कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
अनुरागसागर
( ११ )
सकल हंस कीना सनमाना । धन्य हंस सतगुरु पहिचाना ॥ मलतुम छोड़ेउ कालका फंदा । तुम्हारो कष्ट मिटचो दुख द्रंदा ॥ चलो हंस तुम हमारे साथा । पुरुष दरश करिनावहु माथा ॥ इन्द्रमती आवहु संग मोरे । पुरुष दरश होवें अब तोरे ॥ इन्द्रमती अरु हंस मिलाहीं । करहिं कुतूहल मंगल गाहीं ॥ चलत हंस सब अस्तुति लावें । अब तो दरश पुरुषको पावें ॥ तब हम पुरुष सनविनती लावा । देहु दरस अब हंस ढिग आवा ॥ देहु दरश तिहिं दीनदयाला । बंदीछोर सु होहु कृपाला ॥ बिकस्यो पुहुष उठी असबानी । सुनहु योग संतायन ज्ञानी ॥ हंसन कहैं अब आव लिवाई । दरश कराइ लेउ तुम आई ॥
छन्द
ज्ञानीखाउ हंस लग तब, हंस सकला ले गये ॥ पुरुषदर्शन पाय हंसा, रूप शोभा तब भये ॥ करहिं दंडवत हंस सबही, पुरुष पहुँ चित लाइया ॥ अमीफल तब चार दीन्हों, हंस सब मिल पाइया ॥ ६३ ॥ सो०—जस रविके परकाश, दरश पायपंकज खुले ॥ तैंसैं हंस विलास, जन्म जन्म दुखमिटि गयो ॥ ६६ ॥
इन्द्रमतीको लोकमें पहुँच पुरुष और करणामयको एकही रूपमें देखकर चकित होना
पुरुष कांति जब देखेउ रानी । अद्भुत अमी सुधाकी खानी ॥ गदगद होय चरण लपटानी । हंस सुबुद्धि सुजन गुणज्ञानी ॥ दीनों शीश हाथ जिव मूला । रविप्रकाश जिमि पंकज फूला ॥
इन्द्रमती वचन
कह रानी तुम धनिकरुणामय । जिमिभ्रममेटि आनियहिठामय
( ९२ )
अनुरागसागर
पुरुष वचन
कहा पुरुष रानी समझायी । करूणामय कहँ आनु बुलाई॥
कबीरवचन धर्मदासप्रति
नारि धाय आई मो पासा । महिमा देखि चकित भये दासा॥
इन्द्रमतीवचन
कह रानी यह अचरज आही । भिन्न भाव कछु देखों नाहीं ॥ जे कोइ कला पुरुष कहँ देखा । करूणामय तन एक विशेषा॥ धाय चरण गह हंस सुजाना । हे प्रभु तब चरित्र सब जाना॥ तुम सतपुरुष दास कहलाये । यह शोभा कस कहाँ छिपाये॥ मोरे चित यह निश्चय आई । तुमहि पुरुष दूजा नहिं भाई॥ सो मैं आय देख यहि ठाई । धनसमरथ मुहिं लिया जगाई॥
इन्द्रमती स्तुति करती है । छन्द
तुम धन्य हो दयानिधान सुजान नाम अर्चितयं ॥ अकथ अविचल अमर अस्थित अनघ अजसु आदिये ॥ असंशय निःकाम वाम अनाम अटल अखंडितं ॥ आदि सबके तुमहि प्रभु हो सर्व भूतसमीपतं ॥ ६४ ॥ सो ०-मोपर भये दयाल, लियहु जगाई जानि निज ॥ काटेहु यमको जाल, दीन्हो सुखसागर करी ॥ ५७ ॥
कबीरवचन धर्मदासप्रति
संपुट कमल लगे तेहि बारा । चले हंस निज दीप मैझारा ॥
करूणामय ( ज्ञानी ) वचन इन्द्रमतीप्रति
ज्ञानी बूझें रानी बाता । कहो हंस तुम्हरो विख्याता ॥ अब दुख द्रंद तोर मिटि गयऊ । षोडश भानु रूप पुनि भयऊ ॥ ऐसे पुरुष दया तोहि कीन्हा । संशय सोग मेंटि तुव दीन्हा ॥
अनुरागसागर
( ९३ )
इन्द्रमतीका अपने पति राजा चन्द्रविजयको लोकमें लानेके लिये विनती करना इन्द्रमती वचन
इन्द्रमती कह दोउ कर जोरी । हे साहिब इक विनती मोरी ॥ तुम्हरे चरण भागते पायी । पुरुष दर्श कीन्हा हम आयी ॥ अंग हमार रूप अति सोही । इक संशय व्यापे चित मोही ॥ मो कहैं भयो मोह अधिकारा । राजापति आहि हमारा ॥ आनहु ताहि हंसपति राई । राजा मोर कालमुख जाई ॥
कृष्णा वचन
कहे ज्ञानी सुन हंस सुजाना । राजा नहिं पाये परवाना ॥ तुम तो हंसरूप अब पाया । कौनकाज कहैं राव बुलाया ॥ राजा भाव भक्ति नहिं पाया । सत्त्वहीन भव भटका खाया ॥
इन्द्रमती वचन
हे प्रभु हम जग माँह रहेऊ । भक्तितुम्हारि बहुत विधि करेऊ ॥ राजा भक्ति हमारी जाना । हम कहैं बरजेउ नहीं सुजाना ॥ कठिन भाव संसार सुभाऊ । पुरुष छोड़ कहु नारि रहाऊ ॥ सब संसार देहि तिहि गारी । सुनतहि पुरुष डार तेहि मारी ॥ राज काज अतिमान बड़ाई । पाखंड क्रोध और चतुराई ॥ साधु संतकी सेवा करऊ । राजकेर त्रास ना डरऊ ॥ सेवा करौ संतकी जबहीं । राजा सुनि हरषित हो तबहीं ॥ जो मोहिं तजि न देता राजा । तो प्रभु मोर होत किमि काजा ॥
छन्द
रायकी हम हती प्यारी, मोहिं कबहुँ न बरजेऊ ॥ साधु सेवा कीन्ह नित हम, शब्द मारग चीन्हैऊ ॥ चरण मो कहैं मिलत कैसे, मोहि बरजत रायजो ॥ नामपाननमिलत मोकहैं, कैसे सुधरत काजजो ॥ ६५ ॥
( ९४ )
अनुरागसागर
सो०-धन्य राय सुज्ञान, आनहु ताहि हंस ॥ तुम गुरुदयानिधान, भूपति बंद छुड़ाइये ॥६८॥
कबीरवचन धर्मदासप्रति
सुन ज्ञानी बहुतै विहँसाये । चले तुरंग बार नहिं लाये ॥ गढगिरनार बेगि चलि आया । नृपति केरि अवधी नियराया ॥ घेरेचो ताहि लेन यमराई । राजहि देत कष्ट बहुताई ॥ राजा परे गाढ़ महाँ आया । सतगुरु कहै तहाँ गुहराया ॥ घोड़े नृप नाहीं यमराई । ऐसे भक्ति चूक है भाई ॥ भक्ति चूक कर ऐसे ख्याला । अवधि पूर यम करे विहाला ॥ चन्द्रविजयका करगहि लीन्हा । तत्क्षण लोक पयाना दीन्हा ॥ रानी देखि नृपति ढिग आई । राजा केर गह्यो तब पाई ॥
इन्द्रमती वचन
इन्द्रमती के सुनहु भुवारा । मोहि चीन्हों मैं नारि तुम्हारा ॥
राजा चन्द्रविजय वचन
राय कहैं सुनु हंस सुजाना । वरण तोर षोडश शशिमाना ॥ अंग अंग तोरे चमकारी । कैसे कहाँ तोहि मैं नारी ॥ तुम तो भक्त कीन्ह भल नारी । हमहू कहैं तुम लीन्ह उबारी ॥ धन्य गुरु अस भक्ति दृढ़ाई । तोरि भक्ति हम निज घर पाई ॥ कोटिन जन्म कीन्ह हम धर्मा । तब पाई अस नारि सुकर्मा ॥ हम तो राजकाज मनलाया । सतगुरु भक्ति चीन्ह नहिं पाया ॥ जो तुम मोरि होत ना नारी । तो हम जात नरककी खानी ॥ तुवगुण मोहि वरणि ना जाई । धनगुरु धन्य नारि हम पाई ॥ जस हम तो कहैं पायउ नारी । तैसे मिले सकल संसारी ॥
कबीरवचन धर्मदासप्रति
मुनत वचन ज्ञानी वहसायी । चन्द्रविजय कहैं वचन मुनायी ॥
सुपच सुदर्शनकी कथा
अनुरागसागर
( १५ )
कहणा मय वचन
सुनो राय तुम नृपति सुजाना । जो जिव शब्द हमारा माना ॥ ते पुनि आय पुरुष दरबारा । बहुरि न देखे वह संसारा ॥ हंस रूप होवे नर नारी । जो निजमाने बात हमारी ॥ पुरुष दर्श नरपति चितलायी । हंस रूप शोभा अतिपायी ॥ षोडश भानु रूप नृप पावा । जानुमयंकम ढार बनावा ॥
धर्मदासवचन छन्द
धर्मदास विनती करे, युग लेख जीव सुनायऊ ॥ धन्य नाम तुम्हारा साहिब, राय लोक समायऊ ॥ तत्त्वभाव न गहेउ राजा, भक्ति तुव निजठानिया ॥ नारिभक्ति प्रतापते, यमराजसै नृप आनिया ॥६६॥ सो०-धन्यनारिकोज्ञान, लीन्ह बुलायस्व नृपति कहैं ॥ आवागमन नशान, जगमें बहुरि न आइया ॥६९॥ ता पीछे पुनि का प्रभु कीना । सोई कथा कहो परबीना ॥ कैसे पुनि आये भवसागर । सो कहिये हंसन पतिनागर ॥
कबीरवचन धर्मदासप्रति
धर्मनि पुनि आये जगमाहीं । रानी पति ले गये तहांहीं ॥ राख्यो ताहि लोक मंझारा । तत छिन पुनि आयउ संसारा ॥ काशी नगर तहां चलि आये । नाम सुदरशन सुपच जगाये ॥
सुपच सुदर्शनकी कथा
नाम सुदर्शन सुपच रहाई । ता कहे हम सतशब्द दृढाई ॥ शब्द विवेकी संत सुहेला । चीन्हा मोहि शब्दके मेला ॥ निश्चय वचन मान तिन्ह मोरा । लखि परतीत वंदि तिहि छोरा ॥ नाम पान दियो मुक्ति सँदेशा । मेटचो सकल काल कलेशा ॥
कलियुगमें कबीरसाहबके पृथ्वीपर आनेका वृत्तांत
( ९६ )
अनुरागसागर
शब्द ध्यान तेहि दीन्ह हढाई । हरषित नाम सुमिरे चितलाई॥ सतगुरु भक्ति करे चितलाई । छोडी सकल कपट चतुराई॥ तात मात तेहि हर्ष अपारा । महाप्रेम अतिहित चितधारा॥ धर्मनि यह संसार अँधेरा । विनु परिचय जिव यमको चेरा॥ भक्ति देखि हर्षित हो जायी । नाम पान हमरो नहिं पाईं ॥ प्रगट देखि चीन्हे नहिं मूढ़ा । परे कालके फन्द अगूढ़ा ॥ जैसे श्वान अपावन रांचेउतिमिजगअमीछोड़िविषखांचेउ नृपति युधिष्ठिर द्वापर राजा । तिन पुनि कीन्ह यज्ञको साजा ॥ बन्धु मार अपकीरति कीन्हा । ताते यज्ञरचनके चित दीन्हा ॥ कृष्ण केर जब आज्ञा पाई । तब पांडव सब साज मँगाईं ॥ यज्ञकी सामग्री गहि सारी । जहाँ तहाँते सब साधु हँकारी ॥ पाण्डव प्रति बोले यदुपाला । पूरन यज्ञ जान तिहिंकाला ॥ घण्ट अकाश बजत सुनि आवे । यज्ञको फल तब पूरन पावे ॥ संन्यासी वैरागी झारी । आवे ब्राह्मण औ ब्रह्मचारी ॥ भोजन विविध प्रकार बनाई । परम प्रीतिसे सबहिं जेवाईं ॥ इच्छा भोजन सब मिलि पावा । घण्ट न बाजा राय लजावा ॥ जबहि घण्ट न बाज अकाशा । चकित भयोराय बुधिनाशा ॥ भोजन कीन सकल ऋषिराया । बजा न घण्ट भूप भ्रम आया ॥ पांडव तबहिं कृष्णपह गयऊ । मन संशय करि पूछत भयऊ ॥
युधिष्ठिर वचन
करिके कृपा कहो यदुराजा । कारण कौन घण्ट नहिं बाजा ॥
कृष्ण उत्तर
कृष्ण अस कारण तासु बताया । साधू कोइ न भोजन पाया ॥
१ “शब्द ध्यान” के बदले किसी प्रतियोगी “ सुरति ध्यान ” लिखा है ।
अनुरागसागर
( १७ )
युधिष्ठिरवचन
चकित भै तब पाण्डव कहेऊ । कोटिन साधु भोजन लहेऊ॥ अब कहैं साधु पाइय नाथा । तिनते तब बोले यदुनाथा ॥
कृष्ण वचन
सुपच सुदर्शनको ले आवो । आदरमान समेत जिमावो ॥ सोई साधु और नहिं कोई । पूरन यज्ञ जाहिते होई ॥
कबीरवचन धर्मदास प्रति
कृष्ण आज्ञा जब अस पयऊ । पाण्डव तब ताके ढिग गयऊ॥ सुपच सुदर्शनको ले आये । विनय प्रीतिसे ताहि जेवाये ॥ भूपभवन भोजन कर जबहीं । बजा आकाशमें घंटा तबहीं ॥ सुपच भक्त जब त्रास उठावा । बाजो घण्ट नाम परभावा ॥ तबहुँ न चीन्हे सतगुरु बानी । बुद्धि नाश यम हाट विकानी ॥ भक्त जीव कहैं काल सताये । भक्त अभक्त सबन कहैं खाये ॥ कृष्ण बुद्धि पांडव कहैं दीन्हा । बंधु घात पांडव तब कीन्हा ॥ पुनि पांडव कहैं दोष लगावा । दोष लगा तेहिं यज्ञ करावा ॥ ताहूपर पुनि अधिक दुखावा । भेजि हिमालय तिन्हैं लगावा ॥ चार बंधु सह द्रौपदि गहेऊ । उबरे सत्य युधिष्ठिर रहेऊ ॥ अर्जुन सम प्रिय और न आना । ताकर अस कीन्हा अपमाना ॥ बलि हरि चन्द्र करण बड़ दानी । काल कीन्ह पुनि तिन्हकी हानी ॥ जिव अचेत आशा तेहि लावे । खसम बिसार जारको धावे ॥ कला अनेक दिखावे काला । पीछे जीवन करे बिहाला ॥ मुक्ति जान जिव आशा लावै । आशा बांधि कालमुख जावै ॥ सब कहैं काल नचावै नाचा । भक्त अभक्त कोइ नहिं बाचा ॥ जो रक्षक तेहि खोजे नाहीं । अनचीन्हे यमके सुख जाहीं ॥ बार बार जीवन समुझावा । परमारथ कहैं जीव चितावा ॥
( ९८ )
अनुरागसागर
अस यम बुद्धि हरी सब केरी । फंद लगाय जीव सब घेरी ॥ सत्य शब्द कोइ परखे नाहीं । यम दिशि होय लरै हम पाहीं ॥ जबलगि पुरुष नाम नहिं भेटे । तब लगि जन्म मरण नहिं भेटे ॥ पुरुष प्रभाव पुरुष पहुँ जाई । कुत्रिम नामते यम धरिखाई ॥ पुरुष नाम परवाना पाये । कालहि जीत अमर घर जावे ॥
चन्द्र
सत नाम प्रताप धर्मनि, हंस लोक सिधार्वई ॥ जन्ममरणको कष्ट भेटै, बहुरि न भव जल आवई ॥ पुरुषकी छबि हंस निरखहि, लहे अति आनंद घना ॥ अंश हंस मिलिकरै कुतूहल, चन्द्र कुमुदिनि सँग बना ६६ सो०—जैसे कुमुदिनि भाव, चन्द्र देखि निशि हर्षई ॥ तैसह हंस सुख पाव, पुरुष दर्शके पावते ॥ ७० ॥ नहिं मलीन सुखभाव, एक प्रभाव सदा उदित ॥ हंस सदा सुख पाव, शोक मोह दुख क्षण कनहि ॥ ७१ ॥ जबै सुदर्शन देका पूरा । ले सत लोक पठायो सूरा ॥ मिले रूप शोभा अधिकारा । हंसन संग कुतूहल सारा ॥ षोडश भानु रूप तब पावा । पुरुष दर्श सो हंस जुड़ावा ॥
धर्मराय वचन
हे साहिब इक बिनती मोरा । खसम कबीर कहु बंदी छोरा ॥ भक्त सुदरशन लोक पठायी । पीछे साहिब कहाँ सिधायी ॥ सो सतगुरु कहो सुदि संदेशा । सुधा वचन सुनि मिटै अँदेशा ॥
कबीर वचन
अब सुनु धर्मनि परम पियारा । तुमसों कहौं अलग व्यवहारा ॥ द्रापर गत कलियुग परवेशा । पुनि हम चल जीवन उपदेशा ॥ धर्मराय कहैं देख्यो आई । मोहि देखि यम गयो मुझाई ॥
अनुरागसागर
( ९९ )
धर्मराय वचन
कहे धर्म कस मोहिं दुखावहु । भन्छ हमार लोक पहुँचावहु॥ तीनों युग गवने संसारा । भवसागर तुम मोर उजारा॥ हारी वचन पुरुष मोहि दीन्हा । तुम कस जीव छुड़ावन लीन्हा॥ और बंधु जो आवत कोई । छिनमहैं ताकहैं खाँव विलोई॥ तुमते कछु न मोर बसाई । तुम्हरे बल हंसा घर जाई ॥ अब तुम फेर जाहु सगमाहीं । शब्द तुम्हार सुनै कोउ नाहीं॥ करम भरम मम असकै ठाटा । ताते कोई न पावै वाटा ॥ घर घर भरम भूत उपजावा । धोखा दे दे जीव नचावा ॥ भरत भूत है सब कहैं लागे । तोहि चिन्है ताकहैं भ्रम भागे ॥ मद्य मांस खावै नर लोई । सर्व मांस प्रिय नरको होई ॥ आपन पंथ मैं कीन परगासा । मांम मद्य सब मानुष त्रासा ॥ चण्डी जोगिन भूत पुजाओं । यही भ्रम है जग जहै माडाओं॥ बांधि बहुफंदहिं फन्द फन्दाओ । अंतकाल कर सुधि बिसराओ॥ तुम्हरी भक्ति कठिन है भाई । कोई न मनिहैं कहौं बुझाई ॥
ज्ञानी वचन
धर्मरायते बड़ छल कीन्हा । छल तुम्हार सकलो हम चीन्हा॥ पुरुष वचन दूसर नहिं होई । ताते तुम जीवन कहैं खोई ॥ पुरुष मोहि जो आज्ञा देही । तो सब होय नाम सनेही ॥ ताते सहजहिं जीव चेताऊँ । अंकुरी जीव सकल मुकताऊँ॥ कोटि फन्द जो तुम रचिराखा । वेद शास्त्र निज महिमा भाखा ॥ प्रकट कला जो धरि जग जाऊँ । तो सब जीवनको मुकताऊँ ॥ जो अस करौं वचन तब डोलै । वचन अखंड अड़ोल अमोलै॥ जो जियरा अंकुरी शुभ होई । शब्द हमार मानि है सोई ॥ अंकुरी जीव सकल मुकताओं । फन्दा काटि लोक लैजाओं ॥ काटि भरम जो देहौं ताही । भरम तुम्हार मानि हैं नाहीं ॥
धर्मरायका बाट रोकना और कबीर साहबका उसे परास्त कर आगे बढ़ना
( १०० )
अनुरागसागर
छन्द
सत्य शब्द दिदाय सबहीं, भ्रम तोरि सब डारिहौं ॥ छलतोर सब चिन्हाइ तवहीं, नामबल जियतारिहौं ॥ मनवचनसत्य जो मोहि चीन्ही, एकतत्त्वलौं लाइहौं ॥ तवसीस तुम्हारे पांव देहीं, अमललोक जिव आइहै ६८ सो ०-मर्दहि तोरा मान, सूरग हंस सुजान कोइ ॥ सत्यशब्द सहिदान, चीन्हहि हंसहरषअती ॥७२॥
धर्मराय वचन
कहै धर्म जीवन सुखदाई । बात एक सुहि कहो बुझाई ॥ जो जिव रहे तुम्हैं लौं आई । ताके निकट काल नहिं जाई ॥ दूत हमार ताहि नहिं पावै । मूर्छित दूत मोहि पहीं आवै ॥ यह नहिं बूझ परी मोहिं भाई । तौन भेद मोहिं कहो बुझाई ॥
ज्ञानीवचन
सुनहु धर्म जो पूछेहु मोही । सो सब हाल कहो मैं तोहीं ॥ सुन धर्म तुम सत सहिदानी । सोतोसत्य शब्द आहि निर्वानी ॥ पुरुष नाम है गुप्त परमाना । प्रकट नामसत हंस बखाना ॥ नाम हमार हंस जो गहई । भवसागर सो सो निरबहई ॥ दूत तुम्हार होय बल थोरा । जब मम हंस नाम ले मोरा ॥
धर्मराय वचन
कहै धर्म सुनु अन्तर्यामी । कृपा करो अब मोपर स्वामी ॥ यहि युग कौन नाम तुव होई । सो जनि मोपर राखहु गोई ॥ वीरा अंक गुप्त गन आऊ । ध्यान अंग सब मोहि बताऊ ॥ केहि कारण तुम जाहु संसारा । सोइ कहहु मोहि भेद गुन न्यारा ॥ हमहूँ जीवन शब्द चेतायब । पुरुषलोक कहैं जीव पठायब ॥ मोहिं दास आपन कर लीजै । शब्द सार प्रभु मोकहैं दीजै ॥
निरंजनका कबीर साहबसे नामभेद पूछना
अनुरागसागर
( १०१ )
ज्ञानी वचन
सुनहु धर्म तुम कस छल करहु । प्रगट सुदास गुप्त छल धरहु ॥ गुप्त भेद नहिं देहौं तोहीं । पुरुष अवाज कही नहिं मोहीं ॥ नाम कबीर मोर कलिमाहीं । कबीर कहत यम निकट न जाहीं
धर्मराय वचन
कहे धर्म तुम मोहिं डुरै हो । खेल एक पुन हमहु खेलै हो ॥ ऐसी छल बुधि करब बनाई । हंस अनेक लेव संग लाई ॥ तुम्हार नाम ले पंथ चलायब । यहि विधि जीवन धोख दिखायब
ज्ञानी वचन
अरे काल तू प्ररुष द्रोही । छलमति कहा सुनावसि मोही ॥ जो जिव होई है शब्द सनेही । छल तुम्हार नहिं लागै तेही ॥ जौहरी हंस लेहिं पहिचानी । परखि हैं ज्ञान ग्रंथ मम वानी ॥ जेहि जीव मैं थापब जाई । छल तुम्हार तेहि देव चिन्हाई ॥
कबीर वचन धर्मदासप्रति
यहि सुनत धर्मराय गहु मौना । है अन्तर्धान गयो निज भौना ॥ धर्मनि कठिन काल गति नन्दा । छल बुध कै जीवन कहैं फन्द्रा ॥
धर्मदास वचन
कह धर्मनि प्रभु मोहि सुनाओ । आगल चरित्र कहि समझाओ ॥
जगन्नाथ मंदिरकी स्थापनाका वृत्तान्त
कबीर वचन धर्मदासप्रति
राजा इन्द्रदमन तेहि काला । देश उड़ेसेको महिपाला ॥
सदगुरु वचन
राजा इन्द्रदमन तहैं रहई । मंडप काज युगति सो कहई ॥ कृष्ण देह छांड़ी पुनि जबही । इन्द्रदमन सपना भा तबही ॥ स्वप्नेमें हरि अस ताहि बताई । मेरो मंदिर देहु उठाई ॥ मोकहैं स्थापन कर राजा । तोपह मैं आयउ यहि काजा ॥
( १०२ )
अनुरागसागर
राजा यहि विधि सपना पाई । ततक्षण मंडप काम लगाई॥ मंडप उठा पूर्ण भा कामा । उदधि आय बोरा तेहि ठामा॥ पुनि जब मंदिर लाग उठावा । क्रोधवंत सागर तब धावा ॥ क्षणमें धाय सकल सो बोरे । जगन्नाथको मंदिर तोरे ॥ मंडप सो षट बार बनायी । उदधि दौर तिहिं लेत डुबायी॥ हारा नृप करि यतन उपायी । हरिमंदिर तहैं उठे न भाई ॥ मंदिरकी यह दशा विचारी । वर पूरब मन माहिं सम्हारी॥ हम सन काल मांग अन्याई । बाचा बन्ध तहाँ हम जाई॥ आसन उदधि तीर हम कीन्हा । काहू जीव न मोही चीन्हा ॥ पीछे उदधि तीर हम आई । चौरा तहैं बनायउ जाई ॥ इन्द्रदमन तब सपना पावा । जहो राय तुम काम लगावा॥ मंडप शंक न राखो राजा । इहवाँ हम आये यहि काजा॥ जाहु बेगि जनि लावहु बारा । निश्चय मानहु वचन हमारा॥ राजा मंडप काम लगायो । मंडप देखि उदधि चल आयो॥ सागर लहर उठी तिहि बारा । आवत लहर क्रोधचित धारा॥ उदधि उमंग क्रोध अति आवे । पुरुषोत्तम पुर रहम ना पावे॥ उमंगेउ लहर अकाशे जायी । उदधि आय चौरा नियरायी॥ दरश हमार उदधि जब पाई । अति भय मान रहो ठहराई॥
छन्द
रूप धारयो विप्रको तब, उदधि हमपहैं आइया ॥ चरण गहिके माथ नायो, सर्म हम नहिं पाइया ॥
उदधि वचन
जगन्नाथ हम भोर स्वामी, ताहि ते हम आइया ॥ अपराध मेरो क्षमा कीजे, भेद अब हम पाइया ॥ ६९ ॥
अनुरागसागर
( १०३ )
सो०-तुम प्रभु दीनदयाल, रघुपति बोइल दिवाइये। वचन करो प्रतिपाल कर जोरै विनती करो ॥७३॥ कीन्हेउ गवन लंक रघुबीरा । उदधि बाँध उतरे रणधीरा ॥ जो कोइ करै जोरावरि आयी । अलखनिरंजन बोइल दिखाई ॥ मोपर दया करहु तुम स्वामी । लेउ ओइल सुनु अन्तरयामी ॥
कबीर वचन
ओइल तुम्हार उदधि हम चीन्हा । बोरहु नगर द्वारका दीन्हा ॥ यह सुनि उदधि धरे तब पाई । चरण टेकिके चले हरषाई ॥ उदधि उमङ्ग लहर तब धायी । बोरचो नगर द्वारका जाई ॥ मण्डप काम पूर तब भयऊ । हरिको थापन तहवाँ कियऊ ॥ तब हरि पण्डन स्वपन जनावा । दासकबीर मोहिपहँ आवा ॥ आसन सागर तीर बनायी । उदधि उमङ्ग नीरतहँ आयी ॥ दरश कबीर उदधि हट जाई । यहि विधि मण्डप मोर बचाई ॥ पण्डा उदधि तीर चलि आये । करि अस्नान मंडप चलि आये ॥ पण्डन अस पासंड लगायी । प्रथम दरश मछेच्छ दिखायी ॥ हरिके दर्शन मैं नहिं पावा । प्रथमहि हम चौरालग आवा ॥ तब हम कौतुक एक बनाये । कहाँ वचन नहिं राखु छिपाये ॥ मंडप पूजन जब पण्डा गयऊ । तहँवा एक चरित अस भयऊ ॥ जहँ लग मूरति मण्डप माहीं । भये कबीर रूप धर ताहीं ॥ हर मूरति कहँ पण्डा देखा । भये कबीर रूप धर भेखा ॥ अक्षत पुहुप ले विप्र भुलाई । नहिं ठाकुर कहँ पूजहुँ भाई ॥ देखि चरित्र विप्र सिर नाया । हे स्वामी तुम मर्म न पाया ॥
पण्डा वचन
हम तुम काहि नहीं मनलाया । ताते मोहि चरित्र दिखाया ॥ क्षमा अपराध करो प्रभु मोरा । विनती करो दोइ करजोरा ॥
जगन्नाथकी स्थापना का वृत्तांत
( १०४ )
अनुरागसागर
कबीर वचन । छन्द
वचन एक मैं कहों तोसों, विप्र सुनु तू कान दे ॥ पूज ठाकुर दीन्ह आयसु, भाव दुविधा छोड दे ॥ भ्रम भोजन करे जो जिव, अंगहीन हो ताहिको॥ करे भोजन छूत राखे, सीस उठटे ताहिको ॥७०॥ सोरठा-चौराकरिव्यवहार, भ्रमाविमोचनज्ञानहृद ॥ तहाँते कियो पसार, धर्मदास सुनु कानदे ॥७१॥
धर्मदास वचन
धर्मदास कहे सतगुरु पूरा । तुम प्रसाद भयो दुख दूरा ॥ जेहि विधि हरि कहँ थापउ जाई । सो साहिब सब मोहिँ सुनाई ॥ ता पीछे कहवों तुम गयऊ । कौन जीव कैसे सुकतयऊ ॥ कलयुगकेर कहो परभाऊ । और हंस परमोषेउ काऊ ॥ सो माहि वरणि कहो गुरुदेवा । कौन जीव कीन्ही तुम सेवा ॥
कबीर वचन
धर्मदास तुम बूझहु भेदा । सो सब हमसों कहो निषेदा ॥
चार गुरुकी स्थापनाका वृत्तांत
सुनहु सन्त यह ज्ञान अनुषा । गज थलदेस परमोध्यो भूषा ॥
रायबंकेजी
रायबंकेज नाम तेही आही । दीनेउ सार शब्द पुनि ताही ॥ कीन्ह्यो ताहि जीवन कडिहारा । सो जीवनका करै उबारा ॥
सहतेजी
शिलमिली दीप तहाँ चलि आये । सहतेजी एकसन्त चिताये ॥ ताहुको कडिहारी दीन्हा । जब उन मोकहँ निजकर चीन्हा ॥
१ किसी ग्रन्थमें यह चौपाई ऐसे लिखी है— सुनो संत यह कथा अनुषा । गज अस्थल परमोध्यो भूषा ॥
जगुजी
अनुरागसागर
( १०६ )
चतुरभुज
तहाँते चलि आये धर्मदासा । राय चतुरभुजपति जहँ वासा ॥ ताकर देश आहि दरभङ्गा । परखिसि मोहि सतपर संगा ॥ देखि अधीन ताहि समझावा । ज्ञान भक्ति विधि ताहि हद्दावा ॥ हद्दाता देखि ताहि पुनि थापा । मिला मोहि छाडि भ्रम आपा ॥ मायामोह न तनिको कीन्हा । अमर नाम तब ताही दीन्हा ॥ ताहूँ कहँ कडिहारी दीन्हा । चतुरभुजशब्द हेत करि लीन्हा ॥
छन्द
हँस निरमल ज्ञान रहनी, गहनी नाम उजागरा ॥ कुल कानि सबै बिसारि विषया, जौहरी गुण नागरा ॥ चतुरभुज बंकेज औ सहतेज, तुम चौथ सही ॥ चारिहँ कडिहार जिवके, गिरानिश्चल हम कही ७१ ॥ सो०-जम्बुदीपके जीव, तुम्हरी बाँह मोकहँ मिला ॥ गहे वचन दृढ पीव, ताहि काल पावे नहीं ॥ ७५ ॥
धर्मदास वचन
धन सत गुरु तुम मोहिं चेतावा । काल फंदसे मोहिं मुक्तावा ॥ मैं क्रिकर तुम दासके दासा । लीन्हों मोरि काटि जमफांसा ॥ मोते चित अतिहरष समाना । तव गुण मोहिं न जाय बखाना ॥ भागी जीव शब्द तुव माना । पूरण भाग जो तुव व्रत ठाना ॥ मैं अघकर्मि कुटिल कठोरा । रहेउँ अचेत भ्रम जिव मोरा ॥ कहा जानि तुम मोहिं जगाये । कौने तप हम दशन पाये ॥ सो समुझाय कहो जियमूला । रबि तब गिरा कमल मनफूला ॥
धर्मदासके पिछले जन्मोंकी कथा कबीर वचन
इच्छा कर जो पूछा मोही । अब मैं गोइ न राखौं तोही ॥ धर्मनि सुनहु पाछली बाता । तोहि समझाय कहों विख्याता ॥
धर्मदासके पिछले जन्मकी कथा
( १०६ )
अनुरागसागर
सन्त सुदर्शन द्वापर भयञ् । तासुकथा तोहि प्रथम सुनयञ् ॥ तेहि ले गयो देशनिज जबहीं । विनती बहुत कीन तिन तबहीं ॥
सुपच वचन
कहे सुपच सतगुरु सुनलीजै । हमरे मात पिता गति दीजै ॥ बन्दी छोड़ करो प्रभु जाई । यमके देश बहुत दुख पाई ॥ मैं बहु भांति पिता समुझावा । मातु पिता परतीति न पावा ॥ बालकवत नहिं ज्ञान सिखावा । भक्ति करत नहिं मोहि डरावा ॥ भक्ति तुम्हारी करन जब लागे । कबहुँ न द्रोह कीन्ह मम आगे ॥ अधिक हर्ष ताही चित होई । ताते विनती करौ प्रभु सोई ॥ आनहु तेहि सत शब्द दृढ़ाई । बन्दीछोर जीव सुकताई ॥
कबीर वचन धर्मदासप्रति
विनती बहुत संत जब कीन्हा । ताकर वचन मान हम लीन्हा ॥ ताकर विनय बहुरि जग आवा । कलियुग नाम कबीर कहावा ॥ हम इक वचन निरंजन हारा । वाचा बंध उदनि पगु धारा ॥ और दीप हंसन उपदेशा । जम्बुदीप पुनि कीन प्रवेशा ॥ सन्त सुदर्शनके पितु माता । लक्ष्मी नर हर नाम सुहाता ॥ सुपच देह छोड़ी तिन भाई । मानुष जन्म धरे तिन आई ॥
सुपच सुदर्शन माता पिताके पहला जन्म कुलपति और महेश्वरीकी कथा
सन्त सुदर्शन केर प्रतापा । मानुष देह विप्रके छापा । दोनों जन्म होय तब लीन्हा । पुनि विधि मिलै ताहि कहँ दीन्हा ॥ कुलपति नाम विप्रकर कहिया । नारि नाम महेसरि रहिया ॥ बहुत अधीन पुत्र हित नारी । करि अस्नान सुर्यव्रत धारी ॥ अञ्जल ले विनवै कर जोरी । रुदन करे चित सुत कह दौरी ॥ तत्क्षण हम अञ्जल पर आवा । हम कहँ देखि नारि हरषावा ॥ बाल रूप धरि भेंटयो बोही । विप्र नारि गृह ले गइ मोही ॥
चन्दन साहूकी कथा
अनुरागसागर
( १०७ )
कहै नारि कृपा प्रभु कीन्हा । सूर्य व्रत करफल यह दीन्हा॥ बहुत दिवसलग तहाँ रहाये । नारि पुरुष मिल सेवा लाये॥ रहे दरिद्रते दुखी अपारा । हम मनमहँ असकीन विचारा॥ प्रथमहि दरिद्रता इनकर टारों। पुनिभक्तिमुक्तिकरवचनउचारों॥ जब हम पलना झटक झकोरा । मिलत सुवर्ण ताहि इकतोरा॥ नितप्रति सोन मिलै इक तोला । ताते भये वह सुखी अमोला॥ पुनि हम सत्य शब्द गोहराई । बहुप्रकारसे उनहि समुझाई॥ ता हृदये नहिं शब्द समायी । बालक ज्ञान प्रतीत न आई॥ ताहि देह चीन्हेसि नहिं मोहीं । भयोगुप्त तहँ तन तजि वोहीं॥
सुपच सुदर्शनके पिता माताके दूसरे जन्ममें चन्दसाहु और ऊदाकी कथा
नारि द्विज दोई तन त्यागा । दरश प्रभाव मनुजतनु जागा॥ पुनि दोनों भये अंशु मिलाऊ । रहहि नगर चन्द वारे नाऊ॥ ऊदा नाम नारी कहँ भयऊ । पुरुष नाम चन्दन धरि गयऊ॥ परसोतमते हम चलि आये । तब चन्दवारा जाइ पगटाये॥ बालक रूप कीन्ह तेहि ठामा । कीन्हेउताल माहि विश्रामा॥ कमल पत्र पर आसन लाई । आठ पहर हम तहाँ रहाई॥ पीछे ऊदा अस्नानहि आयी । सुन्दर बालक देखि लुभाई॥ दरश दियोदेहि शिशुतनधारी । लेगई बालक निज घर नारी॥ ले बालक गृह अपने आई । चन्दन साहु अस कहा सुनाई॥
चन्दनसाहु वचन
कहु नारी बालक कहँ पायी । कौने विधिते इहँवा लायी ॥ ऊदावचन
कह ऊदा जल बालक पावा । सुन्दर देखि मोर मन भावा॥ चन्दनसाहुवचन
कह चन्दनते मूरख नारी । वेगि जाहु दै बालक डारी ॥ जाति कुटुम्बहँसिहँ सब लोगा । हँसत लोग उपजे तन सोगा॥
नीमा नीरुका वृत्तांत
( १०८ )
अनुरागसागर
कबीरवचन धर्मदास प्रति
ऊदा त्रास पुरुष कर माना । चन्दन साहु जवै रिसियाना॥
चन्दनस हुवचन धर्मदास प्रति
बालक चेरी लेहु उठाई । लै बालक जल नेहु खसाई॥
कबीर वचन धर्मदास प्रति
चल चेरी बालक कहैं लीन्हा । जलमहँडारनताहिचितदीन्हा॥
चलिभइ मोहि पवारन जवहीं । अन्तरधान भयो मैं तवहीं ॥
भयउ गुप्त तेहि करसे भाई । रुदन करे दोनों बिलखाई ॥
बिकल होय मन दूदत डोलै । मुग्धज्ञान कछु मुखनहिं बोलै॥
सुपच सुदर्शनके माता पिता तीसरे जन्ममें नीमा हुए
यहिविधिबहुतदिवसचलिगयऊ।तजितनजन्मबहुरितिनपयऊ
मानुष तन जुलहा कुल दीन्हा । दोउ संयोग बहुरिविधि कीन्हा॥
काशी नगर रहे पुनि सोई । नीरू नाम जुलहा होई ॥
नारि गवन लावे मग सोई । जेठमास बरसाइत होई ॥
नारि लिवाय आय मगमाहीं । जलअचवन गहबनिताहीं ॥
ताल नाहिं पुरइन पनवारा । शिशु होय मैं तहैं पगुधारा ॥
तहाँ जस बालकै रहैं पौढाई । करौं कुतूहल बाल स्वभाई ॥
नीमा दृष्टि परी तिहि ठाऊ । देखत दर्श भयो अति चाऊ॥
जिमिरविदरशपडुमबिगसाना । धाय गयो धन रंक समाना॥
धाय गही कर लिया उठायी । बालक लै नीरूपहैं आयी ॥
जुलहा रोष कीन्ह तेहि वारी । बेगि देहु तुम बालक डारी॥
हर्ष गुनावन नारी लाई । तब हम तासो वचन सुनाई॥
१ बरसाइत बटसावित्रीका अपभ्रंश है । यह बटसावित्री व्रत ज्येष्ठ शुद्धपूर्णिमासीको होता है इसकी विस्तारपूर्वक कथा महाभारतमें है । उसी दिन कबीर साहब नीमा और नूरीको मिले थे इस कारणसे कबीर पंथियोंमें बरसाइत महात्म पंथकी कथा प्रचलित है । और उस दिन कबीरपंथी लोग बहुत उत्सव मनाते हैं
रतनाकी कथा
अनुरागसागर
( १०९ )
छन्द
सुनहु वचन हमारे नीमा, तोहि कहहु समझायके ॥ प्रीत पिछली कारणे तुहि, दरस दीन्हो आयके ॥ आपने गृह मोहि लै चलु, चीन्हिके जो गुरु करो ॥ देऊँ नाम दृढाय तो कहै, फन्द यमके नापरो ॥७२॥ सो०-सुनत वचन अस नारि, नीरूत्रास न राखेउ ॥ लै गइ गेह मैझार, काशि नगर तब पहुँचेउ ॥७६॥ नारी न मान त्रास तेहि केरा । रंक धनद सम लै चलि डेरा ॥ जोलहा देखि नारि लौलीना । लेइ चलो अस आयसु दीना ॥ दिवस अनेक रहे तेहि ठाई । कैसहु तेहि परतीत न आई ॥ बहुत दिवस तेहि भवन रहावा । बालक जान न शब्द समावा ॥
सुपुत्र सुदर्शनके माता पिताका बोथे जन्ममें मथुरामें
प्रगट होकर सत्यलोक जाना
त्रिन परतीत काजा नहि होई । दृढ कै गहहु परतीत विलोई ॥ ताहि देह पुनि मोहि न चीन्हा । जानि पुत्र मोहि संग न कीन्हा ॥ तजि सो देह बहुरि जो भाई । देह धरी सो देहुँ चिन्हाई ॥ जुलहाकी तब अवधि सिरानी । मथुरा देह धरी तिन आनी ॥ हम तहैं जाय दरश तिन दीन्हा । शब्द हमारा मानसों लीन्हा ॥ रतना भक्ति करे चितलाई । नारि पुरुष परवाना पाई ॥ ता कहै दीन्हेउ लोक निवासा । अंकुरी पठये निज दासा ॥ पुरुष चरण भेटे उरलाई । शोभा देह हंसकर पाई ॥ देखत हंस पुरुष हरषाने । सुकृति अंश कही मन माने ॥ बहुत दिवस लगि लोक रहाये । तब लगि काल जीव संताये ॥ जीवनहुः स्वअतिशय भयो भाई । तबही पुरुष सुकृत हंकराई ॥
मुकुत अंशको पृथ्वीपर भेजनेका वृत्तांत
( ११० )
अनुरागसागर
आज्ञा कीन्हा जाहु संसारा । काल अपार बल जीव दुखारा॥ लोक संदेशा ताहि सुनाओ । देह नाम जीवन मुकताओ॥ आज्ञा सुनत सुकृत हरषाये । तुरतहिं लोक पयाना आये॥ सुकृत देखि काल हरषाई । इन कहैं तो हम लेब फँसाई॥ करि उपाय बहुत तब काला । सुकृत फँसाय जलमहैं डाला॥ बहुत दिवस गयो जब बीता । एकहु जीव न कालहिं जीता॥ जीव पुकार सतलोक सुनाये । तबहीं पुरुष मोकहैं हँकराये॥
कबीरसाहबका धर्मदासजीको चितानके लिये लोकसे पृथ्वीपर
आना पुरुष वचन
पुरुष अवाज उठी तिहि बारा । ज्ञानी वेगि जाहु संसारा ॥ जीवन काज अंश पठवायी । सुकृत अंश जग प्रगटे जायी॥ दीन्ह आज्ञा तेहिको भाई । शब्द भेद वाही समझाई ॥ लावहु जीवन नाम अधारा । जीवन खेइ उतारो पारा ॥ सुनत आज्ञा वहि कीन पयाना । बहुरि न आये देश अमाना ॥ सुकृत भवसागर चलि गयऊ । काल जालते सुधि बिसरयऊ ॥ तिन कहैं जाय चितावहु ज्ञानी । जेहि ते पंथ चले निरवानी ॥ वंस व्यालिस अंस हमारा । सुकृत गृह लैहैं औतारा ॥ ज्ञानी वेगि जाहु तुम अंसा । अब सुकृत अंसकर मेटहु फँसा ॥
कबीर वचन
चलेहु हम तव सीस नवाई । धर्मदास अब तुम लग आई॥ धर्मदास तुम नीरु औतारा । आमिन नीम प्रगट बिचारा ॥ तुम तो आहू प्रिय मम अंसा । जाकारन हम कीन्हा बहुसंसा ॥ पुरुषहि आज्ञा तुमरे ढिग आये । पिछली हेतु पुनि याद कराये ॥ यहि संयोग हम दर्शन दीन्हा । धर्मनि अबकी तुम मोहि चीन्हा ॥ पुरुष अवाज कहू तुम पासा । चीन्हेहु शब्द गहो विश्वासा ॥ धाय परे चरणन धर्मदासा । नैन बारि भर प्रगट प्रगासा ॥