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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

अथ बोधसागर

तृतीयस्तरंगः

बीरसिंहबोध

✽

धर्मदास वचन-चोपाई

धर्मदास पूछे चित लायी । साहब मोहि कहो समझायी ॥
बीरसिंहराय किमि कीनी सेवा । करिके दया कहो गुरुदेवा ॥
बीरसिंहदेव बडा अभिमानी । कैसे साहिब सेवा ठानी ॥
सो वृत्तान्त कहो मोहि स्वामी । दया करि कहिये बहु नामी ॥

कबीर वचन

धर्मदास भल पूछहु बाता । तुमसे बरनि कहूँ विरुयाता ॥
तन मन धन अरु मोहन लावे । जो जिव हमरे संग सिधावे ॥
आदि अन्त सुरति हम कीना । तबही पग धरतीपर दीना ॥
और दिशा देख्यो हम जायी । पूरब पश्चिम दृष्टि फैलायी ॥
बीरसिंह देव काशीकर राऊ । हम पहुँचि तहाँ कीन गोहराऊ ॥
प्रथमहिं चले भक्तपर गयऊ । सकल संत जहाँ भक्ति करयऊ ॥
नामदेव भक्ति करन मन लावा । सेना धनाजाट तहाँ आवा ॥
राँका बाँक सदन कसाई । पद्मावती दीपक ले आई ॥
चौहटे तान चँदेवा दीना । ठाडे भक्त सब गायन लीना ॥
नामदेव लोटन करे भाई । हाथ ताल रेदास बजाई ॥

नं. ४ कबीरसागर - ४

कबीर साहबका काशीमें जाना और भक्तोंके साथ वार्तालाप करना

(९८)

बीरसिंह बोध

धना मृदंग पट्ट उजियारा । जुरे भक्त सब संत अपारा ॥
धर्मदास तहँवा हम गयऊ । राम राम सबही मिलि कियऊ ॥
तब हम वचन एक कहि लीना । सकल भक्तके हिये मन दीना ॥
नामदेव केहि पुरुषहि ध्याओ । भक्त करतका कर्म तुम लाओ ॥

नामदेव वचन

नामदेव कहे सन्त भुलाओ । दोसर पुरुष कौन ठहराओ ॥
हरि हर ब्रह्म हैं बड देवा । तिनकी करै सकल जग सेवा ॥
वे जगकर्ता सब कछु अहहीं । वेद शास्त्र सब तिनकहँ कहहीं ॥
है प्रभु आदि मध्य अरु अंता । शीश सुडाय जपो केहि संता ॥

कबीर वचन

हरि ब्रह्मा शिव शक्ति उपायी । इनकी उत्पन्न कहहुँ बुझायी ॥
विना भेद सब फूले ज्ञानी । ताते काल बांधि जिव तानी ॥
अजर अमर है देश सुहेला । सो वे कहहिं पंथ हुहेला ॥
ताका मरम भक्त नहि जाना । किरतम कर्तासे मन माना ॥
हम तो अगम देशसे आये । सत्यनाम सौदा हम लाये ॥

साखी-किरतम रस रंग भेदिया, वह तो पुरुष न्यार ॥
तीन लोकके बाहिरें, पुरुष सो रहत निनार ॥

चौपाई

बीरसिंहदेव बचेला राजा । बैठे आय महलके छाजा ॥
राजा नजर सबन पर कीना । सबकी भाव भक्ति चित दीना ॥
गावै भक्त आनन्द व्यवहारा । एक भक्त बेटा सो न्यारा ॥
टोपी एक अनूपम दीने । माथा तिलक कूबरी लीने ॥
स्वेत स्वरूप भगतकी काया । महा आनन्द पुरुष छबि छाया ॥

राजाबीरसिंह वचन

छरीदार राजा हँकरायी । नामदेवको आजु बुलायी ॥

कबीर साहबका वेष स्वरूप देखकर वीरसिंहका कबीर साहबके पास आना

बोधसागर

(११)

छड़ीदार वचन

बेगहिं छड़ीदार चलि आये । नामदेव राजा बुलवाये ॥

नामदेव वचन

नामदेव पूछे चित लायी । राव संग को और रहायी ॥
छड़ीदार तब वचन सुनावा । कोउ नहिं साथ रायके भावा ॥
नामदेव छड़ी हाथमें लयऊ । चले चले राजापहैं गयऊ ॥
राजा देखि ठाढ उठि भयऊ । कर गहिके आसन बैठयऊ ॥

राजा वचन

राजा कहै सुनौ हो देवा । कहौ कौनकी करत हो सेवा ॥

नामदेव वचन

सांखी-भक्ति करौं गोविंदकी, एक चित ध्यान लगाय ॥

राजावीरसिंह वचन

श्वेत रूप जो भक्त है, सो कस न्यार रहाय ॥

नामदेव वचन

राजा सुनो वचन यक मोरा । हम तुम हरि हर ब्रह्मा दोरा ॥
ताकर भक्ति करे वह हांसी । कहै पुरुष यक और अविनासी ॥
माला मेखली श्याम शरीरा । मिली जुलाहा सत्य कबीरा ॥
किरतन कहे सकल सब देवा । कहे साँछु देख नहिं सेवा ॥
मूर्ति कूटि पाथर का लाई । कारीगर छाती दे पाई ॥
काँसा ताँबा मूर्ति बनावा । तामें कैसे ब्रह्म समावा ॥
ऐसे कहे कबीर जुलाहा । झूठे देवन हमैं मनाहा ॥
वह तो कहे हम पुरुष अभेवा । नहिं कोइ जाने हमरो भेवा ॥
आप अपनपौ बहु विधि थापै । आपै देव सेवक पुनि आपै ॥
भक्ति ज्ञान योग को भेवा । तीरथ व्रत तप अरु सब देवा ॥
सबको काल जाल बतलावे । एकोको नहिं मनमें लावे ॥
हम सन बहु विधि वाद विवादा । नहि माने वह अनहद नादा ॥

राजा वीरसिंह और कबीर साहबकी वार्तालाप

(१००)

बोरसिंह बोध

साखी-जोलहा निंदत सबनको, बन्दत काहू नाहिं ॥
झूठ कहत हरि ब्रह्महीं, कहे निर्गुण एकै आहिं ॥

राजाबीरसिंह वचन

राजा नामदेव कह बानी । अगम ज्ञान वह करत बखानी ॥

नामदेव वचन

कह नामदेव सुनो हो राजा । बहु विधि कहै शब्द को साजा ॥
जो को निर्गुण नामहिं धावै । योनी संकट बहुरि न आवै ॥
राजा छरीदार पठवाई । जाय कबीरहिं आनु बुलाई ॥

राजाबीरसिंह वचन

परम खुशी हमरे मन आवै । जो कोइ निर्गुण नाम सुनावै ॥
अस्तुति वेद करत है जाको । पार न पावत हरि हर ताको ॥
अहिंपति अस्तुति करै जो ताही । कोउ विधि पार न पावत जाही ॥
तेहिकर भजन करै जो कोई । तब विधिसे पूरा है सोई ॥
नाम देव सुनु संत सुजाना । वह निन्दक नहि संत प्रमाना ॥
छडीदार भेजि तुरत बुलवाऊँ । निर्गुण भेद अबहि खुलवाऊँ ॥
रूप संत हृदय मम भावै । शांत रूप वह भजन प्रभावै ॥
देखो अबहीं आवत सोई । सब कहिहै तेहि भावत जोई ॥
छडीदार तुरते चलि आयऊँ । जहंवा हम वहाँ बैठे रहेऊँ ॥

छडीदार वचन

छडीदार तब विन्ती लावा । अहो कबीर तोहि राय बुलावा ॥
विन्ती राय कीन कर जोरी । लावा कबीर वेगि तैं दोरी ॥

कबीर वचन

कहे कबीर वचन अरथाई । केहि कारण मोहि राय बुलाई ॥
ना हम पण्डित ना परधाना । ना ठाकुर चाकर तेहि जाना ॥
ना हम विराना देश बसावैं । ना हम नाटक चेटक लावैं ॥

बोधसागर

(१०१)

पैसा दमरी नाहिं हमारे । केहि कारणे मोहि राय हंकारे ॥
गरज होय तो यहाँ चलि आवै । हम तो बैठे भजन करावै ॥

साखी—छडीदार तुम जायके, कहो रायके पास ॥
महा प्रचण्ड बघेल है, हम नहिं मानत त्रास ॥

चौपाई

छडीदार अति कोधित भयऊ । तुरतहिं चलि रायपहँ गयऊ ॥

छडीदार वचन

छडीदार कहै कर जोरी । महाराज एक विनती मोरी ॥
भक्त न आवै मोर हँकारे । कुछ भयभीरन राखु तुम्हारे ॥
कहैं हमारे कौन है काजा । तृणहि समान गिनत हौं राजा ॥
एता वचन राय सुनि लीन्हा । अगम बात कछु घटमो चीन्हा ॥
वह तो परमपुरुष है सोई । और होय तो आवै कोई ॥
सत्य भाव जाके उर आवे । मान बढाई लोभ सब जावे ॥
निर्गुण भक्ति जोई लवलीना । ताहि न उपजे भाव मलीना ॥
आशा तृष्णा जेहि घट व्यापै । धनवन्ता सो चाह मिलापै ॥
यहतो संत अविकल अविकारी । केहि कारण आवै केहु दुआरी ॥
शोचत राजा मनमें गूने । नामदेव मन रहे अलूने ॥
मान बढाई जो नर पागे । करत खुशामद नृपती आगे ॥
साखी—नामदेव राजा कहे, जुलहा यहाँ न आव ॥
है अभिमानी बहुत सो, बहु अहँकार जनाव ॥

चौपाई

कीन विवेक राय दिल माहीं । नहिं आये कवीर हम जाहीं ॥
वह तो सत्य भक्ति चित दीन्हा । कारण कौन त्रास मम कीन्हा ॥
यहि विधि कीन विवेक विचारा । तबहीं राजा आप सिधारा ॥

१ नामदेवजीने राजाके विचारका भाव नहीं समझा ॥

(१०२)

बीरसिंह बोध

हुकम पाय आय असवारा । गज औ तुरंग सु साज सँवारा ॥
आवत देखा जब हम भाई । तब हम लीला एक बनाई ॥
आसन अधर कीन तेहि वारा । सवा हाथ धरतीसे न्यारा ॥
माला तिलक औ टोप विराजै । हाथ स्वेत कुवरी सो छाजै ॥
नृपति देखि अचरज मन कीन्हा । यह तो पुरुष अगम कछु चीन्हा ॥
कीन अवलोकन जग हम सबहीं । ऐसे पुरुष न देखे कबहीं ॥
धन्य धन्य अस्तुति सब गावैं । धन्य कवीर चरण सब ध्यावैं ॥
राजा चरण पकड़ि दोउ भाई । धन्य धन्य नृप करई बडाई ॥
कहे राय धन भाग हमारा । दर्शन दीन्ह आय करतारा ॥

राजा बीरसिंह वचन

छन्द-अस्तुति करत नृपति भाषेउ तुम ब्रह्म निर्गुण आप हो ॥
अनाथ नाथ सनाथ करि दिये माथ हाथ अनाथ हो ॥
अपनो दास करि जानि साहब दरश दीनेउ आयकै ॥
कीजै कृपा यहि दासपै चलि भवन दरस दिखायकै ॥
सोरठा-कृपा कीन जस मोहिं, तस मन्दिर पग दीजिये ॥
विनय करौं प्रभु तोहिं, वेगि विलम्ब न कीजिये ॥

कवीर वचन-चोपाई

कहैं कवीर तहाँ नहिं काजा । तुम परचण्ड बघेला राजा ॥
काम क्रोध मद लोभ बडाई । रोम रोम अभिमान समाई ॥
तुरी सवा लक्ष सँग तोरे । लक्ष सवा दो प्यादा दोरे ॥
हस्ती चलत सहस तव संगा । निश्चिदिन भूले कामिनि रंगा ॥
कंचन कलसा महल अटारी । कैसे शब्द गहै नर नारी ॥
हम भिक्षुक जाने संसारा । कौन काज है तहाँ हमारा ॥

राजा बीरसिंह वचन

तुम सतगुरु हो दीन दयाला । करमवश्य हम अहैं विहाला ॥
माया तिमिर नैन पट लागी । दर्शन पाय भये अनुरागी ॥

राजाका रानीसे कबीर साहबको गुरु बनानेकी बात चलाना और रानीका राजाको नीति समझाना

बोधसागर

(१०३)

करो दया अपनो करि लीजै । दास जानि आयसु प्रभु दीजै ॥
दीन जानि मन्दिर पगु धारो । भक्तराज तुम वेगि पधारो ॥
हम हैं पापी अधम अजाना । तव विनु कृपा काल धरि ताना ॥
देह उपदेश प्रभु मोहि बचावो । पाप जालते वेगि छुडाओ ॥
तुमरी कृपा सुनहु हो साहब । अंस विश्वास भवहितरि जायब ॥
अब जनि लावहु बार गुसाई । चलहु कृपा करि हंसन राई ॥

साखी-भक्तराज दाता अहो, कीजै मोह सनाथ ॥

मैं आधीन शरण तुव, चलो हमारे साथ ॥

चोपाई

बहुत अधीन तेहि जब देखा । चलन विचार कीन तब लेखा ॥
ततक्षण राजा हस्ति मँगावा । लै हमहीं तब हस्ती बैठावा ॥
गजते आसन अधरहिं धारा । चले राय तब बजे नगारा ॥
जबै राय मन्दिर लै गयऊ । तबै रानि कहैं तुरत बोलेऊ ॥
मानिक देहरानी चलि आयी । तासे राजा बात सुनाई ॥

राजा बीरसिंह वचन

हम रानी गुरु कीन कबीरा । आदि ब्रह्म हैं मतिके धीरा ॥
चरण धोय चरणाभूत लीजै । सतगुरु दया करम सब छीजै ॥
तब सो रानी कहैं सुनु बाता । ओढे चीर सुभग निज गाता ॥

रानी मानिकदेवी वचन

राजा विन्ती सुनो हमारा । समुझि बूझि गुरु करो भुवारा ॥
तुम राजा हौ बहुतै ज्ञानी । विनय हमार लेहु सुनि मानी ॥

राजा बीरसिंह वचन

इतना सुनत राय मुसुकाये । रानी ज्ञान कौन बहुराये ॥
तुम हौ नारि भक्ति कहैं मानौ । साहबकी गति नहिं तुम जानौ ॥
कर्ता आप देह धरि लीना । भक्तरूप होय दर्शन दीना ॥

नामदेव आदि भक्तोंका कबीर साहबसे ईर्षा करना और उनका समाधान

(१०४)

बीरसिंह बोध

हम अरु राय बैठे जेवनारा । आनि सो वार घरे दोय थारा ॥
कंचन थारी झारी पानी । कंचनवटुकी व्यंजन आनी ॥
अधरसु थार भुईं ते न्यारा । महाप्रसाद राय चित धारा ॥
पाय प्रसाद राय जब लीन्हा । हम अरु राय बाहर पगु दीन्हा ॥
एकहि आसन बैठे दोई । नामदेव तब ठाढे होई ॥
नामदेव कह आसन दीन्हा । बहु सन्मान ताहिकर कीना ॥
नामदेव बैठे जब जायी । प्रश्न करन तिन चित तब लाई ॥

नामदेव वचन

कहहु कवीर मोहि समुझाई । कहैं तव गुरु शब्द कित पायी ॥
साहिब कौन सबनके पारा । मोसे कहहु वचन विचारा ॥
साहिब कौन जाहि तुम ध्याओ । कहैवा सुक्ति सुरति कित लाओ ॥
कौन भाँति यमसे जिव बाँचे । भिन्न भिन्न कहहु मोहि साँचे ॥
आप न समझो बोधो राजा । राम विना होय जीव अकाजा ॥
केतो पढे गुने अरु गावै । विनु हरि भक्ति पार नहीं पावै ॥

कवीर वचन

नामदेव भूले तुम जैसे । हमको मति जानहु तुम तैसे ॥
निर्गुण पुरुष आहि यक आना । अस्तुति ताकर वेद बखाना ॥
शिव ब्रह्मा नहि पावत पारा । और जीव है कौन विचारा ॥
छन्द-नित्य निगम अस्तुति अराघै हारि थके विरंच महेश हो ॥
सबै ऋषिदेव अस्तुति अराधई तेहि गावत सुरपति शेष हो ॥
जेहि गावत नारद शारदादि पार कोई ना लहे ॥
सो भेद सतगुरु गावही कोइ संत ज्ञानी चित गहे ॥
सोरठा-पूजहि हरि हर देव, जड मूर्ति पूजत बहै ॥
निशिदिन लावत सेव, जो रक्षक भक्षक अहै ॥
नामदेव तब सुनत लजाने । नहीं पाये भेद मनहिं पछताने ॥
सुनि लजायके उठि सो गयऊ । राजा तबहिं कहत अस भयऊ ॥

राजाका शिकार खेलने जाना - पानी न मिलनेसे व्याकुल होना और कबीर साहबका बाग प्रगट करके राजाका सेनासहित प्राण बचाना

बोधसागर

(१०५)

राजा वीरसिंह वचन

तब राजा अस वचन उच्चार । हम सँग साहिब चलो शिकारा ॥
आगे सेना सबही ठाडे । हस्ती घोडा बाहर काटे ॥
आगे चले निशान नगारा । सवा लक्ष सँग चले असवारा ॥
सवा लक्ष द्रव्य प्यादा दौरा । ठाडे भौंट करत बड शोरा ॥
हरनी स्वान लीन सँग चीता । कोइ सचान वाज कर लीता ॥
बहु दल हस्ती लीनी साथा । यहि विधि चले शिकार नरनाथा
भौंतिन भौंति खिलौना लीना । आयसु सकल लोक कहँ दीना ॥
आगे सेन चली सब साजा । हस्ती बैठि चले गुरु राजा ॥

कवीर वचन

जबही राजा चले रिगायी । तब हम तासों बात सुनायी ॥
राजा संग मोहि ले जाओ । जीव एक मारन नहि पाओ ॥
कोटिक यतन करो तुम राजा । जीवन मिलै होय तोहि लाजा ॥

राजा वीरसिंह वचन

तत्क्षण राजा वचन सुनावें । मारन कहौ तोहि जाइ चुकावें ॥
तब हम कहा हमका कहहीं । यह नहि धर्म मनुषकर अहहीं ॥
यह सुनि राजा घोड कुदावा । शेर शिकारी रूप बतावा ॥
एको जीव फन्द ना परई । क्रोध अग्नि घट भूपति जरई ॥
खेलेत रमत दूर होय गयऊ । कितहुँ न भेंट जीवसे भयऊ ॥
फिरत अहेरे परे भुलाई । कतहुँ न ठौर नीर कहँ पाई ॥
विना नीर सो तडपे राजा । व्यापी तृषा बने नहि काजा ॥

साखी-बहुत दूर राजा गये, पीछे फिरे भुआर ॥

कटक सकल सबही फिरे, व्याकुल सबै अपार ॥

ग्रंथकर्ता अथवा परचात् के लेखक महाशयकी बलिहारी है, शिकारके लिये इतनी तैयारी
बतलायी है ।

(१०६)

बीरसिंह बोध

पानी पानी सबहीं गोहरावैं । विनु पानी सबहीं मरि जावैं ॥
राजा कहै देखो सब जायी । बडो धूप जिव गयो ढरायी ॥
बहुत लोग जल दूँढन लागे । बहुतक लोग भाग चले आगे ॥
ठावैं ठावैं सब गये झुलाई । हस्ती घोरा सबहिं नशायी ॥
राजा तब कहन अस लागा । संशय बहुत तेहि मन पागा ॥

राजा बीरसिंह वचन

आज अहेर एको नहिं आवा । एको जीव जन्तु नहिं पावा ॥
पाना कतहुँ न पावा भाई । कैसी कर्ता कीन गुसाई ॥
जो जनितों अस होइहैं बाता । करन अहेर न आइत ताता ॥
सेना हमार प्राण सम प्यारी । सोऊ मरत प्यासकी मारी ॥
अब कहाँ जाइ केहि विधि करिहैं । विना नीर सब इतही मरिहैं ॥
व्याकुलता बहुतै मन बाढी । बहुत करौं सकौं नहिं काढी ॥
तेहि अवसर चर बहुतक आये । खोजिथके नहिं जलकतहुँ पाये ॥

साखी-सेना सकल मरत है, पानि पानि गोहराय ॥
छाँह छाँह सब दूँढहीं, राजा रहे शिर नाय ॥

चौपाई

तेहि अवसर हम कीन विचारा । राय प्रतीति देखों यहि वारा ॥
बीरसिंहदेव बघेला राजा । देइ प्रतीति करों यहि काजा ॥
विना प्रतीति भक्ति नहिं होई । विना भक्ति जिव जाय विगोई ॥
विनु भक्ती गुरु नाहीं भेटे । विनु गुरु संशय नाहीं भेटे ॥
विनु भेटे हिय संशय भाई । काल दयाल कहु को विलगाई ॥
मन परतीति होय जेहि प्रानी । होय तुरत चौरासी हानी ॥
करे प्रतीति नर सो पावैं । पाइ श्रद्धा गुरु शरणहिं जावैं ॥
गुरुके वचन जाहि विश्वासा । फिर नहिं होय नरकमें बासा ॥

बोधसागर

(१०७)

गुरु विनु मुक्ति न पावत कोई । चौरासी भय मिटत न लोई ॥
याते हम सब कीन्ह उपाई । राजा मन प्रतीति जेहि आई ॥
सरवर रच्यो अनूपम ठामा । बाग बगीचा औ लखेरामा ॥
नाना भांति फूली फुलवागी । बहु मेवा लागे तेहि बारी ॥
नाना भांति फूल तहैं फूले । बास सुवास पाइ मन भूले ॥
नाना पक्षी करत कलोल। जहैं तहैं उड़ैं सो टोलम टोला ॥

छन्द-फूल नाना भांति फूले, केतकी जूही आदि है ॥

चम्पा चमेली मोगरा तहैं फूल दाख गुलाब है ॥

खम्भा कदली खडे तहाँ सेबती दवना बहु अहे ॥

कदम्ब जाही मालती चमेली बहुत सुखदा लहैं ॥

सोरठा-नारियल अम्ब बदाम, कटहर बडहर पीसता ॥

बहुविधि कहे सुनाम, फल लागे चहु ओर सो ॥

चौपाई

ऐसो बाग बनी फुलवारी । बनी सो तुरत लगी नहिं वारी ॥
इहवाँ सैन रही कुम्हलायी । पानी पानी सबै गोहरायी ॥
तब हम कहे राय सुनु बाता । सत्य वचन भाखूं विख्याता ॥
उत्तर दिशा राय पगु धारो । थोडहि दूर जल बहे अपारो ॥
कहे मरत ससैन कुम्हलाई । सेना सकल चलो तहैं भाई ॥
यह सुनि राय ठाढ़ तब भयऊ । दौय कर जोरि सुविन्ती कियऊ ॥

राजा बीरसिंह वचन

सतगुरु वचन कहो जनि ऐसो । पाहन ऊपर जल बह कैसो ॥
बार अनेक अहेरे आये । पर्वत पर जल नाहिं रहाये ॥
साहिब कछु जनि ऐसी बानी । हँसे लोग गुरु झूठ बखानी ॥

१ महल

(१०८)

बीरसिंह बोध

दीवान वचन

राय दिवान कहे अस बाता । गुरुके वचन झूठ नहिं जाता ॥
कहत दिवान जोरि दोउ हाथा । गुरुके वचन सत्य धरु माथा ॥
का जानो को आहि गुसाई । बेगि राय उठि टेके पाई ॥

राजा बीरसिंह वचन

करो क्षमा सुनु हे गुरुराई । दास गुनाहहि देहु बहाई ॥
जस कहिहौ सोई हम करिहैं । बचन तुम्हार सदा अनुसरिहैं ॥

कबीर वचन

तब हम कहयो सुनो तुम राई । उत्तर दिशा तुम देहु रिगाई ॥
सैन सिपाइ ठाढे सब भयऊ । ततक्षण उत्तरदिशि चलि गयऊ ॥
राजा कुंजर दीन रिगाई । बाज निशान भेरि शहनाई ॥
चलत राय देखे चहुँ फेरा । राजा नजर दूर लगि फेरा ॥
दूरिते देखि परा सो ठावा । सुंदर बाग जहाँ रहै शोभावा ॥
राजा देखि हरष मन भरेऊ । गुरुके चरण शीश तब धरेऊ ॥
सरवर निकट राय चलि जाई । देखत बाग रहै हरषाई ॥
अम्ब निम्ब औ कदलि घनेरा । दौना मरुआ लगे बहुतेरा ॥
भांति भांति तहँ मेवा लागा । भई प्रतीति राय मन जागा ॥
ऐसी शोभा बनी बनायी । देखत बने बरनि नहिं जायी ॥

राजा बीरसिंह वचन

छन्द-राय कुंजर उतरि ठाढे चरण सतगुरुकै गहै ॥
हम कुटिल अधम अघकर्म राशी बचन पावन तुव अहै ॥
बालभाव सुभाव पितु हित बचन कबहिक टार जो ॥
पितु कण्ठ लावत आपने हिय तात और न आव सो ॥
सोरठा-जो पितु तामन लाव, तो बालक कासों कहै ॥
अधम उधारन नाव, दीन जानि जन तारिये ॥

बोधसागर

(१०९)

साखी-सैन सरोवर देखिया, उत्तम वरन सो नीर ॥
गिरिवर पर सरवर रचे, धन धन सत्यकवीर ॥

चौपाई

करी प्रणाम राय गहि पाई । महाप्रसाद देहु गुरुराई ॥
कीन प्रसाद राजा कहैं दीना । राजा बहुत लोक मिलि लीना ॥
मेवा सकल लोक मिली पाये । बहुत भांति सब लीन धराये ॥
राजा प्रजा सब करै बडाई । काहि कहौं कछु कहत न जाई ॥
जैसा मेवा सत्यगुरु दीना । नहि मिल सो सुरलोकहि चीना ॥
खात खात सो जनम सिराई । नहि देख्यो अस मेवा भाई ॥
लेइ प्रसाद जल अचवन कीन्हा । दुख संताप मुलाय सो दीन्हा ॥
फिरन लगे सो बगीचा माहीं । नहि गर्मी नहि शीत तहांहीं ॥
परिमल वास उठे चहुँ ओरा । बहुविधि पक्षी करै कलौरा ॥
ज्यों २ देखै झैल बगीचे । त्यों २ मन आनन्द रस सीचे ॥

साखी-तृषा सबनकी बुझि गयी, ऐसा निर्मल नीर ॥
मेवा पाये सब मिली, तृषित भये शरीर ॥

कबीर वचन-चौपाई

तब मैं कहचो सुनो हो राजा । सेना सकल भयो सब काजा ॥
होय असवार जाहु घर राई । जहँको जल तहँ देखै पठाई ॥
अब हम अपने लोक सिधायब । सत्य पुरुषका दर्शन पायब ॥
वहँकी शोभा अनन्त अपारा । शिव ब्रह्मा नहि पावत पारा ॥
सुनत बचन राजा भय माना । जानि विछोहै मनहि सँकाना ॥
हाथ जोरि विन्ती सो कीना । बहुत अधीन भयो परवीना ॥

राजा बीरसिंह

राजा चरण परे अकुलायी । अब सतगुरु जनि करहु दुरायी ॥
अब स्वामी मन्दिर पगु दीजै । सकल जीव अपना कर लीजै ॥

राजाका कबीर साहबका शिष्य होना

(११०)

बोरसिंह बोध

अब मन जनि दाय करि जानो । हम सेवक तुम निज कै मानो ॥
राय प्रतीति बहुत मन भाई । देखि प्रीति चलन फरमाई ॥
कुंजर राय भये असवारा । ले हमहीं पुनि तहाँ बैठारा ॥
सब सेनाकी भयी तैयारी । बजा निशान लगी नहिं बारी ॥
ततक्षण राय वचन कहि दीना । भरि भरि वर्तन सबही लीना ॥
छोड़ि सरोवर चले रिंगायी । क्षणहि सरोवर छार उडायी ॥
जब राजा पुनि पाछे निहारा । नहीं सरोवर उड़ैं तहाँ छारा ॥
देखत राजा चकित न थोरा । मँम पद गहि चित्त बहु मोरा ॥

साखी-धन्य कवीर सरोवर रची, दलहिं लीन ज़िवाय ॥

जहवाँको जल लायक, तहाँको दीन पठाय ॥

चौपाई

आगे मोहि करि जबही लीन्हा । तब पीछे राजा पग दीन्हा ॥
चले राय महल पग दियऊ । सतगुरुको आगे करि लयऊ ॥
मन्दिर कञ्चन पलंग बिछावा । लै सतगुरुहि तहाँ बैठवा ॥
मानिक देह रानी चली आयी । कहै राय रानी गहु पायी ॥

राजा बोरसिंह वचन रानी प्रति

चरण टेकि चरणामृत लीजै । गुरुकी दया अमृत रस पीजै ॥
लोक लाज तुम तजहु बडाई । गुरु कवीरकी शरणे आई ॥
गुरु कृपा होय दास पर जबहीं । काल त्रास ना ब्यापे तबहीं ॥
ज्ञान भक्ति विन गुरु न पावै । काल फन्द स्वपने नहिं जावै ॥
सर्गुण भक्ति जगत बतलावे । निर्गुण भक्ति गुरुसे पावे ॥
विन निर्गुण नहिं जीव छुटावे । बार बार यम फन्द परावे ॥
छन्द-गुरु कृपा होय जेहि दासपै तेहि काल त्रास न ब्यापई ॥
गुरु भक्ति मुक्ति दाता भक्त त्राता छुटै जीव तहाँ तापई ॥

१ मेरे पग पर पड़कर मनके अभिमानको छोड़ दिया ॥

बोधसागर

(१११)

संशय हरन अघ कर्म दाहन है सदा हंस सहाय हो ॥
गुरु पह मते अपवर्ग वासा पुरुष लोक सिधाय हो ॥

चौपाई

सरवर एक रचे गुरु तहवाँ । पर्वत ऊपर जल नहिं जहवाँ ॥
बाग एक रच्यो तेहिके तीरा । निर्मल जल बहै त्रिविध समीरा ॥
नाना भांती तरु जेहि माहीं । सुर पादप तेहि देखि लजाहीं ॥
कदम्ब निम्ब अम्ब कचनारी । वडहल बेल बदाम सुपारी ॥
नाना रंग फुली फुलवारी । फल रस भरे झुकी सब डारी ॥
रानीसे अस कहि सो राजा । विन्ती करन लगा जिवकाजा ॥

राजा बीरसिंह वचन

चरण टेकि राजा कहे बाता । भये दयाल दयानिधि दाता ॥
आवागमन रहित करु मोही । अब मैं खसम चरण गह्यो तोही ॥
मो कहैं अपना लोक दिखाओ । अब हम धरयो तुम्हारो पाओ ॥

कबीर वचन

सत्य प्रतीति जब राजहिं देखा । बहु विधि ताकी कीन परेखा ॥
श्रवण लागि निज नाम सुनाया । तुरतहिं राजा लेइ सिधाय ॥
तबहीं दूत रोक गहि बाटा । छलन दूत बैठा तहाँ नाटा ॥

दूत वचन

साहब तुम निर्मल असवारा । भुईं तरे कहवाँ पगु धारा ॥

कबीर वचन

तबै हम दूतनसे कहेऊ । यह जिव नाम खसम कर रहेऊ ॥
इतना सुनत दूत उठि भागा । देखत नृपति भयो अनुरागा ॥

राजा बीरसिंह वचन

धन्य सतगुरु धन्य भक्ति तुम्हारी । धन्य हंसा जेहि शब्द उचारी ॥
चले हम अरु राय तेहि ठौरा । जहँवा गम पावत नहिं चौरा ॥
पहुँचे मानसरोवर जायी । शोभा कामिनि बहुत सुहायी ॥

(११२)

बीरसिंह बोध

युत्थ युत्थ बैठी सब पाँती । एक रूप तहवाँ नहिं जाती ॥
चार भानु कामिनिकी काँती । नहिं तहँ दिवस नहिं तहँ राती ॥
राजा परे चरणतर आयी ।

राजा बीरसिंह वचन

। दयावंत भल कोक दिखायी ॥

कबीर वचन

देखिनि राय लोककी शोभा । चकित होय राजा मन लोभा ॥
पुनि राजा कहन अस लागा । देखि लोक लोभ महाँ पागा ॥

राजा बीरसिंह वचन

अब जनि लेह चलो संसारा । राखो लोक शरण मंझारा ॥

कबीर वचन

तब हम कहा सुनु राय सुजाना । तुम राजा सत्यलोक भुलाना ॥
राजा मानो कहा हमारा । चलो तहाँ जहाँ राज तुम्हारा ॥
बरबस बाहँ गही तब राई । ले राजा तहँवा बैठाई ॥
छिन यक गहर तहाँ नहिं कियऊ । देह जायके जागृत भयऊ ॥
दोय कर जोरि राय रहे ठाढे । बहुत प्रेम हरष मन बाढे ॥

राजा बीरसिंह वचन

अब लगि साहब मैं नहिं जाना । सकल भक्त सम तुमको माना ॥
अब हम जाना भेद तुम्हारा । सोई करहु जेहि हंस उबारा ॥
राजा कहे कौन विधि करऊँ । सकल द्रव्य गुरु चरणे धरऊँ ॥
जाते जीव कालते बांचे । सोई जतन करो गुरु सांचे ॥

कबीर वचन

तब हम कहा होहु निर्वाना । राय मँगाव मिठाई पाना ॥
चौका जुगति करो सब साजा । देउ सार पद मेटो लाजा ॥
नरियर धोती पान मँगाओ । महा कन्द ले तहाँ धराओ ॥

राजा वीरसिंहका गुरुस्तुति करना

बोधसागर

(११३)

कलश ले अरु पांचो बाती । साधु संत बैठे बहु भांती ॥
कंचन झारी जल धरवाई । तापर खरचा सात चढाई ॥
स्वेत चँदेवा स्वेत कनाता । सत्यपुर कह सूकृत वाता ॥
सत्यलोक स्वेत है फूला । स्वेत सब देह जीवका मूला ॥
स्वेत सिंहासन चौका चारी । सतगुरु बैठे आसन मारी ॥
कदली पत्र मेवा संयूता । चन्दन श्वेत सुगन्ध बहूता ॥
राजा सकल साज लइ आये । साधु संत बैठे सब आये ॥
विधिपूर्वक शुभ चौक पुराया । हाथ जोरि ठाढा भयो राया ॥
बोले साधु शब्द धुनि तबहीं । रानी राय चरण गहे जबहीं ॥

राजा बीरसिंहका सतगुरुकी स्तुति करना

राजा लीन्ह नारियर हाथा । बहुत जीव तहाँ भये सनाथा ॥
करी दंडवत विन्ती कीना । हंस राज मोहि दर्शन दीना ॥
धन्य भाग मम काह सराहू । हे प्रभु तुम हौ सत्य मम नाहू ॥
छन्द-आनन्द कन्द सर्वज्ञ रूप अखिल ज्ञाता अविगतं ॥
दास जानि दीजै अभय पद ज्ञानदाता अस्थितं ॥
अविनाश सागर-दयाके आगर धर्म कंटक मर्दनं ॥
संशय खण्डन रिपुविहंडन अजर वीरा सुमिरावैनं ॥
सोरठा-अमर पुरी तुव बास, अमर स्वरूपी हंस जहँ ॥
वास दीजिये दास, सुरतिवंत प्रभु कीजिये ॥

कबीर वचन-चौपाई

करि चौका तब नरियर मोरा । करि आरती भयो पुनि भोरा ॥
तिनका तोरि पान लिखि दयऊ । रानी राय अपन करि लयऊ ॥
बहुतक जीव पान मम पाये । ताघट पुरुष नाम सात आये ॥
जो कोइ हमारा बीरा पावे । बहुरि न योनी संकट आवे ॥
बीरा पावे भवते छूटे । विनु बीरा यम धरि २ लूटे ॥

कबीर साहबका परलोकके मार्गका वृत्तान्त राजासे कहना

(११४)

बीरसिंह बोध

सत्य कहूँ सुनु धर्मदासा । विनु बीरा पावै यम फांसा ॥
बीरा पाय राय भय भागा । सत्य ज्ञान हृदयमें जागा ॥
काल जाल तब सबै पराना । जब राजा पायो परवाना ॥
गद्गद् कंठ हरष मन बाढा । विनती करै राजा होय ठाढा ॥
प्रेमाश्रु दोइ नयन ढरावै । प्रेम अधिकता वचन न आवै ॥

राजा बीरसिंहका स्तुति करना

करुणारमन सद्वरु अभय मुक्तिधामी नाम हो ॥
पुलकि सादर प्रेम वश होय सुधरे सो जीवन काम हो ॥
भवसिन्धु अति विकराल दारुण तासु तत्त्व बुझायऊ ॥
अजर बीरा नाम दै मोहि पुरुष दरश करायऊ ॥
सोरठा-राय चरण गहे धाय, चलिये वहि लोकको ॥
जहवाँ हंस रहाय, जरा मरण जेहि घर नहीं ॥

कबीर वचन

आदि अन्त जब नहीं निवासा । तब नहिँ दूसर हते अवासा ॥
तौन नाम राजा कहँ दीना । सकल जीव आपन करि लीना ॥
रायं श्रवण जब नाम सुनायी । तब प्रतीति राया जिव आयी ॥
सत्यपुरुष सत्य है फूला । सत्य शब्द है जीवको मूला ॥
सत्य द्वीप सत्य है लोका । नहीं शोक जहाँ सदा अशोका ॥
सत्यनाम जीव जो पावै । सोई जीव तेहि लोक समावै ॥
ऐसो नाम सुहेला भाई । सुनतहिँ काल जाल नशि जाई ॥
सोई नाम राजा जो पाये । सत्य पुरुष दरशन चित लाये ॥
साखी-ऐसो नाम है खसमका, राय सुरति करि लीन ॥
दर्षित पहुँचे पुरुष घर, यमहिँ चुनौती दीन ॥

चौपाई

जब हंसा यम छेके आयी । चलत बेर निज मना सुनायी ॥
मंडल अखण्ड ब्रह्मण्डे बासा । नीर पवन हंस रहिवासा ॥

बोधसागर

(११५)

सुकृत जहां आपै शठिहारा । रतन पलीता दीपक बारा ॥
फोडि ब्रह्मांड हंस घर जायी । दीप लेसि उजियार करायी ॥
हंस चले पुरुष दर्बारा । डघरे कूँची कुलुफ किवारा ॥
तहैं हंसन रोकत हैं दूता । देखत तहां बहुत अजगूता ॥

साखी-चले हंस सतलोकको, सुरति शब्द गहि डोर ॥
दोय पाँजीके बीचमें, बैठ काल तहैं चोर ॥

चौपाई

धरती माथ स्वर्गको नाका । तहाँ दोय पाँजी है बाँका ॥
तहवाँ दूत रहत है भाई । पुरुष नाम सुनि निकट न आई ॥
युगदानी ठाढे बटपारा । मागै देहू जीव हमारा ॥
प्रथमहिं हैं युगदानी जगाती । दूजे पाछे बजरघाती ॥
तीजे मृत्यु अंध बटपारा । परलम्बित चौथे सरदारा ॥
पैंचये दूत स्वयम्बर जानी । पाँचो यम जिव छेदत आनी ॥
जा घट नाम धनीका होई । सो हंसा नहि बूझे सोई ॥
नाम पान हृदये में गहई । सो हंसा यम सो निर्बहई ॥

साखी-नहिं धरती न अकाश जब, नहीं हाट अरु बाट ॥
तबका खसम कबीर है, दूसर यमकी हाट ॥

राजा बीरसिंह बचन-चौपाई

साहब शब्द सार मोहि दीजे । आपन करि प्रभु निजकै लीजे ॥
औघट घाट बाट कहि दीन्हा । पाँजी भेद सकल हम चीन्हा ॥
दयावंत विनती सुनु मोरी । हम पुरुषा परे नरक अघोरी ॥
महा कुटिल बड कामी रहिया । ताते नरक अघोर बड परिया ॥
ते जिव तारो अरज गुसाई । विन्ती करो रंककी नाई ॥
भरमें जीवनको मुक्ताऊ । सो भाषों प्रभु शब्द प्रभाऊ ॥

राजाका अजर नाम चौका करनेके लिये ब्राह्मणोंके घर वस्त्र लेने जाना और अजर चौका वर्णन

(११६)

अमरसिंह बोध

कबीर वचन

अजर नाम चौका विस्तारो । जेहिते पुरुषा तरे तुम्हारो ॥
गाव तुम्हारे ब्राह्मणि जाती । धोती कीन्हही बहुतै भांती ॥
बारी माहिँ कपास लगायी । बहुत नेम से काति बनायी ॥
सो धोती तुम राजा लाऊ । पाछे चौका जुगुति बनाऊ ॥

राजा बीरसिंह वचन

तब राजा अस विन्ती कीन्हा । कैसे जान्यो को कहि दीन्हा ॥
ब्राह्मणि मंदिर नगर रहायी । ताकी सुधि हमहुँ नहि पायी ॥

कबीर वचन

तब राजा आपै चलि गयऊ । साथ एक नेगीको लयऊ ॥
पूछत ब्राह्मणि राजा गयऊ । वही पुरीमें जाइ ठाढ़ रहेऊ ॥
राजा आवन सुनी जब सोई । आदर देन चली तब ओई ॥
माई पुत्री आगे चलि आई । दधि अच्छत औ लुटिया लाई ॥

ब्राह्मणी वचन

ब्राह्मणि कहै दोई कर जोरी । राजा सुनिये विन्ती मोरी ॥
भाग मोर हम दर्शन पावा । मैं बलिहारी यहाँ सिधावा ॥

राजा बीरसिंह वचन

राजा कह ब्राह्मणीसे बाता । तुव घर धोती एक रहाता ॥
सो धोती हमको देहू । गाँव ठौर तुम हमसे लेहू ॥
एतो वचन जो राखु हमारा । धोती देइ करु काज निबारा ॥

ब्राह्मणी वचन

ब्राह्मणी कहे सुनो हो राऊ । धोती सुधि तुहि कौन बताऊ ॥

राजा बीरसिंह वचन

हम घर सतगुरु कहि समझायी । धोती सुधि हम गुरुपै पायी ॥

कबीर वचन धर्मदास प्रति

वचन सुनत तेहि सुधि सो भूली । मन पछताय विनय मुख खोली ॥