कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
अण्डजखानिसे मनुष्यदेहमें आये हुए जीवकी पारख
अनुरागसागर
( ४९ )
देखत देत और पुनि काहू । मन मन झंखे बहु पछताहू ॥
वाद विवाद सबसों ठाने । ज्ञान ध्यान कछु मनहिं न आने ॥
गुरुसतगुरु चीन्हें नहिं भाई । वेद शास्त्र सब देइ उठाई ॥
आपन नीच ऊंच मन होई । हमसमसरि दूसर ना कोई ॥
मैले बस्तर नहीं नहाई । आंख कीन सुख लार बहाई ॥
पांसा जुवा चित्त मन आने । गुरुचरणननिशिदिननिहिजाने ॥
कुवरा मूड़ ताहिका होई । लंबा होय पाव पुनि सोई ॥
ॐ
यहि भांतिलक्षणमें कहा, तुम सुनहु धर्मनि नागरू ॥
अंडज खानिन गोयराखा, कह्यो भेद उजागरू ॥
यह खानि वर्णन कहौ तौसों, कछु नाहि छिपायऊ ॥
सोसमुझावानीजीवथिरकै, धोखसकलमिटायऊ ३४
उष्मज खानिसे मनुष्य देहमें आये हुये जीवनकी पारख
सोरठा-टूजीखानि बताय, ताहि लक्ष तौसों कहो ॥
उष्मजते जिय आय, नर देही जिन पाइय ॥ ३६ ॥
कहैं कबीर सुनो धर्मदासा । उषमज भेद कहौ परगासा ॥
जाइ शिकार जीव बहु मारे । बहुतसे आनन्द होयतेहि वारे ॥
मारि जीव जब घर कहैं आयी । बहुविधि रांध ताहि कहैं खाई ॥
निन्दे नाम ज्ञान कह भाई । गुरु कहैं मेठि करे अधिकाई ॥
निन्दे शब्द और गुरु देवा । निन्दे चौका नरियर भेवा ॥
बहुत बात बहुतेनरि आयी । कथे ज्ञान बहुते ससुझायी ॥
झूठे वचन सभामें कहई । टेढ़ी पाग छोर उरमहई ॥
दया धरम मनहीं नहिं आवे । करें पुन्य तेहि हांसी लावे ॥
माल तिलक अरु चन्दन करई । हाट बजार चिकन पटफिरई ॥
स्थावर खानिसे मनुष्य शरीरमें आये हुए जीवकी पारख
( ५० )
अनुरागसागर
अन्तर पापी ऊपर दाय। सो जिव यमके हाथ विकाया॥
लंब दांत अरु वदन भयावन । पीरे नेत्र ऊँच अति पावन ॥
छन्द
कहे सतगुरु सुनहु धर्मनि, भेद भल तुम पाइया ॥
सतगुरु विना नहि भेद पावे, भली विधितो हिंदर साइया
भैंटिया तुम मोहिको, कछु नाहिं तोहिं दुराइहौं ॥
जो बृझिहो तुम मोहिसो, सकल भेद बताइहौं ॥३५॥
स्थावर खानिसे मनुष्य शरीरमें आये हुए जीवनकी पारख
सो०-तीजी खानि सुभाव अचल खानि जेहि कहत
नरदेही तिन पाव, ताकर लक्षण अब बताइहौं ॥३७॥
अचल खानिको कहो सँदेसा । देह धरे जस होवैं भेसा ॥
छनिक बुद्धि होवे जिव केरी । पलटत बुद्धि न लागे बेरी ॥
झाड़ा फेटा सिर पर पागा । राज द्वार सेवा भल लागा ॥
घोड़ा पर होवे असवारा । तीन खरग औ कमर कटारा ॥
इत उत चित सैन जो मरई । पर नारी करि सैन बुलवाई ॥
रससों बात कहैं मुख जानी । काम बान लागे उर आनी ॥
पर घर ताकइ चोरी जायी । पकर बांधि राजा पहँलायी ॥
हांसी करे सकल पुनि जगहूँ । लाज शर्म उपज नहिं तबहूँ ॥
छिन इक मन महाँ पूजा करई । छिन इक मन सेवा चित धरई ॥
छिन इक मन महाँ बिसरे देवा । छिन इक मन महाँ की जै सेवा ॥
छिन इक ज्ञानी पोथी बांचा । छिन इक माँहि सवन घर नाचा ॥
छिन इक मनमें सूर कहोई । छिन इकमें कादर हो सोई ॥
छिन इक मनमें साहु कहाई । छिन इक मनमें चारि लगाई ॥
छिन इक मनमें करे जु धर्मा । छिन इक मनमें करे अकर्मा ॥
पिंडज खानिसे मनुष्यशरीरमें आये हुए जीवकी पारख
अवुरागसागर
( ५१ )
भोजन करत साथ खजुआई । बाँह जाँघ पुनि मींजत भाई॥
भोजन करत सोय पुनि जाई । जो जगाय तिहि मारन धाई॥
आंख लाल होहि पुनि जाकी । कहैलंग भेद कहों मैं ताकी॥
छन्द
अचलखानीभेद धर्मनि, छिनक बुद्धि सो होयहो ॥
छिन माहिं करके मेट डारे, कहों तुमसों सोयहो॥
मिले सतगुरु सत्य जा कहैं, खान बुधिसबमेटही॥
गुरुचरणलीन अधीन होवै, लोकसोहैंसापैठही॥३६॥
पिंडज खानिसे मनुष्य गरीरमें आयै हुए जीवनकी पारख
सोरठा-सुनहु हो धरमदास, पिंडज लक्षणगुणकहो॥
कहों तुम्हारे पास चौथीखानिकी युक्तिसो ॥३७॥
पिंडज खानिके लच्छ सुनाऊँ । गुण अवगुणका भेद बताऊँ ॥
वैरागी उनमुनि मत धारी । करे धर्म पुनि वेद विचारी ॥
तीरथ औ पुनि योग समाधी । गुरुके चरणचित्तभलबाँधी ॥
वेद पुराण कथे बहु ज्ञाना । सभा बैठि बातें भल ठाना ॥
राजयोग कामिनी सुख माने । मनशंका कबहुँ नहिं आने ॥
धन संपति सुख बहुत सहायी । सेज सुपेद पलंग बिछायी ॥
उत्तम भोजन बहुत सुहायी । लौंग सुपारी बीसों खायी ॥
खरचे दाम पुन्य महाँ सोई । हिरदे सुधि ताकर पुनि होई॥
चच्छु तेज जाकर पुनि जानी । पराक्रम देही बल ठानी ॥
देखो स्वर्ग सदा तेहि हाथा । देखे प्रतिमा नावे माथा ॥
छन्द
बहुतलीन आधीन धर्मनि, ताहि जितकहैंजानिहो॥
सतगुरुचरणनिशिदिनगहे, मतशब्दनिश्चयमानिहो॥
मनुष्यशरीरसे मनुष्यदेहमें आनेवाले जीवकी पारख
( ५२ )
अनुरागसागर
एक एक बिलोय धर्मनि, कह्यो सत मैं तोहिसों ॥
चारखानी लक्ष भाषेउँ, सुनो आगे मोहिसों ॥३८॥
मनुष्य शरीरसे मनुष्यदेहमें आनेवाले जीवकी पारख
सोरठा-छूटे नरकी देह, जन्म धरे फिर आयके ॥
ताका कहौ सँदेह, धर्मदास सुनु कानदे ॥३९॥
धर्मदासवचन
हे स्वामी इक संशय आयी । सो पुनि मोहि कहो समझाई ॥
चौरासी योनिन भरमावे । तब मानुष की देही पावे ॥
यह विधि मोसन कह्यो बुझायी । अब कैसे यह संधि लखायी ॥
सो चरित्र गुरु मोहि लखाऊ । धर्मदास गहि ठके पाऊ ॥
मानुष जन्म धरे पुनि आयी । लक्षण तासु कहो समझायी ॥
कबीरवचन
धर्मदास तुम भलिविधि जानो । होय चरित सो भले बखानो ॥
आयु रहते भी मृत्यु होती है
आइ अछत जो नर मर जायी । जन्म धरे मानुषको आई ॥
जो पुनि मूरख ना पतियाई । दीपक बाती देख जराई ॥
बहुविधि तेल भरे पुनि ताही । लगै वायु तबै बुझ जाही ॥
अग्नि लायके ताहि लेसावे । यहिविधि जीवहु देह धरावे ॥
ताको लक्षण सुनहु सुजाना । तुमसों न गौय राखै ज्ञाना ॥
शूरा होवे नरके माहीं । भयउ डरताके निकट जाहीं ॥
माया मोह ममता नहि व्यापे । दुश्मन ताहि देखि डरकाँपे ॥
सत्य शब्द प्रतीति कर माने । निन्दा रूप न कबही जाने ॥
सतगुरु चरण सदा चितराखे । प्रेम प्रीतिसो दीनता भाखे ॥
ज्ञान अज्ञान होइ कहैं बूझे । सत्यनाम परिचय नित सूझे ॥
जो मानुष अस लक्षण होई । धर्मदास लिखि राखो सोई ॥
चौरासी धारा क्यों बनी ?
अनुरागसागर
( ५३ )
छन्द
जनमजनमको मैल छूटे, पुरुष शब्द जो पावई ॥
नाम भा सुमिरण गहे सो, जीव लोक सिधायई ॥
गुरुशब्द निश्चय दृढगहेसो, जीव अमियअमोलहो
सतनामबल निज घर चले, करे हंसकलोलहो ॥२८॥
सोरठा-सत्यनामपरताप, काल न रोके जीवकहैं ॥
देखिवंशको छाप, काल रहै सिर नायके ॥ ४० ॥
चौरासी धार क्यों बनी ? धर्मदासवचन
चारि खानिके बूझेउ भाऊ । अब बूझों सो मोहि बताऊ ॥
चौरासी योनिनकी धारा । किह कारण यह कीन्ह पसारा ॥
नर कारण यह सृष्टि बनाई । कै कोह और जीव भुगताई ॥
है साहिब जनि मोहि दुराओ । कीजे कृपाबिलंबजनिलाओ ॥
मनुष्यके लिये चौरासी बनी है सदगुरुवचन
धर्मनि नर देही सुखदायी । नर देही गुरु ज्ञान समाई ॥
सो तनु पाय आप जहैं जावे । सतगुरुभक्ति विनादुख पावे ॥
नर तनु काज कीन्ह चौरासी । शब्द न गहे मूढ़मतिनाशी ॥
चौरासीकी चाल न छाड़े । सत्य नाम सो नेह न माड़े ॥
लै डारे चौरासी माहीं । परचै ज्ञान जहां कछु नाहीं ॥
पुनिपुनि दौड़ि कालमुखजाहीं । ताहूते जिव चेतत नाहीं ॥
बहुत भांतिते कहि समुझावा । जीवत विपति जान गुहरावा ॥
यह तनु पाय गये सतनामा । नामप्रताप लहे निजधामा ॥
छन्द
आदिनाम विदेह अस्थिर, परखि जो जियरा गहे ॥
पाय बीरा सार सुमिरण, गुरु कृपा मारग लहे ॥
जीवोंके लिये कालका फन्दा रचना
( ५४ )
अनुरागसागर
तजिकागचाल मराल पथगहि, नीरक्षीरनिवारिके ॥
ज्ञानदृष्टिसोअदृष्टि देखे, क्षरअक्षरसुविचारिके॥२९॥
सोरठा-निह अक्षर है सार, अक्षरतै लखि पावई ॥
धर्मनि करो विचार निह अक्षर निहतत्त्व है ॥४१॥
धर्मदासवचन
धर्मदास कहे शुभ दिन मोरा । हे प्रभु दरसन पायउँ तोरा ॥
मुहि किंकर पर दाया कीजै । दास जानि मोहि यह बरदीजै ॥
निशिदिन रहो चरण लौलीना । पल इक चित्त न होवे भीना ॥
तुव पदपंकज रुचिर सुहावन । पद पराग बहुपतितन पावन ॥
कृपासिंधु करुणामय स्वामी । दया कीन्ह मोहि अंतरयामी ॥
हे साहिब मैं तव बलिहारी । आगल कथा कहो निरवारी ॥
चारखानिरचि पुनिकसकीन्ह। सो सब मोहि बतावो चीन्ह। ॥
जीवोंके लिये कालका फन्दा रचना । कबीरवचन
सुनु धर्मनि यह है यमबाजी । जेहि नहिं चीन्हे पंडितकाजी ॥
जा यम ताहि गोसइयां भाखे । तजे सुधा नर विषकहैं चाखे ॥
चारिहु मिलियह रचना कीन्ह। कच्छा रंग सु जीवहि दीन्ह। ॥
पांच तत्त्व तीनों गुण जानो । चौदह यम ता संग पिछानो ॥
यहि विधि कीन्ही नरकीकाया । मरे खाय बहुरि उपजाया ॥
ओंकार है वेदको मूला । ओंकारमें सब जग भूला ॥
है ओंकार निरंजन जानों । पुरुष नाम सो गुप्त अमानो ॥
सहस्र अठासी ब्रह्मा जाया । भा विस्तर कालकी छाया ॥
ब्रह्माते जिव उपजे बारा । तिन पुनि कथे बहुत विस्तारा ॥
स्मृति शास्त्र पुराण बखाना । तामें सकल जीव उरझाना ॥
जीवनको ब्रह्मा भटकावा । अडखनिरंजन ध्यान ददावा ॥
अनुरागसागर
( ६६ )
वेद मते सब जिव भरमाने । सत्य पुरुषको मर्म न जाने॥
निरंकार कस कीन्ह तमासा । सो चरित्र ब्रह्मो धर्म दासा॥
छन्द
असुर हैं जीवन सतावे, देव ऋषि मुनि कारकं ॥
पुनि धरि औतार रक्षक, असुर करै संहारकं ॥
जीवको दिखलाय लीला, अपनी महिमा घनी ॥
यहिजानजीवनबांधिआशा, यही है रक्षक धनी४०
सो०-रक्षककला दिखाय, अन्तकाल भक्षण करे ॥
पीछे जिव पछताय, जबहि कालके मुख परे ॥४२॥
अडसठ तीरथ ब्रह्मा थापा । अकरम करम पुण्य औ पापा ॥
बारहराशि नखत सत्ताइस । सात वार पंद्रह तिथि लाइस ॥
चारों युग तब बांधे तानी । घड़ी दंड स्वासा अनुमानी ॥
कार्तिक माघ पुन्य कहिदीन्हा । यमबाजी कोइ बिरले चीन्हा ॥
तीरथ धामकी बांधि महातम । तजेन भरम न चीन्हे आतम ॥
पाप पुण्यमहैं सबै फँदावा । यहि विधिजीव सबै उरझावा ॥
सत्य शब्द विनु बांचे नाही । सारशब्द बिन यममुख जाही ॥
त्रास जानि जिव पुण्य कमावे । किंचित फल तेहि छुधान जावे ॥
जबलग पुरुष डोर नहिं गहई । तब लग योनिन फिर२लहई ॥
अमित कला जम जीव लगावे । पुरुष भेद जीव नहिं पावे ॥
लाम लोभ जिव लागे धायी । आशा बंध काल धर खायी ॥
यम बाजी कोइ चीन न पावे । आशा दे यम जीव नचावे ॥
प्रथमैं सतयुगको व्यवहारा । जीवहि यम लै करै अहारा ॥
लच्छ जीव यम नितप्रति खाई । महाअपरबल काल कसाई ॥
तसशिलानिशिदिन तहैं जरई । तापर लै जीवन कहैं धरई ॥
तप्तशिलापर कष्ट पाकर जीवोंका गुहार करना और कबीर साहबका सत्यपुरुषकी आज्ञासे उन्हें छुड़ाना
( ५६ )
अनुरागसागर
जीवहि जारै कष्ट दिखावे । तब फिर लै चौरासी नावे ॥
ता पीछे योनिन भरमावे । यहि विधि नानाकष्ट दिखावे॥
बहुविधि जीवन कीन्ह पुकारा । काल देत है कष्ट अपारा ॥
तत्त शिलापर कष्ट पाकर जीवोंका गुह्यार करना और कबीर
साहबका सतपुरुषकी आज्ञामें जाकर उन्हें छुड़ाना
यमकर कष्ट सह्यो नहिं जाई । हे गुरु ज्ञानी होहु सहाई ॥
छन्द
जबदेखिजीवनकोविकल अतिदया पुरुषजनाइया ॥
दयानिधि सत पुरुषसाहिब, तबै मोहि बुलाइया ॥
कहे मुहिं समुझाय बहुविधि, जीवजाय चितावहू ॥
तुम दरशदेतेहो जीव शीतल, जायतपनबुझायहू४१॥
सोरठा-आज्ञालीन्हामान, पुरुषसिखापनसीसधरि ॥
ताक्षण कीन्ह पयान, सीसनायसतपुरुष कहैं ॥४३॥
आये जहैं यम जीव सतावे । काल निरंजन जीव नचावे ॥
चटपट करे जीव तहैं भाई । ठाढ़े भये तहां पुनि जाई ॥
मोहि देख जिव कीन्ह पुकारा । हे साहिब मुहि लेहि उबारा ॥
तब हम सत्य शब्द गुहरावा । पुरुष शब्दते जीव जुड़ावा ॥
जीवोंका स्तुति करना
सकल जीव तब अस्तुति लाये । धन्य पुरुष भल तपन बुझाये॥
यमते छोर लेव तुम स्वामी । दया करो प्रभु अन्तर्यामी ॥
कबीरवचन जीवोंप्रति
तब मैं कहा जीव समुझाई । जोर करो तो वचन नसायी॥
जब तुम जाय धरौ जग देहा । तब तुम करिहो शब्द सनेहा॥
पुरुष नामसुमिरण सहिदाना । बीरा सार कहो परवाना ॥
देह धरी सत शब्द समाई । तब हंसासत लोकै जाई ॥
जहाँ आशा तहाँ वासा
अनुरागसागर
( ६७ )
जहां आशा तहां वासा
जहाँ आशा तहाँ वासा होई । मन वच करम सुमिर जो कोई ॥
देह धारि कीन्है जिहि आसा । अंत आय लीन्हैउ तहाँ वासा ॥
जब तुम देह धरो जग जाई । विसरचो पुरुषकाल धरिखाई ॥
जीवन वचन कबीर प्रति
कहे जीव सुनु पुरुष पुराना । देह धरी विसरचो यह ज्ञाना ॥
पुरुष जान सुमरेउ यमराई । वेद पुराण कहे ससुझाई ॥
वेद पुराण कहे पति एहा । निराकार ते कीजे नेहा ॥
सुर नर मुनि तैतीस करोरी । बांधे सबै निरंजन डोरी ॥
ताके मते कीन्ह मै आसा । अब मोहि चीन्ह परे यम फांसा ॥
कबीर वचन जीवोंप्रति
सुनो जीव यह छल मम केरा । यह यम फंदा कीन्ह घनेरा ॥
छन्द
काल कला अनेक कीन्हौं, जीव कारण ठाट हो ॥
तीर्थव्रत जग योग फन्दे, कोइ न पावत बाट हो ॥
आप तन धरि प्रगट हँके सिफत आपन कीन्हैऊ ॥
नानागुणनमन कर्म कीन्है, जीव बंधन दीन्हैऊ ॥ ४२ ॥
सोरठा-कालकराल प्रचण्ड, जीवपरे वश ताहिके ॥
जनम जनमभे दण्ड, सत्यनाम चीन्है विना ॥ ४४ ॥
१ यह छन्द कई ग्रंथोंमें कई प्रकारसे लिखा है दूसरे प्रकारसे जो दो सौ वर्षसे भी अधिकके लिखे पुराने ग्रंथ में इस प्रकार है—
छन्द-काल कन्या अनेक कीन्है जीव कारण जाल हो ।
वेद शास्त्र पुरान स्मृति ते रुधै काल कराल हो ।
देव धरि नर प्रगट हो फिरे, ताहि आशा कीन्हैऊ,
अमृत इत उत काल वसि, बहुपंथमें चित दीन्हैऊ ॥
कबीरवचन धर्मदासप्रति
गुरु महिमा
( ६८ )
अनुरागसागर
छन इक जीवन कहँ सुख दयऊ । जीव प्रबोध पुरुष पहुँ गयऊ ॥
छन इक जीवन कहँ सुख दीन्हा । जीवन कह्यो ज्ञानको चीन्हा ॥
जब तुम देह धरो जग जाई । तब हम शब्द कहब गोहराई ॥
जौ गहि हो सत नामकी डोरी । तब आनब हम जमसे छोरी ॥
जीव परमोधि पुरुष पहुँ गयऊ । जीवनको दुख वरनि सुनयऊ ॥
पुरुष दयाला दयानिधि स्वामी । जिनके मूल अमान अकामी ॥
कह्यो मोहिँ बहुविधि समुझाई । जीवन आनों शब्द चेताई ॥
धर्मदासवचन
धर्मदास अस विनती लायी । ज्ञानी मोहिँ कहो समझायी ॥
जो कछु पुरुष शब्द सुख भाखो । सो साहिब मोहि गोयन राखो ॥
कौन शब्दते जीव उबारा । सो साहिब सब कहो बिचारा ॥
सदगुरुवचन
पुरुष मोहि जैसे फुरमायी । सो सब तुमसों संधिलखायी ॥
केहेउ मोहि बहुविधिसमझायी । जीवहि आनो शब्द चितायी ॥
गुप्त वस्तु प्रभु मोकहँ दीन्हा । नाम विदेह मुक्तिकर चीन्हऽ ॥
दीन्ह पात परवाना हाथा । संधिछाप मोहि सौंप्यो नाथा ॥
बिनु रसनाते सो धुनि होई । गुरुगमते लखि पावे कोई ॥
पंच अमीय मुक्तिका मूला । जाते मिटे गर्भ अस्थूला ॥
यहि विधि नाम गहे जो हँसा । तारौ तासु इकोतर बँसा ॥
नाम डोरि गहि लोकहि जायी । धर्मराय तिहि देखि डरायी ॥
ज्ञानी करो शिष्य जेहि जाई । तिनका तोरो जल अँचवाई ॥
जिहि विधि दीन्ह तुमहि मैं पाना । तेहि विधि देहु शिष्य सहिदाना ॥
गुरुमहिमा
गुरुमुख शब्द सदा उर राखे । निशिदिन नाम सुधारस चाखे ॥
पियानेह जिमि कामिनि लागे । तिमिर गुरुरूप शिष्य अनुरागे
शुकदेवकी कथा
अनुरागसागर
( ६९ )
पल पल निरखे गुरुमुखकान्ती । शिष्यचकोरगुरुशशिशान्ती॥
पतिव्रता ज्यों पतिव्रत ठाने । द्वितीयपुरुष सपने नहिं जाने॥
पतिव्रता दोड कुलहिं उजागर । यह गुण गहे संतमति आगग॥
ज्यों पतिव्रता पिया मन लावे । गुरु आज्ञा असशिष्य जुगावे॥
गुरुते अधिक और कोइ नाही । धर्मदास परखहु हिय माहीं ॥
गुरुते अधिक कोइ नहिं दूजा । भर्म तजै करि सतगुरुपूजा ॥
तीर्थ धाम देवल अरु देवा । शीश अपि जो लावैं सेवा ॥
तो नहिं वचन कहैं हितकारी । भूले भरमें यह संसारी ॥
छन्द
गुरु भक्ति अटल अमानधर्मनि, यहि सरस दूजा नहीं ॥
जप योगतप व्रतदान पूजा, तृणसदृश यह जग कहीं॥
सतगुरुदया जिहिसन्तपरतिहि, हृदययहि विधि आवई॥
ममगिरापरखेहरषिकेहिय, तिमिरमोहनशावई॥४३॥
सोरठा-दीपकसतगुरुज्ञान, निरखेहु सन्तअंजोरतोहि
पावे मुक्ति अमान, सतगुरु जेहि दाय़ा करे ॥५४॥
शुकदेवजीकी कथा
शुकदेव भये गरभ जोगेशर । उन समान नहिं थाप्यो दूसरा॥
तपके तेज गये हरि धामा । गुरु बिन नहीं लहे विथामा ॥
विष्णु कहे ऋषिकहैवा आये । गुरु विहीन तप तेज झुलाये ॥
गुरु विहीन नर मोहि न भावे । फिर २ जो इन संकट आवे ॥
जाहु पलटिगुरुकरहु सयाना । सब पैहौं यहवां अस्थाना ॥
सुनिमुनिशुकदेव वेगि सिधाये । गुरुविहीन तहैं रहन न पाये ॥
जनक विदेह कीन्ह गुरुजानी । हरषि मिले तब सारंगपानी ॥
नारद ब्रह्मा सुत बड़ ज्ञानी । यह सब कथा जगतमें जानी॥
कबीर साहब का सत्यलोकसे चलकर निरंजनसे वार्तालाप करके पृथ्वीपर आनेका वृत्तांत
( ६० )
अनुरागसागर
और देव ऋषि मुनिवर जेते । जिन गुरुलीन्ह उत्तर सो तेते॥
जो गुरु मिले तो पंथ बतावे । सार असार परख दिखलावे॥
गुरु सोई जो सत्य बतावे । और गुरु कोइ काम न आवे॥
सत्य पुरुषके कहे सँदेशा । जन्म जन्मका मिटै अँदेशा॥
पाप पुन्यकी आशा नाहीं । बैठे अक्षय वृक्ष की छाँही ॥
भुङ्गी मत होवे जिहि पासा । सोइ गुरुसत्य सुनो धर्मदासा॥
छन्द
जो रहित घर बतलावई, सो गुरु सांचा मानिये ॥
तीन तजि मिलि जाय चौथ, तासुवचनपरमानिये ॥
पांच तीन अधीन काया, न्यार शब्द विदेह हैं ॥
देह माँहि विदेह दरशै, गुरुमत निज ए कहौं ॥४५॥
सोरठा-ध्यान विदेह समा, देह धरेका फल यहै ॥
नहि आवै नहि जाय, मिलइ देह विदेह होइ ॥४६॥
अस गुरु करे बनाय, बहुरि न जग देही धरे ॥
नहि आवे नहि जाय, जिहि सतगुरुदाया करे ॥४७॥
धर्मदासवचन
हे प्रभु मोहि कृतार्थ कीन्ह। पूर्ण भाग्य दरश सुहि दीन्ह॥
तव गुण मोसन वरणि न जाई। मो अचेत कहै लीन्ह जगाई ॥
सुधा वचन तुम मोहि प्रिय लागे। सुनतहि वचन मोह मद भागे ॥
अब वह कथा कहो समुझायी। जिहि विधि जगमें प्रथमें आयी॥
कबीरसाहबका सत्पुरुषकी आज्ञा पाकर जीवोंको चितानेके लिये
चलना, निरंजनसे भेंट होना और उससे बात चीत करके आगे बढ़ना
कबीरवचन
धर्मदास जो पूछ्यो मोही । युग युग कथा कहौं मैं तोही॥
जबही पुरुष आज्ञा कीन्ह। जीवनकाज पृथ्वी पग दीन्ह॥
योगजीत और धर्मरायका युद्ध
अनुरागसागर
( ६१ )
करि प्रणाम तबहीं पगु धारा । पहुँचे आय धर्म दरबारा ॥
प्रथमैं चलेउ जीवके काजा । पुरुष प्रताप शीशपर छाजा ॥
तेहि युग नाज अचिन्त कहाये । आज्ञा पुरुष जीव पहुँ आये ॥
आवत मिल्यो धर्म अन्याई । तिन पुनि हमसों रार बढ़ाई ॥
मो कहैं देखि धर्म ढिग आवा । महा क्रोध बोले अतुरावा ॥
योगजीत इहवाँ कस आवो । सो तुम हमसो वचन सुनावो ॥
कै तुम हमको मारन आओ । पुरुष वचन सो मोहि सुनायो ॥
योगजीत वचन
तासो कह्यो सुनो धर्मराई । जीव काज संसार सिधार्ई ॥
बहुरि कह्यो सुन सो अन्याई । तुम बहु कीन्ह कपट चतुराई ॥
जीवन कह तुम बहुत भुलावा । बार बार जीवन संतावा ॥
पुरुष भेद तुम गोपित राखा । आपन महिमा परगट भाखा ॥
तस शिलापर जीव जरावहु । जारि बारि निजस्वाद करावहु ॥
तुम अस कष्ट जीव कह दीन्हा । तबहि पुरुष मोहि आज्ञा कीन्हा ॥
जीव चिताय लोक लै जाऊं । काल कष्टसे जीव बचाऊं ॥
ताते हम संसारहि जायब । दे परवाना लोक पठायब ॥
धर्मराय वचन
यह सुनि काल भयंकर भयऊ । हम कहैं त्रास दिखावन लयऊ ॥
सत्तर युग हम सेवा कीन्ही । राज बढ़ाइ पुरुष मुहि दीन्ही ॥
फिर चौंसठ युग सेवा ठयऊ । अष्ट खंड पुरुष मुहि दयऊ ॥
तब तुम मारि निकारे मोही । योगजीत नहि छांड़ी तोही ॥
अब हम जान भली विधि पावा । मारों तोहि लेउँ अब दावा ॥
योगजीत वचन
तब हम कहा सुनो धर्मराया । हम तुम्हरे डर नाहि डराया ॥
हम कहैं तेज पुरुष बल आही । अरे काल तुव डर मोहि नाही ॥
निरंजनका अपने जालका वर्णन करना
( ६२ )
अनुरागसागर
पुरुष प्रताप सुमिरितिहि बारा । शब्द अंगते कालहि सारा ॥
ततछण दृष्टि ताहि पर हेरा । श्यामललाट भयो तिहि केरा ॥
पंख घात जस होय पँखेरू । ऐसे काल मोहि पहाँ हेरू ॥
करे कोध कछु नाहिँ बसाई । तब पुनि परेउ चरण तर आई ॥
धर्मरायवचन छन्द
कह निरंजन सुनो ज्ञानी, करो विनती तोहिसों ॥
जान बन्धु विरोध कीन्हों, घाट भयी अब मोहिसों ॥
पुरुष सम अब तोहि जानों नहिँ दूजी भावना ॥
तुम बड़े सर्वज्ञ साहिब, क्षमा छत्र तनावना ॥ ४५ ॥
सो०—तुमहूँ करो बखशीश, पुरुष दीन्ह जसराजमुहिँ ॥
षोडशमहँ तुम ईश, ज्ञानी पुरुष एकसम ॥ ४८ ॥
ज्ञानो वचन
कह ज्ञानी सुनु राय निरंजन । तुम तो भये वंशमें अज्ञन ॥
जीवन कहँ मैं आनव जाई । सत्य शब्द सत नाम हदाई ॥
पुरुष आज्ञाते हम चलि आये । भौ सागरते जीव सुत्काये ॥
पुरुष अवाज टारु यहि बारा । छनमहँ तो कहँ देउँ निकारा ॥
धर्मराय वचन
धर्मराय अस विनती ठानी । मैं सेवक द्वितीया नहिँ जानी ॥
ज्ञानी विनती एक हमारा । सो नकरहु जिहि मोर विगारा ॥
पुरुष दीन्ह जस मोंकहँ राजू । तुमहूँ देहु तो होवे काजू ॥
अब हम वचन तुम्हारो मानी । लीजो हंसा हम सो ज्ञानी ॥
विनती एक करो तुहि ताता । हट कर मानो हमरी बाता ॥
कहा तुम्हारो जीव नहिँ मानहिँ । हमरी दिशिहै बादबखानिहिँ ॥
हट फन्द हैं रचा बनायी । जामें जीव रहे उरझायी ॥
वेदशास्त्र सुमिरिति गुणनाना । पुत्री तीन देवन परधाना ॥
निरंजनके जाल काटनेका हथियार
अनुरागसागर
( ६३ )
तिनहू बहु बाजी रचि राखा । हमरी डोरि ज्ञानमुखिभाखा॥
देवल देव पखान पुजार्ह । तीरथ व्रत जप तप मनलाई॥
पूजा विश्व बलिदेव अपराधी । यहि मति जीवनराख्यो बांधी॥
जग्य होम अहू नेम अचारा । और अनेक फन्द मैं डारा ॥
जो ज्ञानी जैहो संसारा । जीव न माने कहा तुम्हारा ॥
ज्ञानीवचन
ज्ञानी कहे सुनो अन्याई । काटों फन्द जीव ले जाई ॥
जैतिक फन्द तुम रचे विचारी । सत्य शब्दते सबै बिडारी ॥
जौन जीव हम शब्द दृढ़ावे । फंद तुम्हार सकल मुक्तावे ॥
जबजीव चिन्हा है शब्द हमारा । तजहि भरम सब तोर पसारा ॥
सत्य नाम जीवन समझायब । हंस उबार लोक ले जायब ॥
छन्द
देहैं सत्यशब्ददिदायहंसहि, दयाशील क्षमाघनी ॥
सहज सील सन्तोषसारा, आत्मपूजा गुन धनी ॥
पुरुष सुमिरन सार वीरा, नाम अविचल गाइहौं ॥
शीस तुम्हरे पाँव देके, हंसहि लोक पठाइहौं ॥४६॥
सो०-अमीनाम विस्तार, हंसहि देह चिताइहौं ॥
मरदहि मात्र तुम्हार, धर्मदास सुनु चित्तदे ॥४९॥
चौका करी परवाना पाई । पुरुषनाम तिहि सेउँ चिन्हाई ॥
ताके निकट काल नहि आवे । संधि देख ताकहैं शिर नावे ॥
इतना सुनत काल सकाना । हाथ जोरिके विनती ठाना ॥
दयावन्त तुम साहिब दाता । एतिक कृपा करो हो ताता ॥
पुरुष शाप मोकहैं अस दीन्हा।लच्छजीव नित आसन कीन्हा ॥
धर्मरायवचन
कबीरसाहबका निरंजनसे तीन युग हारकर चौथे युगमें पंथ चलानेकी प्रतिज्ञा करना और व्यालिसवेराकी बात कहना
( ६४ )
अनुरागसागर
जो जिव सकललोकतुव आवे। कैसे क्षुधा सो मोरि बतावे ॥
पुनि पुरुष मोपरदाया कीन्हा। भौसागर कहैं राजमुहि दीन्हा॥
तुमहूँ कृपा मोपर करहुँ। मांगो सो वर मुहि उच्चरहु॥
सतयुग त्रेता द्वापर माहीं। तीनहु युग जीव थोरे जाहीं ॥
चौथा युग जब कलियुग आवे। तब तुव शरण जीव बहु जावे॥
ऐसा वचन हार मुहि दीजे। तब संसार गवन तुम कीजे ॥
ज्ञानीवचन
अरे काल परंपंच पसारा। तीनों युग जीवन दुख डारा॥
विनती तोरि लीन्ह मैं जानी। मोकहैं ठगा काल अभिमानी॥
जस विनती तू मोसन कीन्ही। सो अबबसितोहि कहैं दीन्ही॥
चौथायुगजब कलियुग आये। तब हम आपन अंश पठाये॥
ॐन्द
सुरति आठों अशसुकृत, प्रगटि हैं जग जासके ॥
ता पीछे पुनि सुरतनौतन, जाय ग्रह धर्मदासके ॥
अंश ब्यालिस पुरुषके वे, जीवकारण आवई ॥
कलिपन्थ प्रगट पसारिके, वह जीव लोकपठावई ४७
सोरठा-शत्यशब्द दे साथ जिहि परवाना देइहैं ॥
सदा ताहि हम साथ, सोजिव यम नहि पाइ है ॥
धर्मराय वचन
हे साहिव तुम पन्थ चलाऊ। जीव उबार लोक ले जाऊ ॥
बंश छाप देखौं जेहि हाथा। ताहि हंस हम नाउब माथा ॥
पुरुष अवाज लीन्ह मैं मानी। विनती एक करो तुहिं ज्ञानी ॥
कालका अपना वाहर पन्थ चलनेकी बात कबीरसाहबसे कहना
पन्थ एक तुम आप चलाऊ। जीवन ले सत लोक पठाऊ॥
द्वादश पन्थ करों मैं साजा। नाम तुम्हार ले करों अवाजा॥
कालका जगन्नाथ स्थापना करनेका वरदान पाना
अनुरागसागर
( ६६ )
द्वादश यह यम संसार पठैहों। नाम तुम्हारे पंथ चलेहों ॥
मृतु अन्या इक दूत हमारा। सुकृत ग्रह लै है अवतारा ॥
प्रथम दूत मम प्रगटै जायी। पीछे अंश तुम्हारा आयी ॥
यहि विधि जीवनको भरमाऊँ। पुरुष नाम जीवन समझाऊँ ॥
द्वादश पंथ जीव जो ऐहैं सो। हमरे सुख आन समैं हैं ॥
एतिका विनती करो बनाई। कीजे कृपा देउ बगसाई ॥
कालका कवीरसाहबसे जगन्नाथ स्थापनाका
वरदान मांगना
कलियुगप्रथमचरणजबआयब। तब हम बौद्ध शरीर बनायब ॥
राजा इन्द्रदवन पहुँ जायब। जगन्नाथ हम नाम धरायब ॥
राजा मंडप मोर बनैहै। सागर नार खसावत जैहै ॥
पुत्र हमारा विष्णु तहँ आहीं। सागर ओइलसात तेहि पाहीं ॥
ताते मण्डप वचन न पाईं। उमँगे सागर लेइ डबाईं ॥
ज्ञानी एक मता निर्माऊं। प्रथमै सागर तीन सिधाऊं ॥
तुम कहैं सागर लांघि न जाईं। देखत उदधि रहे सुरझाईं ॥
यहि विधि मोकहँथापिहुजायी। पीछे आपन अंश पठायी ॥
भवसागर तुम पंथ चलाओ। पुरुष नामते जीव बचाओ ॥
सन्धि छाप मोहि देहु बतायी। पुरुष नाम मोहि देहु सुझायी ॥
विना सन्धि जो उतरै घाटा। सो हंसा नहिं पावे बाटा ॥
ज्ञानीवचन छन्द
धर्म जस तुम मांगहू सो, चरितहमभल चीन्हिया ॥
पंथद्वादश तुम कहेउ सो अमी घोर विष दीन्हिया ॥
जो मेटि डारों तोहिको अबपलटिकलादिसावऊँ ॥
लै जीवबन्द छुड़ाय यमसों अमरलोक सिधावऊँ ४८
धर्मरायका कबीर साहबको धोखा देकर उनसे गुप्त भेद पूछना
( ६६ )
अनुरागसागर
सो०—पुरुषवचनअसनाहिं,यहै साच चित कीन्हेऊ ॥
लै पहुँचावहुँ ताहि, सत्यशब्द जा टट गहे ॥ ५१ ॥
द्वादश पन्थ कहेउ अन्याई । सो हम तोहि दीन्ह बगसाई॥
पहिले प्रगटे दूत तुम्हारा । पीछे लेहि अंश औतारा ॥
उदधि तीर कहँ मैं चलि जायब । जगन्नाथको माड मडायब ॥
ता पाछे हम पन्थ चलायब । जीवन कहँ सतलोक पठायब॥
धर्मरायका कबीरसाहबको धोखा देकर उनके गुप्त भेदका पूछना
धर्मराय वचन
सन्धि छाप मोहि दीजे ज्ञानी । जस दैहौं हंसहि सहिदानी ॥
जो जिन मोकहँसन्धि बतावे । ताके निकट काल नहिं आवे ॥
नाम निसानी मो कहँ दीजे । हे साहिब यह दाया कीजे ॥
ज्ञानी वचन
जो तेहि देहु सन्धि लखाई । जीवन काज होइहो दुखदाई ॥
तुम परपंच जान हम पावा । काल चलै नहिं तुम्हरो दावा ॥
धर्मराय तेहि परगट भाखा । गुप्त अंक बीरा हम राखा ॥
जो कोई लेई नाम हमारा । ताहिछोड़ि तुम होहु नियारा ॥
जो तुम हंसहि रोको जायी । तो तुम काल रहन नहिं पायी ॥
धर्मराय वचन
कहे धर्म जाओ संसारा । आनहु जीव नाम आधार ॥
जो हंसा तुम्हरो गुण गाये । ताहिं निकट तो हम नहिंजाये ॥
जो कोई जैहै शरण तुम्हारा । हम शिर पग दै होवै पारा ॥
हम तो तुमसन कीन्ह ठिठाई । पिता जान कीन्हीं लरिकाई ॥
कोटिन औगुण बालक करई । पिता एकहिरदय नहिं धरई ॥
जो पितु बालक देह निकारी । तबको रक्षा करे हमारी ॥
धर्मराय उठ सीस नवायो । तब ज्ञानी संसार सिधायो ॥
कबीर साहबका ब्रह्मासे भेंट
अनुरागसागर
( ६७ )
कबीरबचन धर्मदासप्रति
जब हम देखा धर्म सकाना । तब तहवांते कीन्ह पयाना ॥
कह कबीर सुनु धर्मनि नागर । तब मैं चलि आयउँ भवसागर ॥
कबीरसाहेबकी ब्रह्मासे भेंट
आया चतुराननके पास । तासों कीन्ह शब्द परकाशा ॥
ब्रह्मा चित दै सुनवे लीन्हा । पूछयो बहुत पुरुषको चीन्हा ॥
तबहिं निरंजन कीन्ह उपाई । ज्येष्ठ पुत्र ब्रह्मा मोर जाई ॥
नीराजन मन घंट विराजै । ब्रह्मा बुद्धि फेरि उपराजै ॥
ब्रह्मावचन
निराकार निर्गुण अविनाशी । ज्योतिस्वरूप शून्यके वासी ॥
ताहि पुरुष कहैं वेद बखाने । आज्ञा वेद ताहि हम जाने ॥
कबीरसाहेबका विष्णुके पास पहुँचना
जब देखा तेहि कालहृदायो । तहैंते उठे विष्णु पहुँ आयो ॥
विष्णुहि कह्यो पुरुष उपदेशा । कालवशी नहिं गहे सँदेशा ॥
विष्णुवचन
कहे विष्णु मोसमको आही । चार पदार्थ हमरे पाही ॥
काम मोक्ष धर्मारथ साही । चाहे जैन देउँ मैं ताही ॥
ज्ञानी वचन
सुनहु सो विष्णु मोक्षकस तोही । मोक्ष अक्षर परले तर होही ॥
तुम नहिं थिर थिर कस करहु । मिथ्या साखि कवण गुण भरहु ॥
कबीरबचन धर्मदासप्रति
रहे सकुच सुन निर्भय बानी । निजहिय विष्णु आपडरमानी ॥
तब पुनि नागलोक चलि गयऊ । तासे कुछकुछ कहिबे लयऊ ॥
पुरुष भेद कोउ जानत नाहीं । लागे सभे कालकी छाहीं ॥
राखनहार कहैं चीन्हों भाई । यहसों को तुहि लेइ छुड़ाई ॥
ब्रह्मा विष्णु रुद्र जिहि ध्यावैं । वेदे जासु गुण निशिदिन गावैं ॥
कबीर साहबका नागलोकमें जाना और शेषनागसे वार्तालाप
( ६८ )
अनुरागसागर
सोह पुरुष तेहि राखनहारा । सोह तुमहि लै करिहै गारा ॥
राखनिहार और कोउ आही । करु विश्वास मिलाऊँ ताही ॥
शेष खानि विष तेज सुभाऊ । वचन प्रतीत हृदय नहीं आऊ ॥
सुनहु सुलक्षण धर्मनि नागर । उब मैं आयउँ या भवसागर ॥
आये जब मृत्युमण्डल माहीं । पुरुषजीव कोउ देख्यो नाहीं ॥
काकहँ कहिय पुरुष उपदेशा । सा तो अधिकै यमको भेषा ॥
जो घातक ताको विश्वासा । जो रक्षक तेहि बोल उदासा ॥
जाहि जपै सोई धरि खाई । तब ममशब्द चेत चित आई ॥
जीव मोहवश चीन्हे ताही । तब अस भाव उपज हियमाहीं ॥
छन्द
मेटि डारो काल शाखा, प्रगट काल दिखावउँ ॥
लेऊँ जीवन छोरि यमसो, अमरलोक पठावउँ ॥
जाहि कारण रटत डोलों, सो मोकहैं चीन्हई ॥
कालके वश परे जीव सब, तजि सुधाविषलीन्हई ॥
सो०-पुरुषवचन असनाहि, यही सोच चित कीन्हऊ ॥
ले पहुँचायो ताहि, शब्द परख दृढको गहे ॥ ५२ ॥
पुनि जस चरित भयो धर्मदासा । सो सब बरनि कहों तुवपासा ॥
ब्रह्मा विष्णु शंभु सनकादी । सब मिलि कीन्ही शून्य समाधी ॥
कवन नाम सुमिरो करतारा । कवनहि नाम ध्यान अनुसारा ॥
सबहि शून्यमहँ ध्यान लगाये । स्वाति सनेह सीप ज्यों लाये ॥
तबहि निरंजन जतन विचारा । शून्य गुफाते शब्द उचारा ॥
ररां सु शब्द उठा बहुबारा । मा अक्षर माया संचारा ॥
दोउ अक्षर कहैं समके राखा । रामनाम सबहिनि अभिलाषा ॥
रामनाम लै जगहि दृढायो । काल फन्द कोइ चीन्हन पायो ॥
यह विधि रामनाम उत्पानी । धर्मनि परख लेहु यह बानी ॥