कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
धर्मदासजीको सत्यलोक दिखाना
(५६)
ज्ञानप्रकाश
कबौर साहिबका पांचवीं बार फिर धर्मदासजीको दर्शन देना
सतयै दिन प्रभु प्रकट दिखाये । धर्मदास पद गहि अकुलाये ॥ धरहिं न श्वामहिनिपट अधीरा । परे चरण महाँ क्षीण शरीरा ॥ कर गहि साहब तबहिं उठावा । शीश हाथ दै अंक मिलावा ॥ धर्मदास चरणोदक लीन्हा । चरण पखारि आचमन कीन्हा ॥
सतगुरु वचन
हो धर्मदास प्रमाद कछु पाओ । करि प्रसाद तव मोपहैं आओ ॥ छन्द-चित्तसकुचिधर्मनिविछुरन गुनि सर्वत्र सब हौरा किये ॥ कछु जाइ अलप प्रमाद ततक्षण तृण जल अंचवन लिये ॥ पुनि वेगि समरथ निकट आये सकुचि चित ठाढे भये ॥ अनुशासनो कहु धर्मनि कहा चित चिन्ता भये ॥
धर्मदास वचन
दोहा-धर्मदास कह नाइ शिर, सुनु प्रभु अगम अपार ॥ सात दिवस कहवों रहे, कौन दिशा पगु ढार ॥
सतगुरु वचन
सोरठा-धर्मनि सुनु चित लाय, जौन दिशा हम गौन किये । कालिजर पहुँचे जाय, तहाँ पुनि शब्द प्रकाशेउँ ॥
धर्मदास वचन-चौपाई
हो साहेब कै जीव परमोधा । कौन शब्द सो आन समोधा ॥ आरति चौका नरियर मोरचो । कै जीवन यमते तृणतोरचो ॥
सतगुरु वचन
धर्मनि सुनहु ताहि सहिदाना । तहाँकेजीवहिंनहिंदीन्ह प्रवाना ॥ आरति चौका तहाँ न कीना । नहीं तहाँ नरियर मोरु प्रवीना ॥ वचन बंध जीवनकहैं कियेऊँ । साखी शब्द रमैनी दियेऊँ ॥ कहिआयेऊँतहैंवचन ठिकाना । धर्मदास सो न लियेहु प्रवाना ॥
बोधसागर
(५७)
जम्बूद्वीप कलिके कडिहारा । धर्मनि बाहु जीव होयँ पारा ॥ धर्मनि बाँह जिय पहुँचे आयी । देहु दान जेहि आरति लायी ॥ शब्द मानि पुनि मस्तक नाया । पुरुष दरशकै बात जनाया ॥
धर्मदास वचन
हो प्रभु चिन्तागण करु मोरा । पुरुष दरश देउ करो निहोरा ॥
सतगुरु वचन
धर्मदास यह हठ का करहु । मानहुँ शब्द शीश पर धरहु ॥ हमरे गहे पुरुष पहुँ जैहा । विना गहे उहाँ जान न पैहा ॥ हमसों पुरुष सो ऐसी अहई । जल तरंग जल अन्तर रहई ॥ जिमिरवि और वि तेजप्रकाशा । तिमिमाहि पुरुष अन्तर धर्मदासा ॥ हमरी सुरति गहौ चितलायी । तबहीं पुरुष पद दर्शन पायी ॥ शिष्य हृदय प्रतीति अस आनै । गुरु औ पुरुष भिन्न नहि जानै ॥ जौ लौ चित अस रीति न आवै । तौ लौ जिवनहि लोकसिधावै ॥ धर्मदास चित बहुत सकाने । चरण टेकि बहु विनती ठाने ॥
धर्मदास वचन
हो प्रभु सत्य कहौ तोहि पाहीं । तुम्हते कछु दुचितार्ई नाहीं ॥ मोरे तुमहि पुरुष हौ स्वामी । यमते छोड़ावहु अन्तर्यामी ॥ हो प्रभु बरणेउँ लोककी शोभा । ताते आहि मारममलोभा ॥ तव लीला बहुतै हम देखा । पुरुष दरशविनु रहै हिय रेखा ॥ जौ किंकर पर होहु दयाला । तौ छिन महाँहायगत उरसाला ॥
सतगुरु वचन
धर्मनि जौ ऐसो चित कीन्हा । तनुतजि चलौ लोकप्रवीना ॥ राखेउ तन गौने लै हंसा । तहँ पहुँचे जहँ कालै संसा ॥ लवन एक महाँ पहुँचे जाई । अविगति लीला लखै को भाई ॥ शोभालोक देखि सुख माना । उदित असंख्य शशिऔ भाना ॥
(५८)
ज्ञानप्रकाश
जितदेखिये जगमगझलकाहीं । देखत छकित भये हियमाहीं ॥ द्वारपाल हंस जो रहिया । ता महाँ एकहंसहिँ असकहिया ॥ एहि संसहिँ तुम्हजाहु लिवाई । पुरुष दरश दे आनहुँ भाई ॥ चले लिवाय पुरुष पहुँ जबहीं । झझकि हंस बहु आये तबहीं ॥ करत कोलाहल मंगल चारा । शोभा अद्भुत अंग अपारा ॥ हंसन शोभा कहाँ बताऊँ । कछुक प्रभाव सो वरणि सुनाऊँ ॥ रतनमाल ग्रिव शोभित हंसा । और मणिमाल किमिकरौँ प्रशंसा ॥ जगमग देह हंसन करहीं । अमर चीर बहु शोभा धरहीं ॥ उडुराख चिकुर शोभा छबि आछे । रविका करतार रोम छबिकाछे ॥ हंसन्हभाल शोभा किमि कहऊँ । षोडस चन्द्रभाल छबि लहऊँ ॥ हंस कान्ति प्रतिरोम प्रकाशा । हीरामणी उदित रोमासा ॥ कोटिकविधु हंसन छबिमोहा । देह प्राण शोभा अमी गिरोहा ॥ षोडश रवि हंसन छबि मोहा । देह प्राण शुभ अमृत सोहा ॥ कञ्चन कलश जडित मणि लोना । रतन थार आरतिमहि सोना ॥ हंस मगन शब्द मुख उचारा । कीडाविनोद रतन मणियारा ॥ सुरति हंस कहँ आगे लीन्हा । नृत करत चले हंस प्रवीणा ॥ सुरति हंस अप्रानि अघाने । पुरुष सकल देखत हरषाने ॥ सिंघासन छबि देखत मनमोहा । अद्भुत अमित कलातन सोहा ॥ पुरुष राम एक कला अनन्ता । वरणत कोउ न पावै अन्ता ॥ एक रोम रवि शशि कोटीशा । नखकोटिन्ह विधुमलिन रवीशा ॥ पुरुष प्रकाश सतलोक अँजोरा । तहाँ न पहुँच निरञ्जन चोरा ॥ पुरुष कबीर देखा एक भाई । धर्मदास पुनि रहे लजाई ॥ पुरुष दरश करि आयेउ तहँवा । प्रथम कबीर बैठे रहै जहँवा ॥ इहाँ कबीर बैठे पुनि देखा । कला पुरुष तन अचरजपेखा ॥ का अजगुत कीन्हैके भाई । उहाँ मोहिँ प्रतीति न आई ॥
बोधसागर
(५९)
कवीर पुरुष यक उहाँ छिपाये । सत्य पुरुष जग दास कहाये ॥ धाये चरण गहु अति सकुचायी । हे प्रभु हम परिचै अब पायी ॥ यह शोभा कस उहाँ छिपावा । कस नहिं जगमहँ प्रगट दिखावा ॥
सतगुरु वचन
धर्मनि जोवहि छवि जग जाऊ । तो होय विकल निरअन राऊ ॥ सब जीव तब मोहि लौलावे । उजरे भौ सब लोकहि आवै ॥ ताते गुप्त राखो जग भाऊ । शब्द सँदेश जीवन समुझाऊ ॥ शब्दपरखि चीन्हैं माहिं कोई । गहि प्रतीति घर पहुँचे सोई ॥ कहै कवीर सुनहुँ सुकृति हंसा । दरश पुरुष मिटेहु चित मंसा ॥ अब तुम्ह वेगि चला संसारा । जिवहि चेतावहु करहु पुकारा ॥
धर्मदास वचन
हो साहेब अब उहाँ न जाही । यह सुख घरतजि कहाँ झुराही ॥ वहि यम देश अपरबल काला । नहिं जानौधौ मति होयवेहाला ॥
सतगुरु वचन
धर्मदास तोहि चिन्ता नाहीं । तुमरे सङ्ग हम सदा रहाहीं ॥ तुम देखो सत्य लोक प्रभाऊ । हंसन कहो संदेश सुनाऊ ॥
धर्मदास वचन
मानेउँ शब्द शीश पर राखा । लैचलु अंश सुकृत तब भाषा ॥ छिन एक महँ जगहीं चलि आये । पैठि देह धर्मनि अकुलाये ॥ परेउ चरण गहि साहब केरा । करि बिनती पदगहि सुख हेरा ॥
छन्द-धन्य साहेब सतगुरु तुम सत्य पुरुष अनादि हो ॥ तुव अमितलीला कोलखै प्रभु सकल लोकके तुम आदिहो ॥ त्रिदेव मुनि सनकादि नारद कोईना लखि तुम पावई ॥ तेहि हंस भाग सराहिये जो नाम तुव लौ लावई ॥
(६०)
ज्ञानप्रकाश
दोहा-निर्गुण सर्गुण आदिहौं, अविगति अगम अथाह ॥
गुप्त भये जग महाँ फिरो, को तुव पावै थाह ॥
सोरठा-मोहि परचै तुम दीन्ह, ताते चीन्हैउँ तोहि प्रभु ॥
भये चरण लौलीन, दुचितार्ई सकलो गयी ॥
चौपाई
कीट ते भुंङ्ग मोहि प्रभुकीन्ह। निश्चलरंग आपनो दीन्ह। ॥
जिमिनिलते जग होय फुलेला। तिमिमोहिं भयोसमर्थपदमेला॥
पारस परसि लोहा जिमिहेमा। तिमि मोहिं भयउनाथव्रतनेमा॥
अगर परसि जिमिभयोसुवासा। जल प्रसंग बसन मल नासा ॥
सनपट शुद्ध सूत कहै न कोई। प्रभुगुण लखित शिरनावैलोई ॥
हे प्रभु तिमिमाहिं भयउ अनंदा। जिमिचकोरहरहितलखिचंदा ॥
जनम मरण भौ संशय नाशी। तवपद सुखनिधान सुखराशी ॥
हे प्रभु अस शिख दीजै मोहीं। एकौ पल न विसारौं तोहीं ॥
सतगुरु वचन
जस मनसा तस आगे आवै। कहै कवीर ईजा नहिं पावै ॥
धर्मनि गुरुहिं दोष देह प्रानी। आपु करहिंनर आपनहानी ॥
जो गुरु वचन कहै चित लाई। ब्यापै नाहिं ताहि दुचितार्ई ॥
जो गुरुचरन शिष्य संयोग। उपजै ज्ञान न नासै भ्रम रोगा ॥
जिमि सौदागर साहु मिलाहीं। पूँजि जोग बहु लाभ बढ़ाहीं ॥
सतगुरु साहु सन्त सौदागर। सजीशब्द गुरुयोगा बहुनागर ॥
जो गुरु शब्द कहै विश्वासा। गुरु पूरा पुरवहिं आसा ॥
विनु विश्वास पावै दुखचैला। गहै न निश्चय हृदय गुरुमेला ॥
सुत नारी तन मन धन जाई। तन जोरहै न प्रीति टढाई ॥
शूरा हंस सोई कहलावै। अग्नि रहै तो शोक न लावै ॥
जो विचलै तौ यम धरि खायी। अड़ा रहै तौ निज घर जायी ॥
हंसरहनीवर्णन
बोधसागर
(६१)
काल कसौटी ठहरे हँसा । कहैं कबीर सोइ सुकृत अंसा ॥ सत्य असत्य जानि किमि जायी । कादर विचलै सूर रहायी ॥ धर्मदास तोहि बहुत बुझावा । रहनि गहनि सतपन्थ बतावा ॥ बहुते बेर सिखायो तोही । देखौ अयश न पावै मोही ॥ बहुरि कोटि शिखापन तोही । देखहुँ कोइ हँसै ना मोही ॥
रहनी वर्णन
अभ्यागत जो आवे द्वारा । सन्त असन्त सोहि विचारा ॥ दीजै भिक्षा हरष सो ताहीं । एहि सम योग पुण्य तप नाहीं ॥
धर्मदास वचन
हे साहेब विनती एक करऊं । समरथ जानि पट उतर धरऊं ॥ हे प्रभु रंक होय कोइ दासा । जाय अभ्यागत ताहि अवासा ॥ ताके घर कछु सुकृत न होई । सो कस करै कहो प्रभु सोई ॥ सो कस करै कहौ प्रभुराई । केहि प्रकार तेहि सेवा लाई ॥
सत्गुरु वचन
मुनु धर्मनि पथ नीती भाखे । शक्ति अछत पुनि गोय न राखे ॥ तन बस्तर लै गोय न भाई । जब अशक्त तब काह कराई ॥ आप खाय तब ताहि खिआवै । नहि तो यक सम समय गँवावै ॥ तीरथ व्रत जप तप बहु करमा । काहे परै याहि निज धरमा ॥ कोटि तीर्थ भ्रमर फल पावै । सो फल भरहीं साधु जिवैं ॥ मानो गुरु साधुनका बानी । कह कबीर शब्द सहिदानी ॥ कहै कबीर सत्यगुरु औ साधू । सत्यनाम गहि मिटै उपाधू ॥ सत्यकवीर सत्यगुरु औ साधू । सत्यनाम कहैं सत्य अवराधू ॥ सत्य नाम गहि तजे दुचितार्ई । कहैं कवीर हम ताहि सहाई ॥ सत्यनाम कहैं चीन्हैं सोई । कहैं कवीर गुरु गम जेहि होई ॥ को हम को तुम को है अनन्ता । कहैं कबीर यह बूझैं सन्ता ॥
(६२)
ज्ञानप्रकाश
सोइ हम सोइ तुम सोइ अनन्ता । कहैं कबीर गुरु पारस सन्ता ॥ सन्त चेतु चित सतगुरु ध्याना । कहैं कबीर सद्गुरु परमाना ॥ सतगुरु शब्द ज्ञान गुरु पुंजा । कहैं कबीर लखु मोहनकुंजा ॥ कुंज मोहि मोहन ठहरावै । कहैं कबीर सोइ सन्त कहावै ॥ सन्त कहाय जो सोधै आपू । कहैं कबीर तेहि पुण्य न पापू ॥ पुण्य पाप नहि मान गुमाना । कहैं कबीर सो लोक समाना ॥ जिन्दा सुरदा चीन्है जीवा । कहैं कबीर सतगुरु निज पीवा ॥ सुरदा जग जिन्दा सतनामा । कहैं कबीर सतगुरु निज धामा ॥ यक जग जीतै यक जग हारै । कहैं कबीर गुरु काज सवैरै ॥
धर्मदास बचन
कौन जग जीतै कौन जग हारै । कहौ कौन विधि काज सवैरै ॥
सतगुरु बचन
इन्द्रिन जीते साधुन सो हारै । कहैं कबीर सतगुरु निस्तारै ॥ सतगुरु सो सत्यनाम लखावै । सतपुर लै हंसन पहुँचावै ॥ सत्यनाम सतगुरु तत भाखा । शब्द ग्रन्थ कथि गुप्तहि राखा ॥ सत्य शब्द गुरु गम पहिचाना । विनु जिभ्या करु अमृत पाना ॥ सत्य सुरति अम्मर सुख चीरा । अमी अंकका साजहु वीरा ॥ सोहं ओहं जावन वीरु । धर्मदास सो कहै कबीरु ॥ धरिहौ गोय कहिहौ जिन काहीं । नाद सुशील लखैहो ताहीं ॥ प्रथमहि नाद विन्द तब कीन्हा । मुक्ति पन्थ सो नाद गहि चीन्हा ॥ नाद सो शब्द पुरुष मुख बानी । गुरुमुख शब्द सो नाद बखानी ॥ पुरुष नाद सुत षोडश अहई । नाद पुत्र शिष्य शब्द जो लहई ॥ शब्द प्रतीति गहै जो हंसा । शब्द चालु जेहिसे मम बंशा ॥ शब्द चाल नाद दृढ़ गहई । यम शिर पगु देइ सो निस्तरई ॥ सुमिरण दया सेवा चित धरई । सत्यनाम गहि हंसा तरई ॥
पठित मूर्खका वर्णन
बोधसागर
(६३)
बिन्दो होय शब्द मम धावैँ । नाहबिन्दु दोउ मोहिँ पहुँ आवैँ ॥ नाद सखा जेहि अहँविगुरचे । अहँ रहित सो निज घर पहुँचे ॥ केते पढ़ि गुणि नर्कीहि जैहै । केते पढ़ि गणि लोक सिधैहै ॥
धर्मदास बचन
हो सद्गुरु मैं तुम्हारो दासा । विनती करौँ खसम तुव पासा ॥ पढ़े गुणै दुइदिशि किमिजाहीं । सो चरित्र वरणों मोहिँ पाहीं ॥
सतगुरु बचन
सुनु धर्मनि बहु पढ़ि अरथावै । शब्द कहै सो चालु न पावै ॥ पढ़ि गुणि नीति विचारे नाही । अस पढुआ सुनु नरकहिँ जाही ॥ जिन्ह पढ़िशब्दचाल गहिभाई । सुनु धर्मनि सो लोकहि जाई ॥ छन्द-जो कथत बकतौ तरे जग तो जग सबै तरि जायहो ॥ तजि तरुत सुलतान उबैर नृप कयों बनजाय हो ॥ तातै कहूँ निज समुझ पापी शब्द पढ़ि सतपद गहै ॥ जो सत्य पद निरखत चलै तो नहिँ फेरि जो नीवहै ॥ दोहा-सत्यनाम सुमिरण करै, सतगुरुपद निज ध्यान ॥ आतम पूजा जीव दया, लहै सो मुक्ति अमान ॥ सोरठा-सदगुरु कहै पुकारी, चाल चलै पथ निरखिके ॥ इंस होय भव पारि, शब्द गहन सदगुरु कृपा ॥
चोपाई
गुप्त भयो कहि शब्द प्रमाना । कालिंजर पुनि आय तुलाना ॥ कहैं कालिंजर विनै बडाई । देहु पान मोहिँ अहो गुसाई ॥ धर्मदास कहै देउँ परवाना । साहिब मोहि कह्यो सहिदाना ॥ कह कालिंजर सुनहुँ गोसाई । का सहिदान आहि तुव ठाई ॥ तब सहिदान कहा सुख बासा । सतगुरु बोल कीन्ह परगासा ॥ समय संयोग बोल सो कहेऊ । सुनि भौमौन मुगुध होई रहेऊ ॥ जात कमीना सुनत परायी । केहि कारण आरती लायी ॥
साधन वर्णन
(६४)
ज्ञानप्रकाश
औरहिँ और बुझा उन्ह भाई । पान नलीन्ह वैसहिँ चलिजाई ॥ तेहि गौनत प्रभु प्रगटे तुरन्ता । कला अमित को पावै अन्ता ॥ धर्मदास गहि चरणशिर नाथी । युगकर जोरि ठाढ़ भो जायी ॥ बैठे पुनि आज्ञा प्रभु पाई । विमुख जीव कर बात जनाई ॥
धर्मदास वचन
प्रभु विरतन्त कहो अब ताहीं । वह पान मुक्तिकै लीन्हेसि नाहीं ॥ मैं भाषेऊँ तुमरी सहि दाना । दुर्मति बूझेसि कहु आना ॥
सतगुरु वचन
धर्मनि उन्ह जोन पान नलीन्है । परिहैं कालमुख जायकमीने ॥ तजि रणभूमि टरै जो भाई । तेहि जीवहिं निश्चै यम ख ई ॥ वह यम चोर कालके हंस । धर्मराय धरि करै विध्वंसा ॥ धर्मदास तुम सुनहु हमारा । निशिदिनरहिहो नाम अधारा ॥ अब तुम आपन करहु विचारा । करिहहु निशिदिन ज्ञानविचारा ॥ दुष्ट मित्र सों प्रेम बढै हो । भक्ति भजन आनन्द रहै हो ॥
अर्थ—दुष्ट और मित्र दोनोंमें किसीसे राग द्वेष न रखकर समान प्रीति रखना सबकी भलाई चाहूँ किसीकी बुराई नहीं चाहना ॥
जो सुख होय तो जनि इतरैहौ । दुख परै तौ जनि विललैहौ ॥ संकट महाँ बहु साहब कीजै । निश्चल नाम ध्यान चित दीजै ॥ चित निश्चन्त रहै जो भाई । तो तेहि संकट जाय नसाई ॥ यह मम देश दोउ है भाई । दुख सुख तन धरि चारै आई ॥ चहिये साधुन नहि चित डोलावैँ । हठ प्रतीतिनाम गुरु गावैँ ॥ कच्चे जीवन कर यह लेखा । संकट परै विकल हिय पेखा ॥ सुख सम्पति धन पुत्र सगाई । यह सब सपना आहै भाई ॥ धर्मनि शूरा हंस जो होई । गन न दुख सुख एकौ सोई ॥ अरु घर झगरा निवेरेहु भाई । गुरु गमहि पन्थ कहौ उपाई ॥
समाप्ति
बोधसागर
(६५)
पाँचौ कै परपञ्च मिटावै । पाँच भूतकै स्वाद गँवावै ॥ नासा श्रवण रसना चक्षु इन्द्री । पाँचौ चोर काल मतिमन्द्री ॥ पाँचहु स्वाद विषयकी पूजा । गुरुगमिपन्थ परखहि तेहि दूजा ॥ चक्षु स्वाद रस रूप सलोना । राँचि रहै जग अकिलविलोना ॥ साधु चक्षु राते सतरूपा । गुरुपदनिरखत अकिल अनूपा ॥ श्रवण स्वाद रस गीत कवीता । मगन होई सुनु रसमत चीता ॥ सन्तन श्रवण स्वाद गुरु बानी । शब्द भजन पद सार समानी ॥ नासा वास सुवास अघाहीं । कुबास वासके निकटन जाहीं ॥ सन्त न लागे वास कुवासा । नाम विदेह जपै निःस्वासा ॥ रसना स्वाद षट्स रस मधुभोजन । तजे विलोना सुरस परोजन ॥ सन्त न स्वाद नाम रससारा । षट्स रस व्यंजन छार असारा ॥ निःइच्छित जो पहुँचे आई । सुरस व्यंजन प्रीति सोपाई ॥ इन्द्री स्वादु काम रति नेहा । नारी भोग रतन तजि देहा ॥ सत्य सुरति अनुराग समावे । निशिदिन प्रेमभक्ति चितलावे ॥ पाँचौ आहि प्रबल घट माहीं । मन राजा पाँचौ कर नाहीं ॥ सत्यगुरु ज्ञान मन धरि राखे । पाँच चोरसाधि सत्यसुखमाखे ॥ छन्द-धरि मनहि बाँधहु पाँच साधहु सारसतगुरु ज्ञानते ॥ यह देशहै यमराजको तरे सो विदेही नामते ॥ सतनामव्रतगहिशब्द हियधरि करहु सेवा तासु हो ॥ तत्त्वध्यान सतपदरूप स्थित होय अमर लोकैनिवासुहो ॥ दोहा-गुरु सुखशब्द प्रतीति करि, हर्ष शोक विसराय ॥ दया क्षमा सतशील गहि, अमरलोक को जाय ॥ सोरठा-वण्यौ ज्ञान प्रकार, धर्मदास सम्बोध मत ॥ कहै कवीर कवीर, जेहि मम शब्द प्रतीति दृढ ॥ इति श्री धर्मदास बोध ज्ञान प्रकाश समाप्तः ॥
इति श्री बोधसागरे धर्मदास बोधज्ञानप्रकाश वर्णनो नामप्रथमस्तत्रंगः ॥
नं. ४ कबीरसागर - ३
इति श्रीधर्मदासबोध ग्रन्थ ज्ञानप्रकाश समाप्त
भारतपथिक कबीरपंथी-
स्वामी श्रीयुगलानन्दजीद्वारा संशोधित
श्री-अमरसिंह बोध
A decorative horizontal line with a central diamond-shaped ornament, used as a section separator.
खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन
बम्बई
श्रीमद्भगवद्गीता
संस्कृत भाषायां प्रथमः विभागः
सप्तमः अध्यायः
श्रीमद्भगवद्गीता
श्रीमद्भगवद्गीता
१९९९
सत्य कबीराय नमः
बोधसागर
द्वितीयस्तत्रंगः
अमरसिंहबोध
★
धर्मदास वचन-बीपाई
धर्मदास उठि ठाढे भयऊ । दोउकर जोरि सो विनती कियऊ ॥ जुग जुग जीव चेताये ज्ञानी । कालफांस ते छुडाये आनी ॥ युगकमोद कीना जिव काजा । सोई तुम भाषि कहो निज साजा ॥ यमराजाते भये छुटारा । निर्भय हंसालोक सिधारा ॥
सतगुर वचन
धर्मदास मैं कहि समुझाऊँ । युगकमोदकी खबर सुनाऊँ ॥ जब हम इते पुरुषमें पाँही । तबकी बात कहू सब तोही ॥ युग परवान चाकरी भयऊ । युग जुग पंथपसारा कियऊ ॥ अर्बे खर्बेजिव असंख्य अपारा । सब उबार लाये पुरुष दरबारा ॥ रहे सब हंस पुरुषके पास । करते कुतूहल लोकनिवासा ॥ भूख प्यास निद्रा नहिं भाई । पुरुष ध्यानमें रहे समाई ॥ पुरुष दयाल दयाकरि भारी । षोडश रवि हंस उजियारी ॥ सेज पुष्प बनी अति भावन । सुख विनोद सब लोकसुहावन ॥ बैठे पुरुष सेजपर आयी । तत्क्षण ज्ञानी लिये बुलाई ॥ ज्ञानी तुम जाओ संसारा । जाइ करो अब हंस उबारा ॥ सिंगलद्वीप अमरपुर गामा । अमरसिंह राजा करनामा ॥ ताको अबे चेताओं जायी । चेतन अंश जग रहे खुलायी ॥
धर्मदास साहबका सद्गुरुसे युगकमोदका वृत्तान्त पूछना और सद्गुरुका उत्तर - राजा अमर सिंहकी कथा आरंभ
(७०)
अमरसिंह बोध
ज्ञानी वचन
ज्ञानी वचन कहै कर जोरी । सत्यपुरुषएक बिनती मोरी ॥ पुरुष मोहिं पठवो संसारा । कौन नामते हंस उबारा ॥ साखी-कौन नाम हंसन कहैं, कौन देऊँ कडिहार ॥ कौन नाम नारिन कहैं, जाते होई उबार ॥
चौपाई
कालफाँस जासे कटि जावे । सहजे हंसलोक महाँ आवे ॥ इतना बोल पुरुषसे पाऊँ । तब भवसागरमें चलिजाऊँ ॥
पुरुष वचन
अहो ज्ञानी वचन सुनि लेहू । मान सिखापन शिरपर देहू ॥ सब राह दिखाऊँ मैं तोही । उबरे हंसा अधिकारी सोई ॥ साखी-बालककू बीरा कहो, तिरिया कुटिल सनेह ॥ सुरतवंत कोयह शब्द है; पुरुष नाम निज लेह ॥
चौपाई
पुरुष हुकम दीना तेहि बारा । ज्ञानी वेग जाओ संसारा ॥ मूलनाम परवाना देहू । सकल जीव अपना करि लेहू ॥ ज्ञानी चले लोकते जबहीं । धर्म धीर मिले पुनि तबहीं ॥ देखत धर्मरायमनहिं संकाना । आपन हानि मनहिं अनुमाना ॥ ज्ञानी तुम सुनो वचन हमारा । काहेको आये तुम संसारा ॥ चौदा भुवन राज लिख दीना । अब काहेको चितवन कीना ॥ आहार यही हम कहैं दियऊ । पुरुषदया अब काहेकु कियऊ ॥ राज हमारो है संसारी । मुखदुःख जीवन देहुँ अपारी ॥ ब्रह्मा विष्णु मदेश कहाई । मेरे अंस जगमाँहि रहाई ॥ हमतो रहही शून्य मँझारी । गम नहिं पावे कोइ हमारी ॥ राज भार सब उनको दियेऊ । हम न्यारे होइ देखत रहेऊ ॥
कबीर साहबका अमर पुरीमें जाना और अमर सिंहका मिलना और कबीर साहबका गुप्त हो जाना फिर राजाकी विकलताका वर्णन
बोधसागर
(७१)
ज्ञानी तुम जाओ संसारा । वचन एक अब सुनो हमारा ॥ पुरुष वचनकी तुम कहैं लाजा । ता पाछे करियो जिव काजा ॥
ज्ञानी वचन
सुनहु वचन निरंजन राई । सबै बात मैं कहुं समुझाई ॥ कोटि ज्ञान हम तुम कहैं हारा । द्वादश पंथ चले संसारा ॥ ताते चलिहै आहार तुमारा । इतना वचन धर्म कहैं हारा ॥ धर्मदास सुनियो चित लाई । धर्मधीर ऐसा ठहराई ॥ तब हम आये यहि संसारा । जीवनकाज पृथ्वी पगु धारा ॥ अमरपुरी एक नगर रह्राई । सिंगलद्वीपके माँहि बसाई ॥ तहाँ आई हम कीन्ह पसारा । पहुँचे रायके महल मैझारा ॥ षोडश रविकी ज्योति पसारा । महलन मांही भयो उजियारा ॥ अमरसिंह राजाको नामा । लागी कचहरी बहु विधि धामा ॥ देख प्रकाश उठे तब राई । नृप धाये महलनमें आई ॥ आये महलमें सतगुरु पासा । सतगुरु चरण गहे विश्वासा ॥
अमरसिंह वचन
अहो संत एक विनती करिहो । पूछत वचन क्रोध जनि धरिहो ॥ कै तुम तीन देवनमें कोई । कै परब्रह्म तुम आये सोई ॥ और गम्य नहीं चलत हमारी । सो तुम वचन कहो निरवारी ॥
सतगुरु वचन
साखी—हम आये सतलोकसे, जीवन करन उबार ॥ कालफांस निवारके, ले जाऊँ लोक मैझार ॥
चौपाई
यह कहि गुप्त भये प्रभु राई । राव परे धरनी सुरझाई ॥ बिकल भये मुख आवे न बानी । तलफत मीन जैसे बिन पानी ॥ सतगुरु बिन तलफत नृप तैसे । स्वाँति बुंद बिन चात्रिक जैसे ॥
पांच दिन पीछे फिर कबीर साहबका राजा अमरसिंहको मिलना
(७२)
अमरसिंह बोध
छन्द चर्चरी
मोहि कहा जानि दरशन दिये प्रभु गुप्त पुनि काहे भये ॥ हग पलक देत बिलंब नाही कवन दिशि कहँवा गये ॥ हमहीं अभागी कीन्ह सतगुरु दरस देके छिप रहे ॥ कैसे धरूँ मन धीर तबलग दरश तुम ना देखिहे ॥
सोरठा-भये अभाग मुहि जान, दरश देहेके छिप रहे ॥
नहीं करूँ जलपान, जबलग दरश न देखहुँ ॥
चौपाई
दिवस पाँच तब ऐसे बीता । निपट राय उर बाढ़ी चींता ॥ सुनी खबर तब पंथ चलि आये । तिन राजाको आन उठाये ॥ ले झारी मुख मंजन कीना । संत चरण चितवहु विधिदीना ॥ सतगुरु दरश दिये तेहि वारा । महल मांहि कीनो उजियारा ॥ तहां जाइ जब ठाडे भयऊ । राजा चरण धाय तब गह्यऊ ॥ हमहि सनाथ किये प्रभुराई । हम निज सेवक तुमरे आई ॥
सतगुरु वचन
ज्ञानी कहे सुनो हो राई । यमफांसीते लेहों छुड़ाई ॥ सब जग परचो कालके फंदा । बहुविधि तिनको बांधे बंधा ॥ नेम धर्म कुल कर्म लगाये । ये फंदा सब जगत फँदाये ॥ जो कोइ हंसा होय सुभागी । काल फांसते बचिहै भागी ॥ धर्मकाल ताको नहि पावे । सुरति निरति ले शब्द समावे ॥ साखी-शब्द सुरत युग बांधई, कर्म भर्म दे छोर ॥ हंस गति जब आवई, कहा करे यम चोर ॥
अमरसिंह वचन-चौपाई
हे साहेब जो आयेसु पाऊँ । तो रानीको वचन सुनाऊँ ॥ अबके सतगुरु जाहु दुराई । तो हमकूँ नहि जीवत पाई ॥
रानीका साहबकी शरणमें आना और राजाको सत्यलोक देखना
बोधसागर
(७३)
सतगुरु वचन
सतगुरु कहे सुनो हो राई । भक्ति प्रेम बस कतहुँ न जाई॥ तत्क्षण राजा चलिभे जबहीं । सात खण्डपर पहुँचे तबहीं ॥ सुस्वरकला रानि तहाँ रहेऊ । तासों राय वचन एक कहेऊ ॥ सुनो रानी एक वचन हमारा । अपने जीवका करौ उवारा ॥ साखी-राजा रानीसों कहै, मानो वचन हमार ॥ साहेब आये लोकसे, चरन सोगहो सम्हार ॥
रानी वचन-चौपाई
रानी कहै सुनो हो राजा । विलख वदन आये केहि काजा ॥ केहि कारन आये तुम खरारी । हमसे वचन कहो निरुवारी ॥
राजा वचन
रानी तुमसों कहूँ हवाला । जो सतगुरुने दीनो प्याला ॥ एक दिना लीला अस कियेऊ । महलनमें उजियारा भयेऊ ॥ तब हम तत्क्षण धाये जबहीं । महलन बीच पहुँचे तबहीं ॥ दरशन पाये भयउ अनन्दा । बारहिँ बार चरण गहि वंदा ॥ पलक ओट प्रभु गये विलायी । चार दिवस परे धरनि सुरझाई ॥ प्रोहित विप्र सब आये जबहीं । कहे समुझाइ हमकूँ तबहीं ॥ बनिया मोदी सगरे धाये । छीया सेठ चौधरी आये ॥ भाई भतीजे परजा धाई । काहे राय मरत हो भाई ॥ सबे मिलि आनिउठाये जबहीं । ले झारी भर दीना तबहीं ॥ ले झारी मुख धोवंत भयऊ । साहेब दरश बेगि तब दयऊ ॥ दरश पाय मैं भयउ सनाथा । रानी सत्य कहत हौं बाता ॥
रानी वचन
राजा बात कहत हौं तोही । सत्य कहूँ जो मानो मोही ॥ अब तुम बात कहत हो नीका । तेहि पाछे पुनिलागे नहि फीका ॥
(७४)
अमरसिंह बोध
राजा बात कहीहौ आछी । पाछे जगमें होय न हाँसी ॥
राजा वचन
रानी मानो कहा हमारा । साहेब चरण बेगि चितधारा ॥ धन जौवन तनरंग पतंगा । छिनमें छार होत है अंगा ॥ तुरत मान जो रानी लीना । संत दरश कामिनि जो कीना ॥ हाथ नारियल आरति लीना । सात खंडसे उतर पग दीना ॥ सात सहेली संग लगी जबहीं । स्वरकला पुनि उतरी तबहीं ॥ सब उमराव बैठे दरबारा । रानी आइ बाहिर पग धारा ॥ तब उमराव उठे भहराई । स्वरकला कस अचरज लाई ॥ रानी कबहु न देखी भाई । सो रानी कस बाहेर आई ॥ गजमोतिन से पूरे मांगा । लाल हिरा पुनि दमके आंगा ॥ आधा मस्तक कीन्ह उघारा । मानिक दमके झलाहलपारा ॥ तब रानी सतगुरु पहुँ आई । नारियल भेट जो आनचढ़ाई ॥ रानी थाल हाथमें लियऊ । करत निछावर आरतिकियऊ ॥ साखी-रानी ठाड़ि मैदानमें, सुनो संत धर्मदास ॥ सुरजकिरन अरु रानिको, एकही भयो प्रकाश ॥
चौपाई
लगिचकाचौधि अधिक पुनि जबहीं । देखि न जाय रानी तन तबहीं ॥ राजा रानी दंडवत कीन्हा । ऐसी भक्ति हृदयमें चीन्हा ॥ दोउ कर जोरि राय भयो ठाढा । उपज्यो प्रेम हृदय अति गाढा ॥ साहेब हमपर दया जो कीजै । भुवन हमारे पांव जो दीजै ॥ तबहीं हम मंदिर महाँ आये । पलंग बिछाय तहाँ बैठाये ॥ झारी भर तब राजा लीना । चरनामृतकी युक्ति कीना ॥ राजा ऊपरते डारत पानी । चरण पखारे स्वरकला रानी ॥ चरण पखारि अँगोछा लीना । जैसी भाव भक्ति उन कीना ॥
बोधसागर
(७५)
चरणामृत तब शीश चढावा । लेचरणामृत बहु विनती लावा ॥ जैसी भक्ति राव जो पावा । धरमदास तोहि बरनिसुनावा ॥
धर्मदास वचन
और कहो राजाकी करनी । सो साहेब तुम भाखो वरनी ॥
सतगुरु वचन
तुरतहि तब सब साज बनावा । हमको सो अस्नान करावा ॥ हम अरु राय बैठे जेवनारा । आनेउ सार धरे दोड थारा ॥ अधर थार भूमिते रहई । रानी तबहीं चितवन करई ॥ रानी कहे रायसों तबहीं । लीला निरखो गुरुकी अबहीं ॥ अधर अग्र जिनका पनवारा । महा प्रसादते आइ अपारा ॥ नर नारी तब ठाढे भय आई । महा प्रसाद अब देहु गुसाई ॥ तब हम दीनेउ तहां प्रसादा । पाय प्रसाद भई तब यादा ॥ पुरुषलोककी भई सुधि तबहीं । ज्ञानी आय चेताये भलहीं ॥ हम भूले तुम लीन चेताई । फिरि न विगोवे आइ यमराई ॥ या यम देश कठिन है फांसी । काम क्रोध मद लोभविनाशी ॥ साखी-काम क्रोध अरु लोभ यह, त्रिगुन बसे मन माहि ॥ सत्य नाम पाये विना, जमते छुटको नाहि ॥
चौपाई
श्रवन लागिनिलाम सुनाई । तुरत राय कह चले लिवाई ॥ पहुँचे जाय सुमेर पहारारा । पुर बैकुंठ रच्यो जेहि ठारा ॥ जय विजय जो तहां रहेऊ । तेहि साहेबको देखत भयेऊ ॥ देखत पौरिया ठाडे भयऊ । आदर करि साहेबको लयऊ ॥ कहे पौरिया विनती लाई । भूपति लोक कहाँको जाई ॥ तब हम पौरियन सो कहेऊ । एक जिव सत्यनाम जो गहेऊ ॥
१ इरे !