए; एक को एक घर में दूसरे को दूसरे में रक्खा । सोलह वर्ष की अवस्था होने पर उनका परस्पर का आकर्षण और भी बढ गया ।

६४ [ १-१३ १२६ राजकुमार सोचने लगा कि किस उपाय से मामा की लड़की को राज घर से निकलवाया जा सकता है ? उसे एक उपाय सूझा । एक भाग्य बतानेवाली को बुलवाकर उसने उसे एक हजार मुद्राएँ दीं। भाग्य बतानेवाली ने पूछा— "मैं क्या कर सकती हूँ ?" "अम्ब ! तेरे करने से सफलता निश्चित है। कोई बात कहकर ऐसी विधि लगा जिससे मेरा मामा राज-कन्या को घर से बाहर लाए।" "स्वामी, अच्छा मैं राजा के पास जाकर कहूँगी कि तुम्हारी कन्या पर ग्रह है। इतने समय के बाद नहीं रहेगा। मैं अमुक दिन राज-कन्या को रथ पर चढ़ाकर हथियार बन्द बहुत से आदमियो को साथ ले, अनेक अनुयायियो सहित श्मशान में जाऊँगी। वहाँ मण्डल-चौकी के नीचे श्मशानशय्या पर मुर्दे को लिटा, ऊपर की शय्या पर राज-कन्या को बिठा सुगन्धित जल के एक सौ आठ घडा से स्नान करवाकर ग्रह उतारूँगी, ऐसा कह कर मैं राजकन्या को श्मशान ले जाऊँगी। तू हमारे वहाँ जाने के दिन हमसे भी पहले ही थोड़ा मिर्चों का चूर्ण लेकर, हथियार बन्द अपने आदमियो के साथ रथ पर चढ़कर श्मशान-भूमि में जाना। वहाँ पहुँच रथ को श्मशान-द्वार पर ही एक तरफ छोड़, हथियार बन्द आदमियों को श्मशान-वन में छिपा, स्वयं श्मशान में जाकर वहाँ मण्डतपीठ के पास मुर्दे की तरह पट पड रहना। मैं वहाँ आकर तेरे ऊपर मञ्च बिछा राजकन्या को उठा उस पर सुलाऊँगी । त उस समय मिर्च-चूर्ण को दो तीन बार नाक पर लगा छींकना। तेरे छींकने के समय हमलोग राजकन्या को छोड़कर भाग जाएँगे। तब आकर राजकन्या को सिर से नहला, अपने भी नहा उसे लेकर अपने घर जाना।" उसने अच्छा कह स्वीकार किया। राजा को जाकर जब उसने सब बात कही, तो राजा ने भी स्वीकार किया। राजकन्या से भी वह रहस्य कहा तो वह भी मान गई। उसने बाहर निकलने के दिन राजकुमार को सूचना दे अनेक अनुयायियो के साथ जाते हुए पहरेदार आदमियों को डराने के लिए कहा— मेरु, राजकन्या को चारपाई पर लिटाने के समय चारपाई के नीचे पड़ा हुआ मुर्दा छींकेगा, और छींकने के बाद चारपाई के नीचे से निकल जिसे पहले देखेगा उसे ही पकड़ेगा। इसलिए होशियार रहना। राजकुमार पहले ही पहुँचकर जैसे कहा गया था, वैसे ही लेट रहा।

असिलक्खण ] ६५ भाग्य बतानेवाली ने राजकन्या को मण्डलपीठ की जगह पर जाते हुए 'डर मत' इशारा कर चारपाई पर लिटाया । उसी समय कुमार ने मिर्च-चूर्ण नाक पर फेंक छींक मारी । उसके छींक मारते ही (वह) भाग्य बतानेवाली राजकन्या को छोड़ बड़ा शोर मचाती हुई सबसे पहले भागी । उसके भागने पर एक भी न ठहर सका । जिसके पास जो शस्त्र थे उन्हें छोड़ सभी भाग गए । राजकुमार जैसे निश्चय किया गया था उसके अनुसार सब करके राजकन्या को अपने घर ले गया । भाग्य बतानेवाली ने जाकर राजा को सब हाल कहा । राजा ने स्वीकार किया, बोला—यूँ भी मैने उसे उसी के लिए पाला था । दूध म घी पड़ने जैसा हुआ। आगे चलकर भानजे को राज्य दे अपनी कन्या को उसकी पटरानी बनाया । वह उसके साथ मेल से रहता हुआ धर्म-पूर्वक राज्य करता रहा । वह तलवार के लक्षण बतानेवाला भी उसी की सेवा में रहता था । एक दिन राज्य-सेवा में आ सूर्य के सामने खड़े हो सेवा-कार्य करते हुए उसकी नाक की लाख पिघल गई । नकली नाक जमीन पर गिर पड़ी । वह शर्म के मारे सिर नीचा करके खड़ा हुआ । राजा ने हँसते हुए कहा—आचार्य्य सोच मत करो । छींकना एक के लिए कल्याणकर होता है, दूसरे के लिए बुरा । तुम्हारे छींकने पर नाक पृथक हो गई, लेकिन हमने छींका तो हमें मामा की लड़की और राज्य मिला। इतना कह यह गाथा कही— तथेवेकस्स कल्याणं तथेवेकस्स पापकं, तस्मा सब्बं न कल्याणं सब्बं वापि न पापकं ॥ [ वही किसी के लिए कल्याणकारक है, वही किसी के लिए बुरा । इस लिए न सब कल्याणकारक ही है, न सब बुरा ही है।] तथेवेक्स्स तवेवेकस्स—यह भी पाठ है । दूसरे पद में भी ऐस ही । इस प्रकार इस गाथा द्वारा उसने यह बात कही । फिर दान आदि पुण्यकर्म करके यथाकर्म परलोक सिधारा । ५

हैं उन सबका अनैकान्तिक होना प्रकाशित करके जातक का मेल बैठाया।

६६ [ १.१३.१२७ शास्ता ने इस धर्मोपदेश द्वारा लोक में जो बहुत सी अच्छी बुरी मान्यताएँ हैं उन सबका अनैकान्तिक होना प्रकाशित करके जातक का मेल बैठाया। उस समय का तलवार के लक्षण पढनेवाला तो यह अब का तलवार के लक्षण पड़नेवाला ही था। हाँ भानजा-राजा मैं ही था। १२७. कलण्डुक जातक "ते देसा तानि वत्थूनि..." यह (धर्मदेशना) शास्ता ने जेतवन में रहते समय एक बकवादी भिक्षु के बारे में कही। दोनो कथाएँ (अतीत कथा तथा वर्तमान कथा) कटाहक जातक १ की कथा की तरह ही हैं। हाँ, इस जातक में वाराणसी के सेठ का नाम कलण्डुक था। उसके भाग कर प्रत्यन्त सेठ की लड़की से विवाह कर बड़े ठाट-बाट के साथ रहने के समय, वाराणसी के सेठ के उसे ढुंढवाने पर भी उसके न मिलने पर, वाराणसी सेठ ने अपना पाला-पोसा एक तोते का बच्चा भेजा कि जा कलण्डुक को खोज। तोते का बच्चा इधर-उधर घूमता हुआ उस नगर में पहुँचा। उस समय कलण्डुक जल क्रीडा करने की इच्छा से बहुत सारे माला-गन्ध- विलेपन तथा खाद्य-भोज्य ले नदी पर जा सेठ कन्या के साथ एक नौका पर बैठ पानी में खेलता था। उस देश में ऐश्वर्यशाली लोग जब जल-क्रीडा करते तो कोई तेज औषध मिला हुआ दूध पीते थे। उससे उनके सारा दिन भी जल में क्रीडा करते रहने पर उन्हें शीत नही लगता था। यह कलण्डुक उस दूध से मुँह भर उससे कुरला कर उसे थूक देता, लेकिन उसे जल में न थूककर उस सेठ-कन्या के सिर पर थूकता था। १कटाहक जातक (१२५) ।

कलण्डुक ] ६७ उस तोते के बच्चे ने भी नदी के किनारे एक गूलर की शाखा पर बैठ कलण्डुक को पहचान लिया और देखा कि वह सेठ-कन्या के सिर पर थूक रहा है। उसने कहा—"अरे ! कलण्डुक ! दास ! अपनी जाति और (पूर्व) निवास-स्थान को याद कर। दूध से मुँह भर, उसका कुल्ला कर ऊँची जाति- वाली सुख में पली हुई सेठ की कन्या के सिर पर मत थूक। तू अपनी हैसियत को नहीं देखता ?" फिर यह गाथा कही— ते देसा तानि यत्थूनि अहञ्च वनगोचरो, अनुविच्च खो त गण्हेय्यु पिव खीरं कलण्डुक ॥ [वह देश और वस्तुएँ (=कोख)। मैं वनचर पक्षी। तुझे पहचान कर पकड़ लगे। कलण्डुक दूध पी।] ते देसा तानि यत्थूनि, यह माता की कोख के बारे म कहा है। भावार्थ यह है—जहाँ तू रहा है वह क्षत्रिय कन्या आदि की कोख नहीं रही है, अथवा जहाँ तू प्रतिष्ठित रहा है वह भी क्षत्रिय कन्या आदि की कोख नहीं रही है। तू दासी की कोख मे रहा और प्रतिष्ठित हुआ। अहञ्च वन गोचरो—मै तिरश्चीन योनि में पैदा होकर भी यह सब जानता हूँ, यह प्रकट करता है। अनुविच्च खो त गण्हेय्यु, इस प्रकार अनाचार करते हुए को देख जब मैं जाकर कहूँगा तो पहचानकर वह तेरे स्वामी आकर तुझे ताड़कर और दाग देकर पकड कर ले जायेगें। इसलिए अपनी हैसियत देखकर सेठ की लडकी के सिर पर बिना थूके हुए पिव खीर कलण्डुक, नाम से सम्बोधन करता है कि (हे कलण्डुक दूध पी)। कलण्डुक ने भी तोते के बच्चे को पहचानकर 'यह मुझे प्रकट कर रहा है' सोच भयभीत हो कहा—आइए ! स्वामी ! कब आए ? तोते के बच्चे ने सोचा यह मेरा हित चिन्तक होकर नही बुला रहा है। यह मेरी गरदन मरोड़कर मार डालना चाहता है। यह समझकर कहा कि मुझे तुझसे काम नहीं है। तब वह उड़कर बाराणसी गया और जैसे जैसे देखा था सेठ को विस्तार- पूर्वक सब कहा।

हैं उन सबका भलीभाँति विवेचन प्रकाशित करके जातक का मेल बैठाया।

६६ [ १-१३-१२७ शास्ता ने इस धर्मोपदेश द्वारा लोक में जो बहुधा भी अच्छी बुरी भावनाएं हैं उन सबका भलीभाँति विवेचन प्रकाशित करके जातक का मेल बैठाया। उस समय का तलवार से लक्षण पढ़नेवाला तो यह अब का तलवार के लक्षण पढ़नेवाला ही था। मैं भानन्द-राजा में ही था। १२७. कलण्डुक जातक "से ऐसा सानि थल्पूनि..." यह (धर्मदेशना) शास्ता ने जेतवन म रहने समय एक थरवादी भिक्षु के बारे में कही। दोनो कथाएँ (अतीत कथा तथा वर्तमान कथा) कटाहक जातक¹ की कथा की तरह ही हैं। हाँ, इस जातक में वाराणसी के सेठ का नाम कलण्डुक था। उसने भाग कर प्रत्यन्त सेठ की लडकी से विवाह कर बडे ठाट-बाट के साथ रहने के समय, वाराणसी के सेठ के उसे ढुंढवाने पर भी उसके न मिलने पर, वाराणसी सेठ ने अपना पाला-पोसा एक तोते का बच्चा भेजा कि जा कलण्डुक को खोज। तोते का बच्चा इधर-उधर घूमता हुआ उस नगर में पहुँचा। उस समय कलण्डुक जल-क्रीडा करने की इच्छा से बहुत सारे माला-गन्ध- विलेपन तथा खाद्य-भोज्य ले नदी पर जा सेठ कन्या के साथ एक नौका पर बैठ पानी म खेलता था। उस देश में ऐश्वर्य्यशाली लोग जब जल-क्रीडा करते तो कोई तेज औषध मिला हुआ दूध पीते थे। उससे उनके सारा दिन भी जल म क्रीडा करते रहने पर उन्हें शीत नही लगता था। यह कलण्डुक उस दूध से मुंह भर उससे कुरला कर उसे थूक देता, लेकिन उसे जल में न थूककर उस सेठ-कन्या के सिर पर थूकता था। ¹ कटाहक जातक (१२५) ।

कलण्डुक ] ६७ उस तोते के बच्चे ने भी नदी के किनारे एक गूलर की शाखा पर बैठ कलण्डुक को पहचान लिया और देखा कि वह सेठ-कन्या के सिर पर थूक रहा है। उसने कहा—"अरे ! कलण्डुक ! दास ! अपनी जाति और (पूर्व) निवास-स्थान को याद कर। दूध से मुंह भर, उसका कुरला कर ऊँची जाति- वाली कुल में पली हुई सेठ की कन्या के सिर पर मत थूक। तू अपनी हैसियत को नहीं देखता ?" फिर यह गाथा कही— ते देसा तानि वत्थूनि अहञ्च वनगोचरो, अनुविच्च खो त गण्हेय्यु पिव खीर कलण्डुक ॥ [ वह देश और वस्तुएँ (=कोख) । मैं वनचर पक्षी । तुझे पहचान कर पकड़ लगे । कलण्डुक दूध पी ।] ते देसा तानि वत्थूनि, यह माता की कोख के बारे मे कहा है। भावार्थ यह है—जहाँ तू रहा है वह क्षत्रिय कन्या आदि की कोख नहीं रही है, अथवा जहाँ तू प्रतिष्ठित रहा है वह भी क्षत्रिय कन्या आदि की कोख नहीं रही है। तू दासी की कोख मे रहा और प्रतिष्ठित हुआ। अहञ्च वन गोचरो—में तिरश्चीन योनि में पैदा होकर भी यह सब जानता हूँ, यह प्रकट करता है। अनुविच्च खो त गण्हेय्यु, इस प्रकार अनाचार करते हुए को देख जब मैं जाकर कहूँगा तो पहचानकर वह तेरे स्वामी आकर तुझे ताड़कर और दाग देकर पकड़ कर ले जायेंगे। इसलिए अपनी हैसियत देखकर सेठ की लड़की के सिर पर बिना थूके हुए पिव खीर कलण्डुक; नाम से सम्बोधन करता है कि (हे कलण्डुक दूध पी) । कलण्डुक ने भी तोते के बच्चे को पहचानकर 'यह मुझे प्रकट कर रहा है' सोच भयभीत हो कहा—आइए ! स्वामी ! कब आए ? तोते के बच्चे ने सोचा यह मेरा हित चिन्तक होकर नही बुला रहा है। यह मेरी गरदन मरोड़कर मार डालना चाहता है। यह समझकर कहा कि मुझे तुझसे काम नही है। तब वह उड़कर बाराणसी गया और जैसे जैसे देखा था सेठ को विस्तार- पूर्वक सब कहा।

शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय का

६८ [ १.१३ १२८ सेठ बोला—उसने अनुचित किया। और आज्ञा दे उसे वाराणसी मँगवा दास बनाकर रक्खा। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय का कटण्डुक यह भिक्षु था। वाराणसी सेठ तो मैं ही था। १२८. बिळारवत जातक “यो चे धम्मं धजं कत्वा ..” यह शास्ता ने जेतवन में रहते समय एक ढोंगी भिक्षु के बारे म कही। क. वर्तमान कथा उस समय शास्ता ने उसके ढोंग की चर्चा चलने पर 'भिक्षुओ, केवल अब ही नहीं, पहल भी यह ढोगी ही रहा है' कह पूर्व-जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करन के समय बोधिसत्त्व ने चूहे का जन्म ग्रहण किया। बड़े होने पर वह बढ़कर सूअर के बच्चे की तरह हो अनेक सौ चूहों के साथ जंगल म रहने लगा। इधर उधर घूमते हुए एक शृगाल ने उस चूहों के समूह को देखकर सोचा कि इन चूहों को ठगकर खाऊँगा। यह सोच वह चूहों के बिल से थोड़ी ही दूर पर सूर्याभिमुख हो, मुंह खोल हवा पीते हुए की तरह एक ही पाँव से खड़ा हुआ। इधर उधर भोजन के लिए ढूंढ़ते हुए बोधिसत्त्व ने उसे देख सोचा यह सदाचारी होगा और उसके पास आकर पूछा—

बिळारवत ] ६६ "आपका, भन्ते ! क्या नाम है ?" "मेरा नाम है धार्मिक ।" "चारो पैर पृथ्वी पर न रख, एक ही पैर से क्या खड़े हैं ?" "मेरे चारो पैर पृथ्वी पर रखने से पृथ्वी के लिए दूभर होगा, इस लिए एक ही पैर से खडा होता हूँ।" "मुँह खोले क्यो खड़े हैं ?" "हम हवा के अतिरिक्त और कुछ नही खाते ?" "सूर्य की ओर मुंह करके क्यो खडे है ?" 'सूर्य को नमस्कार कर रहा हूँ।" बोधिसत्त्व ने सोचा, यह सदाचारी है । उसके बाद से चूहों के समूह के साथ प्रात साय उसकी सेवा में जाने लगे । उसकी सेवा कर लौटने के समय शृगाल सबसे पिछले चूहे को पकड़कर मास खा, निगल कर, मुंह पोछ खडा हो जाता । क्रम से चूहों का दल कम पड गया । चूहे सोचने लगे कि पहले हम यह बिल पर्याप्त नही होता था, सट सट कर खड़े होते थे, अब खुलकर खड़े होते हैं तब भी बिल नही भरता । क्या मामला है ? उन्होने बोधिसत्त्व से सारा हाल कहा । बोधिसत्त्व ने 'चूहे किस कारण कम हो गए' सोचते हुए शृगाल पर शक किया । फिर जांच करने के लिए (शृगाल की) सेवा (से लौटने) के समय बाकी चूहों को आगे कर स्वय पीछे रहा । शृगाल उस पर उछला । अपने को पकडने के लिए शृगाल को उछलता देख बोधिसत्त्व ने रुककर कहा— भो शृगाल ! तेरा यह व्रत धार्मिक नहीं है । तू दूसरो की हिंसा करने के लिए ही धर्म को आगे करके रहता है । इतना कह यह गाथा कही— यो वे धम्मं धजं कत्वा निगूळ्हो पापमाचरे, विस्सासयित्वा भूतानि बिळार नाम तं वतं ॥ [जो धर्म की ध्वजा बनाकर, प्राणियो में विश्वास उत्पादन कर छिप कर पाप करता है, उसका व्रत बिलाल-व्रत है ।] यो वे, क्षत्रिय आदियों में कोई भी । धम्मं धजं कत्वा, दस कुशल धर्मों की ध्वजा बनाकर, उन्ह करता हुआ उठाकर दिखाता हुआ, विस्सासयित्वा, यह

७० [ १.१३ १२६ सदाचारी है, ऐसा विश्वास पैदा करके विडार नाम त व्रत, इस प्रकार धर्म की ध्वजा बनाकर छिपकर पाप करनेवाले का व्रत ढोंग कहलाता है। चूहों के राजा ने इस प्रकार कहते ही कहते उछलकर उसकी गरदन पर चढ, ठोडी के नीचे की अन्दर की गले की नाली को डसकर गले की नली को फाड मार डाला। चूहों के दल ने रुक कर शृगाल को मुर मुर करके खा डाला। पहले आए हुओ को ही शृगाल का मांस मिला, पीछे आए हुओ को नही मिला। उसके बाद से चूहों का दल निर्भय हो गया। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय का शृगाल यह ढोगी भिक्षु था। चूहों का राजा तो मै ही था। १२६. अग्गिक जातक “नाय सिखा पुञ्जहेतु .” यह (गाथा) भी शास्ता ने जेतवन में रहते समय एक ढोगी भिक्षु के ही बारे में कही— ख. अतीत कथा पुराने समय में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व चूहों के राजा हो जगल में रहते थे। एक शृगाल जगल में आग लगने पर जब भागने में असमर्थ रहा, तो एक वृक्ष से सिर टिकाकर खडा हो गया। उसके सारे शरीर के बाल जल गए। वृक्ष से लगे हुए सिर पर शिखा की तरह से कुछ बाल बच गए। उसने एक दिन एक पर्वतीय तालाब में पानी पीते हुए अपनी छाया के साथ शिखा को देखकर सोचा अब मुझे पूंजी मिल गई। फिर जगल में घूमते हुए चूहों के बिल

शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय भी

७२ [ १.१३.१३० न खा पाएगा। अथवा हमारे साथ तुम्हारा रहना बन्द हुआ; अब हम तेरे साथ न बसेंगे। शेष पहले ही की तरह से है। ————— शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय भी शृगाल यही भिक्षु था। चूहों का राजा तो मैं ही था। १३०. कोसिय जातक "यथाधाचाव भुञ्जस्सु..." यह (गाथा) शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय श्रावस्ती-निवासी एक स्त्री के बारे में कही। क. वर्तमान कथा वह एक श्रद्धालु ब्राह्मण उपासक की ब्राह्मणी थी; बहुत दुश्चरित्र, पापिन। रात को दुराचार करती। दिन में कुछ न कर रोग का बहाना बना बड़बड़ाती हुई लेट रहती। वह ब्राह्मण उससे पूछता—"भद्रे ! तुझे क्या कष्ट है?" "मुझे वायु बींधती है।" "तो तुझे क्या क्या चाहिए?" "चिकने, मीठे, अच्छे, स्वादिष्ट यागु-भात-तेल आदि।" जो जो वह इच्छा करती, ब्राह्मण ला लाकर देता। दास की तरह सब काम करता। लेकिन वह ब्राह्मण के घर आने के समय लेट रहती, बाहर जाने के समय जारों के साथ गुजारती। ब्राह्मण सोचता कि इसके शरीर में चुभनेवाली वायु का अन्त ही होता दिखाई नहीं देता। एक दिन वह गन्ध माला आदि से जेतवन जा शास्ता की वन्दना तथा पूजा