कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
बोधसागर
( २१७ )
बालक तेरे वंशके हाथा । पंथ दीन्ह मैं तिनके हाथा ॥
मुक्ति जान कर राखै गोई । तेहि सम झोही और न कोई ॥
शब्द जान कर पन्थ चलावै । देश देश फिर सब समझावै ॥
तौन देश गैवनइ कराई । सुर्तन बन्त हंसन मुक्ताई ॥
पुरुष आज्ञा जो मोकहैं दीन्हा । मुक्ति भेदसों सब कहि दीन्हा ॥
सार शब्दका भेद जो पावा । यह सब ज्ञान तोहि समझावा ॥
बिना ना मिट है नहिं संशा । नाम जान सो हमरे वंशा ॥
नाम जान सो वंश करावै । नाम बिना सो मुक्ति न पावै ॥
वंश तुम्हार नाम जब पाई । भवसागरतें लोक सिधार्द ॥
नाम न जान करै अहंकारा । सो जिव परि है भवजलधारा ॥
नाम जान सो वंश हमारा । बिना नाम बूझा संसारा ॥
बिना नाम सबही अभिमानी । नाम प्रचय कोई कोई जानी ॥
नाम निहश्चर कहा बुझाई । अमरमूल महाँ देखो आई ॥
निह अक्षर को पावै भेदा । सोई हंसा होय अछेदा ॥
साखी-कहै कबीर विचारकै, निःअक्षरको भेद ।
निःअक्षर जो पावहीं, सोई हंस अछेद ॥
चौपाई
निह अक्षर तुम ज्ञान सुनाओ । जम्बू द्वीप हंस मुक्ताओ ॥
ऐसा धरम धरे जो कोई । निश्चय पार पाय है सोई ॥
तुम धर्मदास पन्थके राजा । तुम्हरे हाथ जीव को काजा ॥
यही मता हम तुम कहैं दीन्हा । दूसर कोइ न पावै चीन्हा ॥
अक्षर भेद बसै जिहि अंगा । निस बासर हम ताके संगा ॥
सत्य लोक महाँ वासा पाई । अमृत भोजन करै अघाई ॥
छन्द-यही महिमा जीव धरहै, बाम करै सतलोक हो ।
काल फन्दा काटकै लै, धरौ हँसन थोक हो ॥
( २१८ )
अमरमूल
सुन्नन सिज्या बास लीन्हो, असन अमृत पावहीं ।
वस्त्र अम्मर पहिरकै तिन, जरा मरन नसावहीं ॥
सोरठा-षोडश भान प्रवान, धर्मनि शोभा हंसकी ।
पावो शब्द प्रवान, अञ्जलोक वासा कियो ॥
इति श्रीग्रंथ अमरमूल धर्मदास कसोटी, पारस भेद वर्णन-
चतुर्थ विश्राम
धर्मदास वचन चौपाई
धर्मदास तब विन्ती कीन्हौ । अबलगसाहिबहमनहिंचीन्हा ॥
जब तैं दाय़ा भई तुम्हारी । भयो प्रकाश हृदयमें भारी ॥
अमर लोकके हौ गुरु वासी । कारण वन आये अविनाशी ॥
मृतलोक आये किहि काजा । धर्मराय बड़ पापी राजा ॥
सद्गुरु वचन
धर्मनि सुनौ वचन चितलाई । जीवन काज पुरुष पठवाई ॥
सत्यलोक तैं जगमे आवा । धर्मराय मोहे देखन धावा ॥
धर्मराय तब पूछी बाता । कवन काज तुम आयेउ ताता ॥
मृतलोक में अब मैं जाऊँ । हंसन काज पुरुष पठवाऊँ ॥
धर्मराय तब बोलन लीन्हा । हमरे देश मुक्ति तुम दीन्हा ॥
मैं तो तीन लोक कर राजा । तुम कस करो जीव करकाजा ॥
यह तो लोक पुरुष मोहे दीन्हा । तुम कस मोहे छुड़ावन लीन्हा ॥
अजहुँ भली है जाहु गुसाई । जीव जीव जन्तु मारो सब ठाई ॥
अगम अपार निरंजन देवा । तुम नहिं जानत मोरा भेवा ॥
किहि विधि हंस उतारो पारा । कौन भेद लै करो पसारा ॥
तब हम कहा सुनो धर्मराजा । जानत नाहिं मर्म तुम काजा ॥
हम बल एक शब्द का भाई । तेही के बल हंस मुक्ताई ॥
बोधसागर
( २१९ )
जहां नाम तहां तुम नहीं कोई । विना नाम है तुम्हरी छोई ॥
यह विधि होय हंस परवाना । आवा गमन तासु नहीं जाना ॥
धर्मराय वचन
जेतिक नामे मुख सुन्न करिया । सो सब नाम हमारे धरिया ॥
जो कोई धर्म करही संसारा । सो सब मोर आहि व्यवहारा ॥
बहुत भाँति मैं फंदा कीन्हा । शंकर सहित बांध मैं लीन्हा ॥
कवन नाम हंसन मुक्ताओ । सो स्वामी मोहे भेद बताओ ॥
ज्ञानी वचन
नाम हमार पुरुषके केरा । वही नाम सों हंस उबेरा ॥
धर्मराय तुम ताहि न जाना । अपने अवगुण भये विगाना ॥
यही नाम आपन घट लेते । जीवन कष्ट नाहिं तुम देते ॥
धर्मराय वचन
परम पुरुष है मोरा नाऊँ । दूसर पुरुष कहाँ निर्माऊँ ॥
मोरे आगे कवन कहावा । सब कहँ मार जार भर्मावा ॥
तीन लोक महँ जीव पसारा । उन कहँ मार करौ संहारा ॥
ब्रह्मा पुत्र हमारो भयऊ । अंतकाल ताही दुख दयऊ ॥
शिवसमाधि कीन्हा अहँकारा । प्रलय काल करौ जर छारा ॥
विष्णु बड़े सबही में अंशा । तिनकहँ मार करौ निरवंशा ॥
अपने अंश यही गति दैहौँ । सृष्टि संहार प्रलयकर लैहौँ ॥
तुम तो आए हंस उबारन । कवन भाँति करिहौ जगतारन ॥
ज्ञानी वचन
धर्मराय कहँ तब ससुझाई । तुम जीवनके दुष्ट कहाई ॥
जब तुमकीन्ह चोरको काजा । तानैं पुरुष मोहिं उपराजा ॥
नाम एक मोहे दीन्ह अमोला । वोही नाम जिव बन्दी खोला ॥
ठाकुर नाम तुम्हारा होई । तीन लोक ठकुराह समोई ॥
( २२० )
अमरमूल
पुरुष नाम तुम दीन्ह बिसारी । आपहि पुरुष रूप विस्तारी ॥
योग सन्तायन हमरौ नाऊ । तोहि कारण मोहे निर्माऊ ॥
तुम निज धर्म करौ अहंकारा । आदि ब्रह्म अहे रखवारा ॥
धर्मराय वचन
धर्मराय तब उत्तर दीन्हा । हम कहैं दया पुरुष ने कीन्हा ॥
तुमही दया करहु मोहि पाहीं । जिहिते मोर रहै जग छाहीं ॥
तुम जेठे हम लहुरे भाई । हम ऊपर तुम काहि पठाई ॥
पुरुष समानहिं तुम कहैं जाना । अपने मन तुम दूसर ठाना ॥
कहौ उपदेश सोह उपदेशा । जातें ऊजर होय न देशा ॥
पुरुष वचन हम शिरपर मानी । आज्ञा भंग करों नहिं ज्ञानी ॥
ज्ञानी वचन
योग सन्तायन बोलन दीन्हा । यह उपदेश पुरुष तोहि दीन्हा ॥
जा जिव पान प्रवाना पावै । ताके निकट काल नहिं जावै ॥
जो कोइ जीव होइ है ज्ञानी । ताकी तुम कीजौ महिमानी ॥
सार शब्द जो बालक पावै । तासो प्रेम बहुत तुम लावै ॥
यह उपदेश हमारौ लीजे । पुरुषके वचन मान शिर लीजे ॥
जो इतना नहिं करौ कबूला । तौ तुम सहहु दुःख बहु शूला ॥
पान प्रवाना शब्द न होई । जस जानो तस करिहौ सोई ॥
इतना धर्मराय जब जाना । जो तुम कहा सोई परवाना ॥
बिन्ती एक हमारी लीजे । नाम सन्देश मोहि कहि दीजे ॥
साखी-मैं उपदेश जो पावहुँ, सो सब कहहुँ तुम्हार ।
तुमहि पुरुषके अगुवा, हंस छुड़ावनहार ॥
ज्ञानी वचन-चौपाई
तब साहिब जो कहिबे लीन्हा । तुम नहि पावहु नामको चीन्हा ॥
जब तुम सत्यलोक महाँ रहिये । चौसठ युगलग सेवा करिया ॥
बोधसागर
( २२९ )
तबै पुरुष आज्ञा तेहि दीन्हा । सत्रह खण्ड राज्य तब दीन्हा ॥
तब तुम मान सरोवर जाई । कन्या देख बहुत सुख पाई ॥
पुरुष तोहि तब मार निकारा । तब हम भएऊ हंस रखवारा ॥
शब्द वार तब पुरुष सम्हारी । तुम्हरे टारे टरत न टारी ॥
मूल शब्दका का पावै भेदा । सोई हंसा होय अच्छेदा ॥
सोई भेद तुम नाहिंन पावा । कितनौ सेवा कर गुहरावा ॥
तुम कुबुद्धि औगुण बड़ कीन्हा । पुरुष आय पेल जो दीन्हा ॥
तबतै तुम्हरो भित्र पसारा । राज पसारेउ यह संसारा ॥
हम कहैं दया हंस की आई । दीन्ह पयान लोक तैं भाई ॥
बचन हमार मान सिर लीजै । शब्द खोजि अब नाहि करीजे ॥
जब तुम पाहौ शब्द ठिकाना । लोक तुम्हार न रहे निदाना ॥
सबै जीव सत लोकहि जाई । तुम्हरी नहीं रहै ठकुराई ॥
येही मन्त्र हमारो धरहू । शब्द खोज अब नाहीं करहू ॥
साखी-महा प्रलय जब होय है, देखि हो लोक हमार ।
तब हम तुम कहैं मिलिहिंगे, शब्द दोह टकसार ॥
चौपाई
सत्रह खण्ड तबहि मिटि जाई । रहै पुरुष तब शब्द समाई ॥
धर्मराय तुम पुरुष के अंशा । मिलहै शब्द मिटे सब संसा ॥
इतना वचन धर्म सौ कीन्हा । पीछे जगही प्याना कीन्हा ॥
ता पाछे संसारहि आये । पेडरमों बहु जीव छुड़ाये ॥
चार सिद्ध पर्वत पर पाये । तिनसों ज्ञान भेद समुझाये ॥
चारौ सिद्ध काल सों बाचा । दिव्य ज्ञान हृदय मंह साचा ॥
ता पीछे तुम्हरे ढिग आए । धर्मदास तुम दर्शन पाए ॥
धर्मदास वचन
धर्मदास बिन्ती अनुसारि । है सतगुरु तुम्हरी बलिहारी ॥
अगम ज्ञान तुममोहिं लखावा । हृदय कमल तुम मोर छुड़ावा ॥
( २२२ )
अमरमूल
धन्य भाग्य सतगुरु पगुधारा । अब भयोजीवन सुफल हमारा ॥
एक वचन मोहि कहौ बुझाई । जिह्तिं जीव की संशय जाई ॥
काल कठिन सो काहु न जाना । सो मोसौं कहिये परवाना ॥
जीवत काल चिन्ह जब पावै । तब तुम्हरे सतलोक सिधौवै ॥
जीवत काल चीन्ह नहि जाई । तो कैसे सत लोक सिधाई ॥
तुम तो ज्ञान बहुत उपदेशा । बिन देखे सब लगै अन्देशा ॥
दया करो अपनो जन जानी । काल चिह्न याऊ पहिचानी ॥
बिन चीन्है नहिं होय उबारा । भवसागर बांकी है धारा ॥
काल कठिन है जगकौ फंदा । किहिं विधिजीवहोयनिरद्वन्दा ॥
निरद्वन्दी मोहे करो गुसाई । तौ मैं पंथ चलाऊं जाई ॥
सद्गुरु वचन
साहिब तब कहिबे चितधारा । धर्मदास सुन काल पसारा ॥
काल अमल संशय है भाई । प्रथम काल तुम चीन्हौ आई ॥
जेतक कर्म करै संसारा । सो सब आहि काल व्यौहरा ॥
काल रुयाल जानत नहिं कोई । कर विपरीत सबन कहैं सोई ॥
दस औतार काल ने छलिया । काल अपर्बल सबकहैं दलिया ॥
मीन स्वरूप काल औतारा । कूर्म स्वरूप महा जो धारा ॥
बारह रूप औतार जो कीन्हा । नरसिंह रूप औतारजोलीन्हा ॥
वामन होके बलि कहैं छलऊ । परशुराम होय क्षत्री दलऊ ॥
राम रूप होय रावन मारा । कृष्ण रूप होयकंस पछारा ॥
बौध रूप जगन्नाथ औतारा । लीला बहुत भांति सम्हारा ॥
दस औतार कालके धरिया । म्लेच्छ मारसतयुगसोकरिया ॥
इतनी देह धरी युगमाहीं । काल अमल व्यापै तिनपाहीं ॥
काल मर्म काहू नहिं जाना । सबकहैं पकर कीन्हे पिसवाना ॥
काल पुरुष काहू नहिं चीन्हा । काल पाय सबहिन गहि लीन्हा ॥
बोधसागर
( २२३ )
काल पायकर जागहि योगी । कालकष्ट सुन फिरहिं वियोगी॥
काल पायकर पाप जो करहीं । काल पाय सब पुण्यहि धरहीं॥
काल पायकर सत गुरु भयऊ । काल पाय त्रेता है गयऊ ॥
द्वापर काल पायकर आवा । कलियुग काल पाय निरमावा॥
कालहि पाय चला सब जाई । काल पाय संसार समाई ॥
काल पाय कर भक्ति करावै । काल पायकर लोकहि आवै॥
काल भेद मैं कहा विचारी । धर्मदास तुम ज्ञान सङ्घारी ॥
काल कालको मर्म न जाना । सत्य पुरुष तैं भय उत्पाना॥
अलख निरञ्जन नाम कहावा । पुरुष प्रसंग रूप बनि आवा॥
पुरुष प्रगट जब रूप बतावा । सत्य लोक जब नाम धरावा ॥
तबही पुरुष गुप्त होय गयऊ । काल रूप यह मनकर भयऊ॥
साखी-काल काल सब कोई कहैं, काल न कीन्ह विचार ।
मन थिर होवै शब्द महैं, काल रहे झकमार ॥
चौपाई
ना कहैं आवै ना कहैं जाई । शब्दहि माहीं सहज समाई ॥
जा देखहैं तैसा है सोई । गुप्त प्रगट वे रहै समोई ॥
गुप्त ये प्रगट एक कर भयेऊ । दुतिय भावकर ज्ञान नश्येऊ॥
दुतिया दुर्मत दासी होई । ज्ञान विचार कहां रहो सोई ॥
तीन कालसों जो रहै थीरा । सोई पुरुष कायाको बीरा ॥
सोई वीर शब्द निज मूला । मंत्र ध्यान सोई स्थूला ॥
वही शब्द तैं काल डराई । नातर करि हैं कोट उपराई ॥
साखी-दुनिया चेरी काल की, मूरख बूझे नाहिं ।
जाकी दुनिया मिट गई, ते आतमब्रह्म समाहिं ॥
चौपाई
जैसा है तस कहा न जाई । ज्ञान विना बूझे नहिं भाई ॥
आय ज्ञान तव परगट भयऊ । दुतिया भाव सबै मिट गयऊ॥
( २२४ )
अमरमूल
दीपक ज्ञान भयो उजियारा । कालतिमिरमिटगा अँधियारा ॥
भय आनन्द गुरु जब पाये । ऊँच नीच सब दूर बहाये ॥
ऊँच नीच सब समकर जाना । ऊँच नीच सब झूठ बखाना ॥
ऊँच नीच सब झूठहि लावै । जब आतम परमातम पावै ॥
झूठा लोग न बूझै कोई । सब संसार झूठ है सोई ॥
समता ज्ञान प्रकाश कराई । और ज्ञान सब झूठ हैं भाई ॥
झूठ सांच संसार समाना । सत्य शब्द नाही पहिचाना ॥
झूठ सांच दोई मिट गयऊ । ज्ञानप्रकाश जाहि घट भयऊ ॥
धर्मदास तुम बूझहु ज्ञाना । काल कर्म सुनहु अब काना ॥
सतगुरु दया जाहि पर होई । अमरमूल कहैं जाने सोई ॥
साखी-अमर मूल कहैं जानई, काल दगा मिट जाय ।
काल परख कर बूझ है, सब नहिं काल समाय ॥
चौपाई
काल तिहकालका भेद सुनाऊँ । धर्मदास मैं तोहि लखाऊँ ॥
निह अक्षरका भेद निज पावै । निह अक्षर माहिं जाय समावै ॥
जो नहिं जान निहअक्षर भेदा । ता महाँ काल करत है छेदा ॥
निह अक्षर विन काल न जीतै । यज्ञ दान केता कर बीतै ॥
योग यज्ञ तप काल पसारा । यज्ञ दान सब काल व्योहरा ॥
काल गती संसार है भाई । बिरला जन कोई लख पाई ॥
साखी-संशय काल शरीर महिं, विषय काल है दूर ।
ताहि लखत कोई संतजन, जार करै सब धूर ॥
चौपाई
जीव बुद्धिसों नाहिन चीन्हा । काल न चीन्हत मतिके हीना ॥
कबहुँ सुख कबहुँ दुख होई । काल जाल जानत नहिं कोई ॥
मानस कह मनमाहिं बिचारी । निरालंब होय प्रभुहिं पुकारी ॥
बोधसागर
( २२६ )
कबहुँ कहै प्रभुने सब कीन्ह। कबहुँ कहत सब मोर अधीना॥
स्वारथ रूप सदा चित लावै । परमारथ कबहुँ नहि भावै ॥
साखी-कहै कवीर धर्मदास सों, तुम सुनियो चितलाय ।
काल भेद नहि जानहीं, मूरख रहे खुलाय ॥
चौपाई
जो देखा सो काल पसारा । जो बिनसे सो काल अहारा ॥
धर्मदास तुमचित थिर करहू । मनकी डगमग तब परिहरहू ॥
भूत भविष्य वर्तमान जो कहिये । यहि बिधि तीनकाल निर्वहिये ॥
भूत सबै है कालकी काया । भविष्य होय सोइ जीव कहाया ॥
वर्तमान परमात्म जानो । यहि विधितीनकाल पहिचानो ॥
जोई भूत सोई वर्तमाना । सोई भविष्यत भर्मकर जाना ॥
भूत भविष्यत और वर्तमाना । मनथिर भए सबै पहिचाना ॥
शब्द मांहि हंसा निरबहई । मन बिच कर्म नामको गहई ॥
मनके रूप समानी माया । सब संसार व्याप्त यह छाया ॥
मन थिर कर परमात्म जाना । यह विधि तत्त्व लेहुपहिचाना ॥
काल जाल तैं तेही लूटै । काल बिचारै ताहि न लूटै ॥
यही भेद धर्मन सुन लीजै । शब्द मांहि बासा तुम कीजै ॥
काल ज्ञान संसार बखाना । काल स्वरूप नहीं पहिचाना ॥
साखी-इतना भेद सुन लीजिये, काल को ज्ञान बखान ।
काल पाय कर होत है, हम सों फिर फिर ज्ञान ॥
धर्मदास वचन चौपाई
धर्मदास तब पांयन परई । सतगुरु सों बिन्ती अनुसरई ॥
जो तुम कही सोई परवाना । काल पाय कर फिर २ ज्ञाना ॥
तुम प्रसाद मुक्ति फल पावा । यह भवसागर बहुर न आवा ॥
हम सों ज्ञान कहा फिर होही । सोई बात कहो निज मोही ॥
( २२६ )
अमरमूल
सद्गुरु वचन
तब साहिब अस कहिबे लीन्हा । तुम नहिं पाओ ज्ञानको चीन्हा ॥
हम तौ सत्यलोकके वासी । तहैं नहिं काल बसै अविनाशी ॥
मैं जो कहा मृतलोकव्यवहारा । काल पाय सब होत औतारा ॥
काल पाय बिनसै संसारा । काले सब बिनास जग डारा ॥
काल कर्म काहू नहिं जाना । जीव जन्तु सब काल समाना ॥
कालहि पाय सृष्टि निर्माई । काल पाय फिर माहिं समाई ॥
साखी-काल पाय जग ऊपजो, काल पाय वर्त्ताय ।
काल पाय सब विनसही, काल काल कहैं खाय ॥
धर्मदास वचन-चौपाई
यह सुन धर्मदास हर्षाने । सद्गुरु रूप हिये पहिचाने ॥
तुम साहिब मोहे कीन्ह निहाला । आपन जान कीन्ह प्रतिपाला ॥
बिन्ती एक करत संकाई । हे सतगुरु मोहे भाख सुनाई ॥
कालहिकी गति कहि समुझावा । अचरज बात मोर मन आवा ॥
प्रथम पुरुषकी प्रथमहि काला । मोहि बतावहु भेद रसाला ॥
सद्गुरु वचन
तब सतगुरु कहिबे अनुसारा । धर्मदास सुन शब्द हमारा ॥
प्रथम हते जब शून्य स्वभाऊ । धर्मदास सुन शब्द निर्माऊ ॥
शब्दते पुरुष शब्द निर्मावा । यही भेद बिरले जन पावा ॥
जाकौ कहिये शून्य स्वभाऊ । काल शून्य एकै समुझाऊ ॥
काल भेद कोई नहिं जाना । धर्मदास तुम सुनियो ज्ञाना ॥
शून्यहि माहि शब्द उच्चार। धर्मरायको भयो पसारा ॥
प्रथमहि जिन्द रूप इकभयऊ । सत्तर युग सोवत चल गयऊ ॥
तब साहिब मोहे आज्ञा दीन्हा । जिन्द जीवकहैं तुम नहिं चीन्हा ॥
जिन्द जीव कहैं आन बुलाई । सत्तर युग उन सोय सिराई ॥
बोधसागर
( २२७ )
तब हम जाय शब्द अस बोला । सोवत जिन्द नाहिं चित डोला ॥
का सोवत तोहि पुरुष बुलाई । नाहिं जागहि तिहि नींद सुहाई ॥
तब हम तेहि जगावन लागे । जिन्द जाग परम अनुरागे ॥
जगे न नीन्द भर्म बहु आवा । तब हम एक शब्द उपजावा ॥
काल शब्द कहैं टेर पुकारा । सुनकर जिन्द भयो संचारा ॥
काल शब्द सुनजिन्द डराना । तबही आया चरण लिपटाना ॥
काल नाम सुन ऐसा भाई । काल नाम सुन भक्ति कराई ॥
धर्मदास सुन कालको भेदा । काल बिना नाहिं करै निषेदा ॥
काल नयन भर देख न कोई । कालहि पढ़ पढ़ गये बिगोई ॥
वेद शास्त्र सुन पंडित कहाई । काल पुरुष सब जीव भर्माई ॥
साधू मिलकर भक्ति कमाई । जातैं काल फांस नाहिं आई ॥
काल शब्द ना होतौ भाई । ता काहे को भक्ति कराई ॥
कालके डर तपसी तप साधा । इन्द्री पांच काल डर बांधा ॥
कालहिके डर योग जो करई । कालहि डरतैं दान जो भरई ॥
कालहि डर भावै सत जाना । कालहि डर छोड़ै अभिमाना ॥
सत्यहि वचन काल डरकहहीं । कालहि डरसे झूठ परिहरहीं ॥
ऐसा डर है कालहि केरा । धर्मदास तुम करहु न बेरा ॥
सारखी-ऐसा डर है कालका, सुनहु हो धर्मदास ।
एक नाम कहैं जानकै, निडर रहो सुखवास ॥
चौपाई
कालहि डर दुनियां सब बूड़ी । काहु न देखी कालकी मूड़ी ॥
तुम धर्मदास निडर हो रहहु । नाहिन काल झूठ परिहरहु ॥
छन्द-यह भांति पंथ चलाव जगमें हंस लोक पठाइबौ ।
ज्ञान गम्य लखायकै फिर शब्दसार लखाइबौ ॥
हृदय जेहि पर होय गुरुकी रहत गहन समावही ।
काल कष्ट निवारकै सोई पुरुषलोक सिधावही ॥
( २२८ )
अमरमूल
सोरठा-आप सरीखा जान, ता कई शब्द लखाइयो ।
धर्मदास लेव मान, यही सिखावन पुरुषको ॥
इति श्रीग्रन्थ अमरमूल धर्मराय बाद कालको वर्णन ।
पंचम विश्राम
धर्मदास वचन-चौपाई
धर्मदास आनंद समाना । विगसेउ कमल उदेजनुभाना॥
बहुत भांतिसों विन्ती कीन्हा । मन वच कर्म चरणचित दीन्हा॥
पदरज लीन्हौ तृषा मिटाई । छूछी सीप स्वाती जिमि पाई॥
रंकहि निधी मिलगई जैसे । अहिमणि मिलै मगन भय ऐसे॥
चरणामृत वह विधिसों लीन्हा । गुरु चरणनको मैं आधीना ॥
अब प्रतीति मोर मन आई । निश्चय वचन मान तुव साँई ॥
अबही जाय लोक मैं देखा । ज्ञान गम्यसों पायउ लेखा ॥
भक्ति मुक्ति दोनों हम जाना । दया तुम्हार परी पहिचाना ॥
जेपर दया तुम्हारी होई । ऐसे पदको पहुँचे सोई ॥
हम जानकै मान उपदेशा । विन सतगुरु नहिं मिटत अँदेशा॥
तुम सतगुरु और सब शिष्या । यही ज्ञान परगट हम देख्या ॥
सतगुरु आप और सब वंशा । सत्य पुरुषको तुम निज अंशा ॥
तुम्हरे बचन लोक पहिचाना । तुम्हरी दया परी अब जाना ॥
यह मन बूझ शब्द है लोका । ज्ञान भयो मिट गये सब शोका॥
लोक अलोक एक कर जाना । तुम्हरे बचन सत्य हम जाना ॥
अब मोरे जिव परचय आई । बिन जाने जाने बूझी दुनियाई॥
नहि बूझौ नाहीं उतराना । यहि पाया हम केवल ज्ञाना ॥
एक बचन मैं बूझा साँई । विन्ती करौं चरण चित लाई ॥
बोधसागर
( २२९ )
तुम सतगुरु मोहिदिय उपदेशा । मैं हंसनसों कहौ सँदेशा ॥
यह तौ बात कही नहि जाई । जब पावे तब ज्ञान समाई ॥
जब तुम दया करी हियमाही । तबहीं पाऊ नामकी छाहीं ॥
कहिये बचन मोर मन भावै । जातैं हंसा लोक सिधायै ॥
सद्गुरु वचन-चौपाई
तब साहिब अस कहिबे लीन्हा । सब कहैं देह शब्दका चीन्हा ॥
जो नहि पाव शब्द सहदानी । तो कस करहु लोकपहचानी ॥
सब कहैं ज्ञान गम्य कर देहु । शब्द लखाय आपनकर लेहु ॥
प्रथमहि देहु पान परवाना । ता पीछे फिर ज्ञान लखाना ॥
समय जान सब कहौ बिचारी । यही भांति सब जिव निर्वारी ॥
साधुनकी सेवा चित लावै । सो जिव भवसागर नहि आवै ॥
गुरुकी दया मान सिरलीन्हा । भाव सहित पूजातिन कीन्हा ॥
इतनौ भेद एक नहि जानी । सो कैसे पुन शिष्य बखानी ॥
ज्ञानवन्त कहैं यह उपदेशा । मूरखसों जिन करहु संदेशा ॥
सार शब्द जाके घट होई । तिहि हंसा सम और न कोई ॥
धर्मदास तुम कहैं नहि भारा । सबके तारन है करतारा ॥
यह उपदेश कहहु बहु भांती । माने सोई हंस की जाती ॥
जो नहि मानै कहा तुम्हारा । सो चल जैहै यम के द्वारा ॥
यमके हाथ परै सो आई । बहता जाय थाह नहि पाई ॥
साखी-कहै कबीर धर्मदाससों, दीजो पान प्रवान ।
यही हंस जो पावहीं, पहुँचे पद निर्वान ॥
धर्मदास वचन-चौपाई
हे स्वामी तुम्हरी बलिहारी । अब चौकाको कहौ बिचारी ॥
कवन शब्दसो आरति साजी । कवन शब्द सतगुरुकी पाँजी ॥
( २३० )
अमरमूल
कवन शब्दसों नरियर मोरा । कवन शब्दसों तिनका तोरा ॥
कवन शब्दसों चौका करई । कवन शब्दसों दीपक बरई ॥
कवनै शब्द पान लिख दीन्हा । कवन शब्द प्रसाद जो लीन्हा ॥
कवन शब्द मिष्टान्न चढ़ावा । कवन शब्दसों छत्र तनावा ॥
कवन शब्द पनवारौ साजा । धोती कवनै शब्द विराजा ॥
कवन शब्दसों चंदन दीजे । कवन शब्दसों पुहुप चढ़ीजे ॥
दल प्रसाद किहिं शब्द बनाई । यही भेद गुरु कहु ससुझाई ॥
सद्गुरु वचन
यहे भेद अब तोहिं बताऊँ । चौका साज सकलसमझाऊँ ॥
प्रथमहि तौ चौका अनुसारा । सोई शब्द मैं कहौं पसारा ॥
सेत सिंहसन चौका चारी । कंचन थार आरती वारी ॥
तहाँ धनी जीव बैठे आई । लिखनी लिख बहुभाँति बनाई ॥
धर्मदास उठ बिन्ती कीन्हा । चन्द्र सूर्य दोइ साखी दीन्हा ॥
शब्द माहिं बहु भाँति समावा । कदली पत्र जो आन धरावा ॥
अमर शब्द उच्चार कराया । अमर प्रवान अमरभइ काया ॥
अमर प्रवान अमर कर जाना । अमर शब्द बिरले पहिचाना ॥
अमर शब्दका पावै भेदा । कहैं कबीर प्रवान अच्छेदा ॥
एक बीज धरती कहैं दीन्हा । पान सुपारी नरियर कीन्हा ॥
सो प्रसाद संतन कहैं आई । सत्त सुकृत के लोक सिधाई ॥
तीन लोक सों भिन्न पसारा । बाहर भीतर शब्द पसारा ॥
दूजी दुर्मत चित सों मेटो । एकहि चीन्ह कबीरहि भेटो ॥
यहि शब्द मिष्टान्न चढ़ावा । कदली पत्र जो आन धरावा ॥
सवा शेर मिष्टान्न मँगावहु । सत्य पुरुष कहैं आनचढ़ावहु ॥
सत्य सुकृत कहैं आन चढ़ाई । दीन भाव कर बिन्ती लाई ॥
बोधसागर
( २३१ )
धर्मदास वचन
अर्ज एक अब सुनो हमारी । तुम गुरु लीन्हा जीव उबारी॥
शोध देख हम सकल शरीरू । पीरा मेटौ बाप कबीरू ॥
केते लाख चूक जो परई । किहि कारण नरिअर अनुसरई॥
सद्गुरु वचन
धर्मदास तुम सुनो ये बाणी । ताकर भेद कहौं परवानी ॥
सवा लाख चूक जो परई । तिहि कारण नरिअर अनुसरई॥
बहुत भांति सों तत्व लगावै । मृत्युलोकमें बहुरि न आवै ॥
सुमिरन नरिअर तिलकको
मृत्यु लोक यम को स्थाना । खैंच कबीर ने मारा बाना ॥
बान मार जत यश लीन्हा । तिलक काढ़ धर्मन कहै दीन्हा॥
साखी-पाक नारिअर मोरके, हंस उतारो पार ।
कंचन कपूर मिलगए, साहिब जीवको करौ उधार॥
खिरचा अचवन लेके, यकटक सुमरौ ध्यान ।
कहै कबीर धर्मदाससों, सोहे शब्द प्रधान ॥
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चौपाई
तबही दीपक आन प्रकाशा । मनो सत्य लोक कियो बासा॥
अन्न शब्द का पावै भेदा । कहे कबीर तब जोत अछेदा॥
तबहि पानका लिखनी नीका । अन्न शब्दका पावे टीका ॥
सत्यका अंक तहाँ लिख दीन्हा । मंत्र उचार एक तब कीन्हा ॥
सुख सागर मोरौ स्थाना । तहँवा सेत चढ़ाये पाना ॥
सेत पानका अम्बर काया । सीपमाँहिं जिम स्वाति समाया॥
भर्मत पवन बिहरत संसारा । निर्मल पवन हंस रखवारा ॥
तबहि तिनका बेग तुरावा । जन्म जन्मके पाप बहावा ॥
( २३२ )
अमरमूल
सुम्रन तिनका तुरावेका
असन वसन मन कल्पना, देखो सर्वहि भूत ।
कहे कबीर सतगुरु मिले, मिथ्याके मुख थूक ॥
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चौपाई
तबै प्रवाना दीजौ जानी । सुक्ति होय हंसा पहिचानी ॥
दहिने छोड़ धर्म स्थाना । बांये दुर्गदानी को थाना ॥
आगे चित्र गुपित्र कौ भारा । नाम सुनायकै हंस उबारा ॥
टूटे घाट अठासी कोरी । हंसा उतरै नामकी डोरी ॥
सारखी-कितरे वृक्ष कितरै पक्षी, कहाँ विलमेऊ आय ।
कहैं कबीर जो गुरु मिले, हंस देहि पहुँचाय ॥
चौपाई
दे परवाना हंस बचावा । ज्ञान परम पद घटहि समावा ॥
घट की परिचय कोई पाया । जाते जीत चले यमराया ॥
तब स्नान का शब्द सुनावा । विना शब्द पानी नहि पावा ॥
विना शब्द जो पीवे पानी । मानहु मदिरा रुधिर समानी ॥
सुम्रन जल पीवनेका
आगम सरोवर विमल जल, हंसा पिये अघाय ।
काया कंचन मन मगन, कर्म भर्म मिटजाय ॥
सुम्रन स्नानका
सत्य सुकृत के नीर मँगावा । धनीके बालक स्नान करावा ॥
कर स्नान पुनि शीश नवावा । साहिबके चरणन चित लावा ॥
कहैं कबीर सुनौ धर्मदासा । आदि अंत इक ज्योति निवासा ॥
सारखी-आदि अंत इक ज्योति है, अमरनाम स्थीर ।
चौदह भुवन नव खण्डमें, एकहि सत्य कबीर ॥
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बाधसागर
( २२२ )
सुव्रन प्रसाद मालूम करनेका
निर्भय पदका चौका दीन्हा । शील संतोष ले मज्जन कीन्हा॥
प्रेम प्रतीत परम उजियारा । सत्य सुकृत है जेवनहारा ॥
सत्य सुकृत की फिरी दुहाई । जल भयो पाकसंतन सुखदाई॥
सब संतन मिल कियो प्रसादा । जेवै कर्तार जिववै धर्मदासा ॥
सब संतन प्रसाद जब कीन्हा । मुक्ति अभयपद कहैं तब चीन्हा॥
साखी-कहे कबीर धर्मदाससों, आरतिको परमान ।
ये विधि सेवक जो करै, पावै पद निर्वान ॥
धर्मराज वचन चौपाई
धर्मदास विनती कर जोरी । स्वामी सुनिये विनती मोरी ॥
कवन वस्तु आरति मँहै धरई । कवन शब्द लै सेवा करई ॥
सो सब मोहिं कहौ समुझाई । आरति विधि मैं करौ बनाई ॥
सद्गुरु वचन
प्रथमहि मंदिर सेत सम्हारा । सुतं निर्त भक्त चित धारा ॥
कञ्चन केर थार बनवाओ । तामे मोती आन धराओ ॥
मुक्ता तो अन बेघे होई । ऐसी विधि प्रकार है सोई ॥
झारी एक कञ्चनकी होई । ता मँहै दाल प्रसाद करसोई ॥
नरियर इकसत एक प्रवाना । सवा तीन मन लै मिष्ठाना ॥
पाटम्बर धोती तहैं चहिये । दीपमालिका बहुतक लहिये ॥
नई वेद तहैं आन धराई । कञ्चन और कपूर मगाई ॥
जरी केर तहां छत्र तनावा । पान सहस्र द्वादश बनवावा ॥
लौंग सुपारी लायची लीजै । मेवा अष्ट भांति धर दीजै ॥
ता पीछे प्रसाद सहिदानी । सुखपूजा साधन कर जानी ॥
आरति फल तबही जिव पावै । सवा सेर महाकंद मँगावै ॥
सोना केर कलस धरवाई । तहां प्रवाना लिखे बनाई ॥
( २३४ )
अमरमूल
परमाना बालक कहैं दीजै । हंस रूप ता कहैं कर लीजै ॥
ऐसी आरती धरे धर्मदासू । सोई पावै लोक निवासू ॥
मनमें बहु आनन्द बड़ाई । आरत फल सोई पुन पाई ॥
अपने स्वार्थ आरती करई । भवसागर तैं कैसे तरई ॥
धर्मदास वचन
धर्मदास बिनती अनुसार । तुम सतगुरु मोरे करतारा ॥
ऐसी विधि आरति नहिं करई । सो जिव किम भवसागर तरई ॥
कलि में जीव दरिद्री होई । द्रव्य विना किमि भक्तिसँजोई ॥
जिहि विधि होय हंस मुक्ताऊ । सो मोहे स्वामी भेद बताऊ ॥
सदगुरु वचन
तब साहिब अस कहिबे लीन्हा । यही मती हम तुम कहैं दीन्हा ॥
एतिक विधि जापै नहिं होई । सहज भाव आरति करै सोई ॥
सवा सेर मिश्रान्न मँगावै । नरियर इक तहैं आन चढ़ावै ॥
सवा सौ पान कहैं परवाना । लौंग लायची एही बँधाना ॥
धोती एक आन तहैं धरई । सतगुरु केर निछावर करई ॥
साधन सों वह प्रेम बढ़ावै । सत्य रूप होय ज्ञान सुनावै ॥
ज्ञान गम्य कर शब्द बुझावै । सन्तन सों बहु प्रेम बढ़ावै ॥
पांचों पद ताही महाँ लावै । साधन की सेवा मन लावै ॥
ऐसी बिधि सों आरति करै । सो प्राणी भवसागर तरे ॥
धर्मदास वचन
जो इतना नहिं करै कडिहारा । ताको मोसो कहौ विचारा ॥
हे साहिब मोहे कहौ पुकारी । बन्दी छोड़ जाउँ बलिहारी ॥
सदगुरु वचन
जो इतना नाहीं बन आवै । सो कडिहार पार किमि पावै ॥
बारह आरति जो नहिं करै । दो आरति सेवाचित धरै ॥
बोधसागर
( २३५ )
फागुन और भादों परवाना । दो आरति नहीं छोड़ सुजाना ॥
साधन को परवाना देई । वर्ष रोज के कर्म नसाई ॥
साखी-पान प्रवाना पावही, सतगुरु महिमा दान ।
तबही हंसा सत्य है, और झूठ सब ज्ञान ॥
चौपाई
धर्मदास में तुमहिं सुनाऊं । आरति भेद ज्ञान समझाऊ ॥
अक्षर सार आरती सोई । बिन अक्षर सब गए बिगोई ॥
अक्षर भेद जान परसंगा । ताके काल रहै नहीं संगा ॥
आरति बहुत भांति सो करई । अक्षर भेद हिये नहीं धरई ॥
साखी-अक्षर भेद जाने नहीं, बातें कहै बनाय ।
ताको कहौ न मानिये, आपन जीव नशाय ॥
चौपाई
आरति भक्ति औ अक्षर सारा । और सकल सब झूठ पसारा ॥
जा कहैं अक्षर परिचय होई । आरति फल पावत है सोई ॥
मूल शब्द घट मांहि विराजै । शून्य शिखर अक्षर धुन साजै ॥
ताकी महिमा तुलै न कोई । ऐसा साधू विरला होई ॥
सो कडिहार जो अक्षर जाना । और गुरु सब झूठ बखाना ॥
गुरु सोई जो अक्षर जाना । बिन अक्षर मूरखसम जाना ॥
कडिहार वही जीवन कहैं तारै । अक्षर बिन जिव नरकहि डारै ॥
जो गुरु दगा शिष्य कहैं देता । नरक परै गुरु शिष्य समेता ॥
अक्षर बिन गुरु आरति करई । धर्मराय के फन्दा परई ॥
इतना भेद न जानत प्रानी । पेटके कारण ज्ञान बखानी ॥
जैसे ठनिया करै ठगिहारी । जैसे जानहु सो कडिहारी ॥
अक्षर की परिचय नहीं पावे । आपहि आप जो गुरु कहावे ॥
( २३६ )
अमरमूल
छन्द-कडिहार सोई सांच है, जिन शब्द सों परिचय करी ।
सूरत नित ससेट कै सोई, नाम निह अक्षर धरी ॥
रहन शूरे ज्ञान पूरे, पंथ परमारथ लहौ ।
दुष्ट मित्र समान यकचित, दुतिया भाव न चित गहौ ॥
सोरठा-सद्गुरु सिन्धु कबीर, उन पटतर अब को लहै ।
सुनियो धर्मनि धीर, सरिता सब कडिहार हैं ॥
इति श्रीग्रंथ अमरमूल चौका बंधन वर्णन
षष्ठ विश्राम
धर्मदास वचन-चौपाई
यह सुन धर्मदास हर्षाना । जिमिपंकज विकसे लखि भाना ॥
हे सद्गुरु मोपर दया कीन्हा । जन्म स्वार्थ अब मैंने चीन्हा ॥
धर्मदास कहै कर जोरी । स्वामी सुनिये बिन्ती मोरी ॥
यक संशय मोरे घट मांही । कौनउ विधि सों छूटत नाहीं ॥
मृतलोक में पाखंड धर्मा । कैसे जीव होय निह भर्मा ॥
तुम सतगुरु निजज्ञान सुनाया । शिष्य पाखण्ड तजे नहिं माया ॥
सो मोहे सतगुरु भेद बताओ । तासो जीव होय मुक्ताओ ॥
सद्गुरु वचन
धर्मदास तुम सुनो विचारी । पाखण्डी गति सब निवारी ॥
सत्य शब्द घट माहिं समावै । ता लग सब पाखंड कहावै ॥
तुम जानतहौ शब्द प्रवाना । विना ज्ञान नहिं शब्द समाना ॥
पाखण्ड जिव मुक्ति न होई । कितो उपाय करे पुनि सोई ॥
पाखण्ड जाके हृदये होई । सोई हंसा कर मुक्ति कर बिगोई ॥
जप तप ज्ञान बहुत कर जाना । नेम धर्म बहुतक लिपटाना ॥
इतना कष्ट कीन्ह अधिकाई । तौ पाखण्ड भेट नहिं जाई ॥