कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
(४२)
ज्ञानप्रकाश
सर्वानंद वचन
कहै विप्र देख्यो तुव ज्ञाना । फिरिजोलहा तुम्हजातिअयाना॥ ऐसे समय राम तुम्ह बोले । कहा कहो हरि त्रास न डोले ॥
कबीर वचन
अहोविप्र मोहिं कहहु बुझाई । कौनी सभै रामलौ लायी ॥
सर्वानंद वचन
कहा सर्वानन्दमुनहु जोलाहा । करम नीति भाषौ तोहि पाहा॥ वेद प्रमान लै माटी पानी । तबमुख शुद्धराम जपुजानी ॥
कबीर वचन
अहो विप्र जो हम अस करहीं । तौ मुख शुद्ध होय संचरहीं ॥
सर्वानन्द वचन
कहै विप्र है वेद प्रमाना । तब मुख होय पवित्र सुजाना ॥ यह कहिचलिभौ सुरसरितीरा । कर पग मज्जहिं मुखदे नीरा ॥ हम पुनिकर पगु मजे लीन्हा । कर पखारि पुनि कुछा कीन्हा॥ कुछा कीन्ह द्विजवचन प्रमाना । एक कुछा तेहिं ऊपर ताना ॥
सर्वानन्द वचन
चिहुँकि उठे द्विज यहका कीन्हा । फिरिजोलहा तुम्हजाति कमीना ॥
कबीर वचन
हो सर्वानन्दमुख शुचि भयऊ । कुछा कीन्ह अशुचि तर गयऊ॥ यहिविधि मुखशुचि तुम भाषा । तुम्हरो कहा हिये महाँ राखा ॥ हो सर्वानन्द तुझ बड ज्ञानी । सत्य नाममर्मअजहूँनहिजानी॥ रज अरु बीज नरककी देही । सदाअशुचि शुचिनाम सनेही ॥ जो मल तजत प्राण करे गवना । करमुख शुचि हरिजप कवना ॥ समुझि शब्दसो रहु मुखचाहू । उत्तर कछु तब दीन्ह न ताहू ॥ पुनि द्विजमंजनलागु शरीरा । ताभ्रपात्र एक लीन्ह कबीरा ॥
बोधसागर
(४३)
गोबर घोरि ताहि भरि लीन्हा । वरतन कर मुख टाँकन दीन्हा ॥ लै त्रिन रेनु जल मंजै ताही । झलकै अधिक प्रगट मल नाही ॥
सर्वानन्द वचन
कहा सर्वानंद सुनहुँ कबीरा । भो सुन्दर वर्तन मति धीरा ॥ केहि कारण अब मांजहु भाई । मल नहि तनिको देइ दिखाई ॥
कबीर वचन
सुनु पंडित नीक तुम्ह कहेऊ । अपर शुचि अन्तर पल रहेऊ ॥ मोहडा खोलि उलटि दिखलावा । सर्वानन्द देखि धिन पावा ॥ सुनु सर्वानन्द अस नर बाता । अंतर मल प्रगट शुचि गाता ॥ जलमञ्जन तन मैल नशायी । मन मल कहो कौन विधि जायी ॥ विन गुरु ज्ञान न मन शुचि होई । रैन दिवस तन मज्जे कोई ॥
सर्वानन्द वचन
कहै विप्र मन मल कहु मोहीं ।
कबीर वचन
कहै कबीर कहौ मैं तोहीं ॥ काम क्रोध तृष्णा हंकारा । लोभ मोह मन मैल विकारा ॥ परनिन्दा परघात अनीती । मन रहै अशुचि कुकर्म कुनीती ॥ छन्द-सुनु विप्र सोई पंडित सोई ज्ञाता जो परमोघै पाचहीं ॥ जहँ लगि योगी मुनी मुनीश्वर पांच वशि सब नाचहीं ॥ यहि पाँचके परपञ्च महँ सब परे शिव सनकादिक हो ॥ इन्द्र आदि अरु बहु भेष लूटे विष्णु ओ ब्रह्मादि हो ॥ साखी-असरे पखेरिन्ह लूटिया, को नर कीट पतंग ॥ कहै कबीर सो ऊबरे, निरख परखि करे संग ॥ सोरठा-करि गुरु पद परतीति, सदगुरु शब्द निरखत चले ॥ निश्चै पाँचौ जीति, घर अंजोर जागत रहै ॥
(४४)
ज्ञानप्रकाश
चौपाई
सर्वानन्द मगन मन भयऊ । पै उत्तर कछुओ नहि दियऊ ॥ पुनि लागे जल अरपे सोई । चित निश्चल छल एक न होई ॥ हम जल उलिचन लागु करारे । सर्वानन्द पुनि मोहिं निहारे ॥
सर्वानन्द वचन
कहैं सर्वानन्द सुनहु कबीरा । काह कवन उलिचन हौ नीरा ॥
कबीर वचन
कहैं कबीर सुनु विप्र सुजाना । फुलवारी गुरु केर सुखाना ॥ तेहि सींचन कहैं पठइन्हि नीरू । सुनु पण्डित अस कहहिं कबीरू ॥
सर्वानन्द वचन
कह सर्वानन्द यह अनरीती । बात अगम भाषहु विपरीती ॥ कहाँ धौं फुलवारी है भाई । जल सुरसरि महाँ रहै समाई ॥
कबीर वचन
तब हम कहा सुनु पण्डित राजू । तुम्ह जल उलिचौ कौने काजू ॥
सर्वानन्द वचन
कहा सर्वानन्द सुनहु गोसाईँ । देव पितर जल तृषित अघाई ॥
कबीर वचन
हो सर्वानन्द कहहु यह मोहीं । कहा पितर तुव पूछों तोहीं ॥
सर्वानन्द वचन
कहे सर्वानन्द सुनहु सुजाना । देव पितर मम स्वर्ग अस्थाना ॥
कबीर वचन
कहैं कबीर जल ठामहिं रहई । कहहु पितरधौं केहि विधि लहई ॥ कीधौं जलहिं रहै तव पुरखा । पेढ़हु वेद यह लखेउ न सुरखा ॥ वेद शास्त्र नहिं करहु विचार । हरिके कचन आहिं जग सारा ॥ पित्ररूप जनार्दन भाखा । जनार्दन आप सन्तन्हमहँ राखा ॥
बोधसागर
(४५)
हमरे अस मति जानिय भाई । साधु माहिं प्रभु प्रकट रहाई ॥ जहाँ हरी तहाँ पितर अरु देवा । सब होइ तस साधुकी सेवा ॥ कहाँ अन्तै प्रभु खोजौ जाई । हम देखै प्रभु सन्तन आई ॥ हरिऔ सन्त दोय जनिजानौ । प्रभु कहै सन्तन्ह माहिं पिछानौ ॥ अस परतीति आनहु उरमाहीं । सन्तन्हतजि अन्तै प्रभु नाहीं ॥ जल तरंग जल आहे भाई । हरि हरिजन अस माँहि रहाई ॥ जैसे वृक्ष वृक्षकी छाया । अस हरिहरिजनमाहिं रहाया ॥ छन्द-तुलसी अभूषण जीवदायातहाँ आपुहरि निशिदिन रहै ॥ अरु तहाँ प्रकट निवास प्रभु गुरु साधु सेवा जो गहै ॥ हैं आपु सर्व भूतमय प्रभु गुप्त प्रगट लेखिये ॥ हरि प्रगट सन्तन्ह गुप्त जग शास्त्र निगम विवेकिये ॥
दोहा-हरिपूरण सब माहिहै, पण्डित करहु विचार ॥ ज्ञान दृष्टि ते परखहू, कहै कबीर विचार ॥ सो०-ज्ञान दिव्य जब होय, करम गरम तब छूटई ॥ पण्डित गहहु विलोय, देव पितर सब साधु महाँ ॥
चौपाई
रहेउ मुग्ध होय कछु नहिं बोला । ज्ञाता शब्द परखि हिय डोला ॥ पुनि चौकाकरि शिला विडावा । प्रतिमापूजन कहै मन लावा ॥ वेद नित्य बहु करहिं विधाना । तहाँ हमहू उपाय यकठाना ॥ मुरतिन कहै पुनि पूछहिं कुशलता । कहै न मूरति कछु मुखबाता ॥ हो पण्डित कस देव तुम्हारा । एकहु बात न सुनहिं हमारा ॥ तब हम पण्डित सोयह कहिया । प्रतिमा पूजन जेहिचितरहिया ॥
कबीर वचन
हो पण्डित कस देव तुम्हारा । एकहु बात न सुनहिं हमारा ॥ मेवा मिठाई साजि धरु आगे । खाहिं न मूरति परम अभागे ॥
(४६)
ज्ञानप्रकाश
औंख कान मुख नाही स्वासा । केहि बिधिमूरति करहिं गरासा ॥ हो पण्डित जनि सुनत रिसाहू । कहो परमारथ शब्द उछाहू ॥ मूरति सरीजव पूजहू ताहीं । इन्ह ते सूछि उहै सुनु आहीं ॥ सरजिव पातीं तोरि तुम आना । सो ले निरजिव पूजा ठाना ॥ हो पंडित तुम आप न चीन्हा । विनु गुरुज्ञान चक्षुबुधि हीना ॥ जग महाँ ब्याह करै जो कोई । आपुते अधिक होय जो सोई ॥ आपुते अधिक मिलै जो नाहीं । तौ निज समन रखो जमिलाई ॥ तुम सर्जीव घट ब्रह्म समायी । कस निजीव अबोल मन लायी ॥ सरजीव होय सरजीव कहीं सेवे । ज्ञानी शब्द परखि हिय लेवे ॥ मैं तोहिं कहो सुनो हो देवा । जिव है अमर अलेक अभेवा ॥ जीव अमर तन विनशे भाई । तन धरि जीव बहुत दुख पाई ॥ अमर नाम जब जीए भेटें । जेहिजन्म मरणको संशय भेटें ॥ अमर नाम खोजहु द्विज राई । जेहिप्रताप यम निकट न आई ॥ अमरनाथ सत्पुरुषको सारा । सत्यपुरुष सत्यलोक मैझारा ॥ अमरलोक सतलोकहि आहीं । तीनि लोक परलैतर जाहीं ॥ कृत्रिम कला नाम धरु जेते । जनमै मरै प्रलयतर भै तेते ॥ जासु चेतना अमर है भाई । तासु नाम अमर सुखदाई ॥ अमर देह सत्पुरुषके आही । वो नहिं आवै गर्भके माही ॥ जो सतगुरु पद रहै समायी । ते हंसा सतलोकहीं जायी ॥ अमर नाम सतगुरुते पावै । सतगुरु अस्थिर ध्यान लखावै ॥ भूत भविष्य जपै नर लोई । सत्यनाम विनु मुक्ति न होई ॥ वरतमान महाँ सतगुरु सारा । सतगुरु भवतारण कैंडिहोरा ॥ जागृत स्वप्न सुषुप्ति तुरिया । जागृत आहि संजीवन सुरिया ॥ जागृत रहै तुरिया सो पावै । स्वप्न सुषुप्ति जग भरमावै ॥ पुरुष विदेह तुरिया अस्थाना । जागृत ब्रह्म देहुमों जाना ॥
१ करणधारका अपभ्रंश है ।
बोधसागर
(४७)
तीरथ वरत जप पूजा पाती । करम भरम ओजाति कुजाती॥ यह मति स्वप्न सुषुप्ती अहई । जाग्रत विलु कोई भेद न लहई॥ जाग्रत ब्रह्म देह धरु सोई । सबसे श्रेष्ठ साधु गुरु होई ॥ बोलता तजिकिमि जड़लो लायी । जड़पषान सेव कहैं पायीं ॥ इतना कहि फिरि हम कहिया । तिन आपनहाथयक बाहररखिया॥ हो पण्डित यक बूझों तोही । करि विवेक चित कहिये मोही॥ बायूँकर चौका के बाहर । केहि कारण सो कहहु विद्याधर॥
सर्वानन्द वचन
सर्वानन्द कहै अस सूत्रा । बाएँ कर परसे मल सूत्रा ॥ केहि कारण यह कीन्ह निषेधा । चौकाके बाहर कर जिन्दा ॥
कबीर वचन
कहै कबीर यह अचरज बाता । उलटी रीति अपंथ जगजाता॥ तुम्हरे हृदय मई मल भरिया । मलद्वारे मल त्यागित करिया॥ कर शुचि करै अशुचिमलद्वारा । ताहि निषेध तुम करिडारा ॥ विपरीति कथा कहौ कस भाई । राजा पण्डित सब अन्याई ॥ धन्य पंडित धन्य तोर वेदा । कहै कबीर सिद्ध मत भेदा ॥ सुनिवाणी चितभयेउ अँजोरा । लागेउ शब्द प्रेम हित मोरा ॥ नायशिरतिन दुइकर जोरा । जो कछु कहो सो है सब थोरा॥ पुनि जलपान करै तिन चाही । जल माटीके वरतन माही ॥ करवा छुई दीन्ह हम भाई । सर्वानन्द चित रहेउ सकाई ॥ कर करवा लै रह मुख चाहीं । भरम बड़ो जल अँचवै नाहीं ॥
सर्वानंद वचन
कस छुयेउ मम वरतन स्वामी । हम ब्राह्मण तुम यती अनामी ॥
कबीर वचन
हो पंडित यह कहहु बुझायी । उत्तम मध्यम सो कोहै भाई ॥
(४८)
ज्ञानप्रकाश
छन्द-तन अस्थि माँस रुधिर त्वचा सर्व में सुनु एक है ॥ प्रकृति तत्त्व त्रिगुण सबै यह कौन भेद विधेक है ॥ सो ब्रह्म विप्र सर्वमयी सर्वमयी सुनु एक जो ॥ पठि शास्तर निगम पुराण बहु भरम कहा मंडेक जो ॥ दोहा-कर्म अशुचि जेहि देखिये, सो अस करै विचार ॥ सन्त सों दुचिताइ किये, कहैं कबीर पुकार ॥ सोरठा-मन महाँ रहेउ लजाय, सर्वांनन्द अनीति लखि ॥ मम पदशीश नवाय, कहैं धन्य तुम्ह धन्य हो ॥
चौपाई
जब प्रसाद कै कीन्ह अरम्भा । तब जमि बालकको देत है थम्भा ॥ हमहिं कहसि गवनहँ प्रभुगेहा । करब प्रसाद पोषन निज देहा ॥ तासु हृदय बुधिलखि हमपाये । ताते वेगि भवन चलि आये ॥ तब उन अशुचकर्मयक कीन्हा । धर्मदास तुम सुनो प्रवीना ॥ अजा एक पुनि गुप्त मँगायो । गुप्तहि ताकर गला कटायो ॥ निज सेवकन सोकहि समुझावै । अजगा सुधि कबीर नहि पावै ॥ गुप्त रसोई मासु रँधायेसि । बहुविधि अन्तरपाट दिआयेसि ॥ तब चौका पर बैठे जबहीं । हाड़ एक कर लीन्हेसि तबहीं ॥ तेहि क्षण हमहूँ पहुँचे जायी । मोहिं देखत रहु शीश नवायी ॥
कबीर वचन
तब हम कहो सुनो द्विजराई । हमते अन्तर पाट दिवाई ॥ गुप्त अकर्म करै नर कोइ । प्रभु ते नाहि छिपै पुनि सोई ॥ जगकर्ता तुम सङ्गहि देखै । नाहि न लखै नर वह सब पेखै ॥ पाप पुण्य नहि छिपै छिपाये । केतिक जो नर राखु दुराये ॥ नरनारी जिमिलहसुन खायी । गुप्त खाहिं वह पुनि प्रकटायी ॥ तुम्ह अस श्रुतिधारी सज्जानी । सो नहिं जलहु पाठ पहिचानी ॥ हाथ हाड़ मुख थारि हि हाडा । स्वान स्वाँग बन्यो अतिगाढा ॥
बोधसागर
(४९)
धन्य धन्य तुम्ह पण्डित राजू । तुम ब्राह्मण हो का कर काजू ॥ करि अज्ञानतिलक शुठि नीको । कांधजनेउ चाल विनुफीको ॥ उत्तम जाति चालु किमि नीचा । छये चमार तब बालहु सीचा ॥ तोहिँ औ स्वानसो कस भीना । विप्र चमार चालु तुम्ह हीना ॥ पछिली रीति नहिंसमुझहु भेवा । सनकादिक नारद शुकदेवा ॥ किनअसकर्म कीन्ह कछु मोही । द्विजकी चाल न देखौं तोही ॥ हो पण्डित तोहि दया न आई । कैसे परगल काटे भाई ॥ कर्म कसाई विप्र कहावहु । मानुषदेह तुम वादिगैवावहु ॥ सर्वमयी भाषहु भगवाना । केहि गरकाटेहु कहहु सयाना ॥ जीव दया जेहि हृदये नाई । कहैं कबीर सो आहिँ कसाई ॥ गीता भागवत देखु विचारी । जीव दया भाषै बनवारी ॥ जिह्वा स्वाद काज जिव खोवे । जानि बूझि का जनम विगोवे ॥ एक तो भूले गूढ अयाने । तुम्हका दृष्टि देखि बौराने ॥ भूले मूढ जगत्के ज्ञानी । तुमको सृष्टि देखि बौरानी ॥ लाग्यो शब्द सारहियमाहीं । चितगहिपरचे आउ हियमाहीं ॥ तेज हाँड़ पदगहि अकुलायी ।
मोहि अचेत कहैं लियेउ जगायी ॥
सर्वानन्द वचन
मैं भूलेउँ विद्या अभिमाना । अबहिय बेध्यो शब्द सहिदाना ॥ मुख मंजन करि उठे तुरन्ता । पद गहि कहैतबकला अनन्ता ॥ अबमोहि शरणलेहुतुम स्वामी । कृपा करहु प्रभु अन्तर्यामी ॥ पुस्तक बहुत आनिधरि आगे । दीन वचन कहि अति अनुगगे ॥ रामानन्द पहुँ तेहि लै गयऊ । गुरुकी दीक्षा ताहि दिवयऊ ॥ भक्ति भेष तिन्ह लीन्हैसि भाई । गुरु ठिगकहहि साधु सेवकाई ॥ गुरुते बिदा मांगि दिन एका । जननी पहुँ कहिचले विवेका ॥
आरती विधि
(५०)
ज्ञानप्रकाश
धन्य धन्य जननी सुखदायी । जिन्हयह मोहि उपदेश बतायी॥ जाय भवन निज पहुंचे जबही । धाय जननि पग लगै तबही ॥ छन्द-तुम धन्य माता मोहि उधारेउ कहेउ सार उपदेश हो ॥ जाय दास कबीर कहि उन्ह हरेउ कालकलेश हो ॥ मैं थकेउँ उनते वाद करि वे ब्रह्म अविचल नाथ हो ॥ कछु कहत बने ना कला उनकी भयउ बहुत सनाथ हो ॥ साखी-सुनु जननी यह चित दै, हम उनकर शिक्षा लीन्ह ॥ मोहि प्रतीति उनसे वैसी, उन्ह गुरु कै दिशा दीन्ह ॥ सोरठा-भै जन्म शुभ मोर, पहुंचेउ मोक्ष रु मुक्ति घर ॥ जननी गुण बड़ तोर, कबहुँ न ददय तेविसारिहौं ॥
इति सर्वांनन्दकी गोष्ठी
सतगुरु वचन-चौपाई
हे धर्मदास तोहि कहि ससुझावा । सर्वांनन्द सो जो बनि आवा॥
धर्मदास वचन
धन्यधन्यसाहिबअविगतनाथा । प्रभुमोहिनिशिदिनराखोसाथा॥ सुतपरिजन मोहि कछु न सोहाई। धनदारा तिहुँ लोक बड़ाई ॥
सतगुरु वचन
सुनु धर्मनि तुम्ह हमरे साथा । मिलीसुरतितब दुइ नहिंवाता॥ निरखोसुरति नाम लौ लाओ । तनछूटे सत्यलोक सिधाओ ॥ जीवन शब्द चेतावहु भाई । चेतिहिं जीव पुरुष लौ लाई ॥ अङ्ग मोर तुम लेहु सँभारी । जम्बूद्वीप तुम करहु कडिहारी॥ लै जीवन सतभक्ति ददाओ । तब तुम्ह सत्य पुरुष कहँ भाओ॥ सवालाख लै आरति करई । बोधहु जाहि लोक संचरई ॥
धर्मदास वचन
हे साहब मैं बूझों तोही । दयाकरी प्रभु कहिये सब मोही॥ सवालाख नहिं होय जेहि पाहीं। ताहि कहहु बोधबकी नाहीं ॥
बोधसागर
(५१)
सतगुरु वचन
धर्मदास जनि ताहि प्रबोधो । सवा लाख अरपै तेहि बोधो ॥
धर्मदास वचन
हो साहेब तब बनिहैं नाहीं । सवा लाख विनु जीव यम खाहीं ॥
सतगुरु वचन
सुनु धर्मनि जो आधौ होई । करि आरति देउ पान सजोई ॥
धर्मदास वचन
हो साहेब भाषहु कछु थोरा । होय निस्तार जीवन बन्दीछोरा ॥
सतगुरु वचन
धर्मदास जो विन्ती करहु । सवा लाख चौथाई धगहु ॥
धर्मदास वचन
हो समरथ यह दायो कीजै । बोझ थोर जीवनपर दीजै ॥
द्रव्यहीन जिव केहि विधि तरिहैं । यम राजा तेहि भक्षण करिहैं ॥
सतगुरु वचन
धर्मनि चौथाइहु चौथाई । यहि प्रमाण लै आरति लाई ॥
धर्मदास वचन
अहो साहेब कलिजीव अयाना । भाषहु शब्द थोर परवाना ॥
भाषहु थोर तुव पद लौलीना । कलियुग जीव द्रव्यके हीना ॥
सतगुरु वचन
हो धर्मदास मानहु शिर नार्ई । अब जो कहा सो राखु दढार्ई ॥
हम निःइच्छा चाव कछु नाहीं । है मर्याद गुरुसेवा चाहीं ॥
गुरु साधु सेवा नहिं करिहैं । कहो सो जीव कौने विधि तरिहैं ॥
चौथाई कर जो चौथाई । तासु चौथाई मान लेहु भाई ॥
धर्मदास वचन
हो प्रभु मैं चित बहुत सकाऊं । कत साहिब सो उत्तर लाऊं ॥
जाहि न होय शक्ति गुरु एता । सो जिव ऐसहि जाय अचेता ॥
औरो थोर कहौ प्रभु राई । जेहि ते जीव न यम धरि जाई ॥
(५२)
ज्ञानप्रकाश
सतगुरु वचन
धर्मदास बहु कीन्ह निहोरा । कह्यो सो वचन मान लियो तोरा ॥ यह जो कहेऊँ चौथाई तेहि होई । तासु चौथाई करि आरति सोई ॥
धर्मदास वचन
हो प्रभु कलिके जीव दरिद्रा । जाहि न होइहैं एतिक सुद्रा ॥ सो कैसे तोहिं पैहै स्वामी । कहहु थोर प्रभु अन्तर्यामी ॥
सतगुरु वचन
धर्मदास बहु कियेहु महताई । सवा पाँच सुद्रा लेहु भाई ॥
धर्मदास वचन
हो प्रभु विनती करो बहोरी । जाहि न एतिक किमि बंदी छोरी ॥
सतगुरु वचन
सुनु धर्मनि दोय नारियर आने । सवा पाँच आधो लै ठानै ॥
धर्मदास वचन
सवा पाँच आधो जेहि नाहीं । हो प्रभु सो जिव कैसत राहीं ॥
सतगुरु वचन
धर्मनि जेहि इतनो नहिं होई । तासु प्रमोधेहु कहौ बिलोई ॥ सवा सेर मिष्टान्न मँगाओ । पान सवा सै उत्तम लाओ ॥ सवा हाथ बस्तर पुनि श्वेता । अग्र पुहुप पूँगी फल चेता ॥ गोघृत शुचि दीपक बारी । बैठि सिंहासन नाम सुधारी ॥ अन्तरध्यान सुरति संचरिये । सत्यसुकृत कहैं मालुम करिये ॥ यम तृण तोरहु वीरा दीजै । शक्ति होय तब आरति कीजै ॥ प्रति सम्भवत गुरु आरति चाही । आरति करै शक्ति होय जाही ॥ शक्ति अछतनहि आरति करई । भक्तिहीन बहु संकट परई ॥ माया ठगनी आहि रे भाई । यह काहूके संग न जाई ॥ जिन गुरु साधु सेवा चित लावा । सो माया कहैं जीति सिधावा ॥ जिन माया कहैं जोगयो भाई । नहिं परमारथ स्वारथ लाई ॥ सो जीव अन्त बहुत दुख पावै । भक्तिहीन यम नाच नचावै ॥
बोधसागर
(५३)
धर्मदास वचन
हो प्रभु तुम्ह सतपुरुष कृपाला । अन्तर्यामी दीन दयाला ॥ मोहि निश्चय तुवपद विश्वासा । यह माया स्वप्नेकी आशा ॥ जिन्ह जिन्ह माया नेह बढाया । तिन्ह २ निज २ जन्म गँवाया ॥ सवालाख तुम मोहि बतायो । सवा करोड प्रभु आरति लायो ॥ औ जन सप्पति मोर घरआही । अरपौ सभै संतन जो चाही ॥ तुम प्रभु निःइच्छा नहिं चाहो । धन्य समरथ मर्याद दिढाहो ॥ सो जिव पाँवर नरकै जायी । शक्ति अक्षत जो राखु छिपायी ॥ हो प्रभु कलु विनती अनुसार्हूँ । बकसहु दिढाई तो वचन उचारहूँ ॥ सवाशेर भाषहु मिष्टाना । औरौ वस्तु सवासो पाना ॥ हो प्रभु कोई जिव भिक्षुक होई । भीख माँगि तन पालै सोई ॥ सो जिव शब्द तोहार न जानै । कहहु केहि विधि लोक पयानै ॥
सतगुरु वचन
हो धर्मनि जो अस जिव होई । गुरु निज ओर करै पुनि सोई ॥ इतने विनु जिव रोकि न राखा । छोरी बन्ध नाम तिहि भाखा ॥
धर्मदास वचन
धन्य धन्य तुम दीन दयाला । दया सिन्धु दुखहरण कृपाला ॥ छन्द-तुम धन्य सदगुरु जीव रक्षक कालमर्दन नाम हो ॥ शुभ पन्थ भक्ति दिढायऊ प्रभु अमर सुखके धाम हो ॥ मैं सुदिन आपन तबहिं जान्यो प्रथमपद जब देखेऊँ ॥ अब भयेऊँ सुखी निशङ्क यमते सुफल जीवन लेखेऊँ ॥ दोहा-विनती एक करौ प्रभु, कृपा करहु जंगदीश ॥ दो सेवक जो तुम मिले, सो तो कहूँ नहिं दीश ॥
सतगुरु वचन
सोरठा-धर्मदास लेहु जानि, हम वो एकै थान है ॥ कहौ शब्द परमान, वो हम में उन माँहि हम ॥
(५४)
ज्ञानप्रकाश
धर्मदास वचन-चौपाई
हो प्रभु उन मोहिँ बड़ सुख दीन्ह। तुम भये गुप्त राखि उन्ह लीन्ह॥ विरह सिन्धु बूड़त उन्ह राखा। उन्ह दृशन की है अभिलाखा॥
सतगुरु वचन
हो धर्मनि हम माँहि उन्ह देखो। उन्ह मोहिँ द्वितीय भाव जनिलेखो॥ स्वामा सेवक एकै प्र ना। परिचै सुरति नाहिँ विलगाना॥ हो धर्मनि तुमहूँ हम माहीं। मोहिँ तोहिँ अब अन्तर नाहीं॥ जो सेवक गुरु सुरति खमीरा। जीवन मुक्ति सो आहि कबीरा॥ जेहि सेवक गुरुहीं परशंसा। कहै कबार सो निर्मल हंसा॥ सेवक कहँ अस चाहिये भाई। गुरुहिँ रिझावे आपु गँवाई॥ जिमि नटकला मगन होय खेला। तिमि गुरु भक्ति मगन होय चेला॥ निजतन मन सुख स्वाद गँवावै। मन वच कर्म गुरु सेवा लावै॥ निशि वासर सेवा चित देई। गुरुहिँ रिझाय परम पद लेई॥ जग पहाँ सेवा वश भगवाना। धर्मदास यह वचन प्रमाना॥ सेवक सुरति प्रीति वश भाई। शून्य महा वस्ती होय जाई॥ तैसी प्रीति सुरति शुचि सेवा। किमि प्रसन्न नहिँ होहिँ गुरु देवा॥ धर्मनि सो सेवक मोहिँ भावै। जो गुरु साधु सेवा चित लावै॥ सेवा करि नहिँ धरै हंकारा। रहै अधीन दास सोइ प्यारा॥ हा धर्मनि तुम्ह अससिख अहहू। हम तुम्ह एक साँच हिय गहहू॥
धर्मदास वचन
धर्मदास पद गहे अनुरागा। हो प्रभु तुम्ह सोहि कीन्ह सुभागा॥ मैं पामर गुणहीन कुचाली। तुम्ह दीन्है उ मोहि पन्थ मराली॥ हे प्रभु नहि रसना प्रभुताई। अमित रसन गुण वरणि नहि जाई॥ महिमा अमित अहे हो स्वामी। केहि विधि वणौ अन्तर्यामी॥ जेहि सेवक पर होय तव दाया। ताके हृदय बुद्धि अस आया॥ पूर्ण भाग करै सेवकाई। धन्य सेवक जिन्ह गुरुहिँ रिझाई॥ मैं सब विधि अयोग्य अविचारी। मोहि अधर्महि तुम लीन्ह उबारी॥
कबीर साहबका चौथीबार अन्तर्धान होना और धर्मदास साहबका व्याकुल होना और पांचवीबार फिर मिलना
बोधसागर
(५५)
अब यह दया करो सुखदाई । दोउ सेवक कै दरशन पाई ॥ बड़ इच्छा उन्ह दरशन केरा । हो प्रभु हम आहीं तुव चेरा ॥
सतगुरु वचन
सुनु धर्म निदरशन तिन्ह पैहौ । लीला देखि थकित होइ जैहौ ॥ आप तीनरूप प्रकट दिखावा । एक तीन होय एक समावा ॥ धरमदास अचरज है रहेऊ । समिता होय युगल पद गहेऊ ॥ लीला देखि चकित भये दासा । पुनि विनती एककीन्ह प्रगासा ॥
धर्मदास वचन
हे प्रभु अविगति कला तुम्हारी । हम हैं कीट जीव व्यभिचारी ॥ सत्यलोक तुम्ह वरणि सुनावा । सोभा पुरुष ईसन सतभावा ॥ कैसन देश राज वह आही । चित इच्छा प्रभु देखन ताही ॥
सतगुरु वचन
धर्मदास यह निरघिन काया । यहितन पुरुष दरश किमि पाया ॥ तन ठीका जब पुरि है आई । सत्यलोक तब देखहु जाई ॥
धर्मदास वचन
धर्मदास गहि चरण निहोरा । हे प्रभु तृषा मिटावहु मोरा ॥ चरण टेकि प्रभु विनवौ तोहीं । पुरुष दरश विनु कल नहिं मोहीं ॥
कबीर साहिबका फिर अन्तर्धान हो जाना और धर्मदास
साहबका विकल होना
गुप्त भये प्रभु अविगति ताता । धर्मदास मुख आवै न बाता ॥
धर्मदासविलाप
मैं मतिहीनकुमति मुहिलागा । मोहिंसमको जग आहि अभगा ॥ मैं मूरख प्रतीति न कीन्हा । अस साहेब कहैं मैं नहि चीन्हा ॥ अब कौने विधि दरशन पाऊँ । दरशन विनु मैं प्राण गवाऊँ ॥ चरणोदक विनु करौं न आसा । तजौं शरीर कहैं धर्मदासा ॥ दिवस सात लगि अन्न न खावा । भजन अखण्ड नाम लौलावा ॥
धर्मदासजीको सत्यलोक दिखाना
(५६)
ज्ञानप्रकाश
कबौर साहिबका पांचवीं बार फिर धर्मदासजीको दर्शन देना
सतयै दिन प्रभु प्रकट दिखाये । धर्मदास पद गहि अकुलाये ॥ धरहिं न श्वामहिनिपट अधीरा । परे चरण महाँ क्षीण शरीरा ॥ कर गहि साहब तबहिं उठावा । शीश हाथ दै अंक मिलावा ॥ धर्मदास चरणोदक लीन्हा । चरण पखारि आचमन कीन्हा ॥
सतगुरु वचन
हो धर्मदास प्रमाद कछु पाओ । करि प्रसाद तव मोपहैं आओ ॥ छन्द-चित्तसकुचिधर्मनिविछुरन गुनि सर्वत्र सब हौरा किये ॥ कछु जाइ अलप प्रमाद ततक्षण तृण जल अंचवन लिये ॥ पुनि वेगि समरथ निकट आये सकुचि चित ठाढे भये ॥ अनुशासनो कहु धर्मनि कहा चित चिन्ता भये ॥
धर्मदास वचन
दोहा-धर्मदास कह नाइ शिर, सुनु प्रभु अगम अपार ॥ सात दिवस कहवों रहे, कौन दिशा पगु ढार ॥
सतगुरु वचन
सोरठा-धर्मनि सुनु चित लाय, जौन दिशा हम गौन किये । कालिजर पहुँचे जाय, तहाँ पुनि शब्द प्रकाशेउँ ॥
धर्मदास वचन-चौपाई
हो साहेब कै जीव परमोधा । कौन शब्द सो आन समोधा ॥ आरति चौका नरियर मोरचो । कै जीवन यमते तृणतोरचो ॥
सतगुरु वचन
धर्मनि सुनहु ताहि सहिदाना । तहाँकेजीवहिंनहिंदीन्ह प्रवाना ॥ आरति चौका तहाँ न कीना । नहीं तहाँ नरियर मोरु प्रवीना ॥ वचन बंध जीवनकहैं कियेऊँ । साखी शब्द रमैनी दियेऊँ ॥ कहिआयेऊँतहैंवचन ठिकाना । धर्मदास सो न लियेहु प्रवाना ॥
बोधसागर
(५७)
जम्बूद्वीप कलिके कडिहारा । धर्मनि बाहु जीव होयँ पारा ॥ धर्मनि बाँह जिय पहुँचे आयी । देहु दान जेहि आरति लायी ॥ शब्द मानि पुनि मस्तक नाया । पुरुष दरशकै बात जनाया ॥
धर्मदास वचन
हो प्रभु चिन्तागण करु मोरा । पुरुष दरश देउ करो निहोरा ॥
सतगुरु वचन
धर्मदास यह हठ का करहु । मानहुँ शब्द शीश पर धरहु ॥ हमरे गहे पुरुष पहुँ जैहा । विना गहे उहाँ जान न पैहा ॥ हमसों पुरुष सो ऐसी अहई । जल तरंग जल अन्तर रहई ॥ जिमिरवि और वि तेजप्रकाशा । तिमिमाहि पुरुष अन्तर धर्मदासा ॥ हमरी सुरति गहौ चितलायी । तबहीं पुरुष पद दर्शन पायी ॥ शिष्य हृदय प्रतीति अस आनै । गुरु औ पुरुष भिन्न नहि जानै ॥ जौ लौ चित अस रीति न आवै । तौ लौ जिवनहि लोकसिधावै ॥ धर्मदास चित बहुत सकाने । चरण टेकि बहु विनती ठाने ॥
धर्मदास वचन
हो प्रभु सत्य कहौ तोहि पाहीं । तुम्हते कछु दुचितार्ई नाहीं ॥ मोरे तुमहि पुरुष हौ स्वामी । यमते छोड़ावहु अन्तर्यामी ॥ हो प्रभु बरणेउँ लोककी शोभा । ताते आहि मारममलोभा ॥ तव लीला बहुतै हम देखा । पुरुष दरशविनु रहै हिय रेखा ॥ जौ किंकर पर होहु दयाला । तौ छिन महाँहायगत उरसाला ॥
सतगुरु वचन
धर्मनि जौ ऐसो चित कीन्हा । तनुतजि चलौ लोकप्रवीना ॥ राखेउ तन गौने लै हंसा । तहँ पहुँचे जहँ कालै संसा ॥ लवन एक महाँ पहुँचे जाई । अविगति लीला लखै को भाई ॥ शोभालोक देखि सुख माना । उदित असंख्य शशिऔ भाना ॥
(५८)
ज्ञानप्रकाश
जितदेखिये जगमगझलकाहीं । देखत छकित भये हियमाहीं ॥ द्वारपाल हंस जो रहिया । ता महाँ एकहंसहिँ असकहिया ॥ एहि संसहिँ तुम्हजाहु लिवाई । पुरुष दरश दे आनहुँ भाई ॥ चले लिवाय पुरुष पहुँ जबहीं । झझकि हंस बहु आये तबहीं ॥ करत कोलाहल मंगल चारा । शोभा अद्भुत अंग अपारा ॥ हंसन शोभा कहाँ बताऊँ । कछुक प्रभाव सो वरणि सुनाऊँ ॥ रतनमाल ग्रिव शोभित हंसा । और मणिमाल किमिकरौँ प्रशंसा ॥ जगमग देह हंसन करहीं । अमर चीर बहु शोभा धरहीं ॥ उडुराख चिकुर शोभा छबि आछे । रविका करतार रोम छबिकाछे ॥ हंसन्हभाल शोभा किमि कहऊँ । षोडस चन्द्रभाल छबि लहऊँ ॥ हंस कान्ति प्रतिरोम प्रकाशा । हीरामणी उदित रोमासा ॥ कोटिकविधु हंसन छबिमोहा । देह प्राण शोभा अमी गिरोहा ॥ षोडश रवि हंसन छबि मोहा । देह प्राण शुभ अमृत सोहा ॥ कञ्चन कलश जडित मणि लोना । रतन थार आरतिमहि सोना ॥ हंस मगन शब्द मुख उचारा । कीडाविनोद रतन मणियारा ॥ सुरति हंस कहँ आगे लीन्हा । नृत करत चले हंस प्रवीणा ॥ सुरति हंस अप्रानि अघाने । पुरुष सकल देखत हरषाने ॥ सिंघासन छबि देखत मनमोहा । अद्भुत अमित कलातन सोहा ॥ पुरुष राम एक कला अनन्ता । वरणत कोउ न पावै अन्ता ॥ एक रोम रवि शशि कोटीशा । नखकोटिन्ह विधुमलिन रवीशा ॥ पुरुष प्रकाश सतलोक अँजोरा । तहाँ न पहुँच निरञ्जन चोरा ॥ पुरुष कबीर देखा एक भाई । धर्मदास पुनि रहे लजाई ॥ पुरुष दरश करि आयेउ तहँवा । प्रथम कबीर बैठे रहै जहँवा ॥ इहाँ कबीर बैठे पुनि देखा । कला पुरुष तन अचरजपेखा ॥ का अजगुत कीन्हैके भाई । उहाँ मोहिँ प्रतीति न आई ॥
बोधसागर
(५९)
कवीर पुरुष यक उहाँ छिपाये । सत्य पुरुष जग दास कहाये ॥ धाये चरण गहु अति सकुचायी । हे प्रभु हम परिचै अब पायी ॥ यह शोभा कस उहाँ छिपावा । कस नहिं जगमहँ प्रगट दिखावा ॥
सतगुरु वचन
धर्मनि जोवहि छवि जग जाऊ । तो होय विकल निरअन राऊ ॥ सब जीव तब मोहि लौलावे । उजरे भौ सब लोकहि आवै ॥ ताते गुप्त राखो जग भाऊ । शब्द सँदेश जीवन समुझाऊ ॥ शब्दपरखि चीन्हैं माहिं कोई । गहि प्रतीति घर पहुँचे सोई ॥ कहै कवीर सुनहुँ सुकृति हंसा । दरश पुरुष मिटेहु चित मंसा ॥ अब तुम्ह वेगि चला संसारा । जिवहि चेतावहु करहु पुकारा ॥
धर्मदास वचन
हो साहेब अब उहाँ न जाही । यह सुख घरतजि कहाँ झुराही ॥ वहि यम देश अपरबल काला । नहिं जानौधौ मति होयवेहाला ॥
सतगुरु वचन
धर्मदास तोहि चिन्ता नाहीं । तुमरे सङ्ग हम सदा रहाहीं ॥ तुम देखो सत्य लोक प्रभाऊ । हंसन कहो संदेश सुनाऊ ॥
धर्मदास वचन
मानेउँ शब्द शीश पर राखा । लैचलु अंश सुकृत तब भाषा ॥ छिन एक महँ जगहीं चलि आये । पैठि देह धर्मनि अकुलाये ॥ परेउ चरण गहि साहब केरा । करि बिनती पदगहि सुख हेरा ॥
छन्द-धन्य साहेब सतगुरु तुम सत्य पुरुष अनादि हो ॥ तुव अमितलीला कोलखै प्रभु सकल लोकके तुम आदिहो ॥ त्रिदेव मुनि सनकादि नारद कोईना लखि तुम पावई ॥ तेहि हंस भाग सराहिये जो नाम तुव लौ लावई ॥
(६०)
ज्ञानप्रकाश
दोहा-निर्गुण सर्गुण आदिहौं, अविगति अगम अथाह ॥
गुप्त भये जग महाँ फिरो, को तुव पावै थाह ॥
सोरठा-मोहि परचै तुम दीन्ह, ताते चीन्हैउँ तोहि प्रभु ॥
भये चरण लौलीन, दुचितार्ई सकलो गयी ॥
चौपाई
कीट ते भुंङ्ग मोहि प्रभुकीन्ह। निश्चलरंग आपनो दीन्ह। ॥
जिमिनिलते जग होय फुलेला। तिमिमोहिं भयोसमर्थपदमेला॥
पारस परसि लोहा जिमिहेमा। तिमि मोहिं भयउनाथव्रतनेमा॥
अगर परसि जिमिभयोसुवासा। जल प्रसंग बसन मल नासा ॥
सनपट शुद्ध सूत कहै न कोई। प्रभुगुण लखित शिरनावैलोई ॥
हे प्रभु तिमिमाहिं भयउ अनंदा। जिमिचकोरहरहितलखिचंदा ॥
जनम मरण भौ संशय नाशी। तवपद सुखनिधान सुखराशी ॥
हे प्रभु अस शिख दीजै मोहीं। एकौ पल न विसारौं तोहीं ॥
सतगुरु वचन
जस मनसा तस आगे आवै। कहै कवीर ईजा नहिं पावै ॥
धर्मनि गुरुहिं दोष देह प्रानी। आपु करहिंनर आपनहानी ॥
जो गुरु वचन कहै चित लाई। ब्यापै नाहिं ताहि दुचितार्ई ॥
जो गुरुचरन शिष्य संयोग। उपजै ज्ञान न नासै भ्रम रोगा ॥
जिमि सौदागर साहु मिलाहीं। पूँजि जोग बहु लाभ बढ़ाहीं ॥
सतगुरु साहु सन्त सौदागर। सजीशब्द गुरुयोगा बहुनागर ॥
जो गुरु शब्द कहै विश्वासा। गुरु पूरा पुरवहिं आसा ॥
विनु विश्वास पावै दुखचैला। गहै न निश्चय हृदय गुरुमेला ॥
सुत नारी तन मन धन जाई। तन जोरहै न प्रीति टढाई ॥
शूरा हंस सोई कहलावै। अग्नि रहै तो शोक न लावै ॥
जो विचलै तौ यम धरि खायी। अड़ा रहै तौ निज घर जायी ॥
हंसरहनीवर्णन
बोधसागर
(६१)
काल कसौटी ठहरे हँसा । कहैं कबीर सोइ सुकृत अंसा ॥ सत्य असत्य जानि किमि जायी । कादर विचलै सूर रहायी ॥ धर्मदास तोहि बहुत बुझावा । रहनि गहनि सतपन्थ बतावा ॥ बहुते बेर सिखायो तोही । देखौ अयश न पावै मोही ॥ बहुरि कोटि शिखापन तोही । देखहुँ कोइ हँसै ना मोही ॥
रहनी वर्णन
अभ्यागत जो आवे द्वारा । सन्त असन्त सोहि विचारा ॥ दीजै भिक्षा हरष सो ताहीं । एहि सम योग पुण्य तप नाहीं ॥
धर्मदास वचन
हे साहेब विनती एक करऊं । समरथ जानि पट उतर धरऊं ॥ हे प्रभु रंक होय कोइ दासा । जाय अभ्यागत ताहि अवासा ॥ ताके घर कछु सुकृत न होई । सो कस करै कहो प्रभु सोई ॥ सो कस करै कहौ प्रभुराई । केहि प्रकार तेहि सेवा लाई ॥
सत्गुरु वचन
मुनु धर्मनि पथ नीती भाखे । शक्ति अछत पुनि गोय न राखे ॥ तन बस्तर लै गोय न भाई । जब अशक्त तब काह कराई ॥ आप खाय तब ताहि खिआवै । नहि तो यक सम समय गँवावै ॥ तीरथ व्रत जप तप बहु करमा । काहे परै याहि निज धरमा ॥ कोटि तीर्थ भ्रमर फल पावै । सो फल भरहीं साधु जिवैं ॥ मानो गुरु साधुनका बानी । कह कबीर शब्द सहिदानी ॥ कहै कबीर सत्यगुरु औ साधू । सत्यनाम गहि मिटै उपाधू ॥ सत्यकवीर सत्यगुरु औ साधू । सत्यनाम कहैं सत्य अवराधू ॥ सत्य नाम गहि तजे दुचितार्ई । कहैं कवीर हम ताहि सहाई ॥ सत्यनाम कहैं चीन्हैं सोई । कहैं कवीर गुरु गम जेहि होई ॥ को हम को तुम को है अनन्ता । कहैं कबीर यह बूझैं सन्ता ॥