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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

( २४० )

अमरमूल

धर्म न चल न गुरुकहँ मानै । अपने मन महाँ ज्ञान बखानै ॥
जो गुरु मिलै तौ ज्ञान लखावै । बहुरि न योनि संकट आवै ॥
एक नाम को करै नवेरा । चारों वर्ण तासु के चेरा ॥
एक धर्म कहँ बिनवै प्रानी । चार वर्ण साधन कहँ जानी ॥
साधुन की सेवा नहिं करई । बहु अभिमान हिये में धरई ॥

सारखी-भक्त रूप चीन्हत नहीं, चाल चले कहु आन ।
क्षत्री गण अभिमानमें कहैं कबीर निदान ॥

चौपाई

तातैं परसराम औतारा । उन क्षत्रिनको कीन्ह सँहारा ॥
बारन बूढ़न के भए काला । क्षत्री मार विप्र प्रतिपाला ॥
मूर्ख लोग सब करै बखाना । सत्यभक्ति परचित नहिं आना ॥
कोटिन हत्या क्षत्री करई । तिनकी लोग बढ़ाई धरई ॥
क्षत्री धर्म को होय निवाहा । तौ नहिं छोड़ै कालको चाहा ॥
धर्मराय तिन करै सँहारा । जारे वार करै जर छारा ॥
क्षत्री सोइ क्षमा जिहिं आवै । परजा दुखी आप दुख पावै ॥
वैश्य धर्म अब वेद बखानै । विष्णु जान मन और न कानै ॥
भूखा देख दया चित धरई । वैश्य धर्म व्यवहारहिं करई ॥
तीरथ व्रत करै विधि नाना । प्रभुकी भक्ति नहीं चित आना ॥
जेनी जीव करे प्रतिपाला । जैननामगत आहिं रिशाला ॥
पानी छान पिये दिन राती । नहिं ज्योनार करै निशिपांती ॥
हरिप्रतीत मन माहिन आनै । सूखे काठ सों मन चितठानै ॥
भक्ति रूप न्यारो धर्मदासू । जासों मिटै कालकी फांसू ॥
जीव श्वास ना धर्म चलावै । नाटक चेटक ज्ञान बतावै ॥
लिंग पूजावै घर घर जाई । कामिनि सों बहु प्रेम बढ़ाई ॥
कामिनी काम न चितसों छूटे । यहि विधि घर यम निशिदिन लूटे ॥

बाधसागर

( २४१ )

जप तप माया कीन्ह खुआरा । ऐसे जीव अटक यमद्वारा ॥
पारसनाथ पूजा मन लाई । बहुत भाँति सों पूजहि जाई ॥
पारसनाथ परम गुरु ज्ञानी । ताकी नहिं पावैं सहदानी ॥
ताके कर्म काट सब जाई । सतगुरु चरण रहै लवलार्ई ॥
जब सतगुरु की दाया होई । अक्षर भेद पाय नहिं सोई ॥
ब्राह्मण क्षत्री वैश्य बखाना । अक्षर भेद नहीं पहिचाना ॥

साखी—अक्षर भेद जानैं नहीं, करे बहुत अभिमान ।
वैश्य सबै वे नष्ट हैं, सत्य वचन परमान ॥

चौपाई

चार वर्णमें शूद्र अधीना । सेवा कर सबसों लवलीना ॥
इतनी भक्ति सतगुरु की पाई । चार वर्णमहैं सो अधिकाई ॥
ब्राह्मणकी सेवा अनुसारे । काम कोध औ लोभ निवारै ॥
क्षत्री सों बहु करै मितार्ई । नित नये प्रेमसहित अधिकाई ॥
वैश्य धर्मही विधि कर पूजे । सत्य धर्म दाया चित कीजे ॥
ऐसे शूद्रहि ब्रह्म बखाना । ब्रह्मलोक में सेवा माना ॥
कलियुग शूद्र धर्म अधिकारा । तीन धर्म को भयो सँहारा ॥
धन्य शूद्र जो सेवा करई । गुरुके चरण हृदय महैं धरई ॥

साखी—यह तौ करनी शूद्रकी, सुनियो हो धर्मदास ।
सतगुरुके चरण जो सेवई, सत्य लोक महैं वास ॥

चौपाई

धर्मदास तुम शूद्र औतारा । जाते सतगुरु भक्ति चित धारा ॥
तुम्हरे पीछे ब्राह्मण तरि हैं । तुम्हरे पीछे क्षत्रि उबरि हैं ॥
चारों वर्ण मुक्ति घर जैहैं । जो तुम्हरो चरणोदक लैहैं ॥
कबहैं न जल आवैं तेई । मुक्ति पदार्थ पावैं जेई ॥

नं. ७ कबीरसागर - ९

( २४२ )

अमरसूल

साखी—जो प्राणी जन्मत भये, शूद्र सकल संसार ।
कह कबीर जब बाचि हैं, करिहैं ब्रह्म विचार ॥

चौपाई

यह तुम सुनहु वर्णनका लेखा । मुक्ति भेद करहु विवेका ॥
तुम्हरे शिष्य शब्द जो पावैं । बिना शब्द नहिं शिष्य कहावैं ॥
शब्द भेद जो पावैं अंगा । ताको काल नहीं परसंगा ॥
बिन अक्षर सबकहैं दुख होई । येही विधि सब जाय बिगोई ॥
और सकल यमको द्वारा । तिनको धर्मराय जो मारा ॥

धर्मदास वचन

धर्मदास विन्ती कर जोरी । स्वामी सुनियो विनती मोरी ॥
तुम्ही दयाल हो अन्तर्यामी । करहु कृपा अब मोपर स्वामी ॥
तुम्हरे वचन मुक्ति हम पाई । हमरे वंश कस मुक्ति न आई ॥

सद्गुरु वचन

तब कबीर जो कहिबे लीन्हा । अब मैं कहौं वंशकर चीन्हा ॥
जिहि विधि मुक्ति होय रे भाई । सब अब तुम्हैं कहौं ससुझाई ॥
प्रथमहि विधि वंश ज्ञान मन लावै । सहज समाधि परम पद पावै ॥
निमोही हो जगसों रहई । मोह प्रीति मन हर्ष न करई ॥
जो मानै तौ अति भल जाना । नहिं मानै तौ समता ज्ञाना ॥
जो कोइ नाम कबीरहि लेही । तिनसो कछु न अन्तर देही ॥
आपा छोड़ नाम लव लावै । देह छोड़ सतलोक सिधावै ॥
जो मनमें करि है अहँकारा । निश्चय बूझै सब परिवारा ॥
सत्य भक्ति सत्यही मन लावै । आप तरे जीवन मुक्तावै ॥
जो कोई माया आन चढ़ाई । साधुन कहैं सब देय खवाई ॥
सत्य वचन सबही सों भाषै । सत्यनाम मनमें अभिलाषै ॥
कबहुँ न क्रोध कर मनमांही । जो बोले सो नामकी छांही ॥

बोधसागर

( २४३ )

ज्ञान विचारै शब्द सुनावै । सब जीवन कहैं लोक पठावै ॥
तुम्हरे वंश जो आगे होई । तिनके गर्व बहुत मन सोई ॥
गर्वके किये भक्ति नहिं होई । बिना भक्ति सब जाँय विगोई ॥
सात पिढ़ी लग गर्व गुमाना । आठै पिढ़ी भक्ति परवाना ॥
पावै सार शब्द परवाना । तब पुनि पावै लोक ठिकाना ॥
सात बाल जो तुम्हरे होई । तब लग रहै अभिमान समोई ॥
शब्द पेल कै करहिं धिगाई । पंथहिं मेट अपंथ चलाई ॥
आठे वंश तबै औतारा । तिनसों होय पन्थ उजियारा ॥
वे गुरु आय करै संसारा । तीन लोकमहैं बास पसारा ॥
स्वर्ग माहि नामी जिहि आही । धर्मराय तिनकी सुधि पाहीं ॥
तब अपना वह दूत पठाहीं । बहुतक छल करहै तिनपाहीं ॥
सार शब्द सों निकट न जाई । भागे दूत रहै पछताई ॥
वंश तुम्हार केर यह लेखा । बिना नाम नहिं होय विवेका ॥
जा कहैं अमर नाम मिलगयऊ । सो प्राणी निहसंशय भयऊ ॥
अमरशब्द जो घट परकाशा । तहैंवा है हमरौ निज वासा ॥

छन्द—जो अमरनाम न पाय है, सो अध है पछताय ।
जन्म जन्मत कष्ट बहुतक, जरा मरन समाय हो ॥
हंस वंशन हंस पंगत, कही सब दरसायके ।
यह रहन रहै सो लोक पहुँचै, कहै कबीर समझायके ॥

सोरठा—दीन्ह जकत को राज, धर्मन तुम्हरे वंश कहैं ।
करेहि जीव को काज, सत्यनाम समझायके ॥

इति श्रीग्रंथ अमरमूल चारवर्णवर्णन वंशमहिमावर्णन

( २४४ )

अमरमूल

सप्तमविश्राम

धर्मदास बचन चौपाई

धर्मदास कहे कर जोरी । स्वामी सुनये विन्ती मोरी ॥
जो तुम कही सोई परवाना । गुरुके वचन सत्य हम जाना ॥
हम जानी पुरुष रु गुरु माहीं । तुमहिं पुरुष कुछ अंतर नाही ॥
हमरे दिल यह पारख आई । तुम्हरी दया हंस मुक्ताई ॥
हमरे बालक तुम्हरे पाछे । तुम्हरी दया नाम मिल आछे ॥

सद्गुरु वचन

तब साहिब अस कहि समुझाई । वंश तुम्हार मुक्ति घर जाई ॥
जो कोइ बालक होय तुम्हारा । तिनसों भक्ति होय उजियारा ॥
पंथ माहिं जे बालक आवैं । ते तुम वंशन माथ नवावैं ॥
तिनसों भक्ति मर्यादा होई । सार शब्द चलि है निज सोई ॥
नाँद केरि बालक जो होई । तिनको मुक्ति नाम सो सोई ॥
नाँदके बालक शब्दहि जाना । भवसागर तज लोक पयाना ॥
विन्दके बाल रहैं अरुझाई । मान गुमान और प्रभुताई ॥
सत्य शब्द जिहि बालक जानी । सोई पावैं लोक सहिदानी ॥
जेहो बाल प्रवाना पावा । तिन कहैं जानहु वंश स्वभावा ॥

साखी-हमरे बालक नामके, और सकल सब झूठ ।

सत्य शब्द कहैं जानही, काल गहे नहिं खूंट ॥

चौपाई

धर्मदास सुन शब्द पसारा । बिना शब्द नहिं उतरहि पारा ॥
बिना शब्द तुम मुक्ति न पाओ । केतो ज्ञान गम्य फैलाओ ॥
वंश हमार शब्द निज जाना । बिना शब्द नहि वंशहि माना ॥
धर्मदास निर्मोह हिय गेहू । वंशकी चिन्ता छांड़ तुम देहू ॥
तुम तो भयऊ शब्द समाना । यही बचन तुम चित नहिं आना ॥

बोधसागर

( २४६ )

तुमहि कही अस बस्तु गुसाईं । मैं बूझों यह संशय जाईं ॥
तुम्हरी दया आज जो पाऊं । तौ सब बालक लोक पठाऊं ॥

सद्गुरु वचन

तब साहिब अस कहि समुझाईं । बिना नाम नहीं लोक पठाईं ॥
नाँद बिन्दकै बालक दोईं । बिना नाम कोई मुक्ति न होईं ॥
के तौ पढ़ै गुणै औ गावै । बिना नाम भव भटका खावै ॥
हमरे माया मोह न होईं । सब संसार सत्य कर सोईं ॥
धर्मदास तुम बड़े हो ज्ञानी । यह संशय कस मन मँहै आनी ॥
गुरु को भार सबन कर होईं । तुम मनमें पछताव न कोई ॥
तारन तरन सत्य हम सोईं । बिन सतगुरु बूझा सब कोई ॥
सतगुरु तौ सब सृष्टि उबारा । तुम बालक अब कौन है भारा ॥
तुम जिन चिन्तामन मँहै करहूँ । सद्गुरु नाम हृदय मँहै धरहूँ ॥
एक काल आवे जब भाईं । सबै सृष्टि यह लोक सिधाईं ॥
जहाँ लग जीव जन्तु सब कहिये । तहाँ लग सब सद्गुरु मँहै लहिये ॥
सबै भार सद्गुरुके काँधे । पार लगावहि यम नहीं बाँधे ॥
यमका अमल छूट जब जाईं । सद्गुरु शरण जीव जब आईं ॥

साखी—कहे कबीर बिचारकै, सुनियो हो धर्मदास ।

अमरमूल जो जान है, ताको सब परकाश ॥

धर्मदास वचन—चौपाई

धर्मदास बिनवै कर जोरी । स्वामी सुनिये बिनती मोरी ॥
तुम्हरे कहे जगत तर जाईं । कौन मतासों लोक सिधाईं ॥
ज्ञान दिव्य जो घट नहीं होईं । सोइ कवन बिधि लोकसमोईं ॥
तब मैं जानो ज्ञान तुम्हारा । सकल सृष्टिको होय उबारा ॥

( २४६ )

अमरमूल

कहै कबीर तबै समुझाई । यह संशय तुम कवन कराई ॥
तुम तो आपन हंस उबारो । जीवन शोच कहा निर्धारी ॥
सतगुरु लीन्ह जगतको भारा । तेई करि है सृष्टि उबारा ॥
जापर गुरु चितवैं चितलाई । ताकर हंस बिगोय न जाई ॥
जब यह सृष्टि कीन्ह परकाशा । हंस अनंत सतलोक निवासा ॥
अबहुँ अनंत लोक कहैं जाई । सत्यलोक महाँ जाय समाई ॥
तुमको संशय कछु न भाई । आपन हंस करौ मुक्तार्ई ॥

साखी—सतगुरु तारनहार हैं, कहैं कबीर बिचार ।
तुम क्या शंका करत हो, आपन करौ उबार ॥

धर्मदास वचन—चौपाई

धर्मदास विनवै कर जोरी । बिनती साहिब सुनिये मोरी ॥
तुम शिर आहि जत्तको भारा । सब जीवन को करौ उबारा ॥
हमको नाहिं गुरुवाई दीजे । आपन भार आप शिर लीजे ॥

सद्गुरु वचन

तब सतगुरु अस वचन उचारा । तुम कहैं दीन्ह जत्तको भारा ॥
तुम्हरे मुहर चले संसारा । अक्षर अक्षर करै पुकारा ॥
तुम्हरे कहे खोज जो करई । अक्षर पाय हंस निस्तरई ॥
जो नहिं मानै कहा तुम्हारा । सो चल जैहैं यमके द्वारा ॥
धर्मदास बिनती अनुसारि । हे सतगुरु तुम्हरी बलिहारी ॥
तुम तो सत्य लोकके वासी । किहिं कारन आये अविनासी ॥
मृत्यु लोक मैं कवनै काजा । धर्मराय बड़ पापी राजा ॥
तहैंवां कवन काज पगुधारा । सो मोहिं स्वामी कहौ बिचारा ॥
तुम साहब सत पुरुष कहाए । मृत्यु लोक में काहे आए ॥

बोधसागर

( २४७ )

सद्गुरु वचन

तब साहिब बोले बिहसाई । अब यह ज्ञान सुनौ मन लाई॥
जब नहिं हते शून्य बे शून्या । तब नहिं हते पाप औ पुन्या॥
तब नहिं धरती गगन अकाशा । मेरे मन्दर नाहीं कैलाशा ॥
तब नहिं चन्द्र सूर्य औतारा । तब नहिं शेष सकलविस्तारा॥
तब नहिं इन्द्र कुबेर समोई । वायु वरुण तहैंवां नहिं कोई ॥
सात वार पन्द्रह तिथि नाहीं । आदि अंत नहिं कालकी छाहीं॥
तब नहिं ब्रह्मा विष्णु महेशा । आदि भवानी गौरि गणेशा॥
आदि पुरुष तब हते अकेला । उनके संग हता नहिं चेला ॥
आप पुरुष अस कीन्हौ साजा । शब्दहि माहि लोक उपराजा॥
प्रथमहि शब्द सुरत अनुसारा । तेहि पीछे सब द्रौप सवौरा ॥
तेहि पीछे पुन मूल बनावा । तेहि पीछे सोहं उपजावा ॥
ता पीछे अचिन्त जो कीन्हा । ते पीछे अक्षर रच लीन्हा ॥
ता पीछे कूर्महि निर्मयऊ । ताहि भार पृथ्वीको दयऊ ॥
तब जल रंग सूरत इस भाखा । सप्त पातालके नीचे राखा ॥
जिह्वितै भयो जलको विस्तारा । सकल सृष्टि कौ भयो पसारा॥
तिहि तैं तेज तत्त्व अनुसार । जेहिं गुण तैं काल औतारा ॥
पांच तत्त्वतैं सब निर्मावा । तीनों गुण तिहि माहि समावा॥
तीनों गुण स्वरूपके धामा । ब्रह्मा विष्णु महेश्वर नामा ॥
रज गुण तैं ब्रह्मा उत्पानी । सतगुरु भाव विष्णु कर जानी॥
तमगुण शिव संहार पसारा । इतने भयो सकल संसारा ॥
तेजके गुणहि काल उत्पानी । तासों भये जीव दुखदानी ॥
तातैं पुरुष दया चित आई । हंसन कारण मोहिं पठाई ॥
यातैं मृत्यु लोकहि आए । धर्मदास तुम दर्शन पाए ॥
तुम जीवनकैं बन्द बुझाये । सुमरन सत्य नाम समुझाये ॥

( २४८ )

अमरमूल

तुम्हरे हाथ सृष्टि तरजाई । सार शब्द हम तुम्हें लखाई ॥
या कारण संसारहिं आये । नाम पान सों हंस बचाये ॥
जो तुम कहौ कहा अस कीन्हा । आज्ञा मान पुरुषकी लीना ॥
पुरुष शब्द ते जीव उबारा । तुम कहैं कवन बात कर भारा ॥
यह चरित्र कछु कहा न जाई । अचरज खेल पुरुष निर्माई ॥
आपहि पुरुष आपही काला । आपहि काल कीन्ह बे हाला ॥
आपहि सकल सृष्टि निर्माई । आपहि न्याय करै सब कोई ॥
आपहि कर्म कुकर्म बखानै । आपहि आपन आप पहिचानै ॥
यही ज्ञान धर्मन सुन लेहू । इत उन चित जप मत देहू ॥
जिमि बालक मंदिरहिं सवोंरा । आपहि भेट आपहि हारा ॥
माता सों तब रुदन कराई । मंदिर अब मम देहु बनाई ॥
एही खेल बिधाता कीन्हा । यही मता कोई बिरिले चीन्हा ॥
धर्मदास तुम सत्यहिं मानौ । हमरौ बचन झूठ जिन जानौ ॥
यह चरित्र मैं तुम्हें सुनावा । लीला पुरुष केर समुझावा ॥
आपहि पुरुष आपहि नारी । आपहि काम विषय अधिकारी ॥
आपहि सृष्टि कीन्ह उतपानी । आपहि कर्म धर्म लपटानी ॥
कर्म भर्म आपहि उपजाई । आपहि स्तुति कीन्ह बड़ाई ॥
आपहि निंदक आपहि ज्ञानी । आपहि धर्म अधर्म बखानी ॥
आपहि अपनी स्तुति करई । आपहि मूर्ख चतुरता धरई ॥
आप कुलीन आपहि अकुलीना । आप धनाढ्य आपही दीना ॥
सतकुल आपहि असत बनाया । आपहि सत्य असत्य समाया ॥
यह तौ भेद पाय है सोई । सतगुरु मिले जाहि कहिं होई ॥
येही भेद धर्मनि लेव जानी । निर्मल जलगंगा सम मानी ॥
यहै ज्ञान मैं तुम्हें सुनावा । बिरला जन बूझै यह भावा ॥
यही बात गुप्त तुम राखहु । हमरी बात अंत जिन भाखहु ॥

बोधसागर

( २४९ )

जो कोई शब्दका खोजी होई । ता कहँ भेद बतावहु सोई ॥
इक मन इक चिन जाकर होई । ना कह ज्ञान न भापहु सोई ॥
दुतिया मन जाही कर भाई । तासों राखो भेद छिपाई ॥
जो गुरु सों कोई अन्तर राखा । धर्मराय सुगदर सोइ चाखा ॥

साखी-गुरुकी महिमा अगम है, अकह कही नहिं जाय ।

गुरु पद रज हियमें धरै, सत्यलोक कहँ जाय ॥

चौपाई

सत्यलोक सतगुरुकौ बासा । ब्रह्म कीन्ह गुरु मांहि निवासा ॥
गुरुके चरण रहै लवलार्ई । ताकी महिमा वर्णि न जाई ॥
गुरु औ शब्द एक कर जाना । ताकी त्रास धर्म भय माना ॥
जो कोई यह भेद न जानै । धर्मराय ता कहँ सन्मानै ॥
आतम ज्ञान जाहि कहँ होई । ताकौ काल न चापै कोई ॥
ऐसी धरण धरौ धर्मदासू । भवसागर तैं होउ उदासू ॥
सकल पसारा शून्य समाना । शून्यहि माहीं शब्द बखाना ॥
शून्य शिखरकी डोरी पावै । देह छोड़ सतलोक सिधावै ॥

धर्मदास वचन

धर्मदास कह सुनौ गुसाई । आतम ज्ञान गम्य नहिं पाई ॥
आतम ज्ञान मोहि समुझाऊ । जासों सकल हंस मुक्ताऊ ॥

सद्गुरु वचन

धर्मदास यह मता अपारा । ताकर जो मैं कहौ विचारा ॥
तब साहिब दया चितलाई । आतम ज्ञान तुम्हैं समुझाई ॥
गम्य अगम्य ज्ञान जब पावे । आतम ज्ञान तब घटहि समावे ॥
सत्य शब्द जब रहै समाई । सबही ठाम लोक है भाई ॥
शत्रु मित्र एकहि कर जाना । सांच झूठ एकहि कर माना ॥
सांच झूठ दोनों मिट गयऊ । दिव्य ज्ञान जाके घट भयऊ ॥

( २५० )

अमरमूल

आपहि गुरु आपही शिष्या । आपहि पाय आपही दिरुखा ॥
आपहि आप लगावे लेखा । आपहि न्यापे अगम अलेखा ॥
आपहि स्वर्ग नर्क भर्मावै । आप ज्ञानि हिय मुक्ति समावै ॥
आपहि दाता आपहि भुक्ता । आपहि अकृत आपही कृत्ता ॥
आपहि जन्म मरण उपजावै । आप मृत्यु है लोग रुवावै ॥
आपहि जिन्दा जग उपजावा । आपहि आशा तृष्णा लावा ॥
आपहि आप धर्म है काला । दोहू दीन ज्ञान तब चाला ॥
आपहि कुलअरु आपहि जाती । आपहि मूरत, आपहि पाती ॥
आपहि डाल आपही बेला । आपहि गुरु आपही चेला ॥

सार्वी-कहैं कबीर विचारके, आपहि सकल पसार ।
आप आप महँ रम रहै, आपहि सत्य अधार ॥

धर्मदास वचन-चौपाई

धर्मदास कहैं सुनौ गुसाई । यहै भेद तुम मोहि सुनाई ॥
ऐसा शब्द जो मोहि सुनावा । जन्म मरणकी त्रास मिटावा ॥
एक वचन मैं बूझौ साई । सोइ शब्द तुम मोहि सुनाई ॥
तुम जो कहेऊ ब्रह्म समाना । जीवरूप किमि होय अज्ञाना ॥
कबहुँ अज्ञान रूप है बतैं । ज्ञानी होय ज्ञान पुनि कतैं ॥
कबहुँ कहै यह ब्रह्म समाना । कहूँ राजा कहूँ भिक्षुक जाना ॥
कबहुँ जीव स्वभाव उपजावै । कबहुँ ब्रह्महो सबहि बुझावै ॥
ब्रह्म एक काहै अस कीन्हौ । साहिब मोहि बतावहु चीन्हौ ॥
कहैं कबीर सुनौ धर्मदासू । यह सब भेद कहौ तुम पासू ॥

सद्गुरु वचन

ब्रह्म रूप है बीज समाना । पारब्रह्म अंकुर प्रमाना ॥
ताही माहि पत्र दोय कीन्हा । एक शक्ति एके सब चीन्हा ॥
डार पात तब प्रकृति समाना । मूलवृक्ष ईश्वर सम जाना ॥

बोधसागर

( २५१ )

ता मई पांच डार निर्मावा । आकाशादि तेज उपजावा ॥
प्रथमहि वायु रूप जो कीन्हा । वायुके मध्य तेज धर दीन्हा ॥
तेजके मध्य नीर निर्माया । जैसे बीजसे वृक्ष जमाया ॥
ऐसे उत्पति सबकी होई । धोकामें सब गये बिगोई ॥
सद्गुरु जा कहँ दाया कीन्हा । सकल भेद ते पावैं चीन्हा ॥
तत्त्व मांहि निहतत्त्व लखावै । हृद मांहि अनहृद कहँ पावै ॥
अनर्थ मेटके अर्थ बतावै । लघु दीरघ पूरा समझावै ॥
पूर्णज्ञान जाही घट होई । सतगुरु भेदको पावै सोई ॥
ब्रह्मज्ञान बिन मुक्ति न होई । कैसे संत कहावै सोई ॥
जाकी महिमा कही न जाई । ज्ञान गम्य तैं शब्दहि पाई ॥
शब्द सार निर्मोलक पावैं । सो हंसा सतलोक सिधावैं ॥

सारखी-सो पहुँचे सतलोक कहँ, काल मर्म नहि जान ।
ते हंसा अवरन भये, सत्यपुरुषके ध्यान ॥

धर्मदास वचन-चौपाई

धर्मदास कहै सुनौ गुसाई । आप अपन पर सब बिसराई ॥
सतगुरु जापै दाया कीन्हा । तिन पायोनिजबिजको चीन्हा ॥
सूक्ष्म रूप परश जन आवै । लघुता विलै दीर्घ पद पावै ॥
लघुता मति प्रभु आवस कैसे । समझ परै घट कहिये तैसे ॥

सद्गुरु वचन

कहँ कबीर सुन सुकृती बानी । यह घट समझ लेहु सहिदानी ॥
सूक्ष्म रूप शब्द कर आही । सतगुरुमिलहिं लखावहिंताही ॥
सूरत नित जब शब्द समाना । अहंकार मन केर बिलाना ॥
दीन भाव गति तबही आई । सब घट आतम एक समाई ॥
पूर्ण ज्ञान जाहि घट होई । तब यह भेद पाय है सोई ॥
ज्ञानी महिमा एही जाना । सब घट आतम एक समाना ॥
सो हंसा सतलोक सिधावे । दुबिधा भाव सबै बिसरावे ॥

( २५२ )

अमरमूल

छन्द-भाव दूसर तजहु धर्मनि, एक ब्रह्म विचारकै ।
इमि जीव जगमें देखिये, जलबिन्दु लहर सम्हरकै ॥
परमात्मासों आत्मा, जिमि भानु किरण प्रकाश हो ।
उलट कर जब आप चीन्हें, भाव दूसर नाश हो ॥
सोरठा-जिमि तिल मध्ये तेल, कंचन औ आभूषणा ॥
जीव ब्रह्म इमि मेल, पुहुप मध्य जिमि बासना ॥
इति श्री अमरमूल आत्मज्ञान वर्णन

अष्टम विश्राम

धर्मदास वचन-चौपाई

अर्ज एक अब करौं गुसाई । कृपासिन्धु मोकहैं समुझाई ॥
जीव सीव कर भेद न जाना । कैसे ज्ञान करौ परवाना ॥
जीव सीव कर भेद बताओ । यहै ज्ञान मोकहैं समझाओ ॥

सद्गुरु वचन

धर्मदास सुनियो चितलाई । जीव सीव मैं कहौं बुझाई ॥
पांच तत्त्व गुण तीन सो साजा । ताजे सृष्टि कीन्ह उपराजा ॥
शुद्ध सतो गुण सीव कहावै । रज तम मिश्रित जीव बनावै ॥
सत रज तम तीनों सो न्यारा । पारब्रह्म सबही तैं पारा ॥
पारब्रह्म अस कीन्ह समाजा । त्रिगुण रूप करसृष्टि उपराजा ॥
उपजा सृष्टि गुणकी खानी । ताते जीव बुद्धि कर जानी ॥
रज तम सत्त्व एक है भाई । बिना ज्ञान भूली दुनियाई ॥
तत्त्व ज्ञान जाके घट होई । जीव सीव कहैं जाने सोई ॥
बिना तत्त्व जाने नहिं कोई । केतौ यत्न करे नर लोई ॥
भर्म भर्म भूला संसारा । आप न चीन्हाँ भूल संसारा ॥
सब अभिमान छूट जब जाई । ब्रह्म भेद कहैं पावै भाई ॥

बोधसागर

( २५३ )

ब्रह्म ज्ञान जाके घट होई । मरम पुरुष कहैं जाने सोई ॥
सत्य शब्दका मर्म जिन जाना । और सकल जग झूठ बखाना ॥
सबमें ब्रह्म रहौ भर पूरी । बाहर भीतर तत्त्व हजुरी ॥
दूजा काहु न देखै कोई । सत्य शब्द जाके घट होई ॥
जाको सद्गुरु दाया कीन्हा । सो पावेगा शब्दका चीन्हा ॥
अगम भेद लख पावै जोई । सतगुरु साँच और सब छोई ॥
सतगुरु महिमा ही लख पाई । सो सत लोक पहुँचि है जाई ॥
यहै ज्ञान धर्मन करहु सुन लेहू । सब कहैं सत्य शब्द कह देहू ॥
मिथ्या ज्ञान करहु उपदेशा । तो नहि पावहु लोक संदेशा ॥
जो तुम काज आपना चाहू । तौ जीवन कहैं सत्य लखाहूँ ॥
जो कोई शब्द सुनै तुम पासा । सोई करि है लोक निवासा ॥
जाके सत्य ज्ञान घट भयऊ । यारै प्रीति निज घर कहैं गयऊ ॥
अनमोलिक हीरा निज जाना । ताका मोल वही परमाना ॥
सोहैं सम निर्मौलक भयऊ । साहिब सेवकइक मिल गयऊ ॥
कञ्चन और आभूषण जाई । ऐसे ब्रह्म जीव मिलजाई ॥
दूजा भाव न एका रहिया । संशय मेट अमर पद लहिया ॥
अमर मूल अमर पद भई काया । अमर शब्द जिन हंसन पाया ॥
अमर शब्द सतगुरु सो पावै । बिन सतगुरु सब मूल गँवावै ॥
कहैं कबीर सुनौ धर्मदासू । ऐसा भेद करौ परकासू ॥
यहै भेद संसार सुनावहुँ । सब जीवन कहैं लोक लेजावहुँ ॥
तुम कहैं दीन्ह जत्त कडिहारी । तुम्हरी बाँह उतर भवपारी ॥
जा कहुँ तुम बकसो सहिदानी । सो कडिहार जत्त मुहैं जानी ॥
जापर दाया तुमने कीना । सोई जीव मुक्ति कहैं चीना ॥
मुक्ति भेद जब पावै प्राणी । सतगुरुनेक सदा उत्पानी ॥
रजगुण तमगुण त्याग कराई । सतगुण धर्महिं परसैं भाई ॥
सतगुण धर्म कर पावै भेदा । कहैं कबीर सोइ हंस अच्छेदा ॥

( २५४ )

अमरमूल

धर्मदास वचन

धर्मदास विन्ती अनुसारी । हे सतगुरु मैं तुम बलिहारी ॥
सतगुण धर्म मोहि समुझाई । जिह्वितें मन संशय चलिजाई॥

सद्गुरु वचन

धर्मदास चित केहु विचारी । सतगुरु धर्म कहौं निरवारी ॥
प्रथमहि भोजन सब परिहरही । रजगुण भोजन मध्यम करही॥
उत्तम तंड़ुल आन भरावै । बार छानकै तहां मँगावै ॥
उत्तम चौका दीन्ह बहुभांती । शब्द बोल मलकीन्हौं स्वाँती॥
दुग्ध खांड घृत असन करावा । तासौं कहिये सतगुण भावा॥
जितनी क्षुधा होय घट प्रानी । लेव अहार सोई अनुमानी ॥
शब्द बोले परसाद चढ़ावै । भाजी बनै तो अति मनभावै॥
भाजी नहीं तौ जलभर आना । गुरुकहैं देय अधिक सुखमाना ॥
ऊगुर लेय बहुत मन मानी । यह विधि कहिये सात्त्विक ज्ञानी॥
तीसर भाग अभ्यागत देई । तब प्रसाद पवित्र करलेई ॥
अभ्यागत नहिं आपही पावै । राजस धर्म नर्क कह जावै ॥
सतगुरु धर्म छूट जब जाई । राजस तामस आन समाई ॥
सतगुण धर्म करौं प्रतिपाला । निश्चय पावे लोक रसाला ॥
चैतन्य पुरुषमें जाय समाई । दुविधा भाव सबै मिट जाई॥
रजगुण तमगुण सतगुण कहिये । सब मिट जाय ज्ञान जो पड़ये
सब कहैं भर्म भूत करडारा । झूठी बात भेट औटारा ॥
सबै ब्रह्म ना दूसरे कोई । दूजा भर्म मिट गये सोई ॥
वेद शास्त्र सब कहै बखानी । वचन बिलास कहैं सब ज्ञानी॥
छळ शास्त्र मिल झगरा कीन्हा । ब्रह्म रूप कारू नहिं चीन्हा ॥
चीन्हैं तौ जो दूसर होई । भर्म विवाद करें सब कोई ॥
एके ब्रह्म अखंडित कहई । खंडित ज्ञान महीं निसदिन रहई॥

बोधसागर

( २५५ )

ताकी बात कहत परवाना । झूठ न छोड़ै मूर्ख अज्ञाना ॥
मूरख किमि कर कहिये भाई । ब्रह्म सकलमें रहा समाई ॥
आपहि मूरख आपहि ज्ञानी । आप कथा सब कहै बखानी ॥
आपहि ऊँच नीच दिखलावै । ज्ञानी होय जगत समुझावै ॥
आपहि बूझ आपही नाहीं । आप आपमहैं सकल समाहीं ॥
आपहि सुत्रिन करे बनाई । जप तप ज्ञान आप ठहराई ॥
स्वर्ग नर्क सब आपहि बासा । बाजीगर है करे तमासा ॥
आप तमासा आप भुलाया । आपहि हैं सब माहि समाया ॥
आप आप को चीन्हे नाहीं । आपहि ज्ञानी आप समाहीं ॥

साखी-आप आपको चीन्हकै, आप ब्रह्म हो जाय ।
आप न चीन्है आप कहैं, परौ भर्म महैं जाय ॥

चौपाई

अकह कहन कहि नहिं जाई । आप अकथ हो कथा सुनाई ॥
आपहि मनका रूप बनाया । दूया होके जगत दिखाया ॥
ऐसा भाव विधाता कीन्हा । ताते कोइ न पावै कीन्हा ॥

साखी-आप आपको चीन्हकै, सब संशय मिटजाय ।
कहैं कबीर निर्दोष भये, ब्रह्म स्वरूप समाय ॥

चौपाई

जबहि ब्रह्मरूप कहैं जाना । तब संसार झूठ कर जाना ॥
कितहुँ न देखे दूजा नाऊ । सब घट ब्रह्म जो रहा समाऊ ॥
जाहि ज्ञान अनुभव परगासा । सकल कर्मको भयो तब नाशा ॥
कर्म धर्म जो दोउ मिटये । ना कहुँ गये ना कहूँ आये ॥
जैसा रहा तैसा है सोई । बीचको भर्म मेट सब खोई ॥
कर्म भर्म की छूटी आशा । एकै नाम करहु विश्वासा ॥
नाम छोड़कै और न जाने । तीरथ व्रत कछु मन नहिं आने ॥

( २५६ )

अमरमूल

आपहि तीर्थ आपहि देवा । आपहि आप लगावै सेवा ॥
आपहि मूरत पिंड बैधावै । आप जन्त्र है जन्तर लावै ॥
आपहि महिमा सबकी कीन्हा । आपहि निन्दक मिथ्या कीन्हा ॥
साखी-आप सकल जग व्यापिया, आपहि अलख अपार ।
आपहि जग उपजावही, आपहि दस औतार ॥

चौपाई

आपहि देव दैत्य संहारा । आप युद्ध कीन्ह असरारा ॥
आपहि महाभार्थ करवाया । पांडौको शुभ ज्ञान सुनाया ॥
आपहि कौरव पांडव भयऊ । आपहि होय सबनसौं कियऊ ॥
आपहि है अहंकार स्वरूपा । आपहि रय्यत आपहि भूपा ॥
आपहि चाकर हो सेवा लावा । आप पंडित हो वेद पढ़ावा ॥
आपहि भला बुरा अनुसारा । आप अमीर न्याव निर्बारा ॥
आप ले आवै आपहि खाई । आप अतीत आप सिवकाई ॥
आपहि न्याव आपहि बादा । आपहि तीता आपहि वादा ॥
आपहि खाटा मीठा भयऊ । आपहि सर्वस्वाद कर लयऊ ॥
आपहि लघु दीरघ हो देखा । आपहि दूर निकट हो लेखा ॥
आपहि सकलौ वेद पुराना । आपहि पोथी आप बखाना ॥
आपहि छऊ शास्त्र बनावा । वाद विवाद कर ज्ञान सुनावा ॥
आपहि जीत आपही हारा । आपहि तरे आपही तारा ॥

साखी-ऐसी महिमा ब्रह्मकी कहत कही नहिं जाय ।
जो कोइ यह मति समझ है, तेही ब्रह्म समय ॥

चौपाई

ब्रह्म अखण्ड खण्ड नहिं होई । खंडित ब्रह्म ध्यावे सब कोई ॥
आप कहैं है ब्रह्म अखंडा । आपहि खंडित कह सबखंडा ॥
आपहि मनुष्य रूप कहावै । आपहि दूजा भाव स्वभावै ॥

बोधसागर

( २५७ )

आप अवचन वचन नहीं आवै । आप वचन कहि सब समुझावै॥
आप अरूप रूप नहीं कोई । आपहि सकल स्वरूप है सोई ॥
आपहि निर्गुण रूप जो कहिये । ज्ञानगम्यते यह मत लहिये ॥
आपहि ज्ञान मुक्तिके दाता । आपहि दाता आपहि मुक्ता ॥
कहैं कबीर सुनो धर्मदासा । ऐसा ज्ञान घट करौ प्रकाशा ॥

धर्मदास वचन

धर्मदास विनती अनुसारी । हे साहिब मैं तुम बलिहारी ॥
यह मत मोहक अगम लखावा । हृदय कमल अब आन जुड़ावा ॥
एक बात मैं बूझहुँ सार्ई । सोइ कहौ जिहि संशय जाई ॥
तुम सब ब्रह्म कहो समुझावा । मोरे मन निश्चय यह आवा ॥
औरन सों कह कहौ गुसाई । यह तौ ज्ञान कहौं नहीं जाई ॥
मैं जाना सब तुम्हरी दाया । और जीव नहीं शब्द समाया ॥
ताकर मोहे कहौं उपदेशा । सो हंसन सों कहौं सन्देशा ॥

सद्गुरु वचन

धर्मदास तुम ज्ञान सुनाऊँ । जो मानैं सो सन्त स्वभाऊ ॥
जो नहीं माना शब्द तुम्हारा । फिर पछतै है बारम्बारा ॥
धर्मदास तुम आपन सोधौ । तब तुम सकल मृष्टिपर बोधौ ॥
जो तुम्हरी मन थिर नहीं होई । तब लग पंथ चलैं नहीं कोई ॥

सारखी—जब मन कहै परबोध हु, सकल भर्म मिटजाय ।

एक नाम कहै सेवहु, आवागमन मिटजाय ॥

चौपाई

धर्मदास मैं कहौं नवैरा । जासों हंस मुक्त होय तेरा ॥
मुक्ति होय सत नामहि पावै । बहुरि न योनी संकट आवै ॥

( २५८ )

अमरमूल

धर्मदास वचन

धर्मदास कहैं सुनो गुसाईं । मुक्ति वस्तु सो मोहि सुनाईं ॥
तुम तौ मुक्ति भर्म कर डारा । तुमते पायँउ ज्ञान भंडारा ॥
मुक्ति करौ जो बन्धा होई । यह तौ हंस निबन्धक सोई ॥
नहिं कोई बन्धा नहिं कोइ छूटा । संशयके बस सब जग लूटा ॥
तुम्हरी दाय़ा सो हम जाना । मुक्ति अमुक्ति दोउ भर्माना ॥

सद्गुरु उवाच

अब तुम्हारे जिव निश्चय आई । हम जाना तुम सिखहौ भाई ॥
निज मन्त्रहि जानहु धर्मदासा । अब कह बूझहु सत्त विलासा ॥
जो कहिये सो वचन विलासा । यह तौ साखी पद परकासा ॥
ग्रन्थ कहेउ सब जगत प्रबोधा । जो बूझे सो पावै सोधा ॥
जो बूझे ग्रन्थनकी वानी । तब पावै गम निज सहिदानी ॥
जब पावै शब्दहि कर लेखा । तब जानहु जैसे सब धोखा ॥
धोखा योग यज्ञ तप कीन्हा । धोखा दान पुण्य सब लीन्हा ॥
धोखा कर्म करे संसारा । धोखा कोटिन ज्ञान पसारा ॥
धोखा पुरान सकल जहाना । धोखा शास्त्र वेद मत ठाना ॥
धोखा साखी पद है भाई । धोखा कह सब ज्ञान हुनाई ॥
धोखा प्रथम सांच कर माना । समझे धोखा सबै नसाना ॥
जस निर्गुण तस सर्गुण माना । निर्गुण सर्गुण एक समाना ॥
अगुण सगुण दोनों मिट गयऊ । आदिब्रह्म सौ परिचय भयऊ ॥
धर्मदास यह मति सुनि लेहू । धोखा ज्ञान चित्त मत देहू ॥
प्रथमहि भक्त रूपकर ज्ञाना । ता पीछे फिर तत्त्व समाना ॥
जबही तत्त्व समाना भाई । तबही जीव लोक कहैं जाई ॥
जबही सत्त्व हदैं महैं आवै । धोखा रूप सबै मिट जावै ॥
जब तुम अपना तत्त्वहि जानौ । गुरु औ शिष्य दोउ पहिचानौ ॥

बोधसागर

( २५९ )

तुमही शिष्य गुरु हो सोईं । तुम गुरुही शिष्य सब कोई ॥
गुरु अरु शिष्य एककर जाना । दूजा भाव सो सबै बिलाना ॥
दूजा भाव वसत है जाके । नहीं शिष्य नाही गुरु ताके ॥

साखी-गुरु शिष्यकी महिमा, कहैं कबीर विचार ।
अमरमूल जो जान हो, उत्तरो भौजल पार ॥

चौपाई

तुम कहैं शब्द दीन्ह टकसारा । सो हंसन सों कहो पुकारा ॥
शब्द सार का सुन्न करिहैं । सहजै सत्यलोक निस्तरिहैं ॥
सुन्न का बल ऐसा होई । कर्म काट सब पलमहैं खोई ॥
जाके कर्म काट सब डारा । दिव्य ज्ञान सहजै उजियारा ॥
जा कहैं दिव्यज्ञान परकाशा । आपहिमें सब लोक निवासा ॥
लोक अलोक शब्द हैं भाई । जिन जाना तिन संशय जाई ॥
तत्त्व सार सुन्न है भाई । जातें यमकी तपन बुझाई ॥
सुन्न सों सब कर्म बिनाशा । सुन्न सों दिव्यज्ञान प्रकाशा ॥
सुन्न सो जैहै सतलौका । सुन्न सों मिटे हैं सब धोका ॥
धर्मन सुन्न देहु लखाई । जासों हंस सबै मुकाई ॥
गुरु धोबी सिख कपड़ा जानी । सुन्न साबुन है परवानी ॥
बस्तर को तब मैल नसाई । तैसे ज्ञान हिये दसाई ॥
ह्दे ज्ञान परकट जब होई । कर्म भर्म सब मिटगए दोई ॥
ज्ञान दीप जबही परकाशा । मोहे तिमिरको भयो विनाशा ॥
सत्य पुरुष महैं जाय समाना । हंस पुरुष एकहि कर जाना ॥
दुतिया धोखा मिट तब गयऊ । एक रूप महैं एकसम एऊ ॥

धर्मदास वचन

धर्मदास बिन्ती अनुसारि । हे सतगुरु तुम्हरी बलहारी ॥
एक बात अब बूझौ साई । जिहितैं मनकी संशय जाई ॥