कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( २६४ )
अमरमूल
साखी—कहै कबीर विचारकै, सुनियो सन्त सुजान । हम तुम कहैं निज भाखऊ, सत्य शब्द परवान ॥
चौपाई
धर्मदास सुन सत्य सँदेशा । सत्य शब्द कहियो उपदेशा ॥ जाके पास होय दिव्य ज्ञाना । सोई पावहि पद निर्वाना ॥
छंद—निर्वाण पद कहैं पाय है सोई ज्ञान दीपक उर धरै । अज्ञान तमको नाश कर परकाश आतमको करै ॥ जिमि भानु है आकाशमें प्रतिबिम्ब सब घट देखिये । ब्रह्म जीव है भेद इतनौ धर्मदास विवेकिये ॥
सोरठा—सत्य नाम परवान, कहैं कबीर विचारकै । पहुँचै लोक ठिकान, यहै भेद जो पावही ॥ इति श्री अमरमूल, जीव सीव भेद लोकवर्णन
नवम विश्राम
धर्मदास वचन—चौपाई
धर्मदास उठ पांयन परई । सतगुरुसों विनती अनुसरई ॥ सत्यलोक मोहे बरन सुनावा । वचन तुम्हारे सब लखि पावा ॥ तुम तौ कहैं अवचन है सोई । चरचा शब्द कहौ किमि होई ॥ जब तुम शब्द जो कहि समुझावा । वचन भावमें सब जो आवा ॥ अवचन बात वचनकिमिकहिये । सो मोहे स्वामी भेद बतइये ॥ प्रथमहि तौ तुम शब्द सुनावा । ता पीछे फिर ज्ञान दढावा ॥ और तुम कहे वचन अनलेखा । हम सेवक किमि करें विवेका ॥ एक वचन कहिये समुझाई । जिहिते चित्त अन्त नहिं जाई ॥
बोधसागर
( २६६ )
साहिब कबीर-वचन
तब कबीर अस कहिबे लीन्हा । ज्ञान भेद सकल कहि दीन्हा ॥ धर्मदास मैं कहौं विचारी । जिहितैं निबहै सब संसारी ॥ प्रथमहि शिष्य होय जो आई । ता कहैं पान देहु तुम भाई ॥ जब देखहु तुम दृढ़ता ज्ञाना । ता कहैं कहहू शब्द प्रवाना ॥ शब्द मांहि जब निश्चय आवै । ता कहैं ज्ञान अगाध सुनावै ॥ अनुभवका जब करै विचारा । सो तौ तीन लोकसों न्यारा ॥ अनुभव ज्ञान प्रगट जब होई । आतमराम चीन्ह है सोई ॥ शब्द निहशब्द आप कहलावा । आपहि बोल अबोल सुनावा ॥ आपहि चुप जो बोलत रहिया । आप वचन अवचन जो कहिया ॥ आप गुरु है शब्द सुनावै । आप शिष्य है सुत समावै ॥ आहि गुरु शिष्य जो होई । देखै सुनै आपही सोई ॥
साखी-देखै सुनै कहै सबै, आपहि रूप अपार ।
आप न चीन्है आप कहैं, भूला सब संसार ॥
चौपाई
यह मति हम तौ तुम कहैं दीन्हा । बिरला शिष्य कोइ पावै चीन्हा ॥ धर्मदास तुम कहौ सन्देशा । जो जस जीव ताहि उपदेशा ॥ बालक सम जाकर है ज्ञाना । तासौं कहहू वचन प्रवाना ॥ जा कहैं सूक्ष्म ज्ञान है भाई । ता कहैं सुन्नन देहु लखाई ॥ ज्ञान गम्य जा कहैं पुनि होई । सार शब्द जा कहैं कहु सोई ॥ जा कहैं दिव्य ज्ञान परवेशा । ता कहैं तत्त्व ज्ञान उपदेशा ॥ अनुभव ज्ञान जाहि कहैं होई । दूसर कितहु न देखै सोई ॥ उग्र ज्ञान जा कहैं परकाशा । आतमराम घटमाहिं निवासा ॥ आतमरामकी परचय होई । आपहि आतमराम है सोई ॥
( २६६ )
अमरमूल
दूजा कितहुं न देखहि भाई । आप रहा सब ठांव समाई ॥ यही भांति तुम जग समुझावो । जो समुझै तेहिं लोक पठावो ॥ आत्मारामकी परिचय पाई । ताके निकट लोक है भाई ॥ हम तौ एक लोक कहैं दीन्हा । अनंतलोक घट नाहीं चीन्हा ॥ अनंतलोककी परिचय पावै । कहैं कबीर भव बहुरि न आवै ॥ एक बचन तो देउँ लखाई । जिहिं तैं तुम्हरो संशय जाई ॥ एक समय सत लोकहि रहिया । सत्य पुरुष इक मोसन कहिया ॥ हे कबीर हम तुम हैं एका । दूजा भाव मति राखहु ठेका ॥ सुर्त स्वरूप तुम्हारा भाई । शब्द रूप हमही निर्माई ॥ सुरत शब्द निकट इक भाखा । पर्दा अंतर कछू न राखा ॥ ब्रह्म स्वरूप मोहिं कहैं जानौ । केवल ब्रह्म स्वरूप बखानौ ॥ शब्द मोहिं यक सुर्त उतपानी । सो मोकों तुम निश्चय जानी ॥ धर्मराय है मेरो अंशा । सो निज जानहु हमरो वंशा ॥ आदि भवानी रूप बनावा । तामें निश्चय जाय समावा ॥ तीनों गुण हैं मोर प्रकाशा । पांच तत्त्व महाँ मोर निवासा ॥ जीवन रूप कियो हम भाई । आतम रूप जु हमहिं बनाई ॥ पांच तत्त्व परकट हम कीन्हा । निश्चय वासतहां हम लीन्हा ॥ आपहिं सों सब रूप अवतारा । राम कृष्ण परकट संसारा ॥ यह सब रूप मोर है सांचा । इनहि चीन्ह सो यमसों बाँचा ॥ यम माहीं है मोरो रूपा । सब पृथ्वीमह मोर स्वरूपा ॥ चौरासी लख योनी कीन्हा । आप बास योनीमहाँ लीन्हा ॥ हम से दूसर नाहिन कोई । भर्म माँह सब रहे समोई ॥ भर्म रूप हम सृष्टि बनाई । भर्म माँहि सब रहे समाई ॥ सुर नर मुनिगण यक्ष अपारा । राची सृष्टि भर्म व्यवहारा ॥
बोधसागर
( २६७ )
इतने भर्म न छूटत भाई । ब्रह्मादिक से रहे भुलाई ॥ हे कबीर हम तुमसों कही । निश्चय जान बात यह सही ॥ पुरुष बात यह मोहि सुनाई । सो मैं तुम कहैं आन जनाई ॥ धर्मदास निरखहु निज नैना । निश्चय जान परख मम वैना ॥
धर्मदास वचन
धर्मदास विनवै कर जोरी । साहिब सुनहु बिनती मोरी ॥ यहै कथा तुम मोकहैं भाखी । दूसर और कवन है साखी ॥
सतगुरु वचन
तब कबीर बोले अंस बानी । सत्य बात यह सुनियो ज्ञानी ॥ यहै कथा हम त्रेता भाखी । मधुकर विप्र ताहिकर साखी ॥
साखी—यहै कथा त्रेता कही, मधुकर सों समुझाय ।
और न दूजा जानही, धर्मदास सुन भाय ॥
धर्मदास वचन—चौपाई
अमृत कथा मोहि समुझावा । हृदयकमल मम आन जुझावा ॥ सतगुरु सप्रथ की बलिजाऊँ । बहुर न भवसागर महाँ आऊँ ॥ अस्तुति कवन एकमुख करऊँ । सतगुरु चरण हृदयमहाँ धरऊँ ॥ गद गद गिरा नयन भरदयऊँ । अहो नाथ मोहि बड़सुख भयऊँ ॥ बहुत अनंद भयउ मन माहीं । अचरज सुख कछु कही न जाहीं ॥ बचन सुधा रविकिरण समूहा । मम संशय यामिनिगत जूहा ॥ बहुत अनंद भयउ हियमाहीं । ब्रह्म अनंद कहो नहिं खाहीं ॥ बिनती एक सुनो गुरु ज्ञानी । तुम महिमाकिमिकहौं बखानी ॥ जो अब दायो करो गुसाई । सोई शब्दमहैं रहौं समाई ॥
श्रीसाहिब कबीर वचन
कहैं कबीर सुनौ धर्मदासू । हम तुम एक शब्दमहैं बासू ॥ दूसर भाव नहीं है आशा । सोई कबीर सोई धर्मदासा ॥
( २६८ )
अमरमूल
एक रूप धर्मदास कबीरा । लख चौरासी एक शरीरा ॥ काया वीर नाम है धीरू । सब घट रहें समाय कबीरू ॥ जो बोलत सो शब्दप्रवाना । शब्दहि रूप कबीर समाना ॥ शब्दहि रूप कबीर कहाई । शब्द रूप है रहै समाई ॥ निजही शब्द कबीर है सारा । जाका है निज सकल पसारा ॥ एकै रूप शब्द पुन एका । एक भाव दुतिया नहिं देखा ॥ एकहि हम तुम एक शरीरा । एक शब्द है मति के धीरा ॥ एको रूप एकै अनुहारी । एकहि पुरुष सकल बिस्तारी ॥
साखी-रंग रूप सब एक है, एकहि सकल पसार ।
एक जान सोइ एकहै, दूजा यह संसार ॥
बिनती एक करौं कर जोरी । सतगुरु संशय मेटहु मोरी ॥ जो तुम ऐसा ज्ञान सुनावा । हृदयकमल मम आन जुडावा ॥ इक संशय उपजी मन माहीं । चार कर्म देखे जिमि पाहीं ॥ कर्म ज्ञान कहे सब कोई । कर्म करे सो निश्चय होई ॥ कर्म सकल जीवन कहैं फाँसा । कर्म संग यह भयो बिनाशा ॥ कर्म करै तैसा फल पाई । ऊँच नीच योनिन भरमाई ॥ काल पाय कोइ ज्ञान बिचारा । काल पाय सब कर्म सँचारा ॥ ऐसी कथा सुनी सब ठाई । सोइ कहौं जिहि संशय जाई ॥ तुम तो एक एक ठहरावा । दूसर भाव कवन उपजावा ॥ सब घट ब्रह्म एक ठहराई । तौ किमि कष्ट सहैजिव आई ॥ जो तुम कहौं सब ब्रह्म समाना । कोई जीव होहिं अज्ञाना ॥ जो कहिये सब एकहि आई । तौ कस ज्ञान कथा अब गार्ई ॥ एक ब्रह्म तौ सब घट चीन्हा । गुरु शिष्य काहे कहैं कीन्हा ॥ यह तो आप आप ठहराई । काहे का तुम पंथ चलाई ॥
बोधसागर
( २६९ )
जो असकहौ सकल प्रभु कीन्हा । ज्ञान गम्य कैसे कै चीन्हा ॥ काहे कहैं तुम कथा सुनाई । काहे कहैं अब ज्ञान बताई ॥ का कहैं गुरु शिष्य कहावा । कर्म अंक काहे फल पावा ॥ को बूझे अरु कवन बुझावै । कवन गुरुको शिष्य कहावै ॥
सारखी—यह संशय गुरु मेटहु, बिनती सुनो हमार । बलिहारी तुव नामकी, क्षणमें लीन्ह उबार ॥
साहिब कबीर वचन चौपाई
तब सद्गुरु बोले इक बानी । अचरज बात लेहु पहिचानी ॥ कर्म रेख तुम पूछेंउ आई । सो सब कथा तुम्हैं समझाई ॥ मात पिता मिल कर्म कमावा । ताही कर्म देह बनि आवा ॥ ब्रह्मलोक सों जब जिव आवा । कर्म रहित निर्मल पद पावा ॥ जलनिधि वारी मेघ लै आई । बून्द बून्द निर्मल हर्षाई ॥ भूमि परी ढाबर पहिचानी । इमि जीवहि माया लपटानी ॥ पवन लगे निर्मलता होई । माया मलिन दूर सब खोई ॥ जल कहैं पवन जीव कहैं ज्ञाना । ज्ञान भयेते कर्म नसाना ॥ कर्मनसे निर्मल पद पावा । ज्योंका त्यों तब आप कहावा ॥ आप चीन्ह भव जलतै न्यारा । तन छूटे पहुँचै दरबारा ॥ जब जन्मा तब कर्मका लेखा । तन छूटा तब आंखन देखा ॥ जन्म मरनतेथिर नहिं कीन्हा । ऐसी विधि है कर्मको चीन्हा ॥ जाहि समय जैसी बनि आई । ताहि समय तैसा है भाई ॥ तिहिं कर्म काल ठहराना । सब शास्त्रिनमिलकीन्ह बखाना ॥ जीव रूप ताहीसों जानी । आपको आप नहीं पहिचानी ॥ तातै ज्ञान सुनायऊ आई । जीव बुद्धि जातै मिट जाई ॥ गुरु शिष्य यह कारण आई । कर्म अंक लिखनी मिट जाई ॥ तातै पंथ चलाएउ आई । यह कारण हम ज्ञान सुनाई ॥
( २७० )
अमरमूल
एही तें है सकल पसारा । याहीतें है सब व्यवहारा ॥ आतम राम चीन्ह जब पावा । सकल पसारा मेट बहावा ॥ आतम परमातम मिल जाई । जैसे सरिता सिन्धु समाई ॥ जब लग यह चीन्हें नहिं आतमा । तब लग नहिं मिलि है परमातम ॥ शब्द बिना आतम दृग हीना । सद्गुरु संघ यही कहि दीना ॥ शब्द नेत्र जबही लख पावा । सद्गुरु मिलनिज घरहि सिधावा ॥ ऐसी मति जाही घट होई । हंस हिरंमर कहिये सोई ॥ तिन कहैं जानहु हमहिं स्वभाऊ । हमहुँ नहीं कछु ताहिं दुराऊ ॥ धर्मदास यह बूझहु ज्ञाना । जातें हंस होय निर्वाना ॥ जा कहैं आतम ज्ञान प्रकाशा । वही कबीर वही धर्मदासा ॥ आतम राम देख जिन पाई । आप आप सब ठांव समाई ॥ जब देखा तब आप समाना । ब्रह्म छोड़ दूसर नहिं आना ॥ सोहं सोहं सत्य कबीरा । शब्द मंत्र है प्रकट शरीरा ॥ यहां ग्रंथ मैं मंत्र सुनावा । चारहि वेदका मूल बतावा ॥ षटे शास्त्र मिलकरहिं विचारा । प्रकट ब्रह्म यह ज्ञान विचारा ॥
साखी- ऐसा ज्ञान जब ऊपजै, सुनहु हो धर्मदास ।
परकट ब्रह्म स्वरूप है, एक नाम विश्वास ॥
चौपाई
यहै ग्रंथ सब सुनै सुनावै । निश्चय प्रेम भक्ति को पावै ॥ जो ज्ञानी है बूझे ज्ञाना । निश्चय है है ब्रह्म समाना ॥ चार पदार्थ को फल होई । निश्चय जानहु यहमत सोई ॥ ऐसो ज्ञान अखंडित भारी । अमरमूल मैं कहेऊँ बिचारी ॥
साखी-अमरमूल यह ग्रंथ है, सकल ज्ञान भंडार ।
मुनत अमर पद पावहीं, कहैं कबीर विचार ॥
बोधसागर
( २७१ )
धर्मदास वचन
धर्मन हियमें अतिही हवैउ । गद्गद गिरा नयन जल बवैउ॥ सतगुरु चरण रहे हियमाहीं । भानु उदय पङ्कज बिकसाहीं ॥ मोह निशा व्याकुल अतिभारी । तामहैं सोवत नाहिं सम्हारी ॥ गुरु दयाल मोहिं लीन्ह जगाई । आवागमन रहित घर पाई ॥ अब सन्देह रहा कछु नाहीं । शब्द तुम्हार बसा हियमाहीं ॥ स्तुति कहा तुम्हारी कीजै । अमृत कथा श्रवण भर पीजे ॥
छन्द-तुम आदि ब्रह्म अपार सतगुरु, जीवकारण आयऊ ।
काट फन्दा सकल यमके, अमरलोक पठायऊ ॥
भवसिंधु कठिन कराल भारी, पार काहू ना लयो ।
तुम कृपा गोपद जान सोई, पार धर्मनि कर दयो ॥
सोरठा-दीन्हों मोहि लखाय, परमात्म आत्म सकल ।
अमरमूल समुझाय, अमर वस्तु गुरु दीन्हेऊ ॥
इति श्रीग्रन्थ अमरमूल धर्मदास सम्बोधन विज्ञात मतवर्णन
दशम विश्राम सम्पूर्ण
इति अमरमूल ग्रन्थ समाप्त
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सत्यनाम
श्री कबीर साहिब
श्रीगणेशाय नमः
A faint, stylized illustration of a seated figure, likely Lord Ganesha, wearing a crown and holding a small object, possibly a conch shell or a fruit, in his hands. The figure is surrounded by a decorative border.
श्रीगणेशाय नमः
श्री उग्रगीता ग्रन्थ
सत्यनाम
सत्यसुकृत, आदि अदली, अजर, अचिन्त, पुरुष, मुनीन्द्र, करुणामय, कबीर, सुरतियोग संतान, धनी, धर्मदास, चूरामणिनाम, सुदर्शन नाम, कुलपति नाम, प्रबोध गुरुबालापीर, केवल नाम, अमोल नाम, सुरतिसनेही नाम, हक नाम, पाकनाम, प्रकट नाम, धीरज नाम, उग्र नाम, दया नामकी दया- वंश व्यालीसकी दया
अथ श्रीबोधसागरे
एकविंशतिस्तत्रंगः
अथ उग्रगीताप्रारंभः
उत्थानिका
★
दोहा—उग्र गीता सार है, सुकृत दया लिसाय । करे दूरि अज्ञान को, अज्ञन ज्ञान समाय ॥ करे दूरि अज्ञानता, अंजन ज्ञान सो देइ । बलिहारी वे गुरुनकी, हंस उबारि जो लेइ ॥
( ६ )
बोधसागर
सोरठा-अंजन ज्ञान है सार, रहै नहीं अज्ञानता । तेहि गुरुकी बलिहार, मेरी सदा प्रणाम है ॥
चौपाई
प्रथमैं बन्दों सतगुरु पाया । बंदी छोर करहु तुम दाय। ॥ धर्मदास बिन्ती अनुसारा । दया करो दुख भञ्जनहारा ॥ अविगतिकी गतिजाइन जानी । अही दयाल सो कहौ बखानी ॥ वेद शास्त्र सब जगत बखानै । गुप्त तत्त्व कोइ कर्म न जानै ॥ जब लगि वेद भेद नहिं जाने । तब लगि शब्द न हितकर मानै ॥ वेद विचारि भेद जो जाने । सत्य शब्दमें मोहि पहिचानै ॥ जीव जन्तु माया लपटाना । ताते वेद भेद नहिं जाना ॥ करवा चौथ औ होरी पूजै । परम तत्त्व कैसेहु नहिं बूझै ॥ देवी देव बहु पूजा ठानै । सार शब्द हृदय नहिं आने ॥ तीरथ व्रत महाँ तन मन पागै । सद्गुरु शब्द न कबहु लागै ॥ तेहिते सब जग गयो विगोई । जनम काल धरि सबही खोई ॥ तुम सद्गुरु हो मुक्ति के दाता । अगम अपार कहौ विख्याता ॥ सद्गुरु मोहि कहौ समुझाई । जाते मनकी संशय जाई ॥ श्रीकृष्ण गीता जो भापा । सो समर्थ सुनबे अभिलापा ॥ केहि विधि अर्जुन रणमहाँ नयऊ । केहि विधि ताहि मोह पुनि भयऊ ॥ केहि विधिकृष्ण ताहि समझाये । सो समर्थ कहौ भेद बताये ॥
दोहा-हे दयाल बिन्ती करौ, रहौ चरण चितलाय । गीता अर्थ भेद सब, मोहि कहौ समुझाय ॥
चौपाई
कहै कबीर सुनहु धर्मदासा । तत्त्व भेद है गुप्त निवासा ॥ वेद भाव संसार पसारा । ताते सृष्टि रच्यो व्यवहारा ॥ बहु व्यवहार रच्यो बहु भांते । जगत सकल भर्मत है ताते ॥ वेदतत्त्व तुम सुनौ सुजाना । अर्जुनगीता कृष्ण बखाना ॥
उग्रगीता
( ७ )
सो मैं तुमसन कथा सुनावों । तत्त्व भेदका मता बुझावों ॥ शास्त्र वेद पुराणन माँहीं । गीता मता तत्त्व जो आहीं ॥ तत्त्व मता जो कृष्ण सुनाया । सद्वर तो कछु अगम बताया ॥ तत्त्व निरतत्त्व दो होते न्यारा । धर्मदास तुम करहु विचारा ॥ जो संशय गीताके होही । सो अब सकल सुनावों तोही ॥ गीताका अब गम्य बतावों । सार शब्दका भेद सुनावों ॥ जहाँ देखौ तहाँ आप निवासा । सबते न्यारा सबमें बासा ॥
समै-तत्त्व मता है गीता, वेद पुराणमें सार ।
ताते अगम अपार है, पूरण शब्द हमार ॥
अथ श्रीभगवद्गीताप्रथमोऽध्यायप्रारम्भः
कवीर उवाच
अब गीता मैं कहौ बखानी । कृष्ण कहा सो अर्जुन मानी ॥ ताते न्यारा शब्द बतावों । तत्त्व माँहि निहतत्त्व लखावों ॥ जब यह सृष्टि भई महि भारा । तेहि मारण हरि मता विचारा ॥ बंधु विरोध कियो हरि जबहीं । कौरों पाण्डु जुरे दल तबहीं ॥ अर्जुन रथ चढ़ि आये तहवां । दोउ दल युद्ध रचो है जहवां ॥ कृष्ण सारथी रथ जब हांका । तासों अर्जुन ऐसो भाषा ॥
अर्जुन उवाच
दोऊ दलमें लै रथ राखों । दूनों देखौ अपनी आँखों ॥ सुनिकै कृष्ण ऐसे ही कीन्हा । दोउ दल बिच रथ राखै लीन्हा ॥ रथ जब दोऊ दलमें राख्यो । भयो मोह अर्जुन अस भाख्यो ॥ ये सब बन्धु हमारे आही । हे प्रभु मैं मारौं कहु काही ॥ भाई चचा भतीजा सारा । कैसे मारौं कुल परिवारा ॥ जहाँ लग देखों दोऊ सेना । आपन कुल मारौं केहि लेना ॥ विधवा होय है सकला नारी । ऐसो दोष लेत को भारी ॥ राज पाट मैं कछू न चाहों । सुखसम्मति कुलधर्म निबाहों ॥
( ८ )
बोधसागर
तीन लोकका राज जो देई । हत्या बंधु तबहु नहिं होई ॥ जो तुम कहो उन अवगुन कीन्हा । छवहु प्रकार भारऊ लीन्हा ॥ तिन्द प्रकारन मारा चाही । तौ यह मोहि दोष नहिं आही ॥ छौमें एक प्रकार जो होई । ताके मारे दोष न सोई ॥
धर्मदास उवाच
तब धर्मदास विनय अनुसारी । छौ प्रकार कवन कह भारी ॥ तेहि प्रकारन मारा चहिये । सो सब स्वामी मोसे कहिये ॥
कवीर उवाच
देखो हत्या को अब बरना । बहु संग्राम किये का सैना ॥ प्रथमें अग्नि देई घर कोई । मारत तासु दोष नहिं होई ॥ दूजे औरको जहर खवावै । हने ताहि कछु दोष न पावै ॥ तिसरे छत्र जो लेई छुड़ाई । राज काजमें पाप न भाई ॥ चौथे नारि पराई लेही । मारे ताहि पाप नहिं तेही ॥ पंचये धन चोरावन आवै । तेहि मारे कछु दोष न आवै ॥ छठये शस्त्र लै मारन धावै । मारे ताहि विलम्ब न लावै ॥ यह अपराध मारिये जोई । मारत हत्या कबहु न होई ॥
अर्जुन उवाच
छ अपराध हमहिंकू लागै । तऊ न हतों कर्म सब त्यागै ॥ मोसों यह अपराध न होई । जो मोकहैं इहि मारि विगोई ॥ अर्जुन धनुष बान गहि डारा । सबका अपने बंधु बिचारा ॥ सब कह कुल परिवार निहारा । उपजो मोह अस्त्र गहि डारा ॥ मुनहु सन्त अर्जुनको विखादा । इह लगि कीन्हो वाद विवादा ॥ अर्जुन मोह सम्पूर्ण भयऊ । कृष्ण अपन मनमत जो ठयऊ ॥ कीजै छल यक मता विचारा । अर्जुन बुद्धि हतौ यहि वारा ॥ ब्रह्मज्ञानते यहि समुझावउ । काल रूप अपने देखलावउ ॥ तब यह मानै कहा हमारा । मारौ फोरि सकल परिवारा ॥
उग्रगीता
( ९ )
कबीर उवाच
धर्मदास यह काल सुभावा । जाके जपन सृष्टि मन लावा ॥ सुर नर मुनि सब छलि २ मारा । कोई न छूटो यह संसारा ॥ ताते सतगुरु शब्द पुकारा । चीन्हो तत्त्व भेद टकसारा ॥ मूरख सत्य शब्द नहि जाने । झूठहि झूठ सदा सुख मानै ॥ परपंजी यह जग को रचना । बिन सतगुरु कोई नाहीं बचना ॥ छन्द-यहि भांतिकै हरि युद्ध ठानो भाव कोई ना लहै । सकल बंधु विरोध करिकै तासु को मारन चहै ॥ ज्ञान औ अज्ञान करि भरमाइ डारो चित्तको । तबहु मूरख नहीं बूझै देख फंदि उस बरतको ॥ सोरठा-सुन धर्मदास सुजान, शब्द एक संसार है ॥ हंस होइ निरवान, मन बच कै निश्चय गहै ॥
इति श्रीउग्रगीताब्रह्मज्ञानयोगमतकबीरधर्मदाससंवादे
अर्जुनविषादो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ।
अथ द्वितीयोऽध्यायः
श्रीभगवानुवाच
कृष्ण जो मन में मता विचारा । अर्जुन सो पुनि बचन उचारा ॥ तुम काहे मोहै गहि लीन्हा । केहि कारण तुम होहु अधीना ॥ क्षत्री धर्म लाज बढि होई । तुम कह दोष न लैहै कोई ॥ जो तुम जानु सदा ये जीहैं । येई तौ जन्म फेरि फेरि लेहैं ॥ अमर तुमहु मैं नाहीं कोई । फिरि २ आवागवन समाई ॥ मैं हूँ अमर नहीं हौं भाई । हम तुम यहिविधि फिरि २ आई ॥ जब २ पाप प्रगट मोहि होई । धरि अवतार करौं क्षय सोई ॥ जब २ द्रापर आवै भाई । हमतुम यहि विधि फिरि २ आई ॥ कौरव पाण्डव फिरि २ लडि हैं । आपहि आपु मारि कै मरिहैं ॥
( १० )
बोधसागर
तुम्हरो कीन्ह कछु नहिं होई । देखौ ब्रह्म ज्ञान करि सोई ॥ मनमें अहं कबहु नहिं कीजै । को मारै कहु को कह छीजै ॥ आपु जो करता काल कहावै । सोई यह संघार करावै ॥ मनमहँ मोह कबहुँ नहिं कीजै । इच्छा प्रभुकी गहि कर लीजै ॥ शस्त्र लेहु तुम हाथ उठाई । कारण करण करै प्रभु आई ॥ तुम शिर कछु न लागे भारा । अपु ते आप जाय सब मारा ॥ जो तुम कहो जीव सब मरिहैं । जीव अमर फिरि२ अवतरिहैं ॥ मारे मरै न जारे जरई । ताको मोह कहा तैं करई ॥ जो काया सो मन चितलाया । मृतक सदा बनी यह काया ॥ मृतक रूप सदा रहै काया । तेहि कारण तुम करत हो माया ॥ तुम हो अहो युद्ध अति आगर । यहि जगमें तुमही हो उजागर ॥ जो तुम युद्ध करो नहिं भाई । जगमें होइ है तुम्हरी हँसाई ॥ कहि है सबै युद्ध सो डरई । क्षत्रि धर्म तेरो नहिं रहई ॥ अपने कुलको धर्म जो हारै । नर्कवासको सो पगु धारै ॥ जो कुल धर्म सदा प्रतिपालै । स्वर्गवास में सो सुख चालै ॥ अपने धर्म न छाड़िय भाई । काहेको तुम करहु हँसाई ॥ लोग पंच जो निंदा करई । धिग जीवन तोको अनुसरई ॥ तब तो भली बात नहिं होई । महा दोष पुनि लागे सोई ॥ पाप होय मनमें पछिताई । नर्कवास तब रहै समाई ॥ कर्म योग तोहि वाक्य सुनावौ । स्वर्गवास ताते पहुँचावौ ॥ ब्राह्मण क्षत्री वैश्य औ शूद्रा । प्रभु कह छांड़ि भरै सब बोद्रा ॥ नरनारायण देह सवौरा । तबहु न चीन्है मूठ गवौरा ॥ ब्राह्मण कर्म सुनो चितलाई । प्रातः स्नान जपै प्रभु राई ॥ नेम धर्म शुचि संयम करई । सन्ध्या गायत्री चित धरई ॥ ठाकुर सेवा मन चितलावै । कथा कीर्तन करै करावै ॥ मनमें सेवा फल नहिं मांगे । स्वर्गवास पहुँचे सब आगे ॥
उग्रगीता
( ११ )
क्षत्री धर्म कर्म बहु करई । स्नान करै प्रभुको चित्त धरई ॥ यज्ञदान निज धर्म निवाहै । सूरानन नहिं दलहि सकाहै ॥ वैश्यवर्ण व्यापार व्योहारा । नेम धर्म जप तप व्रत धारा ॥ शूद्र वर्ण सेवकाई करई । मन वच कर्म इहै चित्त धरई ॥ सेवा फल है अगम अपारा । आवागमन ते होइ नियारा ॥ एते कुलके धर्म जो कहिये । सदा सर्वदा जो निर्वहिये ॥ यह मारग जो लागा रहई । स्वर्ग वासमें सो सुख लहई ॥ मारग छाँड़ि कुमारग लगै । काम कोधमें तन मन पागै ॥ नर्कवास तेहि कारण पावै । जन्म २ वह योनी आवै ॥ निंदा सकल ताहिकी करई । वाउर वेद ताहि परिहरई ॥ ताते अर्जुन ज्ञान विचारो । ब्रह्म ज्ञान मनमें संभारो ॥ मोह लाजकै वंदन छांड़ो । लैकै अक्ष कुटुम सब वाड़ो ॥ तुम कह पाप पुण्य नहिं होई । कारण करण करावै सोई ॥ साधु संत जो परम सनेही । पाप पुण्यते लिप्त न देही ॥
अर्जुन उवाच
कहैं अर्जुन सुनु पुरुष पुराणा । तिन साधुन कर करौ बखाना ॥ कैसी रहनि रहै वै बोलैं । कैसे बैठै कैसे डोलैं ॥ बोले कृष्ण तब चतुर सुजाना । यहि विधि रहै साधु निर्वाना ॥ स्थिर मन बुद्धि निहकामी होई । पांच पचीसौ रहें समोई ॥ बोले सत्य असत्य न भारै । अभ्यन्तर गति प्रभु कह राखै ॥ सो तो कह दुख सुख नाहिं मानै । दृष्टि माह प्रभु पूर्ण जानै ॥ तत्त्व प्रकृति चापि करि बैठै । जैसे कछुआ पाउ समेटै ॥ सीतल सत्य सहज पगु धारै । बाहर भीतर ब्रह्म निहारै ॥ यह लक्षण संगति कै भाई । इंद्री जीतै साधु कहाई ॥ पूर्ण पक्ष जो अर्जुन करेऊ । रोगी मूर्ख भाव जो धरेऊ ॥