कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
बोधसागर
( १९७ )
अब मैं कहौं ज्ञान उपदेशा । तुम अपने घट करौ प्रवेशा ॥
मुक्ति नाम निःसंशय होई । अमर नाम जब सुर्त समोई ॥
जहँलग कहि जिभ्या करगाया । तहँ लग जानौं सो सब माया ॥
अकह नाम कहा नहि जाई । घट २ व्याप्त निरंतर आई ॥
नाद शब्द जबहीं उच्चारा । तासौं अक्षर भयो बिस्तारा ॥
अक्षर हीते उपजी माया । संशय भई सबनकी काया ॥
तब ही शब्द सुर्त मन लाया । मन थिर भए नहीं है माया ॥
स्थिर घट मन लहर समानी । मुक्तिरूप तबही पहिचानी ॥
सो निःकर्म जीव हमारा । कर्म काट भव उत्तरे पारा ॥
जो यह गहै शब्द मन लाई । ताकर आवागमन नसाई ॥
सीखै पढ़ै काम नहि आवै । कर्म जीव मुक्ति नहि पावै ॥
ज्ञान प्रकाश जाहि घट होई । ताके हृदय मोह नहि कोई ॥
जैसे सूरज बादल हँधा । ऐसे मोह ज्ञान कहँ भँदा ॥
जब लग मोह न छूटे भाई । तबलग नाम न हृदय समाई ॥
जबलग मोह रहै तन बासा । तबलग नहीं ज्ञान प्रकाशा ॥
जन्म जन्म कर भक्त जो होई । तबहि नाम कहँ पावै सोई ॥
कोटिन जन्म भक्ति जिन कीन्हा । अमर मूल तबही पर चीन्हा ॥
अमर मूल कर पावे भेदा । कहैं कबीर सो हंस अछेदा ॥
धर्मदास वचन-चौपाई
धर्मदास बिनती अनुसारी । सदगुरु वचन जाऊँ बलिहारी ॥
जिहि विधिममन होय अछेदा । सो समरथ कहि दीजे भेदा ॥
जो मोहे कहो पान परवाना । नरियर भेद कहो सहिदाना ॥
कहाँ ते भयो पान परवाना । कहवाँ ते नरियर उत्पाना ॥
सतगुरु वचन
अमर मूल सौं पान बनावा । बेली बीज नहीं निर्मावा ॥
हतो न बेल बीज तिहि ठाई । शब्द माहि बेली निर्माई ॥
( १९८ )
अमरमूल
उपजो तबै पान परवाना । जाते हंस होय निर्वाना ॥
नरियर आहि धर्मको माथा । सो मैं दीन्ह तुम्हारे हाथा ॥
जीवके बदले नरियर दीन्हा । हंस छुड़ाय धर्म सो लीन्हा ॥
नारियर पान प्रसादकी जोरी । सार शब्द सो नरियर मोरी ॥
जिन नरियरको पाय प्रसादा । जन्म मरणका पाप नसादा ॥
जे जीव पायो पान प्रवाना । देह छोड़ सतलोक पयाना ॥
काल दगा तबही मिटजाई । सत्यलोक महाँ जाय समाई ॥
ऐसी भक्ति जीव जो करई । भक्ति बिना सो नहिं निस्तरई ॥
धर्मदास वचन
धर्मदास विन्ती अनुसारी । हे सतगुरु तुम्हरी बलिहारी ॥
नरियर पान प्रसाद बतावा । ताकर भेद नाहिं हम पावा ॥
सोई भेद मोहे देहु बताई । जिह्ति मन संशय मिटजाई ॥
सतगुरु वचन
धर्मदास तुम सुनो सुजाना । नरियर भेद पान परवाना ॥
धर्मदास जब सेवा लाई । तबकी कथा कहौं समुझाई ॥
जब तुम सुनो धर्मकी आदी । तब मिटि है जिवकी बकवादी ॥
सेवा बसहि पुरुष तब भयऊ । तीन लोग भवसागर दयऊ ॥
मानसरोवर बैठक दीन्हा । कामिनि देख बहुत सुख कीन्हा ॥
धर्मराज कामिन कहँ ग्रासा । तबही पुरुष आप परकाशा ॥
तीनलोक जिव करौं अहारा । तबही भरि है उद्र तुम्हारा ॥
तीनलोक महाँ जीव जो होई । धर्मराय कहँ आवैं सोई ॥
ताते नरियर बदला दीन्हा । जीव छुड़ाय कालसौ लीन्हा ॥
भक्ति प्रवान कहेउ समुझाई । बिना भक्ति नहिं काल पराई ॥
नरियर पान शब्द है नौका । भक्ति प्रवान कहेउ तहाँ चौका ॥
बोधसागर
( १९९ )
भक्ति प्रवान कहौ समुझाई । कवन भक्ति सों जीव मुक्ताई ॥
तुम प्रभु हौ हंसनके नायक । पुरुष पुरातन जीवहित लायक ॥
भक्ति अँग मोहे देव बताई । तिहिं गहि हंसा लोक सिधाई ॥
सद्गुरु वचन
धर्मदास सुन भक्ति विचारा । जासों उत्तर जाय भव पारा ॥
प्रथमहि पान प्रवाना पावै । साधनकी सेवा मन लावै ॥
सार शब्द घट रहे समोई । अक्षर भेद पावै जन कोई ॥
अमर वस्तु गुप्त हम राखा । ज्ञानी होय तेहि सों भाखा ॥
शब्द रूप निःअक्षर जानो । सो हंसा सत लोक पयानो ॥
इतना ज्ञान जाहि घट होई । अमर मूलको जाने सोई ॥
छन्द-ज्ञान पूरन होय जा घट पान नरिअर भक्ति हो ।
बिन ज्ञान नहिं भेद पावैं केते पद गुण शक्ति हो ॥
अमरमूल यह ग्रन्थ धर्मनि सुनियो चित्त लगायकै ।
जन्म २ को पाप नासै अमरलोक सिधायकै ॥
सोरठा-सुन धर्मदास सुजान, किहिं विधि साधु कहावई ।
कहैं कबीर बखान, अमरमूल जाने बिना ॥
इति श्रीअमरमूल ग्रन्थ प्रथम विश्राम
ज्ञान भक्ति वर्णन
धर्मदास वचन चौपाई
धर्मदास कहैं सुनो गुसाई । जीवन मुक्ति सो मोहे बताई ॥
नाम अमोल तत्त्व अति भारी । दुविधा माहिं जीव संचारी ॥
यह संशय मोहे निसदिन व्यापे । हरहु बेग गुरु यह संतापे ॥
( २०० )
अमरमूल
तुम सतगुरु घर बैठे तारा । आवागमन मोरे निर्बारा ॥
मन अरु जीव भेद बतलाओ । अबजिनमोसन अन्तर लाओ ॥
समझो तबै जीव मुक्ताऊँ । वही डोर गहलोक पठाऊँ ॥
सद्गुरु वचन
पावन पचासी सकल पसारा । जीव पवनसों आहि निसारा ॥
ब्रह्म रूप सब माँहिँ समार्ई । सूक्ष्म रूप जीव दरसारई ॥
दसवां भाग राई कर जाना । आतम रूपी देह समाना ॥
अरु योगिनमें बरते भाऊ । मानस देहमें मुक्ति प्रभाऊ ॥
पांच तत्त्व दस इन्द्री संग । प्रकृति पचीस कहेउ प्रसंगा ॥
यह प्रमान मन करे बखाना । जीव ब्रह्मसों भये उत्पाना ॥
मन करता यह देह समाना । सूक्ष्म रूप नाहिँ पहिचाना ॥
अंक चीन्ह स्थिर होये सोई । ताकी आवागमन न होई ॥
ताकौ बरन भेद जब पावे । मुक्ति होय जग बहुरि न आवे ॥
चौरासी कब बन्धन छूटे । काल जंजाल ताहि नहिँ लूटे ॥
मुक्ति भेद कोइ बिरले जाना । काल फांस जग सब लपटाना ॥
अमर मूल है मुक्ति पसारा । ताकौ संतो करौ विचारा ॥
आतम ब्रह्म एक है भाई । परमातम मिल ब्रह्म कहाई ॥
ज्यों जलमधि सों लहरि उगाई । तिमि परमातम आतम आई ॥
जिमि किसान चिनगी संचारा । इमि जिव भयउ ब्रह्म विस्तारा ॥
जिमि कंचन आभूषण कीन्हा । ऐसे जीव ब्रह्म कहँ चीन्हा ॥
उमैं अंश दीपक इक फूटै । जीव ब्रह्म संग न छूटै ॥
जिमिरविज्योतिकिरणपरकाशा । ऐसे ब्रह्म कर मोहिँ जिवबासा ॥
यहि विधि ब्रह्म जीवहिँ गाई । समझे तबही एक होजाई ॥
शिव शक्ती एकहिँ मतकीन्हा । तारक भेदको बिरले चीन्हा ॥
जे जाना ते मुक्ति समाना । प्रेम भाव सद्गुरु पहिचाना ॥
बोधसागर
( २०१ )
सारखी-जिन जाना निज प्रेम कहैं, सोईं जन परवान ।
तासों कहिये सूरमा, कहैं कबीर बखान ॥
चौपाई
केवल ज्ञान पाय है सोईं । जिहि पर कृपा गुरुकी होई ॥
केवल ज्ञान प्रगट समझाऊँ । भिन्न २ कर तोहि लखाऊँ ॥
प्रथमहि सुनो ज्ञान कर भेदा । निर्माही होय हंस अछेदा ॥
सुर्तवंत अक्षर पहिचाना । और सकल जग मिथ्या जाना ॥
सुखदाई सबही कहैं भावै । बाल रूप होय अग्नि बुझावै ॥
समदृष्टी एकहि कर जानै । भला बुरा कछु मन नहिं आनै ॥
हृदय पुनीत शुद्ध मन होई । पाखण्ड भर्म डार सब खोई ॥
ब्रह्म वियोग सदा अनुरागी । दसहूँ दिशा झूठ तिन त्यागी ॥
झूठ सकल जग देखौ जानी । जैसे अहै बुदबुदा पानी ॥
अस मति जाकर होय सुहाई । केवल ज्ञान ताहि समुझाई ॥
माया बिना मोह नहिं आवै । नाम पदारथ निश्चय ध्यावै ॥
यह विधि केवल ज्ञान कहावै । जो सुमिरत सतलोक सिधावै ॥
केवल काम निःअक्षर आई । निःअक्षर मैं रहै समाई ॥
निःअक्षर तो करै नवेरा । कहैं कबीर सोईं जन मेरा ॥
अमर मूल मैं बरन सुनाई । जिहिते हंसा लोक सिधाई ॥
शब्द भेद जाने जो कोई । सार शब्द मैं रहै समोई ॥
शब्द ज्ञानका लख जिन पाया । समदृष्टि सब माहिं समाया ॥
जेतक जीव देह धर आए । शब्दहिं सों ते सकल उपाए ॥
शब्द अखण्डा और सब खंडा । सार शब्द गरजे ब्रह्मंडा ॥
निःअक्षर की परिचय पावै । सत् लोक महाँ जाय समावै ॥
धर्मदास उवाच-छन्द
बिन्ती करै कर जोर धर्मन, सुनहु सत गुरु सार हो ।
सत्तलोक है कौन शोभा, तहाँ कौन व्योहार हो ॥
( २०२ )
अमरमूल
कवन रूप जो पुरुष रहहीं, कवन सुख हँसा करै ।
कामिनी किहि रूप राजै, तहाँ सुख विस्तार हो ॥
सोरठा-सो मोहे प्रगट सुनाव, दया करौ निज दास कहैं ।
बार बार बलि जाँव, अब जिन मोहि छिपावहु ॥
सतगुरु वचन-चौपाई
कहैं कबीर सुनहु धर्मदासू । सतलोक को कहों प्रकासू ॥
है सतलोकहि अम्बर काया । एक रूप सबही त्रय माया ॥
षोडश भान हंस की कांती । अमर चीर पहिरे बहु भांती ॥
शोभा पुरुष कही नहिं जाई । कोटिन रवि इक रोम लजाई ॥
अमर लोक अमर है काया । अमर पुरुष जहां आप रहाया ॥
अमर पुरुष का पावै भेदा । कहै कबीर सों हंस अछेदा ॥
सतलोक सत शब्द पसारा । सत् नाम है हंस अधारा ॥
अमृत फल के भोजन करहीं । युगन २ की क्षुभ्या हरहीं ॥
पीवत सुधा भर्म मिट जाई । जन्म २ की तृषा बुझाई ॥
कामिनी रूप वरन उजियारा । चार भान की ज्योति पसारी ॥
शोभा बहुतक प्राण पियारी । प्रेम भाव सब हंस निहारी ॥
अनहित वचन बोल नहिं बानी । प्रेम भाव अमृत रसरानी ॥
शोभा बहुत जहां मन भावन । हंस कामिनी रंग बढावन ॥
अमृत नाम हृदयमें लावे । प्रेम भाव पुरुषहि मन भावे ॥
आशा बस मन कोऊ नाहीं । भयो प्रकाश शब्दके माहीं ॥
बूझे संत ज्ञानी जो होई । सतगुरु शब्द हृदय समाई ॥
है निहशब्द शब्द सौ कहेऊ । ज्ञानी सोई जो वह पद लहेऊ ॥
धर्मदास मैं तोहि सुझावा । सार शब्दका भेद बतावा ॥
सार शब्द का पावै भेदा । कहैं कबीर सो हंस अछेदा ॥
बोधसागर
( २०३ )
सार शब्द निःअक्षर आहीं । गहै नाम तेहि संशय नहीं ॥
सार शब्द जो प्राणी पावै । सत्तलोक महि जाय समावै ॥
साखी—कहै कबीर विचार के, सुनहु साधु धर्मदास ।
अमरमूल निज शब्द है, ताकर अस परकास ॥
चौपाई
अमर मूल ग्रन्थ में सारा । बिना अमर नहिं हंस उबारा ॥
धर्मदास वचन
धर्मदास कर जोर निहोरा । स्वामी सुनिये बिनती मोरा ॥
कवन प्रसाद दरश हम पाया । कवन प्रसाद अमर भइ काया ॥
कवन प्रसाद साधु कहलायऊ । कवन प्रसाद हंस गति पायऊ ॥
कवन प्रसाद ज्ञान हम पाया । कवन प्रसाद अमर भइ काया ॥
कवन प्रसाद नाम हम पाया । कवन प्रसाद हम लोक सिधाया ॥
कवन प्रसाद सजन जन जानी । सो समुझाय कहो मोहि बानी ॥
सद्गुरु वचन
कहैं कबीर सुनौ धर्मदास । यह सब भेद कहों परकास ॥
पुरुष दयातैं दर्शन पावा । कोटि भक्ति सत नाम समाया ॥
जब कीन्ही सतगुरु ने दया । नाम जान अमर भई काया ॥
सेवा कीन्ही साधु कहाए । लोक जायके हंस कहाए ॥
हेत दीप सज्जन जन जाना । कहैं कबीर भेद निर्वाना ॥
साखी—एक नामकी शोभा, कहैं लग कहों बखान ।
निःअक्षर जो जानि है, सोई सन्त सुजान ॥
चौपाई
सत सहिदानि तोहि समझाई । अमर मूल महि देखौ आई ॥
कोटि जन्मको पातक होई । नाम प्रताप जाय सब खोई ॥
नामहि गहैं सूरमा जानी । बिना नाम कायर सो मानी ॥
( २०४ )
अमरमूल
नाम बिना सबही बिधि हीना । नाम बिना है ज्ञान बिहीना ॥
नाम बिना सो मूरख कहिये । नाम बिना सो पापी लहिये ॥
नाम जान सोई गुण आगर । नाम जान पहुँच सुख-सागर ॥
छंद
नाम अमी अमोल अबिचल अंक वीरा पावही ।
तज कागकि चाल मरालपथ गह अमरलोक सिधावही ॥
जिमि सदन दीपक बिना नहिं मिटत है अँधियार हो ।
तिमि नाम विन सुनु दास धर्मनि नहीं घट उजियार हो ।
मोरठा-नाम अमोल अपार, अमर मूल मैं वर्णैऊ ।
करहि कर्म जर छार, कहै कबीर बिचार कर ॥
इति श्रीअमरमूल नाम लोकमहिमा वर्णन ।
द्वितीय विश्राम
धर्मदास वचन-चौपाई
बिन्ती इक मैं करों गुसाईं । जिहि तें मन की संशय जाईं ॥
अमरमूल का कहौं विचारा । जाते हंस उत्तर है पारा ॥
कौन भक्त सों हंस कहावा । कौन विधीसों पंथ चलावा ॥
सो मर्यादि देहु बतलाई । तुम प्रभु ही हंसन सुखदाईं ॥
सद्गुरु वचन
कहै कबीर सुन धर्मनि नागर । यहविधिहंस पहुँच सुख सागर ॥
प्रथम करै सतगुरु की सेवा । जाते मिटै काल कर भेवा ॥
महा प्रसाद प्रेम सो पावै । सेवा कर निज गुरुहि मनावै ॥
घट में राखे प्रेम अनंदा । चौरासी के छूटे फंदा ॥
गुरु साहिब एकहि कर जाने । सो हंसा सतलोक पयाने ॥
साधन सों एकहि मति रहई । दुबिधा भाव न कबहुँ करई ॥
गुरु साधु सेवा जिन कीन्ह। ताकहँ मुक्ति निकट हम दीन्ह। ॥
बोधसागर
( २०५ )
सारखी-गुरु संतनको जान कै, हृदय करै परतीत ।
कहे कबीर सो हंस है, चलि है भव जल जीत ॥
चौपाई
सतगुरु तहां आरती करहीं । सब तज जहां जाय पगु धरहीं ॥
चरणाश्रुत साधन को लीजै । मुख पूजाकर अचवन कीजै ॥
गुरुकी दया निरवरत रहई । निंदा रूप न कबहूँ करई ॥
निःअक्षर सुमिरौ चितलाई । जासों आवागवन नसाई ॥
निःअक्षर को निरैवे भावा । देह छोड़ सतलोक सिधावा ॥
गुरुके वचन सोचकर माना । नाम बिना मिथ्या जगजाना ॥
और न देख और नहिं पेखै । निस दिन पल २ नाम विवेखै ॥
सारखी-छूट पसारा देख जग, करनी देय बताय ।
एक नाम कहैं जानके, ता महीं रहै समाय ॥
चौपाई
कर्म भर्म की छोड़हि आशा । एक नाम सों कर विश्वासा ॥
कुलकी लब्धा भर्म नसावै । ऐसी रहिनी साधु कहावै ॥
यह विधिसों तुम पंथ चलाओ । जन्म जन्म को पाप नसावो ॥
वंश तुम्हार लोक कहैं जाई । नाम बिना बूड़ी दुनियाई ॥
नाम जान सो वंश तुम्हारा । बिना नाम बूड़ा संसारा ॥
नाम पार नहिं वेदन पावा । नेति नेति कर सब गुहरावा ॥
आदि ब्रह्मको पार न पावे । पठ पठ पण्डित भर्म लगावे ॥
मुक्ति पंथ नहिं सुतै समावा । पठ गुन थकित पार नहिं पावा ॥
अंतकाल जम घेरै आई । तब विद्या कछु काम न आई ॥
विद्या पठ कीन्हा अभिमाना । अंतकाल होय नर्क निदाना ॥
वेद पुराण साख यह भाखा । नाम बिनाको जमसों राखा ॥
व्यास ब्रह्मकी अस्तुति कीन्हा । श्रीभागवत भाखनित लीन्हा ॥
( २०६ )
अमरमूल
काम रूपकर सबहि सुनावा । पंडित तासु मरम नहि पावा ॥
पुरन ब्रह्म नाहिं चित दीन्हा । काम रूप सबहीमहि लीन्हा ॥
बिन सदगुरु कोइ मरम न पावे । झूठ राह सबही लपटावे ॥
सतपुरुषको मरम न जाने । झूठहि धाय सांच कर माने ॥
झूठहि झूठ रहा लिपटाई । सतपुरुषको लखा न जाई ॥
अठारा पुराण ग्रन्थ बहु भाखा । तिनमहि सिरे भागवत राखा ॥
ब्रह्म महातम कहि समुझावैं । श्रीभागवत भक्त दृढावैं ॥
कृष्ण चरित्रसबकरहिबखाना । कृष्ण मरम काहू नहि जाना ॥
निर्गुन भक्ति नहीं चित दीन्हा । सर्गुण भक्ति सबहिगहिलीन्हा ॥
निर्गुन ब्रह्म मरम नहि जाना । शिव समाधिलगावहिं ध्याना ॥
विष्णु ध्यान कीन्हा मनमाहीं । अलख निरंजन देखैं छाहीं ॥
देखत छांहि मम्र मन भयञ्ज । निरंजन रूप विष्णु ह्वैगण्ड ॥
दैत्य देव कीन्हें उतपानी । कीन्हें दैत्य देवनकी हानी ॥
दैत्य मारिके देव छुडावा । ताते विष्णु सबन मन भावा ॥
गोपिन मिलकर रास पसारा । लीला एहि भक्त चित धारा ॥
ता लीला महि सृष्टि भुलानी । ब्रह्मादिक सबमुनि अरु ज्ञानी ॥
ज्ञान कथैं अरु जोति दृढावैं । जोति स्वरूप मर्म नहि पावैं ॥
जोति स्वरूप निरंजन राई । जिन यह सकल सृष्टि भर्माई ॥
सत पुरुष का मर्म न जाना । झूठ ज्ञान सबही लिपटाना ॥
सत्य पुरुष सतगुरु सों पावे । सत्य नाम महाँ जाय समावे ॥
साखी-कहे कबीर धर्मदाससों, अमर मूलनिज जान ।
अमर शब्द जा घट बसे, पावै पद निर्वान ॥
चौपाई
सत्य महाँ पावहु बासा । विना अमरनहिंकालविनाशा ॥
पठ पठ मूरख ज्ञान विगारे । ज्ञान गम्य नहिं कोइ विचारे ॥
बोधसागर
( २०७ )
ज्ञान गम्य जाके घट होई । शब्द खोज करि है जन सोई ॥
ज्ञान गम्य नहीं मूरख पावे । सतगुरु मिले तो भेद बतावे ॥
सब संसार दूण्ड फिर आवै । ज्ञान बिना सब मूल गँवावे ॥
साखी—संत मिले संशय नसे, नहीं तो पच पच मरना ।
नाव मिली केवटनहिं, किसी बिधि पार उतरना ॥
धर्मदास वचन—चौपाई
धर्मदास कहै सुनहु गुसाई । ज्ञान शब्द मोहे समुझाई ॥
ज्ञान रूप सतपुरुष प्रकाश । सत्य लोक महँ कीन्हौ वासा ॥
किहिबिधि समझ परैयह बानी । कहिये सदगुरु नाम निशानी ॥
सदगुरु वचन
ज्ञान स्वरूप पुरुषकर आही । ज्ञानहि रूप कबीर लखाही ॥
ज्ञान प्रकाश दीप सम जानौ । बिना ज्ञान बस झूठ बखानौ ॥
बिना ज्ञान घटमें अधियारा । ज्ञानबिना नहीं होय उबारा ॥
ज्ञान बिना अक्षर नहीं पाई । ज्ञान रूप अक्षर है भाई ॥
ज्ञान रूप पुरुष कर जानौ । एही वचन सत्य कर मानौ ॥
ज्ञान रूप निःअक्षर कहिये । अक्षर भेद ज्ञान सो लहिये ॥
निःअक्षर हो ज्ञानहि जानौ । अक्षर निःअक्षर पहिचानौ ॥
ज्ञान शब्द पुरुष कर अंशा । ज्ञान जान जन सोह मम वंशा ॥
बिना ज्ञान नहीं वंश कहावे । ज्ञान होय तब शब्दहि पावे ॥
सोई वंश सत शब्द समाना । शब्दहि हेत कथै निज ज्ञाना ॥
साखी—कहे कबीर विचारकै, सुनियो हो धर्मदास ।
जो यह शब्दहि पाय है, करि है लोक निवास ॥
धर्मदास वचन—चौपाई
बिनती करी धर्मनि कर जोरी । हे सम्रथ विनती यक मोरी ॥
जेहि तैं वंश शब्द कहँपावे । सत्य लोक कहँ सत्य सिधावे ॥
औ जीवन कहँ देहु दढाई । जाते जीव मुक्ति गति पाई ॥
( २०८ )
अमरमूल
अब मैं वंशका कहों विचारा । धर्मदास तुम अंश हमारा ॥
आदि नाम आमोदिक शाखा । सोई शब्द वंश कहैं राखा ॥
साठ सभै बारह चौपाई । एही तत्त्व हंस घर जाई ॥
जब माली का भेदहि पावै । सत्य नाम में जाय समावै ॥
ऐसो भेद सुनौ धर्मदासू । जन्म जन्म की भेटत त्रासू ॥
सद्गुरु दया कर्म होय छीना । अमर होय नामहि लौ लीना ॥
संशय का मैं कहों ठिकाना । संशय काल घटमाहि समाना ॥
जबही पुरुष धर्म कहैं कीन्हा । तबही संशय उत्पन लीन्हा ॥
निः अक्षरकी परिचय पावै । संशय मिटे अमर घर जावै ॥
संशय को खंडित है ज्ञाना । ज्ञान हीन संशय लिपटाना ॥
संशय काल सबन कहैं खाई । निःसंशय हो नाम समाई ॥
संशय काल लखै नहि कोई । तातैं गण बिगोय बिगोई ॥
संशय नाम सुनौ धर्मदासू । एक नाम की राखहु आसू ॥
नाम छोड़ अन्तहि चित आनै । संशय तमहि पकर गहि तानै ॥
नामहि गहै तेहि निहसंसा । नाम बिना बूढे सब हंसा ॥
सारखी-कहैं कबीर धर्मदाससों, संशय को विस्तार ।
एक नाम कहैं जानके, उतरहु भौ जल पार ॥
धर्मदास वचन-चौपाई
हे स्वामी संशय उत्पानी । ज्ञान हीन सब जीवहि जानी ॥
विरला हंस होय अंकुरी । सो यह ज्ञान गहै निज मुरी ॥
ज्ञान लखे बिन मुक्ति न होई । तौ यह दुनियां जाय बिगोई ॥
नाम महातम भाख सुनावा । बिना नाम कोई पार न पावा ॥
सद्गुरु वचन
कहैं कबीर सुनौ धर्मदासू । यह निज भेद कहौ तुमपासू ॥
ज्ञान हीन प्रानी जो होई । ताकर भेद कहौ मैं सोई ॥
बोधसागर
( २०९ )
ता कहैं दीजै पान प्रवाना । निश्चय हंस होय निर्वाना ॥
और प्रतीत हीय मैं धरई । सो प्राणी भवसागर तरई ॥
पान पाय सत्यहि मुख भाखै । सदगुरु चरण हियेमें राखै ॥
सदगुरु केर निछावर करई । साधु चरण चितनिश्चय धरई ॥
तन मन धन संतन पर वारै । सतगुरु चरण हृदयमें धारै ॥
सुत नारी कर मोह न आवै । सबही त्याग चरण चित लावै ॥
चरण धोय चरणाभूत लीजै । सत्यलोक महाँ अमृत पीजै ॥
धर्मदास वचन
पुरुषरूप कर यह उपदेशा । नारी को अब कहौ सँदेशा ॥
नारी नाम सुक्ति किमि होई । ताके घट महाँ ज्ञान विगोई ॥
सदगुरु वचन
ताकर तोहि भेद समुझाऊँ । मनो कामना सकल मिटाऊँ ॥
नारी तरै सुनो धर्मदासू । कहैं कबीर नाम विश्वासू ॥
ज्ञान हीन नारी को रूपा । ताको मैं सब कहाँ स्वरूपा ॥
तन मन धन संतन पर वारै । संतनकी सेवा चित धारै ॥
साधन सौ जो अन्तर करई । धर्मरायके फंदा परई ॥
गुरुके चरण निछावर जाई । तन मन धन सब देय चढ़ाई ॥
गुरुकी सेवा निशिदिन करई । सो तिरिया भवसागर तरई ॥
ऐसी धरन धरै धर्मदासू । तबही मिटै कालकी फांसू ॥
धर्मदास वचन
धर्मदास बिन्ती अनुसारि । हे स्वामी तुम्हरी बलिहारी ॥
यही वचन प्रभु मोहि सुनाऊ । मोरे मन इक भर्म समाऊ ॥
नारी रूप सकल हम जाना । पुरुष रूप एकहि पहिचाना ॥
नारी कहिये सब संसारा । आदि ब्रह्म है पुरुष अपारा ॥
आदि पुरुषहमतुमकहँ चीन्हा । दूसर पुरुष कहाँ अब कीन्हा ॥
नं. ७ कबीरसागर - ८
( २१० )
अमरमूल
जो तुम कही सोई हम जानी । नारी रूप सुर्त पहिचानी ॥
दूसर नारि कहाँ है कीन्हा । यही वचन हम संशय लीन्हा ॥
मैं नररूप आँहु मति हीना । यही भेद सुन भयउ मलीना ॥
तुम तौ दयावर्त गुरु स्वामी । क्षमिय चूक प्रभुअन्तरयामी ॥
नारी नाम मातु जो कहिये । इनहि भेद कैसे निर्वहिये ॥
नारी नाम बहिन जो आही । तासौँ कैसे अंक मिलाही ॥
नारी नाम पुत्री जो होई । तासौँ कैसे अंक सजोई ॥
साखी—यह सब भेद बतावहु, सुनहु हो बंदीछोर ।
यह संशय प्रभु मेटहु, चरण गहों प्रभु तोर ॥
सद्गुरु वचन—चौपाई
कहैं कबीर सुनो धर्मदासू । यह संशय उपजी तुम पासू ॥
आदि पुरुष तब हते अकेला । शब्द स्वरूपी पंथ दुहेला ॥
तब साहिब ऐसा मत कीन्हा । सकल सृष्टिरचिबेचित दीन्हा ॥
मनसा घटते भिन्न निकारी । उत्पति भई तहाँ इक नारी ॥
सोई नारि सकल जग जाया । भग भोगे तैं पुरुष कहाया ॥
भग द्वारे होय बालक आया । यही भांति सब जग भर्माया ॥
मैं तो एक मतौ रच जबही । पुत्र, बंधु पिता भयो तबही ॥
मैं तो एक नारीकर जबही । पुत्रि, बहिन माता भई तबही ॥
भाई बहिन कीन्हा व्योहारा । धर्मराय को यह संसारा ॥
यह संशय महाँ मार लै जाई । मार जार सब दुनियां खाई ॥
आपहि पिता आपही पूता । आपहि देव आपही भूता ॥
आपहि नारि रूप औतरिया । आपहि सकल सृष्टि विस्तरिया ॥
आपहि कर्म धर्म उपजावन । आपहि रचै आप विनसावन ॥
तातैं भेदे बताऊँ तोही । ज्ञानी होय समझ कर लेही ॥
धर्मदास को संशय छूटा । जन्म जन्मके पातक टूटा ॥
बोधसागर
( २११ )
ज्ञानी सों कहिये उपदेशा । मूरख सों जिन कहौ संदेशा ॥
संशय कीन्ह सकल जग भंगा । काहु न चीन्हा संशय अंगा ॥
साखी-कहैं कबीर सो बाचि है, गुरु चरण चित दीन्ह ॥
अमर मूल निज शब्द है, हंसा चित गहि लीन्ह ॥
चौपाई
धर्मदास तुम करो विचारा । विना शब्द नहिं उत्तरौ पारा ॥
सार शब्द सों सब उपजावा । नारि पुरुष दोई निरमावा ॥
सूरज पुरुष चन्द्र है नारी । यह घटमें द्वै रूप सँवारी ॥
जैसे धातु कनककी एका । साँचा माही रूप अनेका ॥
पाप पुण्य रूपहि सों बांधी । कीन्ह धर्म यह अगम अगाधी ॥
पाप रू पुण्य भर्म है भाई । धर्म राय सब भर्म उपाई ॥
भर्म अमल तबही मिट जाई । सत्य नाम जब रहै समाई ॥
जब लग भर्म अमल है भाई । तब लग नाम बूझ नहिं जाई ॥
बूझ सीख गावै बहु भाँती । सुमरन भर्म करै दिनराती ॥
आप न चीन्हे मूढ़ गँवौरा । भर्मी भ्रम भूला संसारा ॥
धर्मदास तुम भर्महि छाड़ौ । निर्भय होय नाम चित माड़ौ ॥
जो तुम भर्म करो जो माहीं । तौ कस हंसन लोक कह जाहीं ॥
भर्म छोड़के भक्ति दढावहु । यह विधि हंसनलोक पठावहु ॥
तुम कहैं दीन्ह जक्तकी भारा । तुम्हरी मुहर चलै संसारा ॥
हाथ तुम्हार जीव सब तरहीं । भवसागर तैं हंस उबरहीं ॥
धर्मदास जग पारस देहू । जीव छुड़ाय काल सों लेहू ॥
पारस नाम कहेउ उपदेशा । मूरख सो जिन कहो संदेशा ॥
छन्द-ज्ञानी कहैं यह भेद धर्मनि देहु तुम समुझायकै ।
रहन गहन विवेक बानी कहहु सकल बुझायकै ॥
( २१२ )
अमरमूल
नाम पारस परस घट महाँ काग होय मराल हो ।
अमर लोकहिं बास कर तहाँ नाहिं काल कराल हो ॥
सोरठा-करलेहु आप समान, गुरुभृंगी यह जीव को ।
देखकर नाम निशान, रूप बरख पल्टायकै ॥
इति श्री अमरमूल ग्रंथ नाममहिमा वर्णन तृतीय विश्राम ॥
धर्मदास वचन-चौपाई
धर्मदास उठ बिनती लाई । तुम पर ताप हंस मुक्ताई ॥
किहिंविधिपलटै जिवकी काया । सो समुझाय करौ मोहे दाया ॥
हो सतगुरु तुम अन्तर्यामी । पारस भेद कहो मोहे स्वामी ॥
सतगुरु वचन-चौपाई
कहै कबीर सुन सन्त सुजाना । पारस भेद सुनाऊँ ज्ञाना ॥
ज्ञानी काहिं कहैं शब्द है सारा । यह पारस तैं हंस उबारा ॥
पारस पान बालक कहैं दीजे । तातैं हंस काल नहिं छीजे ॥
कामिनी कहैं पारस है सेवा । धर्मदास लखियो यह भेवा ॥
यही रहन तुम पंथ चलाओ । जीवन बोथ लोक पहुँचाओ ॥
तीनहु विधि यह कहै बुझाई । जो मानैं सो लोक सिधार्ई ॥
पुरुष होय शब्द नहिं जाना । निश्चय हुइहै नरक निदाना ॥
बालक हो वीरा नहिं पावै । कैसे कै वह लोक सिधावै ॥
कामिनि हो पारस नहिं लेही । गुरु सोई जो पारस देही ॥
कामिनि जो सो पारस लेही । कैसे मुक्ति होय पुनि तेही ॥
यासे गुरु जो अन्तर करई । धर्मराय के फन्दा परई ॥
गुरु नहिं शिष कहैं ज्ञान बतावा । यद गुरुमें फिर धोख समावा ॥
शिष्य जो गुरुसों अन्तर राखा । शिष्यमहैं धोखा सत हम भाखा ॥
गुरु सोई जो शिष्य समुझावै । शिष्य सोई जो गुरु मन लावै ॥
बोधसागर
( २१३ )
गुरु कहैं पेट करै अधिकार्ई । निश्चय नरक जाय रे भाई ॥
तुम सों भेद कही निहंतता । निश्चय वचन सुनो मतिमंता ॥
धर्मदास वचन
धर्मदास बिनवैं कर जोरी । स्वामी सुनिये विन्ती मोरी ॥
नारी नाम नरक की खानी । सो गुरुको किमि दीजे आनी ॥
सकल नरक नारी ढिग कहिये । सोई नरक गुरु कैसे चहिये ॥
गुरुतो ब्रह्म रूप हम जाना । नर्क भोगे सो कौने ज्ञाना ॥
गुरुकी महिमा अगम बताई । नीच वचन कैसे कहैं साई ॥
नीच सोई जो नीची कहै । नीच पंथ सों पार न लहै ॥
ऊँचा होय सो गुरु पद धारा । नीचा छोड़ ऊंच भव पारा ॥
नीचे कर्म काट गुरु दीन्हा । गुरुका वचन मान मैं लीन्हा ॥
दोहा—सो अब मोहि बतावहु, तुम गुरु अगम अपार ।
धर्मदास की बीनती, सुनियो हो करतार ॥
साखी—रहित ज्ञान तुम भाखिया, सत्य शब्द ठहराय ।
व्यभिचारी महाँ सत कहौं, कहौ गुरु समुझाय ॥
सतगुरु वचन चौपाई
कहैं कबीर सुनो धर्मदासू । अब यह भेद कहौं तुम पासू ॥
हम जानी तुम संशय छूटा । काल कठिन भव तुम कहैं लूटा ॥
काल केरि गति तुम नहि जाना । झूठी मायामें लिपटाना ॥
जब जाना निज ब्रह्म स्वरूपा । ता कहैं नाहि रं क अरु भूपा ॥
नाम अमल रस छाके अंका । ताको कहा नरककी शंका ॥
तुम कहैं जीव बुद्धि नहि छूटा । ताते जमरा फिर फिर लूटा ॥
धर्मरायकी गति नहि जानी । हर मंदिर उपजाऔ आनी ॥
यह बाजी महाँ जीव भुलाना । शिवहिसमाधिलगावहि ध्याना ॥
विष्णु रूप काहू नहि जाना । सुर मुनि नर बूढ़े अभिमाना ॥
( २१४ )
अमरमूल
यही वचनमें सब जग वंध्य। नाम बिना नहि छूटत फंध्य ॥
झूठी माया सब जग फंदा। फंद कटे बिन नहि निर्द्वन्दा ॥
अज्ञानी जिव पर है फांसा। नर्क स्वर्ग दोऊ कर आशा ॥
संशय काटनको हम आए। धर्मराय सब दुनियां खाए ॥
ज्ञान सँवाद तुम कहैसमुझाए। तुम कहै धर्मराय भर्माए ॥
वचन हमारे दोष लगाए। झूठी माया तुम लिपटाए ॥
शिष्य सोईं गुरु बचनहि माना। आप ज्ञान बूझे नहि ज्ञाना ॥
गुरु प्रतीति हृदये नहि आई। तातैं बूड़ी सब दुनियाई ॥
बूड़त जाह थाँह नहि पावा। तातैं जन्म जन्म भर्मावा ॥
तब सतगुरु भये अन्तरध्याना। धर्मदास मनमहँ पछताना ॥
धर्मदास वचन
दया करौ गुरु पूरन स्वामी। मैं नहि जाना अंतर जामी ॥
हों अज्ञान तुम मर्म न जाना। जान बूझ भूले अभिमाना ॥
क्षमि अपराध मोर प्रभुराया। मोरे चित जो अन्तर आया ॥
तुम गुरु सतगुरु ब्रह्म समाना। मैं शिव आहुँ महा अज्ञाना ॥
कुवचन वचन बोल जो भाखा। माता पिता हृदये नहि भाखा ॥
करुणामय गुरु अन्तर्यामी। करहु दया अब मोपर स्वामी ॥
जो नहि दर्शन पाऊँ आजू। तजौँ प्रान मैं तुम्हरे काजू ॥
हे साहिब तुम पथ जो दीन्हा। तातैं तुमहि बूझ हम लीन्हा ॥
साखी-धर्मदास बिनखत बदन, करुणा बहुविधि कीन्ह।
दर्शन बिन अति विकल है, जल बिन तलफत मीन ॥
सतगुरु वचन-चौपाई
तबहि कबीर दया चित आई। धर्मदास तब दर्शन पाई ॥
दर्शन पाय भयो आनंदा। जैसे चकोर मिलत है चंदा ॥
बोधसागर
( २१६ )
गहि गुरुचरण बंदगी कीन्हा । चरण धोय चरणामृत लीन्हा ॥
बिन्ती कीन्ह चरण चितलाई । महा प्रसाद दीजिये साईं ॥
आमनिको अज्ञा तब दीन्हा । नाना व्यंजन तूर्तहि कीन्हा ॥
कंचन थार आरती चारी । सेवा बहुत हृदयमें धारी ॥
सुत नारी सब चरणन लागे । प्रेम प्रतीत भक्ति मन पागे ॥
चरणामृत सबही मिल लीन्हा । दिव्य ज्ञान सब कहैं कर दीन्हा ॥
साहिब चौका बैठे जाई । बहुत भौंति कर आसन लाई ॥
परस थार जब आमनि नारी । सुन्दर बदन प्राण अतिधारी ॥
मार मार प्रसाद लै खावहिं । प्रेमभाव साहिब मन भावहिं ॥
पाय प्रसाद पुनि अचवन लीन्हा । धर्मदास तब बिन्ती कीन्हा ॥
दया करहु अब मोपर स्वामी । बन्दी छोड़ु वर अनंतर जामी ॥
तब दीन्हऊँ प्रसाद गुसाईं । धर्मदास तब हवैं मन माईं ॥
जेतक साथ रहे घर नाहीं । वह सब आनंद भये मनमाहीं ॥
आमनि तबहीं पलंग बिछावा । सतगुरु तहां आन पौढावा ॥
धर्मदास तब पंख डुलावैं । आमनि चरण चापि सुख पावैं ॥
सकल साध हिल बंदगी कीन्हा । तन मन धन साहिब कहँ दीन्हा ॥
मेटी सकल जगतकी लाजा । ताते होय जीवको काजा ॥
धर्मनि तहां निछावर करहीं । बार बार बिन्ती अनुसरहीं ॥
साखी-यह तन लेव गुसाईं, जो होवे हम काज ।
तन मन धन कर निछावर, सुख संपति कुल लाज ॥
सदगुरुवचन-चौपाई
कर धर सिज्या पर बैठाया । अन्तर गति स्थिर ठहरावा ॥
जोई मुख सौं भीतर देखा । सबहि कसौटी कीन्ह परेखा ॥
साहिब तब ही दाय़ा कीन्हा । मस्तिक हाथ आमनिके दीन्हा ॥
जाहु न अपने घरके माहीं । सत्य तुम्हार देखे मन माहीं ॥
( २१६ )
अमरसूल
यह मन कर्म अकर्म करावे । देहके स्वारथ नाच नचावे ॥
तातें तुम मन थिर हम जाना । काल चरित्र छूटा अभिमाना ॥
हमरे देह काम नहीं होई । तुम अहंकार सकुल हम खोई ॥
धर्मदास तुम वंश उजागर । हंसन पहुँचावहु सुख-सागर ॥
निश्चय हुई है मुक्ति परवाना । सत्यलोक कहि देव पयाना ॥
वंश तुम्हार जहां लग होई । इनके हाथ मुक्ति सब होई ॥
वंश ब्यालिस अचल तुम्हारा । तिनके हाथ मुक्ति संसारा ॥
ब्यालिस मांहि त्रयोदश भाखा । अंश हमारहु हैं निज शाखा ॥
नाम जानते सबै उबारा । बिना नाम बूड़ा संसारा ॥
धर्मदास वचन
धर्मदास बिन्ती अनुसारी । हे साहिब मैं तुम बलिहारी ॥
हमरे वंश कहैं पारस देई । तुम्हरे दरश बहुर कब लेई ॥
यही अर्ज मेरो सुन लीजे । वंश हमारहु आपनो कीजे ॥
जिहंते मुक्ति होय सब केरा । सो मोहे स्वामी कहौ नवेरा ॥
सद्गुरु वचन
तुम्हरे वंश को कहौ उपदेशा । जाते होय हंसको भेषा ॥
जो कोई हंस होय जगमाहीं । उबरहिं वंशनकी वाहीं ॥
वंश तुम्हार जे बालक होई । तिनसौ पारस ले सब कोई ॥
जा कहैं नाहीं ब्यापै कामा । निशदिन रहे शब्दमें धामा ॥
रहित गहिनसौ स्थिर अंगा । मनसा वाचा सत्य प्रसंग्रा ॥
सत पास को जानैं भेदा । आतम परसै सूक्ष्ममें भेदा ॥
ऐसा सज्जत शब्द सनेहा । प्रकट कबीर तासुकी देहा ॥
तिनसौ पारस भेद न कीजे । वंश मोर जो शब्द पतीजे ॥
पारस मांहि भेद जो करई । कहैं कबीर सो किहि विधि तरई ॥
बालक बोध कै पंथ चलाओ । बिना पंथ सोला नहीं पाओ ॥