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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

अनुरागसागर

( ९३ )

इन्द्रमतीका अपने पति राजा चन्द्रविजयको लोकमें लानेके लिये
विनती करना इन्द्रमती वचन

इन्द्रमती कह दोउ कर जोरी । हे साहिब इक विनती मोरी ॥
तुम्हरे चरण भागते पायी । पुरुष दर्श कीन्हा हम आयी ॥
अंग हमार रूप अति सोही । इक संशय व्यापे चित मोही ॥
मो कहैं भयो मोह अधिकारा । राजापति आहि हमारा ॥
आनहु ताहि हंसपति राई । राजा मोर कालमुख जाई ॥

कृष्णा वचन

कहे ज्ञानी सुन हंस सुजाना । राजा नहिं पाये परवाना ॥
तुम तो हंसरूप अब पाया । कौनकाज कहैं राव बुलाया ॥
राजा भाव भक्ति नहिं पाया । सत्त्वहीन भव भटका खाया ॥

इन्द्रमती वचन

हे प्रभु हम जग माँह रहेऊ । भक्तितुम्हारि बहुत विधि करेऊ ॥
राजा भक्ति हमारी जाना । हम कहैं बरजेउ नहीं सुजाना ॥
कठिन भाव संसार सुभाऊ । पुरुष छोड़ कहु नारि रहाऊ ॥
सब संसार देहि तिहि गारी । सुनतहि पुरुष डार तेहि मारी ॥
राज काज अतिमान बड़ाई । पाखंड क्रोध और चतुराई ॥
साधु संतकी सेवा करऊ । राजकेर त्रास ना डरऊ ॥
सेवा करौ संतकी जबहीं । राजा सुनि हरषित हो तबहीं ॥
जो मोहिं तजि न देता राजा । तो प्रभु मोर होत किमि काजा ॥

छन्द

रायकी हम हती प्यारी, मोहिं कबहुँ न बरजेऊ ॥
साधु सेवा कीन्ह नित हम, शब्द मारग चीन्हैऊ ॥
चरण मो कहैं मिलत कैसे, मोहि बरजत रायजो ॥
नामपाननमिलत मोकहैं, कैसे सुधरत काजजो ॥ ६५ ॥

( ९४ )

अनुरागसागर

सो०-धन्य राय सुज्ञान, आनहु ताहि हंस ॥
तुम गुरुदयानिधान, भूपति बंद छुड़ाइये ॥६८॥

कबीरवचन धर्मदासप्रति

सुन ज्ञानी बहुतै विहँसाये । चले तुरंग बार नहिं लाये ॥
गढगिरनार बेगि चलि आया । नृपति केरि अवधी नियराया ॥
घेरेचो ताहि लेन यमराई । राजहि देत कष्ट बहुताई ॥
राजा परे गाढ़ महाँ आया । सतगुरु कहै तहाँ गुहराया ॥
घोड़े नृप नाहीं यमराई । ऐसे भक्ति चूक है भाई ॥
भक्ति चूक कर ऐसे ख्याला । अवधि पूर यम करे विहाला ॥
चन्द्रविजयका करगहि लीन्हा । तत्क्षण लोक पयाना दीन्हा ॥
रानी देखि नृपति ढिग आई । राजा केर गह्यो तब पाई ॥

इन्द्रमती वचन

इन्द्रमती के सुनहु भुवारा । मोहि चीन्हों मैं नारि तुम्हारा ॥

राजा चन्द्रविजय वचन

राय कहैं सुनु हंस सुजाना । वरण तोर षोडश शशिमाना ॥
अंग अंग तोरे चमकारी । कैसे कहाँ तोहि मैं नारी ॥
तुम तो भक्त कीन्ह भल नारी । हमहू कहैं तुम लीन्ह उबारी ॥
धन्य गुरु अस भक्ति दृढ़ाई । तोरि भक्ति हम निज घर पाई ॥
कोटिन जन्म कीन्ह हम धर्मा । तब पाई अस नारि सुकर्मा ॥
हम तो राजकाज मनलाया । सतगुरु भक्ति चीन्ह नहिं पाया ॥
जो तुम मोरि होत ना नारी । तो हम जात नरककी खानी ॥
तुवगुण मोहि वरणि ना जाई । धनगुरु धन्य नारि हम पाई ॥
जस हम तो कहैं पायउ नारी । तैसे मिले सकल संसारी ॥

कबीरवचन धर्मदासप्रति

मुनत वचन ज्ञानी वहसायी । चन्द्रविजय कहैं वचन मुनायी ॥

सुपच सुदर्शनकी कथा

अनुरागसागर

( १५ )

कहणा मय वचन

सुनो राय तुम नृपति सुजाना । जो जिव शब्द हमारा माना ॥
ते पुनि आय पुरुष दरबारा । बहुरि न देखे वह संसारा ॥
हंस रूप होवे नर नारी । जो निजमाने बात हमारी ॥
पुरुष दर्श नरपति चितलायी । हंस रूप शोभा अतिपायी ॥
षोडश भानु रूप नृप पावा । जानुमयंकम ढार बनावा ॥

धर्मदासवचन छन्द

धर्मदास विनती करे, युग लेख जीव सुनायऊ ॥
धन्य नाम तुम्हारा साहिब, राय लोक समायऊ ॥
तत्त्वभाव न गहेउ राजा, भक्ति तुव निजठानिया ॥
नारिभक्ति प्रतापते, यमराजसै नृप आनिया ॥६६॥
सो०-धन्यनारिकोज्ञान, लीन्ह बुलायस्व नृपति कहैं ॥
आवागमन नशान, जगमें बहुरि न आइया ॥६९॥
ता पीछे पुनि का प्रभु कीना । सोई कथा कहो परबीना ॥
कैसे पुनि आये भवसागर । सो कहिये हंसन पतिनागर ॥

कबीरवचन धर्मदासप्रति

धर्मनि पुनि आये जगमाहीं । रानी पति ले गये तहांहीं ॥
राख्यो ताहि लोक मंझारा । तत छिन पुनि आयउ संसारा ॥
काशी नगर तहां चलि आये । नाम सुदरशन सुपच जगाये ॥

सुपच सुदर्शनकी कथा

नाम सुदर्शन सुपच रहाई । ता कहे हम सतशब्द दृढाई ॥
शब्द विवेकी संत सुहेला । चीन्हा मोहि शब्दके मेला ॥
निश्चय वचन मान तिन्ह मोरा । लखि परतीत वंदि तिहि छोरा ॥
नाम पान दियो मुक्ति सँदेशा । मेटचो सकल काल कलेशा ॥

कलियुगमें कबीरसाहबके पृथ्वीपर आनेका वृत्तांत

( ९६ )

अनुरागसागर

शब्द ध्यान तेहि दीन्ह हढाई । हरषित नाम सुमिरे चितलाई॥
सतगुरु भक्ति करे चितलाई । छोडी सकल कपट चतुराई॥
तात मात तेहि हर्ष अपारा । महाप्रेम अतिहित चितधारा॥
धर्मनि यह संसार अँधेरा । विनु परिचय जिव यमको चेरा॥
भक्ति देखि हर्षित हो जायी । नाम पान हमरो नहिं पाईं ॥
प्रगट देखि चीन्हे नहिं मूढ़ा । परे कालके फन्द अगूढ़ा ॥
जैसे श्वान अपावन रांचेउतिमिजगअमीछोड़िविषखांचेउ
नृपति युधिष्ठिर द्वापर राजा । तिन पुनि कीन्ह यज्ञको साजा ॥
बन्धु मार अपकीरति कीन्हा । ताते यज्ञरचनके चित दीन्हा ॥
कृष्ण केर जब आज्ञा पाई । तब पांडव सब साज मँगाईं ॥
यज्ञकी सामग्री गहि सारी । जहाँ तहाँते सब साधु हँकारी ॥
पाण्डव प्रति बोले यदुपाला । पूरन यज्ञ जान तिहिंकाला ॥
घण्ट अकाश बजत सुनि आवे । यज्ञको फल तब पूरन पावे ॥
संन्यासी वैरागी झारी । आवे ब्राह्मण औ ब्रह्मचारी ॥
भोजन विविध प्रकार बनाई । परम प्रीतिसे सबहिं जेवाईं ॥
इच्छा भोजन सब मिलि पावा । घण्ट न बाजा राय लजावा ॥
जबहि घण्ट न बाज अकाशा । चकित भयोराय बुधिनाशा ॥
भोजन कीन सकल ऋषिराया । बजा न घण्ट भूप भ्रम आया ॥
पांडव तबहिं कृष्णपह गयऊ । मन संशय करि पूछत भयऊ ॥

युधिष्ठिर वचन

करिके कृपा कहो यदुराजा । कारण कौन घण्ट नहिं बाजा ॥

कृष्ण उत्तर

कृष्ण अस कारण तासु बताया । साधू कोइ न भोजन पाया ॥

१ “शब्द ध्यान” के बदले किसी प्रतियोगी “ सुरति ध्यान ” लिखा है ।

अनुरागसागर

( १७ )

युधिष्ठिरवचन

चकित भै तब पाण्डव कहेऊ । कोटिन साधु भोजन लहेऊ॥
अब कहैं साधु पाइय नाथा । तिनते तब बोले यदुनाथा ॥

कृष्ण वचन

सुपच सुदर्शनको ले आवो । आदरमान समेत जिमावो ॥
सोई साधु और नहिं कोई । पूरन यज्ञ जाहिते होई ॥

कबीरवचन धर्मदास प्रति

कृष्ण आज्ञा जब अस पयऊ । पाण्डव तब ताके ढिग गयऊ॥
सुपच सुदर्शनको ले आये । विनय प्रीतिसे ताहि जेवाये ॥
भूपभवन भोजन कर जबहीं । बजा आकाशमें घंटा तबहीं ॥
सुपच भक्त जब त्रास उठावा । बाजो घण्ट नाम परभावा ॥
तबहुँ न चीन्हे सतगुरु बानी । बुद्धि नाश यम हाट विकानी ॥
भक्त जीव कहैं काल सताये । भक्त अभक्त सबन कहैं खाये ॥
कृष्ण बुद्धि पांडव कहैं दीन्हा । बंधु घात पांडव तब कीन्हा ॥
पुनि पांडव कहैं दोष लगावा । दोष लगा तेहिं यज्ञ करावा ॥
ताहूपर पुनि अधिक दुखावा । भेजि हिमालय तिन्हैं लगावा ॥
चार बंधु सह द्रौपदि गहेऊ । उबरे सत्य युधिष्ठिर रहेऊ ॥
अर्जुन सम प्रिय और न आना । ताकर अस कीन्हा अपमाना ॥
बलि हरि चन्द्र करण बड़ दानी । काल कीन्ह पुनि तिन्हकी हानी ॥
जिव अचेत आशा तेहि लावे । खसम बिसार जारको धावे ॥
कला अनेक दिखावे काला । पीछे जीवन करे बिहाला ॥
मुक्ति जान जिव आशा लावै । आशा बांधि कालमुख जावै ॥
सब कहैं काल नचावै नाचा । भक्त अभक्त कोइ नहिं बाचा ॥
जो रक्षक तेहि खोजे नाहीं । अनचीन्हे यमके सुख जाहीं ॥
बार बार जीवन समुझावा । परमारथ कहैं जीव चितावा ॥

( ९८ )

अनुरागसागर

अस यम बुद्धि हरी सब केरी । फंद लगाय जीव सब घेरी ॥
सत्य शब्द कोइ परखे नाहीं । यम दिशि होय लरै हम पाहीं ॥
जबलगि पुरुष नाम नहिं भेटे । तब लगि जन्म मरण नहिं भेटे ॥
पुरुष प्रभाव पुरुष पहुँ जाई । कुत्रिम नामते यम धरिखाई ॥
पुरुष नाम परवाना पाये । कालहि जीत अमर घर जावे ॥

चन्द्र

सत नाम प्रताप धर्मनि, हंस लोक सिधार्वई ॥
जन्ममरणको कष्ट भेटै, बहुरि न भव जल आवई ॥
पुरुषकी छबि हंस निरखहि, लहे अति आनंद घना ॥
अंश हंस मिलिकरै कुतूहल, चन्द्र कुमुदिनि सँग बना ६६
सो०—जैसे कुमुदिनि भाव, चन्द्र देखि निशि हर्षई ॥
तैसह हंस सुख पाव, पुरुष दर्शके पावते ॥ ७० ॥
नहिं मलीन सुखभाव, एक प्रभाव सदा उदित ॥
हंस सदा सुख पाव, शोक मोह दुख क्षण कनहि ॥ ७१ ॥
जबै सुदर्शन देका पूरा । ले सत लोक पठायो सूरा ॥
मिले रूप शोभा अधिकारा । हंसन संग कुतूहल सारा ॥
षोडश भानु रूप तब पावा । पुरुष दर्श सो हंस जुड़ावा ॥

धर्मराय वचन

हे साहिब इक बिनती मोरा । खसम कबीर कहु बंदी छोरा ॥
भक्त सुदरशन लोक पठायी । पीछे साहिब कहाँ सिधायी ॥
सो सतगुरु कहो सुदि संदेशा । सुधा वचन सुनि मिटै अँदेशा ॥

कबीर वचन

अब सुनु धर्मनि परम पियारा । तुमसों कहौं अलग व्यवहारा ॥
द्रापर गत कलियुग परवेशा । पुनि हम चल जीवन उपदेशा ॥
धर्मराय कहैं देख्यो आई । मोहि देखि यम गयो मुझाई ॥

अनुरागसागर

( ९९ )

धर्मराय वचन

कहे धर्म कस मोहिं दुखावहु । भन्छ हमार लोक पहुँचावहु॥
तीनों युग गवने संसारा । भवसागर तुम मोर उजारा॥
हारी वचन पुरुष मोहि दीन्हा । तुम कस जीव छुड़ावन लीन्हा॥
और बंधु जो आवत कोई । छिनमहैं ताकहैं खाँव विलोई॥
तुमते कछु न मोर बसाई । तुम्हरे बल हंसा घर जाई ॥
अब तुम फेर जाहु सगमाहीं । शब्द तुम्हार सुनै कोउ नाहीं॥
करम भरम मम असकै ठाटा । ताते कोई न पावै वाटा ॥
घर घर भरम भूत उपजावा । धोखा दे दे जीव नचावा ॥
भरत भूत है सब कहैं लागे । तोहि चिन्है ताकहैं भ्रम भागे ॥
मद्य मांस खावै नर लोई । सर्व मांस प्रिय नरको होई ॥
आपन पंथ मैं कीन परगासा । मांम मद्य सब मानुष त्रासा ॥
चण्डी जोगिन भूत पुजाओं । यही भ्रम है जग जहै माडाओं॥
बांधि बहुफंदहिं फन्द फन्दाओ । अंतकाल कर सुधि बिसराओ॥
तुम्हरी भक्ति कठिन है भाई । कोई न मनिहैं कहौं बुझाई ॥

ज्ञानी वचन

धर्मरायते बड़ छल कीन्हा । छल तुम्हार सकलो हम चीन्हा॥
पुरुष वचन दूसर नहिं होई । ताते तुम जीवन कहैं खोई ॥
पुरुष मोहि जो आज्ञा देही । तो सब होय नाम सनेही ॥
ताते सहजहिं जीव चेताऊँ । अंकुरी जीव सकल मुकताऊँ॥
कोटि फन्द जो तुम रचिराखा । वेद शास्त्र निज महिमा भाखा ॥
प्रकट कला जो धरि जग जाऊँ । तो सब जीवनको मुकताऊँ ॥
जो अस करौं वचन तब डोलै । वचन अखंड अड़ोल अमोलै॥
जो जियरा अंकुरी शुभ होई । शब्द हमार मानि है सोई ॥
अंकुरी जीव सकल मुकताओं । फन्दा काटि लोक लैजाओं ॥
काटि भरम जो देहौं ताही । भरम तुम्हार मानि हैं नाहीं ॥

धर्मरायका बाट रोकना और कबीर साहबका उसे परास्त कर आगे बढ़ना

( १०० )

अनुरागसागर

छन्द

सत्य शब्द दिदाय सबहीं, भ्रम तोरि सब डारिहौं ॥
छलतोर सब चिन्हाइ तवहीं, नामबल जियतारिहौं ॥
मनवचनसत्य जो मोहि चीन्ही, एकतत्त्वलौं लाइहौं ॥
तवसीस तुम्हारे पांव देहीं, अमललोक जिव आइहै ६८
सो ०-मर्दहि तोरा मान, सूरग हंस सुजान कोइ ॥
सत्यशब्द सहिदान, चीन्हहि हंसहरषअती ॥७२॥

धर्मराय वचन

कहै धर्म जीवन सुखदाई । बात एक सुहि कहो बुझाई ॥
जो जिव रहे तुम्हैं लौं आई । ताके निकट काल नहिं जाई ॥
दूत हमार ताहि नहिं पावै । मूर्छित दूत मोहि पहीं आवै ॥
यह नहिं बूझ परी मोहिं भाई । तौन भेद मोहिं कहो बुझाई ॥

ज्ञानीवचन

सुनहु धर्म जो पूछेहु मोही । सो सब हाल कहो मैं तोहीं ॥
सुन धर्म तुम सत सहिदानी । सोतोसत्य शब्द आहि निर्वानी ॥
पुरुष नाम है गुप्त परमाना । प्रकट नामसत हंस बखाना ॥
नाम हमार हंस जो गहई । भवसागर सो सो निरबहई ॥
दूत तुम्हार होय बल थोरा । जब मम हंस नाम ले मोरा ॥

धर्मराय वचन

कहै धर्म सुनु अन्तर्यामी । कृपा करो अब मोपर स्वामी ॥
यहि युग कौन नाम तुव होई । सो जनि मोपर राखहु गोई ॥
वीरा अंक गुप्त गन आऊ । ध्यान अंग सब मोहि बताऊ ॥
केहि कारण तुम जाहु संसारा । सोइ कहहु मोहि भेद गुन न्यारा ॥
हमहूँ जीवन शब्द चेतायब । पुरुषलोक कहैं जीव पठायब ॥
मोहिं दास आपन कर लीजै । शब्द सार प्रभु मोकहैं दीजै ॥

निरंजनका कबीर साहबसे नामभेद पूछना

अनुरागसागर

( १०१ )

ज्ञानी वचन

सुनहु धर्म तुम कस छल करहु । प्रगट सुदास गुप्त छल धरहु ॥
गुप्त भेद नहिं देहौं तोहीं । पुरुष अवाज कही नहिं मोहीं ॥
नाम कबीर मोर कलिमाहीं । कबीर कहत यम निकट न जाहीं

धर्मराय वचन

कहे धर्म तुम मोहिं डुरै हो । खेल एक पुन हमहु खेलै हो ॥
ऐसी छल बुधि करब बनाई । हंस अनेक लेव संग लाई ॥
तुम्हार नाम ले पंथ चलायब । यहि विधि जीवन धोख दिखायब

ज्ञानी वचन

अरे काल तू प्ररुष द्रोही । छलमति कहा सुनावसि मोही ॥
जो जिव होई है शब्द सनेही । छल तुम्हार नहिं लागै तेही ॥
जौहरी हंस लेहिं पहिचानी । परखि हैं ज्ञान ग्रंथ मम वानी ॥
जेहि जीव मैं थापब जाई । छल तुम्हार तेहि देव चिन्हाई ॥

कबीर वचन धर्मदासप्रति

यहि सुनत धर्मराय गहु मौना । है अन्तर्धान गयो निज भौना ॥
धर्मनि कठिन काल गति नन्दा । छल बुध कै जीवन कहैं फन्द्रा ॥

धर्मदास वचन

कह धर्मनि प्रभु मोहि सुनाओ । आगल चरित्र कहि समझाओ ॥

जगन्नाथ मंदिरकी स्थापनाका वृत्तान्त

कबीर वचन धर्मदासप्रति

राजा इन्द्रदमन तेहि काला । देश उड़ेसेको महिपाला ॥

सदगुरु वचन

राजा इन्द्रदमन तहैं रहई । मंडप काज युगति सो कहई ॥
कृष्ण देह छांड़ी पुनि जबही । इन्द्रदमन सपना भा तबही ॥
स्वप्नेमें हरि अस ताहि बताई । मेरो मंदिर देहु उठाई ॥
मोकहैं स्थापन कर राजा । तोपह मैं आयउ यहि काजा ॥

( १०२ )

अनुरागसागर

राजा यहि विधि सपना पाई । ततक्षण मंडप काम लगाई॥
मंडप उठा पूर्ण भा कामा । उदधि आय बोरा तेहि ठामा॥
पुनि जब मंदिर लाग उठावा । क्रोधवंत सागर तब धावा ॥
क्षणमें धाय सकल सो बोरे । जगन्नाथको मंदिर तोरे ॥
मंडप सो षट बार बनायी । उदधि दौर तिहिं लेत डुबायी॥
हारा नृप करि यतन उपायी । हरिमंदिर तहैं उठे न भाई ॥
मंदिरकी यह दशा विचारी । वर पूरब मन माहिं सम्हारी॥
हम सन काल मांग अन्याई । बाचा बन्ध तहाँ हम जाई॥
आसन उदधि तीर हम कीन्हा । काहू जीव न मोही चीन्हा ॥
पीछे उदधि तीर हम आई । चौरा तहैं बनायउ जाई ॥
इन्द्रदमन तब सपना पावा । जहो राय तुम काम लगावा॥
मंडप शंक न राखो राजा । इहवाँ हम आये यहि काजा॥
जाहु बेगि जनि लावहु बारा । निश्चय मानहु वचन हमारा॥
राजा मंडप काम लगायो । मंडप देखि उदधि चल आयो॥
सागर लहर उठी तिहि बारा । आवत लहर क्रोधचित धारा॥
उदधि उमंग क्रोध अति आवे । पुरुषोत्तम पुर रहम ना पावे॥
उमंगेउ लहर अकाशे जायी । उदधि आय चौरा नियरायी॥
दरश हमार उदधि जब पाई । अति भय मान रहो ठहराई॥

छन्द

रूप धारयो विप्रको तब, उदधि हमपहैं आइया ॥
चरण गहिके माथ नायो, सर्म हम नहिं पाइया ॥

उदधि वचन

जगन्नाथ हम भोर स्वामी, ताहि ते हम आइया ॥
अपराध मेरो क्षमा कीजे, भेद अब हम पाइया ॥ ६९ ॥

अनुरागसागर

( १०३ )

सो०-तुम प्रभु दीनदयाल, रघुपति बोइल दिवाइये।
वचन करो प्रतिपाल कर जोरै विनती करो ॥७३॥
कीन्हेउ गवन लंक रघुबीरा । उदधि बाँध उतरे रणधीरा ॥
जो कोइ करै जोरावरि आयी । अलखनिरंजन बोइल दिखाई ॥
मोपर दया करहु तुम स्वामी । लेउ ओइल सुनु अन्तरयामी ॥

कबीर वचन

ओइल तुम्हार उदधि हम चीन्हा । बोरहु नगर द्वारका दीन्हा ॥
यह सुनि उदधि धरे तब पाई । चरण टेकिके चले हरषाई ॥
उदधि उमङ्ग लहर तब धायी । बोरचो नगर द्वारका जाई ॥
मण्डप काम पूर तब भयऊ । हरिको थापन तहवाँ कियऊ ॥
तब हरि पण्डन स्वपन जनावा । दासकबीर मोहिपहँ आवा ॥
आसन सागर तीर बनायी । उदधि उमङ्ग नीरतहँ आयी ॥
दरश कबीर उदधि हट जाई । यहि विधि मण्डप मोर बचाई ॥
पण्डा उदधि तीर चलि आये । करि अस्नान मंडप चलि आये ॥
पण्डन अस पासंड लगायी । प्रथम दरश मछेच्छ दिखायी ॥
हरिके दर्शन मैं नहिं पावा । प्रथमहि हम चौरालग आवा ॥
तब हम कौतुक एक बनाये । कहाँ वचन नहिं राखु छिपाये ॥
मंडप पूजन जब पण्डा गयऊ । तहँवा एक चरित अस भयऊ ॥
जहँ लग मूरति मण्डप माहीं । भये कबीर रूप धर ताहीं ॥
हर मूरति कहँ पण्डा देखा । भये कबीर रूप धर भेखा ॥
अक्षत पुहुप ले विप्र भुलाई । नहिं ठाकुर कहँ पूजहुँ भाई ॥
देखि चरित्र विप्र सिर नाया । हे स्वामी तुम मर्म न पाया ॥

पण्डा वचन

हम तुम काहि नहीं मनलाया । ताते मोहि चरित्र दिखाया ॥
क्षमा अपराध करो प्रभु मोरा । विनती करो दोइ करजोरा ॥

जगन्नाथकी स्थापना का वृत्तांत

( १०४ )

अनुरागसागर

कबीर वचन । छन्द

वचन एक मैं कहों तोसों, विप्र सुनु तू कान दे ॥
पूज ठाकुर दीन्ह आयसु, भाव दुविधा छोड दे ॥
भ्रम भोजन करे जो जिव, अंगहीन हो ताहिको॥
करे भोजन छूत राखे, सीस उठटे ताहिको ॥७०॥
सोरठा-चौराकरिव्यवहार, भ्रमाविमोचनज्ञानहृद ॥
तहाँते कियो पसार, धर्मदास सुनु कानदे ॥७१॥

धर्मदास वचन

धर्मदास कहे सतगुरु पूरा । तुम प्रसाद भयो दुख दूरा ॥
जेहि विधि हरि कहँ थापउ जाई । सो साहिब सब मोहिँ सुनाई ॥
ता पीछे कहवों तुम गयऊ । कौन जीव कैसे सुकतयऊ ॥
कलयुगकेर कहो परभाऊ । और हंस परमोषेउ काऊ ॥
सो माहि वरणि कहो गुरुदेवा । कौन जीव कीन्ही तुम सेवा ॥

कबीर वचन

धर्मदास तुम बूझहु भेदा । सो सब हमसों कहो निषेदा ॥

चार गुरुकी स्थापनाका वृत्तांत

सुनहु सन्त यह ज्ञान अनुषा । गज थलदेस परमोध्यो भूषा ॥

रायबंकेजी

रायबंकेज नाम तेही आही । दीनेउ सार शब्द पुनि ताही ॥
कीन्ह्यो ताहि जीवन कडिहारा । सो जीवनका करै उबारा ॥

सहतेजी

शिलमिली दीप तहाँ चलि आये । सहतेजी एकसन्त चिताये ॥
ताहुको कडिहारी दीन्हा । जब उन मोकहँ निजकर चीन्हा ॥

१ किसी ग्रन्थमें यह चौपाई ऐसे लिखी है—
सुनो संत यह कथा अनुषा । गज अस्थल परमोध्यो भूषा ॥

जगुजी

अनुरागसागर

( १०६ )

चतुरभुज

तहाँते चलि आये धर्मदासा । राय चतुरभुजपति जहँ वासा ॥
ताकर देश आहि दरभङ्गा । परखिसि मोहि सतपर संगा ॥
देखि अधीन ताहि समझावा । ज्ञान भक्ति विधि ताहि हद्दावा ॥
हद्दाता देखि ताहि पुनि थापा । मिला मोहि छाडि भ्रम आपा ॥
मायामोह न तनिको कीन्हा । अमर नाम तब ताही दीन्हा ॥
ताहूँ कहँ कडिहारी दीन्हा । चतुरभुजशब्द हेत करि लीन्हा ॥

छन्द

हँस निरमल ज्ञान रहनी, गहनी नाम उजागरा ॥
कुल कानि सबै बिसारि विषया, जौहरी गुण नागरा ॥
चतुरभुज बंकेज औ सहतेज, तुम चौथ सही ॥
चारिहँ कडिहार जिवके, गिरानिश्चल हम कही ७१ ॥
सो०-जम्बुदीपके जीव, तुम्हरी बाँह मोकहँ मिला ॥
गहे वचन दृढ पीव, ताहि काल पावे नहीं ॥ ७५ ॥

धर्मदास वचन

धन सत गुरु तुम मोहिं चेतावा । काल फंदसे मोहिं मुक्तावा ॥
मैं क्रिकर तुम दासके दासा । लीन्हों मोरि काटि जमफांसा ॥
मोते चित अतिहरष समाना । तव गुण मोहिं न जाय बखाना ॥
भागी जीव शब्द तुव माना । पूरण भाग जो तुव व्रत ठाना ॥
मैं अघकर्मि कुटिल कठोरा । रहेउँ अचेत भ्रम जिव मोरा ॥
कहा जानि तुम मोहिं जगाये । कौने तप हम दशन पाये ॥
सो समुझाय कहो जियमूला । रबि तब गिरा कमल मनफूला ॥

धर्मदासके पिछले जन्मोंकी कथा कबीर वचन

इच्छा कर जो पूछा मोही । अब मैं गोइ न राखौं तोही ॥
धर्मनि सुनहु पाछली बाता । तोहि समझाय कहों विख्याता ॥

धर्मदासके पिछले जन्मकी कथा

( १०६ )

अनुरागसागर

सन्त सुदर्शन द्वापर भयञ् । तासुकथा तोहि प्रथम सुनयञ् ॥
तेहि ले गयो देशनिज जबहीं । विनती बहुत कीन तिन तबहीं ॥

सुपच वचन

कहे सुपच सतगुरु सुनलीजै । हमरे मात पिता गति दीजै ॥
बन्दी छोड़ करो प्रभु जाई । यमके देश बहुत दुख पाई ॥
मैं बहु भांति पिता समुझावा । मातु पिता परतीति न पावा ॥
बालकवत नहिं ज्ञान सिखावा । भक्ति करत नहिं मोहि डरावा ॥
भक्ति तुम्हारी करन जब लागे । कबहुँ न द्रोह कीन्ह मम आगे ॥
अधिक हर्ष ताही चित होई । ताते विनती करौ प्रभु सोई ॥
आनहु तेहि सत शब्द दृढ़ाई । बन्दीछोर जीव सुकताई ॥

कबीर वचन धर्मदासप्रति

विनती बहुत संत जब कीन्हा । ताकर वचन मान हम लीन्हा ॥
ताकर विनय बहुरि जग आवा । कलियुग नाम कबीर कहावा ॥
हम इक वचन निरंजन हारा । वाचा बंध उदनि पगु धारा ॥
और दीप हंसन उपदेशा । जम्बुदीप पुनि कीन प्रवेशा ॥
सन्त सुदर्शनके पितु माता । लक्ष्मी नर हर नाम सुहाता ॥
सुपच देह छोड़ी तिन भाई । मानुष जन्म धरे तिन आई ॥

सुपच सुदर्शन माता पिताके पहला जन्म कुलपति और महेश्वरीकी कथा

सन्त सुदर्शन केर प्रतापा । मानुष देह विप्रके छापा ।
दोनों जन्म होय तब लीन्हा । पुनि विधि मिलै ताहि कहँ दीन्हा ॥
कुलपति नाम विप्रकर कहिया । नारि नाम महेसरि रहिया ॥
बहुत अधीन पुत्र हित नारी । करि अस्नान सुर्यव्रत धारी ॥
अञ्जल ले विनवै कर जोरी । रुदन करे चित सुत कह दौरी ॥
तत्क्षण हम अञ्जल पर आवा । हम कहँ देखि नारि हरषावा ॥
बाल रूप धरि भेंटयो बोही । विप्र नारि गृह ले गइ मोही ॥

चन्दन साहूकी कथा

अनुरागसागर

( १०७ )

कहै नारि कृपा प्रभु कीन्हा । सूर्य व्रत करफल यह दीन्हा॥
बहुत दिवसलग तहाँ रहाये । नारि पुरुष मिल सेवा लाये॥
रहे दरिद्रते दुखी अपारा । हम मनमहँ असकीन विचारा॥
प्रथमहि दरिद्रता इनकर टारों। पुनिभक्तिमुक्तिकरवचनउचारों॥
जब हम पलना झटक झकोरा । मिलत सुवर्ण ताहि इकतोरा॥
नितप्रति सोन मिलै इक तोला । ताते भये वह सुखी अमोला॥
पुनि हम सत्य शब्द गोहराई । बहुप्रकारसे उनहि समुझाई॥
ता हृदये नहिं शब्द समायी । बालक ज्ञान प्रतीत न आई॥
ताहि देह चीन्हेसि नहिं मोहीं । भयोगुप्त तहँ तन तजि वोहीं॥

सुपच सुदर्शनके पिता माताके दूसरे जन्ममें चन्दसाहु
और ऊदाकी कथा

नारि द्विज दोई तन त्यागा । दरश प्रभाव मनुजतनु जागा॥
पुनि दोनों भये अंशु मिलाऊ । रहहि नगर चन्द वारे नाऊ॥
ऊदा नाम नारी कहँ भयऊ । पुरुष नाम चन्दन धरि गयऊ॥
परसोतमते हम चलि आये । तब चन्दवारा जाइ पगटाये॥
बालक रूप कीन्ह तेहि ठामा । कीन्हेउताल माहि विश्रामा॥
कमल पत्र पर आसन लाई । आठ पहर हम तहाँ रहाई॥
पीछे ऊदा अस्नानहि आयी । सुन्दर बालक देखि लुभाई॥
दरश दियोदेहि शिशुतनधारी । लेगई बालक निज घर नारी॥
ले बालक गृह अपने आई । चन्दन साहु अस कहा सुनाई॥

चन्दनसाहु वचन

कहु नारी बालक कहँ पायी । कौने विधिते इहँवा लायी ॥
ऊदावचन

कह ऊदा जल बालक पावा । सुन्दर देखि मोर मन भावा॥
चन्दनसाहुवचन

कह चन्दनते मूरख नारी । वेगि जाहु दै बालक डारी ॥
जाति कुटुम्बहँसिहँ सब लोगा । हँसत लोग उपजे तन सोगा॥

नीमा नीरुका वृत्तांत

( १०८ )

अनुरागसागर

कबीरवचन धर्मदास प्रति

ऊदा त्रास पुरुष कर माना । चन्दन साहु जवै रिसियाना॥

चन्दनस हुवचन धर्मदास प्रति

बालक चेरी लेहु उठाई । लै बालक जल नेहु खसाई॥

कबीर वचन धर्मदास प्रति

चल चेरी बालक कहैं लीन्हा । जलमहँडारनताहिचितदीन्हा॥

चलिभइ मोहि पवारन जवहीं । अन्तरधान भयो मैं तवहीं ॥

भयउ गुप्त तेहि करसे भाई । रुदन करे दोनों बिलखाई ॥

बिकल होय मन दूदत डोलै । मुग्धज्ञान कछु मुखनहिं बोलै॥

सुपच सुदर्शनके माता पिता तीसरे जन्ममें नीमा हुए

यहिविधिबहुतदिवसचलिगयऊ।तजितनजन्मबहुरितिनपयऊ

मानुष तन जुलहा कुल दीन्हा । दोउ संयोग बहुरिविधि कीन्हा॥

काशी नगर रहे पुनि सोई । नीरू नाम जुलहा होई ॥

नारि गवन लावे मग सोई । जेठमास बरसाइत होई ॥

नारि लिवाय आय मगमाहीं । जलअचवन गहबनिताहीं ॥

ताल नाहिं पुरइन पनवारा । शिशु होय मैं तहैं पगुधारा ॥

तहाँ जस बालकै रहैं पौढाई । करौं कुतूहल बाल स्वभाई ॥

नीमा दृष्टि परी तिहि ठाऊ । देखत दर्श भयो अति चाऊ॥

जिमिरविदरशपडुमबिगसाना । धाय गयो धन रंक समाना॥

धाय गही कर लिया उठायी । बालक लै नीरूपहैं आयी ॥

जुलहा रोष कीन्ह तेहि वारी । बेगि देहु तुम बालक डारी॥

हर्ष गुनावन नारी लाई । तब हम तासो वचन सुनाई॥

१ बरसाइत बटसावित्रीका अपभ्रंश है । यह बटसावित्री व्रत ज्येष्ठ शुद्धपूर्णिमासीको होता है इसकी विस्तारपूर्वक कथा महाभारतमें है । उसी दिन कबीर साहब नीमा और नूरीको मिले थे इस कारणसे कबीर पंथियोंमें बरसाइत महात्म पंथकी कथा प्रचलित है । और उस दिन कबीरपंथी लोग बहुत उत्सव मनाते हैं

रतनाकी कथा

अनुरागसागर

( १०९ )

छन्द

सुनहु वचन हमारे नीमा, तोहि कहहु समझायके ॥
प्रीत पिछली कारणे तुहि, दरस दीन्हो आयके ॥
आपने गृह मोहि लै चलु, चीन्हिके जो गुरु करो ॥
देऊँ नाम दृढाय तो कहै, फन्द यमके नापरो ॥७२॥
सो०-सुनत वचन अस नारि, नीरूत्रास न राखेउ ॥
लै गइ गेह मैझार, काशि नगर तब पहुँचेउ ॥७६॥
नारी न मान त्रास तेहि केरा । रंक धनद सम लै चलि डेरा ॥
जोलहा देखि नारि लौलीना । लेइ चलो अस आयसु दीना ॥
दिवस अनेक रहे तेहि ठाई । कैसहु तेहि परतीत न आई ॥
बहुत दिवस तेहि भवन रहावा । बालक जान न शब्द समावा ॥

सुपुत्र सुदर्शनके माता पिताका बोथे जन्ममें मथुरामें

प्रगट होकर सत्यलोक जाना

त्रिन परतीत काजा नहि होई । दृढ कै गहहु परतीत विलोई ॥
ताहि देह पुनि मोहि न चीन्हा । जानि पुत्र मोहि संग न कीन्हा ॥
तजि सो देह बहुरि जो भाई । देह धरी सो देहुँ चिन्हाई ॥
जुलहाकी तब अवधि सिरानी । मथुरा देह धरी तिन आनी ॥
हम तहैं जाय दरश तिन दीन्हा । शब्द हमारा मानसों लीन्हा ॥
रतना भक्ति करे चितलाई । नारि पुरुष परवाना पाई ॥
ता कहै दीन्हेउ लोक निवासा । अंकुरी पठये निज दासा ॥
पुरुष चरण भेटे उरलाई । शोभा देह हंसकर पाई ॥
देखत हंस पुरुष हरषाने । सुकृति अंश कही मन माने ॥
बहुत दिवस लगि लोक रहाये । तब लगि काल जीव संताये ॥
जीवनहुः स्वअतिशय भयो भाई । तबही पुरुष सुकृत हंकराई ॥

मुकुत अंशको पृथ्वीपर भेजनेका वृत्तांत

( ११० )

अनुरागसागर

आज्ञा कीन्हा जाहु संसारा । काल अपार बल जीव दुखारा॥
लोक संदेशा ताहि सुनाओ । देह नाम जीवन मुकताओ॥
आज्ञा सुनत सुकृत हरषाये । तुरतहिं लोक पयाना आये॥
सुकृत देखि काल हरषाई । इन कहैं तो हम लेब फँसाई॥
करि उपाय बहुत तब काला । सुकृत फँसाय जलमहैं डाला॥
बहुत दिवस गयो जब बीता । एकहु जीव न कालहिं जीता॥
जीव पुकार सतलोक सुनाये । तबहीं पुरुष मोकहैं हँकराये॥

कबीरसाहबका धर्मदासजीको चितानके लिये लोकसे पृथ्वीपर

आना पुरुष वचन

पुरुष अवाज उठी तिहि बारा । ज्ञानी वेगि जाहु संसारा ॥
जीवन काज अंश पठवायी । सुकृत अंश जग प्रगटे जायी॥
दीन्ह आज्ञा तेहिको भाई । शब्द भेद वाही समझाई ॥
लावहु जीवन नाम अधारा । जीवन खेइ उतारो पारा ॥
सुनत आज्ञा वहि कीन पयाना । बहुरि न आये देश अमाना ॥
सुकृत भवसागर चलि गयऊ । काल जालते सुधि बिसरयऊ ॥
तिन कहैं जाय चितावहु ज्ञानी । जेहि ते पंथ चले निरवानी ॥
वंस व्यालिस अंस हमारा । सुकृत गृह लैहैं औतारा ॥
ज्ञानी वेगि जाहु तुम अंसा । अब सुकृत अंसकर मेटहु फँसा ॥

कबीर वचन

चलेहु हम तव सीस नवाई । धर्मदास अब तुम लग आई॥
धर्मदास तुम नीरु औतारा । आमिन नीम प्रगट बिचारा ॥
तुम तो आहू प्रिय मम अंसा । जाकारन हम कीन्हा बहुसंसा ॥
पुरुषहि आज्ञा तुमरे ढिग आये । पिछली हेतु पुनि याद कराये ॥
यहि संयोग हम दर्शन दीन्हा । धर्मनि अबकी तुम मोहि चीन्हा ॥
पुरुष अवाज कहू तुम पासा । चीन्हेहु शब्द गहो विश्वासा ॥
धाय परे चरणन धर्मदासा । नैन बारि भर प्रगट प्रगासा ॥

मुकुत अंश (धर्मदास) को चितानेके लिये कबीरसाहबका पृथ्वीपर आना

अनुरागसागर

( १११ )

धरहि न धीरज बहुत संतोषा । तुम साहिब मेढहु जिवधोखा॥
धरे न धीरज बहुत प्रबोधे । बिछुरिजननिजिमिमिल्यो अबोधे
युग पग गहे सीस भुई लाये । निपट अधीरन उठत उठाये ॥
बिलखत बदन वचन नहीं बोले । सुरति चरणते नेक न डोले ॥
निरखत बदन बहुरोपदगहहीं । गदगद हृदय गिरा नहिं कहहीं॥
बिलखत बदन स्वास नहिं डोले । उनसुनिदशा पलक नहिं खोले॥

धर्मराज वचन

बहुरि चरण गहि रोवहिं भारी । धन्य प्रभु मोहितारनतनधारी॥
धरि धीरज तब बोले सम्हारी । मोकहैं प्रभु तारन पगधारी ॥
अब प्रभु दया करहु यहि मोही । एकौ पल ना विसरों तोही ॥
निशिदिन रहों चरण तुम साथ । यह बर दीजै करहु सनाथा ॥

कबीर वचन

धर्मदास निह संशय रहहु । प्रेम प्रतीति नाम दिढ़ गहहु ॥
चीन्हेउ मोहि तोर भ्रम भागा । रहै सदा तुम दृढ़ अनुरागा॥
मन बचकर्म जाहि जो गहई । सो तेहि तज अंत कस रहई॥
आपन चाल बिना दुख पावे । मिथ्या दोष गुरु कहैं लावे॥
पंथ सुपंथ गुरु समझावे । शिष्य अचेतन हृदय समावे॥
तुम तो अंश हमारे आहु । बहुतक जीव लोक ले जाहु ॥
चार माहि तुम अधिक पियारे । किहि कारण तुम शोचविचारे॥
हम तुमसों कछु अन्तर नाही । परक शब्द देखो हियमाहीं ॥
मन बच कर्म मोहि लौ लावे । हृदये बुतिया भाव न आवे॥
तुम्हरे घट हम वासा कीन्हा । निश्चय हम आपन कर लीन्हा ॥

छन्द

आपनो कर लीन्ह धर्मनि, रहो निःसंशय हिये ॥
करहु जीव उबार दृढ़ है, नाम अविचल तुहि दिये ॥

( ११२ )

अनुरागसागर

मुक्ति कारण शब्द धारण पुरुष सुमिरण सारहो ॥
सुरति बीरा अंकधीरा जीविका निस्तार हो ॥७६॥
सो०-तुमतौ हौ धर्मदास, जंबुदीप कड़िहार जिव ॥
पावे लोक निवास, तुहि समेत सुमिरे मुझे ॥७७॥

धर्मदास वचन

धन सतगुरु धन तुम्हरी वानी। मुहि अपनाय दीन्ह गनि आनी ॥
मोहि आय तुम लीन्ह जगायी । धन्य भाग्य हम दर्शन पायी ॥
धन साहब मुनि शाप न कीन्हा । मम शिर चरण सरोरुह दीन्हा ॥
मैं आपन दिन शुभ करि जाना । तुम्हरे दरश मोक्ष परमाना ॥
अब अस दया करहु दुख भंजन । कबहुँ मोहि न धरे निरंजन ॥
काल जाल जौनी बिधि छूटे । यमबंधन जौनी बिधि टूटे ॥
सोई उपाय प्रभु अब कीजे । सार शब्द बताय मोहि दीजे ॥

कबीर वचन

धर्मदास तुम सुकृत अंशा । लेह पान अब मेटहु संशा ॥
धर्मदास आपन करि लेऊँ । चौका करि परवाना देखै ॥
तिनका तुडाय लेहु परवाना । कालदशा छुटे अभिमाना ॥
शालिग्रामको छाड़हु आसा । गहि सत शब्द होहु तुम दासा ॥
दश औतार ईश्वरी माया । यह सब देखु कालकी छाया ॥
तुम जग जीव चितावन आये । काल फंद तुम आय फसाये ॥
अबहुँ चेत करो धर्मदासा । पुरुषहि शब्द करो परकासा ॥
ले परवाना जीव चिताओ । काल जालते हंस मुक्ताओ ॥
यहि कारज तुम जगमें आये । अबन करहु दोसर मन भाये ॥

१ कर्णधार मल्लाह नाव खेकर पार उतारनेवाला भवसागर से गुरु पार उतारते हैं इस कारण उन्हें कड़िहार कहते हैं।