कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
ज्ञानसागर
( ६३ )
रानी शब्द विरहुली भाखा । दूर दूर सबदिन को राखा ॥
रानी क्रोध बहुत तब कीन्हा । बहुत होय नृप अति आधीना ॥
अरे भाई मम प्राण प्यारी । यही बार तुम लेव सम्हारी ॥
सृष्टित रानी सब चलि आये । जाग्रत जान के सबै सिधाये ॥
तक्षक विष नहि लाग्यो नारी । अंतक दूत रहे सब हारी ॥
साखी-रानी उठि ठाढ़ी भई, राजहि हरष अपार ॥
सुमिरन हम को कियो, धन्य है गुरु हमार ॥
चोपाई
तक्षक राव तब आये जहवां । ब्रह्मा विष्णु महेश्वर तहवां ॥
विष को तेज शब्द सों जांता । सुनिके विष्णुहिं भयी तब चिंता ॥
धर्मराय का तुरत हंकारा । यम दूतन को जो सिरदारा ॥
ताका हरि अस मता सुनावा । करियो सबै तुम सेतहि भावा ॥
आने छलिकैं जो नृप नारी । निश्चय आज्ञा आहि हमारी ॥
सुनिके दूत भेष कियो रंगा । अपन कीन्ह सब सेतहि अङ्गा ॥
आये दूत नगर नियरावा । रानी ऐसा सपना पावा ॥
आये गुरु ज्ञानी जो हमारे । बोलत अमृत वचन सुधारे ॥
ज्ञानी वचन
सुन रानी तोहि भेद बताऊं । काल चरित्र सब तोहि सुनाऊं ॥
छलबे अइहैं ताहि सम्हारो । सेत रूप जिन भाव विचारो ॥
साखी-मस्तक ऊंचा कालका, चित्तमें गुणका रंग ॥
यही चिह्न तुम चीन्हियो, और सेत सब अंग ॥
चोपाई
भये प्रभात काल तब आवा । सेत रूप सब अंग बनावा ॥
आये जहां तहां नृप नारी । तिनसौं ऐसो बचन उचारी ॥
चीन्हत है कै नाही रानी । मरदन काल आइस मैं ज्ञानी ॥
( ६४ )
ज्ञानसागर
मैं तो तोकहँ दीक्षा दीन्हा । तक्षक डसै तोहि कहँ लीन्हा ॥
तब तोहि मंत्र दियो मैं सोई । कालको अजय जाहिते होई ॥
तँ पुनि तैसो तत्त्व विचारा । हर्षत भये तब धनी तुम्हारा ॥
बेगी चलो गहर जिन लाओ । प्रभु को दरस तुरत तुम पाओ ॥
इंडु मती सपना जो देखा । बैसो देखो ताकर रेखा ॥
तीनों गुण चक्षु मैं राता । और पुन देखो ऊंचा माथा ॥
और स्वेत सब देख्यो अंगा । पाइ प्रतीत स्वप्न परसंगा ॥
अरे काल तँ क्या ठग मोही । हंस रूप नहि छाजै तोही ॥
यह छल मता न लागु तुम्हारा । है समर्थ बड़ गुरु हमारा ॥
साखी- मम गुरुकी परतीत यह, धरनी धरै न पांव ॥
काग न होय मराल सम, यह छति तोहि न भाव ॥
चोपाई
सुनिके दूत कीन्ह तब रोषा । इन्दुमती को दीन्ह सो दोषा ॥
तिन पुनि सुमरे अपने स्वामी । भक्त हेतु चले अन्तर्यामी ॥
ज्ञानी आवत काल पराना । ता कहँ लै पुनि लोक सिधाना ॥
धन्य भाग तिन रानी केरा । ज्ञानी आय काल सों फेरा ॥
रानी मानसरोवर आई । अमी सरोवर ताहि दिखाई ॥
कबीरके सागर पांव परो जबही । सुरति सागरे पहुँची तबही ॥
पहुँचत तासु हंस हरषाने । सबमिलिकीन्हतासु सन्माने ॥
सतगुरु दायी कीन्ही जबही । पोडशा भानु रूप भयो तबही ॥
भयो हर्ष रानी अति शोभा । राजा लग्यो करन अति क्षोभा ॥
हे सतगुरु मे तुम बलिहारी । राजहि आनो पतहि हमारी ॥
सतगुरु कहैं सुन संत सुजाना । राजा भाव भक्ति नहि जाना ॥
आ तोहि भयो हंसको रूपा । कारण कवन चहै तू भूपा ॥
ज्ञानसागर
( ६५ )
साखी-राजा भक्ति न जानही, तातें हंस न आव ॥
विना तत्त्व नहिं हिरम्बर, हंस न होय भुक्ताव ॥
चौपाई
हे स्वामी मैं भव जब रहिया । राजा भक्ति न वरजै कहिया ॥
है संसार का ऐसा भाऊ । पुरुष पराय ध्यान नहिं आऊ ॥
जो कोइ राते त्रिया बिरानी । ताकी करै सवै मिलि हानी ॥
छोटे बड़े को यह व्यवहारा । धन्यनृपति जिन ज्ञान विचारा ॥
करों साथ सेवा मैं जबही । राजा मोहि न वरजै कबही ॥
जो राजा अटकावत मोहीं । कैसे भेटत तब मैं तोहीं ॥
धन्यनृपति जिन भक्ति हटावा । आनिय ताहि हंस पति रावा ॥
सुनि ज्ञानी ताही की वाता । चले तबहि तहँही बिहँसाता ॥
आये भवसागर जब ज्ञानी । यहाँ नृपति की अवध खुटानी ॥
आये लेन ताहि यमदूता । राजहि कष्ट जो देत बहुता ॥
साखी-हंस ताको नहिं पावे, घेर रहो जो राव ॥
राजा परो अगाध में, सतगुर को गुहराव ॥
चौपाई
राजा तत्त्व मता नहिं चीन्हा । ताते यम राजन दुख दीन्हा ॥
पावे यम नहिं छाड़े ताही । भक्ति योग जो ऐसो आही ॥
तब ज्ञानी आये तेहि ठाई । देखत जीव बहुत संकाई ॥
ज्ञानी लीन्ह जीव कर आगे । देखत दूत ताहि सब भागे ॥
दूत चहुँ दिशि देखत जावैं । मरकट दृष्टि पक्षि नहिं पावैं ॥
जस आकाश कहैं जाय पखेरू । मरकट दृष्टि आये सत हेरू ॥
ऐसे ताहि दूत गुहरावैं । नहिं जब देखैं तब पछतावैं ॥
जहाँ लगि गम तहैं लग हेरा । आगे देखा धुन्ध कुहेरा ॥
हंस गये जब लोक द्वारा । रूप अनूप देख उजियारा ॥
गये नृपति हंसन की पांती । ता मध्ये पुन जइस अजाती ॥
( ६६ )
ज्ञानसागर
साखी-रानी चीन्हौ नृपति को, आन धरे तब पांव ॥
नृप मन में बहु संकुंचै, लज्जा ताहि जनाव ॥
चौपाई
कह रानी सुन साधु भुवारा । चीन्ह नृपति मैं हौ तुम दारा ॥
इन्दुमती है मेरा नाऊँ । यहि कारण टेक्यो तुव पाऊँ ॥
राव कहे कि म करो प्रमाना । बर्ण तुम्हारो हंस समाना ॥
शोभा बहु देखौ तुम अंगा । कैसे तोहि कहौ अर्धगा ॥
हंस करुणामय वचन उचारा । निश्चय मानो वचन हमारा ॥
हंस रूप होवे नर नारी । जिन भवसागर भक्ति विचारी ॥
नृप को भयो हंस का भावा । जिन पुनि ऐसी शोभा पावा ॥
भुई में रहै जो अंतक दूता । तिन पुनि विस्मय कीन्ह बहुता ॥
दूत चलि गये जहैं त्रिय राऊ । तिनसों जाय कहचो सत भाऊ ॥
स्वामी श्वेत वरण यक आवा । रानी नृप लेह लोक सिधावा ॥
कैसो लोक ब्रह्मा पर जरेऊ । जरत हुताशन जनु घृत परेऊ ॥
चलो हरी हर संग हमारे । जहँवा राजा रानी सिधारे ॥
चले वेग तब तीनों भाई । बाहन साज चले तिय राई ॥
साखी-सुम्मेरते ऊँचे गये, तब देखा अँधियार ॥
नव खंड महि तब छाँड़िके, आगे को पगधार ॥
चौपाई
पहुँचे विषम सरोवर जाई । बिजुली हुओ ह्यां अन्याई ॥
ब्रह्मा शिव बाहन थकि गयऊ । सतगुन तेज विष्णु का भयऊ ॥
अलख निरंजन भयो तिहिठाऊँ । औ देवी तें आशिष पाऊँ ॥
तेहि ते विष्णु गो अँमर जहँवा । कामिनि मान सरोवर तहँवा ॥
देखत रूप विष्णु मन भूला । श्वेत पुष्प पद्म जस फूला ॥
कामिनि मान सरोवर राजै । जुत्थ जुत्थ जोड़ भल साजै ॥
कलियुग में कबीरसाहबका प्रगट होना
ज्ञानसागर
( ६७ )
न अध्यान तहाँ तिन्ह लागी । सत्त सुकृत बोले अनुरागी ॥
सब मिलि भयो अचंभो वाता । ऐसा अचरज नरको वाता ॥
कोइ कहे नर देख पखेरू । ऊँची दृष्टि सबै मिलि हेरू ॥
वेग निकारी यहाँते आजू । रहन न पावे करौ सो काजू ॥
साखी-दोई सठहार जो भेजे, नर से कहो बुझाय ॥
छांढौ मान सरोवर; यहाँ नहीं तुव ठाय ॥
चोपाई
प्रतिहारन तब आज्ञा कीन्हा । तिनसोंहरि अस बोलन लीन्हा ॥
देखा चाहों तुम पुर पाटन । हे प्रभु भेद कहो कछु आपन ॥
तब प्रतिहार कहैं समझाई । नरको रूप दरश नहिं पाई ॥
जौ लग बीरा नाम नहिं पावे । सो जीव कैसे लोक सिधावे ॥
भयो जो बड़ो निरंजन राऊ । तेऊ यहाँ रहन नहिं पाऊ ॥
जा तू विष्णु कहा सुन मोरा । नातर चक्षु हीन होय तोरा ॥
चले विष्णु तब लागि न बारा । हरि कमलासो मंत्र विचारा ॥
यह कछु बात अचंभो आही । कहत न बने रूप मोहि पाही ॥
देख सठिहारन बेग निकारा । चले जीव जहाँ राज तुम्हारा ॥
अचरज बात कही नहिं जाई । धन्य पुरुष जिन लोक बनाई ॥
जब मैं ध्यान धरा प्रभु केरा । अलख रूप देखौ बहुतेरा ॥
ऐसा रूप कहुं नहिं देखा । अचरज भयो नजाय विशेषा ॥
साखी-चले ब्रह्मा हरि शंकर, छाडि लोकके खोज ॥
बस शशि के परभावतें, सकुचन होत सरोज ॥
कलियुगमें कबीर साहिबका प्राकट्य-चोपाई
सतयुग त्रेता बीत जब गयऊ । कलियुगको प्रभाव तब भयऊ ॥
छाडयो लोक लोककी काया । प्रथमहि मान सरोवर आया ॥
जगन्नाथके मन्दिरकी स्थापना
( ६८ )
ज्ञानसागर
पाँच तत्त्व तीन गुण साना । त्रिगुण रूप कीन्ह उत्पाना ॥
रूप मनुष्य सुदेह सम्हारा । नहिं लेई अहार व्यवहारा ॥
जो कोइ ये विधि करै उछेदा । सो तो है करता को भेदा ॥
करता देह तबै निरमावा । तामहिं तत्त्व प्रकृतिहि स्वभावा ॥
आयो निरगुण काछ शरीरा । आवा गमनकी भेटन पीरा ॥
जगन्नाथके मंदिरकी स्थापना
प्रथमहि आयो सागर तीरा । जगन्नाथ जहाँ काछ शरीरा ॥
जाते परम वचन मैं हारा । बाजी मांड किया प्रति पारा ॥
आसन बेल तीर मैं लीन्हा । सो स्वरूप काहू नहिं चीन्हा ॥
आया राम विप्रके रूपा । तासों कथि कह्यो अंजगूता ॥
साहित्य कबीर वचन
साखी-वाचा वंघ मैं आइया, मंडप उठि है तोर ॥
मान त्रास सिंधू जवे, दर्शन देखौ मोर ॥
चौपाई
तो कहैं थापौ वचन प्रवाना । तीन लोक तुम करत बखाना ॥
तो परसै को कहा अधिकारा । सोई कहौ तुम बौद्ध विचारा ॥
बौद्ध वचन
मन वच क्रम परसै जो मोई । कोटि जन्म लगि विप्र सोहोई ॥
औ पुनि विद्या औ धनवंता । यहि मुनकै जो भयो हरषंता ॥
साहित्य कबीर वचन
आवा गवन निरवारन आयो । सत् शब्द ते जीव छुड़ायो ॥
जो बहु जन्म थाकौ तुहि पाहीं । कैसे जीव लोक तब जाहीं ॥
बिना नाम नहिं जीव उबारा । कहि अब भाखौं कलु उपचारा ॥
मारकंठे तर जाइ नहाई । अस हँस बोले त्रिभुवन राई ॥
ज्ञानसागर
( ६९ )
अक्षैबट कृष्णरोहिणी अस्नाना । इन्द्र दमन समुद्र अस्थाना ॥
यहि विधि तीर्थकरे मन जानी । पुनर्जन्म ना होवे प्रानी ॥
सार्वी-हँसे कृष्ण छल मता कहि, जिमि माहुरको मीठ ॥
अस पुरुषोत्तम क्षेत्र फल, ज्ञानवन्त कहैं दीठ ॥
चौपाई
समाधान हरिको जब कीन्हहा । आसन उदधि तीर में लीन्हहा ॥
चौरा कीन्ह तहाँ पुन जाई । इन्द्र दमन तब आज्ञा पाई ॥
जबहीं मंडप काम लगावा । सागर उमँग खसावन आवा ॥
उठावहु मंडप करि निःशंका । उदधि त्रासकी मेटव शंका ॥
आयो क्रोध लहर जब पानी । मेटचो पुरुषोत्तम सहिदानी ॥
लहर उमंगी सागर तीरा । आय जहां तहैं सत्त कबीरा ॥
देखत दरस महा भय मानी । बोल्यो वचन जोर युग पानी ॥
हे स्वामी तुव मर्म न जाना । जगन्नाथ वर किया पयाना ॥
क्षमौ अपराध मोर प्रभुराया । लेउ बैर अस कीजै दाया ॥
तासों पुनि अस वचन उचारा । बोर द्वारिका बैर तुम्हारा ॥
सार्वी-राम रूप सागर बँध्यो, तातैं उदधि उमंग ॥
बोरौ नगर द्वारका, भयो रुचिर परसंग ॥
चौपाई
तब तैं उजर द्वारका भयऊ । पंडनको तब स्वप्ना दयऊ ॥
आये मोपर साहिब कबीरा । आवा गमनकी मेटन पीरा ॥
ऐसा स्वप्न पंडन दीन्हहा । तीर्थ स्नान तेहि सब कीन्हहा ॥
उठचो जो मंडप बाज बधावा । कनक उरे नहिं हाथ बनावा ॥
एक दिना कौतुक अस भयऊ । सागर तीर पंडा चलि गयऊ ॥
करि असनानचलो मंडप पासा । मनमें ऐसा वचन प्रकासा ॥
प्रथमहिं चौरा म्लेछ को गयऊ । ठाकुरके नहिं दर्शन कियऊ ॥
( ७० )
ज्ञानसागर
तेहिके मन पाखंड जब देखा । किय कौतुक सो कहौं विशेषा॥
जहँ लग मंडप पूजहि बीरा । तहँ लग देखहि रूप कबीरा ॥
गयो जहां कठ मूरत आहीं । कबीरको रूप भयो तेहि पाहीं॥
अच्छत पुहुप लैविप्रमन भूला । नहिं ठाकुर जो पूजहु फूला ॥
साखी-तब पंडा सिर नायो, प्रभु चरित्र अवगाह ॥
कोध छोड़िये स्वामी, कृपा करो मोहि पांह ॥
चौपाई
अपने मन आन्यो प्रभु हीना । तातैं प्रभु तुम कौतुक कीन्हा ॥
तासौं वचन मैं बोलये लीन्हा । सो पंडा पुनि कही जो कीन्हा॥
सुनहु विप्र तुम्हे आयसु होई । दुबिधा भाव करौ मत कोई ॥
ब्राह्मण छाड़हु जात अजाती । ताते मेटब सबकी फांसी ॥
भोजन माहि भर्म जो करहीं । ताकी अज्ञ हीन अनुसरहीं ॥
तब पडा विन्ता अस ठाना । हे स्वामी मैं तोहि न जाना ॥
करौं सोई जो आज्ञा दीजे । कछु जांचोंसोप्रदानमुहिकीजे॥
जो मन इच्छा होय तुम्हारी । देउ सोइ अस वचन उचारी ॥
साखी-सागर नीर बड़ खारा, सो तो असो न जाय ॥
निर्मल जल मैं मांगौं, सो दीजै प्रभुराय ॥
जहँ चौरा है सागर तीरा । खनहु कूप होय निर्मल नीरा ॥
तहां खनायो आय तब कीन्हा । जल मँगाय पंडन कहैं दीन्हा ॥
कूप बनायो सागर तीरा । तहां भयो पुनि निर्मल नीरा ॥
यह तो भेद जाने सोई संता । कबीर सागर बूझे मतवंता ॥
हरी भेद मैं सागर आयो । तेही सकल चरित्र सुनायो ॥
भुंगी को कीन्ही मैं दाय। ताको एक जो भेद बताया ॥
ताकी दियो मता कडहारी । जीव भेद सों लेत उबारी ॥
चन्दवारमें कबीरसाहबका जाना
ज्ञानसागर
( ७१ )
पठवै जीव नाम दे जहँवा । सुक्ति पदारथ फल है तहँवा ॥
चार भातु कामिन उजियारी । मान सरोवर है वह नारी ॥
धर्मदान वचन
धर्मदास कहै अस बानी । स्वामी कहू संत उत्पानी ॥
हंस रूप जो षोडश भाना । कामिनि चार भातु परवाना ॥
साखी-कारण कौन है कामिनि, चार भातु कह्यु थोर ॥
शब्द गहे सब हँसा, संशय भई जब मोर ॥
माहिर कबीर वचन-चोपाई
सुन धर्मनि मैं तोहि बताऊँ । यह सब भेद मैं तोहि बुझाऊँ ॥
चौरासी लक्ष जोइन ठाना । सुक्ति छेत्र नरको उत्पाना ॥
तातैं प्रभु प्रगटे नर भाऊ । ताते शोभा हंस बहु पाऊ ॥
आय अदेह पुरुष रह जहँवा । नर को रूप प्रगट भये तहँवा ॥
जेहि सुक्ति चंदा निर्माई । हंस प्यार सुक्ति अधिकाई ॥
भुंगी कीट शिष्य जो होई । पावै भेद मग्न होय मोई ॥
सिंधु मध्य राह तिन केरा । आवै जीव ताहि सों फेरा ॥
वहै राह भुंग राज कहैं दीन्हा । यही भेद विरले जन चीन्हा ॥
पाहै भेद सन्त जन सोई । आन्यो सतगुरु जेहि गम होई ॥
निज बीरा जो चौरा पावै । इकोतर सौ जीव लोक सिधवै ॥
साखी-यही चरित्र करि आयो, चौरा के व्यवहार ॥
निज बीरा जो पावै, तव जीव होय उवार ॥
चन्दवारैमें प्राकटचकी कथा
चोपाई
आसन कर आयो चंदवारा । चंदन शाह तहाँ पगु धारा ॥
बल रूप धर आयो तहँवा । आठै पहर रहचो मैं जहँवा ॥
नूरीको मिलनेकी कथा
( ७२ )
ज्ञानसागर
ताकी नारि गई अस्नाना । रूप देखि ताकर मन माना ॥
ले गये बालक सो निज गेहा । बहुत भांति तिन कीन्ह सनेहा ॥
चंदन साडु देखि रिसियाना । चल गयो नारि तोर अब ज्ञाना ॥
बेग डार बालक को आजू । सुने लोग तो होय अकाजू ॥
जाति कुटुम्ब सुने जो कोई । यह तो भली बात नहिं होई ॥
चेरी हाथ तिन दीन्ह पठाई । उद्यान मास तिन दीन्ह अडाई ॥
नूरीको मिलनेकी कथा
काशीमें प्राकट्य
कछु दिन काया धर दुख पावा । यहि अंतर इक जुलहा आवा ॥
नूरि नाम जो वा संग नारी । देखत बालक भई सुखारी ॥
बालक देख नारि मन भूला । रविके उदय कमल जस फूला ॥
सारखी-अति सनेह जिन कीन्हा, नूरी देख रिसान ॥
बालक लीन्हो नारि अब, कहा भयो अज्ञान ॥
बालक वचन-चौपाई
बालक दीन्ह मही मई डारी । अस सुनि बालक दीन्ह हुँकारी ॥
बूझो काल फांस नर नारी । पूर्व जन्म तेहि लीन्ह उबारी ॥
पाछिलि प्रीति भयी अब मोही । तातैं दरश भयो अब तोही ॥
नूरी वचन
तुम जानो अब मैं नहिं जाना । सो अब मोहि सुनाओ काना ॥
नूरीके पूर्वजन्मकी कथा
कबीर वचन
पूर्व जन्म तैं ब्राह्मण दूखी । तोरे गृह कबहु नहिं सूखी ॥
श्वपच भक्त मम प्राणन प्यारा । ताको मान पिता अवतारा ॥
श्वपच भक्ति करै पुनि जबही । मात पिता पर लगै तबही ॥
ज्ञानसागर
( ७३ )
ताकी प्रीति भक्त मन धारा । तातैं भयो विप्र अवतारा ॥
प्रथम प्रीति मोरे मन भावा । तोरे गृह मैं यहि विधि आवा ॥
तोसों कहीं इक भक्ति हटाई । राखौ मर्म हमार छिपाई ॥
देव सुवर्ण नित्य मैं तोही । एक सुहर पुनि ताकी होई ॥
साखी-बोलो नहिं यहि कारणे, ताहि सुक्ति नहिं भाव ॥
माया देख सुलानो, यहि कारण तब पाव ॥
चोपाई
घर नहिं रहो पुरुष औ नारी । मैं शिवसों अस वचन उचारी ॥
आनि देव लक्ष्मी संसारा । आपन को निज भीख अहारा ॥
आन की बार बदत हौ योगू । आपन नार करत हौ भोगू ॥
काशी मरे जन्म नहिं होई । तुव महिमा वगैँ सब कोई ॥
औ पुन तुम सब जग ठग राखा । काशी मरे अजल तुम भाखा ॥
जब शंकर होवे तुव काला । कहाँ रहे तब भक्त विचारा ॥
जीवन करत जो होय अकाजा । या शंकर तब तुम कहैं लाजा ॥
सुनि शंकर तब चलयो लजाई । यहि अन्तर जुलहिनि चलिआई ॥
हे स्वामी मम भिक्षा लीजै । सब अपराध क्षमा प्रभु कीजै ॥
एक पुत्र जो विधि मोहि दीन्हा । कबहुँ बात कहै नहिं लीन्हा ॥
शंकर वचन
तोरें गृह पंडित अधिकारी । झूठ बोल कस बोलहु नारी ॥
हरि कमला सम देखो ज्ञाना । बुद्धिवंत तुम पुत्र सुजाना ॥
साखी-सुनकर महिमा पुत्रकी, नारि धरे तब पांव ॥
हे स्वामी मम इच्छा, श्रवणन वचन सुनाव ॥
चोपाई
कहा लजान कहा फिर आवा । बिहँसि कहा तुम सिद्ध कहावा ॥
सुनिकै वहै दर्प बहु कीन्हा । भिक्षा कनक जाति को दीन्हा ॥
( ७४ )
ज्ञानसागर
भिक्षा दै प्रसुदित चलि आई । हस्तामल को खोज न पाई ॥
वाचा बन्ध तहाँ पुनि आयो । काल कष्ट मैं तोर मिटायो ॥
सुन जुलहा मन भयो आनंदा । जिमि चकोर पायो निशि चंदा ॥
ले सुत चले हर्ष मन कीन्हा । तासों पुनि अस बोलेहि लीन्हा ॥
आगिल जन्म जब होइ तुम्हारा । तुम्हैं पठायब यम तैं न्यारा ॥
साखी-सुत काशी को लै चले, लोग देखन तहाँ आव ॥
अन्न पानी भक्ष नहीं, जुलहा शोक जनाव ॥
चौपाई
तब जुलहा मन कीन्ह तिवाना । रामानन्द सौँ कहि उत्पाना ॥
मैं सुत पायो बड़ गुणवंता । कारण कौन भखै नहीं संता ॥
रामानन्द ध्यान तब धारा । जुलहा सो तब वचन उचारा ॥
पूर्व जन्म तैं ब्राह्मण जाती । हरि सेवा कीन्हेसि भलि भांती ॥
कछु तुव सेवा हरिकी चूका । तातैं भायो जुलहा को रूपा ॥
प्रीति प्रभू गहि तोरी लीन्हा । तातैं उद्यानमें सुत तोहि दीन्हा ॥
नूरी वचन
हे प्रभु जस कीन्हो तस पायो । आरत हो तुव दर्शन आयो ॥
सो कहिये उपाय गुसाई । बालक श्रुधावंत कछु खाई ॥
रामानंद अस युक्ति विचारा । तुम सुत कोई ज्ञानी अवतारा ॥
बछिया जाही बैल नहीं लागा । सो ले ठाढै करै तेहि आगा ॥
साखी-दूध चले तेहि थन तैं, दूधहि धरौ छिपाइ ॥
श्रुधावंत जब होवै, ता कहैं देउ खवाइ ॥
चौपाई
जुलहा इक बछिया ले आवा । चल्यो दूत कोउ मर्म न पावा ॥
चल्यो दूत जुलहा हरषाना । राख छिपाइ काहूँ नहीं जाना ॥
सुन भामिनि आगे चल आवा । सो ले जाइ कोई भेद न पावा ॥
बाललीला और रामानन्दको गुरु करनेका वर्णन
ज्ञानसागर
( ७५ )
दूध न पीवत नाम कबीरा । खेलेत संत संग मत धीरा ॥
तिनसौँ कहैं जागौ रे भाई । बिना नाम नहिँ काल पराई ॥
कोई न बूझौ भेद हमारा । रामानंद पर तब पगु धारा ॥
तब अपने मन कीन्ह उपाई । तिनहि दरश कैसहु नहि पाई ॥
रामानन्दको गुरु करना
जाहि रामानंद गंग स्नाना । तेहि मारग में जा पौढाना ॥
तबहि पांव गुरु लाग कबीरू । रामानंद बोल्यो मत धीरू ॥
उठ कबीर तब वचन उचारा । रामानंद है गुरु हमारा ॥
साखी-करहिगोष्ठी शिष्य सब, कोई ज्ञान जीत नहिं जाय ॥
सत ऋषि सुधि पाई, गुरु सों बोले आय ॥
बोपाई
विद्या कहे मलेच्छ को दीन्हा । रामानंद कोध तब कीन्हा ॥
चले शिष्य तब आज्ञा पाई । कबीर संतको आन बुलाई ॥
सुनतहिं शिष्य चहुँ दिशि धाये । हेर खोज कबीरै लाये ॥
आये कबीर लागि नहि बारा । गुरु मंडलमें आन पगु धारा ॥
अन्तर कपाट शिष्य तब लाया । पूजत रामानंद हरि राया ॥
सुन कबीर आगे चलि आये । गुरुहि आनकर मस्तक नाये ॥
लक्ष्मीनारायण मुकुट सिरनाये । पहिरै वस्त्र माल नहीं समाये ॥
तबहि कबीर वचन अस भाखा । वस्त्र पहिरि माला तुम राखा ॥
अंतर कपाट खोल तब दीन्हा । रामानंद सुन अचरज कीन्हा ॥
दिव्यज्ञान तुम कहैं केहि दीन्हा । जोर कर गुरुहि विनोदित कीन्हा ॥
कब हम तुम को दिशा दीन्हा । नाम हमारा काहे तुम लीन्हा ॥
गुरु हमैं तुम दिशा दीन्हा । झूठ बोलका क्या फल चीन्हा ॥
नं. १ कबीर सागर -
( ७६ )
ज्ञानसागर
साखी-गुरु जब चलैं नहाने, तब हम दिक्षा पाव ॥
तातैं गुरु कहि थाप्यो, फिर पीछे पछताव
चौपाई
पूज्यो पाहन पंडित धर्मा । पहिल न जानो तुम्हरो मर्मा ॥
मैं तो चाहत मुक्ति पदार्थ । तुम पाहिन जापूजे निश्चारथ ॥
तब गुरु सुनकै अचरज भयऊ । योग समाधि वैकुंठहि गयऊ ॥
सत्त समाधि विष्णु जब देखा । तापर देश कबीरहि लेखा ॥
जहैं देखा तहां सत्त कबीरा । झूठ ध्यान भूले मत धीरा ॥
हे कबीर तुम मर्म न जाना । जान मलेछ किया अपमाना ॥
जो कछु आहि मुक्ति सन्देशा । सो सब मोहि कहौ उपदेशा ॥
साहिब कबीर वचन
छोड़ी सबै मान अभिमाना । तो कह देव मुक्ति फल दाना ॥
शिष्य सरवा सौ बात जनाऊ । काल तोर शरणगत आऊ ॥
कहैं कबीर काल है काला । है बड़ दारुण काल कराला ॥
साखी-मुक्तिदेव नहिं लेव तुम, रामानंद गुरु देव ॥
भोरहि जन्म गवांय हो, करि पाहन की सेव ॥
सिकन्दर शाहकी बारता-चौपाई
ता निशि को तब भयो प्रभाता । काशी आइ भयी एक बाता ॥
आये सिकन्दर शाह सुल्ताना । है व्याधा बहु भेद न जाना ॥
रामानंद की सुनी बड़ावा । तातैं शाह आप चलि आवा ॥
आये मंडप जहां सुल्ताना । रामानंद तब देख रिसाना ॥
आये शाह सन्मुख भये जबही । रामानंद मुख फेरा तबही ॥
वार अनेक तिहितें सुख फेरा । तांकी ओर क्रोध कर हेरा ॥
मारचो खंग परचो खसि धरनी । शाह के अङ्ग अनिल सम बरनी ॥
आये शाह जहां दुःख नसावन । अधिक भई जो देह सतावन ॥
सिकन्दरसाहूकी वार्ता और रामानन्दजीका कत्ल होना
ज्ञानसागर
( ७७ )
पय औ रुधिर चल्योगुरु अंगा । पावक उठी शाह के अंगा ॥
तवै शाह ने सुधि अस पाई । महिमा जान कबीर बुलाई ॥
सारखी-कबीर दर्शन दीन्हा जबै, तपन भई सब दूर ॥
शाह कहा तुम सांच हो, औ अल्लहका नूर ॥
सिक्कन्दरवन-चोपाई
पय औ रुधिर चल्यो गुरु अंगा । शाह कहै यह कौन प्रसंगा ॥
कबीरवन
जेहि तन मान्यो शब्द हमारा । तेहि तैं चले दूध की धारा ॥
कीन्हा कालउ केर विचारा । आधा अङ्ग रुधिर अनुसारा ॥
अगले जन्म मुक्ति जो होई । अंकूरी जीव कहावै सोई ॥
गोको बिलाना
यहै चरित्र तहां पुनि भयऊ । तब नूरी के मंदिर गयऊ ॥
काजी मुह्ता सबै रहाये । गाय आनि के गलो कटाये ॥
देखि दुखित भये सत्त कबीरू । महा व्याधि गाई की पीरू ॥
केहि कारण गाई जो मारा । सो सब मोहि कहो उपचारा ॥
काजी काया देख विचारी । एकहि ब्रह्म गाय क्यों मारी ॥
गाय ज़िवावहु मुर्गा सारू । नातर वेद अथर्वन हारू ॥
सत्त शब्द है जासु शरीरू । व्यापी महा गाय की पीरू ॥
सारखी-उठिके गाय ठाढ़ी भई, आज्ञा जबही कीन्ह ॥
काजी मुह्ता जानि कै, पाव पकर तब लीन्ह ॥
चोपाई
नगर के लोग अचंभो लागा । यह कबीर कर्ता हो जागा ॥
मगध गवन
तब तहैं से पुनि कीन पयाना । उत्तर देश मगध अस्थाना ॥
नूवा नूरी काल बस भयऊ । तिन पुनि जन्म मनुष्य हिलयऊ ॥
( ७८ )
ज्ञानसागर
राजा बीरसिंह देव बड़ राज । ताके गृह अब धारचो पाऊँ ॥
कमलावती तासु नृप नारी । तिन बड़ सेवा कीन्ह हमारी ॥
ताकौ दीन्ह पान परवाना । तिन कछु भेद हमारा जाना ॥
कह्यो तासों मुक्ति प्रभाऊ । सुनत भयो आनंदित चाऊ ॥
विजुलीखां पठान बड़ ज्ञानी । सन्त जान जिन सेवा ठानी ॥
तासों कही मुक्ति परभाऊ । ज्ञान गम्य तिन बहुत कराऊ ॥
साखी-अति आधीन जब देखा, ता कहैं दीन्हहा नाम ॥
प्रीति जानि कै ताकी, कछु दिन किय विश्राम ॥
चोपाई
विजुलीखां कहै पीर हमारे । नृप वीरसिंह शिष्य तुम्हारे ॥
साहिब आप तजो जब देहा । दोह दीन सो कीन्ह सनेहा ॥
सुनि विहंसि अस आज्ञा ठानी । दोह दीन से हम निरवानी ॥
हिन्दू तुरक नहीं हो भाई । सुन पठान संशय उपजाई ॥
जो तुम दोइसों न्यारी रीती । मेरे मन कैसे होय प्रतीती ॥
तुम तो हो अछह के बन्दा । यह तो अहै आदमी गंदा ॥
तुमहि शरीर तजौगे जबही । शरीर उपाय करों क्या तबही ॥
कै पृथिवी कै देहों जारा । करहु हुकम सो पीर हमारा ॥
जो कछु होई लोक व्यवहारा । सोई कहो मम पीर पियारा ॥
जो साहिब हुकम जस करिहौ । मजार तुम्हारा रचिके धरिहौ ॥
साखी-बिहंसि कह्यो तब तिनसैं, मजार करौ सम्हार ॥
हिन्दू तुरक नहीं हौं, ऐसा वचन हमार ॥
चोपाई
दिन कछु गये तासु संबादा । राजा बीरसिंह ने भेजे प्यादा ॥
बन्दीछोर आवैं मम गेहा । रानी विन्ती कीन्ह सनेहा ॥
ताकी प्रीति तहाँ पगुधारा । दुःखद्वन्द्व तिन सबै विसारा ॥
ज्ञानसागर
( ७१ )
तिन पुनि कही सुनौ गुरु ज्ञानी । दुतिया ब्याह लगन में ठानी ॥
ब्याह जो होय बिकट अस्थाना । क्या जाने होवे संग्रामा ॥
कोइ घायल कोइ जाई मारा । खाड़ो आही दुहु दिशि धारा ॥
ताकी आज्ञा करौ गुसाई । तिनहि देह क्या करो उपाई ॥
कै गाड़ौ कै जारौ धूरी । यह संशय मेटो प्रभु मोरी ॥
करौ सोई लोक कुल धर्मा । बिन लागै कोई जानै न मर्मा ॥
साखी-जो गाड़ौ तो माटी, जो जारौ तो छार ॥
करो लोककी जो कृति, बोलता ब्रह्म निनार ॥
चौपाई
हे स्वामी तुम मोहि बताओ । तुम तनतजोतो काहि कराओ ॥
जस प्रभु तस पुन सेवक करई । सेवा युक्ति सदा सो तरई ॥
जो तुम कितहू करहू प्याना । गाड़हि लागै तुमहिं पठाना ॥
हँसै सबै यह देखि परतच्छा । गुरु तुम्हारो आहि मलेच्छा ॥
तस कछु भेद बताओ स्वामी । करो कृपा सो अन्तर्यामी ॥
वास्तव तेहो कहाँ बुझाई । जारौ देह जो क्षार उड़ाई ॥
तातैं लोक मैं नहीं छुड़ाओ । यातैं दोह दीन फरमाओ ॥
गयो नृपति तहैं साज बराती । कौतुक रचो देह तब त्यागी ॥
सुनत साज दल चले पठाना । राना मुर्दा ले बिल खाना ॥
लेकर गाड़ै करै निमाजा । करन बिहानक दूरी काजा ॥
साखी-रानी भेजे प्यादहीं, तन जब तजो कबीर ॥
आयो बिजुली खान तब, सुनि वृत्तान्त गंभीर ॥
चौपाई
राजा पास पठाओ पाती । सुनतहि क्रोध जरी तब छाती ॥
छाड़्यो ब्याह चले दल साजी । हनें निशान सम्हर की बाजी ॥
बाजा गाजी तुरही आवहि । यह बिजुलीखां युक्ति बनावहि ॥
ऐसी भांति सो कीन्ह प्याना । रन के आगे बजै निशाना ॥
रतनाकी कथा
( ८० )
ज्ञानसागर
बांधी अस्त्र अस चले बहु बीरा । कुहुक बान औ बहु धन तीरा ॥
बरछी सेल औ छुरी कटारी । खड्ग रु तुरी चपल परचारी ॥
दोड़ दिशि देख अस्त्र चमकारा । मानो साज चलो जल धारा ॥
राजा कीन्ह मरन का ठाना । वयरख रोप जो रहो पठाना ॥
जब देखा मैं होत लराई । युद्ध जानि अस कन्यो उपाई ॥
रानी जान मोर कछु मर्मा । तिन पुनि कही तजो नृप भर्मा ॥
साखी-पहिले खोदो माटी, मुदां देखु निहार ॥
सुरदा नहिं वहि भीतरे, कहा करत ही रार ॥
चोपाई
सत् कबीर नहीं नर देही । जारै जरत ना गाई गड़ही ॥
पठयो दूत पुनि जहां पठाना । सुनिके खान अचंभी माना ॥
दोड़ दल आई सलाहा जबही । बने गुरु नहिं भेटे तबही ॥
दोनों देख तबै पछतावा । ऐसे गुरु चीन्ह नहिं पावा ॥
अपने मैं अचंभा ठाना । रंक माहिं धन गया छिपाना ॥
दोड़ दीन कीन्ह बड़ शोगा । चकित भये सबै पुनि लोगा ॥
रतनाकी कथा
तब अपने मन कीन्ह विचारा । रतना कँदोइन कै पगु धारा ॥
रतना समाधान बहु कीन्हा । राजहि पठय सँदेशा दीन्हा ॥
तुम नृप किमि करते पछताना । निश्चय आही शब्द प्रवाना ॥
रहौ सदा शब्दहि मन लाई । दर्शन मोक्ष होय नहिं भाई ॥
साखी-विजुलीखां सौं दुआ कहि, किमि कारण पछताव ॥
रहौ नाम लौ लाइके, जाते कर्म कटाव ॥
चोपाई
लोक वेद मैं ऐसे विचारा । किमि कारण मन दुखी तुम्हारा ॥
सुने दंडवत बहु विध कीन्हा । तत्त्व मता नामहि गहि लीन्हा ॥
रतना सौं कहि मता अपाना । तेहि सुनिके हरष बहु आना ॥
ज्ञानसागर
( ८१ )
हे स्वामी मोहिं कीजै चेरी । जातै कटै कर्म की बेरी ॥
धन्य शब्द धनिजो कह्यु चहिये । सो सब स्वामी मोसों कहिये ॥
सवा सेर मिष्ठान ले आवहु । और सवासौ पान मैगावहु ॥
इतना चहिये और न काजा । तातै भाग चले यमराजा ॥
सोई अंश पान निज लीन्हा । ताको जीव दान मैं दीन्हा ॥
अंकुरी जिव भेटे निज गेहा । नूवा नाम जो प्रथम सनेहा ॥
साखी-ताको पठयो निज भवन, तीन लोक तें न्यार ॥
नूरी के मन इच्छा, धर्मदास अवतार ॥
चौपाई
सुन धर्म दास यहै कुल धर्मा । मेटो तीरथ बरत कुल भर्मा ॥
कोटि जन्म कीन्हौ तप धर्मा । विनसत गुरु नहिं मिटिहै भर्मा ॥
धर्मदासवचन
हंस राज जो दर्शन दीन्हा । जन्म स्वारथ अधमको कीन्हा ॥
हे प्रभु मोरे बन्दी छोरा । हौं आधीन दास मैं तोरा ॥
आनहु पान और मिठाई । जितनौ रतना के मन भाई ॥
आनहु रतना कहौ तुम स्वामी । कृपा करो तुम अन्तर््यामी ॥
कबीरवचन
प्रथम हि जो पावै निज बीरा । पुरुष रच्यो सुख सागर तीरा ॥
जाके रहे पुरुष औ नारी । बीरा नाम जीव रखवारी ॥
सवा लक्ष जीव नित जो मारा । तातैं सवा सेर व्यवहारा ॥
साखी-सवा सेर मिष्ठान जो, और सवा सौ पान ॥
इतना ले जो शिष्य हो, यम तेहि देखि डरान ॥
चौपाई
सुहर देखि जैसे घट वारा । जिनहैं घाट ऊपर बैठारा ॥
जो कोइ झूठा रूप बनावै । बिना पान जान नहिं पावै ॥
( ८२ )
ज्ञानसागर
आने फेर परवाना सोई । जैसा अंक सुहर पर होई ॥
इतनी सुन हरषे धर्म दासा । शिरनी पान लाइ धरे पासा ॥
सेत सिंहासन सेतु ई साजा । सेत पान सिर क्षत्र बिराजा ॥
पाने दलतै सबहीं कीन्हहा । तामें अंक अग्र को दीन्हहा ॥
प्रथम हि तितुका वेग तुरायी । मारग भेद तबै समुझायी ॥
बाएं दाहिने है सहि दानी । इकदिशि धर्म द्वितीय दुर्गदानी ॥
पाछे चित्र गुपित्र को थाना । तेहि तजि हंसा देइ पयाना ॥
टूटै घाट अठासा कोरी । हंसा चढ़े नाम की डोरी ॥
साखी-यमसों तितुका तोरकै, तब दीजौ निजपान ॥
पाई प्रसादै हर्ष तब, शब्द देख मन मान ॥
चौपाई
जाई उबारौ हंस अंकुरा । मन की दिशा देख मन भुला ॥
हे प्रभु कौन शब्द है सारा । तौन शब्द तैं जीव उबारा ॥
एक शब्द पुनि दीन्हहा हेरी । यही शब्द तैं जीव उबेरी ॥
जस दरपर लै दीजे हाथा । दर्शन देखै मुख औ माथा ॥
धर्म दास सुनत मन माना । बिकसे कमल उदैं जनु भाना ॥
यही वस्तु से जीव उबारा । और ज्ञान है बहुत अपारा ॥
मूल नाम अक्षर धुनि साचा । जेहि तैं जीव काल सों बाचा ॥
आदि नाम पुरुष कर आही । भाग जीव पाव पुनि ताही ॥
धन्य भाग वस्तु जिन पाया । मोकहँ सत गुरु अलख लखाया ॥
अक्षर मूल और सब डाला । डारहि में फल फूल रसाला ॥
किंचित को फल पावै सोई । कहैं कबीर अमर सो होई ॥
अक्षर मूल अमी पैंच शाखा । साखी रमैनी ताकी पाता ॥
सुमिरन डार पुहुप है जोगा । तेहि सम आहिना दूसर भोगा ॥
साखी-अक्षर धुनि लौ लावई, अपराधै परिचय योग ॥
कहैं कबीर संशय गयी, भोगहि मध्ये भोग ॥