कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
ज्ञानसागर
( ४१ )
मारहिं कपि कहैं कौतुक जानी । तब हनुमान आप बल ठानी ॥
जारि नगर तब कीन्हों छारा । नगर लोग सब कहैं विकारा ॥
साखी-आय कहौं रघुपति सौं, समाचार हनु वीर ॥
सिंधु बांधि हरि उत्तरे, दैत्य वधन रनधीर ॥
चौपाई
आए कीन्ह दैत्य संग्रामा । मारे दैत्य बहुत तब रामा ॥
कुंभकरण निद्रा सौं जागा । रघुवर सौं युद्ध करे अचुरागा ॥
कहै विभीषण सुन नृप रावन । आए राम जो असुर सतावन ॥
सिया संग लै जाहु तुरंता । क्षमा अपराध गहु पग हर्षता ॥
मारी लात विभीषण भाई । कोधित मिलो राम कहैं आई ॥
समाधान नृपति बड कीन्हौं । लंका बकसि ताहिं कौ दीन्हौं ॥
कुंभकरण गहि समर अपारा । ताको हरि बहु बल सौं मारा ॥
इंद्र जीत तब लाग गुहारी । कर अश्वमेध तपस्या भारी ॥
तिन कपि रोके कपिदल जुथ्या । विभीषण भेद कहो अज जुथ्या ॥
जौलौं पूर्ण जह ना होई । मारहु राम वध करे सोई ॥
भयो प्रभात राम जब देखा । लक्ष्मण लाग्यो बान विशेषा ॥
साखी-मार सो महाबली, मेघनाद जिहि नाम ॥
सुनत क्रोध रावन कियो, कठिन कीन्ह संग्राम ॥
चौपाई
दैत्य महाबल शक्ति संधाना । जूझे लक्ष्मण भया निदाना ॥
तुम हनुमान लै आवहु मूरी । उत्तर दिशा देश बड़ दूरी ॥
दौनागिर पर्वत कर नाऊ । संजीवन सहित ताहि लै आऊ ॥
संजीवन बास तैं लक्ष्मण जागा । हर्ष भये तब कपिकर भागा ॥
तब रघुवीर घेर गढ लंका । दैत्यनके जी उपजी शंका ॥
तब रावन गहि समर अपारी । बंधुहि व्याकुल है सब झारी ॥
( ४२ )
ज्ञानसागर
रामचन्द्र रावन कहै मारा । वार अनेक सीस झुइ पारा ॥
मारचो हृदय ताक कै जबही । रावन काल वश्य भयो तबही ॥
सीता समाधान हरि कीन्हा । ताको रूप न काहू चीन्हा ॥
सिया लीन्ह रघुवीर बुलाई । राज विभीषण दीन्ह सुहाई ॥
लै सीतहि अवधपुर आना । भरतहि कीन्ह बहुत सनमाना ॥
सीता सती रही अवधाना । गर्भ वास लौकृश उत्पाना ॥
साखी-राज करै रघुवंश मणि, तब अस कीन्ह प्रमान ॥
थाप्यो कोट अयोध्यहि, सुनौ मंत्र हनुमान ॥
चौपाई
जबहि राम लंका से आये । अयोध्या कोट उठावन लाये ॥
लक्ष्मण भाइ संग तब लीन्हा । सुदिन जानकै तब निव दीन्हा ॥
उठत कोट सो भय अस शोरा । है कछु द्रव्य नीच अस बोला ॥
सुन अस वचन राम रघुराई । खनहु खनहु अस आज्ञा पाई ॥
चहुँ दिश खने जो बाजु कुदारा । तपसी एक देख तहँवारा ॥
लुहिडा माथे दै तप करई । जोग अरंभ सदा चित धरई ॥
भौह बार मुख रहे छिपाने । बैठे महि के तले सयाने ॥
देखा ऋषिहि बहुत भय माना । शाप न देई बहुत सकाना ॥
छाँड़ि समाधि निरखि जब हेरा । राम दंडवत किये चहुँ फेरा ॥
साखी-बोले वचन ऋषी तब, कोहो सो कहु मोहि ॥
रूप भाव बहु आगर, देखों नृप सम तोहि ॥
रामचंद्र वचन-चौपाई
दशरथ तनय राम मोहि नाऊ । रहौं समीप अवधपुर गाऊ ॥
ऋषि कहो भयो राम अवतारा । पूछौ यह कह करब भुवारा ॥
हे ऋषि राज मैं कीर्ति बनाऊँ । जातैं रहे यहि जग में नाऊँ ॥
कह ऋषिराज जीवन है थोरा । छाँडो कोट कहा सुन मोरा ॥
ज्ञानसागर
( ४३ )
राम कह्यो ऋषि सो निज मर्मा । केते दिवस किया तपधर्मा ॥
लोमश ऋषि मोर है नाऊ । अपने जन्म को कह्यो प्रभाऊ ॥
आठ पहर रात दिन होई । अहो रात कहैं सब कोई ॥
दोई पाख कर प्रहर प्रमाना । सो एकदिवस पित्रन को जाना ॥
वर्ष दिवस जब उनको होई । एक दिवस देवन को सोई ॥
बारह वर्ष दिवस जब जाना । चौदह सहस्र इक मनु जो वखाना ॥
सप्त मनु जबही जाइ विगोई । तब इक इन्द्र काल सब होई ॥
सप्त इन्द्र जब होवै नाशा । इक ब्रह्मा को होई विनाशा ॥
साखी-सप्त ब्रह्मा जब विनशहीं, तब एक विष्णु को नाश ॥
सप्त विष्णु जब वीतहीं, तब इक रुद्र विनाश ॥
सोरा रुद्र गति जब हो जाई । तब इक रोम मम परे खसाई ॥
तातैं लोमस नाम है मोरा । करा समाध जीतवै है थोरा ॥
सुन रघुवीर अचंभित भयऊ । ऋषिको वचन प्रतीत न लयऊ ॥
राम चरित्र ऋषी तब जाना । क्या सोंचौ रघुवीर सुजाना ॥
देव अंगुष्ठ भैंटहु जो मोही । तैसे अंगुष्ठ दैऊ मैं तोही ॥
यहै कमंडल मोरे साथा । काढ़ौ गिन जो आवहि हाथा ॥
क्रोधित हाथ डार भगवाना । गिनि उनचास कोट परवाना ॥
परचो पाय रघुवीर न जाना । लोमश वचन सत् कर माना ॥
एतिक सुदरी गिनी विशेषा । कमंडलको कहैं कहिये लेखा ॥
इतने राम रावन होय गएऊ । सुनि रघुवीर अचंभौ भएऊ ॥
साखी-जान्यो जन्महि अल्प जब, चले स्वर्ग अस्थान ॥
निराकार निरञ्जन, तासु मर्म नहि जान ॥
चौपाई
त्याग्यो राजपाट बन्धु चारी । गये स्वर्ग नृप सैन सिधारी ॥
आप इच्छा जन्म पुन लीन्हा । कृष्ण चरित्र आगे पुन कीन्हा ॥
नं. १ कबीरसागर-
कृष्णचरित्रवर्णन
( ४४ )
ज्ञानसागर
जाहि राम को जपत संसारा । ताको तो ऐसो व्यवहारा ॥
बाजी दिखाय जीव सब राखा । मारे अन्त करै अस लाखा ॥
काह करै जिव बस परेऊ । तातैं सत्त शब्द चित धरेऊ ॥
जमराजा है अति बरबंडा । मारे ब्रह्मा विष्णु नौ खंडा ॥
काल फांस कैसे मुक्तावै । जब लग सत्तनाम नहि पावै ॥
साखी-नाम अदल जो पावै, कहै कबीर विचार ॥
होय अटल जो निश्चय, जमराजा रहे हार बार ॥
चोपाई
सुन धर्म मैं तोहि सुनाऊं । कृष्ण चरित्र को भाव बताऊं ॥
कृष्णचरित्र
राम रूप त्रेता अवतारा । गयो वियोग सकल संसारा ॥
करै भेख बहुत विधि कैसा । लेखा मूल ब्याज है जैसा ॥
एक नार रघुपति दुख पाया । सोरा सहस्र गोपि निरमाया ॥
प्रथमहि गोपिन को निरमाया । पीछे कृष्ण देव है आया ॥
देवकी कहैं जन्म लियौ जाई । दीन्ह सबै गोकुल पहुँचाई ॥
नंद के गेह आन तिन राखा । है मम पुत्र जसोधा भाखा ॥
करै नंद जसोधा महरी । पल भर कृष्ण राख न बहरी ॥
गोपी सबै विलास बनावैं । रात दिवस हरिके गुण गावैं ॥
नृप दशरथ वसुदेव अवतारा । कौशिल्यासुमित्रा देवकी वारा ॥
नारद ऋषि कंसहि कह भेऊ । यह निज जन्म न जानै केऊ ॥
उपजो तुव वैरी भगवाना । नंद गेह गोकुल अस्थाना ॥
सुन नृप कीन्ह जो बहुत उपाई । मारहु ताहि कहै अस राई ॥
कागासुर इक दैत्य अपारा । बलपौरुरज जिहिकै अधिकारा ॥
ताको कंस वचन अस भाखी । राम कृष्ण कर फोरहु आंखी ॥
चलयो दैत्य आयो हरि पाहीं । सखा संग जहैं बाल कन्हाहीं ॥
जान्यो कृष्ण दुष्ट यह आही । चपट कै मारचो है हरि ताही ॥
ज्ञानसागर
( ४५ )
सारखी-मारौ दैत्य महा बली, दैत्य राज भयमान ॥
भगनी तासु जो पूतना, ता कईं दीन्हों पान ॥
चौपाई
चली पूतना कर छल भेषा । गरल लगाइ पयोधर रेखा ॥
लेके पयोधर कृष्ण लगाई । तारी तवै सबै विष खाई ॥
एक बार ग्वालन संग गएऊ । जान बकासुर छैकै लएऊ ॥
मारचो कृष्ण ताहि पल माहीं । नहीं दैत्य जीते कोइ जाहीं ॥
इन्द्र पूजा नहिं दीन्ह गुवारा । वर्षे इन्द्र अखंडित धारा ॥
डारचो इन्द्र वर्षा दिन साता । हरि गिर लीन्हो ऊपरहाथा ॥
सारखी-सात दिवस जब वर्षेऊ, जान्यो इन्द्र भुवार ॥
क्षमा अपराध अब कीजिये, देव विनय अनुसार ॥
चौपाई
एक बार कालिन्दी तीरा । बछड़े लै गए जादौ बीरा ॥
लागी प्यास पियावहिं पानी । पीवत ही भइ सब की हानी ॥
देखत कृष्ण अचंभौ भयऊ । उरग गरल साँवल तन भयऊ ॥
पुन धँस गये तहं यदुराई । नाथ्यो नाग वारि मई जाई ॥
सारखी-यह चरित्र माधव कियो, जानत नाहिन कोय ॥
बूझेगे कोइ बिरले, सतगुरु मिलिया सोय ॥
चौपाई
केसी नाम बंधु बड़ बीरा । तिन पुनकीन्हा असुर शरीरा ॥
तब निकंद कीन्है जो ठाना । छलके मारचो तेहि भगवाना ॥
सुकल केश कईं बेग पठावहु । राम कृष्ण कौं बेग लै आवहु ॥
चल अकूर आये हरि पाहीं । कृष्ण चरित्र बूझे पल माहीं ॥
सोरा सहस्र अबला सों नेहा । बूझ न परै जीव दोइ देहा ॥
सारखी-बहु क्रीडा हरि कीन्हौ, जानत नाहिं न कोय ॥
अजिया पुत्रहि पालिये, आप स्वारथी होय ॥
( ४६ )
ज्ञानसागर
चौपाई
मारत तासु बार नहीं लावा । ऐसा देखो हरी स्वभावा ॥
रावन कुंभकरन जा मारा । ताको जन्य शिशुपाल अवतारा ॥
चलत कृष्ण गोपिन किए शोगा । संग भले तब जादों लोगा ॥
मारन कौं हरि मता जो ठाना । मथुरासे हरि कीन्ह पयाना ॥
मुष्ट चार और दोह खँडावा । सब असुरनहि कंस गुहरावा ॥
रंग भूमि नृप कंस बनावा । काल रंग भूमी ही आवा ॥
चल भए कृष्ण जहां कहैं तबही । कुबरीको सन्मान कियो जबही ॥
पूर्व जन्म तिन सेवा कीन्हा । भक्ति हेतु ताको रति दीन्हा ॥
साखी-कुबरीको सन्मान कर, चल भयो राज द्वार ॥
हस्ती कौं बल महाबल, तिनको पहिले मार ॥
चौपाई
मारत तासु वीर जो धाये । मुष्ट चार अरु दोह खँडाये ॥
मुये नृप पुन तब खस परेऊ । कालिन्दी तट आन जराएऊ ॥
उग्रसेन कीन्हों सन्माना । गये हरि मात पिता अस्थाना ॥
पूर्व जन्म सेवा तिन कीन्हा । भक्ति हेतु मैं दर्शन दीन्हा ॥
जरासन्ध नृप लाग गुहारी । सत्रह बार तिन कीन्हों मारी ॥
तैंतिस शोहणि दल तिन जीता । जमन केर सम्हर पर बीता ॥
नृप मुचकुंदहि तब पुनि मारा । ताकौ हरि पुनि बैर विचारा ॥
साखी-यह चरित्र कहु कैसौ, जमन को आनि मराव ॥
जीव कौ बदला जीव है, अदल अंश कर न्याव ॥
चौपाई
कंस मार हरि गोकुल गएऊ । गोपिन समाधान हरि किएऊ ॥
सब मिलि कीन्हों मंगलचारा । तब हरि ऐसौ वचन उचारा ॥
दुरवासा ऋषि तप बड़ कीन्हा । इच्छा भोजन माँगहि लीन्हा ॥
ज्ञानसागर
( ४७ )
जाय सबै ले जमुनहि पारा । ले चलि भोजन भर भर थारा॥
जमुना बहु विधि आप गुसाई । तब हरि ऐसा वचन सुनाई ॥
कही जाइ कालिन्दी तीरा । कृष्ण छुवा नहि मोर शरीरा ॥
होई है थाह जाइ हो पारा । चल भो गोपी लाग न बारा ॥
साखी-कृष्ण सन्देशा कहिके, सबै भई तब पार ॥
जाइ कराइन भोजन, तब विन्ती अनुसार ॥
चौपाई
तब गोपिन अस बचन सुनावा । हे प्रभु पार जाहिं किहिं भावा॥
कालिन्दी से कहि सब मांदा । ऋषि नहि खाइब मोर प्रसादा ॥
कहत सन्देशा सब भई पारा । अचरज भयो मनमाहिं विचारा ॥
ठगई लगा तीनों पुर माहीं । कृष्ण कहाये अचरज नाही ॥
चौथे लोक बसे परधाना । ताहिखबर कहु विरलन जाना ॥
तपके तेज कहा बड़ भएऊ । तीन लोक जो अचरज ठएऊ ॥
एकवार शिशुपाल भुवारा । कृष्ण से कीन्ह जो समर अपारा ॥
मारचो तबै दैत्य बल बीरा । निकसे प्राण जो छांडि शरीरा ॥
सब के देखत कृष्ण जो खावा । तेहु न बूझे काल स्वभावा ॥
सब के देखत आस जो कीन्हा । तासों कहे मुक्ति हरि दीन्हा ॥
साखी-काल सबन को आस्थो, वचन कह्यो समुझाय ॥
कहैं कबीर मैं का करो, देख नहीं पतिआय ॥
चौपाई
बूझो संतो काल की हानी । हरि को भाव भले मैं जानी ॥
कृष्ण के भयो जो प्रदुमनबारा । ताकुल अनिरुधलीन्ह अवतारा ॥
सुन प्रवीन बानासुर राऊ । शिव सेवही महाबल पाऊ ॥
ता नृप कै दुहिता एक भयऊ । ऊखा नाम तासु सो ठयऊ ॥
रूप आगर किमि करें बखाना । ताहि देख कर काम लजाना ॥
उन्मद यौवन भयो पुन जबही । काम बान सर लागेउ तबही ॥
( ४८ )
ज्ञानसागर
साखी-तासु दूत गण द्वारिका, अनिरुध अंश भुवार ॥
दोऊ उपजो मर्म अब, जस हंसनकी ज्वार ॥
चौपाई
दिवस आठ दस बीते जबही । अनिरुध कुँवर प्रगट भयो तबही ॥
बानासुर ने कोध दल साजा । अगणित बाज सम्हर कौ बाजा ॥
युद्ध करै दैत्य तहाँ जाई । अनिरुध सब कहँ मार हटाई ॥
छै प्रकार जीतो उन जबही । सातई बार भर्म भयो तबही ॥
दैत्य मार गहि समर अपारा । बाँध चपल कै कृष्ण कुँवारा ॥
कोई कहै मारो विषको मूला । शत्रु राखकै नृपकस भूला ॥
मंत्री कहई सुना भुवारा । शिव की आज्ञा मैं यह मारा ॥
नारद ऋषि तबही सुधि पाई । कृष्णहि बात जनावहु जाई ॥
चल भयो कृष्ण जो कोध अपारा । दैत्य जहाँ तहाँवा पशु धारा ॥
साखी-गरुड़ चढ़े तब कृष्ण सो, पुरही पहुँचे आय ॥
जाही नग्र अग्नि दियो, दैत्य राज तिहि ठाँयै ॥
चौपाई
आय दैत्य करै संग्रामा । हरि भेटें तेहि यम उन ग्रामा ॥
मारो हलधर अग्नित वीरा । बानासुर देख परे तेहि भीरा ॥
मोरा कृष्ण मता सुन आजू । अटल दियो महि शंकर राजू ॥
बहु विधि युद्ध दैत्य तब कीन्हा । कृष्ण चपल तेहि बाँध हिलीन्हा ॥
बाँध्यो नृप शंकर सुधि पाई । कोधित आई तब कृष्ण लराई ॥
दोनों वीर महा बल धारी । लागी होन परस्पर मारी ॥
दोनों मंत्र पुनि दीन अडाई । तारी मार मार पुन धाई ॥
दोह जुरे पुन मछ समाना । कौतुक आई निरंजन जाना ॥
दोउके समर पावक उठि जबही । आदि भवानी चलभइ तबही ॥
दोनों सुत कहँ जब बिलगावा । बादल पवनके जैसे स्वभावा ॥
ज्ञानसागर
( ४९ )
साखी-दोई सुत तब बरजी, आदि भवानी आय ॥
बर ऊषा अनिरुद्धको, शंकर दीन्ह मिलाय ॥
चोपाई
चले कृष्ण और सुत भामिनि । तासु अंग चमके जिमि दामिनि ॥
कृष्ण द्वारिका पहुँचे जाई । सो वृत्तान्त कहौं समुझाई ॥
जोपै हर हरिको व्रत धरई । प्रभु सेवक कहु काहे लरई ॥
प्रभु सेवक कहु कैसे लड़ाई । सो गति मोहि कहौ समुझाई ॥
हरि हर युद्ध सबै कोइ जाना । सहस्रनाम किमि करब बखाना ॥
यमराजा जु ठगौरी लायी । ज्ञान देख कर चेतो भायी ॥
बूझौ सब मिलि पाखंड धरमा । मैं जानौं भल कालही मरमा ॥
अदेख देख सब कहि समुझाई । ताको विरला जन पति आई ॥
साखी-शङ्कर कियो युद्ध हरिसों, तब कहु कैसो दास ॥
पंडित जन सब थापहीं, सहस्र नाम विश्वास ॥
चोपाई
चारौं वेद को मूल बताऊँ । सहस्र नाम को सार बुझाऊँ ॥
काशीमें विश्वास जनावई । विश्वनाथके मंदिर धावई ॥
विश्वनाथको भेद बतावहु । सार ग्रन्थ मोही समझावहु ॥
सबै ग्रन्थ करि आगिल कीन्हा । भक्ति तत्त्व सबै मिलि चीन्हा ॥
सब पर सहस्र नाम परवाना । जहाँ लग शास्त्र रु वेद पुराना ॥
तेहि जाने जेते सब कोई । बूझौ मरम जु विरला कोई ॥
बूझौ पंडित भेद बताई । प्रभु सेवक कहु कैसे लराई ॥
यह सब बन्ध बहुत मैं भाखी । ते यमराजा सब ठग राखी ॥
ज्यों नारी पिय को व्रत तजई । दूजे जु प्रेम प्रीति सों भजई ॥
तैसो देखो यह संसारा । नाम बिना किमि उतरे पारा ॥
साखी-भूल परी सब दुनियाँ, पाखंडके व्यवहार ॥
मूल छाँड़ि डारे गहै, कैसे उतरे पार ॥
( ५० )
ज्ञानसागर
चौपाई
तब हरि कीन्हे चरित अपारा । सो अब भाखौँ अगिलव्यवहारा ॥
पांडव पांच सेवा बहु करई । तिन सों कृष्ण हेतु बहु धरई ॥
मारन तासु को मतौ बिचारा । पांडव कौरव नृप दोह मारा ॥
दोनोंमें छल कियो भगवाना । ताको मर्म काहु नहि जाना ॥
बंधु विरोध वैर उपजाई । प्रतिदिन समर करें तहँ आई ॥
राजा दुपद स्वयम्बर ठाना । तहँ पारथ राहु संधाना ॥
दुयोंधन अस कीन्ह उपाई । कन्या मारि लेव पाँचों भाई ॥
कृष्ण ताहि छल मत उपजावा । तातें ताहि पांच पति भावा ॥
तेहि मारन हरि मतौ बिचारा । गीता कह अध्याय अठारा ॥
कौरव आई जो करहि लड़ाई । ताहि कृष्ण छलसे भरवाई ॥
मारचो करण गंगसुत द्रोना । सबको मारि कियो दल सूना ॥
मारचो दुयोंधन जो राई । अठारह शोहणी मार गिराई ॥
साखी-पाँचों पांडव बचि रहे, औ जूझे सब झार ॥
धरमराय अस कीन्हा, कृष्ण परी हंकार ॥
चौपाई
चल भये कृष्ण स्वर्ग अस्थाना । शून्यआदि जहँ शशिनहिंभाना ॥
पुर वैकुंठ ते आगे गयेऊ । तहाँ जाइके स्तुति कियेऊ ॥
अलख निरंजन अंतर््यामी । सब ते न्यारे हो तुम स्वामी ॥
सबमें व्याप्त निरंजन राया । पाँचो तत्त्व शून्य उपजाया ॥
तुमही ब्रह्मा विष्णु महेशा । आदि अंत तुम देव गणेशा ॥
अहो कृपालु कृपानिधि स्वामी । करहु दया तुम अंतर्यामी ॥
ततक्षण भई अकाशतें वाणी । अहो कृष्ण सबको उत्तपानी ॥
अब जो कहैं करो सो जानी । सोई वचन लेव सिर मानी ॥
तुम भेजा महि भार उतारहु । असुरनको विध्वंसके मारहु ॥
ज्ञानसागर
( ५१ )
साखी-मारहु जादव वंश कहैं, मानो वचन रसाल ।
गोपी जाय संहारो, तेहि पाछे तुव काल
कृष्ण वचन-चोपार्द
कृष्ण कहै सुनु पुरुष पुराना । काल अभै कहाँ मोर ठिकाना॥
निरंजन वचन
तैं मम अंश मोहिमें वासा । काल रूप संसार निवासा ॥
पातक जीव जो रहै महाबल । मारहुतिनिहीतुम अतिबल छल॥
उपजत विनसत क्षीन भइ देहा । कलियुग आवै क्षीण सनेहा ॥
क्षीण शरीर अवधि भइ थोरा । पूजी अवधि आई कै तोरा ॥
जस कछु कहो कियासो चढ़िहौ । जाकौ दिया राज महिकरिहौ॥
छाड़ो महि मंडलको भाऊ । जगन्नाथ में कष्ट बनाऊ ॥
तजो कृष्ण अब वेग शरीरू । आये अन्न अब दास कबीरू ॥
कृष्ण वचन
साखी-सुन कियो कृष्ण अचंभो, कैसो दास कबीर ॥
सो मोहि स्वामी कहब सब, तब मैं तजों शरोर ॥
निरंजन वचन-चोपार्द
कली अनेक राज है मोरा । कलियुग नरहिअवधि है थोरा ॥
पांडव नंदन यज्ञ जो ठानहि । ऋषिगण सबहीनिवतजुआवहि॥
यज्ञ पूर्ण नहिं ताकर होई । नाम प्रभाव कहै नहिं कोई ॥
कलि उत्पन्न मनुष्य शरीरू । जा कहैं सुनियो दास कबीरू॥
तिनके शिष्य सुपच जो होई । पूरण यज्ञकर ततक्षण सोई ॥
या सहिदानी तोहि बताऊँ । तोहि सेती महि मंडल छाऊँ ॥
बालिही राम रूप तुम मारा । ताकर होई व्याध औतारा ॥
ताकर बैर देहुँ तुम जाई । फेर जीव कछु संशय नाई ॥
सुनिकै कृष्ण चले सिरनाई । नगर द्वारिका पहुँचे आई ॥
पाण्डव यज्ञ तथा सुपच सुदर्शन कथा-वर्णन
( ५२ )
ज्ञानसागर
पांडव निवते यज्ञ पठाये । चलिये स्वामी बेग बुलाये ॥
मारन बंधु या किया लागा । तातें यज्ञ रची है रागा ॥
चल भये कृष्ण बार नहिलाये । पुर पांडव के आश्रम आये ॥
आवत समाधान नृप कीन्हा । छत्र तानि सिंहासन दीन्हा ॥
आवत कृष्णसभा सिर नावा । भोजन को तब आज्ञा पावा ॥
साखी-बैठे गन्धरव देव गण, ऋषि मुनिवर सब झार ॥
सब मिलि कीन्हा भोजन, इच्छा के अनुसार ॥
चौपाई
भोजन भये घंट नहिं बाजा । राय युधिष्ठिर को भयी लाजा ॥
अहो कृष्ण का करौं उपाई । सोमोहि स्वामी कहिये समुझाई ॥
जबहि कृष्ण अस भाव बताया । सुनहू मंत्र युधिष्ठिर राया ॥
खोजहु भक्त जो निर्गुण गावयी । सतगुण महिमा सदा बतावयी ॥
आनब ताहि यज्ञ निवताई । दीन भाव कर ताहि लिवाई ॥
कृष्ण वचन सुनि युधिष्ठिर राया । भगत बुलावन दूत पठाया ॥
सुनिके दूत चले चहुँ देशा । नहिं कोइ भक्तन भेटे वेशा ॥
चले भीम तब लागि न वारा । चहुँ दिश फिर काशी पगुधारा ॥
बैठे सुपच ताहि सों कहई । निर्गुन भक्त यहाँ कोइ रहई ॥
कहै सुपच निर्गुन को जानों । सतगुरु महिमा सदा बखानों ॥
साखी-कहै भीम सुन हरिजन, कृपा करौं मम संग ॥
चलो जहाँ हरि बैठे, स्वामी बाल गुविन्द ॥
चौपाई
कहै सुपच प्रभु कैसे कहऊ । कालहि जान कृष्ण परिहरऊ ॥
सुनतहि भीम कोप तब कीन्हा । यामैं कहा भक्त वर चीन्हा ॥
यहि मारो तो राख रिसाई । कह्यो मंत्र राजा पर जाई ॥
तीन लोक के जे प्रभुराई । तिनको भाखै काल कसाई ॥
ज्ञानसागर
( ५३ )
कृष्णहि कहै काल की फांसी । कीन्हही आय भक्त की हांसी ॥
मारचो नहि पर तुव भय माना । यह सुनकर विहिसे भगवाना ॥
सारखी-जाव युधिष्ठिर वेग दै, तुम आनो गहि पांय ॥
आज्ञा मानि चले तब, आये युधिष्ठिर राय ॥
चोपाई
अहो संत तजिये अपराधा । अधम उधारन सुनियत साधा ॥
चलो स्वामी मेरे गृह आजू । कृपा करौ मम होवै कालू ॥
कहैं सुपच सुन पांडव राज । तोर का काज होय वहि ठाऊ ॥
तुम्हरे गये होय मम काजा । परमारथ तुम को बड़ साजा ॥
चल परमारथ कारण संता । सभा माहिं बैठे हरषंता ॥
आवत स्वपच कृष्ण जब जाना । होय काज पूरण सनमाना ॥
राय युधिष्ठिर पखारे पांऊ । भोजन सादर आन जिवाऊं ॥
भोजन करके सुपच भयो ठाढा । बाज्यो घंट शब्द भयो गाढा ॥
बाज्यो घंट यज्ञ भयो पूरा । कौतुक देखि ऋषीगण भूला ॥
पूरण यज्ञ विष्णु जब जाना । तबही कीन्ह द्वारिका पयाना ॥
सारखी-बूझो रे नर परानी, क्या सुपचे अधिकार ॥
गण गन्धर्व सुनि देव ऋषि, सब मिलि कीन्ह अहार ॥
चोपाई
सब के खाये घंट नहि बाजा । धर्म की देह युधिष्ठिर राजा ॥
सो सब रहे पूर्ण यज्ञ नाहीं । नामहि महिमा जानत नाहीं ॥
सुपच जान भल नाम प्रभाऊ । ताते पूरण यज्ञ कराऊ ॥
कृष्ण शक्ति में सुनि ऋषि झूला । जान बूझिकै पंडित भूला ॥
बूझौ सन्तो नाम हमारा । नाम विना किमि उत्तरौ पारा ॥
कृष्ण पारथ ही वेग बुलावा । तेहि पुनि निज मतौ सुनावा ॥
गोपी लैकै जाऊं मैं जहँवा । पुर वैकुंठ सुमेर है तहँवा ॥
कृष्णका स्वर्गारोहण और जगन्नाथकी स्थापना
( ५४ )
ज्ञानसागर
मथुरा तैं तुम वेग लै आवहु । जाहु तुरन्त गहर जनिलावहु ॥
चल भयो पार्थ हाथ धनु तीरा । गोपी लैन कोटिन यदुबीरा ॥
आपस में जो करे लड़ाई । इक मारे एक मरजाई ॥
छप्पन कोटि जो सबै सिरानो । सो नट षट कृष्णहि के जानो ॥
अष्ट कन्या लखी चित्रसारी । तिनकहैं कृष्णजो यहि विधि मारी ॥
साखी-मारिन सब जेती हती, कृष्ण काल बरि यान ॥
तब अपने मन में गुनौ, करो उदधि अस्थान ॥
चौपाई
वधिक देव घात संधाना । बालि बैरको भाव जो जाना ॥
जम सब प्रान घेर लै गयेऊ । मारचो कृष्ण मूर्च्छित भयेऊ ॥
निरंकार निरंजन राऊ । आपहि मारिजो ताहि नसाऊ ॥
बालि का बैर व्याधा जबलीन्हा । यह तो भेद न काहू चीन्हा ॥
तीन लोक के कृष्ण भुवारा । रहै न बैर जीव व्यवहारा ॥
जो जीव आप स्वारथहि मारा । सो जीव अपनौ किमि निस्तारा ॥
तबहि कृष्ण अस मता विचारा । तत्त्व मता अस रूप संहारा ॥
जादव रूप कृष्ण सब मारे । पारथ बान रहे सब हारे ॥
गोपी रही जो प्राणहि प्यारी । तिनको कृष्ण येहि बिधि मारी ॥
आये कृष्ण पहुँ अर्जुन बीरा । लाज न छाड़ै अत्र शरीरा ॥
साखी-कहैं कृष्ण सुन अर्जुन, छाड़ो यहि संसार ॥
हम तो जात हैं स्वर्ग को, इत परंपंच अपार ॥
गये पारथ जहँ चारौं भाई । चलौ वही जहँ यादो राई ॥
कहै सन्देश सुनौ हो राऊ । यहवाँ मोर दर्श नहि पाऊ ॥
मृत मंडल नहि मेटव मोही । छाड़ौ महि बोलों अस तोही ॥
छाड़ौ राज पाट सब भाई । पुत्र राज देख सब जाई ॥
निकलंक अवतारकी वार्ता
ज्ञानसागर
( ५५ )
चारेउ पांडव काल बड़ा भयेऊ । रायशुधिष्ठिर सदेह तब गयेऊ ॥
ता कहैं बड़ शासन जो कीन्हा । नाम विना देखो अस चीन्हा ॥
देखत कृष्ण अपन तन त्यागा । चिता तासु की रचन जो लागा ॥
चन्दन काष्ठ तासु तन जारा । चल भयो काष्ठ समुद्र मझारा ॥
इंद्र देवन हरि सपना दयेऊ । तिन पुनि काष्ठ आन धरि लयेऊ ॥
सुंधायो द्वार काहु नहि जाना । ठक २ उठै दिन रात प्रवीना ॥
शिशुपाल भुजा चार रहो जाही । मारचो कृष्ण जो भक्ष्यो ताही ॥
साखी-सबै अंग सम्पूर्ण हैं, जगन्नाथ को भाव ॥
शिशुपाल की भुजा उखारी, ताको वैर दिवाव ॥
चौपाई
दोह भुजा काष्ठ जेहि उरेहा । वैर न छूटे सो गहि देहा ॥
जो काइ जीव जोर कर मारा । तासु जन्म किमिहो निस्तारा ॥
राम कृष्ण तैं को बड़ आही । वैर घात तासों न रहाही ॥
कृषी करै किसान जस भाऊ । ऐसी दसों जनम निर्माऊ ॥
दसों जनम ऐसे ही बीते । तासों कहै कि सुक्ति करीते ॥
बूझो नहि चरित्र भगवाना । तीन जुग गये काल नियराना ॥
है बड़ ठाकुर ज्योति स्वरूपा । तिन सब रच्यो मही औ भूपा ॥
आप स्वार्थी तिनहु मारे । ज्यों नकटी विश्वासहि वारे ॥
साखी-जिस सिरदार मही को, करै चरित्र भुवार ॥
जहैं तहैं शील पटावै, मछ बली तब धार ॥
चौपाई
कलियुग अन्त मलेच्छ व्यवहारा । तब हरि निष्कलंक अवतारा ॥
मारहि मलेच्छ सबै पुर कैसे । पावक मध्य तृण है जैसे ॥
पावक रूपनि कलंक अवतारा । तृण समान मलेच्छ संहारा ॥
बहुर कलंकी ज्योति समाई । कौतुक करै निरंजन राई ॥
ऐसे दसों जन्म निर्माये । निरंकार पुनि ताहि सताये ॥
उत्पत्ति परलयका लेखा
( ५६ )
ज्ञानसागर
धर्मदास वचन
धर्मदास कहैं सुनौं गुसाई । दसों जन्म कहि मोहि सुनाई ॥
कलप अनेक निरंजन राजा । आगे कैसा करि है साजा ॥
सो सब स्वामी मोहि जनाओ । उत्पति प्रलय भाव बताओ ॥
उत्पति प्रलय सुनौं तुम पाही । कहौ सबै जो संशय जाही ॥
साहिब कबीर वचन
चारौं युग हैं रहट स्वभाऊ । सो अब तोहि कहौं समुझाऊँ ॥
चारौं युग अंत जब होई । वषैं अग्नि निरंजन सोई ॥
पृथ्वी जार करै सब पानी । रहै स्वर्ग सो कहौ निशानी ॥
रहै जो देव तैंतीस करोरी । रहै जब तपसी तपकी जोरी ॥
चन्द्र सूर्य तारागण झारी । जबही देह तजै सुख चारी ॥
विष्णु बीतही दस अवतारा । नहिं शिव बीत योग जो धारा ॥
यहि विधि बहत रचौकड़ी जाई । सेवा फल पावै अन्याई ॥
उत्पति करै पुन प्रथम स्वभाऊ । ऐसे भवसागर निर्माऊ ॥
छंद-महा प्रलय जब किया निरंजन अग्नि सेवत ना रहो ।
लोमस ऋषितबहोय अंतहि शशि भानु पानी सब गयो ॥
तीन गुन पांच तत्त्व बीते दस चार सुत आकाश हो ।
महा देवी आदि कन्या ताही करै वह गरास हो ॥
सोरठा-सब भक्षे निरंजन राय, आदि अंत ना कछु रहै ।
शिव कन्यानाम विहाय, सब जी राखै आपमें ॥
चौपाई
सतगुरु दया जाहि पर होई । नाम प्रताप बाचे जन सोई ॥
निज घर हंसा करहि पयाना । और सकल जीवतहां समाना ॥
जाई रहैं जहां धर्महि द्वीपा । प्रथम करी जो लोक समीपा ॥
उत्पति कारण सेवा करहीं । पुनियहि भांति सृष्टि अनुसरहीं ॥
कृत्ययुगमें कबीरसाहबका पृथ्वीपर आना
ज्ञानसागर
( ५७ )
भक्त अभक्त सबै पुनि खाई । सबको भक्षै निरंजन राई ॥
सो पुनि महिमा वेद बखाने । वेद पढे पर भेद ना जाने ॥
छंद-जेहि को भरोसा सोई चुरावै कहो तब कैसी वने ।
सेवा करै जेहि पुरुषकी सो भक्षण प्रति दिन करै ॥
जानी कै बूझै नहिं केतो कहो समुझाय हो ।
आदि अंत सबै यसै अस निरंजन राय हो ॥
सोरठा-काल सबनको खाय, हरि हर ब्रह्मासे सबै ।
वाचै कौन उपाय, एक नाम जाने बिना ॥
धर्मदासवचन-जीपाई
धर्मदास टेके गहि पाऊ । हे स्वामी मोहि भेद बताऊ ॥
कैसे आयो यहि संसारा । सो कहिये मोसों ध्यवहारा ॥
साहब कवीर वचन
सत्य युगमें कवीर साहबका पृथ्वी पर प्रगट होना
सुन धर्मनि मै तोहि बताउं । लोक छोड़ि मै इहँवां आउं ॥
सतयुग सत सुकृत मम नाउं । सोई सबै तोहि समझाउं ॥
हंस उवारन आयेउ जबही । मथुरा नगरहि पहुँचे तबही ॥
गुरुमठमांझ जो आसन कीन्ह। रक्षा अंत मोहि काहु न चीन्ह। ॥
कहौं भक्ति बहु भाति हटाई । बिन अंकूर न जीव जगाई ॥
बिबसी नाम रहै इक नांरी । ज्ञानवंत औ वरण कुँमारी ॥
तासों कहो भक्ति परमाना । बिबसी सुनै अचंभौ माना ॥
बिबसी वचन
साखी-अचरज कही तुम स्वामी, लोक वर्ण उजियार ॥
पहिले लोक दिखाओ, पीछे हो इतबार ॥
१ रानी-ऐसा भी पाठ है । २-बिश्वास
त्रेतामें कबीर साहबका पृथ्वीपर आना
( ५८ )
ज्ञानसागर
चोपाई
तब हम मता अस कीन्हा । ताके शीश हाथ जो दीन्हा ॥
परसत शीश ताकर भय भागा । शून्य मंदिरमें सुहरा जागा ॥
देखत सुरति निरति सौ लोका । बिबसीका मेटचो सब धोखा ॥
हे स्वामी अब कीजे दाय। यमके घरसे जीव मुक्ताया ॥
बार अनेक विनय तिन कीन्हा । तब हम नाम लखाई दीन्हा ॥
भक्ति भावसों करै अनंदा । ज्यों चकोर पाये निशि चन्दा ॥
ताके गृह निंदक सब रहई । बिबसी देखत ही पर हरई ॥
साखी-जाके पाछे हंस जो उबरे, तिनहिको जो बताव ॥
हंस ग्यारह आयऊ, गुरुसे कीन्ह भिट्ठाब ॥
चोपाई
तिन कह सत् शब्द जो दीन्हा । परम पुरुषके दर्शन कीन्हा ॥
तब उठि गयो पुरुषके ठाऊँ । सतयुग सत सुकृत मम नाऊँ ॥
आवत जात लखे नहिं कोई । आज्ञा पुरुषकी जापर होई ॥
त्रेतायुगमें कबीर साहबका प्राकट्य
चोपाई
त्रेतायुग आयो पुनि जबही । युग अनुमान चलो मैं तबही ॥
नाम मुनींद्र धरो निःशंका । प्रथम जाय देखेउ गढ़लंका ॥
द्वारपाल सों कहि समुझाई । राजाको ले आव बुलाई ॥
सुन प्रतिहार कह अस वानी । रावन मरम सिद्ध नहिं जानी ॥
महा गर्व कछु गिने न आनो । शिवके बल कछु शंक न मानो ॥
मारहि मोहि कहाँ जो जाई । गर्व प्रहारी है रावन राई ॥
मुनींद्रववन
जाहु तुरत कहा सुन मोरा । बार बंक नहिं होवहिं तोरा ॥
प्रतीहार जब बात सुनाई । सिद्ध एक है ठाढ़ गुसाई ॥
सुनिनुपक्रोध अनल समकीन्हा । प्रतीहार तुम मति अति हीना ॥
भिक्षुक एक जो मोहि बुलावै । शिव सुत मार दरशनहिं पावै ॥
ज्ञानसागर
( ५१ )
साखी-कहा रूप तेहि ऋषीकर, मोहि कहो समझाय ॥
जो मांगे सो देव वहि, लेइ बहुर घर जाय ॥
चौपाई
हे प्रभु आहि सेत जो भाऊ । सेत अंग जैसे शशि गऊ ॥
माला तिलक बदन है सेता । कहै नृपति कोई आहि अजेता ॥
मन्दोदरि कहै सुनो हो राजा । ऐसा रूप और नहि छाजा ॥
सेत रूप महिमा मैं जानौं । निश्चय है कोई पुरुष पुरानो ॥
जार्ई तुरन्त गहौ तुम पाऊ । होऊ अकल सुन रावन राऊ ॥
दस सिर बचन सुनत पर जरेऊ । जगत हुताशन जनु वृत्त परेऊ ॥
चलि भयो असुर अनिल समचीन्हा । बहुत वेग मनमें अस कीन्हा ॥
सत्तरवार खड़ सो चलावा । तब हम ओट तृणकी लावा ॥
साखी-तृण ओट जेहि कारणे, गर्व परिहरौ राव ॥
तृण जवही ना टूटयो, राजहि शोक जनाव ॥
चौपाई
कह मन्दोदरि गहि मम पाऊ । गर्व न छाड़ रावन राऊ ॥
शिवकी सेव करै मन मानी । अटल राज दीन्हा तिन ठानी ॥
तब चलत हम कही अस बाणी । मृदु नृपति तुम मर्म न जानी ॥
सुनु रावण जो लंक मझारा । सब कहैं रामचन्द्र जो मारा ॥
काहू मुक्ति गम्य नहि पाई । ताते मैं कछु कहां बुझाई ॥
तो कहैं भक्षहि काल अन्याई । काचा मास स्वान जिमि खाई ॥
काल भक्ष जिव सबहि निदाना । अधिक तोर कछु मरदै माना ॥
अगिला जन्म तोर होइ जवही । भक्षी कृष्ण देख पुन तबही ॥
उनसे करिहौ बहु अभिमाना । ताकर तोहि कहा परवाना ॥
तृण नहि टूटो बल तुम बूझा । आगै कहा तोह बल सूझा ॥
वालि नाम इक कपि जो होई । रख छह मास तोहि कहैं गोई ॥
तिनकी कांख रहिहौ छै मासा । ऐसा कहैं पग कौन्ह प्रकाशा ॥
( ६० )
ज्ञानसागर
सार्वी-रावणको अपमान करि, अवध नगर चलि आय।
दशा सन्त की जान कै, मधुकर पकरै पाय ॥
प्रसंग-चौपाई
नमस्कार कर गहि लिये पाऊं । बाल गोपाल चरण तर नाऊं ॥
ताकी प्रीति नीक मैं जाना । तासों लोक संदेश बखाना ॥
तिन कीन्ही विन्ती बहुवानी । हे प्रभु देखों लोक सहिदानी ॥
लैकर चले पंथ तेहि जहँवा । पांजी एक रहे धर्म तहँवा ॥
देखि ताहि दौरे यम दूता । कहाँ ले चले विप्रको पूता ॥
कहैं सुनींद्र सुनो यमराई । इनको जिन रोकौ तुम आई ॥
जाकर दूत जाव तेहि पास। पाछे करो वैर की आशा ॥
ब्रह्मा विष्णु शिव आज्ञा देही । तीन लोक महाँ जिव गहि लेही ॥
सार्वी-छोड़ देव यह मारग, तुम अब आहु कौन ॥
यहां कोई नहीं आवे, तुम कह करत हो गौन ॥
चौपाई
तव सुनींद्र अस बोले लीन्हा । होहु दूत तुम सब बलहीना ॥
शब्द प्रमाण न होई बल थोड़ा । दूतन जीत गये महि ओरा ॥
तिनको दिव्य दृष्टि कर दीन्हा । तहँवा जाय लोक तिन चीन्हा ॥
देखि स्वरूप सुरंग अपारा । झलके जोत जहां उजियारा ॥
देखत मधुकर बहुत प्रतीती । हे स्वामी तुम यम कहैं जीती ॥
मो कहैं दीजै शब्द दृढाई । जेहिते हम परम पद पाई ॥
अति आधीन देखा मैं जबहीं । नाम दृढाय दियो तेहि तबहीं ॥
अति आधीन जो बोलस्वभाऊ । मोरे गृह अब धारो पाऊ ॥
ताके गृह आयो मैं जबहीं । सोरा जीव शरण भये तबहीं ॥
सार्वी-मधुकर जेते जीव सब, लोकहि कीन्ह पयान ॥
तातैं नाम सुनींद्र कहि, जीव सत्त दियो दान ॥