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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

बोधसागर

(१२१)

सोरठा-वेगि नृपति चलि आव, सतगुरु काया लीजिये ॥ हँसे लोक बड चाव, नृप गुरु कहिकै म्लेच्छ सब ॥

कबीर बचन

पाती गही देखु जब राया । महाकोध आतुर चलि आया ॥ डारत घृतहि ढुताशन जैसे । रोम रोम पावक वरु तैसे ॥ चले सकल दल छोडि वराता । ब्याकुल राय कहे तब वाता ॥

राजा बीरसिंह बचन

अरे दिवान सुनो मतिवाना । वेगि चलौ गुरु कैसे ठाना ॥ विजुली मारहु शत्रु हमारा । करी विचार बैठ हंकारा ॥

कबीर बचन

आतुर चले बाजि गज धाये । कूड़ुक बाण गहि लीन चढाये ॥ खड्गतुपक औ सेल कटारा । धनुष बान करि वेगि सवारी ॥ कुड़ुक बाण हाथ करि लीना । अगनित बाजा बाजत दीना ॥ ठाढा भांट अनेक पुकारे । गुण वरने चारन बहु पारे ॥ भेजे राय पाँति तेहि बारा । खोदि कबर गुरु देहु हमारा ॥ नहि तो विजली बचे न पाई । एक एकको मारि गिराई ॥ आई पाँति तब कहे पठाना । सुनि विजली गहि लीन कमाना ॥

विजलीखाँ बचन

हिन्दू काफिर पीर न पावे । जान माल जो सब गलि जावे ॥

कबीर बचन

विजली खान सेना ले ठाढा । आपुन दीस बहुत बड गाढा ॥ पीर आपना हम नहि देते । विरसिंह राय करेगा केते ॥ तब हम रानी दर्शन दीना । मानिक दे चरणामृत लीना ॥ छोटी है कमलापति रानी । सो मम चरण पखारे आनी ॥ रानी राय कहा मोहि चीन्हा । मानुष विधि तुम हमकूँ कीना ॥ हाड मांस हमरे नहि काया । काहे दोनों रार बढाया ॥

पान देकर रानियोंको परलोक ले जानेके समयके मार्गका वर्णन

(१२२)

बीरसिंह बोध

राय पठान दोनों गुरु भाई । काहे दोनों करे लड़ाई ॥ पाती भेजहु राय पठाना । खोदि कबर देखो मतिवाना ॥ गोर मांहि सुरदा जो होई । राय पठान लड़ो तुम दोई ॥ जो मुर्दा तुम दूँठ न पाओ । काहेको तुम रार बढाओ ॥ मथुरा रतना कदोइन नारी । तिन बड प्रीति हमारी धारी ॥ सात दिवस लगि अन्न न पावा । हमरे दरस को सुरति लगावा ॥ ताको दर्शन दिये हम जाई । काहे मरो दोऊ गुरु भाई ॥ अन्तर्धान तब हम होइ गयऊ । तत्क्षण रतना दर्शन पयऊ ॥ यहाँ राना पाती पठवायी । राय देखि अचरज मन लायी ॥ गये बाँचि जहाँ रहै पठाना । सुनत पठान अचम्भो माना ॥ सुनत सलाह कीन पुनि दोई । राय पठान आये सब कोई ॥ आइ पठान गोर खुदवाई । देखो तहाँ देह नहीं पाई ॥ भये अधीन देख सब लोगा । करुणा करहि सकल भयो सोगा ॥ छन्द-भये सुकृत उदास सबहीं रंक निधि जैसे हरयो ॥ धन्य गुरु कहा बंदना तब चीन्ह गुरु मम ना परयो ॥ अमी पाय गुरु पंकज गहेसो काग होय मराल हो ॥ पाय अस्थिर सदन निर्बध हंस होय बड भाग हो ॥ अखंड धर्म विराज सतगुरु जहाँ काल नहीं पहुँच है ॥ असंख्य रवि अरु कोटि दामिनि अग्र शोभा तहाँ सहे ॥ दयासागर असहि विराजत पुष्प सज्या सोहहीं ॥ करहि कलोहल हंस सबहीं पुरुष दरश विलोकहीं ॥ सोरठा-षोडश रवि प्रभाव, चकोर उडगन पोहिया ॥ श्रवण आहि रवि भाव, अमृत फल हंसा चुगे ॥

चौपाई

गोर बनाय चले सब कोई । हिन्दू मुसलमान पुनि दोई ॥ नाना भाँति करत सब सोभा । कंठी तिलक देखि सब लोभा ॥

बोधसागर

(१२३)

धन्य राय धन्य पठाना । ऐसे गुरु पाये मतिवाना ॥ ऐसे बहुत दिन गये बिताई । रानी केरि अवधि नियराई ॥ सुन्दरदेह रानी कर नाऊ । पाये शब्द न प्रीति लगाऊ ॥ शब्द पाइ गुरु प्रीति न लागी । विना प्रीति सतभक्ति न जागी ॥ पाय शब्द नहिं कीन कमाई । ताते यम बहुते दुख लाई ॥ चारि दूत हरि तबहि बुलावा । तासे सकल मता समुझावा ॥ नगर गहो जाय नृप रानी । तहँवा जाय वेगि तुम आनी ॥ तब यमदूत गहि राजा गयऊ । जाय ठाढ़ मन्दिरमें भयऊ ॥ घट घट यम देखा व्योहारा । काया पैठि सो कीन विचारा ॥ तब रानीके वेदन भयऊ । व्याकुल करी दूत चित रहऊ ॥ राजा बूझे रानी बाता । कहे रानी मोहि नाहि सुहाना ॥ एक बात सुनिये मम राई । साधु संत सब देहु बुलाई ॥ राजा सकल साधु बुलवाये । सतगुरु भक्ति करो चित लाये ॥ बाढ़ विथा रानीकी काया । ततक्षिन आप पुरुष होय आया ॥ तबहीं यम जिव घेरे आयी । अरध अरध स्वासा चलि धायी ॥ भागि हंस त्रिकुटी में गयऊ । तहवाँ यम जिव घेरे लयऊ ॥ चारो जीव यम घेरे लायी । काहे बल तुम बचिहो जायी ॥ चलो हंस हरि कीन बुलाऊ । तब हंसा यक वचन सुनाऊ ॥ यहवाँ कस आये बटपारा । हमरे हैं समरथ रखवारा ॥ हम घर गुरु खसम यक आही । सो मोहि नाम दीन बतलाही ॥ दूत भूत यम तोहि चिन्हाई । आज्ञा देह खसम घर जाई ॥ जे साहेब मोहि नाम सुनाया । सो आवे गुरु जाय लिवाया ॥

साखी—तबही यम अस बोलिया, कहँ है धनी तुम्हार ॥ ताकहँ वेगि बुलावहू, नहिं चलु हरि दरबार ॥

(१२४)

बीरसिंह बोध

चौपाई

तब जिव यमसे कहवे लीना । साहब एक वचन कहि दीना ॥ निगमके पार अगमके आगे । सो सतगुरु मम श्रवणहि लागे ॥ धरनि अकाशते नगर निनारा । तहाँ विराजे धनी हमारा ॥ जहँ नहिँ चन्द सूरकी कांती । तहाँ नहीँ दिवस अरु राती ॥ अगम शब्द जब भाषे नाऊ । तब यम जीव निकट नहिँ आऊ ॥ चलो जीव हरि ब्रह्मा पासे । तुम्हरे धनी मोहि ना आसे ॥ तवहीं हँसा कीन पुकारा । कहँवा हौ तुम धनी हमारा ॥ मोसे यम कीनी बरि याई । कस नहिँ राखहु सद्गुरु आई ॥

छन्द-कीन जीव पुकार ततक्षण खसम बेगहिँ आइये ॥

बेग लागु गुहार सतगुरु हंस लोक पठाइये ॥

काहि करों पुकार साहब मातु पिता नहिँ कोइ जना ॥

करि ठिठाई मारि जीव यम झूठ जग मँह बन्धना ॥

सोरठा-लगे खसम गुहार, घाट घाट यम छेकिया ॥

कठिन परी यमधार, अति व्याकुल अकुलाय जिव ॥

चौपाई

तब सतगुरुका आसन डोला । काल दग्ध जिव व्याकुल बोला ॥

आई खसम तब दर्शन दियऊ । चरण बन्दि हँसा तब लियऊ ॥

साहब देखि भगा यमराई । अति आतुर होय हरिपै जाई ॥

हरिहर वचन

हरिहर बूझे यमसे बाता । कस नहिँ कियो जीवकी घाता ॥

दूत वचन

कहे यम स्वामी विन्ती मोरी । हम जिव छेकि कीन तेहि सोरी ॥

वह सुमिरे सतसुकृत नाऊ । सुनत पुकार धनी चलि आऊ ॥

आवत धनी भयो उजियारा । हम भागे चारो बटपारा ॥

नाम माहात्म्य

बोधसागर

(१२५)

कबीर वचन

वहाँ दूत पहुँचे हरि पासा । यहाँ जीव कहत सुखवासा ॥

जीव वचन

विनय जीव सुनु बन्दी छोरा । हम कहैं कष्ट दीन बड चोरा ॥ नाम तुम्हार बूझे यमराया । कहा नाम तब बचने पाया ॥ तब हम ततछिन कीन पुकारा । बेगहि आओ खसम हमारा ॥

ज्ञानी वचन

सुनो जीव नहिं शब्दहिं ध्यावा । राजा गुरु मानुष विसरावा ॥ गहे नाम अरु करे कमाई । तब यम दूत निकट न आई ॥

जीव वचन

जेहि ते हंसको घर पठवायी । तौन नाम मोहि भाषि सुनायी ॥ जाते जीव अमर घर जावै । दूत भूत यम खबर न पावै ॥

कबीर वचन

साखी-गुप्त नाम सुख भाखिया, अकह अमर निज नाम ॥ अमर कृपा निधि जीव कूँ, पहुँचे जीव निज ठाम ॥

चौपाई

पहुँचे जीव खसम घर जबहीं । सुख आनन्द भये बड तबहीं ॥ कंचन कलस बरत तहैं बाती । आरति करे हंस बहु भांती ॥ देखत जीव हंस उजियारा । अंग अंग शोभा चमकारा ॥ देख द्वीप शोभा बहु भांती । रविशशि मनि लागे जिमि पांती ॥ ता मध्ये जिमि लाल जंडाई । बीच बीच चुनि लै बैठाई ॥ मोतीसर झालरि बहु पोहा । देखत हंस रहे तहैं मोहा ॥ तबहिं पुरुष ज्ञानी हँकराई । कौन वचन तुम जीव सुनाई ॥ कौन वचन तुम जीवन दीना । जाते जीव अटक यम कीना ॥

(१२६)

बीरसिंह बोध

ज्ञानी वचन

दोय कर जोरि कहे शठिहारा । मुक्ति वचन जिव डार विसारा ॥ विसरे नाम छेके यम आयी । भाषि नाम यम जीव छुडायी ॥

पुरुष वचन

आज्ञा जीव पुरुष हंकराई । कहो जीव कस कीन कमाई ॥ कैसे पहुँचे लोक हमारे । सत्य वचन सो कहो विचारे ॥

हंस वचन

मस्तक नाय हंस कर जोरी । अमर पुरुष विन्ती यक मोरी ॥ हे साहब हम कछू न चीन्हा । गुरुको वचन मानि शिरलीन्हा ॥ जा दिन गुरु मोहिं दीनेउ पाना । तब मैं जानवो पद निर्बाना ॥ साधु गुरु मैं जान्यो एका । काम क्रोध छोडयो टेका ॥ साधु संत कर बन्देउ पायो । विसरचो नाम गुरु मोहि सुनायो ॥ अब पुरी यम छेकेउ आयी । पल यक दुख मोहिं तहाँ दिखायी ॥

साखी-खसम आइ दर्शन दिये, दीना नाम सुनाइ ॥ तब आये हम लोककूँ, यम शिर पाँव चढाइ ॥

चौपाई

जो नहिं नाम मुक्तिको पावे । माला डारि जगत बौरावे ॥ सुने नाम अरु करे कमाई । छाडे पारखण्ड अरु अधमाई ॥ निर्मल काया होय संसारा । जाकहँ दया करे करतारा ॥ नाम कवीर जपे बड भागी । उन मन ले गुरुचरमन लागी ॥ जापर दया जो होय तुम्हारी । ताकहँ कहा करहि बटपारी ॥ पुरुष दया जब होय सहायी । सत्यलोकमों जाय समायी ॥

छन्द-पुरुष दया कीन ततछिन अटल काया तब भयो ॥ पुहुप दीप निवास कीना सुमन सज्या आनन्दमयो ॥

बोधसागर

(१२७)

हंसन शिर क्षत्र राजे अमृत फल आनन्द घना ॥ रूप षोडश भानु हंसा कोटि शसिहिं अति बना ॥

सोरठा-धाम जो पाय अमोल, हंसा सुख तहैं विलसही ॥ द्वीपहिं द्वीप कलोल, जरा मरन भ्रम मेटिया ॥

इति श्रीबोधसागरे कबीरधर्मदाससंवादे बीरसिंहबोधवर्णनो नाम तृतीयस्तरंगः ॥

ग्रन्थ बीरसिंहबोध समाप्त ।

इति श्रीबोधसागरान्तर्गत ग्रन्थ वीरसिंहबोध समाप्त

प्रारंभिक पृष्ठ (बोधसागर द्वितीय भाग)

कबीरसागर चतुर्थ खण्डान्तर्गत

भारतपथिक कबीरपंथी स्वामी श्रीयुगलानन्द (विहारी)

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अध्यक्ष : श्रीवेंकटेश्वर प्रेस,

खेमराज श्रीकृष्णदास मार्ग, मुंबई - ४०० ००४.

नं. ५ कबीरसागर - १

संस्करण : फरवरी २०१९, संवत् २०७५

मूल्य : १२० रुपये मात्र ।

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कबीरपंथके प्रधान आचार्य

A black and white portrait of a bearded man, identified as Shri Ugranam Sahab. He is seated, wearing a crown and traditional robes, and is holding a small object in his hands. The portrait is framed by a dark, textured border.

श्री १०८ पं० श्री उग्रनाम साहब

THE NEW YORK

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बोधसागर द्वितीय भागकी अनुक्रमणिका

इसमें चौथे तरंगसे लेकर आठवें तरंगतक है, जिसमें- चौथे तरंगमें भोपालबोध है जो पृष्ठ १ से आरंभ होकर पृष्ठ १६ पर समाप्त हुआ है ।

पाँचवाँ तरंग जगजीवन बोध है जो पृष्ठ १७ से आरम्भ होकर ६० पर समाप्त हुआ है ।

छठा तरंग गढ़बोध है जो पृष्ठ ६१ से आरंभ होकर पृष्ठ १०८ पर समाप्त हुआ है ।

सातवाँ तरंग हनुमानबोध है जो पृष्ठ १०९ से आरम्भ होकर पृष्ठ १३६ पर समाप्त हुआ है ।

आठवाँ तरंग लक्ष्मण बोध है जो पृष्ठ १३७ से आरंभ होकर पृष्ठ १६० पर समाप्त हुआ है ।

उपरोक्त तरङ्गोंकी अलग अलग अनुक्रमणिका इस प्रकार है-

अथ भोपालबोधकी अनुक्रमणिका

विषय.पृष्ठांक.विषय.पृष्ठांक.
धर्मदास साहबका सद्गुरुसे कालके जीवोंके मारनेके विषयमें प्रश्न करना और कबीर साहबका उत्तरराजाका आरती चौका करके नामका उपदेश लेना११
धर्मरायका मृत्युको मनुष्योंके मारनेकी आज्ञा देनाराजाको लेकर कबीर साहबका सत्यलोक को जाना१२
सत्यगुरुका कबीर साहबको जीवों की रक्षा के लिये पृथ्वीपर आनेकी आज्ञा देनामंत्रि आदिका राजाको महल में न देखकर परजात्ताप और शोक करके भयसे नगर छोड़कर भाग जाना१५
कबीर साहबका जालंदर देशमें राय भोपाल के घर जानाइति
राय भोपालका कबीर साहबको क्लेश करने की सलाह करनाअथ जगजीवनबोधकी अनु-क्रमणिका
राजाके अधीन होकर सद्गुरुका हास्य प्रकृताधर्मदास साहबका गर्भवियय प्रश्न और सद्गुरुका उत्तर२१
रानीका सद्गुरुके अधीन होनागर्भोत्पत्ति वर्णन२२
कबीर साहबका राजारानीको ज्ञान समझानाजगजीवनका गर्भके कष्ट से व्याकुल होकर साहबकी स्तुति और कीस करना२३

( ६ )

बोधसागर द्वितीयभागको अनुक्रमणिका

विषय.पृष्ठांक.विषय.पृष्ठांक
साहबका दया करके जगजीवनसे कौल लेकरसदगुरुका राजाको अपना प्रतिनिधि बना
गर्भसे मुक्त करना२५कर गमन करना४९
पिशुन कर्म वर्णन२६राजाका सत्यलोक गमनकी तय्यारी करना
पिशुनके फेरमें पड़कर जगजीवनका गर्भ-और अधिकारी हूँताँका साथ जाना५०
का कौल भूल जाना और संसारी बँधबन्धमेंसत्य लोकके मार्गमें धर्मरायसे हूँताँ का
मगन होना२९वातालाप५१
सदगुरुका पाटनमें पहुँचना और एक सूखेकामिनीसे बातचीत५२
बागमें ठहरना, उसका हरा होजानाहंस गुज्रन जनसे बातचीत५३
और राजाका खबर पाकर बाग देखनेसब हूँताँको लेकर ज्ञानीजीका सत्य पुरुषके
आना फिर कबीर साहबसे मिलना३२सन्मुख जाना और सत्य पुरुषको प्रसन्नता५४
सदगुरुका राजा हो गर्भका कौल यादग्रन्थसार५६
दिलाना३४इति
राजाका सदगुरुसे उद्धारकी बिल्ली करना३५अथगुरुबोधकी अनुक्रमणिका
सदगुरुका राजाको आरती करनेका उप-सत्यपुरुषका ज्ञानीजीको संसारमें जाकर
देश देना३०जीवोंको चितानेको आज्ञा देना६५
राजाका पहलेके हूँताँका हाल पूछना औरज्ञानीजीका संसारमें आना और गुरुसे
सदगुरुका उत्तर देना३७भेट होना६६
राजा रानी इत्यादि सब परिवारका सद-गुरुका श्रीकृष्णके पास जाकर ज्ञान करना६७
गुरुकी शरणमें आना और राजकुंवरकागुरुका ज्ञानीजीके आधीन होना६८
हट करना पीछे शरणमें आना३९श्रीकृष्णका गुरुको कबीर साहबको गुरु
कुफर्मा जीवके उद्धारका उपाय४०बनानेको आज्ञा देना७०
सत्यलोकके आनेका मार्ग"गुरुका आरतीका साज एकट्ठा करना७१
आरती कराकर राजा तथा अन्य जीवों-गुरुका सब देवोंको आरतीमें बुलानेके
का पान लेना४३लिये नेवता देनेको ब्रह्मसभामें जाना"
तन छूटने पर हंसका स्थान कर्मानुसार भिन्नमहादेवका बोध करना और गुरुका उन्हें
२ लोककी प्राप्ति४४समझाना७२
राजाका सदगुरुसे लोक लेजानेको बिल्लीगुरुकी आरतीमें सब देवोंका आना और
करना४५गुरुका परवाना लेना७३
सदगुरुका प्रसाद पाना४६गुरुका त्रिवेवसे जर्बा करने जाना७४
पान माहात्म्य४७गुरु और ब्रह्मासे जर्बा"
काल ज्ञान"ब्रह्माका विमान भंजकर विष्णु और महादेव
सदगुरुका पाटनसे चलनेका बिचार प्रगटको बुलाना७७
करना और बहूँके हूँताँकी बिल्ली४८

बोधसागर द्वितीयभागकी अनुक्रमणिका

( ७ )

विषय.पृष्ठांक.
ब्रह्मा और विष्णुकी बातचीत७९
गरुड़ और महादेवका बातलाप८१
तीनों देवोंका गरुड़से हारकर मातासे भेद
पूछनेको जाना८३
निर्गुण भेद वर्णन८६
लौकिक ज्ञान वर्णन८७
महादेवका क्रोध और गरुड़का ज्ञान८८
गरुड़का तीनों देवोंकी परीक्षा लेनेके लिये
बालक लाना८९
बालकका कालसे रक्षाके लिये त्रिदेवसे
विनती करना९०
तीनों देवका कालसे रक्षा करनेमें असमर्थ
होना और गरुड़का बालकको जिलाने की
प्रतिज्ञा करना९३
गरुड़का लोक लोकान्तरमें अमृतके लिये
फिरना और सब लोकपालोंसे चर्चा
करना९६
गरुड़का अमृत लाकर बालक को जिलाना
और तीनों देवका हार मानना१०४
गरुड़ बोधका संक्षेपसार१०५
इति
अथ हनुमान बोधकी अनु-
क्रमणिका
धर्मदास साहबका प्रश्न११३
हनुमान शब्दका अर्थ और हनुमान बोधका
भाव (टीप्पणीमें)
बेतामें कबीरसाहबका हनुमान से मिलना
हनुमानका अपनी बड़ाई करना और
मुनीन्द्रजीका समझाना११५
हनुमान रामचन्द्रजीको सबके ऊपर
बापना (रामनामकी बड़ाई)११६
मुनीन्द्रजीका हनुमानके वचनका खण्डन
कर देना११७
हनुमानका निरंजन (काल) की बड़ाई
करना११९
विषय.पृष्ठांक.
मुनीन्द्रजीका समरथकी बड़ाई करना
और हनुमानका सन्देहमें आकर समरथ
की बात पूछना मुनीन्द्रजीका समरथकी
बात कहना१२१
हनुमानका मुनीन्द्रजीसे समरथके देशमें
लंजानेपर उसको देख लेने पर विस्वास
करनेकी बात कहना१२३
मुनीन्द्रजीका लोप होजाना और हनुमानका
घबराकर पुकारना, फिर मुनीन्द्रजीका
प्रगट होना
हनुमानका मुनीन्द्रजीसे अपनेको शिष्य कर
लेनेको प्रार्थना करना१२४
मुनीन्द्रजीके योग्यीत नामसे प्रकट होकर
आदि उत्पत्तिकी कथा हनुमानको
सुनाना
हनुमानका साधु लक्षण विषय मुनीन्द्रजीसे
प्रश्न करना और नाना वेष तथा योग
युक्ति का वर्णन करना१२५
साधुलक्षण (मुनीन्द्रबचन)१२६
हनुमानका समरथका ठिकाना और वहां
पहुँचनेकी युक्ति पूछना१२७
मुनीन्द्रजीका सुरति निरति एक करना
समरथके घर पहुँचनेका मार्ग बताना
हनुमानका सुरति निरति एक करनेकी
युक्ति पूछना
मुनीन्द्रजीका समरथके घर पहुँचनेके लिये
सुरति निरति एक करनेकी युक्ति
हनुमान को बताना१२८
हनुमानका कबीर साहबका उपकार मानना१३१
ग्रन्थकी सभाप्ति कबीरका वचन धर्मदास
प्रति१३२
सारविचार पचीसी१३३
इति

( ८ )

बोधसागर द्वितीयभागकी अनुक्रमणिका

विषय.पृष्ठांक.
अथ लक्ष्मण बोधकी अनुक्रमणिका संगत्ता-
चरण और उत्थानिका१४१
कृष्णजीका शरीर त्याग देना, बलभद्रजी
का संदेश और कृष्णका समझाना
बलभद्रजीका कृष्णके शवका दाह करके
समुद्रमें बहा देना और कृष्णजीका उडीसा
के राजाको स्वप्न देना१४२
राजाका समुद्रमें स्नानको जाना और कृष्ण
के शवको पाकर स्वप्नको सच्चा समझ
कर जगन्नाथका मन्दिर बनवाना१४३
समुद्रका अपना बहला लेनेके लिये मंदि-
रको छः बार बहा ले जाना
सातवें बार कबीर साहबका समुद्र तटपर
बैठना और समुद्रका पीछे लौट जाना
लक्ष्मी और कबीरसाहबकी बातलाप१४४
समुद्र और कबीर साहबकी बातचीत१४६
ब्रह्मायुगकी वार्ता (लक्ष्मणबोध)१४८
समुद्रका द्वारिका दुबा लेना और कबीर
साहबका जगन्नाथके यज्ञमें जाना पण्डा
का संदेह और अनंत कबीरका दर्शन
तथा जगन्नाथमें छूत छात माननेवाले
के दंडका वर्णन१४९
ब्राह्मणका समुद्र तटपर स्नान करने जाना
वहां कबीर साहबकी देखकर घृणा
करना उसके देहमें कोढ़ फूटना राजा
विषय.पृष्ठांक.
का कबीर साहबसे प्रार्थना करके
ब्राह्मणका शरीर अच्छा कराना१५०
जगन्नाथजीकी काष्ठकी प्रतिमा बनानेके
लिये राजाको स्वप्न देना१५१
राजाका मलयगिरिसे चन्दन लाना और
मूर्ति बनानेके लिये कारीगरका खोजना
और कारीगर न मिलनेसे राजाका
विकल होना
कबीर साहबका निरंजनके अनुरोधसे
कारीगरका रूप धरके राजाके द्वार पर
जाना और सोलह दिनतक द्वार न खोलनेका
वचन लेकर प्रतिमा बनानेको बैठना१५३
कबीर साहबका निरंजनके अनुरोधसे
कारीगरका रूप धरके राजाके द्वार
पर जाना और सोलह दिनतक द्वार
न खोलनेका वचन लेकर प्रतिमा
अपूर्ण रहना१५४
जगन्नाथजीका गोरखको शाप देना और
योगियोंका जगन्नाथ दर्शन बन्द होना
सम्मानित और कबीर साहबका सिंहल
दीप गमन
संक्षेपसार और ग्रन्थपर साधारण दृष्टि१५४
इति

भारतपथिक कबीरपंथी-

स्वामी श्रीयुगलानन्दद्वारा संशोधित

श्री-भोपालबोध

मुद्रक एवं प्रकाशकः

खेमराज श्रीकृष्णदास,

अध्यक्ष : श्रीवेंकटेश्वर प्रेस,

खेमराज श्रीकृष्णदास मार्ग, बम्बई-४०० ००४

नं. ५ कबीरसागर - २

श्री कालिका

प्रकाशक : श्री कालिका पुस्तक संख्या : १०१ प्रकाशक : श्री कालिका

सत्यनाम

श्री कबीर साहिब

A faint, stylized illustration of a seated figure, possibly a deity or sage, holding a staff or lotus, with a small figure to the right. The figure is depicted in a meditative or seated posture, wearing robes. Above the figure is a small, triangular, umbrella-like structure. The entire illustration is rendered in a light, monochromatic style, appearing as a watermark or a faded print on the page.

विष्णु विष्णु वि