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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

द्वापरमें कबीरसाहबका पृथ्वीपर आना

ज्ञानसागर

( ६१ )

चोपाई

तब हम गये आप सुख सागर । अभय पक्ष जहाँ नाम उजागर ॥
विन्ती दंडवत कीन्ह अनेका । पुहुप द्वीप द्वीपन को थेगा ॥
कीडा विनोद होत बहु भावा । द्वापर युग धर्म न नियराया ॥

द्वापरमें कबीर साहिबका प्राकट्य

आज्ञा पुरुष दीन्ह मोहिं सारा । ताते बहुरि नाम उर धारा ॥
करूणा मय मम नाम प्रकासा । बहु जीवन कहैं छुड़ायो फांसा ॥
आयो जहाँ चन्दबिज बड़राऊ । गढ़ गिरनार नगर तेहि ठाऊ ॥
ताकी नारि रहे ब्रतधारी । पूजै साधु कुल लाज विसारी ॥
तिन पुनि सुधि सो हमारी पाई । लैगयी बहु विधि तुरत लिवाई ॥
आई चेरि विन्ती कीन्हा । तुव दर्शन रानी चित दीन्हा ॥
मैं नहिं राजा रावकर जाऊं । उठ रानी आपहि चलि आऊ ॥
नमस्कार कै कहि अस बानी । मोरे गृह पगु धारौं ज्ञानी ॥
ताकी प्रीति नीक मैं जाना । राजा गृह तब कीन्ह पयाना ॥
रानी कह उपदेश जो दीन्हा । राजा कर कछु शंक न कीन्हा ॥

साखी-एक दिवस जो रानी, बूझा मता अपार ॥
कहा मता तुम ज्ञानी, सो कछु कहो विचार ॥

रानी इन्दुमतीका कबीर साहबसे ज्ञान चर्चा करना-चोपाई

तासो कह्यो सुनौं हो रानी । अथरहिं रहौं नाम मम ज्ञानी ॥
जो कोइ माने कहा हमारा । ताको पठऊं जम सों न्यारा ॥
कहे रानी मोहि कीजे दाय। जातैं नहिं हते यमराया ॥
बहुत भांति तत्त्व जो चीन्हा । बहु विधि विन्ती मुक्ति अधीना ॥

कृष्ण-विष्णु-म्यवहार

सोवत कृष्ण स्वप्न इक देखा । बहु वैकुंठ सेत जनु रेखा ॥
उग्यो बादल सेतहिं फूला । सपना देख कृष्ण मन भूला ॥

( ६२ )

ज्ञानसागर

अहो ब्रह्मा मैं सपना देखा । बादल उमंग पड्डप की रेखा ॥
सोवत देखा पुरमें अपना । ब्रह्मा वेद देख कहु सपना ॥
रास वर्ग गनि मोहि बताओ । जेहि ते जीवका भर्म मिटाओ ॥
तब पुनि ब्रह्मा वेद विचारा । पुनि भाष्यो ताकर उपचारा ॥
सुनो विष्णु समझाऊं तोही । यही आज्ञा भयीं सो मोही ॥

साखी—है कोई ज्ञानी जीव बड़ा, तेहि कारण प्रभु आव ॥
दूत ताहि नहि पावई, सत्त पुरुष सुन नाव ॥

चोपाई

सुनिके विष्णु अचरज मन कीन्हा । ब्रह्मा सों तब बोले लीन्हा ॥
सोइ करौ जो जीव न जाई । राखौ ताहि महि भरमाई ॥
सुनिके ब्रह्मा मतौ विचारा । तक्षक रूप दूत पगु धारा ॥
यह सब भेद जबै हम जानी । इन्दुमती सो आज्ञा ठानी ॥
काल रूप तक्षक को आही । डस है तोहि जो कष्ट जनाई ॥
विरहुलि शब्द गहो मन लाई । यमको दूत जीत नहि जाई ॥
रानी शब्द विरहुली पाई । ता कहैं तब प्रतीति मन लाई ॥
बहुविधि सुमरै शब्द अघाई । काल घरी निकटै है आई ॥
चारौ दूत पठाव यम राऊ । गढ़ गिरनार बेग चल आऊ ॥

साखी—रानी भक्ती लीन्ह मन, काल न पावै दाव ॥
साध चले घर आपने, रानी मस्तक नाव ॥

चोपाई

राजा रानी दोई शिष्य मोरा । रानी लीन्ह राव मति भोरा ॥
तब यमदूत मता अस कीन्हा । चित्रसारमें पहुँचे लीन्हा ॥
रानी चली सिज्या पर जबहीं । तक्षक ग्रास भर्म भयो तबहीं ॥
रानी कहे डस्यो मोहि सांपा । राजा कियो कठिन संतापा ॥
मंत्री गुणी सब तुरत बुलाये । राजा आज्ञा सों सब आये ॥

ज्ञानसागर

( ६३ )

रानी शब्द विरहुली भाखा । दूर दूर सबदिन को राखा ॥
रानी क्रोध बहुत तब कीन्हा । बहुत होय नृप अति आधीना ॥
अरे भाई मम प्राण प्यारी । यही बार तुम लेव सम्हारी ॥
सृष्टित रानी सब चलि आये । जाग्रत जान के सबै सिधाये ॥
तक्षक विष नहि लाग्यो नारी । अंतक दूत रहे सब हारी ॥

साखी-रानी उठि ठाढ़ी भई, राजहि हरष अपार ॥
सुमिरन हम को कियो, धन्य है गुरु हमार ॥

चोपाई

तक्षक राव तब आये जहवां । ब्रह्मा विष्णु महेश्वर तहवां ॥
विष को तेज शब्द सों जांता । सुनिके विष्णुहिं भयी तब चिंता ॥
धर्मराय का तुरत हंकारा । यम दूतन को जो सिरदारा ॥
ताका हरि अस मता सुनावा । करियो सबै तुम सेतहि भावा ॥
आने छलिकैं जो नृप नारी । निश्चय आज्ञा आहि हमारी ॥
सुनिके दूत भेष कियो रंगा । अपन कीन्ह सब सेतहि अङ्गा ॥
आये दूत नगर नियरावा । रानी ऐसा सपना पावा ॥
आये गुरु ज्ञानी जो हमारे । बोलत अमृत वचन सुधारे ॥

ज्ञानी वचन

सुन रानी तोहि भेद बताऊं । काल चरित्र सब तोहि सुनाऊं ॥
छलबे अइहैं ताहि सम्हारो । सेत रूप जिन भाव विचारो ॥
साखी-मस्तक ऊंचा कालका, चित्तमें गुणका रंग ॥
यही चिह्न तुम चीन्हियो, और सेत सब अंग ॥

चोपाई

भये प्रभात काल तब आवा । सेत रूप सब अंग बनावा ॥
आये जहां तहां नृप नारी । तिनसौं ऐसो बचन उचारी ॥
चीन्हत है कै नाही रानी । मरदन काल आइस मैं ज्ञानी ॥

( ६४ )

ज्ञानसागर

मैं तो तोकहँ दीक्षा दीन्हा । तक्षक डसै तोहि कहँ लीन्हा ॥
तब तोहि मंत्र दियो मैं सोई । कालको अजय जाहिते होई ॥
तँ पुनि तैसो तत्त्व विचारा । हर्षत भये तब धनी तुम्हारा ॥
बेगी चलो गहर जिन लाओ । प्रभु को दरस तुरत तुम पाओ ॥
इंडु मती सपना जो देखा । बैसो देखो ताकर रेखा ॥
तीनों गुण चक्षु मैं राता । और पुन देखो ऊंचा माथा ॥
और स्वेत सब देख्यो अंगा । पाइ प्रतीत स्वप्न परसंगा ॥
अरे काल तँ क्या ठग मोही । हंस रूप नहि छाजै तोही ॥
यह छल मता न लागु तुम्हारा । है समर्थ बड़ गुरु हमारा ॥

साखी- मम गुरुकी परतीत यह, धरनी धरै न पांव ॥
काग न होय मराल सम, यह छति तोहि न भाव ॥

चोपाई

सुनिके दूत कीन्ह तब रोषा । इन्दुमती को दीन्ह सो दोषा ॥
तिन पुनि सुमरे अपने स्वामी । भक्त हेतु चले अन्तर्यामी ॥
ज्ञानी आवत काल पराना । ता कहँ लै पुनि लोक सिधाना ॥
धन्य भाग तिन रानी केरा । ज्ञानी आय काल सों फेरा ॥
रानी मानसरोवर आई । अमी सरोवर ताहि दिखाई ॥
कबीरके सागर पांव परो जबही । सुरति सागरे पहुँची तबही ॥
पहुँचत तासु हंस हरषाने । सबमिलिकीन्हतासु सन्माने ॥
सतगुरु दायी कीन्ही जबही । पोडशा भानु रूप भयो तबही ॥
भयो हर्ष रानी अति शोभा । राजा लग्यो करन अति क्षोभा ॥
हे सतगुरु मे तुम बलिहारी । राजहि आनो पतहि हमारी ॥
सतगुरु कहैं सुन संत सुजाना । राजा भाव भक्ति नहि जाना ॥
आ तोहि भयो हंसको रूपा । कारण कवन चहै तू भूपा ॥

ज्ञानसागर

( ६५ )

साखी-राजा भक्ति न जानही, तातें हंस न आव ॥
विना तत्त्व नहिं हिरम्बर, हंस न होय भुक्ताव ॥

चौपाई

हे स्वामी मैं भव जब रहिया । राजा भक्ति न वरजै कहिया ॥
है संसार का ऐसा भाऊ । पुरुष पराय ध्यान नहिं आऊ ॥
जो कोइ राते त्रिया बिरानी । ताकी करै सवै मिलि हानी ॥
छोटे बड़े को यह व्यवहारा । धन्यनृपति जिन ज्ञान विचारा ॥
करों साथ सेवा मैं जबही । राजा मोहि न वरजै कबही ॥
जो राजा अटकावत मोहीं । कैसे भेटत तब मैं तोहीं ॥
धन्यनृपति जिन भक्ति हटावा । आनिय ताहि हंस पति रावा ॥
सुनि ज्ञानी ताही की वाता । चले तबहि तहँही बिहँसाता ॥
आये भवसागर जब ज्ञानी । यहाँ नृपति की अवध खुटानी ॥
आये लेन ताहि यमदूता । राजहि कष्ट जो देत बहुता ॥

साखी-हंस ताको नहिं पावे, घेर रहो जो राव ॥

राजा परो अगाध में, सतगुर को गुहराव ॥

चौपाई

राजा तत्त्व मता नहिं चीन्हा । ताते यम राजन दुख दीन्हा ॥
पावे यम नहिं छाड़े ताही । भक्ति योग जो ऐसो आही ॥
तब ज्ञानी आये तेहि ठाई । देखत जीव बहुत संकाई ॥
ज्ञानी लीन्ह जीव कर आगे । देखत दूत ताहि सब भागे ॥
दूत चहुँ दिशि देखत जावैं । मरकट दृष्टि पक्षि नहिं पावैं ॥
जस आकाश कहैं जाय पखेरू । मरकट दृष्टि आये सत हेरू ॥
ऐसे ताहि दूत गुहरावैं । नहिं जब देखैं तब पछतावैं ॥
जहाँ लगि गम तहैं लग हेरा । आगे देखा धुन्ध कुहेरा ॥
हंस गये जब लोक द्वारा । रूप अनूप देख उजियारा ॥
गये नृपति हंसन की पांती । ता मध्ये पुन जइस अजाती ॥

( ६६ )

ज्ञानसागर

साखी-रानी चीन्हौ नृपति को, आन धरे तब पांव ॥
नृप मन में बहु संकुंचै, लज्जा ताहि जनाव ॥

चौपाई

कह रानी सुन साधु भुवारा । चीन्ह नृपति मैं हौ तुम दारा ॥
इन्दुमती है मेरा नाऊँ । यहि कारण टेक्यो तुव पाऊँ ॥
राव कहे कि म करो प्रमाना । बर्ण तुम्हारो हंस समाना ॥
शोभा बहु देखौ तुम अंगा । कैसे तोहि कहौ अर्धगा ॥
हंस करुणामय वचन उचारा । निश्चय मानो वचन हमारा ॥
हंस रूप होवे नर नारी । जिन भवसागर भक्ति विचारी ॥
नृप को भयो हंस का भावा । जिन पुनि ऐसी शोभा पावा ॥
भुई में रहै जो अंतक दूता । तिन पुनि विस्मय कीन्ह बहुता ॥
दूत चलि गये जहैं त्रिय राऊ । तिनसों जाय कहचो सत भाऊ ॥
स्वामी श्वेत वरण यक आवा । रानी नृप लेह लोक सिधावा ॥
कैसो लोक ब्रह्मा पर जरेऊ । जरत हुताशन जनु घृत परेऊ ॥
चलो हरी हर संग हमारे । जहँवा राजा रानी सिधारे ॥
चले वेग तब तीनों भाई । बाहन साज चले तिय राई ॥

साखी-सुम्मेरते ऊँचे गये, तब देखा अँधियार ॥
नव खंड महि तब छाँड़िके, आगे को पगधार ॥

चौपाई

पहुँचे विषम सरोवर जाई । बिजुली हुओ ह्यां अन्याई ॥
ब्रह्मा शिव बाहन थकि गयऊ । सतगुन तेज विष्णु का भयऊ ॥
अलख निरंजन भयो तिहिठाऊँ । औ देवी तें आशिष पाऊँ ॥
तेहि ते विष्णु गो अँमर जहँवा । कामिनि मान सरोवर तहँवा ॥
देखत रूप विष्णु मन भूला । श्वेत पुष्प पद्म जस फूला ॥
कामिनि मान सरोवर राजै । जुत्थ जुत्थ जोड़ भल साजै ॥

कलियुग में कबीरसाहबका प्रगट होना

ज्ञानसागर

( ६७ )

न अध्यान तहाँ तिन्ह लागी । सत्त सुकृत बोले अनुरागी ॥
सब मिलि भयो अचंभो वाता । ऐसा अचरज नरको वाता ॥
कोइ कहे नर देख पखेरू । ऊँची दृष्टि सबै मिलि हेरू ॥
वेग निकारी यहाँते आजू । रहन न पावे करौ सो काजू ॥

साखी-दोई सठहार जो भेजे, नर से कहो बुझाय ॥
छांढौ मान सरोवर; यहाँ नहीं तुव ठाय ॥

चोपाई

प्रतिहारन तब आज्ञा कीन्हा । तिनसोंहरि अस बोलन लीन्हा ॥
देखा चाहों तुम पुर पाटन । हे प्रभु भेद कहो कछु आपन ॥
तब प्रतिहार कहैं समझाई । नरको रूप दरश नहिं पाई ॥
जौ लग बीरा नाम नहिं पावे । सो जीव कैसे लोक सिधावे ॥
भयो जो बड़ो निरंजन राऊ । तेऊ यहाँ रहन नहिं पाऊ ॥
जा तू विष्णु कहा सुन मोरा । नातर चक्षु हीन होय तोरा ॥
चले विष्णु तब लागि न बारा । हरि कमलासो मंत्र विचारा ॥
यह कछु बात अचंभो आही । कहत न बने रूप मोहि पाही ॥
देख सठिहारन बेग निकारा । चले जीव जहाँ राज तुम्हारा ॥
अचरज बात कही नहिं जाई । धन्य पुरुष जिन लोक बनाई ॥
जब मैं ध्यान धरा प्रभु केरा । अलख रूप देखौ बहुतेरा ॥
ऐसा रूप कहुं नहिं देखा । अचरज भयो नजाय विशेषा ॥

साखी-चले ब्रह्मा हरि शंकर, छाडि लोकके खोज ॥
बस शशि के परभावतें, सकुचन होत सरोज ॥

कलियुगमें कबीर साहिबका प्राकट्य-चोपाई

सतयुग त्रेता बीत जब गयऊ । कलियुगको प्रभाव तब भयऊ ॥
छाडयो लोक लोककी काया । प्रथमहि मान सरोवर आया ॥

जगन्नाथके मन्दिरकी स्थापना

( ६८ )

ज्ञानसागर

पाँच तत्त्व तीन गुण साना । त्रिगुण रूप कीन्ह उत्पाना ॥
रूप मनुष्य सुदेह सम्हारा । नहिं लेई अहार व्यवहारा ॥
जो कोइ ये विधि करै उछेदा । सो तो है करता को भेदा ॥
करता देह तबै निरमावा । तामहिं तत्त्व प्रकृतिहि स्वभावा ॥
आयो निरगुण काछ शरीरा । आवा गमनकी भेटन पीरा ॥

जगन्नाथके मंदिरकी स्थापना

प्रथमहि आयो सागर तीरा । जगन्नाथ जहाँ काछ शरीरा ॥
जाते परम वचन मैं हारा । बाजी मांड किया प्रति पारा ॥
आसन बेल तीर मैं लीन्हा । सो स्वरूप काहू नहिं चीन्हा ॥
आया राम विप्रके रूपा । तासों कथि कह्यो अंजगूता ॥

साहित्य कबीर वचन

साखी-वाचा वंघ मैं आइया, मंडप उठि है तोर ॥
मान त्रास सिंधू जवे, दर्शन देखौ मोर ॥

चौपाई

तो कहैं थापौ वचन प्रवाना । तीन लोक तुम करत बखाना ॥
तो परसै को कहा अधिकारा । सोई कहौ तुम बौद्ध विचारा ॥

बौद्ध वचन

मन वच क्रम परसै जो मोई । कोटि जन्म लगि विप्र सोहोई ॥
औ पुनि विद्या औ धनवंता । यहि मुनकै जो भयो हरषंता ॥

साहित्य कबीर वचन

आवा गवन निरवारन आयो । सत् शब्द ते जीव छुड़ायो ॥
जो बहु जन्म थाकौ तुहि पाहीं । कैसे जीव लोक तब जाहीं ॥
बिना नाम नहिं जीव उबारा । कहि अब भाखौं कलु उपचारा ॥
मारकंठे तर जाइ नहाई । अस हँस बोले त्रिभुवन राई ॥

ज्ञानसागर

( ६९ )

अक्षैबट कृष्णरोहिणी अस्नाना । इन्द्र दमन समुद्र अस्थाना ॥
यहि विधि तीर्थकरे मन जानी । पुनर्जन्म ना होवे प्रानी ॥

सार्वी-हँसे कृष्ण छल मता कहि, जिमि माहुरको मीठ ॥

अस पुरुषोत्तम क्षेत्र फल, ज्ञानवन्त कहैं दीठ ॥

चौपाई

समाधान हरिको जब कीन्हहा । आसन उदधि तीर में लीन्हहा ॥

चौरा कीन्ह तहाँ पुन जाई । इन्द्र दमन तब आज्ञा पाई ॥

जबहीं मंडप काम लगावा । सागर उमँग खसावन आवा ॥

उठावहु मंडप करि निःशंका । उदधि त्रासकी मेटव शंका ॥

आयो क्रोध लहर जब पानी । मेटचो पुरुषोत्तम सहिदानी ॥

लहर उमंगी सागर तीरा । आय जहां तहैं सत्त कबीरा ॥

देखत दरस महा भय मानी । बोल्यो वचन जोर युग पानी ॥

हे स्वामी तुव मर्म न जाना । जगन्नाथ वर किया पयाना ॥

क्षमौ अपराध मोर प्रभुराया । लेउ बैर अस कीजै दाया ॥

तासों पुनि अस वचन उचारा । बोर द्वारिका बैर तुम्हारा ॥

सार्वी-राम रूप सागर बँध्यो, तातैं उदधि उमंग ॥

बोरौ नगर द्वारका, भयो रुचिर परसंग ॥

चौपाई

तब तैं उजर द्वारका भयऊ । पंडनको तब स्वप्ना दयऊ ॥

आये मोपर साहिब कबीरा । आवा गमनकी मेटन पीरा ॥

ऐसा स्वप्न पंडन दीन्हहा । तीर्थ स्नान तेहि सब कीन्हहा ॥

उठचो जो मंडप बाज बधावा । कनक उरे नहिं हाथ बनावा ॥

एक दिना कौतुक अस भयऊ । सागर तीर पंडा चलि गयऊ ॥

करि असनानचलो मंडप पासा । मनमें ऐसा वचन प्रकासा ॥

प्रथमहिं चौरा म्लेछ को गयऊ । ठाकुरके नहिं दर्शन कियऊ ॥

( ७० )

ज्ञानसागर

तेहिके मन पाखंड जब देखा । किय कौतुक सो कहौं विशेषा॥
जहँ लग मंडप पूजहि बीरा । तहँ लग देखहि रूप कबीरा ॥
गयो जहां कठ मूरत आहीं । कबीरको रूप भयो तेहि पाहीं॥
अच्छत पुहुप लैविप्रमन भूला । नहिं ठाकुर जो पूजहु फूला ॥

साखी-तब पंडा सिर नायो, प्रभु चरित्र अवगाह ॥
कोध छोड़िये स्वामी, कृपा करो मोहि पांह ॥

चौपाई

अपने मन आन्यो प्रभु हीना । तातैं प्रभु तुम कौतुक कीन्हा ॥
तासौं वचन मैं बोलये लीन्हा । सो पंडा पुनि कही जो कीन्हा॥
सुनहु विप्र तुम्हे आयसु होई । दुबिधा भाव करौ मत कोई ॥
ब्राह्मण छाड़हु जात अजाती । ताते मेटब सबकी फांसी ॥
भोजन माहि भर्म जो करहीं । ताकी अज्ञ हीन अनुसरहीं ॥
तब पडा विन्ता अस ठाना । हे स्वामी मैं तोहि न जाना ॥
करौं सोई जो आज्ञा दीजे । कछु जांचोंसोप्रदानमुहिकीजे॥
जो मन इच्छा होय तुम्हारी । देउ सोइ अस वचन उचारी ॥

साखी-सागर नीर बड़ खारा, सो तो असो न जाय ॥
निर्मल जल मैं मांगौं, सो दीजै प्रभुराय ॥

जहँ चौरा है सागर तीरा । खनहु कूप होय निर्मल नीरा ॥
तहां खनायो आय तब कीन्हा । जल मँगाय पंडन कहैं दीन्हा ॥
कूप बनायो सागर तीरा । तहां भयो पुनि निर्मल नीरा ॥
यह तो भेद जाने सोई संता । कबीर सागर बूझे मतवंता ॥
हरी भेद मैं सागर आयो । तेही सकल चरित्र सुनायो ॥
भुंगी को कीन्ही मैं दाय। ताको एक जो भेद बताया ॥
ताकी दियो मता कडहारी । जीव भेद सों लेत उबारी ॥

चन्दवारमें कबीरसाहबका जाना

ज्ञानसागर

( ७१ )

पठवै जीव नाम दे जहँवा । सुक्ति पदारथ फल है तहँवा ॥
चार भातु कामिन उजियारी । मान सरोवर है वह नारी ॥

धर्मदान वचन

धर्मदास कहै अस बानी । स्वामी कहू संत उत्पानी ॥
हंस रूप जो षोडश भाना । कामिनि चार भातु परवाना ॥

साखी-कारण कौन है कामिनि, चार भातु कह्यु थोर ॥

शब्द गहे सब हँसा, संशय भई जब मोर ॥

माहिर कबीर वचन-चोपाई

सुन धर्मनि मैं तोहि बताऊँ । यह सब भेद मैं तोहि बुझाऊँ ॥
चौरासी लक्ष जोइन ठाना । सुक्ति छेत्र नरको उत्पाना ॥
तातैं प्रभु प्रगटे नर भाऊ । ताते शोभा हंस बहु पाऊ ॥
आय अदेह पुरुष रह जहँवा । नर को रूप प्रगट भये तहँवा ॥
जेहि सुक्ति चंदा निर्माई । हंस प्यार सुक्ति अधिकाई ॥
भुंगी कीट शिष्य जो होई । पावै भेद मग्न होय मोई ॥
सिंधु मध्य राह तिन केरा । आवै जीव ताहि सों फेरा ॥
वहै राह भुंग राज कहैं दीन्हा । यही भेद विरले जन चीन्हा ॥
पाहै भेद सन्त जन सोई । आन्यो सतगुरु जेहि गम होई ॥
निज बीरा जो चौरा पावै । इकोतर सौ जीव लोक सिधवै ॥

साखी-यही चरित्र करि आयो, चौरा के व्यवहार ॥

निज बीरा जो पावै, तव जीव होय उवार ॥

चन्दवारैमें प्राकटचकी कथा

चोपाई

आसन कर आयो चंदवारा । चंदन शाह तहाँ पगु धारा ॥
बल रूप धर आयो तहँवा । आठै पहर रहचो मैं जहँवा ॥

नूरीको मिलनेकी कथा

( ७२ )

ज्ञानसागर

ताकी नारि गई अस्नाना । रूप देखि ताकर मन माना ॥
ले गये बालक सो निज गेहा । बहुत भांति तिन कीन्ह सनेहा ॥
चंदन साडु देखि रिसियाना । चल गयो नारि तोर अब ज्ञाना ॥
बेग डार बालक को आजू । सुने लोग तो होय अकाजू ॥
जाति कुटुम्ब सुने जो कोई । यह तो भली बात नहिं होई ॥
चेरी हाथ तिन दीन्ह पठाई । उद्यान मास तिन दीन्ह अडाई ॥

नूरीको मिलनेकी कथा

काशीमें प्राकट्य

कछु दिन काया धर दुख पावा । यहि अंतर इक जुलहा आवा ॥
नूरि नाम जो वा संग नारी । देखत बालक भई सुखारी ॥
बालक देख नारि मन भूला । रविके उदय कमल जस फूला ॥

सारखी-अति सनेह जिन कीन्हा, नूरी देख रिसान ॥

बालक लीन्हो नारि अब, कहा भयो अज्ञान ॥

बालक वचन-चौपाई

बालक दीन्ह मही मई डारी । अस सुनि बालक दीन्ह हुँकारी ॥
बूझो काल फांस नर नारी । पूर्व जन्म तेहि लीन्ह उबारी ॥
पाछिलि प्रीति भयी अब मोही । तातैं दरश भयो अब तोही ॥

नूरी वचन

तुम जानो अब मैं नहिं जाना । सो अब मोहि सुनाओ काना ॥

नूरीके पूर्वजन्मकी कथा

कबीर वचन

पूर्व जन्म तैं ब्राह्मण दूखी । तोरे गृह कबहु नहिं सूखी ॥
श्वपच भक्त मम प्राणन प्यारा । ताको मान पिता अवतारा ॥
श्वपच भक्ति करै पुनि जबही । मात पिता पर लगै तबही ॥

ज्ञानसागर

( ७३ )

ताकी प्रीति भक्त मन धारा । तातैं भयो विप्र अवतारा ॥
प्रथम प्रीति मोरे मन भावा । तोरे गृह मैं यहि विधि आवा ॥
तोसों कहीं इक भक्ति हटाई । राखौ मर्म हमार छिपाई ॥
देव सुवर्ण नित्य मैं तोही । एक सुहर पुनि ताकी होई ॥

साखी-बोलो नहिं यहि कारणे, ताहि सुक्ति नहिं भाव ॥

माया देख सुलानो, यहि कारण तब पाव ॥

चोपाई

घर नहिं रहो पुरुष औ नारी । मैं शिवसों अस वचन उचारी ॥
आनि देव लक्ष्मी संसारा । आपन को निज भीख अहारा ॥
आन की बार बदत हौ योगू । आपन नार करत हौ भोगू ॥
काशी मरे जन्म नहिं होई । तुव महिमा वगैँ सब कोई ॥
औ पुन तुम सब जग ठग राखा । काशी मरे अजल तुम भाखा ॥
जब शंकर होवे तुव काला । कहाँ रहे तब भक्त विचारा ॥
जीवन करत जो होय अकाजा । या शंकर तब तुम कहैं लाजा ॥
सुनि शंकर तब चलयो लजाई । यहि अन्तर जुलहिनि चलिआई ॥
हे स्वामी मम भिक्षा लीजै । सब अपराध क्षमा प्रभु कीजै ॥
एक पुत्र जो विधि मोहि दीन्हा । कबहुँ बात कहै नहिं लीन्हा ॥

शंकर वचन

तोरें गृह पंडित अधिकारी । झूठ बोल कस बोलहु नारी ॥
हरि कमला सम देखो ज्ञाना । बुद्धिवंत तुम पुत्र सुजाना ॥
साखी-सुनकर महिमा पुत्रकी, नारि धरे तब पांव ॥
हे स्वामी मम इच्छा, श्रवणन वचन सुनाव ॥

चोपाई

कहा लजान कहा फिर आवा । बिहँसि कहा तुम सिद्ध कहावा ॥
सुनिकै वहै दर्प बहु कीन्हा । भिक्षा कनक जाति को दीन्हा ॥

( ७४ )

ज्ञानसागर

भिक्षा दै प्रसुदित चलि आई । हस्तामल को खोज न पाई ॥
वाचा बन्ध तहाँ पुनि आयो । काल कष्ट मैं तोर मिटायो ॥
सुन जुलहा मन भयो आनंदा । जिमि चकोर पायो निशि चंदा ॥
ले सुत चले हर्ष मन कीन्हा । तासों पुनि अस बोलेहि लीन्हा ॥
आगिल जन्म जब होइ तुम्हारा । तुम्हैं पठायब यम तैं न्यारा ॥

साखी-सुत काशी को लै चले, लोग देखन तहाँ आव ॥
अन्न पानी भक्ष नहीं, जुलहा शोक जनाव ॥

चौपाई

तब जुलहा मन कीन्ह तिवाना । रामानन्द सौँ कहि उत्पाना ॥
मैं सुत पायो बड़ गुणवंता । कारण कौन भखै नहीं संता ॥
रामानन्द ध्यान तब धारा । जुलहा सो तब वचन उचारा ॥
पूर्व जन्म तैं ब्राह्मण जाती । हरि सेवा कीन्हेसि भलि भांती ॥
कछु तुव सेवा हरिकी चूका । तातैं भायो जुलहा को रूपा ॥
प्रीति प्रभू गहि तोरी लीन्हा । तातैं उद्यानमें सुत तोहि दीन्हा ॥

नूरी वचन

हे प्रभु जस कीन्हो तस पायो । आरत हो तुव दर्शन आयो ॥
सो कहिये उपाय गुसाई । बालक श्रुधावंत कछु खाई ॥
रामानंद अस युक्ति विचारा । तुम सुत कोई ज्ञानी अवतारा ॥
बछिया जाही बैल नहीं लागा । सो ले ठाढै करै तेहि आगा ॥
साखी-दूध चले तेहि थन तैं, दूधहि धरौ छिपाइ ॥
श्रुधावंत जब होवै, ता कहैं देउ खवाइ ॥

चौपाई

जुलहा इक बछिया ले आवा । चल्यो दूत कोउ मर्म न पावा ॥
चल्यो दूत जुलहा हरषाना । राख छिपाइ काहूँ नहीं जाना ॥
सुन भामिनि आगे चल आवा । सो ले जाइ कोई भेद न पावा ॥

बाललीला और रामानन्दको गुरु करनेका वर्णन

ज्ञानसागर

( ७५ )

दूध न पीवत नाम कबीरा । खेलेत संत संग मत धीरा ॥
तिनसौँ कहैं जागौ रे भाई । बिना नाम नहिँ काल पराई ॥
कोई न बूझौ भेद हमारा । रामानंद पर तब पगु धारा ॥
तब अपने मन कीन्ह उपाई । तिनहि दरश कैसहु नहि पाई ॥

रामानन्दको गुरु करना

जाहि रामानंद गंग स्नाना । तेहि मारग में जा पौढाना ॥
तबहि पांव गुरु लाग कबीरू । रामानंद बोल्यो मत धीरू ॥
उठ कबीर तब वचन उचारा । रामानंद है गुरु हमारा ॥

साखी-करहिगोष्ठी शिष्य सब, कोई ज्ञान जीत नहिं जाय ॥
सत ऋषि सुधि पाई, गुरु सों बोले आय ॥

बोपाई

विद्या कहे मलेच्छ को दीन्हा । रामानंद कोध तब कीन्हा ॥
चले शिष्य तब आज्ञा पाई । कबीर संतको आन बुलाई ॥
सुनतहिं शिष्य चहुँ दिशि धाये । हेर खोज कबीरै लाये ॥
आये कबीर लागि नहि बारा । गुरु मंडलमें आन पगु धारा ॥
अन्तर कपाट शिष्य तब लाया । पूजत रामानंद हरि राया ॥
सुन कबीर आगे चलि आये । गुरुहि आनकर मस्तक नाये ॥
लक्ष्मीनारायण मुकुट सिरनाये । पहिरै वस्त्र माल नहीं समाये ॥
तबहि कबीर वचन अस भाखा । वस्त्र पहिरि माला तुम राखा ॥
अंतर कपाट खोल तब दीन्हा । रामानंद सुन अचरज कीन्हा ॥
दिव्यज्ञान तुम कहैं केहि दीन्हा । जोर कर गुरुहि विनोदित कीन्हा ॥
कब हम तुम को दिशा दीन्हा । नाम हमारा काहे तुम लीन्हा ॥
गुरु हमैं तुम दिशा दीन्हा । झूठ बोलका क्या फल चीन्हा ॥

नं. १ कबीर सागर -

( ७६ )

ज्ञानसागर

साखी-गुरु जब चलैं नहाने, तब हम दिक्षा पाव ॥
तातैं गुरु कहि थाप्यो, फिर पीछे पछताव

चौपाई

पूज्यो पाहन पंडित धर्मा । पहिल न जानो तुम्हरो मर्मा ॥
मैं तो चाहत मुक्ति पदार्थ । तुम पाहिन जापूजे निश्चारथ ॥
तब गुरु सुनकै अचरज भयऊ । योग समाधि वैकुंठहि गयऊ ॥
सत्त समाधि विष्णु जब देखा । तापर देश कबीरहि लेखा ॥
जहैं देखा तहां सत्त कबीरा । झूठ ध्यान भूले मत धीरा ॥
हे कबीर तुम मर्म न जाना । जान मलेछ किया अपमाना ॥
जो कछु आहि मुक्ति सन्देशा । सो सब मोहि कहौ उपदेशा ॥

साहिब कबीर वचन

छोड़ी सबै मान अभिमाना । तो कह देव मुक्ति फल दाना ॥
शिष्य सरवा सौ बात जनाऊ । काल तोर शरणगत आऊ ॥
कहैं कबीर काल है काला । है बड़ दारुण काल कराला ॥

साखी-मुक्तिदेव नहिं लेव तुम, रामानंद गुरु देव ॥
भोरहि जन्म गवांय हो, करि पाहन की सेव ॥

सिकन्दर शाहकी बारता-चौपाई

ता निशि को तब भयो प्रभाता । काशी आइ भयी एक बाता ॥
आये सिकन्दर शाह सुल्ताना । है व्याधा बहु भेद न जाना ॥
रामानंद की सुनी बड़ावा । तातैं शाह आप चलि आवा ॥
आये मंडप जहां सुल्ताना । रामानंद तब देख रिसाना ॥
आये शाह सन्मुख भये जबही । रामानंद मुख फेरा तबही ॥
वार अनेक तिहितें सुख फेरा । तांकी ओर क्रोध कर हेरा ॥
मारचो खंग परचो खसि धरनी । शाह के अङ्ग अनिल सम बरनी ॥
आये शाह जहां दुःख नसावन । अधिक भई जो देह सतावन ॥

सिकन्दरसाहूकी वार्ता और रामानन्दजीका कत्ल होना

ज्ञानसागर

( ७७ )

पय औ रुधिर चल्योगुरु अंगा । पावक उठी शाह के अंगा ॥
तवै शाह ने सुधि अस पाई । महिमा जान कबीर बुलाई ॥

सारखी-कबीर दर्शन दीन्हा जबै, तपन भई सब दूर ॥

शाह कहा तुम सांच हो, औ अल्लहका नूर ॥

सिक्कन्दरवन-चोपाई

पय औ रुधिर चल्यो गुरु अंगा । शाह कहै यह कौन प्रसंगा ॥

कबीरवन

जेहि तन मान्यो शब्द हमारा । तेहि तैं चले दूध की धारा ॥

कीन्हा कालउ केर विचारा । आधा अङ्ग रुधिर अनुसारा ॥

अगले जन्म मुक्ति जो होई । अंकूरी जीव कहावै सोई ॥

गोको बिलाना

यहै चरित्र तहां पुनि भयऊ । तब नूरी के मंदिर गयऊ ॥

काजी मुह्ता सबै रहाये । गाय आनि के गलो कटाये ॥

देखि दुखित भये सत्त कबीरू । महा व्याधि गाई की पीरू ॥

केहि कारण गाई जो मारा । सो सब मोहि कहो उपचारा ॥

काजी काया देख विचारी । एकहि ब्रह्म गाय क्यों मारी ॥

गाय ज़िवावहु मुर्गा सारू । नातर वेद अथर्वन हारू ॥

सत्त शब्द है जासु शरीरू । व्यापी महा गाय की पीरू ॥

सारखी-उठिके गाय ठाढ़ी भई, आज्ञा जबही कीन्ह ॥

काजी मुह्ता जानि कै, पाव पकर तब लीन्ह ॥

चोपाई

नगर के लोग अचंभो लागा । यह कबीर कर्ता हो जागा ॥

मगध गवन

तब तहैं से पुनि कीन पयाना । उत्तर देश मगध अस्थाना ॥

नूवा नूरी काल बस भयऊ । तिन पुनि जन्म मनुष्य हिलयऊ ॥

( ७८ )

ज्ञानसागर

राजा बीरसिंह देव बड़ राज । ताके गृह अब धारचो पाऊँ ॥
कमलावती तासु नृप नारी । तिन बड़ सेवा कीन्ह हमारी ॥
ताकौ दीन्ह पान परवाना । तिन कछु भेद हमारा जाना ॥
कह्यो तासों मुक्ति प्रभाऊ । सुनत भयो आनंदित चाऊ ॥
विजुलीखां पठान बड़ ज्ञानी । सन्त जान जिन सेवा ठानी ॥
तासों कही मुक्ति परभाऊ । ज्ञान गम्य तिन बहुत कराऊ ॥

साखी-अति आधीन जब देखा, ता कहैं दीन्हहा नाम ॥

प्रीति जानि कै ताकी, कछु दिन किय विश्राम ॥

चोपाई

विजुलीखां कहै पीर हमारे । नृप वीरसिंह शिष्य तुम्हारे ॥
साहिब आप तजो जब देहा । दोह दीन सो कीन्ह सनेहा ॥
सुनि विहंसि अस आज्ञा ठानी । दोह दीन से हम निरवानी ॥
हिन्दू तुरक नहीं हो भाई । सुन पठान संशय उपजाई ॥
जो तुम दोइसों न्यारी रीती । मेरे मन कैसे होय प्रतीती ॥
तुम तो हो अछह के बन्दा । यह तो अहै आदमी गंदा ॥
तुमहि शरीर तजौगे जबही । शरीर उपाय करों क्या तबही ॥
कै पृथिवी कै देहों जारा । करहु हुकम सो पीर हमारा ॥
जो कछु होई लोक व्यवहारा । सोई कहो मम पीर पियारा ॥
जो साहिब हुकम जस करिहौ । मजार तुम्हारा रचिके धरिहौ ॥

साखी-बिहंसि कह्यो तब तिनसैं, मजार करौ सम्हार ॥

हिन्दू तुरक नहीं हौं, ऐसा वचन हमार ॥

चोपाई

दिन कछु गये तासु संबादा । राजा बीरसिंह ने भेजे प्यादा ॥
बन्दीछोर आवैं मम गेहा । रानी विन्ती कीन्ह सनेहा ॥
ताकी प्रीति तहाँ पगुधारा । दुःखद्वन्द्व तिन सबै विसारा ॥

ज्ञानसागर

( ७१ )

तिन पुनि कही सुनौ गुरु ज्ञानी । दुतिया ब्याह लगन में ठानी ॥
ब्याह जो होय बिकट अस्थाना । क्या जाने होवे संग्रामा ॥
कोइ घायल कोइ जाई मारा । खाड़ो आही दुहु दिशि धारा ॥
ताकी आज्ञा करौ गुसाई । तिनहि देह क्या करो उपाई ॥
कै गाड़ौ कै जारौ धूरी । यह संशय मेटो प्रभु मोरी ॥
करौ सोई लोक कुल धर्मा । बिन लागै कोई जानै न मर्मा ॥
साखी-जो गाड़ौ तो माटी, जो जारौ तो छार ॥
करो लोककी जो कृति, बोलता ब्रह्म निनार ॥

चौपाई

हे स्वामी तुम मोहि बताओ । तुम तनतजोतो काहि कराओ ॥
जस प्रभु तस पुन सेवक करई । सेवा युक्ति सदा सो तरई ॥
जो तुम कितहू करहू प्याना । गाड़हि लागै तुमहिं पठाना ॥
हँसै सबै यह देखि परतच्छा । गुरु तुम्हारो आहि मलेच्छा ॥
तस कछु भेद बताओ स्वामी । करो कृपा सो अन्तर्यामी ॥
वास्तव तेहो कहाँ बुझाई । जारौ देह जो क्षार उड़ाई ॥
तातैं लोक मैं नहीं छुड़ाओ । यातैं दोह दीन फरमाओ ॥
गयो नृपति तहैं साज बराती । कौतुक रचो देह तब त्यागी ॥
सुनत साज दल चले पठाना । राना मुर्दा ले बिल खाना ॥
लेकर गाड़ै करै निमाजा । करन बिहानक दूरी काजा ॥
साखी-रानी भेजे प्यादहीं, तन जब तजो कबीर ॥
आयो बिजुली खान तब, सुनि वृत्तान्त गंभीर ॥

चौपाई

राजा पास पठाओ पाती । सुनतहि क्रोध जरी तब छाती ॥
छाड़्यो ब्याह चले दल साजी । हनें निशान सम्हर की बाजी ॥
बाजा गाजी तुरही आवहि । यह बिजुलीखां युक्ति बनावहि ॥
ऐसी भांति सो कीन्ह प्याना । रन के आगे बजै निशाना ॥

रतनाकी कथा

( ८० )

ज्ञानसागर

बांधी अस्त्र अस चले बहु बीरा । कुहुक बान औ बहु धन तीरा ॥
बरछी सेल औ छुरी कटारी । खड्ग रु तुरी चपल परचारी ॥
दोड़ दिशि देख अस्त्र चमकारा । मानो साज चलो जल धारा ॥
राजा कीन्ह मरन का ठाना । वयरख रोप जो रहो पठाना ॥
जब देखा मैं होत लराई । युद्ध जानि अस कन्यो उपाई ॥
रानी जान मोर कछु मर्मा । तिन पुनि कही तजो नृप भर्मा ॥

साखी-पहिले खोदो माटी, मुदां देखु निहार ॥

सुरदा नहिं वहि भीतरे, कहा करत ही रार ॥

चोपाई

सत् कबीर नहीं नर देही । जारै जरत ना गाई गड़ही ॥
पठयो दूत पुनि जहां पठाना । सुनिके खान अचंभी माना ॥
दोड़ दल आई सलाहा जबही । बने गुरु नहिं भेटे तबही ॥
दोनों देख तबै पछतावा । ऐसे गुरु चीन्ह नहिं पावा ॥
अपने मैं अचंभा ठाना । रंक माहिं धन गया छिपाना ॥
दोड़ दीन कीन्ह बड़ शोगा । चकित भये सबै पुनि लोगा ॥

रतनाकी कथा

तब अपने मन कीन्ह विचारा । रतना कँदोइन कै पगु धारा ॥
रतना समाधान बहु कीन्हा । राजहि पठय सँदेशा दीन्हा ॥
तुम नृप किमि करते पछताना । निश्चय आही शब्द प्रवाना ॥
रहौ सदा शब्दहि मन लाई । दर्शन मोक्ष होय नहिं भाई ॥
साखी-विजुलीखां सौं दुआ कहि, किमि कारण पछताव ॥
रहौ नाम लौ लाइके, जाते कर्म कटाव ॥

चोपाई

लोक वेद मैं ऐसे विचारा । किमि कारण मन दुखी तुम्हारा ॥
सुने दंडवत बहु विध कीन्हा । तत्त्व मता नामहि गहि लीन्हा ॥
रतना सौं कहि मता अपाना । तेहि सुनिके हरष बहु आना ॥