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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

( २६० )

अमरमूल

तुम तौ एक एक ठहरावा । एक महात्मन निज हम पावा ॥ सत्य लोक का कहौ ठिकाना । केतक है विस्तार प्रमाना ॥ केतक ऊँच नीच है भाई । सो मोहि साहिब देहु बताई ॥ केतक लंबा औ चकराई । सो सब लेखा कहु समझाई ॥

सद्गुरु वचन

कहैं कबीर सुन सुकृत वानी । लोक कथा सब सुन बिलछानी ॥ सब विस्तार तोहि समझाऊं । लेखा नहीं अलेख लखाऊं ॥ कहिये तो लेखा हो भाई । अलेखा बात सुख कही न जाई ॥ जासौ कहिये अगम अपारा । ताको अंश न पावहि पारा ॥ जहँ लेखा तहँ परलय होई । अलेख अंत न पावहि कोई ॥ एक समय ऐसो धर्मदासा । अपने चित्तको कहौ प्रकाशा ॥ जब हम सत्यलोकमें रहिया । सो वृत्तान्त तुहै नहिं कहिया ॥ सत्यलोक तैं आगे गयऊ । अचरज तहँवा देखत भयऊ ॥ सो अचरज अब कहौ न जाई । तुम पूछौ तौ देहुँ बताई ॥ ऐसी बात ताहिं काहू जानी । तुम ना काहू फिर पूछी आनी ॥ धर्मदास प्राण हित मोरा । सुनहु ज्ञान यह दीप अंजोरा ॥ केतक सत्यलोक में देखा । पुरुष प्रमाण न जात विशेषा ॥ ऐसा लोक यही ब्यवहारा । ऐसहि रूप तहँ पुरुष सव्वारा ॥ तहवों देख सुर्त सौ जाई । जिनमोहिं दीन्हा अगम लखाई ॥

साखी—अनंत काल तहँ देखऊ, सत्यलोक विस्तार ।

गिन्ती कहैं लग कीन्हिये, धर्मदास निर्धार ॥

चौपाई

गिन्ती कहाँ गिनौ निज धामा । को वणै सो पुरुष प्रवाणा ॥ गिन्ती की मर्याद मिटाई । सार शब्द सब घटन समाई ॥

बोधसागर

( २६१ )

साखी-जौ कछु गिन्ती आवही, ताकौ है सब नाश । परे न गिन किम गीनिये, ऐसा शब्द प्रकाश ॥

चौपाई

वचन भेद कर कथा सुनावा । जिह्तिं तुम्हरा मनपति आवा ॥ ब्रह्म अखण्ड लेख किमि जानी । खंडित कर किमि ज्ञान बखानी ॥ तहँ लगि सुनी सो माया जानी । जो देखा सो भर्म बखानी ॥ कहिये जो तौ दुतिया होई । दुनिया भर्म मेंट सब कोई ॥ एक ब्रह्म दुतिया नहिं कोई । कैसे दुतिया कहिये सोई ॥

साखी-नहिं उत्पति नहिं प्रलय, नहिं आवे नहिं जाय । नहिं गिन्ती अनगिनत वह, बूझ कै शब्द समाय ॥

चौपाई

तब हम आगे दीन्ह पयाना । जहँ देखा तहँ हंस समाना ॥ अक्षर एक हम सब में देखा । भाव अनेक कहो का लेखा ॥ तब हम चले आप स्थाना । ऊर्ध्वलोक सो कीन्ह पयाना ॥ मारगमें अचरज एक देखा । ताका अब मैं कहौं बिवेका ॥ अद्भुत लीला वर्णि न जाई । कहे सुने सौ को पतिआई ॥ धर्मदास मैं तुमहिं सुनाऊँ । अकथ कथा कथ ज्ञान बुझाऊँ ॥ तहँवां देख कबीर कर लोका । असंख्य कबीर कर देखा थोका ॥ हम जाना की हमहि कबीरू । जहँ देखा तहँ कबीर शरीरू ॥ तब अपने चित कीन्ह बिचारा । एकहि रूप सकल बिस्तारा ॥ दूजा और आय नहिं कोई । सब घट रमें कबीर समोई ॥

साखी-हम कबीर हम कर्ता, सकल सृष्टि धर्मदास । दूजा और न देखिये, सत्य शब्द परकास ॥

( २६२ )

अमरभूल

चौपाई

नहीं कबीर नहीं धर्मदासा । अक्षर एक सकल घट वासा ॥ सत्य पुरुष वाही सों कहिये । आदि अन्त अक्षर गह रहिये ॥ अक्षर मूल और सब डारा । शाख रमैनी पत्र पसारा ॥ कथा जोकहि-कहि ज्ञान सुनावा । यही भांति संसार बुझावा ॥ जिन बूझा तिन धोखा माना । सकल बात मिथ्याकर जाना ॥

सारखी— कहै कबीर यह मनहि है, मतका सकल पसार ।

चिन्ह यह मन कहै बूझिया, आवागमन निवार ॥

धर्मदास वचन—चौपाई

धर्मदास विनती करजोरी । बंदिछोर सुन विन्ती मोरी ॥ निश्चय जान मोहिं समुझायो । निश्चय सकल हमतुमसों पायो ॥ सो यह बात अब बूझों साई । सो साहिब मोहिं देहु बताई ॥ आवागमन कवन विधि होई । बन्दी छोर सुनावहु सोई ॥

श्रीसाहिब कबीर वचन

तब साहिब कहिबे अनुसारा । कहौं विचार तासु व्यवहारा ॥ पांच तत्त्वका पुतरा बनावा । तामहँ परगट आप समावा ॥ त्रिगुण आतमा रूप बनाई । दुख सुख ताहि सबै भुगताई ॥ इन मँ मन राजा कर दीन्हा । ताते जीव बुद्धि गह लीन्हा ॥ आपन रूप आपनहिं चीन्हा । ताते आवागमन कर लीन्हा ॥ ना कोइ आया ना कोई गया । मनके मते जन्मतें भया ॥ मनही ज्ञानी मूरख कहिये । मनही ब्रह्मरूप यह लहिये ॥ मनका है यह सकल पसारा । मनही पाप पुण्य बिस्तारा ॥ मनही मोह काम उपजावै । मनही आशा तृष्णा लावै ॥

बोधसागर

( २६३ )

मनही देहरा देव पसारा । मनही पूजे पूजन हारा ॥ मनही नार पुरुष कर जाना । मनहि पुत्र मन बाप बखाना ॥ मनही राजा रय्यत कहिये । मनहि दिवान मनहि मिलि रहिये ॥

साखी—कहैं कबीर यह मनहि है, मनका सकल पसार । मन चीन्हे ते अमर हैं, गढ़ निहअक्षर सार ॥

चौपाई

कहैलग कहिये मनकी बानी । झूठ पसारा मनहि बखानी ॥ एक ब्रह्म सब घटहि समाई । नहि कहुँ आवै नहि कहुँ जाई ॥ मनकी वृत्ति यह कथा सुनावा । मनही वेद पुरान पढ़ावा ॥ मनहि शास्त्र शुभ घड़ी विचारी । उत्तम मध्यम कह निर्वारी ॥ मनही भाव बूत्त सब करई । मनके भाव योग तप धरई ॥ मनके भाव यज्ञ जो कीन्हा । मनके भाव दान जो दीन्हा ॥ मनके भाव प्रतिग्रह लेई । मनके भाव तुला सब देई ॥ यह सब है मन केर खुटाई । सतगुरु मिस सब कर्म छुटाई ॥

साखी—यह सब मनकी दौर है, मनका सकल पसार । ज्ञान चीन्ह मन अचल है, कहैं कबीर विचार ॥

चौपाई

मनकी कथा कहेउ प्रसंगा । अचरज बात कहेउ सब रंगा ॥ यह मत तौ हम तुमसों कहिया । ज्ञानी होय कोइ कोई लहिया ॥ इक अक्षर का यह है लेखा । ज्ञानी हों सोइ शब्द विवेका ॥ धर्मदास अक्षर हट जानौ । दूजा भाव न मनमहँ आनौ ॥ दूजा कहिये मनका भाऊ । ताते सत्य ज्ञान समझाऊ ॥ झूठा है मन का पैसारा । ताते चित महाँ शब्द सँभारा ॥

( २६४ )

अमरमूल

साखी—कहै कबीर विचारकै, सुनियो सन्त सुजान । हम तुम कहैं निज भाखऊ, सत्य शब्द परवान ॥

चौपाई

धर्मदास सुन सत्य सँदेशा । सत्य शब्द कहियो उपदेशा ॥ जाके पास होय दिव्य ज्ञाना । सोई पावहि पद निर्वाना ॥

छंद—निर्वाण पद कहैं पाय है सोई ज्ञान दीपक उर धरै । अज्ञान तमको नाश कर परकाश आतमको करै ॥ जिमि भानु है आकाशमें प्रतिबिम्ब सब घट देखिये । ब्रह्म जीव है भेद इतनौ धर्मदास विवेकिये ॥

सोरठा—सत्य नाम परवान, कहैं कबीर विचारकै । पहुँचै लोक ठिकान, यहै भेद जो पावही ॥ इति श्री अमरमूल, जीव सीव भेद लोकवर्णन

नवम विश्राम

धर्मदास वचन—चौपाई

धर्मदास उठ पांयन परई । सतगुरुसों विनती अनुसरई ॥ सत्यलोक मोहे बरन सुनावा । वचन तुम्हारे सब लखि पावा ॥ तुम तौ कहैं अवचन है सोई । चरचा शब्द कहौ किमि होई ॥ जब तुम शब्द जो कहि समुझावा । वचन भावमें सब जो आवा ॥ अवचन बात वचनकिमिकहिये । सो मोहे स्वामी भेद बतइये ॥ प्रथमहि तौ तुम शब्द सुनावा । ता पीछे फिर ज्ञान दढावा ॥ और तुम कहे वचन अनलेखा । हम सेवक किमि करें विवेका ॥ एक वचन कहिये समुझाई । जिहिते चित्त अन्त नहिं जाई ॥

बोधसागर

( २६६ )

साहिब कबीर-वचन

तब कबीर अस कहिबे लीन्हा । ज्ञान भेद सकल कहि दीन्हा ॥ धर्मदास मैं कहौं विचारी । जिहितैं निबहै सब संसारी ॥ प्रथमहि शिष्य होय जो आई । ता कहैं पान देहु तुम भाई ॥ जब देखहु तुम दृढ़ता ज्ञाना । ता कहैं कहहू शब्द प्रवाना ॥ शब्द मांहि जब निश्चय आवै । ता कहैं ज्ञान अगाध सुनावै ॥ अनुभवका जब करै विचारा । सो तौ तीन लोकसों न्यारा ॥ अनुभव ज्ञान प्रगट जब होई । आतमराम चीन्ह है सोई ॥ शब्द निहशब्द आप कहलावा । आपहि बोल अबोल सुनावा ॥ आपहि चुप जो बोलत रहिया । आप वचन अवचन जो कहिया ॥ आप गुरु है शब्द सुनावै । आप शिष्य है सुत समावै ॥ आहि गुरु शिष्य जो होई । देखै सुनै आपही सोई ॥

साखी-देखै सुनै कहै सबै, आपहि रूप अपार ।

आप न चीन्है आप कहैं, भूला सब संसार ॥

चौपाई

यह मति हम तौ तुम कहैं दीन्हा । बिरला शिष्य कोइ पावै चीन्हा ॥ धर्मदास तुम कहौ सन्देशा । जो जस जीव ताहि उपदेशा ॥ बालक सम जाकर है ज्ञाना । तासौं कहहू वचन प्रवाना ॥ जा कहैं सूक्ष्म ज्ञान है भाई । ता कहैं सुन्नन देहु लखाई ॥ ज्ञान गम्य जा कहैं पुनि होई । सार शब्द जा कहैं कहु सोई ॥ जा कहैं दिव्य ज्ञान परवेशा । ता कहैं तत्त्व ज्ञान उपदेशा ॥ अनुभव ज्ञान जाहि कहैं होई । दूसर कितहु न देखै सोई ॥ उग्र ज्ञान जा कहैं परकाशा । आतमराम घटमाहिं निवासा ॥ आतमरामकी परचय होई । आपहि आतमराम है सोई ॥

( २६६ )

अमरमूल

दूजा कितहुं न देखहि भाई । आप रहा सब ठांव समाई ॥ यही भांति तुम जग समुझावो । जो समुझै तेहिं लोक पठावो ॥ आत्मारामकी परिचय पाई । ताके निकट लोक है भाई ॥ हम तौ एक लोक कहैं दीन्हा । अनंतलोक घट नाहीं चीन्हा ॥ अनंतलोककी परिचय पावै । कहैं कबीर भव बहुरि न आवै ॥ एक बचन तो देउँ लखाई । जिहिं तैं तुम्हरो संशय जाई ॥ एक समय सत लोकहि रहिया । सत्य पुरुष इक मोसन कहिया ॥ हे कबीर हम तुम हैं एका । दूजा भाव मति राखहु ठेका ॥ सुर्त स्वरूप तुम्हारा भाई । शब्द रूप हमही निर्माई ॥ सुरत शब्द निकट इक भाखा । पर्दा अंतर कछू न राखा ॥ ब्रह्म स्वरूप मोहिं कहैं जानौ । केवल ब्रह्म स्वरूप बखानौ ॥ शब्द मोहिं यक सुर्त उतपानी । सो मोकों तुम निश्चय जानी ॥ धर्मराय है मेरो अंशा । सो निज जानहु हमरो वंशा ॥ आदि भवानी रूप बनावा । तामें निश्चय जाय समावा ॥ तीनों गुण हैं मोर प्रकाशा । पांच तत्त्व महाँ मोर निवासा ॥ जीवन रूप कियो हम भाई । आतम रूप जु हमहिं बनाई ॥ पांच तत्त्व परकट हम कीन्हा । निश्चय वासतहां हम लीन्हा ॥ आपहिं सों सब रूप अवतारा । राम कृष्ण परकट संसारा ॥ यह सब रूप मोर है सांचा । इनहि चीन्ह सो यमसों बाँचा ॥ यम माहीं है मोरो रूपा । सब पृथ्वीमह मोर स्वरूपा ॥ चौरासी लख योनी कीन्हा । आप बास योनीमहाँ लीन्हा ॥ हम से दूसर नाहिन कोई । भर्म माँह सब रहे समोई ॥ भर्म रूप हम सृष्टि बनाई । भर्म माँहि सब रहे समाई ॥ सुर नर मुनिगण यक्ष अपारा । राची सृष्टि भर्म व्यवहारा ॥

बोधसागर

( २६७ )

इतने भर्म न छूटत भाई । ब्रह्मादिक से रहे भुलाई ॥ हे कबीर हम तुमसों कही । निश्चय जान बात यह सही ॥ पुरुष बात यह मोहि सुनाई । सो मैं तुम कहैं आन जनाई ॥ धर्मदास निरखहु निज नैना । निश्चय जान परख मम वैना ॥

धर्मदास वचन

धर्मदास विनवै कर जोरी । साहिब सुनहु बिनती मोरी ॥ यहै कथा तुम मोकहैं भाखी । दूसर और कवन है साखी ॥

सतगुरु वचन

तब कबीर बोले अंस बानी । सत्य बात यह सुनियो ज्ञानी ॥ यहै कथा हम त्रेता भाखी । मधुकर विप्र ताहिकर साखी ॥

साखी—यहै कथा त्रेता कही, मधुकर सों समुझाय ।

और न दूजा जानही, धर्मदास सुन भाय ॥

धर्मदास वचन—चौपाई

अमृत कथा मोहि समुझावा । हृदयकमल मम आन जुझावा ॥ सतगुरु सप्रथ की बलिजाऊँ । बहुर न भवसागर महाँ आऊँ ॥ अस्तुति कवन एकमुख करऊँ । सतगुरु चरण हृदयमहाँ धरऊँ ॥ गद गद गिरा नयन भरदयऊँ । अहो नाथ मोहि बड़सुख भयऊँ ॥ बहुत अनंद भयउ मन माहीं । अचरज सुख कछु कही न जाहीं ॥ बचन सुधा रविकिरण समूहा । मम संशय यामिनिगत जूहा ॥ बहुत अनंद भयउ हियमाहीं । ब्रह्म अनंद कहो नहिं खाहीं ॥ बिनती एक सुनो गुरु ज्ञानी । तुम महिमाकिमिकहौं बखानी ॥ जो अब दायो करो गुसाई । सोई शब्दमहैं रहौं समाई ॥

श्रीसाहिब कबीर वचन

कहैं कबीर सुनौ धर्मदासू । हम तुम एक शब्दमहैं बासू ॥ दूसर भाव नहीं है आशा । सोई कबीर सोई धर्मदासा ॥

( २६८ )

अमरमूल

एक रूप धर्मदास कबीरा । लख चौरासी एक शरीरा ॥ काया वीर नाम है धीरू । सब घट रहें समाय कबीरू ॥ जो बोलत सो शब्दप्रवाना । शब्दहि रूप कबीर समाना ॥ शब्दहि रूप कबीर कहाई । शब्द रूप है रहै समाई ॥ निजही शब्द कबीर है सारा । जाका है निज सकल पसारा ॥ एकै रूप शब्द पुन एका । एक भाव दुतिया नहिं देखा ॥ एकहि हम तुम एक शरीरा । एक शब्द है मति के धीरा ॥ एको रूप एकै अनुहारी । एकहि पुरुष सकल बिस्तारी ॥

साखी-रंग रूप सब एक है, एकहि सकल पसार ।

एक जान सोइ एकहै, दूजा यह संसार ॥

बिनती एक करौं कर जोरी । सतगुरु संशय मेटहु मोरी ॥ जो तुम ऐसा ज्ञान सुनावा । हृदयकमल मम आन जुडावा ॥ इक संशय उपजी मन माहीं । चार कर्म देखे जिमि पाहीं ॥ कर्म ज्ञान कहे सब कोई । कर्म करे सो निश्चय होई ॥ कर्म सकल जीवन कहैं फाँसा । कर्म संग यह भयो बिनाशा ॥ कर्म करै तैसा फल पाई । ऊँच नीच योनिन भरमाई ॥ काल पाय कोइ ज्ञान बिचारा । काल पाय सब कर्म सँचारा ॥ ऐसी कथा सुनी सब ठाई । सोइ कहौं जिहि संशय जाई ॥ तुम तो एक एक ठहरावा । दूसर भाव कवन उपजावा ॥ सब घट ब्रह्म एक ठहराई । तौ किमि कष्ट सहैजिव आई ॥ जो तुम कहौं सब ब्रह्म समाना । कोई जीव होहिं अज्ञाना ॥ जो कहिये सब एकहि आई । तौ कस ज्ञान कथा अब गार्ई ॥ एक ब्रह्म तौ सब घट चीन्हा । गुरु शिष्य काहे कहैं कीन्हा ॥ यह तो आप आप ठहराई । काहे का तुम पंथ चलाई ॥

बोधसागर

( २६९ )

जो असकहौ सकल प्रभु कीन्हा । ज्ञान गम्य कैसे कै चीन्हा ॥ काहे कहैं तुम कथा सुनाई । काहे कहैं अब ज्ञान बताई ॥ का कहैं गुरु शिष्य कहावा । कर्म अंक काहे फल पावा ॥ को बूझे अरु कवन बुझावै । कवन गुरुको शिष्य कहावै ॥

सारखी—यह संशय गुरु मेटहु, बिनती सुनो हमार । बलिहारी तुव नामकी, क्षणमें लीन्ह उबार ॥

साहिब कबीर वचन चौपाई

तब सद्गुरु बोले इक बानी । अचरज बात लेहु पहिचानी ॥ कर्म रेख तुम पूछेंउ आई । सो सब कथा तुम्हैं समझाई ॥ मात पिता मिल कर्म कमावा । ताही कर्म देह बनि आवा ॥ ब्रह्मलोक सों जब जिव आवा । कर्म रहित निर्मल पद पावा ॥ जलनिधि वारी मेघ लै आई । बून्द बून्द निर्मल हर्षाई ॥ भूमि परी ढाबर पहिचानी । इमि जीवहि माया लपटानी ॥ पवन लगे निर्मलता होई । माया मलिन दूर सब खोई ॥ जल कहैं पवन जीव कहैं ज्ञाना । ज्ञान भयेते कर्म नसाना ॥ कर्मनसे निर्मल पद पावा । ज्योंका त्यों तब आप कहावा ॥ आप चीन्ह भव जलतै न्यारा । तन छूटे पहुँचै दरबारा ॥ जब जन्मा तब कर्मका लेखा । तन छूटा तब आंखन देखा ॥ जन्म मरनतेथिर नहिं कीन्हा । ऐसी विधि है कर्मको चीन्हा ॥ जाहि समय जैसी बनि आई । ताहि समय तैसा है भाई ॥ तिहिं कर्म काल ठहराना । सब शास्त्रिनमिलकीन्ह बखाना ॥ जीव रूप ताहीसों जानी । आपको आप नहीं पहिचानी ॥ तातै ज्ञान सुनायऊ आई । जीव बुद्धि जातै मिट जाई ॥ गुरु शिष्य यह कारण आई । कर्म अंक लिखनी मिट जाई ॥ तातै पंथ चलाएउ आई । यह कारण हम ज्ञान सुनाई ॥

( २७० )

अमरमूल

एही तें है सकल पसारा । याहीतें है सब व्यवहारा ॥ आतम राम चीन्ह जब पावा । सकल पसारा मेट बहावा ॥ आतम परमातम मिल जाई । जैसे सरिता सिन्धु समाई ॥ जब लग यह चीन्हें नहिं आतमा । तब लग नहिं मिलि है परमातम ॥ शब्द बिना आतम दृग हीना । सद्गुरु संघ यही कहि दीना ॥ शब्द नेत्र जबही लख पावा । सद्गुरु मिलनिज घरहि सिधावा ॥ ऐसी मति जाही घट होई । हंस हिरंमर कहिये सोई ॥ तिन कहैं जानहु हमहिं स्वभाऊ । हमहुँ नहीं कछु ताहिं दुराऊ ॥ धर्मदास यह बूझहु ज्ञाना । जातें हंस होय निर्वाना ॥ जा कहैं आतम ज्ञान प्रकाशा । वही कबीर वही धर्मदासा ॥ आतम राम देख जिन पाई । आप आप सब ठांव समाई ॥ जब देखा तब आप समाना । ब्रह्म छोड़ दूसर नहिं आना ॥ सोहं सोहं सत्य कबीरा । शब्द मंत्र है प्रकट शरीरा ॥ यहां ग्रंथ मैं मंत्र सुनावा । चारहि वेदका मूल बतावा ॥ षटे शास्त्र मिलकरहिं विचारा । प्रकट ब्रह्म यह ज्ञान विचारा ॥

साखी- ऐसा ज्ञान जब ऊपजै, सुनहु हो धर्मदास ।

परकट ब्रह्म स्वरूप है, एक नाम विश्वास ॥

चौपाई

यहै ग्रंथ सब सुनै सुनावै । निश्चय प्रेम भक्ति को पावै ॥ जो ज्ञानी है बूझे ज्ञाना । निश्चय है है ब्रह्म समाना ॥ चार पदार्थ को फल होई । निश्चय जानहु यहमत सोई ॥ ऐसो ज्ञान अखंडित भारी । अमरमूल मैं कहेऊँ बिचारी ॥

साखी-अमरमूल यह ग्रंथ है, सकल ज्ञान भंडार ।

मुनत अमर पद पावहीं, कहैं कबीर विचार ॥

बोधसागर

( २७१ )

धर्मदास वचन

धर्मन हियमें अतिही हवैउ । गद्गद गिरा नयन जल बवैउ॥ सतगुरु चरण रहे हियमाहीं । भानु उदय पङ्कज बिकसाहीं ॥ मोह निशा व्याकुल अतिभारी । तामहैं सोवत नाहिं सम्हारी ॥ गुरु दयाल मोहिं लीन्ह जगाई । आवागमन रहित घर पाई ॥ अब सन्देह रहा कछु नाहीं । शब्द तुम्हार बसा हियमाहीं ॥ स्तुति कहा तुम्हारी कीजै । अमृत कथा श्रवण भर पीजे ॥

छन्द-तुम आदि ब्रह्म अपार सतगुरु, जीवकारण आयऊ ।

काट फन्दा सकल यमके, अमरलोक पठायऊ ॥

भवसिंधु कठिन कराल भारी, पार काहू ना लयो ।

तुम कृपा गोपद जान सोई, पार धर्मनि कर दयो ॥

सोरठा-दीन्हों मोहि लखाय, परमात्म आत्म सकल ।

अमरमूल समुझाय, अमर वस्तु गुरु दीन्हेऊ ॥

इति श्रीग्रन्थ अमरमूल धर्मदास सम्बोधन विज्ञात मतवर्णन

दशम विश्राम सम्पूर्ण

इति अमरमूल ग्रन्थ समाप्त

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प्रारंभिक पृष्ठ (उग्रगीता)

श्रीउग्रगीताप्रारम्भः

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सत्यनाम

श्री कबीर साहिब

श्रीगणेशाय नमः

A faint, stylized illustration of a seated figure, likely Lord Ganesha, wearing a crown and holding a small object, possibly a conch shell or a fruit, in his hands. The figure is surrounded by a decorative border.

श्रीगणेशाय नमः

श्री उग्रगीता ग्रन्थ

सत्यनाम

सत्यसुकृत, आदि अदली, अजर, अचिन्त, पुरुष, मुनीन्द्र, करुणामय, कबीर, सुरतियोग संतान, धनी, धर्मदास, चूरामणिनाम, सुदर्शन नाम, कुलपति नाम, प्रबोध गुरुबालापीर, केवल नाम, अमोल नाम, सुरतिसनेही नाम, हक नाम, पाकनाम, प्रकट नाम, धीरज नाम, उग्र नाम, दया नामकी दया- वंश व्यालीसकी दया

अथ श्रीबोधसागरे

एकविंशतिस्तत्रंगः

अथ उग्रगीताप्रारंभः

उत्थानिका

दोहा—उग्र गीता सार है, सुकृत दया लिसाय । करे दूरि अज्ञान को, अज्ञन ज्ञान समाय ॥ करे दूरि अज्ञानता, अंजन ज्ञान सो देइ । बलिहारी वे गुरुनकी, हंस उबारि जो लेइ ॥

( ६ )

बोधसागर

सोरठा-अंजन ज्ञान है सार, रहै नहीं अज्ञानता । तेहि गुरुकी बलिहार, मेरी सदा प्रणाम है ॥

चौपाई

प्रथमैं बन्दों सतगुरु पाया । बंदी छोर करहु तुम दाय। ॥ धर्मदास बिन्ती अनुसारा । दया करो दुख भञ्जनहारा ॥ अविगतिकी गतिजाइन जानी । अही दयाल सो कहौ बखानी ॥ वेद शास्त्र सब जगत बखानै । गुप्त तत्त्व कोइ कर्म न जानै ॥ जब लगि वेद भेद नहिं जाने । तब लगि शब्द न हितकर मानै ॥ वेद विचारि भेद जो जाने । सत्य शब्दमें मोहि पहिचानै ॥ जीव जन्तु माया लपटाना । ताते वेद भेद नहिं जाना ॥ करवा चौथ औ होरी पूजै । परम तत्त्व कैसेहु नहिं बूझै ॥ देवी देव बहु पूजा ठानै । सार शब्द हृदय नहिं आने ॥ तीरथ व्रत महाँ तन मन पागै । सद्गुरु शब्द न कबहु लागै ॥ तेहिते सब जग गयो विगोई । जनम काल धरि सबही खोई ॥ तुम सद्गुरु हो मुक्ति के दाता । अगम अपार कहौ विख्याता ॥ सद्गुरु मोहि कहौ समुझाई । जाते मनकी संशय जाई ॥ श्रीकृष्ण गीता जो भापा । सो समर्थ सुनबे अभिलापा ॥ केहि विधि अर्जुन रणमहाँ नयऊ । केहि विधि ताहि मोह पुनि भयऊ ॥ केहि विधिकृष्ण ताहि समझाये । सो समर्थ कहौ भेद बताये ॥

दोहा-हे दयाल बिन्ती करौ, रहौ चरण चितलाय । गीता अर्थ भेद सब, मोहि कहौ समुझाय ॥

चौपाई

कहै कबीर सुनहु धर्मदासा । तत्त्व भेद है गुप्त निवासा ॥ वेद भाव संसार पसारा । ताते सृष्टि रच्यो व्यवहारा ॥ बहु व्यवहार रच्यो बहु भांते । जगत सकल भर्मत है ताते ॥ वेदतत्त्व तुम सुनौ सुजाना । अर्जुनगीता कृष्ण बखाना ॥

उग्रगीता

( ७ )

सो मैं तुमसन कथा सुनावों । तत्त्व भेदका मता बुझावों ॥ शास्त्र वेद पुराणन माँहीं । गीता मता तत्त्व जो आहीं ॥ तत्त्व मता जो कृष्ण सुनाया । सद्वर तो कछु अगम बताया ॥ तत्त्व निरतत्त्व दो होते न्यारा । धर्मदास तुम करहु विचारा ॥ जो संशय गीताके होही । सो अब सकल सुनावों तोही ॥ गीताका अब गम्य बतावों । सार शब्दका भेद सुनावों ॥ जहाँ देखौ तहाँ आप निवासा । सबते न्यारा सबमें बासा ॥

समै-तत्त्व मता है गीता, वेद पुराणमें सार ।

ताते अगम अपार है, पूरण शब्द हमार ॥

अथ श्रीभगवद्गीताप्रथमोऽध्यायप्रारम्भः

कवीर उवाच

अब गीता मैं कहौ बखानी । कृष्ण कहा सो अर्जुन मानी ॥ ताते न्यारा शब्द बतावों । तत्त्व माँहि निहतत्त्व लखावों ॥ जब यह सृष्टि भई महि भारा । तेहि मारण हरि मता विचारा ॥ बंधु विरोध कियो हरि जबहीं । कौरों पाण्डु जुरे दल तबहीं ॥ अर्जुन रथ चढ़ि आये तहवां । दोउ दल युद्ध रचो है जहवां ॥ कृष्ण सारथी रथ जब हांका । तासों अर्जुन ऐसो भाषा ॥

अर्जुन उवाच

दोऊ दलमें लै रथ राखों । दूनों देखौ अपनी आँखों ॥ सुनिकै कृष्ण ऐसे ही कीन्हा । दोउ दल बिच रथ राखै लीन्हा ॥ रथ जब दोऊ दलमें राख्यो । भयो मोह अर्जुन अस भाख्यो ॥ ये सब बन्धु हमारे आही । हे प्रभु मैं मारौं कहु काही ॥ भाई चचा भतीजा सारा । कैसे मारौं कुल परिवारा ॥ जहाँ लग देखों दोऊ सेना । आपन कुल मारौं केहि लेना ॥ विधवा होय है सकला नारी । ऐसो दोष लेत को भारी ॥ राज पाट मैं कछू न चाहों । सुखसम्मति कुलधर्म निबाहों ॥