कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
सत्यपुरुषका ज्ञानीजीको संसारमें जाकर जीवोंको चितानेकी आज्ञा देना
श्रीसद्गुरुभ्यो नमः
अथ श्रीबोधसागरे
वच्छत्तरंगः
ग्रन्थ गुरुडबोध
सोरठा-गुण गण जेहि अशेष, बने न वर्णत सहसमुख ।
वंदौ सोइ हंसेश, सत्यकबीर जो प्रगट जग ॥
धर्मदास वचन
साखी-धरमदास बिन्ती करै, सुनहु जगत उधार ।
गुरुड बोधको भेव सो, अब कहहु यहि बार ॥
सतगुरु वचन
सत गुरु कहन तबहिँ अस लागे । गुरुड सो ज्ञान जेहि विधि पागे ॥
सत्य पुरुष वचन
आप पुरुष यक शब्द उचारा । हो सुकृत तुम जाहु संसारा ॥
नाम पान तुम लेहु हमारा । जाय छुडायहु जिव संसारा ॥
सत्य लोक ते करहु प्यानी । लेहु शब्द तुम बहुविधि बानी ॥
लेहु शब्द अजरमनि ज्ञानी । सत्य शब्द बोलहु सहिदानी ॥
आज्ञा मानि हमारी लेहु । जाय पाँव पृथ्वी तुम देहु ॥
कहो सबन सों शब्द बुझायी । भक्ति प्रताप सत्तनाम सहायी ॥
ज्ञानी वचन
तब ज्ञानी उठि मस्तक नावा ! तुव प्रताप हम हंस छुडावा ॥
जुगन जुगन में हमहिँ सिधाये । जिन माना तिनही सुकृताये ॥
नं. ५ कबीरसागर - ४
ज्ञानीजीका संसारमें आना और गरुड़से भेंट होना
( ६६ )
गरुड बोध
तब साहब मोहि दाय़ा कीन्ह़ा । बचन मानिहम शिरपर लीन्ह़ा॥
करि प्रणाम परदक्षिण कीन्ह़ा । पाछे जगहिं पयाना दीन्ह़ा ॥
यही भौंति धर्मनि जग आवा । बहुत भौंतिते जिव समझावा॥
प्रथम गरुडसे भेंट जब भयऊ । सत्य नाम कह बोल सुनयऊ॥
धर्मदास सुनु कह्यो बुझायी । जेहि विधिसे ताही समझायी ॥
गरुड वचन
शीश नाइ तिन पूछा भाये । हौ तुम कौन कहाँसे आये ॥
कौन दिशा ते तुम चलि आऊ । अपनो नाम कही समझाऊ ॥
ज्ञानी वचन
कह ज्ञानी है नाम हमारा । दीक्षा देन आयऊ संसारा ॥
सत्यलोक से हम चलि आये । जीव छुडावन जग महाँ आये ॥
सत्यपुरुष मोहि आज्ञा दीन्ह़ा । सत्य शब्द हम लेइ तब लीन्ह़ा ॥
गरुड वचन
सुनत गरुड़ अचम्भो माना । सत्य पुरुष आही को आना॥
प्रत्यक्ष देव कृष्ण कहावैं । दश औतार सो धरि धरि आवैं॥
ज्ञानी वचन
तब हम कहा सुनहु तुम स्याना । सत्य पुरुष तुम नहिं पहिचाना॥
अवतारन का कहो विचारा । इतने साहब रहै नियारा ॥
जाकर कीन्ह सकल विस्तारा । सो साहब नहिं जग औतारा ॥
योनी संकट वह नहिं आवे । वह तो साहब अछय रहावे ॥
जहाँ लगे जो जगमें आये । तहाँ लगि सबही अंश कहाये॥
साखी-ताते साहब अछय है, तीन लोक सों न्यार ।
योनि संकट ना आवई, ना वह लेइ औतार ॥
गरुड वचन-चौपाई
तबही गरुड जो बोलहिं बानी । कौने देश बसन है ज्ञानी ॥
हम बाहन हैं कृष्ण के भाई । तिनकी गति तुमहू नहिं पाई ॥
गरुड़का श्रीकृष्णके पास जाकर ज्ञान करना
बोधसागर
( ६७ )
तीनि लोकके ठाकुर आही । तिनके आगे कौनको शाही ॥
तीनि लोकके ठाकुर कहिये । तिनके और कौनको गहिये ॥
सोई मोहि अब देहु बतायी । मोरे मन चिंता समुहायी ॥
दूसर कौन सो देहु बतायी । हमरे मन गुमान नहिं आयी ॥
ज्ञानी वचन
सुनहु गरुड यक वचन हमारा । वह साहब है सबसे न्यारा ॥
यह तो सबै ईश्वरी माया । उपजहिं विनसहिं बहुरि विलाया ॥
वह नहिं आवे नहीं जाहीं । वह तो सदा अजर घरमाहीं ॥
उनकी आज्ञा इन पर आवें । तब इन गरभ वास सो पावें ॥
तुम पर सदा कृष्ण असवारी । काहे न दाय़ा करहिं विचारी ॥
हम तो शब्द संदेशी आये । योनी संकट नहिं निरमाये ॥
तब हम उसको तत्त्व लखावा । होइ विदेह तब वचन सुनावा ॥
गरुड वचन
तबही गरुडे अस्तुति ठानी । तुम साहिब निर्गुण सहिदानी ॥
तुमहो प्रभू सगुण ते न्यारा । निर्गुण तत्त्व साहिब विस्तारा ॥
धरि अस्थूल मोहि दरश दिखावा । निर्गुण शब्द प्रभु मोहि सुनावा ॥
अब गुरु मैं बन्दों तब पायो । अब जाना प्रभु तुम्हरो भायो ॥
निज प्रतीति हमरे मन आऊ । हंसराज मोहि दरश दिखाऊ ॥
अब प्रभु मोहीं दर्शन दीजे । हंस उबार आपन करि लीजे ॥
भेद तुम्हार सकल मैं पाया । धरि स्वरूप तुम दरश दिखाया ॥
ज्ञानी वचन
देह धरी हम दरशन दीना । तब उन चरणबन्दना कीन्हा ॥
गरुड वचन
शीश नाइ चरणन लपटाये । अब साहब मोहिं लेहु बचाये ॥
सार्वी-निर्गुण प्राण अधार तुम, दरश दीन्ह प्रभु आय ।
आपन करि समझावहु, लेहु जीव मुकुताय ॥
गरुड़का ज्ञानीजीके आधीन होना
( ६८ )
गरुडबोध
ज्ञानी वचन—चौपाई
अहो गरुड तुम चीन्हा भाई । दे परवान लेऊँ मुकुतार्ई ॥
बाहर भीतर सबै बताओं । तुमसों गरुड कछू न छिपाओं ॥
अब तुम जाहु कृष्णके पास । आज्ञा मानिके करहु विलासा ॥
आज्ञा मांगि कृष्णसे आओ । तब आरति विस्तार बनाओ ॥
तबही गरुड गये पुनि तहवों । श्रीकृष्ण बैठे रहे जहवों ॥
जाइ गरुड तब विन्ती लाई ।
गरुड वचन श्रीकृष्ण प्रति
तुम प्रभु सदा संत सुखदाई ॥
हम यक निर्गुण भेद जो पाया । ताका हम प्रभु विन्ती लाया ॥
ओय कबीर सत्यलोकसे आये । तिन मोहि भेद कही समझाये ॥
उन अन्तर नहिं ऐसो दिढावा । निज साहब नहिं पृथ्वी आवा ॥
नाम कबीर उन आप धराया । यह शब्द उनही भाष सुनाया ॥
निर्गुण भेद सबनते न्यारा । अस उन हमसो कीन्ह पुकारा ॥
जो मोहि आज्ञा करो गुसाई । तौ उनको गुरु करिये जाई ॥
दाया करि मोहि आज्ञा दीजै । सो हममानि अपन फिर लीजै ॥
श्रीकृष्ण वचन
सुनिके कृष्ण उतर तब दीन्हा । भले गरुड तुम उनको चीन्हा ॥
भले गरुड तुम पूछा आयी । दुविधा दुर्मति कपट नशायी ॥
जो यह भेद गुप्त करि रखते । हमसों तुमसों अन्तर पढ़ते ॥
जो तुम हमसों पूछो भाई । उनकर भेद है अगम उपाई ॥
वह निर्गुण हम सर्गुण भाई । निर्गुण सर्गुण बहु बीच रहाई ॥
हम सर्गुण कई बार औतारा । वह साहिब है सबते न्यारा ॥
जाकर पठाये वह यहाँ आये । तिनही पुनि हम कहँ निर्माये ॥
उन आज्ञा जब कीन्ह उचारा । तब हम लीन जोइनि औतारा ॥
जो कबीर अहहीं अर्थाई । सोई वचन सत्य है भाई ॥
बोधसागर
( ६९ )
गरुड वचन
गरुड कहे तब काहे न भाषा । कैसे मोहि छिपाइके राखा ॥
निर्गुण भेद प्रभु मोहि छिपायी । सगुण भेद दीन्हा फैलायी ॥
श्रीकृष्ण वचन
सुनो गरुड यक शब्द निदाना । निर्गुण भेद कोइ विरले जाना ॥
देह धरी हम क्रीडा कीन्हा । यहै मानि सब काहु लीन्हा ॥
हम गीता महँ सन्धि जनाई । ताको कोइ न चीन्हे भाई ॥
निर्भय भक्ति कह्यो परमाना । ताकर भेद काहु नहि जाना ॥
पठि गीता पण्डित बौराये । अर्थ भेद को गम नहि पाये ॥
पठि गीता औरहि समुझावे । आप भरममें जन्म गमावे ॥
करै अचार छूतिकै माने । औरनको हीनहि करि जाने ॥
सर्वमयी हमहीं सब माहीं । पण्डित अँधरे समुझत नाहीं ॥
हम सबमें सब हमरे माहीं । हमते भिन्न कोइ जानत नाहीं ॥
करै सो कौन अचार बिचारा । पण्डित भूले धरि हँकारा ॥
सर्वमयी है नाम हमारा । पण्डित अर्थ न करै विचारा ॥
कहि गीता हम सब समझायी । गीता पढ़ै समुझि नहि जायी ॥
कब हम पूजा नेम बतावा । कब हम जीव घात फरमावा ॥
ब्रह्मा विष्णु और शिव कहवाये । इन तीनों मिलि बाजी लाये ॥
तेहि बाजी अटका सब कोई । निर्गुण गमि कैसे के होई ॥
बाजी लायके जग भरमाया । निर्गुणकी गति काहु न पाया ॥
जो जो कछु हम कहा उधारी । सो काहु नहि दृष्टि निहारी ॥
हम जानहि सब भेद अवगाहा । और देव नहि पावहि थाहा ॥
ब्रह्मा विष्णु शिव बाजी लाये । उन काहु नहि और सुहाये ॥
अपस्वारथसों बहुविधि लीन्हा । परमारथ काहु नहि चीन्हा ॥
गीता मथी कही समझायी । सो अर्जुन नहि जानी भाई ॥
चारि वेद मथि गीता कही । सो अर्जुन निज मानी सही ॥
श्रीकृष्णका गरुड़को कबीर साहबको गुरु बनानेकी आज्ञा देना
( ७० )
गङ्गबोध
श्रवण लगाय गीता उन सुनी । रहनि गहनि एको नहिं गुनी ॥
रहनि गहनि उनहुँ नहिं पायी । अर्थ सुनी सब कान उडायी ॥
सुनि सुनिसो सब जग अरुझावे । सांचा भेद न कोई पावे ॥
उनहुँ अचार विचार न छूटा । ब्रह्मा विनशे यम सो लूटा ॥
श्रवण अवाज सबहिंकी लीन्हे । रहनी गहनी कोइ न चीन्हे ॥
अहमेव कीन्हो अधिकारा । ताते जाहि गले सोहि मारा ॥
करै विचार पाखण्ड छूटे । भर्म विगुर्चन यमकी लूटे ॥
पण्डित बाँचि गीता अथावे । गीता केर अर्थ नहिं पावे ॥
फिर फिर हमहीं को ठहरावे । पंडित अँधरा भेद न पावे ॥
सुनहु गुरुड यक शब्द हमारा । होय निर्गुण जिव केर उवारा ॥
हम कबीर कै निज करिजाना । उनहीं सकल कीन मण्डाना ॥
उन्ही सब अस्थान हटाया । जहाँ ले तीर्थ तिन सबहि गढाया ॥
जहाँ जहाँ उन चरण छुआया । सोइ सोइ तीर्थ अस्थान बनाया ॥
आपु जानिके चर्ण जो दीन्हा । यहि विधि सबको थापन कीन्हा ॥
वही मानि सब काहु लीना । आप गुप्त होय काहु न चीना ॥
इन सबही मिलि बाजी लायी । आप आपकी कीन बढाई ॥
जिनकी आज्ञा सब कछु भयऊ । तिनको छिपाये तीनों दयऊ ॥
सारखी-कहैं कृष्ण कबीरसों, गुरु तुम करो कबीर ।
हंस लै जइहैं लोक के, खेइ लंगैहैं तीर ॥
चौपाई
चरण टेकिके गुरुड रिगायी । कीन्हो भेंट द्वारका जायी ॥
वृन्दावन होय आज्ञा लीन्हा । दर्शन जाइ द्वारका कीन्हा ॥
चरण टेकि प्रदक्षिण दीन्हा । मस्तक नाइ बन्दगी कीन्हा ॥
समरथ कहो मोहि समझायी । आरति साज मैं लेउँ मैगायी ॥
तब हम उनपै पूछे लीन्हा । कहो कृष्ण आज्ञा कस कीन्हा ॥
गरुड़का आरतीका साज इकट्ठा करना
बाधसागर
( ७१ )
गरुड वचन
तबही गरुड कह्यो अर्थाई । अस्तुति कीन्ह बहुत लौ लाई॥
एको बात गोंय नहीं राखी । कृष्ण बहुत कै अस्तुति भाखी॥
निर्गुण के हम गम्य न जाना । बहुत भाँति उन गम्य बखाना॥
उनतो निर्गुण गम्य बतावा । ब्रह्मा विष्णु शिव पार न पावा॥
औ हम उन कहँदल जो दीन्ह। उन आवे की आज्ञा कीन्ह। ॥
सत्गुरु वचन
तब हम उनको भेद बतावा । एकोत्तर से नरियर फरमावा ॥
बहुत जतन कै मंडप छावा । बहु अतुरागी साज सजावा ॥
जेतके साधु द्वारका आया । सबको गरुड कानि बुलवाया ॥
जेतिक साधू तहाँ रहाये । गरुड सबहिंको दल पहुँचाये ॥
जहाँ ले सुनि हैं सहस अठासी । नाग लोकके नाग जो वासी ॥
वासुकि देव जो आपु रहाये । औरो नाग बहुत चलि आये ॥
आय विष्णु ब्रह्मा दोउ भाई । शीव आय बहु तेज जनाई ॥
सब पर तेज महादेव कीन्ह। तुम सब मिलिके गरुडहि चीन्ह। ॥
तबहि गरुड पूछा सहिदानी । जोई कृष्ण कहा मोहि बानी ॥
गरुड वचन
सुनहु ब्रह्मा विष्णु मदेशा । यह मुहि कृष्ण कहा उपदेशा ॥
एति समय बीति जब जायी । तब हम तुमसों कहब बुझायी ॥
जोइ कृष्ण सब कहा विवेकी । सो तुम्हरी मति आँखिन देखी ॥
महादेव वचन
यह सुनि महादेव रिसियाने । हमरी गति तुम काहु न जाने ॥
हम तीनों हैं त्रिभुवन राई । हमहीं छोड़ि अवर चित लाई ॥
तुम हैं पंछी मतिके हीना । हमहिंछोड़ि औरहिं चित दीना ॥
महादेवका बोध करना और गरुड़का उन्हें समझाना
( ७२ )
गरुडबोध
गरुड वचन
तबही गरुड कहे समझायी । मति हमारि कोइ विरले पायी॥
अजर अमर घर पहुँचे सोई । मती हमार लखै जो कोई ॥
अवसर वीति जबै यह जायी । तब महादेव हम कहब बुझायी॥
सब साधुन की करिये सेवा । यह निज आहि भक्तिको भेवा॥
सबको गरुड जो भोजन दीन्हा । बहुत यतनकै भक्ति सो कीन्हा॥
करि प्रसाद जब माँड मैडायी । हमसे पूछी विन्ती लायी ॥
तबहि गरुड विन्ती अनुसारी । चलिये समरथ चौक विस्तारी॥
धर्मदास सुनि चौका कीन्हा । लोक समान पयाना दीन्हा ॥
संत समाज सब गावहिं गाजी । ऐसी भक्ति भक्त भल साजी ॥
बजो शंख वीन स्वर सोई । झांझन केरी बाजन होई ॥
ताल मृदंग गगन सो बाजै । ऐसी भक्ति भक्त भल छाजै ॥
शब्द स्वरूप तबै हम भयऊ । तुरत जाइ सत्यलोकहि गयऊ॥
सकलो साज वहां ते आना । बहुत भाँतिकी भक्ति जो ठाना ॥
सत्यलोक ते उतरे अंशा । अधम कालका भया विध्वंशा॥
सब समेत साज जो आये । जग मग ज्योति बरनिनहिं जाये
निर्गुण भक्त हो सुरति संजोई । कौतुक देखि रहे सब कोई ॥
नाग लोक को कीना मोही । ऐसी भक्ति न देखी कोही ॥
शेषनाग भये आपु मोहाने । औरकी बातें काहि बखाने ॥
मोहे ब्रह्मा विष्णु महेशा । नारद मोहे शुकदेव शेशा ॥
गण गंधर्व मोहे सब झारी । निर्गुण भक्ति न परे विचारी ॥
मोहे कृष्ण द्वारका वासी । मोहे सकल सिद्ध चौरासी ॥
यह समाज सो कैसो आई । ताहि देखि सब रहैं झँवाई ॥
ताते रंग उठे ततकारी । मोहि रहे सब सभा विचारी ॥
मोहे विष्णु वैकुण्ठके वासी । मोहे इन्द्र रुद्र लोक कैलासी ॥
गरुड़की आरतीमें सब देवोंका आना और गरुड़का परवाना लेना
बोधसागर
( ७३ )
मोहे इन्द्र और उरवशी । नौ लख तारा सूरज शशी ॥
यहि विधि कीन्ह भक्ति मनलायी । तनमन सुधि सकलौ बिसरायी ॥
साखी-तेतीस कोटि देवता, गण गन्धर्व सब झार ।
सुर असुर सबही थके, लीला नाम अपार ॥
चौपाई
धन्य धन्य सब करहिं पुकारा । धन्य गुरुडजी ध्यान तुम्हारा ॥
धन्य कबीर जिन भक्त उधारा । भक्ति ज्ञान का कीन पसारा ॥
धन्य गुरुड सबही अस कीन्हा । ऐसी भक्ति हृदय चित दीन्हा ॥
भक्ति मंडान पहर दोय भयऊ । तहैं हम उठिके आरति कियऊ ॥
आरति भइ पुनि बहुते भांती । बरणि न जाय शोभाकी कांती ॥
एकोतर नरियर मालुम कीन्हो । बाँटि प्रसाद सबनको दीन्हो ॥
सत्य सत्य सबन मिलि कीन्हा । धन्य गुरुड तुम यह मति लीन्हा ॥
गुरुड वचन
विन्ती करै गुरुड चित लायी । सबसे करब हम चर्चा जायी ॥
दया करहु हम पैं गुरु देवा । तीनों देव सो कहिहो भेवा ॥
हम तो चरचा करब गुसाई । हमको दो लखाइ सब ठाई ॥
ज्ञानी वचन
अहो गुरुड तुम हौ बड ज्ञानी । विद्या देहु सब घरके जानी ॥
घर आयेसे राड न कीजै । क्षमावंत हो बिदा सब कीजै ॥
बिदा देहु सबही सावधाना । तिनके घर तुम करिहो ज्ञाना ॥
अस्तुति ठानि चले सब देवा । धन्य कबीर देवनके देवा ॥
साखी-कहैं कबीर धर्मदाससे, यहि विधि आज्ञा लीन ।
अपने अपने लोक को, सबही प्याना कीन ॥
चौपाई
सबको बिदा जबहि करि दीन्हा । तबहिं गुरुड अस कहबे लीन्हा ॥
गरुड़का त्रिदेवसे चर्चा करने जाना
( ७४ )
गरुडबोध
गरुड वचन
हमको हुक्म तुम देहु गुसाईं । तुव प्रताप करौं बडाईं ॥
तुमरी कृपा काल हम जीता । सबही भांति छुटी मन चीता ॥
तुमरी दया आश सब झूटी । भया निराश तब फन्द़ा टूटी॥
अब मनमें मोहीं यक आवै । चरचा करनकौ मनमें भावै ॥
जो आज्ञा हम तुम तुमरी पावै । फिरि सर्बहिं सो चर्चा लावै॥
त्री देवन सों कहूँ बुझायी । तिन कर फँद सब देहुँ तुडायी ॥
ज्ञानी वचन
तब हम तिनको बहु समझावा । निर्गुण सगुण सब भेद बतावा॥
पाईं भेद गरुड मनसाने । त्रिदेव सो चरचा मन आने ॥
तब हम आज्ञा तेही दीना । हमहू बिदा तहाँ से लीना ॥
साखी-दया लेइ गरुड चले, हृदये धरि गुरु ज्ञान ।
ब्रह्मपुरी ठाढे भये, चर्चा कर मन ठान ॥
चौपाई
हुते द्वारका ज्ञान मडाना । गरुड वहाँते कीन्ह पयाना ॥
जाइ सुमेरु पर बैठे जायी । कीन्हो भेंट ब्रह्म सों आयी ॥
गरुड ब्रह्म लोकहि जब आये । ब्रह्मा आदर कीन्ह बनाये ॥
आदर भाव ब्रह्मा तब कीन्हा । डारि सिंहासन बैठक दीन्हा ॥
जल करजोरि ब्रह्म लइ आये । गरुड के चरण पखारन आये॥
ब्रह्मा वचन
धन्य गरुड यहाँ पगु धारी । अब पूरी सब आश हमारी ॥
तुमतो बाहन कृष्ण के भाई । आज कृष्ण पग धारे आई ॥
जो तुम हमपर दया कीन्हा । कृष्ण बदल हम तुमकर चीन्हा॥
आयसुमौंगिप्रसाद जो भयञ्ज । करि प्रसाद वैकुण्ठमें गयञ्ज ॥
पान फूल जो अगर मैगायञ्ज । इच्छा भोजन तहँवा पायञ्ज ॥
बोधसागर
( ७५ )
बैठे जाय पुनि गरुड समाजा । उठि तब चर्चा निर्गुण साजा॥
ब्रह्मा कह तुम कैसे आये । सो मोहि वचन कहो समुझाये॥
कौन काज यहाँ पगु धारा । कहे ब्रह्मा तुम कृष्णके प्यारा॥
गरुड वचन
तबही गरुड कहे समझायी । तुमहिं चितावन आयउँ भाई ॥
तुमहिं चितावन हौं पगुधारा । आदि पुरुष वह रहै नियारा ॥
साखी-विनु देखे को जाय यह, नहिं पावे कोइ ठाम ।
जन्म अनेक भरमत फिरे, मरे विनु गुरुके नाम ॥
आदि पुरुष आगम है, जाको सकल प्रकाश ।
निर्गुण भेद अपार है, तुम कहैं बांधी आश ॥
चौपाई
कोटिन ब्रह्मा गये सिरायी । अविगतकी गति काहु न पायी॥
कोटिन ब्रह्मा पृथ्वी विलाने । अविगतकी गति काहु न जाने॥
कोटिन विष्णू गये सिरायी । फिरि फिरिकै पृथ्वीहु विलायी॥
कोटिन रुद्र देह धरि लीना । अस्थिर होय जगत्सो कीन्हा॥
कोटिन इन्द्र अवतार जोलीन्हा । अविगति पुरुष काहु नहिं चीन्हा॥
गण गंधर्व नर कौन चलावै । सनक सनन्दन पार न पावै ॥
शेष नाग बहु भांति भुलाने । आदिपुरुषकी खबरि न जाने॥
सब परिवार जो भूले भाई । अवगति की गति काहु न पाई॥
भुला देखि जिव दथा न आई । जीव अनेक घात किहु भाई ॥
सब भूले कोइ लागु न तीरा । महा अधम सो आहि शरीरा॥
देह धरी सब भरमें आई । आपन आप सब करै बडाई ॥
अहमेव कैसे खोजेहु जाई । मांताको कहा न कीनेहु भाई ॥
१ जिन २ पुस्तकों में सृष्टि उत्पत्ति प्रकरणका वर्णन आया है, उन सबोंमें आद्याकी आत्माको न मान कर हठ करके ब्रह्माका निरंजन के खोजमें जानेका वर्णन आया है वहासे जानना चाहिये और यथार्थ भेद गुस्ते ।
( ७६ )
गुरुवोध
कीन्होखोज तुम आपुगुमाना । नहिं पाये तब रहे लजाना ॥
खोजकीन्हो जब अन्त न पावा । तब तुम आप आप ठहरावा ॥
आपु दृढाय थापना कीन्हा । सोई अहम् निर्गुण नहिं चीन्हा ॥
तुमरे भूले जगत भुलाना । आदिपुरुषको मर्म न जाना ॥
यहि विधि जग सब रहत भुलायी । टीका मूल काहु नहिं पायी ॥
तेतीस कोटी देव भुलाये । यहि भूले कोह गम्य न पाये ॥
सारखी-भूले गम्य न पाइया, भूले मूठ गँवार ।
टीका भूल न जानई, अरुझि रहा संसार ॥
चौपाई
तुम बाजीगर बाजी लाये । तुमतो सब दुनियाँ भरमाये ॥
ब्रह्मा वचन
सुनि ब्रह्मा तबहीं रिसियाने । हमते दूजा केहि को जाने ॥
गुरु वचन
सुनु ब्रह्मा यक वचन हमारा । तुम अस ब्रह्मा कोटि हजार ॥
कोटिन ब्रह्मा ठाढ़े द्वारा । कोटिन वेद सो करहिं उचारा ॥
खोज करन ब्रह्मा तुम गयऊ । कहूँ पिता के अन्त न पयऊ ॥
झूठ कहे मातासों जायी । ताते ब्रह्म शाप तुम पायी ॥
माता ते तुम भये लबारा । आय जीवमें सकल संसारा ॥
सबकी प्रतिमा थीर न आयी । आपु समेत सकलो भरमायी ॥
जो कोह कहै भूलकी वानी । कोटिन जन्म नरककी खानी ॥
यह संसार रहट की घरिया । कइक बार राजा अवतरिया ॥
कइक बार नरक में परई । कइक बार ब्राह्मण औतरई ॥
यहि विधि जीव आवे जायी । भरमि भरमि चौरासी पायी ॥
कोटिन बार अस्थावर जानी । कोटिन बार पिंडज उत्पानी ॥
कोटिन जन्म अंडज अवतारा । यहि विधि भरमहिं जीव विचारा ॥
यहि विधि भरमें जीव विचारा । विनु सतगुरु नहिं होय उबारा ॥
ब्रह्माका विमान भेजकर विष्णु और महादेवको बुलाना
बोधसागर
( ७७ )
साखी-कहे गरुड समझाइके, सुनहु ब्रह्म यह बात ।
अविगत पुरुष सु और है, जाके माय न तात ॥
ब्रह्मा-वचन चौपाई
सुनि ब्रह्मा तब पूछे बानी । कैसे अविगतिकी गति जानी ॥
कौनी युक्ति साच कै मानी । साहिबकी गति कैसे जानी ॥
गरुड वचन
गरुड कहै तुम आपही ज्ञाना । जहाँ गर्व तहाँ पुरुष छिपाना ॥
गर्व गुमान में जो है पूरा । रहै सदा सो धूर अधूरा ॥
साखी-मानुषदेह अपराधि है, देह धरे अभिमान ।
ताते सबै विगुचै, भक्ति मर्म नहिं जान ॥
चौपाई
भक्ति जो आदि अंतसे आयी । जाते सकल माँड निर्मायी ॥
ताकर मर्म जो जाने नायी । ताते काल फांस निरमायी ॥
साखी-लोक वेद जानै नहीं, करै भक्ति अभिमान ।
ताते सबै विगुरचे, भक्ति करन का जान ॥
ध्वजा जो फरके शून्यमें, बाजे अनहद तूर ।
तकिया है मैदान में, पहुंचेगा कोइ शूर ॥
ब्रह्मा वचन-चौपाई
ब्रह्मा कहै गरुड सुनु भाई । अपने मुख तुम करहु बडाई ॥
इतना ब्रह्मा किया विचारा । देव विमान तुरत भये ठाढ़ा ॥
कहे ब्रह्मा तुम जाहु विमाना । लाओ विष्णु बुलाइ सयाना ॥
चला विमान विष्णु पै गयऊ । तबहि विष्णु अस पूछनलयऊ ॥
कहो विमान कहाँ पगु धारे । सत्य सत्य कहो वचन सम्हारे ॥
विमान वचन
गरुड भक्त यक आया देवा । सो नहिं माने तुम्हरी सेवा ॥
( ७८ )
गरुडबोध
सुनते विष्णु विमान चढ़ाये । चढ़ि विमान ब्रह्म लोकहि आये॥
विष्णुपुरीसे विष्णु जब आये । बैठे जाय ब्रह्माके ठाये ॥
विष्णु वचन
केहि काज पर मोहि बुलायी । सो मोहि भेद कहो समझायी ॥
ब्रह्मा वचन
ब्रह्मा वचन कहै अर्थावै । कहै गरुड हम केहि चेतावै ॥
हमको मनुष्य देह करि जाने । आदि पुरुष औरै को माने ॥
भले विष्णु तुम आये भाई । अब शिवको तुम लेहु बुलाई ॥
गढ कैलास शिवका अस्थाना । तहाँको अब तुम जाहु विमाना ॥
सब देवनको आनु बुलायी । सुनहीं चर्चा गरुड की आयी ॥
महा विमान तुरत चलि गयऊ । गढ कैलास पर ठाढे भयऊ ॥
शिवशंकर को माथ नवायी । पाछे ब्रह्माका वचन सुनायी ॥
ब्रह्मा गरुड जहाँ झगर पसारा । तेहि कारण तुम सबके हँकारा ॥
ब्रह्मा विष्णु बैठे एक ठाई । कीन्ही चर्चा मंड मँडाई ॥
गरुड सबहि का करै उच्छेदा । सो मैं तुमहि बतायो भेदा ॥
बाजे डमरू हने निशाना । चले रुद्र तब साजि विमाना ॥
तुरत चले नहीं लाये बारी । चले रुद्र आये पगुथारी ॥
ब्रह्माको जहाँ भयउ उच्छेदा । बैठे जहाँ करे बहु भेदा ॥
इन्द्र लोक सो इन्द्र बुलाये । जेहि सँग देव सबै चलि आये ॥
सो सब चलि ब्रह्मा पहुँ आये । वासुकि देव जो आप रहाये ॥
आवत उनके नाग बहु आये । बहुते नागिन आयी बहुभाये ॥
सुर नर मुनि सब आनिबुलायी । जो जस आसन तस बैठई ॥
ब्रह्मा विष्णु बैठे यक ठावा । गरुड तहाँ पुनि ज्ञान सुनावा ॥
गरुड वचन
अविगतिकी गतिआहि निनारा । सब भूले कोइ पाउ न पारा ॥
ब्रह्मा और विष्णुकी बातचीत
बोधसागर
( ७९ )
ब्रह्मा वचन
ब्रह्मा कहै विष्णु सों बाता । गुरुडको ज्ञान सुनो विख्याता॥
हम तीनों अवरे नहिं कोई । हमरे परे सुनावै सोई ॥
ब्रह्मा कहै विष्णु सों बाता । हमको कहत है परलय घाता॥
हम तो तीन लोकको कीन्हा । हमको सकल देवता चीन्हा ॥
गुरुड वचन
तबहि गुरुड यक वचन उचारा । जब कर्ता तुम सृष्टि सव्वारा ॥
वह साहब सबही ते न्यारा । कस नहिं ताकर करो विचारा॥
जिन साहब तुम्हें निर्मायी । तुम कस ताको नाम छिपाई॥
विष्णु रहत हैं तुम्हरे पास । तिनहुं को पुनि काल गरासा॥
क्रोधवंत ब्रह्मा तब भयेऊ । अचरज बात गुरुड जो कहेऊ॥
जाकी तैं पुनि सेवा करई । सो तो हमरे त्रास महँ डरई ॥
सुर नर सुनि सब काहू चीन्हा । सुनु पंछी तैं मतिका हीना ॥
लोक वेद सब हम कहैं जाने । न जानूं कस आप चित आने॥
गुरुड वचन
सुनु ब्रह्मा तैं गर्व भुलासी । तोहि अस ब्रह्म कोटि मरासी॥
हम तो ब्रह्मा बहुत जो देखा । जी पूछहु तो काढों लेखा ॥
काढों विष्णु कोटि सै चारी । महादेव जाके भंडारी ॥
मैं तो भक्त कवीरका चेला । युगन युगन जिन कीन्हो मेला॥
हमसों कह्यो कवीर बुझायी । ताते आय कह्यो गोहराई ॥
ब्रह्मा वचन
ब्रह्मा कोपि उठे तब भाई । विष्णु महादेव सुनहुँ आई ॥
विष्णु वचन
आये दूनों जन ब्रह्मा ठाई । विष्णु कहै कस मता दिढाई ॥
काह आज जिव बहुत उदासा । कीन्हो क्रोध गुरुड के पास ॥
कहो वचन मुख होय प्रकाश । हम अजान है तुम्हरे आसा ॥
( ८० )
गरुडबोध
ब्रह्मा कहै सुनो हो भाई । अविगत की गति गरुड सुनाई॥
हमहीं तीन अवर नहिं कोई । चौथे एक निरंजन सोई ॥
ताको गरुड न माने भाई । ताते मोहि कोध भौ आई ॥
तिहि कारण हम तुम्हें बुलावा । गरुड ज्ञान हमहीं समझावा ॥
विष्णु वचन
विष्णु कहैं सुनो गरुड विचारी । आदि अंत कोई अगम है भारी॥
एक ध्यान हमहूं नहिं कीना । अविगति बात हमहूँ नहिं चीना॥
अहमेव मटी सुरत लगाया । अविगति ध्यान तबहूँ नहिं पाया॥
ध्यान मध्य हम देखा जाही । ब्रह्मा विष्णु महादेव नाहीं ॥
साखी-विष्णु नहीं ब्रह्मा नहीं, माहादेव नहिं कोय ।
ओम्ओंकार तहवाँ नहीं, निरखि देखा हम सोय ॥
ब्रह्मावचन-चौपाई
तब ब्रह्मा अस वचन उचारा । यह है बड़ा काल वटपारा ॥
विष्णु वचन
सुनु ब्रह्म अविगती कहानी । विना तत्त्व मैं निरखा बानी ॥
ताकी का कहिये अब वाता । अगम अपार कहूँ विरुगता ॥
साखी-निःकामी निध्यानि सोई, निज्जेमी निर्वान ।
कहै विष्णु ब्रह्मा सुनो, अविगति यहि विधि जान ॥
चौपाई
ब्रह्मासों कहै विष्णु बखानी । है कोई आदि पुरुष निर्वानी ॥
दुर्वासा संग रहे जब भाई । अविगतिकी गति तब हम पाई ॥
तबका बोल हम कीन्ह परमाना । ताते हम जानहिं निरवाना ॥
दुरवासा गुरुभक्ति दृढाया । तब ते हमहु परम पद पाया ॥
साखी-ब्रह्मा हमकहैं जानहुँ, और न कोई सांच ।
दृढा ज्ञान नहिं आवई, ताते काया कांच ॥
गरुड़ और महादेवका वार्तालाप
बोधसागर
( ८१ )
ब्रह्मा कहै सुनो विष्णु विचारी । हमही रचा पुरुष औ नारी ॥
हमते और कौन है भाई । सो मोहि भेद कहौ समझाई ॥
हम तो सर्गुण सकल पसारा । हमतो अगम निगम विस्तारा ॥
हमतो रचा पवन औ पानी । हम कहैं वेदव्यास बखानी ॥
हम चौरासी नाव जो कीन्हा । हम निर्गुण सरगुण चीन्हा ॥
इतनी कथा कहि ब्रह्मा सुनाई । तबहूँ गुरुड न मानैं भाई ॥
गुरुड वचन
कहै गुरुड सुनो ब्रह्म कुमारा । तुम कहैं रची सृष्टि करतारा ॥
सबको रची सबै जिन कीन्हा । वह तो पुरुष सबन ते भीना ॥
वह तो पृथ्वी पाँव न दीन्हा । शब्दहि ते सकलो जग कीन्हा ॥
जो आप रचना करि जाना । तो हमसे हठि भाषहु ज्ञाना ॥
जो तुम रचा पवन औ पानी । पृथ्वी अकाश तुमहिं जो ठानी ॥
रचा तुम्हार तब जानहिं भाई । अब रचहु तुम फिरि विनशाई ॥
जो तुम्हार है सकल बनाई । फिरिके परलय करहु तुम भाई ॥
तब हम जानहिं कीन तोहारा । यह मेटहु सकलो विस्तारा ॥
अपने हाथ रचै जो कोई । फिरिकै मेटि सके पुनि सोई ॥
तब ब्रह्मा सुनि रहे लजाई । सम्मुख उत्तर कह्यो न जाई ॥
महादेव वचन
कहे महादेव सुनो रे भाई । अचरज बात कही नहिं जाई ॥
सुनु ब्रह्मा गुरुड जो कहई । ताकर भेद कोई विरला लहई ॥
दश औतार विष्णु जो लियऊ । काया काल ब्रास जो कियऊ ॥
तबही कृष्ण भेद यक कीन्हा । ताको ब्रह्मा तुम नहिं चीन्हा ॥
गोपी ग्वाल सबै हरि लाये । तब जो कृष्ण सब दीन मेराये ॥
इतनी बात ब्रह्मा तुम नहिं जानो । अविगतिकी गति कैसे पहिचानो ॥
( ८२ )
गरुडबोध
सारखी-कौन सरूपी कृष्ण है, कौन धरे अनुमानु ।
देह धरे नहीं चीन्हहूँ, निर्गुण कैसे जानु ॥
चोपाई
निरगुणको गुण है बड भारी । जिन उत्पन्न कियो सब सारी ॥
वह तो पुरुष मूल है माथा । गति प्रतीति ताहीके साथा ॥
नहीं महात्म पुरुष की पूजा । जप तप संयम नाम विनु दूजा ॥
वार पार नाम नर सेई । अजर नामको सुमिरन देई ॥
बारहिं बार नाम लौ लावे । अजर अमर होय लोक सिधावे ॥
नाम सिखापन बदन सो खोले । विना नाम विनु महात्म डोले ॥
सतगुरु विना मर्म नहीं जाने । हमैं तुम्हैं सब जगत बखाने ॥
ब्रह्मा वचन
सुनो महादेव साँच बखाना । निर्गुणके गुण हमहूँ नहीं जाना ॥
अविगतिकी गति हम ना जानी । योगी जंगम सेविं हम जानी ॥
सुर नर मुनि सब हमको ध्यावें । हम उपजावें हमही विनशावें ॥
साखी-मैं उपजावों मैं विनसावों, मैं खरचों मैं खाऊँ ।
तीन लोक पैदा करें, मोर ब्रह्म है नाऊँ ॥
गरुड वचन चोपाई
ममताते नर नरकें जायी । ताते बहुरि बहुरि जन्मायी ॥
तुहि अब ब्रह्मा बहुत विचारा । ताते काया विनसे सब सारा ॥
तू ब्रह्मा अस जो धरे हँकारा । तेहिते काल भया वटपारा ॥
सुनु ब्रह्मा अविगति की बाता । एकै पुरुष एक है माता ॥
सुनहू सब सभा विचारो । यक मैं निरखिकहौं निरुआरो ॥
वहि साहबकी खबरि न पावा । तुव अस ब्रह्मा बहुत उपावा ॥
वही हम निरखि परखिके जानी । साहब शब्द लेहु पहिचानी ॥
१ ब्रह्मा शिवकी बातकी व्यंगसे हँसी करते हैं ।
तीनों देवोंका गरुड़से हारकर मातासे भेद पूछनेको जाना
बोधसागर
( ८३ )
साखी-कहो ब्रह्मका भूलहू, कहौं तोहि समुझाय ।
मोर मोर कै धावहू, ममता अमल चलाय ॥
चोपाई
ममिता ते दशों अवतारा । ममिता महादेव धरु छारा ॥
ममिता लोमश योग जो कीन्ह। आयु बढी भगती नहिं चीन्ह।।
ममिता ते आपुहिं जो रहेऊ । ममिता ते तीन लोक बहि गयऊ।।
ममिता तेज निरञ्जन कियऊ । ममिता ते पुरुष दरश नपयऊ।।
तुम ब्रह्मा कीन्हे अभिमाना । तेहिंते साहब अछय छिपाना ॥
साखी-ब्रह्मा गर्व तुम कीनिया, सुनि राखू यक बात ।
जो साहब अभि अंतरे, सोई सदा सँघात ॥
तुम अज्ञानी नहिं जानहू, सुनु ब्रह्मा यक बात ।
अविगति अगम अपार है, समरथ सदा सँघात ॥
विष्णु वचन-चोपाई
विष्णु कहैं सुनो हो भाई । चलहू तुरत ज्योति पहुँ जाई।।
ज्योति कहैं सो सुनिये भाई । सब मिल चलहु साँचके आई।।
आंखिन देखी पूछि न जाई । पाय अभिमान चीन्हे नहिं पाई।।
अभिमान मता सब दूर दीजे । साँच बस्तुको धारण कीजे ॥
अभिमान समेत चीन्हे नहिं कोई । देह धरी सब गये विगोई ॥
आपा थापि सुधि बुधि खोई । आपा छोडे पावे सोई ॥
महादेव वचन
तब महादेव कहैं विचारी । अहो विष्णु पूछहु महतारी ॥
जो वह कहैं सो हम तुम मानैं । औरी बात नाहिं हम जानैं ॥
ब्रह्मा विष्णु से हुई यह बात । तुम बडे हो कि बडी है माता ॥
सबै मिली तब कीन्ह पयाना । जाइ माता ढिग कीन्ह बयाना ॥
बोलहु माता सत के भाऊ । नहिं अरुझावहु भाषि सुनाऊ ॥
( ८४ )
गरुडबोध
तीनों देव कहैं सुनु माता । और कौन पुरुष आहि विधाता ॥
हम तीनों कि और है कोई । यह निज भेद बतावहु सोई ॥
माता वचन
तब माता बोले हितकारी । कस न ब्रह्मा करहु विचारी ॥
जब तुम हते हमारे पास । तब तुम कौन पिता की आसा ॥
तबकी बात विसरी तुम गयऊ । पुरुष ते विमुख तुम भयऊ ॥
पुनि माता यक वचन अनुसारी । महादेव ही कृतम भिकारी ॥
अमर वचन जो हमहीं भाखा । युग चारों देह अमर राखा ॥
सोई वचन भूलि जो गयऊ । मातु पिता सो अंतर लयऊ ॥
पुनि माता गरुडसे बोली । अमृत वचन रसाल अति खोली ॥
कहे माता सुनु गरुड सुजाना । तुमतो वचन कही परमाना ॥
गरुड वचन
गरुड तब पूछे ज्योतिसों बानी । कैसे तुम यह सिरजा खानी ॥
माया वचन
तब उन कहा पुरुष सों बानी । पावक नीर पवन वैसानी ॥
जल रंग अंश सो साथहि रहई । ताकी खबरि कोई नहि लहई ॥
प्रथम अंशजल रंग जो कीन्हा । तब जलसिन्धुनाम कहि दीन्हा ॥
सारखी-ब्रह्मा विष्णु कोई नहीं, महादेव भी नाहिं ।
पुरुष एक तब अविगति, अगम अगोचर माहिं ॥
ब्रह्मा वचन चौपाई
कहे ब्रह्मा हम आपु प्रकाशा । हम पुहमी नौ खण्ड निवासा ॥
हम हैं नीर हमहिं हैं पवना । हमहीं रचा सकल सब भवना ॥
हमहीं पांच तत्त्व सब कीन्हा । हमहीं आप सृष्टि रचि लीन्हा ॥
हमहीं सकल सृष्टि विस्तारा । हम कर्ता है सकल पसारा ॥
हमहीं चन्द्र सूर दिन राती । हमहीं कीन्ह किरतम उत्पाती ॥
हमहीं आदि अंत मधि तारा । हमहीं अंध कूप उजियारा ॥