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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

( ८८ )

चौकास्वरोदय

प्रथम चौका विधि

अब मैं कहों एकतरी विधाना । एकोतरिनारियलचौका प्रमाना
लौंग इलायची धोति सुपारी । इकतरी सब वस्तु विस्तारी ॥
पान मिठाई अवर पकवाना । इकोतर सह सबको बंधाना ॥
दश अरु कमल आरतीसाजा । मुखसों जपैं इकोत्र समाजा ॥
इकोतर जन्मके पाप नसाई । कर्म अकर्म सबै मिटजाई ॥
निर्मल हंस हिरम्मत देही । पहुँचे जहँही पुरुह विदेही ॥

द्वितीय चौका विधि

अब सहेज चौका कहोप्रमाना । जीवसंग एकनरियल बंधाना ॥
अस नारियल सम धरही । विना मंत्र नहिं चौका करही ॥
छठै मास चौकाकी पूजा । छोंड़ि चौका पूजै नहिं दूजा ॥
छटै मास नहिं पहुँचै भाई । बरस दिनामें विसरिन जाई ॥
जो जीव शिष्य हमारा होई । हमही पूजी पूजै नहिं दोई ॥
दोई पूजी बहुत दुख पावै । तन छूटै जमकाल सतावै ॥
ममता फिरै कहुँ ठौरै न पावै । फिरि फिरि जत्तहि देह धरावै ॥
दुख अरु सुख दोनूं भुगतावै । एकहिनाम पुरुषको गावै ॥
लोकजात बार नहीं लावै । चौका सहजिहि भाँति करावै ॥

चालवा चौकाविधि

चालवा चौका कहौं विचारा । बाहर नरियललै विस्तारा ॥
आठ सुपारी पन्द्रहसौ पाना । लौंग इलायची ले बंधाना ॥
पन्द्रह सेर मिठाई ले आवै । बारह धोती आनि जढ़ावै ॥
पाँच भाँड़ै धातुके होई । सोरह हाथ चन्दोवा सोई ॥
पाँच खंभको मण्डप गढ़ावै । नये पुराने वस्त्र मँगवावै ॥
सो परदा गहिरैकै देई । गीत मंगल कर माटी लेई ॥
तिहि माटीकी वेदि बनावै । वाँछा सहित जुगाय चढावै ॥

बोधसागर

(८९)

साधु सन्तको भोजन करावै । पन्द्रह सेर पकवान चढ़ावै ॥
चार पहर सब साज जो करही । सोरह सुतकी पोसी धरही ॥
चार पहर निस बैठक करही । सूर्यस्नेह चौका विसतरही ॥
सुरती सुरत सूर्यपर जोरे । पृथ्वी तत्त्वमें नारियर मोरे ॥
औरहु भाव बहुत हैं भाई । जो समुझे सो बिचलि न जाई ॥
अमी अंकको वीरा पावै । विगड़े हंस लोक को आवै ॥
पान प्रसादे वंश हेतु लेई । पियेपर नाम हमारा लेई ॥
छूटैं हंस कर्मके पारा । चोर उदय घट सूर्य विचारा ॥
चन्द्र हेतु तिन चौका करहीं । चन्द्र लग्नको काल जिझ डरहीं ॥
चौथा चौका चलवेका एहै । सूर्य लग्न निजही मनमें है ॥
देह धरै नहीं कर्म सतावे । सहजे जाय परम पद पावे ॥
चारों चौका एहि विधि करै । सो हंसा तरहै औ तौर ॥
सहजको चौका वासनमें निरतावे । इतने भेद टकसार लखावे ॥
भेद चुरामणिखण्ड अपारा । चुरामनिबस एहि भेद विचारा ॥
उन्हको नाम प्रताप है सोई । इहतो भेद कडिहारको होई ॥
जोन अंकुरी वोहित कडिहारा । सो यह पावे वंस टकसारा ॥
अंस बँसकी परख न पावै । पढ़ि टकसार काल घर जावै ॥
बिन गुरु भेद गहे टकसारा । बिना पुरुषकी नारि बिचारा ॥
बिन दूलहकी कौन बराता । बिना गुरुझूठ जान जिहिं राता ॥
बिना छत्र ज्यों लशकर फिरहीं । बिन गुरु ज्ञान धीरको धरहीं ॥
हमरे पन्थके गुरु धर्मदासा । तिनके वंशगुरु जक्त प्रकाशा ॥
हमरा ज्ञान वंस अस करई । खोवे आपु नरकमें परई ॥
तजै मनै क्रोधे अहँकारा । सो ये गहैं वंश टकसारा ॥
इतने भेद इहै टकसारा । औरै ज्ञान बहुत असरारा ॥
वंश टकसार कडिहारा जो पावै । सो सौ भवसागर जीवमुक्तावै ॥

( ९० )

चौकास्वरोदय

वंश अस न टकसार होई । सीखसहित गुरुजाय विगोई ॥
इतनौ भेद है अगम अपारा । नीर पवन चन्द्र सूर्यकी धारा ॥
कार्यसिद्ध नीर युक्ति प्रवाना । सद्गुरु बचन शीश परमाना ॥
उत्तर पूरव चन्द्र सनेहा । दक्षिण पश्चिम सूर्यहि देहा ॥

साखी-इतना भेद चन्द्र सूर्यका, पांच तत्व निजसार ।

दिनतिथि पच्छ उदयलों, सो साँचो कडिहार ॥

कहै कबीर सोई लखे, ए सब मिले टकसार ।

चन्द्र सूर्यको भेद जानै, सो झूठो कडिहार ॥

इतिग्रन्थ चौकास्वरोदय संपूर्ण सत्य सही


अथ अलिफनामा

★

अलिफ अन्वल एक नाम सही है आप अकेला सॉई ॥ आदि
अनादि अनादह अनाहद नहीं वा सॉई ॥१॥ (बे) बंदेको पैदा
किया देमका हियां दरूदा ॥ अन्वल कलमा पाक सही है हुकम
रब्बमह बूबा ॥२॥ (ते) तनमें दीदार मिलेगा पाक होय वजूदा॥
नूर झलकके सत्य साहबका, सब घट है मौजूदा॥३॥(से)साबित
सत्यनाम गोसाईं, सदा जो कायम वाशिद ॥ पूरा होय सत नाम
कहावै मिलै जो पूरा मुशिद ॥४॥(जीम)जाहि लघु गुजार जहाँ
सग यह तो नेक नजर है॥५॥फेकुन सैयन सुहीत नजलील अलाहक
खबर है हे हकाका हुकुम हाकिमका सदा जो कहिये बर ॥
अजकुन फेकुन पेदा गहती सोहं ओहं मुनहक ॥६॥ (खे) खालि
कको सुमिरत रहिये, लिखत खूब यही है ॥ खुदाखबीसीछाँडसबी
शद साधु खैरतभी है॥७॥(दाल)दया दुवैश दोस्तकर दूर करै सब
दर्दा ॥ जिसके दिलमें दर्द नहीं सो मून्जी नामदा ॥८॥ जाल
जैहनको पाक साफकर, जिकर कि लज्जत पावो॥जोक शोकसे जिकर
लगावो दूर बहावो ॥९॥(रे) रहीम रहमत कर तुझपर रहम करै
जो कोई ॥ रामरहीमसे एककर जानै तब जहेमत नहिं होई॥१०॥
(जे) जौरावर कोई न बांचे, रावण था दशकंधा ॥ जोर जुल्म है
जहेरका प्याला मत कोई पीवे बन्दा ॥११॥ (सीन) सरासरी सिर
साईका सब सीनोंके अन्दर॥ साँचा वचन सुनो साधोजन, स्वाती
बरस ससुन्दर ॥१२॥ (शीन) शेहरमें शोर बहा है शुक्र खुदाका
कहिये॥ सत्य सुकृत ये कर बासन बिसरे हरदम सुमिरत रहिये ॥१३॥
(स्वाद) सदा सिफत साहबकी कहिये, सदा समीपै भाषो॥ दिल
दरदिल सीना दरसीना देखो दिलकी आँखो ॥१४॥ (ज्वाह) जमीर

( ९२ )

अलिफनामा

सुनीर सुवाजे व्यापक सब घट साईं ॥ है हजूर रहिमाना जिह
नाकीजै भाई ॥१५॥ (तोय) तालिब मतलूबको पहुँचै तोफ
करे दिल अन्द ॥बहुते तौफ जाय तब वायफना देव जाय पहाड़
समुन्दर ॥१६॥ (जोय) जालिम मिलै इजरयाल कबज करै जो
जाना ॥ गये जुलमात कोई न बाँचे सिकंदर सुलताना ॥ १७ ॥
(ऐन) इल्म चौदाको पड़ते अमल नहीं जो लावे ॥ अमल नहीं वो
इल्म ऐब है दानीश मन्द कहावै ॥ १८ ॥ (गैत) गलत ते वहि
नहीं कहिये गुस्से गजबको त्यागै ॥ नाहक सुनके न्यारा रहिये
कह सुनके मत भागे ॥ १९ ॥ (फे) फरमान आखिर है फानी
फाजिल फहेम कहाया ॥ भिन कुल अलेहफाना कुरानो खबर
कहाया ॥ २० ॥ (काफ) कलब है अरस जमीका सुनकर और
नकीरा ॥ नेकी करो बदी बिसरावो कुलसे कहत कबीरा ॥२१॥
(लाम) लाहोल उसीपर जो न सुने जुगझाना ॥ साहेब से जो कोल
किया था तो काहे बिसराना ॥२२॥ (मीम) मुसल्लममर्द मुसलमान
कहत, सुरीद ना करना ॥ रहिये सदाईं मनसलामत जेहि विधिसे
निस्तरना ॥२३॥ (नून) नोज बिलाह अलेकुम नेक सरबुनका
करना ॥ नैनो अकबर हबलूल बरिद हैं हकका फरमाना ॥२४॥
(वाव) वजूवजेमे गो यमनेकी खरत सुनुफ ॥ रुयाल बदी तुस्वास
दिल अन्दर सो है मर्दमुखौबफ ॥ २५ ॥ (हे) है दोनों यक
सूरत दोनी ये साँई एक म्यानमें हो दो यम घर कबहु नहीं
समाई ॥२६॥ (ये) येक साहब है साँचा सुनो तुम मन चित्त
देको ॥ काया कबीर कहत है अन्वल आखिर येको ॥ २७ ॥

इति अलिफनामा । सप्तदशस्तरंगः

श्रीः

कबीरबानी

भारतपथिक कबीरपंथी
स्वामी श्रीयुगलानन्द द्वारा संशोधित

★

मुद्रक व प्रकाशक—

गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास,
अध्यक्ष—“लक्ष्मीवेङ्कटेश्वर” स्टीम-प्रेस,
कल्याण-बम्बई.


पुनर्मुद्रणादि सर्वाधिकार “लक्ष्मीवेङ्कटेश्वर” मुद्रणयन्त्रालयादयक्षके अर्पित है।

सत्यनाम

श्री कबीर साहिब

यमदूतबोध एवं गुरुसीख स्नेह (अष्टादश तरंग)

सत्यमुक्त, आदि अदली, अजर, अचिन्त, पुरुष,
मुनीन्द्र, करुणामय, कबीर, सुरति योग, संतायन.
धनी धर्मदास, चूरामणिनाम, सुदर्शन नाम,
कुलपति नाम, प्रबोध गुरुवालापीर, केवलनाम
अमोल नाम, सुरतिसनेही नाम, हक्कनाम,
पाकनाम, प्रकट नाम, धीरज नाम,
उग्र नाम, दया नामकी वंश-
व्यालीसकी दया
अथ श्रीबोधसागरे

★

अष्टादशस्तरंगः

कबीरबानी

★

प्रथम बानि सुनियो चितलाई । आदि अन्तकी सुधिदेहु बताई॥
प्रथम आदि समरथ हते सोई । दुसरा अंस हता नहिं कोई ॥
आदि अंकुर सुरती जब कीन्हा । सात करीको गर्भ तेहि दीन्हा ॥
इच्छा सूर्ति दूसरे उपजाई । सातो करी मैं चित बनियाई ॥
छीप रूपहि करी परकासा । स्वाति रूप इच्छा नीवासा ॥
सात इच्छा तेहिते उपजाई । भिन्न भिन्न पर करी बनाई ॥

( ९६ )

कबीरबानी

विमल शब्द विरलिततबदयेऊ । तबहुलासबंदपाँचकरिमेदयेऊ ॥
तब पाँच इंड भरो उतपानी । तत एक भिन्न पर श्यानी ॥
नहिं तबधरनी नहिं आकासा । नहिं तब दुसरो हतो अवासा ॥
ध्यावै इंड करै चौचन्दा । आपु देखिऔर सहज अनन्दा ॥
तबकी बात नहीं कोई जाने । कहीं ससुझाय तो झगरा ठानै ॥
धर्मदास सुनियो चितलाई । फूटो इंड सूरतसे भाई ॥
सहज अंकुर बीज सब भाई । तिहिकी इच्छा इंड उपजाई ॥
तब सरवनसो साजी बानी । तेहिते मूल सुरति उतपानी ॥
अबोलबुन्द तेहि सुरतेहि दीन्हा । पाँच अंश तब उत्पन कीन्हा ॥
पाँचो अंश तब कह्या बुझाई । पाँचो अंडमें तुमजाओ समाई ॥
एकहि एक इंड तब गयेऊ । आपहु आप कलामें ठयेऊ ॥
तब अवगत एक खेल बनावा । पाँच स्वरूप पाँचों इंडहि आवा ॥
फूटो इंड तेज भई धारा । सबमें देखे पाँच ततसारा ॥
पांचइण्ड भिन्न भिन्न विस्तारा । सातअधरदीपतेहिमहिंसंचारा ॥
देखि सरूप अंडनकर भाई । सो हंग सुरति तबहिं उपजाई ॥
पुरुष शक्ति भई दोय प्रकारा । तिन्हको सोप्यो उत्पन सारा ॥
तासो अंकुर भेद बतावा । बचन सुरत एक संग समावा ॥
जाते ओहं पुरुषको अंगा । ओहं भये बंस दो संगा ॥
तिन्हें उत्पनकी आज्ञा कीन्ही । शब्द शनद उनहुको दीन्ही ॥
मूलसुरति औ पुरुष पुराना । रचना बाहर कीन्ह अस्थाना ॥
सोहं सोहं इंडनमें रहेऊ । सकल सृष्टिके कर्ता कहेऊ ॥
प्रथम अंकुर दूसर इच्छा उत्पानी । तिसरे मूल चौथे सोहं ठानी ॥
सोहं सोहं की बंधानी । आठ अंस तिनते उत्पानी ॥
आठ अंस भये एही धामा । करता सृष्ट धरे यहि नामा ॥
करता सरूपी आठ भराअंसा । तिन्हके भये सृष्टि सब बंसा ॥

बोधसागर

( १७ )

तेज अंड अंचितकूं दीन्हा । प्रथम सुर जब उत्पन्न कीन्हा॥
सोई अंस दूसरे भय भाई । धीरज अंड तिन्हें बैठक पाई ॥
तिसरे अंस अण्ड निर्माई । क्षमा अण्ड तिन्हें बैठक पाई ॥
चौथे अंस है सुकृत सारा । सत्य अंड है ताहि पसारा ॥
पांचों अंस हिरम्मर भाई । सुमत अंड तिन्हें बैठक पाई ॥
दोई अंस दोह करी समाने । तिनका भेद गुरुगम जाने ॥
एक अंस निर्गुण अवतारा । ते तब सृष्टिके भये कडिहारा ॥

साखी-एती उत्पन्न चार सुरतकी, भिन्न भिन्न परकार ।
कहै कबीर धर्मदाससों, आगे बन्स पसार ॥

धर्मदास वचन

साँचे सदगुरु की बलिहारी । धर्मदास विनती अनुसारी ॥
धन्य भाग्य मोहि मिले गुसाई । अपना कै मोहि लीन्ह सुत्ताई ॥
चारि वेद अरु शास्त्र पुराना । सबहीके मैं सुनो प्रमाना ॥
अविगति गती काहु नहि जानी । जो तुम कही आदि की बानी ॥
सुरत सोहंगके आठ भय अंशा । तिनके सृष्टि सबही भए वंशा ॥
अपरंपार है तिनका सेषा । अर्चित्य सृष्टिको कहां विवेका ॥

साखी-तुम निज सतगुरु सत्य हो, हम निज चीन्हा सोय ।

अर्चित सृष्टिको भेद कहो, अविगति पूछौं तोय ॥

धर्मदास तुम बड़े विवेकी । तुम्हरे घटमें बुधि बड़ देखी ॥
अर्चित्य सृष्टिको कहां पसारा । तेज अंड तिन्ह पायो सारा ॥
बारहि पालंग अंड विस्तारा । तिहिमें पांच तत्व है सारा ॥
इनको बैठक आसन दीन्हा । अंड सीखपर लोक तिन्हें कीन्हा ॥
प्रेम सुरति तिन कीन उपचारा । तिन्हते भयो अक्षर विस्तारा ॥
अक्षर सुरत तब मोहमें आई । ताते अंस चार निर्माई ॥

( ९८ )

कबीरबानी

चारि अंस भये चारि प्रकारा । चौविध दीप चौविध हि पसारा ॥
प्रथम अंश पर माया भयऊ । सोपृथिवितत्वको वीज निर्मयऊ ॥
दुसरे कर्म भये अवतारा । पालंग अठानवे कीन्ह विस्तारा ॥
तिसरे अदली अंश निरमावा । शेष नाग सो नाम धरावा ॥
चौथे अंश भये धर्म राई । जिन्ह पाप पुण्यको लेखा पाई ॥
चारी अंश अक्षर ते भयऊ । चार अंश चार मत ठयऊ ॥
तब समर्थ अविगति एक कीन्हा । पूरी नींद अक्षरकूँ दीन्हा ॥
चौसठ युगलौं सोए सिराई । तोलों कैल सुरती ठहराई ॥
समर्थ सुरति जल तत्व समानी । कैल अंड की कीन्ह उपानी ॥
तेहि पीछे अक्षर पुनि जागा । मोह तत्त्व भये अतुरागा ॥
चकित होय अक्षर बिलखाना । सोह मोह सब सृष्टि समाना ॥
अंड दृष्टिमें देखो भाई । व्याकुल भए यह किन निरमाई ॥
समर्थ छाप अंडसिर दीन्हा । अक्षर छाप देखि सौ लीन्हा ॥
सोई अंड जलमें विराना । जिनको वेद नारायण माना ॥
तहवां ज्योति निरञ्जन भयऊ । तिनको सब जग कर्ता कहेऊ ॥
अक्षर सुरति समर्थकी बानी । तेहि गुण खेल भए उतपानी ॥
निरंजन नाम अक्षर ठहराई । अचित भेद नहि पावै भाई ॥
कैलहि देखा सकल पसारा । तब अक्षर सो वचन उचारा ॥
देउ पिता मोहि आज्ञा सोई । जो कुछ इच्छा उपज्यो मोई ॥
सेवा करत सत्तर जुग बीता । तब मुख बोले पुरुष अतीता ॥
जीव पुत्र जहां पृथ्वीको मूला । तहां कर्म बैठे अस्थूला ॥
सृष्टि भंडार कूर्मको भाई । सोलह माथ हाथ चौसठ पाई ॥
चले निरञ्जन कूर्मलिंग आये । पुरुष ध्यानते कर्म जगाये ॥
उत्पति हमकूँ मागे देहू । ना देहो तौ तौ मारिकै लेहू ॥
तबहि कूर्म अपने मन मानी । एतो कैल भए अभिमानी ॥

बोधसागर

( ११ )

हम मांगे कछु देव न भाई । जाऊ पुरुष लगि वेगि सिधाई ॥
कल कूर्मते युद्ध निर्मयऊ । छीन माथा तीन पुनि लयऊ ॥
लेकर माथै सुन्यमें आवा । कैल सुरति घट मोह समावा ॥
तीनों माथे भक्ति तब लीन्हा । तबसे अक्षर पुरुष डर कीन्हा ॥
मनमें तब अभिमान समाई । तब कर जोरिके सेवा लाई ॥
सोला चौकड़ा तब चलिआई । तब लगि निरंजन सेवा लाई ॥
अक्षरपुरुष जो कीन्ह विचारा । तिन्हको समरथ वचन उचारा ॥
विदेह बानि तब अक्षर पाई । सो बानीते कन्या भइ भाई ॥
ताको बहुत सिखावन दीन्हा । अष्टांगी तिन कन्या कीन्हा ॥
पुत्रि निरंजन लागि सिधाई । तुमको समरथ सदा सहाई ॥
तब कन्या निरंजन लगि आई । एक पाँव पर सेवा लाई ॥

साखी—कहै कबीर

देखे पलक उधारिके, कन्या आगे ठाढ़ि ।
उपज्यो मोहऽरुप्रेम, तब विप्रीत मनमें बाढ़ि ॥

चौपाई

पलक उधारि कैल तब देखा । अपने मनमें कीन्ह विवेका ॥
कहै कबीर सुनो तुम बानी । मोहिकारनपुरुषतोहिउतपानी ॥
हम तुम कीजे सृष्टि पसारा । तीनहि लोक सकल महि भारा ॥
तब अष्टांगी कैलसों कहाई । मोहि तोहि नाहीं होय सगाई ॥
मैं तोरि बहिनी तू मोरा भाई । सो अनरीती सब दीन चलाई ॥
कहैं कैल सुनो आदि भवानी । हमरे वचन तुम काहै न मानी ॥
जो तुम कहा हमारा मानौ । तौ तुम उत्पति निर्णय ठानौ ॥
तब अष्टांगी कहै बुझाई । बिन आज्ञा तोहि पुरुष रिसाई ॥
बिन आज्ञा कूरम सिर छीना । ताते पुरुष अन्त करि दीना ॥

( १०० )

कबीरबानी

साखी-कहै कबीर

देखि स्वरूप कन्यहिको, मनमें रोष समाय ।
मनमें रोष भयो अति, कन्या लीन्हीं खाय ॥

लीलत कन्या कीन्ह पुकारा । पुरुष वचन ले हृदय सम्हारा ॥
तब सुरति बानते कैलहि मारा । कन्या तब उगलै बहि पारा ॥
एहि प्रपंच अक्षर तब कीन्हा । ताते कैल मती हरि लीन्हा ॥
कन्या सुरति तब गई भुलाई । जबते पेट कैलके आई ॥
पिता पिता कैलसो कहेऊ । मदन प्रचंड कल छन भयेऊ ॥
अष्टांगी कैल एकमत कीन्हा । ताते सृष्टि रचवे मन दीन्हा ॥
किया संयोग भयो त्रीवारा । जेठो ब्रह्मा लघु विष्णु कुमार ॥
तीजे शंभु विष्णु ते छोटा । येकही निरंजनहि के ढोटा ॥

साखी-कहै कबीर

जैसे रूप निरञ्जनहिं, तैसे तीनों भाय ।
जे उत्पत्ति कैलकी, आगे सृष्टि उपाय ॥

चौपाई

करि प्रपंच शून्य इंडमें गयऊ । मनमें बहुत आनंदित भयऊ ॥
एहि आनन्दमें गए भुलाई । ताते श्वासा सुरति उठाई ॥
तेहि श्वासाते वेद कटि आई । रूपनिधान चारों बने भाई ॥
हाथन पोथी सुसरस बानी । ताते कैल भयो अभिमानी ॥
चारि वेद सब मरम बतावा । तब चलि अक्षर शून्यमें आवा ॥
कैल प्रचण्ड भयो बरियारा । तब अक्षरते बुद्धि विचारा ॥
येतो कैल औ जीव विचारा । समरथ छाप लियो टकसारा ॥
अक्षर चले अर्चित लगिगयऊ । महाशून्य छोड़ी तब दयऊ ॥
तब अर्चित्य अक्षर समुझावा । यह अविगति गति काहु न पावा ॥

बोधसागर

( १०१ )

तुम तो सुरति हमारी हो भाई । कैल सुरति समरथ निर्मायी ॥
लक्ष जीव नित करे अहारा । सवा लक्ष नितप्रति निस्तारा ॥
अंशवंश मिलिएक मत कीन्हा । चारों ज्ञान विचारि तब लीन्हा ॥
तुम गति हंसरूप हो भाई । वह तो कैल जीव दुखदाई ॥
तुम समर्थको ध्यान लगावो । अन्तर्गति समर्थ सुख पावो ॥
चारी ज्ञानमें निर्णय कीन्हा । सो निरणय अंशको दीन्हा ॥

साखी-कहै कबीर

कहे कबीर धर्मदाससों, एता सकल पसार ।
तीन शक्तिको खेले भयो, चौथे हंस उबार ॥

धर्मदास बहुतै सुख पावा । उठि सतगुरुसों विनती लावा ॥
सांचे वचन तुम्हारी बानी । आदि अन्तकी निरणय ठानी ॥
कौन है अण्ड कौन है अंशा । काहे अंश कौन है वंशा ॥
कौन कैल कौन गुण धारी । कौन मृष्टि कौन संसारी ॥
एती बात मोहि सों भाखो । और गुप्त गोये जिनि राखो ॥

साखी-कहै धर्मदास

विन देखे सबही कहै, सुनि पाइहै कान ।
सोइ अदेख तुम दिखावहु, आदि अंत परमान ॥

चौपाई-सतगुरु कबीर उवाच

तब सतगुरु मन में बिहसानै । तुमसों धर्मनि निर्णय ठानै ॥
तेज अण्ड अशर है वंशा । अचित्य अण्ड सोहं गहै हंसा ॥
निरंजन कैलचारि गुणधारी । तीन मृष्टि अविगति संसारी ॥
तेज अंड अचिन्त्य है अंशा । नववंश अक्षर है वंशा ॥
सत्य अण्ड जोहं गहै अंशा । सो रहै तिनके उपज्यो वंशा ॥
पालंग पचीस तासु विस्तारा । पातालपाँजि ते तिनको बैठारा ॥
तिसरों अंडहि क्षमा बखानी । अकह अंश तिन्हकी रजधानी ॥

( १०२ )

कबीरबानी

अकहनामते सताविस वंशा । तिन्हके सकल और हैं अंशा ॥
चौथा धीरज अंश है भाई । ताते सुकृत अंश निरमाई ॥
वंश बयालिस है कड़िहारा । तिनकी सदन चलै संसारा ॥
पाँचों अण्ड सुमत निर्माई । अंश हिरम्बर बैठक पाई ॥
तिन्हके वंश सात परवानी । इह सब भेद लेहो पहिचानी ॥
अंडहि अंड आठ भए अंशा । सात सुरति इक्कोत्तर वंशा ॥
चारि अंडको एक विचारा । दोए करीको भेद अपारा ॥
एक वंश कोई पार न पावै । सतगुरु निजही भेद बतावै ॥

खुद होय कहै

सुरति सरूप हमहीं सबकीन्हा । मान बड़ाई अंशोंको दीना ॥
जबे अचिन्त्य सुरत ठहरानी । सुरति समर्थ घट आनि समानी ॥
दोह मध्य एक आए समाई । तिन्हको नाम अक्षर ठहराई ॥
अक्षर इच्छा उपजो भाई । दुसरा अंश कैल होय आई ॥
आठों अंस कालकी बानी । अक्षर घट जो आये समानी ॥
सो वासा होय बाहि ढिआई । तिन्हकी गति कोई बिरलै पाई ॥
पांच प्रगट तीन गुप्त सारा । इनके हंस अग्यारा सारा ॥
चारि अंशभवभार हम दीन्हा । चारि वैद्यमें निर्णय कीन्हा ॥
तीन देव मृष्टि अधिकारी । उपजनविनसुन दुखसुख भारी ॥
तिन्हें चौरासी लक्ष बनावा । जीव अनेक बहुत उपजावा ॥
यह अविगति काह नहीं पावा । सारथ ऐसा खेल बनावा ॥

सारखी-वेद कितेब जाने नहीं, पावे ग्यानी थाह ।

तीन अंशलौ सबहीं खेले, आगे अगम अथाह ॥

धर्मदास उवाच

धर्मदास विनती चितलाई । तुम्हरे शरण मुक्ति गति पाई ॥
उत्पति कारण हम सब पावा । वंश अंश दूनों निरतावा ॥

बोधसागर

(१०३)

लोक दीपको ठौर बतायो । बैठक अस्नेह हंस चिन्हायो ॥
साखी-कैसे सरूप समर्थ हैं, कैसे हैं सब हंस ।
केहि करनीते पाइये, कैसे कटे कालकी फंस ॥
चौपाई-सतगुरु कबीर उवाच

कहे कबीर सुनो धर्मदासा । अल्पबुद्धि घटमाँह निवासा ॥
सत्य लोक है अधर अन्तुपा । तामें है सत्ताविस दीपा ॥
सत् शब्द का टेका दीना । अगम पोहुमीरचीतिन लीन्हा ॥
सागर सात ताहि विस्तारा । हंस चले तहाँ करै विस्तारा ॥
अग्रवास वह सुवरन कांती । तहाँ बैठे हंसनकी पांती ॥
पुहुपद्दीप है मध्य सिंहासन । करूपदीप हंसनको आसन ॥
अविगत भूषण अविगत सिंहारा । अविगत वस्त्र अविगत अहारा ॥
कमलस्वरूप भौम्य है भाई । कहाँकी उपमा देउ बताई ॥
आभा चन्द्र सूर्य नहीं पावहिं । भूल चूकके शीस नवावहिं ॥
कला अनेक सुख सदा होई । वह सुखभेद यहाँ लहे न कोई ॥
निरतै हंस पुरुषके सङ्ग । नखशिख रूप बन्यो बहु अंगा ॥
पुरुष रूपको बरनै भाई । कोटि भानु शशि पार न जाई ॥
छत्र सरूप को वरणै भाई । अविगत रूप सदा अधिकई ॥
सत्ताइस द्वीपमें करे अनन्दा । जो पहुँचे सो काटें फन्दा ॥
हंस हिरम्मर और सोहंगा । श्वेत अरुण रूप दोउ अंगा ॥
विमल जोतको है उजियारा । झलकै कला पुरुषमें भरा ॥
चारि शब्दका लोक बनावा । पाँच सरूप लै हंस समावा ॥
सत्य शब्दकी भूमि बनाई । क्षमा शब्द आसन निरमाई ॥
धिर्ज शब्दसों छत्र उजियारा । सुमत शब्दसों वस्त्र पसारा ॥
प्रेम शब्दसों हंस निरमाई । आप शब्दते लोक समाई ॥
दीपन करै दीप हंस बिहारा । तहाँ पुरुष निर्मल उजियारा ॥
जब विहंसे मुखमोड सुहाई । निरत हेरि विहंसे चितलाई ॥

(१०४)

कबीरबानी

चिकुरझलक बरनी नहिं जाई। कोटिनवार शशि वारन जाई॥
एति सिद्ध सतगुरु फरमाई। मानुष रूपन्हि लोके जाई॥
अविगति रूप है लोक हमारा। करनी भेद कहो निर्घांरा ॥

करनी भेद

काया करनी चार है भाई। मनकरनी दोई लेहों उठाई ॥
प्रथम करनी चौका है सारा। तिनकीसन्धतिनहुका विचारा॥
दुसरे पुनि चरणामृत कीन्हा। तिसरे शीत प्रसाद जो लीन्हा॥
चौथे साधुकी सेवा करहु। यम औ कालसों कबहु न डरहु॥
काया करनी कही विचारी। मन करनी सो हंस उबारी ॥
पारस परशे कञ्चन होई। लोहा वासों कहै न कोई ॥
स्वाति सनेहकी करनी है भाई। सो करनी काहु विरले पाई ॥
स्वाति बून्द सीप जो लेही। बून्द स्वरूपहि पलटे देही ॥
इक करनी है हंस सनैदा। पहुँचे लोक काँपि यमफंदा ॥
लोक वेद कुल जगत विसारे। बोलत वचन जीव निवारे ॥
माया चारि कालकी भाई। इनहि जीव राखे उरझाई ॥
इह छोडे सद्गुरुके ओटा। मेटे कर्म भर्म सब खोटा ॥
दोइ माया सद्गुरुके ठहराई। दौय करनीसे सत्य मिलाई ॥
हंस करनि तीनलोकसो न्यारी। सद्गुरु मिले तो कहै विचारी ॥
धर्मदास कर चौका प्रमाना। मेटो कुल पाखंड अभिमाना ॥
सोरा असंख्ययुग गयोसरसाई। काहु न खबरिसमर्थकी पाई ॥
जीव निकाल यमधरधर खाई। चारि वेद सब जक्त भ्रमाई ॥
धर्मदास तुम अंश हमारा। तुमसो वचन कहौं टकसारा ॥

सारखी-कहै कबीर

मैं कबीर बिचलौ नहीं, नाम मेरो समरत्थ ।
ताही लोक पठाइहों, जो चढ़ शब्दके रत्थ ॥

बोधसागर

( १०६ )

धर्मदास उवाच

धर्मदास तब सौंज मँगाई । सोरह अंश तब दीन्ह चिन्हाई॥
चौका पुरस तब युक्ति बनाई । तनुका तोड़े जल अचनाई ॥
लिख्यो पान समरथ सहिदानी । दीन्हो सन्देश सत्यकी बानी ॥
तीनि अंशकी लगन विचारी । नारीअर अंशको हंस उवारी ॥
नारी पुरुष होय एक संगा । सदगुरु बचन दीन्ह सोहंगा ॥
सोहँग शब्द है अगम अपारा । तुमसों धर्मनि कहौ विचारा ॥
पेड़ सोहँग और सब डारा । साखा सोहँ कीन्ह प्रकारा ॥
प्रथम सहज सोहँगकी बानी । दूसरि इच्छा सोह उपतानी ॥
तिसरे मूल सोहँ है भाई । चौथे सोहँ सोहँ निर्माई ॥
सोहँगते भये सोह अतीता । जाको नाम जो कह्यो अचित्ता ॥
अचित्तिते अक्षर सोहँगा । अक्षर सोहँगते कैल सोहँगा ॥
कैल सोहँगते त्रिगुण सोहँगा । सोहँगते सकल सृष्टिको रंगा ॥
अमृत वस्तुते नौ पकारा । सोहँग शब्दके सुमिरन सारा ॥
सो सोहँ अचीन्हि जो पावै । सोहँ डोर गहि लोक सिधावै ॥
जा घट होई सोहँ मतसारा । सोई आवहु लोक हमारा ॥
सुरति सोहँ हृदये महाँ राखो । परचे ज्ञान तुम जगमें भाषो ॥
एती सिद्धि सोहँकी भाई । धर्मदास तुम गहौ बनाई ॥
चौका करि दीन्य परमाना । तब जीवहि छूटे अभिमाना ॥
अजावन बीरा आवै हाथा । तब हंसा चले हमरे साथा ॥
ताकैं पुनि चहि आवै डोरी । टूटे घाट अठासी करोरी ॥
कुल करनी जिन्ह खोय निसाई । काटि फन्द निज घरकू जाई ॥
तन मन धनको मोह न आवै । सो जिव दर्स हमारा पावै ॥
गुरुसों अन्तर कबहुँ न कीजै । साधु सन्त सेवा मन दीजै ॥
एती सनद जीव उजियारा । ताको सुकृत आवै सठिहारा ॥
सोहँ करनी सोहँ विचारा । सोहँ शब्द है जिव उजियारा ॥

( १०६ )

कबीरबानी

सारखी-कहै कबीर

धर्मदास उन मन बसौ, करौ शब्दकी आस ।
सोहैं सार सुमरन करो, सुनिवर मरें पियास ॥

चौपाई-धर्मदास उवाच

सत्य नाम संतन सुखदाई । कथा अनूप कहौं चितलाई ॥
बन्दौं गुरु दोऊ कर जोरी । जिमि कलहिते तुम बँदे छोरी ॥
को प्रवीन है लोक तुम्हारा । सो मोसों सब कहौं विचारा ॥
बस्ती सून्य बिचकी सब भाखो । जो देखो सो गोय जिन राखो ॥

धर्मदास बचन

सारखी-जैसे है तैसी कहौं मैं बलिहारी जाऊँ ।
अंस वंस निवारके, जीव सकल मुक्ताऊँ ॥

चौपाई

तुमरे कारन भेद हम दावा । सर्वमूल गुरु समरथ आवा ॥
लोक परेलोक दोउ हम पाए । जब सद्गुरु मोहिं दर्श दिखाए ॥
पांजी भेद कहौं ससुझाई । कौन अंस कौन लोक बैठाई ॥
केते पवन इहाँते होई । जहाँ समर्थ बैठक सोई ॥
वेद कितेकी सन्ना दीजे । इतनी दया गुरु हमपर कीजे ॥

सारखी-लोक भेद केते वहै, पांजी भेद कहो ससुझाय ।
अंस वंस अस्थान बतावो, सब संशय मिट जाय ॥

सद्गुरु पेडी भेदः पठ्यते

धर्मदास मैं कहा ससुझाई । पांजी अंस को भेद बताई ॥
तज अंडवार पलंगबिस्तारा । मध्यमेशून्यदोयपालैंगअंधियारा ॥
मृतुलोकमें सालोक मुक्तिप्रमाना । ताकी नाम मानसरोवर स्थाना ॥

बांधसागर

(१०७)

चारिमुक्तिकी कमाई अस्थान

धीरज अंश तहाँ बैठारा । चौसठ कामिनी संग विहारा ॥
मध्यसरोवर पिंडसिला लै धारी । चौसठकामिनी निरते घरियारी ॥
जो कोई वाम मार्ग को ध्यावै । सो सालोक्य मुक्ति को पावै ॥
पेडी ॥१॥ तहाँते वैकुण्ठ चौवीस कोटी रहाई । तहाँ सुमेर रहचो
ठहराई ॥ तहाँ धर्मराय अविनासी रहही । जो पाप पुण्यका
लेखा लहही ॥ तहाँ रंभा सामीप्य मुक्त है सोई । नवसौ सखी
ताके सँग होई ॥

(पेडी २ वैकुण्ठको विस्तारा)

पांच सीखर सुमेरके रहही । पांचों अंसकाला तहाँ धरही ॥
ईशानकोन ध्रुव आशन कीन्हा । वायु कोन कुबेरको
दीना ॥ नैऋत कोन जमको अस्थाना । अग्नि कोन इन्द्रासन
ठाना ॥ जिनकूं धर्मराय मैं कही । मध्यसिंहासन विष्णुको
सही ॥ सहस्र साठजोजन वैकुण्ठ प्रमाना ॥ ६००००० तेहिके
आगे सुन्य डोर बन्धाना ॥ निर्वाणमारगको जो कोई ध्यावै ॥
सो सामीप्यमुक्ति वैकुण्ठको पावै ॥ पेडी ॥६॥ वैकुण्ठते शून्य
अठारह १८ करोरी ॥ तहाँ लागी सून्यकी डोरी । शून्यमध्य है दीप
अनूपा । आदि निरंजन तहाँ जोतिसरूपा ॥ तहाँ अँधियारी हैं
सुन्य मंझारा । दोय पलंग है सुन्य विस्तारा ॥ तहाँ कोटि
चारि है जोति उजियारी ॥ तहाँ अष्टंगी है शक्ति नारी ॥
सारूप्य मुक्ति सो तब पावै ॥ अघोर मार्गको जो कोई ध्यावै ॥

चौथी मुक्ति आगे अस्थान

ते अक्षर आगे अस्थाना । एक पलंग तहाँते परवाना ॥ तहाँ
अक्षर योग माया विस्तारा । चारि अंश जिनके अधिकारा ॥
तहाँते चार वेद परवाना । चौथी मुक्तिको येथि ठिकाना ॥ तहाँते
आगे कोह ना गएऊ । एहि मता चारों वेद मिलितयेऊ ॥ चारों