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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

प्रारंभिक पृष्ठ (उग्रगीता)

श्रीउग्रगीताप्रारम्भः

भारतपथिक कबीरपंथी-

स्वामी श्रीयुगलानन्द द्वारा संशोधित

मुद्रक एवं प्रकाशकः

खेमराज श्रीकृष्णदासा,

अध्यक्ष : श्रीवेंकटेश्वर प्रेस,

खेमराज श्रीकृष्णदास मार्ग, मुंबई - ४०० ००४.

नं. ८ कबीरसागर -

संस्करण : अप्रैल २०१९, संवत् २०७६

मूल्य : १७० रुपये मात्र ।

मुद्रक एवं प्रकाशक:

खेमराज श्रीकृष्णदास™

अध्यक्ष : श्रीवेंकटेश्वर प्रेस,

खेमराज श्रीकृष्णदास मार्ग,

मुंबई - ४०० ००४.

© सर्वाधिकार : प्रकाशक द्वारा सुरक्षित

Printers & Publishers :

Khemraj Shrikrishnadass Prop: Shri Venkateshwar Press, Khemraj Shrikrishnadass Marg, 7th Khetwadi, Mumbai - 400 004.

Web Site : http://www.Khe-shri.com

Email : khemrai@vsnl.com

Printed by Sanjay Baje For M/s. Khemraj Shrikrishnadass Proprietors Shri Venkateshwar Press, Mumbai-400 004, at their Shri Venkateshwar Press, 66 Hadapsar Industrial Estate, Pune 411 013

सत्यनाम

श्री कबीर साहिब

श्रीगणेशाय नमः

A faint, stylized illustration of a seated figure, likely Lord Ganesha, wearing a crown and holding a small object, possibly a conch shell or a fruit, in his hands. The figure is surrounded by a decorative border.

श्रीगणेशाय नमः

श्री उग्रगीता ग्रन्थ

सत्यनाम

सत्यसुकृत, आदि अदली, अजर, अचिन्त, पुरुष,
मुनीन्द्र, करुणामय, कबीर, सुरतियोग संतान,
धनी, धर्मदास, चूरामणिनाम, सुदर्शन नाम,
कुलपति नाम, प्रबोध गुरुबालापीर, केवल नाम,
अमोल नाम, सुरतिसनेही नाम, हक नाम,
पाकनाम, प्रकट नाम, धीरज नाम,
उग्र नाम, दया नामकी दया-
वंश व्यालीसकी दया

अथ श्रीबोधसागरे

एकविंशतिस्तत्रंगः

अथ उग्रगीताप्रारंभः

उत्थानिका

★

दोहा—उग्र गीता सार है, सुकृत दया लिसाय ।
करे दूरि अज्ञान को, अज्ञन ज्ञान समाय ॥
करे दूरि अज्ञानता, अंजन ज्ञान सो देइ ।
बलिहारी वे गुरुनकी, हंस उबारि जो लेइ ॥

( ६ )

बोधसागर

सोरठा-अंजन ज्ञान है सार, रहै नहीं अज्ञानता ।
तेहि गुरुकी बलिहार, मेरी सदा प्रणाम है ॥

चौपाई

प्रथमैं बन्दों सतगुरु पाया । बंदी छोर करहु तुम दाय। ॥
धर्मदास बिन्ती अनुसारा । दया करो दुख भञ्जनहारा ॥
अविगतिकी गतिजाइन जानी । अही दयाल सो कहौ बखानी ॥
वेद शास्त्र सब जगत बखानै । गुप्त तत्त्व कोइ कर्म न जानै ॥
जब लगि वेद भेद नहिं जाने । तब लगि शब्द न हितकर मानै ॥
वेद विचारि भेद जो जाने । सत्य शब्दमें मोहि पहिचानै ॥
जीव जन्तु माया लपटाना । ताते वेद भेद नहिं जाना ॥
करवा चौथ औ होरी पूजै । परम तत्त्व कैसेहु नहिं बूझै ॥
देवी देव बहु पूजा ठानै । सार शब्द हृदय नहिं आने ॥
तीरथ व्रत महाँ तन मन पागै । सद्गुरु शब्द न कबहु लागै ॥
तेहिते सब जग गयो विगोई । जनम काल धरि सबही खोई ॥
तुम सद्गुरु हो मुक्ति के दाता । अगम अपार कहौ विख्याता ॥
सद्गुरु मोहि कहौ समुझाई । जाते मनकी संशय जाई ॥
श्रीकृष्ण गीता जो भापा । सो समर्थ सुनबे अभिलापा ॥
केहि विधि अर्जुन रणमहाँ नयऊ । केहि विधि ताहि मोह पुनि भयऊ ॥
केहि विधिकृष्ण ताहि समझाये । सो समर्थ कहौ भेद बताये ॥

दोहा-हे दयाल बिन्ती करौ, रहौ चरण चितलाय ।
गीता अर्थ भेद सब, मोहि कहौ समुझाय ॥

चौपाई

कहै कबीर सुनहु धर्मदासा । तत्त्व भेद है गुप्त निवासा ॥
वेद भाव संसार पसारा । ताते सृष्टि रच्यो व्यवहारा ॥
बहु व्यवहार रच्यो बहु भांते । जगत सकल भर्मत है ताते ॥
वेदतत्त्व तुम सुनौ सुजाना । अर्जुनगीता कृष्ण बखाना ॥

उग्रगीता

( ७ )

सो मैं तुमसन कथा सुनावों । तत्त्व भेदका मता बुझावों ॥
शास्त्र वेद पुराणन माँहीं । गीता मता तत्त्व जो आहीं ॥
तत्त्व मता जो कृष्ण सुनाया । सद्वर तो कछु अगम बताया ॥
तत्त्व निरतत्त्व दो होते न्यारा । धर्मदास तुम करहु विचारा ॥
जो संशय गीताके होही । सो अब सकल सुनावों तोही ॥
गीताका अब गम्य बतावों । सार शब्दका भेद सुनावों ॥
जहाँ देखौ तहाँ आप निवासा । सबते न्यारा सबमें बासा ॥

समै-तत्त्व मता है गीता, वेद पुराणमें सार ।

ताते अगम अपार है, पूरण शब्द हमार ॥

अथ श्रीभगवद्गीताप्रथमोऽध्यायप्रारम्भः

कवीर उवाच

अब गीता मैं कहौ बखानी । कृष्ण कहा सो अर्जुन मानी ॥
ताते न्यारा शब्द बतावों । तत्त्व माँहि निहतत्त्व लखावों ॥
जब यह सृष्टि भई महि भारा । तेहि मारण हरि मता विचारा ॥
बंधु विरोध कियो हरि जबहीं । कौरों पाण्डु जुरे दल तबहीं ॥
अर्जुन रथ चढ़ि आये तहवां । दोउ दल युद्ध रचो है जहवां ॥
कृष्ण सारथी रथ जब हांका । तासों अर्जुन ऐसो भाषा ॥

अर्जुन उवाच

दोऊ दलमें लै रथ राखों । दूनों देखौ अपनी आँखों ॥
सुनिकै कृष्ण ऐसे ही कीन्हा । दोउ दल बिच रथ राखै लीन्हा ॥
रथ जब दोऊ दलमें राख्यो । भयो मोह अर्जुन अस भाख्यो ॥
ये सब बन्धु हमारे आही । हे प्रभु मैं मारौं कहु काही ॥
भाई चचा भतीजा सारा । कैसे मारौं कुल परिवारा ॥
जहाँ लग देखों दोऊ सेना । आपन कुल मारौं केहि लेना ॥
विधवा होय है सकला नारी । ऐसो दोष लेत को भारी ॥
राज पाट मैं कछू न चाहों । सुखसम्मति कुलधर्म निबाहों ॥

( ८ )

बोधसागर

तीन लोकका राज जो देई । हत्या बंधु तबहु नहिं होई ॥
जो तुम कहो उन अवगुन कीन्हा । छवहु प्रकार भारऊ लीन्हा ॥
तिन्द प्रकारन मारा चाही । तौ यह मोहि दोष नहिं आही ॥
छौमें एक प्रकार जो होई । ताके मारे दोष न सोई ॥

धर्मदास उवाच

तब धर्मदास विनय अनुसारी । छौ प्रकार कवन कह भारी ॥
तेहि प्रकारन मारा चहिये । सो सब स्वामी मोसे कहिये ॥

कवीर उवाच

देखो हत्या को अब बरना । बहु संग्राम किये का सैना ॥
प्रथमें अग्नि देई घर कोई । मारत तासु दोष नहिं होई ॥
दूजे औरको जहर खवावै । हने ताहि कछु दोष न पावै ॥
तिसरे छत्र जो लेई छुड़ाई । राज काजमें पाप न भाई ॥
चौथे नारि पराई लेही । मारे ताहि पाप नहिं तेही ॥
पंचये धन चोरावन आवै । तेहि मारे कछु दोष न आवै ॥
छठये शस्त्र लै मारन धावै । मारे ताहि विलम्ब न लावै ॥
यह अपराध मारिये जोई । मारत हत्या कबहु न होई ॥

अर्जुन उवाच

छ अपराध हमहिंकू लागै । तऊ न हतों कर्म सब त्यागै ॥
मोसों यह अपराध न होई । जो मोकहैं इहि मारि विगोई ॥
अर्जुन धनुष बान गहि डारा । सबका अपने बंधु बिचारा ॥
सब कह कुल परिवार निहारा । उपजो मोह अस्त्र गहि डारा ॥
मुनहु सन्त अर्जुनको विखादा । इह लगि कीन्हो वाद विवादा ॥
अर्जुन मोह सम्पूर्ण भयऊ । कृष्ण अपन मनमत जो ठयऊ ॥
कीजै छल यक मता विचारा । अर्जुन बुद्धि हतौ यहि वारा ॥
ब्रह्मज्ञानते यहि समुझावउ । काल रूप अपने देखलावउ ॥
तब यह मानै कहा हमारा । मारौ फोरि सकल परिवारा ॥

उग्रगीता

( ९ )

कबीर उवाच

धर्मदास यह काल सुभावा । जाके जपन सृष्टि मन लावा ॥
सुर नर मुनि सब छलि २ मारा । कोई न छूटो यह संसारा ॥
ताते सतगुरु शब्द पुकारा । चीन्हो तत्त्व भेद टकसारा ॥
मूरख सत्य शब्द नहि जाने । झूठहि झूठ सदा सुख मानै ॥
परपंजी यह जग को रचना । बिन सतगुरु कोई नाहीं बचना ॥
छन्द-यहि भांतिकै हरि युद्ध ठानो भाव कोई ना लहै ।
सकल बंधु विरोध करिकै तासु को मारन चहै ॥
ज्ञान औ अज्ञान करि भरमाइ डारो चित्तको ।
तबहु मूरख नहीं बूझै देख फंदि उस बरतको ॥
सोरठा-सुन धर्मदास सुजान, शब्द एक संसार है ॥
हंस होइ निरवान, मन बच कै निश्चय गहै ॥

इति श्रीउग्रगीताब्रह्मज्ञानयोगमतकबीरधर्मदाससंवादे

अर्जुनविषादो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ।

अथ द्वितीयोऽध्यायः

श्रीभगवानुवाच

कृष्ण जो मन में मता विचारा । अर्जुन सो पुनि बचन उचारा ॥
तुम काहे मोहै गहि लीन्हा । केहि कारण तुम होहु अधीना ॥
क्षत्री धर्म लाज बढि होई । तुम कह दोष न लैहै कोई ॥
जो तुम जानु सदा ये जीहैं । येई तौ जन्म फेरि फेरि लेहैं ॥
अमर तुमहु मैं नाहीं कोई । फिरि २ आवागवन समाई ॥
मैं हूँ अमर नहीं हौं भाई । हम तुम यहिविधि फिरि २ आई ॥
जब २ पाप प्रगट मोहि होई । धरि अवतार करौं क्षय सोई ॥
जब २ द्रापर आवै भाई । हमतुम यहि विधि फिरि २ आई ॥
कौरव पाण्डव फिरि २ लडि हैं । आपहि आपु मारि कै मरिहैं ॥

( १० )

बोधसागर

तुम्हरो कीन्ह कछु नहिं होई । देखौ ब्रह्म ज्ञान करि सोई ॥
मनमें अहं कबहु नहिं कीजै । को मारै कहु को कह छीजै ॥
आपु जो करता काल कहावै । सोई यह संघार करावै ॥
मनमहँ मोह कबहुँ नहिं कीजै । इच्छा प्रभुकी गहि कर लीजै ॥
शस्त्र लेहु तुम हाथ उठाई । कारण करण करै प्रभु आई ॥
तुम शिर कछु न लागे भारा । अपु ते आप जाय सब मारा ॥
जो तुम कहो जीव सब मरिहैं । जीव अमर फिरि२ अवतरिहैं ॥
मारे मरै न जारे जरई । ताको मोह कहा तैं करई ॥
जो काया सो मन चितलाया । मृतक सदा बनी यह काया ॥
मृतक रूप सदा रहै काया । तेहि कारण तुम करत हो माया ॥
तुम हो अहो युद्ध अति आगर । यहि जगमें तुमही हो उजागर ॥
जो तुम युद्ध करो नहिं भाई । जगमें होइ है तुम्हरी हँसाई ॥
कहि है सबै युद्ध सो डरई । क्षत्रि धर्म तेरो नहिं रहई ॥
अपने कुलको धर्म जो हारै । नर्कवासको सो पगु धारै ॥
जो कुल धर्म सदा प्रतिपालै । स्वर्गवास में सो सुख चालै ॥
अपने धर्म न छाड़िय भाई । काहेको तुम करहु हँसाई ॥
लोग पंच जो निंदा करई । धिग जीवन तोको अनुसरई ॥
तब तो भली बात नहिं होई । महा दोष पुनि लागे सोई ॥
पाप होय मनमें पछिताई । नर्कवास तब रहै समाई ॥
कर्म योग तोहि वाक्य सुनावौ । स्वर्गवास ताते पहुँचावौ ॥
ब्राह्मण क्षत्री वैश्य औ शूद्रा । प्रभु कह छांड़ि भरै सब बोद्रा ॥
नरनारायण देह सवौरा । तबहु न चीन्है मूठ गवौरा ॥
ब्राह्मण कर्म सुनो चितलाई । प्रातः स्नान जपै प्रभु राई ॥
नेम धर्म शुचि संयम करई । सन्ध्या गायत्री चित धरई ॥
ठाकुर सेवा मन चितलावै । कथा कीर्तन करै करावै ॥
मनमें सेवा फल नहिं मांगे । स्वर्गवास पहुँचे सब आगे ॥

उग्रगीता

( ११ )

क्षत्री धर्म कर्म बहु करई । स्नान करै प्रभुको चित्त धरई ॥
यज्ञदान निज धर्म निवाहै । सूरानन नहिं दलहि सकाहै ॥
वैश्यवर्ण व्यापार व्योहारा । नेम धर्म जप तप व्रत धारा ॥
शूद्र वर्ण सेवकाई करई । मन वच कर्म इहै चित्त धरई ॥
सेवा फल है अगम अपारा । आवागमन ते होइ नियारा ॥
एते कुलके धर्म जो कहिये । सदा सर्वदा जो निर्वहिये ॥
यह मारग जो लागा रहई । स्वर्ग वासमें सो सुख लहई ॥
मारग छाँड़ि कुमारग लगै । काम कोधमें तन मन पागै ॥
नर्कवास तेहि कारण पावै । जन्म २ वह योनी आवै ॥
निंदा सकल ताहिकी करई । वाउर वेद ताहि परिहरई ॥
ताते अर्जुन ज्ञान विचारो । ब्रह्म ज्ञान मनमें संभारो ॥
मोह लाजकै वंदन छांड़ो । लैकै अक्ष कुटुम सब वाड़ो ॥
तुम कह पाप पुण्य नहिं होई । कारण करण करावै सोई ॥
साधु संत जो परम सनेही । पाप पुण्यते लिप्त न देही ॥

अर्जुन उवाच

कहैं अर्जुन सुनु पुरुष पुराणा । तिन साधुन कर करौ बखाना ॥
कैसी रहनि रहै वै बोलैं । कैसे बैठै कैसे डोलैं ॥
बोले कृष्ण तब चतुर सुजाना । यहि विधि रहै साधु निर्वाना ॥
स्थिर मन बुद्धि निहकामी होई । पांच पचीसौ रहें समोई ॥
बोले सत्य असत्य न भारै । अभ्यन्तर गति प्रभु कह राखै ॥
सो तो कह दुख सुख नाहिं मानै । दृष्टि माह प्रभु पूर्ण जानै ॥
तत्त्व प्रकृति चापि करि बैठै । जैसे कछुआ पाउ समेटै ॥
सीतल सत्य सहज पगु धारै । बाहर भीतर ब्रह्म निहारै ॥
यह लक्षण संगति कै भाई । इंद्री जीतै साधु कहाई ॥
पूर्ण पक्ष जो अर्जुन करेऊ । रोगी मूर्ख भाव जो धरेऊ ॥

( १२ )

बोधसागर

निह इच्छा रोगी है भाई । मूरख इच्छा नाही पाई ॥
ताकर मैं विरतान्त सुनाऊँ । सकल कामना तोरि मिटाऊँ ॥
मूरख सुगध कछू नहिं जानै । काम क्रोध मन कछू न आने ॥
पुरइन सम वासा है वाको । लिस अंग कछु होइ न ताको ॥
निशिवासर फिरिनाम भुलाई । तेहि कारण भर्मै सब ठाई ॥
रोगी इंद्री जीत कहावै । काम क्रोध नहिं क्षुधा सतावै ॥
पै इच्छा जो अब उठि लैहै । काम क्रोधमें बहु चित दैहै ॥
नाम विहीन दुखी बहु तलफै । खान पान आगे बहु कलफै ॥
ताते पटतर भक्त न भाई । बाधा यम पाटनको जाई ॥
साधु संत की रहनि बतावौ । करनी साखि जो वाक्य सुनावौ ॥
ऐसो रहनि साधु जो होई । जाकी महिमा वरनि न जाई ॥
ताते अर्जुन ज्ञान विचारौ । मनते लोभ मोह गहि डारौ ॥
दुतिय अध्याय इहां लगु कहेऊ । आगे भेद और कछु लहेऊ ॥

कवीर उवाच

कहैं कवीर सुनौ धर्मदासा । यतना कृष्णकीन्ह केहि आसा ॥
छल छिद्रहि कै ज्ञान सुनावै । अर्जुन कह तम गुण उपजावै ॥
जाते धनुष बान संधारै । सब परिवार चुनीचुनि मारै ॥
करता आप जो युद्ध करावै । शिर पाण्डों के भार चढावै ॥
छन्द-काल कर्ता करम करई समुझि देखि विचारिकै ॥
सत शब्द एक सार निर्मल ताहि लेह संभारिकै ।
तीनि गुण सब राखिकै जब जाइकै चौथे मिले ॥
शब्द सुरति लै लोक पहुँचै तबहि हंसा उठि चले ।

सोरठा-ऐसी रहनी हंस, धर्मदास सो अमर है ।

रहै न कबहुं संश, जो नामी नामै गहै ॥

इति श्रीमद उग्रगीतात्रब्रह्मज्ञानयोगमतकवीरधर्मदाससंवादे

अर्जुनकृष्णअशंकयोगो नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥

उग्रगीता

( १३ )

अथ तृतीयोऽध्यायः

अर्जुन उवाच

अर्जुन पूछे सुनु भगवाना । निर्मल ज्ञान सुनावो काना ॥
तुम तो कहौ कि युद्ध मचावौ । सब पलको तुम मारि गिरावौ॥
ज्ञान कही कहि मोहि समझावौ । फिरि कुलधर्म मोहि बतलावौ॥
जेहि ते मोर अकाज न होई । मोहि ज्ञान प्रभु दीजै सोई ॥

श्रीभगवानुवाच

कहै कृष्ण सुनु अर्जुन बीरा । तुम तौ क्षत्रिय हो रणधीरा ॥
मारग दोइ ज्ञान हैं भाई । ताते तेहि कहौ समुझाई ॥
निवृत्ति मारग आहि निरासा । सदा ब्रह्ममें रहैं निवासा ॥
तत्त्व प्रकृति लित नहीं होई । सदा रहै निलेपी सोई ॥
नाम विना कछु बात न बोले । मन वच क्रम अंतरपट खोले ॥
निष्कर्मो निर्मल निर्माही । नहिं इच्छा मननाम समोई ॥
जगमें रहै कमल सम भाऊ । ऐसे लित होइ नहिं काऊ ॥
दान पुण्य जो यह कछु करई । ताकर फल मनमें नहिं धरई ॥
दाता भुक्ता प्रभु कह जानै । कर्म धर्म कछु मनहिं न आनै ॥
मारग निवृत्ति साखि जो अहई । महाकठिन मारग तेहि कहई ॥
कठिन विहंगम मारग होई । पहुँचै कोटिन्ह महाँ पुनि कोई ॥
तेहि मारग कोइ चलने न पावै । काम क्रोध मद लोभ भुलावै ॥
पूरण सिद्ध हुवा नहिं जाई । ताते तोहि प्रवृत्ति दृढाई ॥
कुलके कर्म सदा चित धारै । कबहु न छोड़ै लोकाचारै ॥
दान पुण्य जप तप व्रत करई । संध्या तर्पण मन चित धरई ॥
नियम धर्म औ करै जो स्नाना । सवा सुमिरन धारै ध्याना ॥
उद्यम अपने कुलको करई । यह मारग जौ लागा रहई ॥
सो तो कर्मके कश्मल धावै । धीरा तन मन मैल जो खोवै ॥

१४)

बांधसागर

यह पिपील मत कहिये भाई । हरे हरे वह मार्ग जाई ॥
तेहि मार्ग कोइ विघ्न न लागै । कमहि कम धर्म तब जागै ॥
स्वर्गवास पावै सो प्राणी । कबहीं ताको होय न हानी ॥
तासों मैं बहु प्रीति जनावौं । संशय दुख सब दूरि बहावौं ॥
धनसम्पति सुख बहु विधि देऊँ । आपन करि मैं ता कह लेऊँ ॥
ताते प्रवृति अधिक फल भाई । लोकाचार समीप बताई ॥
तुम क्षत्री रणपति हो आगर । गहो धनुष तुम जक्त उजागर ॥
ऐसो कहो जब कृष्ण सुजाना । अर्जुन पुनि पूछो भगवाना ॥
कैसे कर्म लिप्त नहिं होई । कर्म धर्म तुम थापेउ सोई ॥
कहै कृष्ण अर्जुन सुन लीजै । सेवा सुमिरण मैं चित दीजै ॥
करि करि कर्म मोहि सब अपै । कबहुँ न पाप दोष सो डपै ॥
ताके शिर नहिं लागै भारा । सत्य भाव मो ऐसे विचारा ॥
पांच हत्या नित गेही करई । अंध भावते गेही फिरई ॥
नित नित हत्या शिर पर लेही । बांचे जन कोइ परम सनेही ॥
कहै अर्जुन यह हत्या कैसी । गेहीको तिन लागै सौसी ॥
सो तो वनिकै मोहि सुनावौं । दुविधा भावसो मोहि मिटावौं ॥
कहै कृष्ण अर्जुन सुनु वैना । हत्या पंच निरखि कै लेना ॥
प्रथम हत्या जो पीसेपिसाना । दूसर कुट्टे आनि जो धाना ॥
तिसरै बढ़नी जो घर देई । चौथे कलशा भरै जो कोई ॥
पंचये रसोई चूलहा वारै । हत्या पांच जीवहुँ मारै ॥
कहै अर्जुन यहि विनु को रहई । यह पातक कैसे परिहरई ॥
यह पातक जो देह सनेही । कैसे उधरनी इनसो लेही ॥
सुनु अर्जुन जिव कर्म न लगै । नित नित करि प्रभु चरणन पागै ॥
जो कछु करै सो प्रभुके कारण । ताहक दोष न कछु विचारण ॥
करै रसोई प्रभुके नामा । पुनि अपै जल लै सब सामा ॥

उग्रगीता

( १५ )

अंत कार काहैं परसादा । दीन दुखित जो पोषै सादा ॥
ता पाछे ब्रसाद जो पावै । ताको हत्या निकट न आवै ॥
ऐसे कारज प्रभु सनमानै । ताहि दोष नहि वेद बखानै ॥
त्रै अध्याय तोहि सन कहेऊं । कर्म योग परकट कै सहेऊं ॥
कहै कबीर सुनु धर्मसुनि आगर । सत्य सुकृतको ज्ञान उजागर ॥
यह तौ कर्म ज्ञान दृढ़ावै । फल भोगै फिरि योनिहि आवै ॥
निवृति कहै त्रिवृति ले आवै । फिरि फिरि लेके कर्म दृढ़ावै ॥
ताते मैं संसारहि आवा । सत्य शब्द कहि बहु गोहरावा ॥
बूझेगा कोइ सन्त विवेकी । ज्ञान दृष्टि ते सब कछु छेकी ॥
हम तौ तीनि लोकते न्यारा । जो बूझैं सो हंस हमारा ॥
यह रीझै तौ स्वर्ग देह वासा । कर्म भोगि मृतुलोक निवासा ॥

छन्द-धर्मदास मैं कहौं तोसौं सार शब्द जो भेद है ।
हंस मन बच गहैं ताकु पालक ना विछुरार है ॥
विश्वास देखो प्रीति करि मैं निकट प्रकटो तासुको ।
यम फंद शंसा भटी चौथो लोक देख निवासको ॥

सोरठा-अगम भेद है सार, भेद कोइ नहीं पावई ।
उत्तरे भव जल पार, शब्द गहै विश्वास कै ॥

इति श्रीमदुग्रगीताब्रह्मज्ञानयोगमते कबीरधर्मदाससंवादे

कर्मयोगारूढ्यानां नाम तृतीयोऽध्यायः

अथ चतुर्थोऽध्यायः

श्री कृष्ण उचाव

अर्जुन सो अस कहेउ भगवाना । अगम भेद बतावै ज्ञाना ॥
यह गीता काहू नहिं पाई । सो मैं तोसों वाक्य सुनाई ॥
प्रथम मैं गीता सूर्य सुनावा । उन वैवस्वत पुत्र पढ़ावा ॥

( १६ )

बोधसागर

ताकर सुत देवसि जो भयऊ । अपना सुतहि पढ़ाया लयऊ ॥
उन्ह लै सुत इक्ष्वाकुहि दीन्हा । प्रगट फिर काहू नहि कीन्हा ॥
यतिक दिवस जो रहेउ समाई । अब तुम कहैं मैं आनि सुनाई ॥
और ज्ञान यहि सम नहि होई । सुरति लौरति लै देखहु सोई ॥
तब अर्जुन पूछेउ अस बाता । तुम तौ भये यहि युग उतपाता ॥
सूर्य को आदि युग गयऊ । तुम सो गयउ उन्ह ज्ञान पयऊ ॥

श्रीभगवानुवाच

कहै कृष्ण सुनु वचन प्रमाना । जो मैं तोहि सुनावों ज्ञाना ॥
मैं तो सदा रहों जगमाहीं । तुमहु रहौ हमारे पाहीं ॥
जन्म अनेक तेरो चलि गयऊ । जन्म अनेक मेगे पुनि भयऊ ॥
तैं अचेत माया में बंधा । मैं निर्मल जस पूरण चन्दा ॥
जन्म जन्म के गुण मैं जानौ । अपनो तेरो गुण पहिचानौ ॥
आदि अंत सकलौ मैं जानौ । ताते यतना भेद बखानौ ॥
तै है काम क्रोध अधिकारा । नहि बूझै तैं चरित हमारा ॥

अर्जुन उवाच

पुनि अर्जुन अस पूछन लयऊ । कारण कवन जन्म तुम धरेऊ ॥
निह इच्छा तुम अंतर््यामी । काहे आवागमन समानी ॥
तुम्हारे दुष्ट मित्र नहि कोई । कारण कवन जन्म धर लेई ॥

श्रीभगवानुवाच

कहै कृष्ण सुनु परम पियारे । धरणी माँह पाप होइ भारे ॥
बहुत अधर्म होन जब लागे । वसुधा भार मही उठि लागे ॥
जब जब देखौं महि पर भारा । तब तब आनि लेउं अवतारा ॥
जन्म कर्म लै खेलौं जगमें । करि संहार जो रहौं अलग में ॥
मेरी गति मति कोइ न जानै । महिमा चारौ वेद बखानै ॥
होइ निष्कपट जो मोहक ध्यावै । महा अनंद परम निधि पावै ॥

उग्रगीता

( १७ )

जो मोसों कोइ अंतर राखै । कै २ दंभ भक्ति मन भाखै ॥
ता कई काल बहुत दुख देई । दंभी भार बहुत शिर लेई ॥
मैं हूँ तासों अंतर राखौं । कबही तासों निकट न भाखौं ॥
ताते तुम मोहक पहिचानौ । मेरो कहा सदा तुम मानौ ॥
तब अर्जुन बोले अस बानी । मर्म तुम्हार न काहू जानी ॥
करन करावन तुमही स्वामी । केहि कारण पृथ्वी अकुलानी ॥
तुम काहेको मारण आवौ । केहि कारण तुम भार चढ़ावौ ॥
तब अस बोले कृष्ण सुजाना । मर्म आपनो कहौं बखाना ॥
तीनि लोक जो राज हमारा । ताते रचौं खेले विस्तारा ॥
बहुत भांतिकै ख्याल बनावौं । खेलि ख्याल पुनि ताहि मिटावौं ॥
तीनि लोक मैं आवौं जावौं । निर्गुण सगुण जु नाम धरावौं ॥
जो जन भक्ति हमारी करई । मन वच कर्म मोहि चित धरई ॥
तेहि कह महु सहायक होऊँ । उन्हके दुष्टहि मारि बिगोऊँ ॥
सदा रहौं भक्तन हितकारी । तारण तरण है नाम सुरारी ॥
अर्जुन बहुरि जो पूछन लागे । इंद्री जीति सबै गुण त्यागे ॥
करन करावन कहवौ स्वामी । तुम पूरण हौ अंतर््यामी ॥
काहे सेवा पूजा लावै । देवि देवता बहुत मनावै ॥
देव पितरको पिण्ड जो भरई । केहि कारण बंधनमें परई ॥
तीरथ व्रत बहुतै तुम धावै । केहि कारण तुम नाम धरावै ॥
सुनु अर्जुन मैं कहौं बखानी । मेरी मति गति विरले जानी ॥
जग रचना स्थिर नहि पावै । ब्रह्म अज्ञान विराग उठावै ॥
कोइ काहूकी शंक न मानै । आपु आपुमें ब्रह्म बखानै ॥
सब व्यवहार जगतके चाहौं । राज काजमें वोर निवाहौं ॥
तब यह कर्म दृढावौ आई । तौन सृष्टि तुम कस उरझाई ॥

( १८ )

बोधसागर

चारि चरण तब परकट कीन्हा । कर्म धर्मपुनि ता कह दीन्हा ॥
ताते पूजा हम ही थापो । देवन महाँ हम ही आपो ॥
पूजत मोहि देखै संसारा । बहुते भाँति तब पूजा धारा ॥
तीर्थ व्रत जप तप गहि लीन्हा । ताकर फल संसारहि दीन्हा ॥
फल कारण सब जग अरुझाना । देवी देव रहे लपटाना ॥
जैसा करै तैसा फल पावै । दान पुण्य बहुते मन लावै ॥
ब्रह्म ज्ञान विनु मोहि न जानै । ताते चौरासी अरुझानै ॥
आवै जाई जगत मझारा । पशुवा शूकर श्वान सियारा ॥
चौरासी योनीमें फिरई । बडे भाग नर देही धरई ॥
जो कोइ भक्त मोहि न चितलावै । मोक्ष मुक्ति परम पद पावै ॥
मन संकल्प विकल्प ते त्यागै । तब यह पूरण तंतुहि लागै ॥
यज्ञ कर्म सब विधि व्यवहारा । ताते भव जल उत्तै पारा ॥
द्रादश यज्ञ कर्म है भाई । जेहिते महा परम सुख पाई ॥
सो अब तुमसों कहौ बखानी । यज्ञ कर्म करै जो प्राणी ॥
प्रथमें ब्रह्म यज्ञ है भाई । ब्रह्म सउज लै ब्रह्म अपराई ॥
ब्रह्म अग्नि होम ब्रह्म देई । सब विधि ब्रह्म जानिके लेई ॥
दुतिया यज्ञ देव यज्ञ करावै । देवि देवता बहुत मनावै ॥
सब साउज लै होम करावै । यहि विधि जन्म सफल सो पावै ॥
तीसर यज्ञ संयम करु इंद्री । साधै भूख प्यास औ निंद्री ॥
पांच पचीश गुप्त लिये खेले । मनुवा निशि दिन प्रभु सो मेलै ॥
चौथ यज्ञ संयम औ आतम । अभ्यंतर चीन्है परमातम ॥
आतम परमातम जब जानै । यहि विधि भेटै श्री भगवानै ॥
पँचयें द्रव्य यज्ञ जो होई । करि महि रक्षा साधु रसोई ॥
बहुत भांतिकै साधु जेवावै । तेहि पीछे वह भोजन पावै ॥
जस कीरत होवै संसारा । ताकी गति वैकुंठ सवारा ॥

उग्रगीता

( १९ )

छठये यज्ञ तपस्या भाई । आगिल जन्म राज कर पाई ॥
सतयें यज्ञ योग जो साधै । आसन मूल पवन अपराधै ॥
पूरण योग होइ जो कोई । काल त्रास कह जाने सोई ॥
जब लगि चाहे काया राखै । फिरि जन्मै तो योग अभिलाषै ॥
अठयें योग यज्ञ अधिकाई । गीता कथा पाठ करै भाई ॥
पोथी पढ़ि गुरु मारग गहई । सो भवसागरते निर्वहई ॥
नवयें ज्ञान यज्ञ है भाई । ज्ञान ध्यानमें रहै समाई ॥
दशयें यज्ञ जो प्राण पयाना । यह नारम जो रहै लपटाना ॥
एकादश है संयम सारा । सूक्ष्म भोजन करै जेवनारा ॥
देहीको मिथ्या करि जाने । प्रभु पूरण अन्तर पहिचानै ॥
द्वादश यज्ञ विधि नाम कमावै । योग युक्ति सब जानि जो पावै ॥
यहि विधि द्वादश यज्ञ हैं भाई । जो कोई करै परम हित लाई ॥
सो भावसागरते तरि जाई । विष्णुलोकमें जाइ समाई ॥
अर्जुन तुम तौ भक्त हमारे । बहुत उजागर प्रेम पियारे ॥
माया मोह चितते तुम डारो । धनुष बाण तुम वेगि सम्हारो ॥
चतुर्थाध्याय कहेउ तुम संगा । यज्ञ योग नाम सब अंगा ॥

कबीर उवाच

धर्मदास तुम संत सुजाना । सत्य शब्दका मर्म जो जाना ॥
यह तो धर्म कर्म व्यवहारा । कहा करै जिन शब्द संभारा ॥
शब्द इमार भेद टकसारा । जो बूझै सो उत्तरे पारा ॥
मुक्ति होइ सत्यलोक सिधावै । तीनि लोक बंधन मुक्तावै ॥
तीनि लोक जग आवागवना । अधर लोक है सतगुरु भवना ॥
इच्छा रूप फिरै जन मुक्ता । जहाँ पुरुष समीप संयुक्ता ॥
तहैं कर वर्णन कहा बखानों । गूँगेको सपना सम जानों ॥

( २० )

बोधसागर

छन्द-लोक उपमा कहा दीजै जगतमें कछु नाहिं हो ।
पुरुष पटतर कहा दीजै ससृजियों मन माहिं हो ॥
नदी अठारह गण्डका रेणुका भरिपूर हो ।
पुरुष शोभा अग्र आभा एति सूर्य झूर हो ॥

सोरठा-पुरुष रूप अपार, कहतै शोभा ना बने ।
चीन्हो शब्द हमार, जेहिते पुरुष परसि हो ॥

इति श्रीमदुग्रगीताब्रह्मज्ञानयोगमते कवीरधर्मदाससंवादे

द्वादशयज्ञव्याख्यानो नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥

अथ पञ्चमोऽध्यायः

श्रीकृष्ण उवाच

अर्जुन तुम हो भक्त हमारा । तुम्हरो काज करौ मैं सारा ॥
ज्ञान ध्यानमें मन तन देहू । निशिवासर सुमिरनकै लेहू ॥
ज्ञानवन्त जो है तत्त्वज्ञानी । तिनकी महिमा अवर न जानी ॥
हर्ष शोक जाके नहिं होई । काम क्रोध सो लिप्त न सोई ॥
कर्म करै करता न कहावै । अभ्यन्तर मारग चितलावै ॥
इंद्री आपु आपु सुख चाहै । ताके कबहुँ निकट न बाहै ॥
इंद्री कर्म सदा होय भाई । ताके लिप्त न होवे भाई ॥
तिनसों कर्म करै जो कोई । परमात्म कह लाग न सोई ॥
सम दृष्टी होय सर्व निहारै । सर्व योनिमें ब्रह्म विचारै ॥
ऐसो जो कोइ प्राणी होई । जीवन मुक्त कहावै सोई ॥
काम क्रोधमें यह जग बंदा । ज्ञान न उपजै मूरख अंधा ॥
निशिदिन ताहि मोह भरमावै । बहुरि बहुरि पाछे पछितावै ॥
नारी सुत हित बन्दन लाया । धनसो मन जो बहुत लगाया ॥
अंतकाल कोइ काम न आवै । होइ बिछोह पाछे पछितावै ॥
अन्तकाल जब संकट आवै । कालके हाथ सो कौन बचावै ॥