कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
बोधसागर
( २३ )
चौपाई
ऐसा राम कबीर न जाना । धर्मदास सुनियो दै काना ॥
सुत्र के परे पुरुष को धामा । तहैं साहब है आदि अनामा ॥
ताहि धाम सब जीवका दाता । मैं सबसों कहता निज बाता ॥
कहत अगोचर सब के पारा । आदि अनादि पुरुष है न्यारा ॥
आदि ब्रह्म इक पुरुष अकेला । ताके संग नहीं कोइ चेला ॥
ताहि न जाने यह संसारा । बिना नाम है जमके चारा ॥
नाम बिना यह जग अरुझाना । नाम गहे सौ संतसुजाना ॥
सच्चा साहब भजु रे भाई । यहि जगसे तुम कहो चित्ताई ॥
धोखा में जिव जन्म गँवाई । झूठी लगन लगाये भाई ॥
ऐसा जग से कहु समझाई । धमदाम जिव बोधो जाई ॥
सज्जन जिव आवै तुम पासा । जिन्हें देव सतलोकहि बासा ॥
ज्ञानहीनके सुन षट करमा । धर्मदास उनके ये धरमा ॥
भरग गये वे भव जलमाहीं । आदि नाम को जानत नाही ॥
पीतर पाथर पूजन लागे । आदि नाम घटही से त्यागे ॥
तीरथ बर्त करे संसारे । नेम धरम असनान सकारे ॥
भेष वनाय विभूति रमाये । घर घर भिक्षा माँगन आये ॥
जग जीवनको दीक्षा देहीं । सत्तनाम विन पुरषहि द्रोही ॥
ज्ञान हीन जो गुरु कहावै । आपन भूला जगत भुलावै ॥
काम कोध मद लोभ विक्राग । इन्हें न त्यागे साध बिचारा ॥
ऐसा ज्ञान चलाया भाई । सत साहबकी सुध बिसराई ॥
यह दुनियां दो रंगी भाई । जिव गह शरण असुरकी जाई ॥
तीरथ व्रत तप पुन्य कमाई । यह जम जाल तहाँ ठहराई ॥
यहै जगत ऐसा अरुझाई । नाम बिना बूढ़ी दुनियाई ॥
जो कोइ भक्त हमारा होई । जात वरण को त्यागे सोई ॥
( २४ )
ज्ञानबोध
तीरथ व्रत सब देय बहाई । सतगुरु चरणसे ध्यान लगाई ॥
काम क्रोध मद लोभ न तेही । सोई पावै परम सनेही ॥
मनहीं बांध स्थिर जो करही । सो हंसा भवसागर तरही ॥
भक्त होय सतगुरुका पूरा । रहै पुरुष के नित्त हजुरा ॥
यही जो रीति साधकी भाई । सार युक्ति में कह गुहराई ॥
साखी-सत्तनाम निज मूल है, यह कबीर समझाय ॥
दोई दीन खोजत फिरें, परम पुरुष नहीं पाय ॥
सोरठा
सत्तनाम गुण गाव, गहै नाम सेवा करै ।
सहज परम पद पाव, सतगुरु पद विश्वास दृढ ॥
चौपाई
पाथर पूज हिंदु भुलाना । सुरदा पूज भूले तुरकाना ॥
कहैं कबीर ये दोह भुलाना । आदि पुरुष कोई नहीं जाना ॥
हिन्दू तुर्क दोई उपदेशा । नाम गहै मिटि काल कलेशा ॥
भवसागर कोइ पार न पावे । या जग में सब गोता खावे ॥
भव दरयाव है अगम अपारा । पुरुष भक्त उतरेंगे पारा ॥
धर्मदास जग कहो समझाई । आदि नाम बिन सुक्ति न पाई ॥
जो जन भजि हैं निर्भयनामा । सो हंसा पहुँचै निज धामा ॥
अजर नाम लै लोकहि जाई । दुष्ट काल तब रहे सुरझाई ॥
कर्मत्याग सब भजो यकनामा । कभी न हो भवसागर धामा ॥
ब्रह्मने जो राह चलाई । सो सब कहों मैं तुमसे गार्ई ॥
चार वरण अरु वेद बखाना । जगके जीव सबही उरझाना ॥
जात पांत ब्रह्म कर दीन्हा । सबमें ऊँच ब्राह्मणको दीन्हा ॥
ब्रह्म अपने मते चलाये । तीनों गुण जग नाम लखाये ॥
आदि नामकी सुध नहीं पाये । चारों जुग धोखाहि गुमाये ॥
बोधसागर
( २५ )
यह ब्रह्मा की है कगवृत्ती । जगहि लखाये झूठी रीती ॥
ब्रह्माने यह जग भरमाया । पत्त पुरुषका भेद न पाया ॥
तिहुँपुर कालके जाल पसारा । तामें अटके सब संसारा ॥
जात पांत कोई भेद न चीन्हा । मिथ्या राह जगहि गहलीन्हा ॥
ब्राह्मण प्रभुकी भक्ति न जाने । ब्रह्म रूप नाहीं पहचाने ॥
सार शब्द ब्राह्मण नहीं जाने । आदि नाम शूद्रही बखाने ॥
ब्राह्मण धरे शूद्र औतारा । करे मुक्ति तिहुँ पुरसे न्यारा ॥
धन्य शूद्र जो सेवा करई । आदि नामको हियमें धरई ॥
जाति वनरमें भेद बताऊँ । जो कोई समझे ताह लखाऊँ ॥
जाति बरण सब एकहि होई । दूसर जाति नहीं है कोई ॥
दूसर कर्म जाति है भाई । कर्म करे सो नाम धराई ॥
जैसो कर्म करे जो भाई । तैसी ताकी जात बनाई ॥
चार बरण सब एकहि जानो । दूसरे कर्म जो जात बखानो ॥
जाति बरणका चिह्न न कोई । कैसे जाति दूसरी होई ॥
दूसरि जाति कोई विधि माने । जग अज्ञात भेद न जाने ॥
जाति पांति होके नहिं आये । यह जगमें झगड़ा फैलाये ॥
जाति पांति नाहीं कोई न्यारी । एक जाति है सब संसारी ॥
भगके द्वार जीव सब आये । जन्म मरनमें बहुरि समाये ॥
राह एक आये संसारा । कौन ज्ञानसे भये नियोग ॥
एकइ घरसे सब जिव आये । एक बाप एक माता जाये ॥
ऊँच नीच सब सम कर जाना । ऊँच नीच सब झूँठ बखाना ॥
डार जनेऊ ब्राह्मण कहलायें । ब्राह्मणिको कहो का पहिराये ॥
सुनत करा मुसलमानहि कीन्हा । तुर्कानीको का कर दीन्हा ॥
ना हिन्दू ना तुर्क कहाये । ज्ञान हीन जिव धोखा खाये ॥
जात बरन मिथ्या कर जानो । सत्त कहे निश्चय कर मानो ॥
( २६ )
ज्ञानबोध
यह जग आंधर जानो भाई । नाम न जाने ऊँच कहाई ॥
ऊँच वही जो नामहि जानें । विना नाम सब नीच कहानें ॥
ना कोउ वर्ण नहीं कोउ भेषा । शब्द सरूपी जैहै देशा ॥
सब मिल भक्ति करो रे भाई । सतगुरु मुखसे यह फरमाई ॥
यह सतगुरुका ज्ञान है भाई । जो कोइलखे सो लोक सिधाई ॥
जात वर्ण हम भाख सुनाई । धर्मदास जगसे कहो जाई ॥
ऐसा तुम जग जान लख वो । सत्तलोकमें जिव पहुँचावो ॥
साखी-यह जग त्रयगुण भक्तमें, धूल परे धर्मदास ॥
नाम गहे विश्वास करि, जाय पुरुषके पास ॥
माना कहा कबारकी, सबको यहै पुकार ।
भरम जाल सब त्यागदे, गहले नाम अपार ॥
सारठा
जिन सब न म आधार विना नाम भव ना तरे ।
जाय काल दर्बार, सत्तपुरुष जो ना गहे ॥
चौपाई
कहै कबीर सुनो धर्मदासा । अब निज भेद कहों तुम पास ॥
अकह हतो पुनि कहा बखानी । उत्पति प्रलय हती मम वाणा ॥
आदि न अंत हती नहि माया । उत्पति प्रलय हती न काया ॥
सोहं ब्रह्म न नहि ओङ्कारा । काल निरंजन नहि औतारा ॥
दश आतारन चौबीस रूपा । तब नहि होता ज्योति स्वरूपा ॥
जब नहि चंद्रलोक दीपविस्तारा । तब नहि सुकृत करचो संसारा ॥
जब नहि लाक चंद्रसूर्य अरुतारा । तब नहि तीनों गुण औतारा ॥
वहां नहीं है दिन अरु राती । ऊच न नीच जात ना पांती ॥
नाही मुख पवन नहि पानी । समरथ गति काहू नहि जानी ॥
आदि ब्रह्म नहि करे पसारा । आप अकह तब हता नियारा ॥
बोधसागर
( २७ )
है अनाम अक्षर के माहीं । निहअक्षर कोइ जानत नाहीं ॥
अमर लोक जहाँ अम्बर काया । अकाल पुरुष जहाँ आपरहाया ॥
धर्मदास जहाँ वाम हमारा । काल अकाल न पावे पारा ॥
निरभय घर बोही है भाई । रोग न व्यापे काल न खाई ॥
समरथ घर हैं पैले पारा । सबके ऊपर है निरधारा ॥
जिनकी गम्य काल नहीं पाई । तीन देवकी कौन चलाई ॥
मन माया काल गति नाहीं । जीव सहाय बसै तेहिं ठाही ॥
ऐसा है वह देश हमारा । जहाँसे हम आये संसारा ॥
ताकी भक्ति करे जो कोई । भवते छूटै जन्म न होई ॥
वहाँ जाय जीव करे विलासा । अमरलोक जिवका नहीं नासा ॥
कहै कबीर सुनो धर्मदासा । आदिनाम मैं कहा तुम पासा ॥
जो कोई माने कहा तु हारा । निरभय जाय पुरुषके द्वारा ॥
मूरख सतगुरु मरम न पावे । भवसागरमें भटका खावे ॥
सार युक्ति मैं तुम्हें लखया । गन मुनि काहू भेद न पाया ॥
भाषा ग्रंथ ज्ञान उपदेशा । तुम अपने घट करो प्रवेशा ॥
सारखी-अस मुख है हमरे घरे, कहैं कबीर समझाय ।
सत्त शब्द तो कोई गहे, अस्थिर बैठे जाय ॥
सोरठा
चौथे पद निरवान, पूरे गुरुसे पाइये ।
कहे कबीर बखान, सत्त मान सतगुरु सही ॥
चौपाई
और सुनो गुरुमु का लेखा । भक्त होय सो करै विवेका ॥
जो कोई पान पम्बाना पावै । ताके निकट काल नहीं जावै ॥
पान परवाना पावै भाई । नाम गहे अरु भरम नशाई ॥
तन मन से गुरु सेवा लाई । गुरुसे देव और नहीं भाई ॥
गुरु से कपट शिष्य जो राखे । जमराजाके सुदगर चाखे ॥
( २८ )
ज्ञानबोध
सोई हंस काल घर जावे । सत् लोकमें वास न पावे ॥
निरभय घर कबहुँ ना पावै । कोट जन्मतिहिकालसतावै ॥
भक्ति कर पूजत हैं जो देवा । निश्चय जाय कालकी सेवा ॥
मनुष्य तन वे कभी न पावै । लख चौरासी भटका खावै ॥
जैसे कर्म करे संसारा । तस भुगते चौरासी धारा ॥
ना गुरु ना निगुरा पंथी । कहा कयो बांचैसे ग्रंथी ॥
साखी-भक्ति करें भरमत फिरे, जग छोड़े नहिं सोय ।
कहैं कबीर धर्मदास से, जिनका तरन न होय ॥
सोरठा
करनी देय वहाय, आदि नाम कह जानके ।
ता महाँ रहै समय, भरम जाल सब छोड़ दे ॥
धर्मदास वचन
चौपाई
धर्मदास तब कहै करजोरी । स्वामी सुनिये विनती मोरी ॥
हो स्वामी मैं बूझो तोहीं । करके कृपा बताइये मोहीं ॥
हो अविनाशी ब्रह्म कहाये । यह जगमें तुम कैसे आये ॥
यह सब भेद बताइय स्वामी । तुम सब घटके अंतर्यामी ॥
सकल चरित तुम मोहि बतावो । मैं जाते जगजीव चितावो ॥
यह जग तब पतियावे साई । चारों जुग तुम कहाँ रहाई ॥
साखी-सो अब मोहि बतावहूँ, तुम गुरु अगम अपार ।
धर्मदास विनती करे, सुनियो हो करतार ॥
कबीर वचन चौपाई
कहै कबीर सुनो धर्मदासा । अब यह भेद कहों तुम पासा ॥
वेद पुराण शास्त्र जग ठाना । भूले जीव न पांय ठिकाना ॥
बोधसागर
( २९ )
तीन लोक जिव काल सतावै । ब्रह्मा विष्णू पार न पावै ॥
सत् पुरुष तब मोहिं पठावा । जीव उबारन मैं जग आवा ॥
यहि कारण आयो संसारा । जगके जीव मैं करों उबारा ॥
जग जीवनको नाम लखावै । पकड़ हंस सतलोक पठावै ॥
हम हैं सतलोकके बासी । दास कहाय प्रगट भये कासी ॥
ना कोइ वर्ण नहीं कोइ भेशा । सत् पुरुषके थे हम देशा ॥
तहैंकी रचना अद्भुत भाई । सो मैंने तोहि पहिले सुनाइ ॥
और तोहि मैं कहूँ समझाई । धर्मदास सुन चित्त लगाई ॥
धरी देह भवसागर आये । धर्मदास तोहि नाम सुनाये ॥
कलियुगमें काशी चल आये । जब हमरे तुम दर्शन पाये ॥
तब हम नाम कबीर धराये । काल देख तब रह सुरझाये ॥
जो कोइ हमको चीन्हा भाई । जिनका काल धोक मिट जाई ॥
देह नहीं अरु दरसै देही । जग ना चीन्हे पुरुष विदेही ॥
नहीं बाप ना माता जाये । अब गतिहीसे हम चल आये ॥
हते विदेह देह धर आये । जग जीवोंके बन्द छुड़ाये ॥
नाम गहे तेहि लोक पठाये । बिना नाम जिव कालहि खाये ॥
गुप्त रहे नाहीं लख पावा । सो मैं जगमें आन चितावा ॥
चारों जुग भवसागर आये । आदि नाम जग ढेर सुनाये ॥
नाम सुने शरणागत आवें । तिनहीकी हम बंद छुडावें ॥
जीव प्रबोध लोक पहुँचावें । काल निरंजन देख डरावें ॥
चारों जगके चारों नामा । माया रहित रहै तिहि ठामा ॥
सतजुग सत् सुकृत कहलाये । त्रेता नाम सुनींद धराये ॥
द्वापरमें करुनामय कहाये । कलियुग नाम कबीर रखाये ॥
आदि नाम चारों जुग ढेरा । सज्जन जीव सुनतही दौरा ॥
जो जो जीव शरणमें आये । तिनको हमने नाम सुनाये ॥
( ३० )
ज्ञानबोध
आदि नाम जो नित गुन गावैं । कर विश्वास अमर पद पावैं ॥
जो कोइ सतगुरु नामको धावैं । तिनको साहब पार लगावैं ॥
पार हाय जो माया त्यागे । जन्म मरनको संशय भागे ॥
माया त्याग वैरागी होई । अजर अमरको पावैं सोई ॥
धर्मदास वचन
कह धर्मदाम सुनो प्रभु राई । भक्त भाव मोहि देव बताई ॥
कबीर वचन
भक्तोंकी यह कथा पसारा । धर्मदास सुनियो चित्त धारा ॥
जगमें भक्त भये अधिकारी । जोगी सन्यासी लट धारी ॥
शीव गोरख अरु बहु ब्रह्मचारी । मायाने सबको ठग डारी ॥
इनको ठग जब हमपर धाई । गुप्त नाम हम टेरे सुनाई ॥
लोट गइ माया बहुवारी । रहे जीत माया गइ हारी ॥
माया जल है कठिण अपारा । तासे गन सुनि बैठे हारा ॥
माया जाल परो मत भाई । धर्मदास जग कहो गुहराई ॥
भवसागर है भक्त बहुतेरा । जिनको तुमसे कहो निबेरा ॥
मौनी भये मुखहु नहिं बोलें । भेष बनाये घर घर डोलें ॥
अंगहि भस्म गले बिच माला । मठिया बैठ सुने मतवाला ॥
धून रमाय गुरिया सरकावे । गगन चढ़ाय के जग भरमावैं ॥
कान फाड़ शिर जटा बढ़ाये । माथे चन्दन तिलक लगाये ॥
वस्त्र रँगा जोगी बन आये । सतगुरु मिले न भेष बनाये ॥
बहुत करें जप तप रे भाई । आदि नाम कोई नहिं पाई ॥
पाहन सेवैं भक्त कहावैं । चन्दन तेल सिंदूर चढ़ावैं ॥
मानुष जन्म बड़े तप होई । नाम बिना झूठे तन खोई ॥
साधु युक्ति अस चाल बताऊँ । धर्मदास मैं तुम्हैं लखाऊँ ॥
काम क्रोध लोभ अहँकारा । सोई साधु जिन इतने मारा ॥
सूखा फीका करे अहारा । निशिदिन सुमरे नाम हमारा ॥
बोधसागर
( ३१ )
तत्त्व प्रकृति और बल माया । इन्हिं जीत तब साधु कहाया ॥
अन्त कपट सब देय बहाई । क्षमा गङ्गमें बैठ नहाई ॥
हार जीत और अभिमाना । इनसों रहित साधुको ज्ञाना ॥
बिहँसत बदन भजनको आगर । शीतल दया प्रेम सुखसागर ॥
सब षट् कर्म छोड़ अज्ञाना । धर ले केवल निर्गुन ध्याना ॥
धन्य धन्य जग साधु है सोई । जिन अपनी दुरमति सब खोई ॥
ऐसी रहन साधुकी भाई । जब हँसा निरभय पद पाई ॥
यह भक्तोंकी कथा सुनाई । निरभय पद कोइ बिरले पाई ॥
साधू लक्षण तुम्हें सुनाया । गन सुनि काहू भेद न पाया ॥
आदि नामको नित गुनगावो । सोवत जागत ना बिसरावो ॥
सत साहिब है सबसे न्यारा । ताहि जपे होवे भव पारा ॥
भक्त अनेक भये जग माहीं । जोग करै पै युक्ति न पाहीं ॥
जोगहि युक्तिनाम बिन नाहीं । झूठी माया आन लगाहीं ॥
नामहि गहै तेहि निहसंसा । नाम बिना बूझे सब हँसा ॥
नाम निरक्षर सुधि जब पावा । काल अपर्बल निकट न आवा ॥
माया त्याग भजो निज नामा । तब जिव जाय पुरुषके धामा ॥
सबसे कहो पुकार पुकारी । कोइ न माने नर अरु नारी ॥
सत्य पुरुषकी युक्ति न पाई । ऊदय धरे नहिं सत्य को भाई ॥
शिव गोरख सोइ पार न पावे । और जीवकी कौन चलावे ॥
कहें कबीर सुनो मम बानी । जोग युक्ति मैं कहों बखानी ॥
अब गेहीका सुनो विचारा । धर्मदास मैं कहों पुकारा ॥
गेही भक्त करे जो कोई । अब मैं तुमसे भाखों सोई ॥
गेही भक्ति सत्त गुरुकी करई । आदि नाम निज हृदसे धरई ॥
गुरु चरनसे ध्यान लगावै । अन्त कपट गुरुसे ना लागै ॥
( ३२ )
ज्ञानबोध
गुरु सेवामें फल सब आवै । गुरु विमुख नर पार न पावै ॥
गुरु वचन निश्चय कर मानै । पूरे गुरुकी सेवा ठानै ॥
विन विश्वास भक्ति परकाशा । प्रीति विना नहिं दुबिधा नाशा ॥
मीन मांस मद निकट न जाई । अंकुर भक्ष सो सदा कराई ॥
गुरुसे शिष्य करे चतुराई । सेवा हीन नर्कमें जाई ॥
परधन पाहन समझे भाई । झूठ वचन हृदये नहिं लाई ॥
पर तिरिया माता सम मानै । झूठ छोड़ सत्यहिको जाने ॥
जीवपै दया करै रे भाई । बुरे कर्म सब देय बिहाई ॥
हृदये दया प्रीति ना होई । सतगुरु सपने मिले न सोई ॥
नाम नेह गुरु सुतै लगावे । आदि नामको पल पल ध्यावे ॥
लेवै पान सुक्ति सहदानी । जाते काल न रोकै आनी ॥
सारखी-पुरुष नाम निशिदिन गहो, शब्द करो परतीत ।
अंक नाम निज पाइया, जाहो भवजल जीत ॥
सोरठा
भर्म तजे यम जाल, सत्तनाम लौ लावई ।
चले संतकी चाल, परमार्थ चित दे गहे ॥
चौपाई
गेही भक्त आरती आने । प्रति पूनोकी आरति ठाने ॥
अमावस आरती नहिं होई । ताहि भवन रह काल समोई ॥
पाख दिवस नहिं होवे साजू । प्रति पूनो कर आरति काजू ॥
पूनो पान लीन्ह धर्मदासा । पावे शिष्य होट सुखबासा ॥
छटे मास नहिं आरति भेवा । साल माह गुरु चौका सेवा ॥
नाम कबीर जपै लौलाई । तुम्हरा नाम कहे गुहराई ॥
ऐसी रहनि गेहि जो धरि है । गुरु प्रताप दोई निस्तरि है ॥
बोधसागर
( ३३ )
साखी-सो भव पार उतारि है, केवटसे कर प्रीत ।
जब सतगुरु केवट मिले, जैहै भव जल जीत ॥
सोरठा-काल जीव धर खाय, सत्तनाम जाने विना ।
बचि है एक उपाय, सत्त कबीर कह भव तरे ॥
चौपाई
सत्त कबीर गुरु धर्मदासा । जीव पठै है पुरुष के पास ॥
सत्त गुरु सत्त कबीरहि आहीं । गुप्त रहे जग चीन्हत नाहीं ॥
सतगुरु आप जगत पग धारे । दासा तन धर शब्द पुकारे ॥
काल निरंजन सब पर छाया । आदि नामका चिह्न भिटया ॥
धर अवतार असुर संहारा । जिव जाने यह धनी हमारा ॥
एही धोख नर्क सब जाहीं । जिव अचेत छल चीन्है नाहीं ॥
नर्क बास नहिं छूटै भाई । जो सतगुरु को चीन्है नाहीं ॥
ब्रह्मा विष्णु शिवसे नहिं देवा । जिन्ह बैकुण्ठवास नहिं देवा ॥
ऐसा काल अपरबल भाई । जिहिके छल जग चीन्है नाई ॥
जगमें जीव घात बहुतेरे । करे घात अरु पाप घनेरे ॥
दुष्ट अन्याई करजिवकी घाता । खेल शिकार माने मन माता ॥
जीव मार तन करत अहारा । जीव दया नहिं करत गँवारा ॥
जीवघाती खो बहुत दुख पावे । जन्मजन्म तिथिकाल सतावे ॥
काग देह धर विष्टा खाहीं । जन्म अनेक भ्रमे जगमाहीं ॥
जीव दया विन मुक्ति न पावैं । मीन मांस मद राक्षस खावैं ॥
धर्मदास यह जग बौराई । दुष्ट जीवकी कथा सुनाई ॥
जीव कष्ट मोहिं सहा न जाई । ज्ञान हीन नर जीव सताई ॥
यहि कारण हम जगमें आये । तीन लोक जम लूटत पाये ॥
पहले लूटे विष्णु सुरारी । फिर लूटे शंकर लटधारी ॥
( ३४ )
ज्ञानबोध
गनमुनि लूटे तपसी झारी । अरु लूटे सगले संसारी ॥
चन्द्र सूर्य तारागण सोई । कहै कबीर बचा नहिं कोई ॥
देखो यही काल की रीती । धर्म न परखो रीति अनीती ॥
ऐसा काल कठिन बरियारा । बचे सोह जो नाम पुकारा ॥
काल रीति मैं तोहिं सुनाई । धर्मदास जिव बोधा जाई ॥
साखी-कहे कबीर धर्मदास सों, तुम सुनियो चितलाय ।
काल भेद ना जानहीं मूरख रहै झुलाय ॥
सोरठा-तजो काल बरयार, जीव दया चितमें करो ।
उतरो भव जल पार, आदि नाम हृदय गहो ॥
सुनो संत मति धीर, कहो ज्ञान परखो हिये ।
काल अपरबल बीर, हृदये विवेकं दृढ ॥
चौपाई
आदि नाम है अजर शरीरा । तनमनसे गह सत्त कबीरा ॥
जोई गहे धर्मदास कबीरा । सो पावे सुख सागर तीरा ॥
काया बीर नाम है धीरू । सब घट रहे सभायक बीरू ॥
निजही शब्द कबीर है सारा । जाका है निज सकल पसारा ॥
एकै रूप शब्द पुर एका । एक भाव दुतिया नहिं देखा ॥
कैसे दुतिया कहिये सोई । दुतिया भर्म मिटै सब कोई ॥
एकहि हम तुम एक शरीरा । एक शब्द है मतिके धीरा ॥
दूसर भाव नहीं है आसा । सोई कबीर सोई धर्मदासा ॥
एक रूप एकै अनुहारी । एकहि पुरुष सकल विस्तारी ॥
आदि नाम मैं भाख सुनाओ । नाम गहे जब मुक्ती पाओ ॥
जो कोइ आदि नामको चीन्हा । तासो काल भयो बलहीना ॥
साखी-आदि नाम है मुक्तिका, जप जाने जो कोय ।
कोटि जाप संसारमें, तासे मुक्ति न होय ॥
बोधसागर
( ३५ )
सोरठा-बूझ लेहु हो हंस, आदि नाम निज सार है ।
अमर होय ते वंश, जिन जानो निज नामको ॥
और मन्त्र सब छार, आदि नाम निज मंत्र है ।
बूढ़ मरा संसार, कह कबीर निजनाम विन ॥
चौपाई
कहे कबीर सुनो धर्मदासु । चार गुरुकी कथा प्रकासु ॥
चार गुरु संसारहि कीन्हों । जिनके हा जिवमुक्ती दीन्हों ॥
वे हंसन को लोक पठाये । भवसागर जिव बहुरि न आये ॥
सार शब्द साहब का न्यारा । सोई शब्द कहैं गुरु उचारा ॥
सार शब्द काल नहिं पाईं । तीन देवकी कौन चलाई ॥
शब्द सङ्ग हंसा घर जाईं । काल अपरबल देख डराईं ॥
सार शब्द मैं तुमको दीन्हा । काल तुम्हारे रहे अधीना ॥
धर्मदास तुम मतिके धीरा । तुमको दीन्हा मुक्तिका वीरा ॥
तुमते जीव उतारि है पारा । सौंप दीन्ह तोहि जगको भारा ॥
सतजुग शिष्यसहतेजी कहाये । द्वापर चतुर्भुज नाम सुनाये ॥
त्रेता शिष्य बंकेजी भाई । कलियुगमें धर्मदास गुसाई ॥
चार गुरु भवसागर माहीं । धर्मदास वे जिव मुक्ताहीं ॥
यह मैं तुमसे कहां समझाईं । सब संशय तुम्हरे भिट जाईं ॥
वंस ब्यालिस तुम्हारे सारा । और सकल सब झूठ पसारा ॥
इनहीं सौंप देव जिव भारा । सब जीवनको करे उबारा ॥
धर्मदास तुम पुरुषके अंशा । अब हमको कछु नाहीं संशा ॥
होय पंथ भव सागर सारा । तुम्हरे वंश सब जीव उबारा ॥
ब्यालिस वंशराजलिख दीन्हों । अटल राज भवसागर कीन्हों ॥
धर्मदास मैं कहां बिचारी । यहि विधि निबहै सब संसारी ॥
साखी-नाम भेद जो जानहीं, सोई वंश हमार ।
नातर दुनिया बहुत है, बूढ़ मरा संसार ॥
( ३६ )
ज्ञानबोध
सोरठा-जैसे भव जल जीत, सार शब्द जो जानहीं ।
कठिन काल विपरीत, नातो जम ले जायगा ॥
धर्मदास वचन
चौपाई
धर्मदास तब विन्ती लाई । अब मैं पंथ करो गुन गाई ॥
अमरलोकके हो गुरु वासी । कारन कौन आये अविनाशी ॥
मृत्युलोक आये कैहि काजा । धर्मराय पापी बड़ राजा ॥
साहब कबीरका वचन
धर्मदाम तुम सुनियो भाई । जीवन काज पुरुष पठवाई ॥
सक्त पुरुष सतलोकके बासी । सकल हंसके लिये अविनाशी ॥
पुरुषदरश कोइ बहुरि न पावै । तीन लोकमें आन रहावै ॥
तीन लोक सब परले होई । अमरलोक सुखदायक सोई ॥
जीवकाज जगमें हम आये । धर्मरायसे जीव छुड़ाये ॥
आदि अनाम अमोल अपारा । अकह अगोचर सबसे न्यारा ॥
तहाँसे हम आये संसारा । पहुँचे काशी नगर मैझारा ॥
सत्त सत्त हम करें पुकारा । भवसागरके जीव उबारा ॥
नाम सुने जो मो लग धाये । जिनको हमने पार लगाये ॥
समझे सुने जो वाचा मेरी । काटूँ ताकी कर्मकी बेरी ॥
भगकी राह नहीं हम आये । जन्म मरन ना बहुरि समाये ॥
त्रिगुण पांच ताव हम नाही । इच्छारूप देह हम आहीं ॥
साखी-पांच तत्त्व गुन तीन नहीं, तामें सकल शरीर ।
सब कोइ हृदये चीन्हियो, सतगुरु पुरुष कबीर ॥
चौपाई
हम जमके शिर मर्दन द्वारा । जो कोइ गहे सो उतरे पारा ॥
जहाँ हम रहें काल तहाँ नाही । हंसन हम सुखदायक आहीं ॥
बोधसागर
( ३७ )
जो साहब सतलोक रहाई । तिनको सब कोई चीन्हौ भाई॥
नाम बिना दुखि तीनों देवा । जिनकी गन गंधर्व करें सेवा ॥
जगके देव सब काल अधीना । बचे सोई जो नामको चीन्हा ॥
हम बल एक शब्दका भाई । ताही बल हंसा सुत्काई ॥
जहाँ नाम काल गति नाही । बिना नाम है कालकी छाई ॥
ज्ञान हीन जाने नहीं भाई । जीव कै सँग मन काल रहाई ॥
जीव के संग कालको वासा । अज्ञानी जन गहे विश्वासा ॥
मनको कहो न कीजे कोई । मन जिवको भरमावे सोई ॥
कहे कबीर मन जात गँवारी । मनको कहो न करो नर नारी ॥
मनको कहो जो कर है भाई । भवसागरमें देय बहाई ॥
मन चंचल सो काल है भाई । मनको त्यागे निरमल हो जाई ॥
मनके रूप समानी माया । सब संसार व्याप्त यह छाया ॥
मन थिरकर परमात्म जाना । यहि विधितत्त्वलेय पहिचाना ॥
काल जाल ते तेही छूटे । काल विचारा ताहि न लूटे ॥
यही भेद धर्म सुन लीजे । शब्द माहि तुम बासा कीजे ॥
काल ज्ञान संसार बखाना । काल स्वरूप नहीं पहिचाना ॥
काल चरित्र तुमसे कहो भाई । यही भेद कोई नहीं पाई ॥
काया माया झूठी जानो । झूठा सकल पसारा मानो ॥
झूठो नाम साहबको नाही । बूझ लेव अपने हिय माहीं ॥
साखी-काल पाय जग ऊपजो, काल पाय सब धाय ।
कालपाय सब विनसही, काल काल कह खाय ॥
सोरठा-धर्मदास लेव जान, मुन्य सुरूपी मनहि है ।
वचन कबीर प्रमान, रूप रेख मनको नहीं ॥
चौपाई
परम पुरुष नाम गहो भाई । ताते हंसा लोक सिधाई ॥
आदि नाम है जिव रखवारा । उनको सब कोई करो पुकारा ॥
( ३८ )
ज्ञानबोध
अमर लोक साहबका न्यारा । जहाँ पुरुष का है दरबारा ॥
आदि पुरुष जहाँ आप अकेला । धर्मराय नहि मन के मेला ॥
अंधकार जहाँ कबहुँ न होई । सदा जोति अमरापुर सोई ॥
आदि पुरुष जहाँ काल न जाई । तीन देव की कौन चलाई ॥
आदि नाम जो ध्यान लगाई । तब हँसा सत लोकहि पाई ॥
ऐसा लोक साहबका भाई । जहाँ हँसा सुख सदा रहाई ॥
तादि लोकमें जो कोइ जावे । भवसागरमें बहुरि न आवे ॥
धर्म राय से तिन का टूटे । जन्म मरण को संशय छूटे ॥
बिरले जीव निःसंशय होई । दृढ़ परतीत नाम गहँ सोई ॥
अगम भेद मैं तुम्हें बताया । काल निरञ्जन गम्य न पाया ॥
जगके जीव प्रबोधो भाई । पुरुष शरण जब हँसा जाई ॥
जीवहि बोधो सब संसारा । पकड़ हँस फँको पैले पारा ॥
भवसागरसे जीव उबारो । जन्म मरण जिव संशय टारो ॥
जीव मुक्त मैं तुमको दीन्हा । पुरुष भक्ति है नामको चीन्हा ॥
सार युक्ति मैं तुमसे कहिया । कहन सुननको अब नहिं रहिया ॥
धर्मदास वचन-चौपाई
धर्मदास विनवे कर जोरी । सतगुरु सुनिये विनती मोरी ॥
निरगुन नाम लखे नहिं कोई । सरगुनमें जग भरमें सोई ॥
अज्ञानी जिव कहा न माने । आदि नामको भेद न जाने ॥
यह सब भेद कहो प्रभुराई । कैसे जीव प्रबोधों जाई ॥
साहिव कबीर वचन-चौपाई
कहैं कबीर सुनो धर्मदासा । अब मैं भेद कहाँ तुम पासा ॥
सज्जन जन जो होवे भाई । तुम्हरे शरन दौरके आई ॥
तन मन तुमसे ध्यान लगाई । ताको नाम सुनइयो भाई ॥
जब देखहु तुम दृढ़ता ज्ञाना । तबही देव पान परवाना ॥
बोधसागर
( ३९ )
निरभय ज्ञान कहो जिवपासा । जो कोह होय तुम्हारा दासा ॥
मूरखके तुम पास न जइयो । बचन हमारो हियमें गहियो ॥
मूरख ज्ञान कहो मत भाई । नाहक ज्ञान गांठको जाई ॥
डुरमति मन जाही कर भाई । तासे राखो भेद छिपाई ॥
ज्ञानी जनको नाम सुनावो । परम पुरुषसों हृदय चिन्हाओ ॥
साखी-मूरखसे ना खोलिहौ कहैं कबीर विचार ।
ज्ञानीसे न डुरायहौ, सुनो सत् मतसार ॥
चौपाई
अलख नाम घट भीतर देखो । हृदये माहीं करो विवेको ॥
घट घट राम बसे हैं भाई । विना ज्ञान नहिं देत दिखाई ॥
अतुभव ज्ञान प्रगट जब होई । आतमराम चीन्ह है सोई ॥
आतमराम चीन्ह जब पावा । सकल पसारा मेट बहावा ॥
हिये नयनसे देखो भाई । जब तुमको वह राम दिखाई ॥
सब घट व्यापक सबसे न्यारा । सोई राम है जीव मँझारा ॥
अकह नाम कहा नहिं जाई । घट घट व्याप्त निरंतर आई ॥
आतमराम देख जिव पाई । आप आप सब ठांव समाई ॥
जहाँ देखा तहाँ आप समाना । ब्रह्म छोड़ दूसर नहिं आना ॥
यही मता हम तुमकह दीन्हा । दूसर कोउ न पावै चीन्हा ॥
ऐसा ज्ञान लखाओ भाई । जो नहिं मानकाल तिहिं खाई ॥
साखी-अजर पुरुष एकै रहै, अजर लोक अस्थान ।
कहे कबीर सर्वांग जो, ताहि पुरुषको जान ॥
सोरठा-सुनहु ज्ञानी धर्मदास, सोइ ज्ञान जप ऊपजै ।
एक नाम विश्वास, प्रगट ब्रह्म स्वरूप है ॥
चौपाई
आदि नाम जो राखे आसा । तापै परे न कालकी फाँसा ॥
आदि नाम निरअक्षर भाई । ताहि नाम ले लोकहि जाई ॥
( ४० )
ज्ञानबोध
सोहँ शब्द निरक्षर वासा । ताहि शब्द जपहै निज दासा ॥
आदि नाम निज सार है भाई । जमराजा तेहि निकट न आई ॥
तुम कहँ शब्द दीन्ह टकसारा । सो हंसन सो कहौ पुकारा ॥
सार शब्दका सुमरण करि है । सहज अमर लोक निस्तारि है ॥
सुमरन का बल ऐसा होई । कर्म काट सब पलमें खोई ॥
जाके कर्म काट सब डारा । दिव्य ज्ञान सहजै उजियारा ॥
जाकहँ दिव्य ज्ञान परकाशा । आपहिमें सब लोग निवासा ॥
लोक अलोक शब्द है भाई । जिन जाना तिन संशय जाई ॥
तत्व सार सुमरन है भाई । जातै कालकी तपन बुझाई ॥
सुमरनते सब कर्म विनाशा । सुमरनसों दिव्य ज्ञान प्रकाशा ॥
धर्मन सुमरन दयो लखाई । जासों हंस सबै मुक्ताई ॥
सारखी-कहे कबीर विचारके, सुमरन सार बखान ।
कहै भेद जो पावहीं, पहुँचे लोक ठिकान ॥
धर्मदास-वचन चौपाई
कहँ धर्मदास सुनों प्रभुराई । अब जिवको सन्देह मिटाई ॥
अलख अगोचर हो प्रभु मेरा । अब जीवन को करें उबेरा ॥
आदि ब्रह्म तुम अगम अपारा । जीव काज आये करतारा ॥
आदि नाम गुरु मोहिँ लखाये । जीवनके तुम बंद छुड़ाये ॥
अजर लोकमें जिव पहुँचाये । धन्य भाग हम दर्शन पाये ॥
अमर वस्तु सतगुरु मोहिँ दीन्ह। जीवनके सब दुखहर लीन्ह ॥
सतगुरु चरण गहँ हिय माहीं । भानु उदय पंकज बिगसाहीं ॥
सतगुरुने मोहिँ लीन्ह जगाई । आवागमन रहित घर पाई ॥
अब सन्देह रहा कछु नाहीं । शब्द तुम्हार बसो हियमाहीं ॥
सोरठा-दीन्हों मोहिँ लखाय, परमात्म आत्म सकल ।
अलख नाम समुझाय, अमर वस्तु गुरु दीन्हऊ ॥
बोधसागर
( ४१ )
साहब कबीर बचन-चौपाई
ज्ञान उपदेश कहा मैं भाई । ताते जीव हिय ज्ञान समाई ॥
यही ग्रंथ मैं नाम नियारा । सूक्ष्म रीति से कहो पुकारा ॥
आदि नाम जाने संसारा । करे भक्ति पहुँचे दरबारा ॥
पढ़े सन्त होवै मति धीरा । आदि नाम गहै अन्न शरीरा ॥
आदि नाम है सत् कबीरा । जो जन गहे छूटे भव पीरा ॥
आदि नाम पहिचाने भाई । तब हंसा निज घरही जाई ॥
ज्ञान उपदेश कहा गुरु पूरा । नाम गहे चेला कोई सूरा ॥
साधु सन्तसों बिनती मोरी । नाम भूले अक्षर लीजो जोरी ॥
इति श्रीग्रन्थज्ञानबोध समाप्त
भवतारणबोध (चतुर्दश तरंग)
सत्यपुरुषाय नमः
अथ श्रीबोधसागरे
चतुर्दशस्तरंगः
ग्रन्थ भवतारणबोध
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धर्मदास वचन-चौपाई
धर्मदास बिनवै कर जोरी । सद्गुरु सुनिये विनती मोरी ॥
भवसागर कवनहिं विधि छूटे । यमबंधन कवनहिं विधि टूटे ॥
भव दरियाका वार न पारा । ता मई अँटके सब संसारा ॥
सो दरियाव कौन विधि थाहूँ । परम पुरुषको कैसे पाहूँ ॥
करों भक्तिके योग कमावों । देओं दानके तीर्थ नहावों ॥
करों यज्ञ के इन्द्री साधों । बाहर फिरों के मतको बांधों ॥
जो तुम कहो मैं करिहों । वचन तुम्हारे हृदये धरिहों ॥
भवसागर दुख मेटो मोरा । दूटै जन्म मरनको ठौरा ॥
संशय रहित करहु मोहिं स्वामी । तुम सब घटके अन्तर्यामी ॥
सद्गुरु वचन
सुन धर्मदास मैं सत्य बताऊँ । भवसागरका भरम मिटाऊँ ॥
संशय रहित सदा तुम होऊँ । तुम्हरी राह न रोकै कोऊ ॥
करो भक्ति औ बंधन काटो । जन्म मरणका संशय पाटो ॥
भाव भक्ति करिये चित लाई । सेवहु साधु तजि मान बढ़ाई ॥
सुन धर्मदास भक्तिपद ऊचा । इन सीढ़ी कोई नहिं पहुँचा ॥
योगी योगसाधना करई । भवसागरते नाहीं तरई ॥
दान देय सोई फल पावे । भवसागर भुक्तनको आवे ॥
तीर्थ नहाये जो कछु होहीं । सो सब भाषा सुनाऊँ तोहीं ॥