जातक पारिजात (वैद्यनाथ दीक्षित - शास्त्रीय होरा फलित, राजयोग एवं आयुर्दाय सटीक)
Jataka Parijata of Vaidyanatha Dikshita with Commentary
वैद्यनाथ दीक्षित (टीकाकार: पं. कपिलेश्वर शास्त्री एवं पं. मातृप्रसाद शास्त्री) द्वारा
४ जातपारिजातस्य- विषयाः पृष्ठङ्काः | विषयाः पृष्ठङ्काः मध्यमायुर्योगः ११५ | निर्याणसमयाः १४२ मध्यमायुषः केचन भेदाः | यमकण्टकज्ञानं (टीकायाम्) " (टीकायाम्) ११६ | निर्याणमास-चन्द्र-लग्नानि १४४ पूर्णायुर्योगः ११८ | निर्याणसमयान्तरम् १४५ पूर्णायुः प्रमाणम् १२० | निर्याणचन्द्रः १४६ योगविशेषाद्युगान्तमायुः " | निर्याणदशा " मुनित्वप्रदो ग्रहयोगः १२१ | निर्याणहेतुः १४७ अमितायुर्योगः " | हस्तादिविच्छेदयोगाः १५२ देवसाहय्यप्रदो योगः १२१ | दुर्मरणयोगाः १५३ असंख्यायुः प्रमाणम् १२२ | निर्याणदिग्ज्ञानम् १५९ मुनिसमता " | मरणे मोहकालः शवपरिणामश्च " युगान्तायुर्योगः " | मरणानन्तरं गतिज्ञानम् १६० ब्रह्मपदप्राप्तियोगः " | अध्यायोपसंहारः १६२ आयुषः सप्तविधता " | बृहज्जातकोक्तनिर्याणाध्यायः आयुर्दायाध्याये ॥ ५ ॥ | (टीकायाम्) १६२ निसर्गायुः कथनम् १२४ | जातकभङ्गाध्याये ॥ ६ ॥ निसर्गायुषो वर्षाणि " | जातकभङ्गपरिभाषा " पिण्डायुषो " " | राजभङ्गाः " पिण्डायुषः स्पष्टीकरणम् १२५ | नीचोऽपि निखिलां विद्यां प्राप्नोति, आयुषो हरणम् १२६ | कुलीनोऽपि निम्नवृत्त्याजीवतीति योगौ " व्ययादिहरणम् १२७ | भिक्षुयोगाः १६५ क्रूरोदयहरणम् १२८ | दुष्कर्मकृत्प्रेष्ययोगौ १६६ लग्नायुः साधनम् १२९ | दुर्भोज्यादिनीचयोगाः १६७ षड्विधायुर्हरणम् १३० | रेकायोगाः १७३ अंशकायुः " | रेकायोगफलम् १७५ रश्मिजायुः १३३ | दरिद्रयोगाः १७६ रश्मिजायुषो हरणम् १३४ | अन्येपि दरिद्रयोगाः (टीकायाम्) १७८ चक्रायुः १३५ | दरिद्रयोगफलम् १७९ दशायुः " | प्रेष्ययोगाः " आयुषो ग्रहणम् १३६ | प्रेष्ययोगफलम् १८१ आयुषः स्पष्टीकरणम् १३७ | अङ्गहीनयोगाः " आयुषोऽधिकारिणः १३७ | द्विगुणाङ्गमूकयोगौ १८२ नानाजातीयमायुः १३८ | सदन्तकुब्जपङ्गुजडजन्मयोगाः " अरिष्टदशा " | वामनहीनाङ्गयोगौ १८३ छिद्रग्रहाः १४१ | विकलनेत्रयोगाः " देष्काणस्वरूपम् " | सूर्यस्थित्या नेत्रविकारः १८४ जीवदेहमृत्युसंज्ञाः १४२ | नेत्रविकारयोगाः "
विषयसूची । ५ विषया: पृष्ठाङ्का: विषया: पृष्ठाङ्का: रोगयोगा: १८६ अखण्डसाम्राज्यपति: २२३ सर्पाङ्गद्वययोग: १८७ भद्रयोगफलम् ,, कर्णरोगयोग: १८८ हंसयोगफलम् २२४ पित्तरोग: ,, मालव्ययोगफलम् ,, अपानरोग: १८९ शशकयोगफलम् ,, क्लीवयोग: १९० योगानां फलप्राप्तिकाल: २२५ उन्मादयोग: १९१ भास्करादियोगा: ,, उन्मादबुद्धियोग: १९२ इन्द्रयोग: २२६ बुद्धिभ्रम-जड-मद्यपायीयोग: ,, मरुद्योग : ,, गुह्यरोग-कण्ठरोगयोग: ,, बुधयोग: ,, उन्मादभावकलहयोग: १९३ सुनफाऽनफा-दुरुधुरा-केमद्रुमयोगा: २२७ दन्ताक्षियोग: ,, अन्ये केमद्रुमसमफलयोगा: २२८ अन्धयोग: ,, केमद्रुमयोगापवाद: २३० कुष्ठयोग: १९४ केमद्रुमफलम् २३१ मूत्रकृच्छ्रशोणितरोगयोग: ,, बृहज्जातकोक्तं सुनफादियोगा: ,, गुल्मरोगदाहरोगयोग: १९५ सुनफा-नफा-दुरुधुरा-केमद्रुमयो- उदररोगभेद: ,, गानां खेटज्ञानचक्राणि ,, हृदयशूलरोग शूलयोग: ,, सुनफादियोगफलम् २३४ अपरिपाकरोग-पाण्डुरोगयोग: १९६ कुजादिकृतसुनफायोगफलम् २३५ व्यभिचारजातरोगयोग: ' ,, अनफायोगफलम् ,, देवदर्शनाद् भूतप्रेतपिशाचदर्शना- ,, दुरुधुरायोगफलम् २३६ ज्जातरोगयोग: १९७ शकटयोगफलम् २३८ रोगयोगानां विवरणम् ,, पारिजातादियोगफलानि. ,, कासश्वासक्षयपीनसयोग: ,, अधमसमवरिष्ठयोगा: ,, जलोदररोगदीर्घरोगयोग: १९८ चन्द्राधियोग: २३९ जातस्य ह्रस्वयोग: ,, लग्नाधियोग: " विकलनयनदारजन्मयोग: १९९ गजकेसरीयोग: २४० कर्णरोगदन्तरोगयोग: ,, अमलायोग: ,, मुखयोग: २०० वासिवेशी-उभयचरिकैयोग: २४१ राजयोगाध्याये ॥ ७ ॥ वास्यादियोगफलानि ,, राजयोगा: २०० शुभाशुभकर्त्तरियोगा: २४२ राजाधिराजयोगा: २०७ पर्वतयोग: २४३ नृपतुल्ययोगौ २०८ काहलयोग: २४४ विविधराजयोगभेदा: २१० मालिकायोगा: ,, ग्रहफलदानविवरणम् २२२ चामरयोग: २४६ पञ्चमहापुरुषयोगा: ,, शंखयोग: ,, रुचक-योगफलम् २२३ भरीयोग: २४७ मृदङ्गयोग: ,,
| ६ | जातकपारिजातस्य- | ||
|---|---|---|---|
| विषयाः | पृष्ठांकाः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
| श्रीनाथयोगः | २४८ | चतुर्थभावगतग्रहफलम् | २७६ |
| शारदयोगः | ,, | पञ्चम- ,, | ,, |
| मत्स्ययोगः | २४९ | षष्ठ- ,, | २७७ |
| कूर्मयोगः | ,, | सप्तम- ,, | ,, |
| खड्गयोगः | २५० | अष्टम- ,, | २७८ |
| लक्ष्मीयोगः | ,, | नवम- ,, | २७९ |
| कुसुमयोगः | २५१ | दशम- ,, | ,, |
| पारिजातयोगः | ,, | लाभ- ,, | २८० |
| कलानिधियोगः | २५२ | व्यय- ,, | ,, |
| अंशावतारयोगः | २५३ | स्वोच्चफलम् | २८१ |
| हरि-हर-विधियोगाः | ,, | मूलत्रिकोणफलम् | २८२ |
| नाभसयोगाः | २५४ | स्वक्षेत्रफलम् | ,, |
| बृहज्जातकोक्ताश्रयदलयोग- | मित्रक्षेत्रफलम् | ,, | |
| लक्षणम् | ,, | शत्रुक्षेत्रफलम् | २८३ |
| प्राक्तनैराश्रयदलयोगानुक्तकारणम् | २५६ | नीचस्थफलम् | २५४ |
| गदा-शकट-विहग-शृङ्गाटक- | सान्वब्दादिफलाध्याये ॥ ६ ॥ | ||
| हलयोगाः | ,, | मान्दिस्थितद्वादशभावफलानि | २८५ |
| वज्र-यव-कमल-वापी-योगाः | २५७ | ग्रहयुक्तमान्दिफलम् | २८६ |
| यूप-शर-शक्ति-दण्ड-योगाः | २५८ | संवत्सरफलम् | २८७ |
| नौकूटच्छत्रचापाद्र्धयोगाः | २५९ | संवत्सरायनप्रकारस्तन्नामानि च | |
| समुद्र-चक्रयोगौ | २६० | (टीकायाम्) | २८८ |
| संख्यायोगाः | २६१ | अयनफलम् | २९० |
| आश्रय-दलयोग-फलम् | ,, | ऋतुफलम् | २९१ |
| गदादियोगफलम् | ,, | मासफलम् | ,, |
| ७ अध्यायोपसंहारः | २६३ | पक्षफलम् | २९२ |
| द्व्यादिग्रहयोगाध्याये ॥ ८ ॥ | कालफलम् | ,, | |
| द्विग्रह-योगाः | २६३ | तिथिफलम् | ,, |
| त्रिग्रह-योगाः | २६४ | वारफलम् | २९३ |
| चतुर्ग्रहयोगाः | २६७ | नक्षत्रनामानि | २९४ |
| पञ्चग्रहयोगाः | २६९ | गण्डान्तताराः | २९६ |
| षड्ग्रहयोगाः | २७० | अभुक्तघटिका | ,, |
| मेषादिराशिस्थैकग्रहफलम् | २७१ | ज्येष्ठाज्ञानि | ,, |
| दृष्टिफलम् | २७२ | मूलफलानि | २९७ |
| चन्द्रस्य दृष्टिफलम् | ,, | श्लेषागण्डान्तम् | २९८ |
| लग्नादिभावगतग्रहफलम् | २७४ | श्लेषा-मघा-ज्येष्ठा-मूल-रेवत्य- | |
| द्वितीयभावगतग्रहफलम् | २७५ | श्विनीषु गण्डान्तकथनम् | २९९ |
| तृतीय- ,, | ,, | अन्यगण्डान्तानि | ,, |
विषयसूची । ७ विषयाः पृष्ठाङ्काः | विषयाः पृष्ठाङ्काः गण्डकालः ३०० | अष्टकवर्गादायुःसाधनम् ३३२ तिथिदोषः ३०१ | लग्नाष्टकवर्गचक्रम् (टीकायाम् ) ३३३ योगदोषः ,, | अष्टकवर्गायुर्ग्रहस्थितिः ,, दन्तोद्गमफलम् ३०२ | समुदायाष्टकवर्गः ३३४ जन्मतारादयः ,, | सर्वाष्टके भावानां त्रिभागकल्पना ३३६ गण्डदोषापवादः ३०३ | सर्वाष्टके खण्डत्रये ग्रहफलम् ३३७ नक्षत्रफलम् ३०४ | लग्नगतविशिष्टबिन्दुफलम् ,, राशिफलम् ३०५ | योगवशादायुःप्रमाणम् ३३८ राशिनवांशफलम् ३०६ | ग्रहयोगवशाद्विन्दुफलानि ,, योगफलम् ३०७ | बिन्दुवशाद्रोगादिज्ञानम् ३३९ करणफलम् ३०८ | शुद्धाष्टकवर्गायुः ३४० लग्नफलम् ३०९ | गणितागतायुषः पाकस्थितिः ३४१ होराफलम् ३१० | अध्यायोपसंहारः ,, द्रेष्काणफलम् ,, | प्रथमद्वितीयभावफलाध्याये ॥११॥ द्रेष्काणसंज्ञाचक्रम् ३११ | ग्रहस्थितिवशाद्भावानां शुभाशुभा- नवांशफलम् ३१२ | दिनिरूपणम् ३४२ द्वादशांशफलम् ,, | तनुभावाद्दिचारणीयविषयाः ,, त्रिंशांशफलम् ३१३ | तनुभावफलानि ३४५ वेलाफलम् ,, | द्वितीयभावे विचारणीयविषयाः ३५४ वेलाबोधकचक्रम् ,, | धनविचारः ,, कालहोराफलम् ३१४ | नेत्रविचारः ३५७ कालहोरानयनचक्रम् ३१५ | मुखविचारः ३५८ अष्टकवर्गाध्याये ॥ १० ॥ | विद्या-वाग्विचारः ३६० ग्रहाणां शुभबिन्दुसङ्ख्याः ३१५ | गणितज्ञयोगः ३६१ ग्रहाणामष्टकवर्गाः (टीकायाम्) ३१६ | तार्किकयोगः ,, अष्टकवर्गे बिन्दुपरत्वेन | वैयाकरणयोगः ३६२ भावफलानि ३२१ | वेदान्तज्ञयोगः ,, सूर्याष्टकवर्गफलम् ३२२ | षट्शास्त्रियोगः ,, चन्द्राष्टकवर्गफलम् ,, | कुटुम्बविचारः ,, भौमाष्टकवर्गफलम् ३२३ | पात्राशनयोर्विचारः ३६३ बुधाष्टकवर्गफलम् ३२४ | तृतीयचतुर्थभावफलाध्याये ॥१२॥ गुर्वष्टकवर्गफलम् ,, | तृतीयभावाद्दिचारणीयविषयाः ३६५ शुक्राष्टकवर्गफलम् ३२५ | भ्रातृविचारः ,, शन्यष्टकवर्गफलम् ,, | सोदरसङ्ख्याज्ञानम् ३६९ अष्टकवर्ग-प्रस्तारकम् ३२६ | भ्रातृभार्याफलविचारः ३७१ अष्टकवर्गे त्रिकोणशोधनम् ३२७ | भ्रात्ररिष्टविचारः ३७२ ,, एकाधिपत्यशोधनम् ३२८ | पराक्रमविचारः ३७३ गुणकपिण्ड-गुणकाङ्काः ३३१ | कण्ठविचारः ३७५
८ जातकपारिजातस्य- विषयाः पृष्ठाङ्काः विषयाः पृष्ठाङ्काः श्रुतिभूषणविचारः ३७६ पुत्रभावाभावौ ३९८ वस्त्रविचारः ,, पौत्रप्राप्तिरल्पपुत्र एकपुत्रश्च ,, धैर्यविचारः ,, पुत्रस्त्रीरहितयोगो दत्तात्मजयोगश्च ३९९ बलविचारः ३७७ सुताभावयोगो जारपुत्रयोगश्च ४०० भोजनविचारः ,, पुत्रप्रदा योगाः ४०१ चतुर्थभावफलानि ३७८ वंशहीनयोगाः ,, चतुर्थभावे विचारणीयविषयाः ,, भ्रष्टविधिजीवियोगः ,, विद्याविचारः ,, धनव्ययतायोगाः ,, मातृविचारः ३७९ दत्तादिसुतयोगः ४०२ पितुर्धिटत्वम् ३८० गुरुस्थित्या सन्तानविचारः ,, मातुर्व्यभिचारयोगाः ३८१ सन्तानक्षयकारणानि ४०३ पित्रोरनिष्टयोगः ,, दत्तकपुत्रयोगाः ४०४ सुखविचारः ३८३ विलम्बेन पुत्रप्राप्तियोगः ,, सुखादिविचारनिर्णयः ३८४ पुत्र-भ्रातृ-स्त्री-दास-दासी- सुगन्धविचारः ,, मित्राणां विचारः ४०६ बलविचारः ,, पुत्रोत्पत्तिकालः पुत्रसङ्ख्याज्ञानञ्च ४०७ पशुविचारः ,, स्थितिवशेन पुत्रस्येष्टानिष्टे ४०८ बन्धुविचारः ३८५ पुत्रस्य जननमरणलक्षणौ ,, मनोविचारः ,, पितृविचारः ,, वाहनविचारः ,, पित्रादीनां मरणम् ४१० राज्यविचारः ३८६ बुद्धिविचारः ४१३ राजयोगाः ( सिंहासन- हृदयरोगयोगः ४१४ प्रदयोगाः ) ३९० पुण्यविचारः ,, भाग्यविचारः ३९१ रोगविचारः ,, क्षेत्रविचारः ३९२ ग्रहकर्तृकरोगस्थानानि ४१७ निक्षेपधनप्राप्तियोगाः ,, शत्रोः पीडा, शत्रुनाशश्च ४१८ गृहविचारः ३९३ क्षान्त्युपकारीयोगः ,, पञ्चमषष्ठभावफलाध्याये ॥१३॥ सप्तमाष्टमनवमभावफलाध्याये ॥१४॥ केषांचिद्भावानां विचारक्रमः ३९४ सप्तमभावे विचारणीयविषयाः ४१९ पञ्चमभावफलानि ,, जारयोगः ,, देवताविचारः ३९५ कामुकयोगः ,, राज्यविचारः ,, जारयोगोऽपुत्रयोगो बहुस्त्रीयोगश्च ४२० जन्मविचारः ३९६ कलत्रहीनैकपुत्रयोगौ ४२१ चतुष्पदानां जन्म ,, वन्ध्यापतिः, स्त्रीप्रकृतिश्च ,, पुत्रविचारः ( दारहा- नवांशवशात्स्त्रीविचारः ,, पुत्रमरणयोगौ ) ३९७ सप्तमे ग्रहयोगात् स्त्रीविचारः ४२२ पुत्रपुत्रीयोगौ ३९८ बहुकलत्रेऽपि सन्ततिहीनयोगः ४२३
विषयसूची । ६
| विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| नष्टदारयोगः | ४२४ | भाग्यहीनयोगः | ४५० |
| कलत्रद्वययोगस्तल्लक्षणञ्च | ४२४ | भाग्यवान् योगः | ४५१ |
| कलत्रत्रययोगः | ,, | गुरुभक्तियोगः | ,, |
| बहुस्त्रीयोगः | ४२५ | धर्महीन-योगः | ४५२ |
| व्रतपरायणदारयोगः | ,, | सुभाग्य-योगः | ,, |
| पतिघ्नीस्त्रीयोगः | ,, | पुत्रभावाभावयोगौ | ,, |
| सप्तमेशवशात्स्त्रीवंशज्ञानम् | ,, | बालस्य पितृमरणं दिने रात्रौ वा | ४५३ |
| स्त्रीसङ्ख्याज्ञानम् | ४२६ | पुण्यविचारः | ,, |
| विवाहकालः | ,, | दशमैकादशद्वादशभावफला- | |
| विवाहकालः स्त्रीस्वभावश्च | ४२६ | ध्याये ॥ १५ ॥ | |
| वरवधूजातकसंयोगः | ४३० | दशमे भावे विचारणीयविषयाः | ४५४ |
| पुरुषे दारहा, स्त्रियां पतिघ्नयोगः | ,, | कर्मविचारः | ,, |
| स्त्रीणां पतिमृत्युयोगः | ,, | प्रव्रज्यायोगाः | ४५९ |
| स्त्रीवियोग-सुखयोगौ | ,, | प्रव्रज्यायोगानामपवादः | ४६६ |
| पुत्रमात्राभावयोगौ | ४३१ | जीविकायोगाः | ४६७ |
| स्त्रियाः स्तनविचारः | ,, | ग्रहकर्त्तृकजीविकावृत्तिः | ४६८ |
| गम्यस्त्रीविवरणम् | ,, | केन्द्रेषु शुभकर्तृकराजयोगः | ४७० |
| स्त्रीसङ्गमे स्थानविचारः | ४३२ | पुण्य-पापरतयोगौ | ,, |
| कलत्रशुभाशुभज्ञानम् | ,, | चन्द्राद्दशमे भौमादियुतसूर्यफलम् | ४७१ |
| भगचुम्बनयोगः | ४३३ | ,, भौमादिद्विग्रहफलानि | ४७२ |
| स्त्रियाभगविचारः | ,, | आज्ञाविचारः | ,, |
| स्त्रीमरणसमयः | ४३४ | कीर्ति-मान-कृषि-व्यापार- | |
| अष्टमभावफलानि | ४३५ | निद्राविचारः | ४७३ |
| अल्पायुर्योगद्वयम् | ,, | लाभे सूर्यादिस्थित्या लाभविचारः | ४७४ |
| दीर्घ-मध्याल्पायुषां भेदाः | ,, | शुभ पाप धनलाभविचाराः | ४७५ |
| मृत्युविचारः ( मरणदशा ) | ४३७ | व्यये विचारणीय-विषयाः, नाना- | |
| मारकग्रहदशायां मरणकालनिर्णयः | ४३९ | देशाटनयोगश्च | ४७६ |
| मात्रा पित्रा च सह मृत्युयोगः | ४४० | व्ययविचारः | ४७७ |
| देहे गन्धादिज्ञानम् | ,, | दानविचारः | ४७८ |
| चरादिलग्नवशान्मरणकालनिर्णयः | ४४१ | धननाश-धनरक्षा-शय्यासुखयोगाः | ४७९ |
| नवमभावफलानि | ,, | शयनविचारः | ,, |
| भाग्यविचारः | ,, | गतिविचारः ( मरणानन्तरम् ) | ४८० |
| नवमे गुरौ ग्रहदृष्टिफलानि | ४४३ | ग्रहस्थितिवशाद्भावशुभाशुभत्वम् | ,, |
| ,, द्विग्रहयोगफलानि | ४४४ | स्त्रीजातकाध्याये ॥ १६ ॥ | |
| ,, त्रिग्रहयोगफलानि | ४४६ | जातकविवरणम् | ४८१ |
| ,, चतुर्ग्रहयोगफलानि | ४५० | स्त्रीजन्मनि फलकथनविवरणम् | ४८२ |
| ,, त्र्यादिग्रहयोगफलम् | ,, | लग्नेन्दुवशात्स्त्रीफलम् | ४८३ |
| 2 |
१. अध्याय १-४: राशि, ग्रह-स्वरूप, कारकत्व एवं योगाध्याय (शुभ-अशुभ योग)
१० विषयसूची। विषयाः पृष्ठाङ्काः विषयाः पृष्ठाङ्काः कुलटायोगः ४८४ देहजीवपरिभाषा ५०७ साध्वीयोगः ,, कानिचिन्मरणस्थानानि ५०८ गुरुषिणी-ब्रह्मवादिनीयोगौ ,, ग्रहजनितदेहजीवफलम् ५०९ स्त्रीजातके त्रिंशांश फलानि ४८५ चक्रदशाफलम् ५१० लग्नत्रिंशांशफलचक्रम् (टीकायाम्) ४८६ चक्रांशशायां विशेषः ५१३ पुनर्भू-विधवा-भर्त्तृत्यक्तयोगाः ४८७ त्रिविधा कालचक्रगतः ५१५ स्वैरिणी-पुनर्भूलक्षणम् ,, कालचक्रदशासाधनज्ञानम् ५१७ मात्रा सार्धं पुंश्चली-व्याधियोनि- सव्यचक्रवाक्यानि ५१८ सुभगायोगाः ,, अपसव्यचक्रवाक्यानि ५१९ ग्रहपटुत्वेन सप्तमभावफलम् ४८८ अन्तर्दशासाधनम्- ५२० दुर्भगा-पतिवल्लभायोगौ ४८९ स्त्रियाः पश्चात्पूर्वं वा पत्युर्मृतिः ,, दशाफलाध्याये ॥ १८ ॥ भाग्य-दुर्भाग्ययोगौ ४९० दशामहत्त्वम् ५२३ पतिनिर्देशात्परगामिनीयोगः ४९१ विंशोत्तरीमहादशाविवरणम् ,, मात्रा साकं व्यभिचारिणीयोगः ,, दशानां शुभाशुभत्वम् ५२३ सुभगा-दुर्भागायोगौ ,, इष्टकालीनदशाकथननिर्णयः ५३० सप्तमे शुभाशुभग्रहफलम् ,, उत्पन्नादिसंज्ञादशा ,, जन्मलग्ने ग्रहदृष्टिफलम् ४९२ निर्याणदशा ५३१ स्त्रीजातके प्रव्रज्यायोगः ४९३ गुलिकदशा ,, स्त्रिया वैधव्ययोगो मरणयोगश्च ,, शूलदशा ५३२ दम्पत्योः समकालमरणम् ४९४ महादशा विशेषः ,, स्त्रिया मरणकालः ,, अन्तर्दशाविशेषफलम् ५३३ ,, सोदरप्राप्तियोगौ ४९५ आवेशदशाफलम् ,, ,, पतिलक्षणम् ,, अन्तर्दशाफलानि ५३६ कालचक्रदशाध्याये ॥ १७ ॥ सूर्यान्तरे ग्रहाणां फलानि ५३७ कालचक्रगतिविषये शङ्करं प्रति चन्द्रान्तर्दशाफलानि ५३८ देवीप्रश्नः ४९८ भौमान्तर्दशाफलानि ५४० देवीं प्रति शङ्करस्योत्तरम् ४९८ राह्वन्तर्दशाफलानि ५४२ कालचक्रदशाप्रस्तारः ४९९ गुर्वन्तर्दशाफलानि ५४४ सव्यचक्रम् ५०० शन्यन्तर्दशाफलानि ५४५ अपसव्यचक्रम् ५०२ बुधान्तर्दशाफलानि ५४७ कालचक्रदशोदाहरणम् केत्वन्तर्दशाफलानि ५४८ ( टीकायाम् ) ५०४ शुक्रान्तर्दशाफलानि ५५० देहजीवफलम् ५०५ उपसंहारः ५५३
॥ श्री मङ्गलमूर्तये नमः ॥ जातकपारिजातः सुधाशालिनी-विमला-टीकाभ्यां पल्लवितः अथ राशिशीलाध्यायः । श्रीकान्ताजशिवस्वरूपममरज्योतिर्गणस्वामिनं मायातीतमशेषजीवजगतमीशं दिनेशं रविम् ॥ नत्वा गर्गपराशरादिरचितं सङ्गृह्य होराफलं वक्ष्ये जातकपारिजातमखिलज्योतिर्विदां प्रीतये ॥ १ ॥
- सुधाशालिनी * श्रीकान्तं कमनीयकञ्जनयनं हृन्मन्दिरे संस्थितं, देवीं दैन्यविनाशिनीं विनमतामाराधयन् सर्वदाम् । ग्रन्थे जातकपारिजात इह ये मुह्यन्ति तेषां कृते काश्यां 'श्रीकपिलेश्वरो' वितनुते टीकां "सुधाशालिनीम्" ॥ अथायमाचार्यो भारद्वाजकुलोद्भवः श्रीवैद्यनाथ इति नाम्ना प्रसिद्धो ज्यौतिषविषये जातकपारिजात-नामकं ग्रन्थं चिकीर्षुः 'देवाधीनं जगत्सर्वमि'त्यतो जगति सर्वस्मिञ्छुभकार्ये देवार्चनं कार्यमिति सत्सम्प्रदायमनुपालयन् विधेयविषयस्य च कुशलेन परिसमाप्तिमिच्छन् स्वविषयाधिष्ठातृदेवस्य श्रीसूर्यस्य नमस्कारात्मकं मङ्गलं कर्त्तव्यवस्तुनिदर्शनं च करोति श्रीति— श्रीकान्ताजशिवस्वरूपं = श्रियो लक्ष्म्याः कान्तो विष्णुः, अजो ब्रह्मा, शिवश्चेति त्रिदेवस्वरूपं "त्रिमूर्तिस्तु दिवाकर" इत्युक्तेः । अमरज्योतिर्गणस्वामिनं = अमरा देवा ज्योतींषि ग्रहनक्षत्राद्यस्तेषां गणानामखिलानां स्वामिनं प्रकाशकत्वेनाधिपतिम् । अत्रेदमुक्तं भवति—सूर्यं एवाखिलानि ज्योतींषि प्रकाशयति । तथोक्तं कमलाकरेण— “तेजसां गोलकः सूर्यो ग्रहर्क्षाण्यम्बुगोलकाः । प्रभावन्तो हि दृश्यन्ते सूर्यरश्मिप्रदीपिताः" ॥ मायातीतं = सत्स्वरूपमित्यर्थः । अशेषजीवजगतमीशं = सकलचराचरजीवानां नायक- मात्मत्वेनाधिपतिं "सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्चे'ति श्रुतेः । दिनेशं = दिनाधिपतिं, यतो रवेरुदयादेव दिनप्रवृत्तिरिति । "दिनं दिनेशस्य यतोऽत्रदर्शने" इति भास्करोक्तेः । रवि = श्रीसूर्यं, नत्वा = नमस्कृत्य, गर्गपराशरादिरचितं = गर्ग-पराशरप्रमुखर्षिप्रणीतं, होराफलं = जातकशास्त्रं, सङ्गृह्य = सङ्कलय्य, अखिलज्योतिर्विदां = सकलज्योतिश्शास्त्रवेत्तॄणां, प्रीतये = प्रमोदाय "मुत्प्रीतिः प्रमदो हर्षः प्रमोदामोदसम्मदः" इत्यमरः । जातकपारिजातं = जातकेषु ( जातकशास्त्रेषु ) पारिजातं ( सुरतरुं ) "पञ्चैते देवतरवो मन्दारः पारिजातकः" इत्यमरः । अमुं ग्रन्थं वक्ष्येऽहमिति शेषः । प्रकृतग्रन्थादौ श्रीपदोपादानं सर्वेषां श्रेयःसूचकमित्यलं पल्लवितेन ॥ १ ॥
२ सटीकजातकपारिजाते-
- विमला * लक्ष्मीकान्तमजं गिरीन्द्रतनयानाथं दिनेशं गुहं, वाग्देवीं गिरिजासुतं पवनजं श्रीरामचन्द्रप्रियम् । तातं छत्रधरं प्रणम्य सततं चानन्दिकां मातरं, वक्ष्ये जातकपारिजातविमलां टीकां सतामुन्मुदे ॥ विष्णु ब्रह्मा और शङ्करजीके स्वरूप देवता और ज्योतिर्गणोंके अधिपति मायासे भिन्न तथा सम्पूर्ण जगतके जीवोंके प्रभु श्रीसूर्यनारायणको नमस्कार कर गर्गपराशर आदिसे रचित होराफलका संग्रह करके सब ज्योतिषियोंकी प्रसन्नताके लिये मैं जातक- पारिजात को बनाता हूं ॥ १ ॥ इदानीमात्मपरिचयपूर्वककर्त्तव्यतामाह— भारद्वाजकुलोद्भवस्य विदुषः श्रीव्यङ्कटाद्रेरिह । ज्योतिःशास्त्रविशारदस्य तनयः श्रीवैद्यनाथः सुधीः ॥ होरासारसुधारसज्ञविबुधश्रेणीमनःप्रीतये । राशिस्थाननिरूपणादि सकलं वक्ष्ये यथाऽनुक्रमम् ॥ २ ॥ भारद्वाजकुलोद्भवस्य = भारद्वाजगोत्रजन्मनः, ज्योतिषशास्त्रविशारदस्य = ज्यौतिषशास्त्रे दक्षस्य, विदुषः = पण्डितस्य, श्रीव्यङ्कटाद्रेः = श्रीव्यङ्कटाद्रिनाम्नस्तनयस्तनूजन्मा श्रीवैद्यनाथ इति नामा, सुधीः = विद्वान् कर्त्ताऽहं, होरासारसुधारसज्ञविबुधश्रेणीमनःप्रीतये=होराशास्त्राणां सारमेव सुधारसममृतं जानन्ति ये विबुधा विद्वांसस्तेषां श्रेणीनामखिलानां मनसो मुदे, राशिस्थाननिरूपणादि = राशीनां मेषप्रभृतिद्वादशानां स्थाननिरूपणमादिर्यस्मिंस्तत्सकलं = यावदशेषं विषयं, यथाऽनुक्रममनुक्रममनतिक्रम्य ( क्रमपूर्वकमित्यर्थः ) वक्ष्ये इति ॥ २ ॥ श्रीभारद्वाजऋषिके कुलमें उत्पन्न ज्योतिःशास्त्रके विशारद श्रीवेङ्कटाद्रि पण्डितका पुत्र मैं वैद्यनाथ होराशास्त्रके रसको जाननेवाले विद्वानोंके मनके प्रसन्नतार्थ राशिस्थान निरूपण आदि सब विषयोंको कहता हूं ॥ २ ॥ पुनरपि स्वाभीष्टदेवताप्रणिपातपूर्वकं विधेयविषयमाह— प्रणम्य वन्दारुजनाभिवन्द्यपदारविन्दं रघुनायकस्य । सङ्गृह्य सारावलिमुख्यतन्त्रं करोम्यहं जातकपारिजातम् ॥ ३ ॥ अहं = श्रीवैद्यनाथः, रघुनायकस्य = रघुकुलाधिपतेर्भगवतो रामचन्द्रस्य, वन्दारुज- नाभिवन्द्यपदारविन्दं = वन्दारुजनैरभिवादकैः "वन्दारुरभिवादके" इत्यमरः । अभिवन्द्यं सर्वथा वन्दनीयं पदारविन्दं चरणकमलं प्रणम्य, सारावलिमुख्यतन्त्रं सङ्गृह्य = कल्या- णवर्म्मकृतां सारावलीमेव मुख्यतन्त्रमागमत्वेन स्वीकृत्य जातकपारिजातमिमं ग्रन्थं करोमि विरचयामीति । ननु "गर्गपराशरादिरचितं सङ्गृह्य होराफल"मित्युक्तमिदानीं 'सङ्गृह्य सारावलिमुख्यतन्त्र'मित्युच्यते किमिति ? सत्यं, सारावल्यामपि प्राक्तनर्षीणामभिमतविषया एव दरीदृश्यन्तेऽतोऽदोषः ॥ ३ ॥ देवताओंसे वन्दित रघुनाथजी के चरण कमलोंको प्रणाम करके सारावली मुख्यतन्त्र को संग्रह करके मैं जातकपारिजातको बनाता हूं ॥ ३ ॥ अथ मेषादीनां संज्ञाविशेषाः । मेषाजविश्वक्रियतुम्बुराद्या वृषोक्षगोतावुरगोकुलानि । द्वन्द्वं नृयुग्मं जुतुमं यमं च युगं तृतीयं मिथुनं वदन्ति ॥ ४ ॥ —
राशिशीलाध्यायः ॥१॥ कुलीरकर्कटककर्कटाख्याः कण्ठीरवः सिंहमृगेन्द्रलेयाः । पाथोनकन्यारमणीतरुण्यस्तौली वणिक्जूकतुलाधटाश्च ॥ ५ ॥ अल्यष्टमं वृश्चिककौर्पिकीटाः धन्वी धनुश्चापशरासनानि । मृगो मृगास्यो मकरश्च नक्रः कुम्भो घटस्तोयधराभिधानः ॥ ६ ॥ मीनान्त्यमत्स्यपृथुरोमझषा वदन्ति दस्रादिकर्क्षनवपाद्युताः क्रियाद्याः । चक्रस्थिता दिविचरा दिननाथसंख्याः क्षेत्रर्क्षराशिवभवनानि भसंज्ञितानि ॥ ७ ॥ इदानीं राशीनां नामान्तराण्युच्यन्ते— मेषः, अजः, विश्वः, क्रियः, तुम्बुरः, आद्यश्चैते मेषराशेः पर्यायाः सन्ति । वृषः, उक्षः, गौः, तावुरुः, गोकुलमित्येता वृषराशेः संज्ञाः । मिथुनं = मिथुनराशि द्वन्द्वं, नृयुग्मं, जुतुमं, यमं, युगं, तृतीयं च विज्ञा वदन्ति । कुलीरः, कर्काटकः, कर्कट इत्येताः कर्कराशेराख्याः = संज्ञाः । कण्ठीरवः, सिंहः, मृगेन्द्रः, लेय इत्येते सिंहराशेः पर्यायाः । पाथोनः, कन्या, रमणी, तरुणीत्येते कन्याराशेः पर्यायाः । तौली, वणिक्, जूकः, तुला, घटश्चैते तुलाराशेः पर्यायाः । अलिः, अष्टमं, वृश्चिकः, कौर्पिः, कीटश्चैते वृश्चिकराशेः पर्यायाः । धन्वी, धनुः, चापं, शरासनमित्येते धनूराशेः पर्यायाः । मृगः, मृगास्यः, मकरः, नक्रश्चैते मकरराशेः पर्यायाः । कुम्भः, घटः, तोयधरश्चैते कुम्भराशेः पर्यायाः । मीनः, अन्त्यः, मत्स्यः, पृथुरोमः, झषश्चैता मीनराशेः संज्ञा विबुधा वदन्ति । अथ नक्षत्रसङ्गता राशयो बुधैः कथं ज्ञायन्ते ? इत्यत आह—दस्रादिकर्क्षनवपाद्युताः = आश्विन्यादिनक्षत्राणां नवभिर्नवभिः पादैर्युताः सङ्गताः ( अत्रेदमवधेयं-प्रतिनक्षत्रं चत्वारः पादास्तथा = नवभिः पादैरेको राशिरिति । दस्रादिसप्तविंशतिनक्षत्राणामष्टोत्तरशतसंख्याकाः पादास्तैर्द्वादशराशयोऽतो नवभिः पादैरेको राशिरिति युक्तम् ) क्रियाद्याः = मेषाद्याः, दिननाथ- सङ्ख्या दिननाथः सूर्यस्तत्सङ्ख्या द्वादशमिता इत्यर्थः “द्वादशात्मा दिवाकर” इत्युक्तेः । दिविचराः = आकाशचारिणो राशयश्चक्रस्थिताश्चक्राकारे ( वृत्ताकारे ) वर्त्तमाना भसंज्ञितानि = भमिति संज्ञा येषां तानि ( 'भम्' इति राशेः पर्यायः ) क्षेत्रर्क्षराशिवभवनानि = क्षेत्रम्, ऋक्षं राशिः, भवनमित्येतानि नामान्तराणि भजन्ते । अत्र राशिरैव क्षेत्रमृक्षं भं भवनमित्यादि- नामान्तरैर्गृह्यते । तथोक्तं वराहेण बृहज्जातके— “राशिक्षेत्रगृहर्क्षभानि भवनञ्चैकार्थसम्पत्ययाः इति” ॥ ७ ॥ मेष, अज, विश्व, क्रिय, तुंबुर, और आद्य मेषके नाम हैं । वृष, उक्ष, गो, तावुरु और गोकुल, वृषके नाम हैं । द्वन्द्व, नृयुग्म, यम, युग और तृतीय, मिथुनको कहते हैं ॥ ४ ॥ कुलीर, कर्काटक और कर्कट, कर्कको कहते हैं । कंठीरव, सिंह, मृगेन्द्र और लेय सिंह को कहते हैं । पाथोन, कन्या, रमणी और तरुणी, कन्याको कहते हैं । तौली, वणिक्, जूक, तुला और घट, तुलाको कहते हैं ॥ ५ ॥ अलि, अष्टम, वृश्चिक, कौर्पि और कीट, वृश्चिकके नाम हैं । धन्वी, धनुः, चाप और शरासन, धनुके नाम हैं । मृग, मृगास्य, मकर और नक्र, मकरके नाम हैं । कुम्भ, घट और तोयधर, कुम्भको कहते हैं ॥ ६ ॥
४ सटीकजातकपारिजाते- स्पष्टार्थं राशिचक्रम् । मीन, अन्त्य, मत्स्य, पृथुरोम और झष, मीनको कहते हैं । चार चार चरणोंके एक एक नक्षत्र होते हैं । अश्विनी आदि नक्षत्रोंके नव २ चरणों से सहित मेषादि बारह राशि चक्र (वृत्त) में रहते हुए आकाशमें घूमा करते हैं और वे ही १२ राशि क्षेत्र, ऋक्ष, राशि, भवन और भ इत्यादि नामसे कहे जाते हैं ॥ ७ ॥ अथ मेषादयो राशयः कालनरस्यावयवा इत्याह— कालात्मकस्य च शिरोमुखदेशवक्षोहृत्कुक्षिभागकटिवस्तिरहस्यदेशाः । ऊरू च जानुयुगलं परतस्तु जङ्घे पादद्वयं क्रियमुखावयवाः क्रमेण ॥ ८ ॥ कालात्मकस्य=काल एवात्मा यस्यासौ कालात्मा स एव कालात्मकस्तस्य (कालपुरुष स्येत्यर्थः) क्रियमुखावयवाः = क्रियमुखा मेषादयोऽवयवा अङ्गानि क्रमेण सन्ति । के तेऽवयवा इति ? शिरोमुखदेशवक्षोहृत्कुक्षिभागकटिवस्तिरहस्यदेशाः, ऊरू च जानु- युगलं परतस्तु जङ्घे पादद्वयमिति । मेषः शिरः, वृषो मुखदेशः, मिथुनं (१)वक्षः, कर्को हृत् = हृदयं, सिंहः कुक्षिभागः = उदरं, कन्या कटिः, तुला वस्तिर्नाभिलिङ्गयोर्मध्यदेशः, वृश्चिको रहस्यदेशः = लिङ्गं, धनुरूरू द्वौ, मकरो जानुयुगलं, कुम्भो जङ्घे द्वे, मीनः पादद्वयं = चरणयुगलमिति । एतत्प्रयोजनञ्च-जन्मादौ शुभग्रहाक्रान्तराश्यङ्गे पुष्टिः, पापाक्रान्तरा- श्यङ्गदेशे वैकल्यञ्च वाच्यमिति । तथोक्तं स्वल्पजातके— “कालनरस्यावयवान् पुरुषाणां चिन्तयेत्प्रसवकाले । सदसद्ग्रहसंयोगात् पुष्टाः सोपद्रवास्ते च” इति ॥ ८ ॥ ( १ ) स्वल्पजातके मिथुनं बाहू , इत्युक्तं “शीर्षमुखबाहूहृदयोदरानि......”
राशीशीलाध्यायः ॥ १ ॥ इस राशि चक्रका न्यास काल पुरुषके शरीरमें इस प्रकार से विद्यमान है मेष शिर, वृष मुख, मिथुन स्तनमध्य, कर्क हृदय, सिंह उदर (पेट), कन्या कमर, तुला नाभिके नीचे (पेड़ू), वृश्चिक लिंग, धनु ऊरु, मकर दोनों घुटने, कुंभ दोनों जांघें और मीन दोनों पैर हैं। राशि चक्रके अङ्ग विभागका तात्पर्य यह है कि जन्म अथवा प्रश्न वा गोचरमें जो राशि पापाक्रान्त हो उस राशिवाले अङ्गमें तिल वा चोट या मासा आदिका चिह्न होगा। जो राशि शुभ ग्रहसे युक्त हो वह अङ्ग पुष्ट होगा यह विशेष रूपसे स्मरणीय है ॥ ८ ॥ अथ मीनादीनां स्वरूपवर्णनम्। व्यस्तोभयपुच्छमस्तकयुतौ मीनौ सकुम्भो नर- स्तौली चापधरस्तुरङ्गजघनो नक्रो मृगास्यो भवेत् ॥ वीणादण्डं सगदं नृयुग्ममबला नौस्था ससस्यानला शेषाः स्वस्वगुणाभिधानसदृशाः सर्वे स्वदेशाश्रयाः ॥ ६ ॥ मीनौ = द्वौ मत्स्यौ, व्यस्तोभयपुच्छमस्तकयुतौ = अन्योन्यं मुखपुच्छसम्मिलितौ यथा भवतस्तद्रूपं मीनराशेर्ज्ञेयम् । सकुम्भो नरः = स्कन्धावहतरिक्तकलशो नरो
उक्ष्णस्तु"? Wait, between स्यात् and उक्षणस्तु: There is a space. Then 'उ', then 'क्ष', then 'ण', then 'स्तु'. Wait, look at the meter: मे-ष-स्य धा-तु-क-र-र-त्न-ध-रा-त-लं स्या- दु-क्ष्ण-स्तु सा-नु-कृ-षि-गो-कु-ल-का-न-ना-नि Wait! If it is स्यादुक्ष्णस्तु: स्या (G) दु (L) क्ष्ण (G) स्तु (G) सा (G) नु (L) कृ (L) षि (L) गो (G) कु (L) ल (L) का (G) न (L) ना (G) नि (L) Wait, Vasantatilaka is: त-भ-ज-ज-ग-ग: त: G G L भ: G L L ज: L G L ज: L G L ग: G ग: G Total: 14 syllables. Let's see: दु (L) क्ष्ण (G) स्तु (G) -> no, if it's "उक्षणस्तु": उ (L) क्ष (G) ण (L) स्तु (G) सा (G) नु (L) कृ (L) षि (L) गो (G) ... Wait, let's scan: उ
न्पण्यं तस्य मही तुलायास्तुलाराशेः स्थानम् । अश्मविषकीटविलप्रदेशाः = अश्मा पाषाणो विषं गरलं कीटाः कृमयस्तेषां बिलप्रदेशा गर्त्तानि, कीटस्य = वृश्चिकराशेः स्थानानि । वाजि- रथवारणवासभूमिः = वाजिनोऽश्वाः, रथाः स्यन्दनानि, वारणा हस्तिनस्तेषां वासभूमिश्चापस्य = धनूराशेः स्थानम् । सरिदम्बुवनप्रदेशाः = सरितां नदीनामम्बूनि जलानि, वनप्रदेशा आर- ण्यानि तानि, एणाननस्य = मकरस्य निवासस्थानानि । अत्र मकरस्य पूर्वदले ( १५ अंशाः ) वनेषु, तथाऽपरं दलं जलेषु तिष्ठतीदमवधेयम् । तोयघटभाण्डगृहस्थलानि = तोयं जलं, घटः कलशः, भाण्डानि पात्राणि, गृहाण्यायतनानि तेषां स्थलानि भूमयः कुम्भस्य निवासस्था- नानि । मीनाधिवाससरिदम्बुधितोयराशिः = मीनानां मत्स्यानामधिवासो हृदादिः, सरितो नद्यः, [
८ सटीकजातकपारिजाते- प्राक् पूर्वा दिगादियेषां तानि प्रागादीनि, प्रागादीनि च क्रियगोनृयुक्तकभानि प्रागादिक्रि- यगोनृयुक्तकभान्येतानि कोणान्वितान्याहुः । अत्रेदमुक्तं भवति स्वस्वकोणेन=नवमेन पञ्च- मेन च सहितानि, क्रिय-( मेषः ) गो-( वृषः ) नृयुक्-( मिथुनं ) कटक-( कर्कः ) भान्येतानि पूर्वादिषु ज्ञेयानीत्याहुः । यथा पूर्वस्यां दिशि मेष-सिंह-धनूंषि । दक्षिणस्यां वृष-कन्या-मकराः । पश्चिमायां मिथुन-तुला-कुम्भाः । उदीच्यां कर्क-वृश्चिक-मीना इति । प्रयोजनं च हतनष्टादौ द्रव्यस्य चौरादेश्च दिग्विज्ञानम् । अपि च 'यातव्यदिङ्मुखगतस्य सुखेन सिद्धिर्व्यर्थश्रमो भवति दिक्प्रतिलोमलग्ने" इति । अथ राशीनां शुभाशुभत्वमाह- क्रूरशुभाविति । मेषः क्रूरो वृषः शुभः, मिथुनं क्रूरः कर्कः शुभः । एवं मेषाद्विषमाः क्रूरा- स्तथा वृषादिसमाः शुभा ज्ञेयाः । प्रयोजनं च-"उग्रे क्रूराः पुरुषाः सौम्याः सौम्येषु भव- नेषु" इति । अथ च तानि = मेषादीनि भानि क्रमात् = क्रमशः चरस्थिरतरद्वन्द्वानि ज्ञेयानि । यथा मेषः चरः, वृषः स्थिरः, मिथुनं द्वन्द्वमित्येवं मेष-कर्क-तुला-मकराश्चराः । वृष-सिंह- वृश्चिक-कुम्भाः स्थिराः । मिथुन-कन्या-धनुर्मीना द्विस्वभावा इति । प्रयोजनं, हतनष्टादौ द्रव्यादेश्चौरादेश्च ज्ञानमपि च जन्मनि चरे चरधियः, स्थिरे स्थिरधियः, द्वन्द्वे मिश्रस्वभावाः पुरुषा भवन्तीति ॥ अथ राशीनामुदयव्यवस्थां बलसमयं च निर्दिशति-वीर्योपेता इति । वृषनृयुक्कर्क- चापाजनक्राः=वृष-मिथुन-कर्क-धनुर्मेष-मकराः निशि=रात्रौ वीर्योपेताः=बलिनो भवन्ति । युग्मं अपनं=मिथुनराशिं, हित्वा=त्यक्त्वा एत एव पृष्ठपूर्वोदयाश्च=पृष्ठोदया भवन्तीति । मिथुनं शीर्षेणैवोदेति । शेषाः=पूर्वोक्तेभ्योऽवशिष्टाः=सिंह-कन्या-तुला-वृश्चिक-कुम्भाः, शीर्षोदयदि- नबलाः = शीर्षोदया दिवा बलिनश्च भवन्ति । अत्रैतत् दिनरात्रिवलावलोकनं सञ्ज्ञामात्र- मेव । यतोऽग्रे वक्ष्यति विशेषतो बलाबलत्वमेतस्मिन्नेवाध्याये षोडशादिश्लोकत्रये । श्रेष्ठ- ताराशयस्ते । स्वस्वोच्चसमये ते राशयः श्रेष्ठाः = श्रेष्ठाः सन्तीत्यर्थः । मीनाकारद्वयं = मत्स्यरूपद्वयं, उभयतोऽन्योन्यं, काललग्नं = काले = एककालावच्छेदेन लग्नं मुखपुच्छसंलग्न- मित्यर्थः, समेति उदयं गच्छतीति । तथोक्तं बृहज्जातकेऽपि- "गोजाश्विकर्किमिथुनाः समृगा निशाख्याः पृष्ठोदया विमिथुनाः कथितास्त एव । शीर्षोदया दिनबलाश्च भवन्ति शेषा लग्नं समेत्युभयतः पृथुरोमयुग्मम्" इति ॥ १३-१४ ॥ मेष, वृष, और कुम्भ, ह्रस्व हैं । मकर, मिथुन, धनु, मीन, और कर्क, सम हैं । वृश्चिक, कन्या, सिंह, और तुला दीर्घ हैं । मेषादि द्वादश राशि क्रमसे पुरुष और स्त्री संज्ञक हैं । मे. मि. सिं. तु. ध. कु. ये नर-राशि हैं । एवं वृ. क. कं. वृ. म. मी. ये स्त्री-राशि हैं । मेष, वृष, मिथुन, कर्क, अपने २ पञ्चम और नवमसे सहित पूर्वादि दिशाके राशि हैं । जैसे मे. सिंह ध. पूर्व की । वृष, कन्या, मकर, दक्षिणकी । मिथुन, तुला, कुम्भ पश्चिमकी । और कर्क, वृश्चिक, मीन उत्तर दिशाकी राशि हैं । मे. मि. सिं. तु. ध. कुं ये क्रूर हैं । एवं वृ. क. कं. वृ. म. मी. ये शुभ हैं । मेषादि राशियोंकी क्रूर और सौम्य संज्ञा है । मेषादि द्वादश राशि क्रम से चर स्थिर द्विस्वभाव संज्ञक हैं । जैसे - १।४।७।१० ये चर हैं । २।५।८।११ ये स्थिर हैं और ३।६।९। १२ ये द्विस्वभाव हैं ॥ १३ ॥ वृष, मिथुन, कर्क, धनु, मेष और मकर ये राशियां रात्रिमें बली हैं । मिथुनको छोड़ कर ये ही पृष्ठोदय हैं । शेष ( सिंह-कन्या. तुला. वृश्चिक. कुम्भ ) राशि दिनमें बली हैं । ये ही और मिथुन शीर्षोदय हैं । मीन दो मछलियों के मुख पूंछ मिल कर उभयोदय है । जो पीठ से उदय होते हैं वे पृष्ठोदय जो शिर से उदय होते हैं वे शीर्षोदय हैं ॥ १४ ॥
राशिशीलाध्यायः ॥२॥ ९ मेषादिराशीनां ह्रस्वादिस्त्रीपुरुषसंज्ञा-दिशा-क्रूरसौम्य- संज्ञा-चरादिसंज्ञाबोधकचक्रम्—
| राशि | मे. | वृ. | मि. | क. | सिं. | क. | तु. | वृ. | ध. | म. | कुं. | मी. |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ह्रस्व सम दीर्घ | ह्र. | ह्र. | सम | सम | दी. | दी. | दी. | दी. | सम | सम | ह्र. | सम |
| स्त्रीपुरुष | पु. | स्त्री | पु. | स्त्री | पु. | स्त्री | पु. | स्त्री | पु. | स्त्री | पु. | स्त्री |
| दिशा | पू. | द. | प. | उ. | पू. | द. | प. | उ. | पू. | द. | प. | उ. |
| क्रूर सौम्य | क्रूर | सौ. | क्रूर | सौ. | क्रूर | सौ. | क्रूर | सौ. | क्रूर | सौ. | क्रूर | सौ. |
| चरादि संज्ञा | चर | स्थिर | द्विस्व. | च. | स्थि. | द्वि. | च. | स्थि. | द्वि. | च. | स्थि | द्वि. |
| राशि | मे. | वृ. | मि. | क. | सिं. | क. | तु. | वृ. | ध. | म. | कुं. | मी. |
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केन्द्रं गतोऽह्नि द्विपदो बलाढ्यः चतुष्पदाः केन्द्रगता रजन्याम् । कीटास्तु सर्वे यदि कण्टकस्थाः सन्धिद्वये वीर्ययुता भवन्ति ॥ १८ ॥ चापापरार्द्धहरिगोमकरादिमेषाः = धनुरपरार्द्ध-सिंह-वृष-मकरपूर्वार्द्ध-मेषाश्चतुष्पदाख्या- श्चतुष्पदसञ्ज्ञकास्तथा मानस्थिताः=माने दशमे स्थितास्तदा च बलयुताः=बलिनो भवन्ति । कन्यान्नृयुग्मघटतौलिशरासनाग्राः=कन्या-मिथुन-कुम्भ-तुला-धनुराद्यभागा नरा नरराशयो द्विपदा द्विपदसञ्ज्ञकास्तथा अमी यदि लग्नान्विताः स्युस्तदा बलाढ्या बलिनो भवन्ति । मृगापरार्द्धान्त्यकुलीरसञ्ज्ञाः=मकरोत्तरार्द्ध-मीन-कर्काः, जलाभिधानाः=जलचरसञ्ज्ञकास्तथा चतुर्थे=चतुर्थभावे बलिनो भवन्ति । वृश्चिकनामधेयो वृश्चिकराशिश्चलाश्रयो जलाश्नयसञ्ज्ञस्तथा स सप्तमस्थानगतो बली स्यात्, सप्तमे भावे वृश्चिको बलवानित्यर्थः । तथाऽऽह वराहः— "कण्टककेन्द्रचतुष्टयसञ्ज्ञाः सप्तमलग्नचतुर्थखभानाम् । तेषु यथाभिहितेषु बलाढ्याः कीटनराम्बुचराः पशवश्च" इति । अथ कालपरत्वेन राशिबलं निरूप्यते—केन्द्रमिति । द्विपदो नरराशिः केन्द्रं=लग्नच- तुर्थसप्तमदशमभावानामन्यतमं गतोऽवस्थितोऽह्नि=दिने बलाढ्यो भवति । केन्द्रवर्ती नररा- शिर्दिने बलीत्यर्थः । चतुष्पदाः = चतुष्पदसञ्ज्ञकराशयः केन्द्रगता रजन्यां = रात्रौ बलि- न इति । कीटास्तु सर्वे = सकलाः कीटा जलचराः ( अत्र कीटशब्देन न केवलं वृश्चिकस्य ग्रहणं किन्तु सर्वे जलचरा गृह्यन्ते ) यदि कण्टकस्थाः केन्द्रगताः स्युस्तदा सन्धिद्वये दिन- रात्र्योः सन्धियुगले ( सन्ध्याद्वितये ) वीर्ययुता बलिनो भवन्ति । तथोक्तं च स्वल्पजा- तके—"सन्ध्याधुरात्रिवलिनः कीटा नृचतुष्पदाश्चैवम्” इति । एतद्राशिबलाबलत्वं जन्मनि प्रश्ने च सम्यग्विवेचनीयमिति ॥ १६-१८ ॥ धनुका परार्ध, सिंह, वृष, मकरका पूर्वार्द्ध और मेष ये चतुष्पद हैं और ये दशम भावमें बली होते हैं। कन्या, मिथुन, कुम्भ, तुला, धनुका पूर्वार्द्ध ये नर राशि हैं और ये लग्नमें बली होते हैं ॥ १६ ॥ मकर का परार्ध, मीन और कर्क जलचर हैं और चौथेमें बली होते हैं। वृश्चिक जलाशय है, वह सप्तम स्थानमें प्राप्त होनेपर बली होता है ॥ १७ ॥ द्विपद ( नर ) केन्द्रमें प्राप्त होकर दिनमें बली होते हैं । चतुष्पद, केन्द्रमें जानेपर रात्रिमें बली होते हैं । सभी कीट ( जलचर ) केन्द्रमें प्राप्त होकर दोनों सन्ध्या-( सुबह और शाम ) में बली होते हैं ॥ १८ ॥ अथ राशीनां धातु-मूल जीवसञ्ज्ञाः । धातुमूलं जीवमित्याहुराया मेषादीनामोजयुग्मे तथैव ॥ स्वर्णाद्धात्वादिमृत्तिकान्तं तृणान्तं वृक्षात्तन्मूलं जीवकूटः स जीवः ॥ १६ ॥ अथ राशीनां धात्वादिविशेषसञ्ज्ञां कथयति—धातुरिति । मेषादीनां द्वादश- राशीनां क्रमात् धातुः, मूलं, जीव इति सञ्ज्ञामार्या विद्वांस आहुः । यथा मेषो धातुसञ्ज्ञो वृषो मूलसञ्ज्ञो मिथुनं जीवसञ्ज्ञम् , एवं मेष-कर्क-तुला-मकरा धातुसंज्ञाः । वृष-सिंह- वृश्चिक-कुम्भा मूलसञ्ज्ञाः । मिथुन-कन्या-धनुर्मीना जीवसञ्ज्ञा भवन्ति । ओजयुग्मे तथैव । तथैव = तेनैव विधिना मेषादीनामोजयुग्मे सञ्ज्ञे भवतः । मेष ओजो वृषः समः । एवं मेष-मिथुन-सिंह-तुला-धनुः-कुम्भा ओजराशयः ( विषमाः ) । वृष- कर्क-कन्या-वृश्चिक-मकर-मीनाः समराशयः । अथ यदुक्तं धातुर्मूलं जीव इति तत्र को धातुः, किं मूलं, कथ जीव इति सन्देहे आह—स्वर्णाद्धातुरित्यादि । स्वर्णान्मृत्तिकान्तं = मृत्तिकापर्यन्तो धातुः । वृक्षात्तृणान्तं मूलं ज्ञेयम् । जीवकूटो जीवानां प्राणिनां
राशिशीलाध्यायः ॥ १ ॥ ११ कूटा राशिः ( प्राणिमात्रम् ) "स्यान्निकायः पुञ्जराशी तूत्करः कूटमस्त्रियाम्" इत्यमरः, स जीवो ज्ञेय इति । प्रयोजनं च-सूतिकागारे प्रश्ने च द्रव्यादिज्ञानम् ॥ १९ ॥ विद्वान् लोग मेषादि राशियों की धातु, मूल और जीव संज्ञा कहते हैं, (जैसे १।४।७। १० धातु २।५।८।११ मूल और ३।६।९।१२ जीव हैं) एवं विषम और सम संज्ञा कहे हैं । सोना से मिट्टी तक धातु । वृक्ष से तृण तक मूल । प्राणीमात्र जीव हैं ॥ १९ ॥ अथ मेषादीनां विप्रत्वादिनिरूपणम् । मीनालिवृषभा विप्राश्चापाजहरयो नृपाः । कुम्भयुग्मतुला वैश्याः शूद्राः स्त्रीमृगकर्कटाः ॥ २० ॥ मीनालिवृषभाः=मीनवृश्चिकवृषराशयः, विप्राः = ब्राह्मणवर्णाः । चापाजहरयः = धनु- मेषसिंहाः, नृपाः = क्षत्रियाः । कुम्भयुग्मतुला वैश्याः स्त्रीमृगकर्कटाः=कन्यामकरकर्काः शूद्राः=शूद्रवर्णा भवन्ति । प्रयोजनं च-चौरादेवर्णज्ञानम्, विवाहादौ च वधूवरयोर्वर्णज्ञानम् । Notes-अत्र प्रकृतग्रन्थे वर्णपाठे भेदः । द्रष्टव्यं रामाचार्योक्तम्— द्विजाः झषालिकर्कटास्ततो नृपा विशोऽङ्घ्रिजाः । वरस्य वर्णतोऽधिका वधूर्न शस्यते बुधैः । इति ॥ २० ॥
| ब्रा. | क्ष. | वै. | शू. | वर्णाः |
|---|---|---|---|---|
| १२।४।८ | १।५।९ | २।६।१० | ३।७।११ | राशयः |
| १२।८।२ | १।५।९ | ११।३।७ | ६।१०।४ | मतान्तरे |
| मीन, वृश्चिक और वृष राशि ब्राह्मण वर्ण हैं । धनु, मेष और सिंह क्षत्रिय वर्ण हैं। | ||||
| कुम्भ, मिथुन और तुला वैश्य वर्ण हैं । कन्या, मकर और कर्क शूद्र वर्ण हैं ॥ २० ॥ | ||||
| अथ मेषादीनां कालविशेषे अन्धत्वादिनिरूपणम् । | ||||
| सदा निशान्धाः क्रियगोमृगेशा मध्यन्दिने कर्कटयुग्मकन्याः । | ||||
| पूर्वाह्नकाले बधिरौ तुलाली धन्वी मृगाख्यश्च तथाऽपराह्ने ॥ २१ ॥ | ||||
| मृगाननश्चापधरश्च पङ्गू सन्धिद्वये नाशकरौ भवेताम् । | ||||
| स्यादृक्षसन्धिः कटकालिमीनभान्तं प्रगण्डान्तमिति प्रसिद्धम् ॥ २२ ॥ | ||||
| क्रियगोमृगेशाः ( मेष-वृष-सिंहाः ) सदा निशान्धाः = सदैव रात्र्यन्धा भवन्ति । | ||||
| न कस्यामपि रात्रौ तेषामन्धत्वन्निरस्यतीति सदापदोपादानम् । अत्र 'महानिशान्धा' | ||||
| इत्यपि पाठान्तरम् । तदा महानिशायामर्द्धरात्रे ( निशीथे ) अन्धाः स्युरिति । | ||||
| कर्कटयुग्मकन्याः, मध्यन्दिने = दिनस्य मध्यभागेऽन्धत्वमाप्नुवन्ति । तुलाली=तुलावृश्चिकौ | ||||
| पूर्वाह्नकाले = दिनस्य प्रथमे त्रिभागे बधिरौ भवतः । धन्वी = धनुः, मृगाख्यश्च = मकरश्चेति | ||||
| द्वौ, अपराह्ने = दिनस्य तृतीये त्रिभागे तथा=बधिरौ भवतः । मृगानन चापधरश्च=मकरधनुषी | ||||
| सन्धिद्वये=सन्ध्याद्वितये, पङ्गू = पङ्गुसञ्ज्ञकौ (खञ्जौ) भवतः । नाशक्राविति=तौ पङ्गू राशी | ||||
| नाशक्रावनिष्टकरौ भवेताम् । सन्ध्याद्वये धनुर्मकरौ राशी यदि लग्ने भवेतां तदा जात- | ||||
| कस्य प्रष्टुर्वा नाशकरौ भवत इत्यर्थः । स्यादृक्षसन्धिरिति । कर्कटालिमीनभान्तं = कर्कवृ- | ||||
| श्चिकमीनराशीनामन्तमृक्षसन्धिरिति सञ्ज्ञकम् । यत्र नक्षत्रराश्योर्युगपदवसानं तदेवर्क्ष- | ||||
| सन्धिः । यथा-कर्कस्य श्लेषान्तेऽवसानं, ज्येष्ठान्ते वृश्चिकान्तं, पौष्णान्ते मीनान्तं च भवति । |
-like shape at the bottom: It's a u-matra: क्षु! Wait, does it have a half-k before it? Look at line 37: "वृश्चिकस्य तु तिक्षुलोहादिकम्" or "तिक्ष्क्षुलोहादिकम्"? Look at the space between त and the next letter: Wait, in line 37: तु ति then... wait! Is that a half-k? No, it's त् ? Wait, could it be "तिक्त"? No, there is 'लोहादिकम्' right after! Wait, let's look at the transliteration of this verse in Jataka Parijata: वस्त्राद्यं शालिमुख्यं वनफलनिचयः कन्दली मुख्यधान्यं त्वक्सारं मुद्गपूर्वं तिलवसनमुखं तिक्ष्क्षुलोहादिकं च । Wait, some editions print "तिक्षुलोहादिकं" or "तीक्ष्णलोहादिकं" or "तिक्ताम्ललोहादिकं"? Wait, sugarcane is "इक्षु". "तिक्ष्क्षु"? Wait! Could it be "तिक्षुलोहादिकं"? Let's look at the characters: ति - क्षु - लो - हा - दि - कं Wait, is there a क् before क्षु? Let's look at the thickness: In line 27: between '
राशिशीलाध्यायः ॥१॥ १३ मेषादि बारह राशि के द्रव्य क्रमसे-१ वस्त्र और धान्य । २ वन्यफल । ३ हरिणविशेष ४ उत्तम अन्न । ५ जिसके त्वचा में बल हो । ६ मूंग आदि । ७ तिल वस्त्र आदि । ८ ईख, और लोहा आदि । ९ शस्र और घोड़ा । १० सुवर्णादि । ११ जलमें होने वाले फूल । १२ समस्त जलमें होने वाली चीजें हैं ॥ २४ ॥ अथ राशिस्वामिनिरूपणम् । धराजशुक्रज्ञशशीनसौम्यसितारजी वार्क जमन्दजीवाः । क्रमेण मेषादिषु राशिनाथस्तदंशपाश्चेति वदन्ति सन्तः ॥ २५ ॥ धराज-शुक्र-ज्ञ-शशी-न-सौम्य-सितार-जीबार्कज-मन्द-जीवाः क्रमेण मेषादिषु राशिनाथाः भवन्ति । यथा धराजो मङ्गलो मेषस्य । शुक्नो वृषस्य । ज्ञो बुधो मिथुनस्य । शशी = चन्द्रः कर्कस्य । इनः=सूर्यः सिंहस्य । सौम्यो बुधः कन्यायाः । सितः = शुक्रस्तुलायाः । आरो मङ्गलो वृश्चिकस्य । जीवो वृहस्पतिर्धनुषः । अर्कजः=शनिः मकरस्य । मन्दः शनिः कुम्भस्य । जीवो गुरुमीनस्याधिपतिरिति । तदंशपाश्च=अमी राशि- स्वामिनस्तदंशपास्तेषां राशीनां येंडशाः = नवांशास्तेषामधिपश्व, राशीशा एव नवांशाधिपा अपि भवन्ति, इन सन्तो मनीषिणो वदन्ति । अत्र सूर्याचन्द्रमसावेकैकराश्यधिपावन्ये ग्रहा द्विराशिपा इत्यत्र वृद्धानां वचनम्— “कण्ठीरवं विक्रमिणं विलोक्य स्वीयं पदं तत्र चकार सूर्यः । मैत्र्या तदासन्नतया कुलीरे निजं बबन्धालयमेणलक्ष्मा ॥ अन्ये ग्रहा गृहयियाचिषया क्रमेण शीतांशूतीग्ममहसोः सदनं समीयुः । प्राप्तक्रमेण ददतुर्भबनानि तौ तु ताराग्रहा द्विभवनास्तत एव जाताः” ॥ २५ ॥ मेषादि राशियोंके स्वामी कहते हैं—मेषका मंगल । वृषका शुक्र । मिथुनका बुध । कर्कका चन्द्रमा । सिंहका सूर्य । कन्याका बुध । तुलाका शुक्र । वृश्चिकका मंगल । धनु का बृहस्पति । मकरका शनि । कुम्भका शनैश्चर और मीनका बृहस्पति हैं ॥ २५ ॥ मेषादिराशीशचक्रम् ।
| राशि | मे. | वृ. | मि. | क. | सि. | कं. | तु. | वृ. | ध | म. | कुं. | मी. |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स्वामी | मं. | शु. | बु. | चं. | सू. | बु. | शु. | मं. | गु. | श. | श. | बृ. |
अथ सूर्यादीनां त्रिकोणराश्यादिवर्णनम् । मूलत्रिकोणा हरितावुरुक्रिया वधूथनुस्तौलिघटा दिवाकरात् । सितासिताक्कार्किरसां नखांशकास्त्रिकोणमादौ परतः स्वमन्दिरम् ॥ २६ ॥ वृषादिभागत्रयमुच्चमिन्दोर्मूलत्रिकोणं परतस्तु सर्वम् ॥ मेषादिगा द्वादशभागसंज्ञाः कुजस्य कोणं परतः स्वभं स्यात् ॥ २७ ॥ कन्याऽर्द्धमुच्चं, शशिनस्य कोणं दशांशकाः, स्वर्चफलं शरांशाः । कुम्भस्त्रिकोणं, फणिनायकस्य तुङ्गं नृयुग्मं, रमणी गृहं स्यात् ॥ २८ ॥ सूर्यादीनां मूलत्रिकोणराशय उच्यन्ते । हरितावुरुक्रियावधूथनुस्तौलिघटाः, दिवाकरात्=सूर्यादेः, मूलत्रिकोणानि भवन्ति । यथा सूर्यस्य हरिः=सिंहो मूलत्रिकोण- संज्ञः । चन्द्रस्य तावुरुर्वृषः । कुजस्य क्रियः = मेषः । बुधस्य वधूः = कन्या । गुरोर्धनुः । शुक्रस्य तौली=तुला । शनैश्चरस्य घटः=कुम्भो मूलत्रिकोणसंज्ञो भवति । तथाऽऽह वराहः— “सिंहो वृषः प्रथमषष्ठहयाङ्गतौलिकुम्भास्त्रिकोणभवनानि भवन्ति सूर्यात्” इति । अथ सूर्यस्य सिंहः स्वगृहं तदेव मूलत्रिकोणमुक्तम्, किमित्युच्यते-सितासिताकार्गि- २ जा०