कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( १४ )
ज्ञानसागर
लीजे हंस जो भक्त परमाना । तीनों जुग हैं मेरे थाना ॥ चौथा जुग तबही उत्पानी । तबहि सम्हार सुनौ हो ज्ञानी॥ कैसे सम्हारो मोही समझावहु । की भक्ति जो मोहि सुनावहु॥ कहैं धर्म सुन जोग संतायन । ऐसे हंस न होय मुक्तायन ॥ हरि मन्दर मैं रचौ बनाई । तहँवा हंस करत मम नाई ॥ जो कोई गम्य न करै विचारा । सात जन्म लौं चोर हमारा ॥ सुन ज्ञानी विहँसित मन कीन्हा । कैसा हरि मंदिर का चीन्हा ॥
धर्मरायवचन
जब मम कन्या भयो प्रसंगा । मनमथ उपज्यौ भयो उमंगा ॥ चलयौ रुधिर कामिन केजबही । नख रेखा भग उपजी तबही ॥ चलयौ रुधिर ताको रज भएऊ । गर्भ प्रसंग अंड तिय ठएऊ ॥ तेहि प्रसंग तिय गुण उपराजा । तबतै अधर निरञ्जन राजा ॥ सारखी-ज्ञानी कहैं धर्म सो, छल मतौ तुम्हारै ॥ जाको मैं चेतावहुं, सो तुमहीं सो न्यार ॥
चौपाई
विनती तोर करों प्रतिपाला । जुग तीनों जीवन वर साला ॥ चौथा जुग अंश मम आवहि । नाम प्रताप हंस मुक्तावहि ॥
धर्मरायवचन
हे स्वामी वर आयसु होई । कछु मांगों अब दीजे सोई ॥ सो न करब जो सब जिव जाई । भवसागर खाली परजाई ॥ ऐसा मत ज्ञानी तुम ठाँनहु । आज्ञा पुरुष की तुमहु मानहु ॥ पुरुष बोल हारा मोहि पाहीं । सोनकरब जो सब जिय जाहीं ॥ कह ज्ञानी सब मैं मानी । कह्यौ वचन सो करब प्रमानी ॥ सतजुग त्रेता द्वापर जाई । कलियुग कौ प्रभाव जब आई ॥ चार अंश मैं कीन्हौ थाना । खुंट गहौ तो नहीं प्रमाना ॥
ज्ञानसागर
( १५ )
धर्मरायवचन
साखी--बाँवन नरसिंह अंश मम, परसराम बलवीर ॥ रामचन्द्र आगे करौ, तब पुनि कृष्ण शरीर ॥
चोपाई
कृष्ण देह छाँडव मैं जहियाँ । कलियुगचौथायुग होय तहियाँ ॥ तब हम करिहैं बौद्ध शरीरा । जगन्नाथ सरोवर के तीरा ॥ राजा इंद्र दवन परवाँना । मंडप काम लगावैं तवाँना ॥ मंडप तास उठन नहिं पाई । सायर उमंग खसावन आई ॥ तब ज्ञानी पूछैं यह बात । तोहि ते उपजै सायर साता ॥ जगन्नाथ तैं कष्ट बनाई । सायर कवनहुं भाँति खसाई ॥ हँस्यो धर्म कहि सतौ अपाना । कहौ करतूत सुनौ परिवाना ॥ दैत्य अनेक जीव जो मारौ । अंश मोर तेहि जाय सँहारौ ॥ राम रूप जब होय हमारा । तिनसौ होइ है द्रोह अपकार ॥ दैत्य अनेक जीव को फेरा । वालि वधे औ सायर तेरा ॥ वालि बैर मैं तुरत दिवायव । व्यादि फाँसी सो कृष्ण मरायव ॥
साखी--सायर बैर ना पावई, करि है वाऊ सौ घात ॥ मंडप उठन न पाइ है, जातैं कहो अस बात ॥
चोपाई
हे ज्ञानी अस मतौ विचारहु । प्रथमहि सागर तीर सुधारहु ॥ मोहिं थापहु मैं करहुं निहोरा । तातैं भाव जूरे नहिं मोरा ॥ मण्डप उठे अटल हो राजू । पुरुष वचन कहैं तुम कहैं लाजू ॥ पहिले थापहु मो कहैं ज्ञानी । सागर तीर बैठहु अन्तर्यामी ॥ कहे जोग जीत सुनो धर्मराई । पुरुष बोल मेटा नहिं जाई ॥ सतजुग त्रेता द्वापर माहीं । तीनों जुग अंश मोर जहैं जाहीं ॥ कोई कुल हंस शब्द जो पावई । तीनों जुग जीव थोरा आवई ॥ कलियुग मोर मनुष्य शरीरा । जा कहैं सुनियों नाम कबीरा ॥
सृष्टि उत्पत्तिकी कथा वर्णन
( १६ )
ज्ञानसागर
जो जिव नाम शरण गति आवै । होय निशंक लोक कहैं जावै ॥ और इकोतर नामहि पावै । तुम कह जीत हंस घर आवै ॥ माँग्यो वचन करौं प्रतिपाला । जुग तीनों जीवन वरशाला ॥ जातै पुरुष वचन अब हारा । करौं सो वचनन कौ प्रतिपारा ॥
साखी--जगन्नाथ मैं थाँपब, जायब सागर तीर ॥ हंस लोक लै आएब, देह जब धरब कबीर ॥
चौपाई
यहि प्रकार आयो ज्ञानी जबहीं । मारचो तुरत बांधके तबहीं ॥ कियो अवज्ञा गरस्यो नारी । मान सरोवरतै मार निकारी ॥
धर्मराय वचन
हे स्वामी मैं कहौं विचारी । रोकौं न हंस जो शरण तुम्हारी ॥ जो कोई जीव जो होय तुम्हारा । अपने काँध उतारौं पारा ॥ साखी--यह चरित्र सब ज्ञानी, कीन्ह धरम के पास ॥
जाय कह्यो तब पुरुष सौं, सुख साखर कीन्ह निवास ॥
चौपाई
अभैपक्ष ज्ञानकी कौ द्वीपा । तहाँ सत्ताईस द्वीप समीपा ॥ तहँकी काल खबर नहिं पाई । तहँ न सतादे काल अन्याई ॥
धर्मदास वचन
धरमदास तब कीन्ह प्रमाना । अगम अपार सुनै यह ज्ञाना ॥ हे स्वामी यह कहौं बुझाई । कौन मते अब सृष्टि बनाई ॥ सो विरंतत कहौं समुझाई । जिहिं ते मन की संशय जाई ॥ तुम्हरे वचन मोहि सार गुसाई । सुन हर्षब धन रंक की नाई ॥
साहेब कबीर वचन
कहै कबीर सुनौ धर्मदासा । जब कन्या कह्यु कीन्ह तमासा ॥ तीनों अण्ड भये तिय वारा । ताके रूप भये अधिकारा ॥
तीन देवका प्रगट होना और आदि मायाका तीनोंका काम बताना
ज्ञानसागर
( १७ )
रजगुन भाव ब्रह्मा उत्पानी । सतगुन भाव विष्णु कोजानी ॥ तमगुन भाव रुद्र का लेखा । तीनों गुन तिय अंड विशेषा ॥ जब देवी तिन सुत उत्पाने । धरमराय निद्रा अलसाने ॥ सोवत चार युग गय बीती । इक युग प्रथम अंड सौ प्रीती ॥ उठि जागै कोइ जान न भेदा । ताकी स्वांस तैं चारौं वेदा ॥ स्तुति वेद कियो पुनि तहैंवा । चतुर रूप विधाता जहैंवा ॥ मीन रूप जो कीन्ह बनाई । तीन छोड़ि रह चौथे ठाई ॥ जो तुम संशय करहु धर्मदासा । वेद चरित्र अब कहौं प्रकाशां ॥ कूर्म चाव कियोकालअन्याई । बुंद प्रसेद तहाँ पुनि पाई ॥ एक बुंद धरती परगासा । दूसरा बुन्द घट माहीं नितासा ॥ बुंद प्रभाव वेद भये ताही । ऐसे बुन्द की उत्पति आही ॥ और चरित्र जस कीन्ह भवानी । सो अब तुमसौ कहा बखानी ॥
सारखी-तीन देव जब ऊपजे, ब्रह्मा विष्णु महेश ॥ कर जोरे स्तुति करें, तैं अब कहौं संदेश ॥ आज्ञा कह मोहि माता, सोइ कहौं समुझाइ ॥ सोई करब हम निहचै, बोले तीनौ राइ ॥
ब्रह्मा करहु तुम सृष्टि उरेहा । जात जीव धरैं सब देहा ॥ कैसे करहि सो युक्ति बतावहु । क्रिया करहु जनिमोहि दुरावहु ॥ सतगुन पहिले भयो उत्पानी । तैंतिस कोटी देव बखानी ॥ रजगुन तमगुन अंड जो भयऊ । दैत्य अनेक तबहि निरमयऊ ॥ दैत्य देव सों होय संग्रामा । जो मैं कहौं करब सो कामा ॥ जाय खनावहु सागर साता । जातैं दैत्य न करें उत्पाता ॥ सागर नीर करौ उत्पानी । जाते दैत्य गति रहै भुलानी ॥ रचौ सिन्धु जल होय अपारा । तब कहि हौं आगिल व्यौहारा ॥
ब्रह्माका समुद्र खुदवाना
( १८ )
ज्ञानसागर
चल्यो ब्रह्मा मातहिं सिरनाई । सोच रह्यो कस करब उपाई ॥ बहुतक जने परिश्रम कीन्हा । चलो प्रस्वेद सोइ पगु चीन्हा ॥ साठ सहस्र बुन्द अनुसारी । बुन्द प्रभाव सबै नख धारी ॥ नख धारिन स्तुति अनुसारा । कहा कैर सुन पिता हमारा ॥
ब्रह्मा वचन
साखी--खनहु सिन्धु मम वचन इम, मन्त्र कहौं समुझाय ॥ माटी उठे जु खनत महैं, ता कह घालिब खाय ॥
चौपाई
चतुर रूप कीन्हा तिन चारी । कहौं नार सबते अधिकारी ॥ रचा सिन्धु कछु लागिनबारा । सागर सात रच्यो विस्तारा ॥ सागर नीर जब भयो प्रकाशा । नख धारिन तब काल गरासा ॥ सागर रचि ब्रह्मा अनुरागा । अडसठ तीरथरचन तबलागा ॥
साखी-गङ्गा यमुना सरस्वती, गोदावरी समान ॥ रची नदी तब गंडकी, जहैं तहैं शिल उत पान ॥
चौपाई
सालिग्राम गंडक अंकूला । पांहन पूजत पंडित भूला ॥ और नर्मदा नदी गोदावरी । सोनभद्र पुनि करमनासावरी ॥ और अनेक रच्यो विस्तारा । जाते भूल पर्यो संसारा ॥ सिन्धु सम्हार गये देवी ठाऊं । चतुर मुख आन गहे तब पाऊं ॥ हे माता आज्ञा तुम मानी । रच्यो सिंधु तुव वचन प्रवानी ॥
भावानी वचन
मथौ सिन्धु सुत कहा हमारा । वहि में पैहौ कामिनि वारा ॥ तीनों जनै चले सिर नाई । मथन सिन्धु कस करब उपाई ॥ पर्वत आनि मथनियां कीन्हा । फनपति लेह फाहरी दोन्हा ॥ मथतहि सिन्धु मतो अस कान्हा । आपन अँश उतपानहि लीन्हा ॥
भवानीकी आज्ञासे तीनों देवका छारे समुद्रको मंथन करना और उससे वेद आदिक प्रकट होना
ज्ञानसागर
( १९ )
अंश बारि महाँ पाये जबहीं । कन्या तीन उत्पन्न भई तबहीं॥ पाय कन्या तब भये आनन्दा । देवी पास चले तिय संगा ॥ ले कन्या तब आगे कीन्हा । कर जोरें प्रणाम मन दीन्हा ॥ सारखी-हे माता यह कन्या, पायो सिन्धु मझार ॥ जस कछु आज्ञा कीजिये, तस कछु करब विचार ॥
भवानी वचन चौपाई
कहे भवानि सुन ब्रह्म कुवॉरा । कामिन के तुम सदा भरतारा ॥ सावित्री ब्रह्मा कहैं दीन्हा । लक्ष्मी कृपा विष्णु पर कीन्हा ॥ पारवती रहि संकर पाँहीं । अटल अहिवात करचो भवमाहीं॥ पायो कामिनि भयो हुलासा । बहुरि विनय कियो देवी पास ॥ हे माता तुव आज्ञा सारा । जो कछु कहाँ सो करो विचारा ॥ कहे भवानी सुन ब्रह्म कुवॉरा । जाइ मथो अब सागर खारा ॥ पढ़ौ वस्तु सो आनहु जानी । अस कछु बोली आदि भवानी ॥ चले देव त्रिय लाग न वारा । मथयो सिन्धु करि हर्ष अपारा ॥ पाये वेद ब्रह्मा सो लीन्हा । विष्णु भाव सो हमहू चीन्हा ॥
सारखी-चार वेद ब्रह्मा लिया, अमृत विष्णु सम्हार ॥
मथे अनिल जो विष भया, सो लीन्हा त्रिपुरार ॥
चौपाई
यह चरित्र त्रय देव बनाया । यहि सुधि दैत्य सुने जब पाया ॥ आइ कीन्ह सब बाद विवादा । पायहु वस्तु देहु मोहिं आधा ॥ वेद अनिल विष सब तुम लेहू । सुधा आहि सो हम कहैं देहु ॥ कहैं विष्णु सुन दैत्य अधीरा । सदा खाइकर विपति शरीरा ॥ दोनो मिल अस कीन्ह विचारा । सब मिल खईये अमृत सारा ॥ दोई पांति बैठे भल जोरी । दैत्य देव तैंतीस करोरी ॥ विष्णु चरित काहू नहिं जाना । बाँटत अमृत छल जो ठाना ॥
चार खानिकी उत्पत्ति
( २० )
ज्ञानसागर
साखी-देवन अमृत पानयो, काहु न कीन्ह प्रसाद ॥ बांटत राहु तब ग्रस्यो, चन्द्र भानु कियो वाद ॥
चौपाई
जब सब मिलिकै आयसु पाई । सभा बैठ कैसे कै खाई ॥ सुनकै विष्णु क्रोध तब कीन्हा । चक्र मार राहु सिर छीना ॥ अमृत परचो ताहि के पेटा । शीश के राहु देह सो केता ॥ भयो युद्ध दोनों दल भारी । बहुत दिन लरे जो बैर सम्हारी ॥ चन्द्र भानु जो राहु सुरावा । आसै जान बैर को भावा ॥ यह चरित भयो सागर तीरा । देवी पास चले त्रय वीरा ॥ तब देवी अस मतौ विचारा । रचहुँ सृष्टिजग होइ उजियारा ॥ अंडज माता किया उत्पानी । पिंडज भाव ब्रह्मा को जानी ॥ उष्मज विष्णु कीन्ह व्यवहारा । शिव कीन्हौ रोम अठासी धारा ॥ लख चौरासी योनिन कीन्हा । आधा जल आधा थल दीन्हा ॥
साखी-जलके जीव पताल सब, औ पृथ्वी परचंड ॥ रचो अहार शंभू सबै, वनस्पती को अंग ॥
चौपाई
स्थावर मदेश जो कीन्हा । उष्मज दोइ तत्त्व कर चीन्हा ॥ तीन तत्त्व अंडज मैं दीन्हा । चार तत्त्व पिंडज को कीन्हा ॥ मुक्ति क्षेत्र नर कौ अवतारा । ता महँ पांच तत्त्व हैं सारा ॥ और जो इन में बरतै भाऊ । मनुष्य जन्म में प्रगट स्वभाऊ ॥ मनुष्य जन्म उत्तम सो होई । विना नाम पुनि जाइ बिगोई ॥ स्वासा सार तै वेद जो भएऊ । सो पुनि मीन पास ले धरेऊ ॥ एकहि सुरति तब ब्रह्मा पावा । तेहि पढिबे का मन चितलावा ॥ वेद पढ़त बूझ अस परेऊ । पृथ्वी आकाश जोत अनुसरेऊ ॥
साखी-निराकार निरंजन, सृष्टि कीन्ह उत्पान ॥ मैं जानौ भल मरेंम अब, नहि कीन्हौ आदि भवान ॥
ब्रह्माको वेद पढ़कर संदेह होना और माताकी आज्ञासे पिताकी खोजमें जाना
ज्ञानसागर
( २१ )
चौपाई
चले ब्रह्मा माता पर आये । दोई कर जोरिकै विनती लाये ॥ हे माता मैं पूछौं तोहीँ । जो पूछौं सो कहिये मोहीँ ॥ कौन पुरुष मुदि कीन्ह प्रकाशा । सो सब मातु कहौमोदि पास ॥ कहे भवनि सुतु ब्रह्म कुवौरा । पृथ्वी अकाश मैं अनुसारा ॥ मैं कीन्हा दुतिया नहिं कोऊ । तुम कस भूले सो कहु भेऊ ॥ हे माता मैं वेद विचारा । है कोई शून्यमें सिरजन हारा ॥ निरंकार निरञ्जन राया । ज्योतिअपार श्रुति गुणगाया ॥ साधु साधु कहि आदि भवानी । आदि पुरुष जेहि तैं उत्पानी ॥ कहाँ अहै सो मोहि बताओ । कृपा करो जिन मोहि डुराओ ॥
साखी—चरण सप्त पाताल हैं, सात स्वर्ग हैं माथ ॥
पुढूप लैकर परसौ, जामे होहु सनाथ ॥
चौपाई
चले ब्रह्मा मातहि शिर नाई । उत्तर पन्थ सुमेरुहि जाई ॥ जाइ ठाढ भये तिहिं अस्थाना । शून्य आद जहाँ शशि नहिं भाना ॥ बहु विधि स्तुति ब्रह्मा करई । ज्योति प्रभाव ध्यान अस धरई ॥ दुखित सुर्त जो भई तुम्हारी । स्तुति करत भये जुग चारी ॥ यहु विधि बहुत दिवस चलि गएऊ । आदि भवानी मन चित ठएऊ ॥ जेठा पुत्र जो ब्रह्म कुवौरा । कहाँ गयो वह पुत्र हमारा ॥
साखी—अब मैं करब उपाय सो, जिहि तैं ब्रह्मा आय ॥
गायत्री उत्पानऊ, ताहि कही ससुझाय ॥
चौपाई
ब्रह्मा गये पिता के ठाईँ । पिता दृश अजहूँ नहिं पाई ॥ बहुत दिवस भये बेग ले आवहु । बहुत भांति कर तिहि ससुझावहु ॥ चली गायत्री ब्रह्मा पास । तिनसौ जाइकर वचन प्रकाशा ॥
मायाका गायत्रीको उत्पन्न करके ब्रह्माको बुलानेके लिये भेजना और मायाका ब्रह्माको झूठ बोलनेके कारण शाप देकर निरंजन से आप शाप पाना
( २२ )
ज्ञानसागर
पुहुप लैकर दरशन आएहु । पिता दरश अजहूं नहिं पाएहु ॥ ब्रह्मा कहै कवन तैं आही । मोर मरम पाये किहिं पाही ॥
दर्शन
आदि भवानी मोहि उपजाई । तुमहि लैन को यहां पठाई ॥ चलहु बेगि जिन लावहु बारा । तुम विन सृष्टि न हो अनुसारा ॥ कहे ब्रह्मा कैसे मैं जाऊँ । पिता दरश अजहूं नहिं पाऊँ ॥ एक उपाय चलो सुनु बाता । तौ कहैं बात पूछिहै माता ॥ मोरे हित कह झूठ स्वभाऊ । तौ तुव संग अब धारौं पाऊ ॥ गायत्री कहैं आयसु होई । पुन परमारथ है बड सोई ॥
चौपाई
साखी-चलु ब्रह्मा माता पर, होवै सृष्टि उपाय ॥
झूठ वचन मैं भाषिकै, जाय सुनाइब माय ॥
चलि गायत्री ब्रह्मा साथी । माता प्रेम सौ चूम्यौ माथा ॥ कुशल प्रभाव सौ चूम्यौ शीसा । और मातु दियो बहुत अशीशा ॥ कैसो भयो तहां तोहि भाऊ । सो सब ब्रह्मा मोहि सुनाऊ ॥ ब्रह्मा कहै सुनौ हो माता । यह पूछौं गायत्री बाता ॥ गायत्रिहि आज्ञा भई जवही । अचरज बात कही कलु तबही ॥ परस पुहुप ले पितु ही माथा । देखो सबै रही मैं साथी ॥ आदि भवानी बहुत बिहैंसानी । दोई झूठ कही सहिदानी ॥ ज्येष्ठ पुत्र मम ब्रह्म कुंवारा । बहुत झूठ तिन वचन उचारा ॥ ब्रह्महि शाप दियो तब जानी । होहु अपूज्य कहिआदि भवानी ॥ ओ कमल केतकी अस अविश्वासा । निरघिन ठौर तोर होइ बासा ॥ गायत्री होई वृद्ध भरताग । पांच सात औ बहुत पसारा ॥
साखी-शाप्यो ब्रह्मा गायत्री, फिर पाछे पछताय ॥
क्रोध क्षमा नहिं कोन्हेऊ अबकस करे निरञ्जन राय ॥
मायाका विष्णुको पिताके खोजके लिये भेजना । विष्णुका शुक्लसे श्याम हो जाना । मायाके पास आकर विष्णुका सत्य बोलना और तीनों लोकका राज्य पाना
ज्ञानसागर
( २३ )
चौपाई
ततक्षण भई अकाश तैं वानी । नहिं भलकीन्हौं आदि भवानी॥ ऊँचे होइ जो नीच सतावै । ताकर बैर मोहि सन पावै ॥ लेहुँ बैर सुन कहा हमारा । तोरे होइ हैं पञ्च भर्तारा ॥ सतयुग त्रेतायुग जैहैं जबही । द्रापर को प्रभाव होय तबही ॥ राजा द्रुपद घर तो अवतारा । द्रौपदी नाम तोर उजियारा ॥ पांडव होई हैं कंत तुम्हारा । निश्चय मानहु कहा हमारा ॥ शाप बैर देवी जब पावा । सोच करै मनमें पछतावा ॥
साखी-सोच करा कह अब मैं, दुर्ग निरंजन राइ ॥
आइ परी वस अथम के, विष्णुहि देखौ जाइ ॥
चौपाई
सुनहु विष्णु तुम कहा हमारा । बैर गमन कर सप्त पताला ॥ जाय पिता कर परहू पाऊँ । सो सब विष्णु तोहि समुझाऊँ ॥ अच्छत पूजा लियो कर जोरी । पताल पंथ की अगम है डोरी ॥ चलत जात कछु अंत न पावा । शेष नाग विष गरल स्वभावा ॥ विष के तेज विष्णु कुम्हलाना । येहि चरित्र निरंजन जाना ॥ स्वान शरीर भय विष के ज्वाला । भइ अकाशवानी तत काला ॥ सुनहु विष्णु तुम कहा हमारा । विषम पंथ है सप्त पतारा ॥ प्रथम पतालको है अस ज्वाला । आगे होइ तोर जिव काला ॥
साखी-फिरचो विष्णु परमान इमि, कह जो दियो समुझाय ॥
मध्य पंथ है दारुन, कैसे परसौ पाय ॥
चौपाई
गरल भाव उर स्यामल अंगा । ताकर बैर कहाँ परसंगा ॥ जो को करै जीव वरियाई । दुर्ग राइ तिहि बैर दिवाई ॥ सतयुग त्रेता गत हो जबहा । द्रापर को प्रभाव हो तबही ॥
मायाका महादेवको वर देना
( २४ )
ज्ञानसागर
विष्णु भाव पुनि कृष्ण शरीरा । नाथहि काल कालिन्दी तीरा ॥ जो कुछ विष्णु पातालहि सुना । देवी पास कहौ सतगुना ॥ सुनकर देवी विहंसत भएऊ । विष्णु अशीश बहुत केदिएऊ ॥ सत्य वचन तैं भयौ डुलसा । लेउअशीश विष्णु मोहिपासा ॥ जहँ लग जीव जंतु उतपानी । सब पर विष्णु तुमहिपरमानी ॥ तीनों पुर में आन तुम्हारी । वचन मोर सुनु सत्य सुरारी ॥ साखी-यह चरित्र कर देवी, चलि जो शिव के पास ॥ कर जोरे स्तुति करै, कीन्हौ बहुत हुलास ॥
चौपाई
दोह पुत्र को मतौ सुनावा । मांगु महादेव तुम मन भावा ॥ मांगौ सो जो कीजो दाय। यह नहिं बिनसै हमरी काया ॥ वैसे होहु सुनो हो वारा । साधौ जोग जो मतौ अपारा ॥ जब लग पृथ्वी अकाश पतारा । तब लगकाया न बिनसै तुम्हारा ॥ ब्रह्मा विष्णु तजैं शरीरा । तैंतिस कोट देव रनधीरा ॥ जब लग चन्द्र सूर्य औतारा । बिनसैं न देह सुनु कहा हमारा ॥ तीनों पुत्र को कीन्ह सन्माना । तब माता अस आज्ञा ठाना ॥ रचौ सृष्टि तुम तीनों भाई । प्रथमहि कैसे युक्ति बनाई ॥ नर नारी कीन्हो दोह देहा । तातैं उपज्यो मदन सनेहा ॥ दश द्वारा सुर नर मुनि कीन्हा । धरती भार भए अकुलीन्हा ॥ साखी-दशौ दिशा तब निरमयो, भयो मनुष्य अपार ॥ पृथ्वी भई तब व्याकुल, सहि न सके अस भार ॥
चौपाई
गौ रूप हो वसुधा गयऊ । विष्णु स्थान ठाढ़ पुनि भयऊ ॥ हे स्वामी भयो मनुष्य अपारा । मोर अंग बलसहि न सम्हारा ॥ चलत पंथ नहिं भूमि अडाही । माथे पर लै हाथ चढाही ॥ मुनकै विष्णु समाध लगावा । निरंकार सौ अस्तुति लावा ॥
तीनों देवका मानुषी सृष्टिकी उत्पत्ति करना । मनुष्य की अधिकतासे पीड़ित होकर पृथ्वीका गौरूपधरके विष्णुके समीप जाना और विष्णुका अवतार लेनेका वचन देना
ज्ञानसागर
( २५ )
अहो पुरुष का करब उपाई । पृथ्वी भार बहुत अकुलाई ॥ ततक्षण भई अकाश ते वाणी । सुनहु विष्णु कर सबकी हानी॥ शिव विहाय चौदह सुत मोरा । इन्हें छांडकर शंकर ओरा ॥
सारखी-जाहु पृथ्वी घर अपने, करौं चरित अब सोय ॥ भार उतारो मही को, आज्ञा अस जो होय ॥
चौपाई
चली आय वसुधा निज गेहा । जमन विष्णु तब कीन्ह सनेहा॥ मारहु जारहु अब जिव जन्तू । सुन अन्तक सुन भयो अनंतू॥ आई पावक तब रखना लीन्हा । सबजिवमार विष्णु कहदीन्हा॥ मारे देव तैंतीस करोरी । ब्रह्मा मार मही सब घोरी ॥ कीन्हो युग निकंद भयो जबही । जुग निकंद विष्णु कियौ तबही॥ सब जीव घाल आप में लीन्हा । प्रथम स्वभाव जमन तब कीन्हा॥
सारखी-सवा लक्ष जीव विष्णु ते, चले जात नित नेम ॥ जस अनाज की कोठरी, करि कृषानु बहु प्रेम ॥
चौपाई
ले अनाज कोठी वहरावै । खरच लेइ पुन फेर सुदावै ॥ अस चरित्र कियो अन्त कराऊ । अबकछु भाखौ अगिल स्वभाऊ॥ विष्णुहिं सैं सतभाव जो देखा । छांडो अंश करौं सृष्टि उरेहा ॥ सतगुण भाव विष्णु कौ जानी । नाभि कमल ब्रह्मा उत्पानी ॥ ततक्षण ब्रह्मा गयो अकाशा । विष्णु ध्यान अस वचन प्रकाशा॥ येहो स्वामि निरंजन राया । वसुधा कैसे करौं उपाया ॥ बारी सहित मही जो बोरी । प्रकट करन की युक्ति है थोरी ॥ रजगुन भयो जो ब्रह्मा निवासा । ताकी नाभि से पवन प्रकाशा॥ तीनौं गुन तिय अंड जो भयऊ । दैत्य देह तिन दोनों धरेऊ ॥ उठि ठाढे नहिं पावहिं थाहा । गये जहां तहैं प्रभु अवगाहा ॥
( २६ )
ज्ञानसागर
करहिं युद्ध बहु भुजा पसारी । वे दोई बांह विष्णु भुजचारी ॥ बहुतक दिवस युद्ध जो कीन्हा । तिनपुनि ऐसोबोलहि लीन्हा ॥ मांगहु विष्णु देव मोहि सोई । मैं भय छल भाखौ अब सोई ॥ मधु कैंटभ तुम दैत्य अपारा । अवश्य होहु तुम वध्य हमारा ॥ होउ वध्य जहँवा जल नाहीं । दोनों गये विष्णु के ठाहीं ॥ यह चरित्र विधाता कीन्हा । तेजयजलसबसिन्धुमहँदीन्हा ॥ तबहि कियो पुन सप्त पतारा । मीन रूप वसुधा अनुसारा ॥ तेजय वल सब सिंधुमें दएऊ । उनचास कोट मेदनी ठएऊ ॥
साखी-तहां बैठ जो देवत, जब भयो पृथ्वि प्रचार ॥ तीन देव विन्ती करें, कीजै सृष्टि विचार ॥
चौपाई
प्रथमहिं सतयुग कीन्हौ थाना । कीन्हौ जीव जन्तु उत्पाना ॥ सत्यदेह पुनि भयल कुमारी । यह प्रकार रचना अनुसारी ॥ वडवा नाल अग्नि प्रकाशा । सो तीनों पुर कीन्ह निवासा ॥ कीन्होऋषिसबसहस्रअठासी । नौई नाथ सिद्ध चौरासी ॥ कीन्हौ देव प्रथम परगाशा । ये सब कीन्है अपने आशा ॥ और अनेक राजा सब कीन्हा । यह चरित्र काहू नहिं चीन्हा ॥ यहि कारण मारहिं उपजावहिं । आप स्वारथी जीव हतावहिं ॥
छंद
नहिं बूझ परत अपार महिमा सुरत ऐसी विधि कियो । बाज लगावहिं भावहु सब जीव जम के वश रह्यो ॥ तुम बूझि देखो चरित्र वाको जन न कोई बूझई । सेवा करत सब स्तुति यम जीव को अटकावई ॥ सोरठा-सुनु धर्मदास सुजान, नाम गहौ चितलाय कै । शब्द गहौ परवान, विना नाम नहिं मुक्ति फल ॥
बलिचरित्र (वामन अवतार)
ज्ञानसागर
( २७ )
धर्मदास वचन-चोपाई
धर्मदास विन्ती अनुसारी । हे स्वामी तुम्हरी बलिहारी ॥ अब मैं पायो भेद तुम्हारा । मोर मनोरथ करौ प्रतिपारा ॥ पृथ्वी केर चरित्र सुनावहु । जन्म जन्म के भाव बतावहु ॥ जग समीप हरि को विस्तारा । तुम कह्यु स्वामी अगम विचारा ॥ आदि अन्त बूझौ प्रभु राया । अब गुरु कहौ गहौ तुव पाया ॥
साहित्य कबीर वचन
सुन धर्मन मैं तोहि बुझाऊँ । हरि चरित्र सब तोहि सुनाऊँ ॥ दैत्य महा बलि भये अपारा । यज्ञ अश्वमेध कीन्ह विस्तारा ॥
बलि चरित्र
बलि भयो दानी महा प्रचंडा । स्वर्ग पताल मही नौ खंडा ॥ जो जांचै तिहि देय तुरन्ता । जांचय फिर आवै हरषन्ता ॥
छन्द
जाचक भयो जो धनी बहुविधि दीन्ह नहि कोई जग रह्यो । पाई मुक्ति वर अवराध्यौ दैत्य ऐसो वृत्त गह्यो ॥ शुक्र मन्त्री मन्त्र ठान्यो अश्वमेध यज्ञ जो कीजिये । मुक्ति बर पावै नहौ तो स्वर्ग बरबस लीजिये ॥
सोरठा-अश्वमेध रचि राज, जान महाफल मुक्ति कर । करब स्वर्ग कर राज, इन्द्र करब बस आपने ॥
चोपाई
जानी तीन लोक के भूपा । तब पुनि कीन्हो वामन रूपा ॥ तौन रूप धरि गये पताला । जहँवाँ बलि राची यज्ञ शाला ॥ प्रतिहारै तब बात जनाई । है दुज ठाढ़ सुनौ बलिराई ॥ महा पंडित मुख वेद उच्चार । आज्ञा कहा सो कहौ भुवारा ॥
( २८ )
ज्ञानसागर
सुनतहिं बलि अब धरे उपाऊ । अर्घ पाबडे कीन्ह बनाऊ ॥ नमस्कार कर पूछी बाता । आज्ञा कहा सुनौ तुम दाता ॥ माँगौं सो मोहि दीजै राऊ । दानी सुन आएऊ तोहि ठाऊ ॥ मोहि देव माँगौं जो स्वामी । महा पंडित तुम अन्तर्यामी ॥
छन्द
परनकुटी छावन चहैं महि देव तुम बलिराई हो । पग तीन माँगौं नापतै जायैं होय अटाव हो ॥ सुनि विहँसे बलिराय तबही अहो विप्र माँगौं कहा । हीरा रत्न मानिक पदार्थ छांड महिमें क्या रहा ॥ सोरठा-माँगौं थोरा दान, यही रुचि मोहि सुन नृपति । प्रथम वचन परमान, तृष्णा स्वारथ निधि कहौ ॥
चोपाई
शुक्र मंत्रि सुन शीश डुलावा । हे नृप दान मोहि नहिं भावा ॥ राजा सुनत कोथ तब कीन्हा । बृद्धि बोल मन्त्री मतिहीना ॥ लीन्हा नृपति हाथ कुशपानी । कीन्ह संकल्प मही दियो दानी ॥ मानहु विप्र वचन परवाना । लेव तहां जहँवौं मन माना ॥ तीनौं पुर तीनौं पग कीन्हा । प्रगटे हरि तब सबहिन चीन्हा ॥ देव पूरा नृप आधा पाऊँ । नातर जाय पुण्य परभाऊ ॥ लेव नापि प्रभु पीठ हमारी । तातैं विष्णु वाक्य मैं हारी ॥
छन्द
नाप दीन्ही पीठ अपनी बलि नृपति बड़ राइ हो । वाचा व्रत में बांधि राख्यो लक्षमता पैठाय हो ॥ विश्वास दीन्हा मुक्ति कौ भरमाई राख्यो तेहि हो । यही भांति प्रपंच कीन्ह्यो तपी सिद्ध सबहि हो ॥ सोरठा-बूझो सन्त मुजान, हरि दीन्हा जस मुक्ति फल । पछतइहो अन्त निदान, एक नाम जाने विना ॥
सनक सनन्दन चरित्र
ज्ञानसागर
( २९ )
सनक सनंदन चरित्र
चौपाई
सनक सनंदन चले हरषाई । पुर वैकुंठ सुमेर पर जाई ॥ जय रु विजय दोह रहैं प्रतिहारा । रोकि न तेहि न दीन पैठारा ॥ सुनिकै क्रोध ऋषि तब कीन्हा । जय रु विजय कहैं शाप जो दीन्हा ॥ हाऊ दैत्य तुम दोनों भाई । जाई रहो मृत्यु मंडल ठाई ॥ सुनिकै शाप दोनों गये जहँवा । हरि बैठे लक्ष्मी संग तहँवा ॥ कहिन जाइ तिहि ऋषिकर भाऊ । सुनकर विष्णु कीन्ह पछताऊ ॥ थोरी चूक शाप बड़ दीन्हा । नहिं भल कीन्ह अवज्ञा कीन्हा ॥ ऋषिन बुलाय कही अस बाता । है परभाव वैर कर घाता ॥
साखी—जय रु विजय कहैं शापेऊ, होहु दैत्य प्रभाव । ताको सुत तुम होहु अब, शाप का बदलौ पाव ॥
चौपाई
अब स्वामी तुम वचन प्रमाना । मो कहैं देव भक्ति भगवाना ॥ जय अरु विजय काल वश भयऊ । तिन कौ जन्म मनुष्यहि ठएऊ ॥ हिरनाकुश वा हिरनाक्ष राऊ । कीन्हा सेवा बहु शम्भू ठाऊ ॥ पा वरदान भये बलवन्ता । नहिं कोई देव यक्ष गुणवता ॥ सोई आन पुनि कीन्ह संग्रामा । भाजे देव छांड़ि सब धामा ॥
साखी—तब प्रपंच हरि कीन्हा, अस ठाना व्यवहार ॥ ताकी नार औधान रहि, भयो पुत्र अवतार ॥
चौपाई
हिरनाकुश जब भये हरषता । चले असुर घर जन्मो पूता ॥ सेवकन दीन्हैं रतन पदारथ । शिव सुत दीन्ह जन्म ममस्वारथ ॥ बर्ष पांच को भयो जो बारा । गुरु बुलाय पढ़ने बैठारा ॥ शिवकी भक्ति तुम याहि पढ़ावहु । माँगहु इच्छा सो फल पावहु ॥ लै घर विप्र गये तब बारा । पढ़ौ सुसुत शिव भक्ति विचारा ॥ प्रहलाद शिवको भक्ति जो धरहुं । हरषे नृप मम विथा बिसरहुं ॥
( ३० )
ज्ञानसागर
साखी-केतौ गुरु प्रबोधै, शिव न पद्वै प्रहलाद । विष्णु विष्णु गुरहार्वई, सुन गुरु करै विपाद ॥
चोपाई
एक बार नृप सभा मझारी । बैठे सुत कहैं कीन्ह गुहारी ॥ गये प्रतिहार ले आए बारा । गुरु समीप पढ़ने बैठारा ॥ हर्षत चूम्यो सुत को शीसा । सकलसभादियो बहुत अशीसा ॥ सुत मोहि कछु पाठ सुनावहु । कहौ वचन मम हृदय जुड़ावहु ॥ तब प्रहलाद पढ़न अनुसारा । धन्य विष्णु जिन काय सम्भारा ॥ पानी तैं जिन पिण्ड बनावा । तिहि प्रभुको कोइ अन्त न पावा ॥ अलख निरंजन देव सुरारी । सुनौ तात मैं तुव बलिहारी ॥ सुनत वचन हिरनाकुश राऊ । कोध कीन्ह जस अग्नि स्वभाऊ ॥
साखी-अहो मंद जड़ अकरमी, किमि ठानो मम बार ॥ जाइ 'पढ़ावहु' शंकर, नातर झोंको भार ॥
चोपाई
दिन दशमें पढ़ाइ लै आवहु । शिव कि भक्ति भली भांति सिखावहु ॥ नृप आज्ञा पढ़वे को दीन्हा । तब प्रहलाद पढ़े अस लीन्हा ॥ हरि तज काहि पढ़ौ मैं ताता । चार पदारथ के फलदाता ॥ भक्ति पक्ष सन्तन सुखदाई । जिन प्रभु सकल सृष्टि उपजाई ॥ तब नृप सुन अस वचन उचारा । मारहु सुत यह शत्रु हमारा ॥ हस्ति बुलाए अति बलवन्ता । चलत छांहि भुव देह पदंता ॥ ता कहैं आज्ञा दीन्ह भुवारा । देव महाबल आंकुश भारा ॥ साखी-हस्ति देख प्रहलाद कह, चले पराइ पराय ॥ नरसिंह रूप दिखराय हरि, भक्ति करत मन लाय ॥
चोपाई
तब नृप ऐसी युक्ति विचारी । जरत अग्नि देव सुत कहैं डारी ॥ अग्नि जरत तब पवन उड़ानी । प्रहलाद पढ़ै तब सारंग पानी ॥
नारदचरित्र
ज्ञानसागर
( ३१ )
तब नृप ऐसी युक्ति अरंभ । बांधो सुत कई गाड़ो खंभा ॥ जो कोइ होय तोर रखवारा । ता कई सुमिरो सुत हो वाग ॥ नातर छांडु विष्णु कर नाऊँ । अबही घात करो यहि ठाऊँ ॥ तब प्रहलाद सुभिरै भगवाना । कहा तू करब दैत्य बलवाना ॥ अहो धरणिधर अहो सुरारी । यहि औसर प्रभु लागु गुहारी ॥
साखी-खंभा सौं हरि नीकसे, की भयंकर गात ॥
आधा नर आधा सिंह का, कीन्ह दैत्य ही घात ॥
दोऊ बंधु महा बलि मारा । दैत्य मारि महि भार उतारा ॥ फारचो उदर नखन सौं छीना । सुर औ नरन हरष बहु कीना ॥ मांग प्रहलाद इच्छा फल आजू । तोहि भक्तलगहनौ दैत्यहि राजू ॥ कर जोरे प्रहलाद अस भाखा । हे स्वामी भक्तन प्रण राखा ॥ मोक्ष पिता कई दीजे स्वामी । मोहि भक्ति सुन अन्तर्यामी ॥ साधु साधु विष्णु अस भाखा । पुत्र पिता प्रण भल तुम राखा ॥ दोई जन्म आगे औतारब । तब तोर पिता देख मैं तारब ॥ तैं मम भक्ति कीन्ह बडि सेवा । ताकर फल भाषौ कछु भेवा ॥ दैत्य हते जब बाल कन्हई । आवै देव सबै तेहि ठाई ॥ करहि सुयस हरि सबहि बखाना । प्रहलादहि देवस्वर्ग अस्थाना ॥
साखी-कीन्ह इन्द्र प्रहलाद कई, सब मिलि कीन्ह विचार ॥
नरसिंहरूप नर कीन्हा, ताको यह व्यवहार ॥
नारद चरित्र
चौपाई
एक समय इन्द्र यज्ञ ठानी । निवते सिद्धि ऋषि औ ज्ञानी ॥ पहुँचे गन गंधर्व सब झारी । सब मिलि कीन्ह ज्ञान सुधारी ॥ जो कोई गया इन्द्र अस्थाना । इच्छा भोजन सब कई ठाना ॥
विभीषणचरित्र
( ३२ )
ज्ञानसागर
बहु विधि इंद्र करे सतकर्मा । पुरै न घंट जानसको मरमा ॥ तब नारद अस कीन्ह विचारा । धरौ धीर कहौ वचन उचारा ॥ ऋषि जमदग्नि इच्छा खावा । तिहिं प्रभाव अनंग जनावा ॥ ऋषि रत करें कै छाड़ैं ठावा । बजै घंट अस मता सुनावा ॥ सुनतहि ऋषितबकीन्ह पयाना । बज्यो घंट पूरण यज्ञ जाना ॥ साखी-ऋषि मन में तब बूझ्यो, जान करौ अब व्याहु ॥ ऋतमान जब आये, राजा कश्यप ठांहु ॥
चौपाई
देव नृपति कन्या इक मोही । मांगौ आजु जाव नृप तोही ॥ तब कन्या नृप दीन्ह बुलाई । कीन्हो व्याह ऋषी तेहि ठाई ॥ लै कन्या ऋषि घरहि सिधाये । भृगुकुलहरि औधानहि आये ॥ जो धर्मदास संशय कछु तोही । कहौ बुझाय चरित्र अब वोही ॥ भय क्षत्री महि व्याकुल भयऊ । मारन तासु जन्म हरि लयऊ ॥ निछत्र कीन्ह बहु जीव संहारा । बैर हेतु भृगुकुल औतारा ॥ सहसबाहु ऋषिगन जो मारी । पिता बैर सो प्रथम सम्हारी ॥ क्षत्री मारि निक्षत्री कीन्हा । भृगु रूप विष्णु को चीन्हा ॥ साखी-यहि विधि क्षत्री निकंदऊ, परसराम बली वीर ॥ आगे भाव बतावऊँ, सुनौ संत मत धीर ॥
श्रवण चरित्र
चौपाई
अवध नगर दशरथ बड़ राऊ । पुरुषारथ जिन कहौ प्रभाऊ ॥ तिनहि नारि बहु सबहि पियारी । रात दिवस जौ कर हित भारी ॥ एक समय आखेटहिं गये राऊ । पशु भोरे कियौ ऋषिकहँ घाऊ ॥ पानी तट ऋषि हरि हरि कीन्हा । नृप पछितानो जब मुनि चीन्हा ॥ ताके पितहि श्रवणकी बाता । तुव सुत दशरथ कीन्हौ घाता ॥
सती दाहकी कथा
ज्ञानसागर
( ३३ )
साखी-अहो ऋषि तुव सुत कहैं, दशरथ मारचो बाण ॥
यह चरित्र सुन सुनिवर, तत्क्षण छांड्यो प्राण ॥
दोनों ऋषी काल बस भयऊ । नृप अन्याय बैर हरि ठयऊ ॥
सुत बिहून जस ऋषितन त्यागा । तैसे काल नृप तोर अभागा ॥
पुत्रके शोक काल होय तोरा । देहू बैर कहा सुन मोरा ॥
नारद ऋषि तब कीन्ह तिवाना । राजा दक्ष यज्ञ जो ठाना ॥
देव ऋषी आये तिहि ठाई । सब नृप बहुते सेवा लाई ॥
ऋषि तब कहै सुनो दक्ष राऊ । शिवको जियत निवत बुलवाऊ ॥
इन्द्र यज्ञ जब निवत जु आये । गण गन्धर्व सब देव रहाये ॥
तहाँ शिव कीन्ह तोर अपमाना । आई कहौ सुन नृपति सुजाना ॥
सुनतहि क्रोध नृप पर जरेऊ । जरत हुताश मनहु घृत परेऊ ॥
साखी-शिव विहाय सब निवते, चलै सबै तिहि पास ॥
देख गगना सुनि वरन को, सती वचन परकास ॥
चोपाई
हे प्रभु कहाँ जायैं सुनि राई । सो प्रभाव प्रभु मोहि बताई ॥
राजा दक्ष यज्ञ जो ठाना । तहाँ जायैं ऋषि चढे विमाना ॥
हे प्रभु मो कहैं आयसु होई । यज्ञ तात कर देखौ सोई ॥
निवते बिन न बूझियत नारी । ऐसी इच्छा आहि तुम्हारी ॥
चली सती तब लागि न बारा । पिता भवन तहैंवा पगु धारा ॥
देखत नृपति महा उर जरेऊ । काहू समाधान नहिं करेऊ ॥
व्याकुल भई दिगम्बर नारी । यही ब्याह मम कुल भई गारी ॥
सुनत विषाद सती मन जागा । परी अनल तब देही त्यागा ॥
हाहाकार भयो सभा मझारी । यज्ञ विध्वंस भयो सुन चारी ॥
हिमाचल गृह सती अवतरिया । गणदीन्ह नाम पारवती धरिया ॥
यहै चरित्र विष्णु जब देखा । शिव विवाह गुण मनमें पेखा ॥