कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( १५२ )
बोधस.गर
समदश वचन शब्दकी राहू । हंसराज कहु हंसन नाहू ॥ शब्दचाल तेहि काल न पाई । कृपा करो पद बल २ जाई ॥
ज्ञानी वचन
समरथ वचन सुनो धर्मदासा । तुमसों सत्य शब्द परकाशा ॥ संतोषबोध सतहीते भयेऊ । सत्यपुरुष आपन मुख कियेऊ ॥ साधुसंतपर कीन्है दाय। मोह लोकतें जगत पठाया ॥ उठी अवाज पुष्पतें जैसी । सो वर्णन भाषौ मैं तैसी ॥
पुरुष वचन
हौ ज्ञानी तुम अंश हमाग । वचन सत्य मैं कहौ पुकारा ॥ जो कोइ साथ मोहको साधे । लोभ मोह तृष्णा गहवाधे ॥ तृष्णा वांध साथ जो पावे । आवत लोक वार नहिं लावे ॥ तृष्णा लोभ काल व्यवहारा । जो त्यजि है सो हंस हमारा ॥
ज्ञानी वचन
तत्क्षण ज्ञानी बिनती ठानी । वचन तुम्हार कोइ नहिं मानी ॥ भक्तहीन आंधर दुनियाँई । घट २ फाँस कालगइ नाई ॥ कोट वार जीवन परमोधा । कोइ एक सत्य शब्द ममसोधा ॥
साखी-पृथ्वी जाय जीवन कहि, युग २ शब्द बिताय ।
कोइ एक ज्ञानी चित गहे, आंधर ना पतियाय ॥
पुरुष वचन
जाहु वेग तुम वा संसारा । जो समझे सो उतरे पारा ॥ वार २ तुम जगमें जाई । आपन कह सब कथा सुनाई ॥
ज्ञानी वचन
धर्मदास तब जग हम आवा । आपन कह जीवन समझावा ॥ युग अंशख अर्ब बहु बीता । कै २ बार पृथ्वी हम कीता ॥ शेष गणेश महेश न ब्रह्मा । विष्णु नाम धरती नहिं थम्हा ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( १५३ )
यह युग बीत अनन्तन बारा । युग २ आयेउ जिव रस्वारा॥ नर जाने जुलहा अवतारा । साधन काज देह हम धारा ॥ अगम शब्द नहिं जात गैवारा । बार अनेक जगत पुकारा ॥ जीवन बारहिबार पुकारा । नरदेही बहुते हँकारा ॥
साखी-जीवनसों घर २ कहा, नहिं माने उपदेश । गुप्तभाव हम तब भये, चले अमरपुर देश ॥
चौपाई
पांजी चले ठाव हम भयेऊ । सात स्वर्ग ऊपर चढ़ गयेऊ ॥ तहवां देख धर्म अस्थाना । नानझंकारी ताहि बखाना ॥ द्वारे वज्र सिला दे बैठे । बैठे हर सब जेठे ॥ धर्मराय अति प्रबल जगाती । मांगे दान जीव बहु भांती ॥ तिन हम सबको आद बढ़ावा । कैसे ज्ञानी जीवन मुक्तावा ॥ हम कहें सुनो दुष्ट वटपारा । छोड़हु रार पलकमें मारा ॥ छोड़ ठांव यम भये निनारा । पहुँचे अमरलोक मझारा ॥ पुरुष दरश कीन्हे तेहि क्षणमें । घट २ व्याप सकल जीवनमें ॥ तहाँ नहीं परवेश जमन को । बैठक पाँति सकल हंसन को ॥ हरष शोक नहिं करे कतूला । सदा बसंत फूल ऋतु फूला ॥ मोर चकोर बोल मृदु बैना । कोकला कोयल वचन सुबैना ॥ बैठक तहाँही सकल पुरुषकी । बोलत वचन अमीरस रसकी ॥
पुरुष वचन
साखी- वह सत बोले पुरुष तब, सुनो सँदेशी अंश । भवसागर बहु दिन रहे, केतक लाये हंस ॥
ज्ञानी वचन-चौपाई
रहे शब्दसों तब कर जोरी । बंदी छोर विनय सुन मोरी ॥ काम अरु कोथ मोह औ लोभा । माया फँसै जीव पर शोभा ॥
( १५४ )
बोधसागर
सकल जीव अघ आतम पुंजा । फिरि २ परहि जनमके कुंजा ॥
पुरुष वचन
तब समरथ अस वचन पुकारा । दुनियाँ जात काल मुख द्वारा ॥ हो ज्ञानी तुम बहुर सिधाओ । शब्द देव जीवन मुक्ताओ ॥ देव परवाना अपने हाथा । सकल जीव जो होय सनाथा ॥ तिनका तोरहु यम का लेशा । माथे हाथ दे कहो संदेशा ॥ नरियर धोती तान मैंगे हो । सत्य शब्द देअंक चढै हो ॥ येही शब्द येही परवाना । सत्य शब्द निश्चय कर जाना ॥ सन्त समाज सुनो तुम महिमा । गुरुपद परस दरस एक लहमा ॥ तेहि समधन नहिं जगमें औरा । कोट जन्म तीरथ फल दौरा ॥ जो कोइ साथ मंदिरमें आवे । चरण पखार चरणामृत लावे ॥ नारी पुरुष एक मत कीजे । सतगुरु दया अमीरस पीजे ॥
साखी—काम कोध तृष्णा तजे, तजै मान अपमान ।
सद्गुरु दया जाहिपर, यम शिर मरदे मान ॥
चौपाई
जो ये तक तज सेवा करहै । सो प्राणी भवसागर तरहै ॥ सेवा करत कसर भई जाई । तवै कालघर बजत बधाई ॥ सेवा करे चरण चितलाई । पाँच साथ मिल भगत कराई ॥ संतोष बोध जीवन पर भाषा । जो कोइ साधू मन दृढ़ राखा ॥ जरा मरण तिनका हो नासू । गुरु पद गह सन्त निज दासू ॥ अगम ज्ञान संतोष वरदानी । हंसा आप होय महिमानी ॥ अगम अपार ज्ञान संतोषू । सकल साधु हिलमिल परतोषू ॥ संतोष ज्ञान स्वाती सम कहिये । सज्जन सत समझ दृढ़ रहिये ॥ स्वाती ज्ञान साथ जो पावे । सो साधू सतलोक सिधावे ॥
ज्ञानस्थितिबोध
( १५५ )
साखी-ज्ञानकथा ऐसो कहे, जस स्वातीको पान । सबहिनमें जो गुण करे, सन्त लेइ बिलछान ॥
चौपाई
संतोष ज्ञान मल्यागिरि जैसे । निकट बृक्ष प्रबल हो जैसे ॥ श्रोता सुने श्रवण शुभ बानी । ज्ञानी हृदय करो बिलछानी ॥ साधू ज्ञान सुने चितलाई । ताका हंस विगोइ न जाई ॥ अन्न सोय जो भूख बुझेहै । ज्ञान सोइ जेहि लोकहि जैहै ॥ सतगुर शब्द गहे जो हियमें । बचन अमोल मानमिल पियमें ॥ जाके हृदे कपट नहिं न्याप् । सो साधू मेंटे त्रिय ताप् ॥ बहुर न देह धरे यहि जगमें । कमलपत्र सम न्यारे जलमें ॥ जो प्राणी ऐसी गहि रीती । तजतहि देह चले यम जीती ॥ काया तजे प्रीति गुरु लागी । हंस समाज पहुँच अनुरागी ॥ गुरु प्रताप मम दर्शन पावे । हंसन समसर सेज बिछावे ॥ अमृत फलके भोजन पैहो । अटल दुलीचा सेज बिछेहो ॥ क्रीट रवीस जगमगत सुहावन । अमर चीर शोभा बटु पावन ॥ षोडश रबि जनु अंग लपेटा । हरषहि शोक सकल दुख मेटा ॥
साखी-अस बीरा परताप बल, प्रबल काल क्षय होय । जेहि सद्गुर वहियाँ मिले, हंसन जाय विगोय ॥
इति श्रीछोटासंतोष बोध समाप्त
( १५६ )
बोधसागर
अथ बड़ा सन्तोषबोध प्रारंभ
चतुर्विंशतिस्तत्रंगः
○
धर्मदास वचन चौपाई
धर्मदास पूछे चितलाई । तत्त्व भेद कहिये समुझाई ॥ कौन तुरीके योजन दौरा । भाषो साहेब हम हैं भौरा ॥ तत्त्वनके स्थान चिन्हाओ । बाहर भीतर भाषि सुनाओ ॥ विनय करूं कीजे प्रभु दाय। धर्मदास गहे दोनू पाया ॥
सदगुरु वचन
धर्मनि सुनो तत्त्व व्यवहारा । निशिवासर का कहूँ विचारा ॥ तत्त्वतत्त्वका स्थान चिन्हाऊँ । कहि करि वाहर भीतर दशाऊँ ॥ स्वासासंग होय आवे जाई । तत्त्वभेद सुनियो चितलाई ॥ लालतुरी योजन परवाना । मुशकी कोजन डेठ सिधाना ॥ हरीतुरी योजन दाय जाई । पीला योजन तीन चलाई ॥ हंसा योजन चारहि ध्यावे । फिरिके दण्ड तबै ले आवै ॥ मूल कमल है तेज ठिकाना । षट दल तत्त्व अकाश बखाना ॥ कमल अष्ट दल है तत्त्वबाई । द्वादश दल पृथ्वी सु रहाई ॥ षोडश दल जलतत्त्व बखाना । धर्मदास गहि राख ठिकाना ॥ याविधि पाचौ आवै जाई । अपनी मनजिलको सुन भाई ॥ गौचतुरी रथ एक सर्वा। ता उपर मन जिव असवारा ॥ जाव पडचो है मनके हाथा । नाच नचावे राखै साथा ॥ क्षण भीरत क्षण बाहर आवै । सतगुरु मिलतो साधिलखावै ॥
साखी—अष्टपांखुरी कमल है, ता ऊपर जिव बास । ताकर मनको आसना, नख शिख तनके पास ॥
संतोषबोध
( १५७ )
धर्मदास वचन
साहेब कहो भेद टकसारा । जेहिते जिवका होय उबारा ॥ नौ तत्त्वनको भेद बताओ । सकल कामना मोर मिटाओ ॥ पाँच तत्त्व जाने सब कोई । चारि तत्त्वकी खबरि न होई ॥ पाँच तत्त्व खेले मैदाना । चारि तत्त्व रहे कौन ठिकाना ॥ कहाँ तत्त्वनको भोजन केता । ताके चेत आगम है चेत ॥ इनका सतगुरु कहो बिचारा । कहो केता तत्त्व करै अहारा ॥
सद्गुरु वचन
धर्मदास मैं अगम बताऊँ । नौ तत्त्व को भेद लखाऊँ ॥ पाँच तत्त्व खेले मैदाना । चारि तत्त्व ब्रह्मांड ठिकाना ॥ छठवाँ अग्नि तत्त्व जो होई । नैना वीच रमै पुनि सोई ॥ दोयदल कमल वरणहै चारी । बैठे निरञ्जन आसन मारी ॥ ताहि कमलको नाम बताऊँ । चारि वरणका रूप दिखाऊँ ॥ लखै शब्दसो जाने भेदा । राता पीरा श्याम सपेदा ॥
साखी—ताहि कमलको छाड़िके, कीजै शब्द विचार । पाँच तत्त्व संभारिहो, उतरो भव जल पार ॥
चौपाई
निशि बासर की स्वांसा जेती । कहूँ विचार चले दम तेती ॥ छःसै स्वास इक्कीस हजार । येते निशिदिन दमहि सुधारा ॥ ताको भोजन सबमिलि पावे । जो सतगुरु यहि भेद बतावे ॥ बीस सहस्र पंच देव पाई । ताको लेखो कहूँ समुझाई ॥ प्रतिदेव पाछे चार हजार । रहै जाप सोलहसै सारा ॥ छठवें तत्त्व निरञ्जन राई । जाप सहस्र तहाँ पहुँचाई ॥ सोलहसै मैं छःसै रहई । ताको भेद हंस कोह गहई ॥ जाप अठोतर जब रहि जाई । ताछिन शब्द सुरति मिलाई ॥
( १५८ )
बोधसागर
साठसमै बाहर चौपाई । ततछिन हंस लोक को जाई ॥ सुषुमनि तत्त्व करे असवारी । तबे कालकी पहुँचे धारी ॥
साखी--जादिन काल आसहि, पगते करे उजारि ।
भागि जीव चढ़ि बैठही, द्वार कुल्फ उधारि ॥
धर्मदास वचन--चौपाई
साहेब इतना भेद बताई । जाते काल छुवन नहि पाई ॥ सब तत्त्वनको भायो भेदा । एक २ का कह्यो निषेदा ॥ तत्त्वके संग जीव चलि जाई । कौन ठौरनमें बासा पाई ॥ कौन तत्त्व संग धरे जिवदेही । कौन तत्त्व है सुक्त सनेही ॥
सद्गुरु वचन
नौ तत्त्वनका भेद बताऊँ । द्वारा तीनको कहि समझाऊँ ॥ तेज तत्त्वमें करे पयाना । वज्रशिलामें जाय समाना ॥ आकाश तत्त्वमें छूटे भाई । तारागणमें जाय समाई ॥ वायु तत्त्वमें छाडे देहा । वन वृक्षनमें जाय उरेहा ॥ पृथ्वी तत्त्वमें छूटे भाई । तौ जीव देह पशुकी पाई ॥ जल तत्त्वमें जब छूटे जाई । नरकी देह धरे तब आई ॥ अग्नि तत्त्वमें तजै शरीरा । होय पशुपक्षी कहै कबीरा ॥ छै तत्त्वनको कह्यो विचारा । तीन तत्त्वको भेद निनारा ॥ तीन तत्त्व भेद जो पावे । निश्चय हंसा लोक सिधावे ॥
धर्मदास वचन
छै तत्त्वनको पायो भेदा । तीन तत्त्वको कहो निषेदा ॥ तीन तत्त्व देहु प्रकट बताई । जासे हंसा लोक चल जाई ॥
सद्गुरु वचन
धर्मदास सुनिये चितलाई । तीन तत्त्व मैं देउं बताई ॥ शब्द तत्त्व जो जानै भाई । सुरति तत्त्वको ध्यान लगाई ॥
संतोष बोध
( १५९ )
नीर तत्त्व जाके घट होई । ताकर आवागमन न होई ॥ नौ तत्त्वनको कह्यो विचारा । धर्मदास तुम करो सँभारा ॥ कहूँ भेद तत्त्वकी बानी । क्षत्र अधर है नाम निशानी ॥ षष्ठ कमल नैन लगि देखा । तीन भेदको कहूँ विवेका ॥ तीन भेद पुरुष तेहिके पास । छाड़े काल जीवकी आसा ॥ पुरुष शब्द हैं शीतल अंगा । तत्त्व निःअक्षर कमलके संगा ॥ आप पुरुष तेहि पिण्ड न हाथा । पुरुष बिदेहि शीश बिन गाथा ॥ कायामांहि लगी यक नाला । तहवां रहे निरंजन काला ॥ ताशिर ऊपर पांजी लागी । ताहि चढ़ि हंसा जाये आगी ॥ स्वेत औ पीत कमल है गाता । तीन तत्त्व जीव संग रहाता ॥ ताहि तत्त्वको भाव सुनाई । तीन रूप तीन महिठाई ॥ कायाक्षेत्र ताहि हम दीन्हौ । खेत कमाय सो आगम चीन्हौ ॥ सप्तपाखुरी कमल यक होई । ताकर भेद कहौ मैं सोई ॥ कमल एक लोकहै तीना । तीन लोक तीनोंपुर कीना ॥ चौथालोक अधर कहि चीन्हौ । ताकरि काल गमन नहि कीन्हौ ॥
साखी-तीनलोक विचारिके, गहे शब्द टकसार ।
कहै कबीर विचारिके, उतरो भवजलपार ॥
धर्मदास वचन चौपाई
साहेब बचन कही परमाना । तीनलोकका कहो ठिकाना ॥ चौथालोक मोहि समझाई । सुनू भेद तब मन पतिआई ॥
सतगुरु उवाच
धर्मदास मैं तोहि बुझाऊँ । तीनलोक स्थान चिन्हाऊँ ॥ ब्रह्मलोक लिंग अस्थाना । तहाँते उत्पति होय निदाना ॥ विष्णुलोक नाभी विस्तारा । शिवका लोकहै हृदय मैझारा ॥
( १६० )
बोधसागर
चौथालोक अधर अस्थाना । कहै कबीर मैं कह्यौ बिधाना ॥ ताहि लोकको ध्यान लगावे । चलत हंस काल नहि पावे ॥
सारखी-अधर करै जब आसन, पिण्ड झरोखे नूर । मैं अदली कदली बसूँ, कहाँ खोजै बडि दूर ॥
धर्मदास उवाच चौपाई
साहेब लोक कहा हम जाना । और भेद कछु कहो बखाना ॥ सात पांखडी वरणि दिखाओ । भिन्न २ करि मोहिं लखाओ ॥
सद्गुरु उवाच
सात पांखडी कहूँ ठिकाना । धर्मनि बचन सत्कर माना ॥ श्रवण दोय पांखडी जाना । सुने शब्द तबही सुख माना ॥ होय पांखडी नैन बखानी । पापदृष्टि सबही क्षय हानी ॥ पांचये पांखडी कहूँ बिचारा । रसना शब्द उठै हंकारा ॥ छठी गांखडी इन्द्री जानी । उत्पत्ति बिन्दुले डारे तानी ॥ सातवीं पांखडी हेठ बतावा । खोजै कमल स्थिर घर पावा ॥ पांखडी सात कमल है एका । भीतर ताहि जीव मन ठेका ॥ ताहि कमलमें तार लगाई । सोई तारको चीन्हों भाई ॥ सोही तार अधर ले राखा । जो कोई साधु हृदयमें ताका ॥ ताहि तारका बहुत पसारा । खंड ब्रह्मांड पताला संबारा ॥ ताहि तारमें डोरी लागी । बिरला चीन्हे संत सभागी ॥ श्वेतभाव तारको अंगा । नाम निःअक्षर ताके संगा ॥
सारखी--कहै कबीर धर्मदाससे, गुप्त निःअक्षर नाम ॥ निःअक्षर लखपावई, होय जीवको काम ।
धर्मदास उवाच चौपाई
कमलभेद तुम भले सुनाया । अक्षरभेद सोइ हम पाया ॥ साहेब कहो जीव किमि आया । नरदेही कैसे करि पाया ॥
संतोषबोध
( १६१ )
कैसे घटमें कीन पसारा । कौन अस्थल बैठक संवारा ॥ इतना भेद कहां समझाई । सतगुरु मैं तुम बलि जाई ॥
सद्गुरु उवाच
धर्मदास सुनियो चितलाई । जो बूझे सो देखै बताई ॥ पवनजीव ब्रह्माण्ड रहाई । ता पीछे नाभी चलजाई ॥ नयन नासिका कीना साखी । मूल कमल सुरति गहि राखी ॥ चक्षुज्योति जो बरै उजियारा । हिरदाकमल ब्रह्माण्ड मझारा ॥ जीव बैठे द्रौपन में जाई । काया क्षेत्रमें जाय समाई ॥ ता बिधि घटमें जीवहि आया । रज बीजहीते पिंड बँधाया ॥ शीश स्वारि बांही निर्माई । कंठ कमल हृदय बनाई ॥ ता ऊपर द्विपि बदन सवारा । पवनजीवसे भय उजियारा ॥ कमल सबज स्वेत है राता । नाभी सकल पुनि सब गाता ॥ ता पीछे दोय खम्भ लगाया । रचिकाया पुनि जीव समाया ॥ स्वाती पवन पुरुषकी स्वांसा । जिन कीना जीवन संग बासा ॥ ताको भेद सुना धर्मदासा । तौलि लेहु सत्ताइस मासा ॥ छिन छिन पलपल आवै भाई । जीव संधि लेखे नहि पाई ॥ प्रथम घडी ब्रह्माण्ड रहाई । दूजी घडी नाभी चल जाई ॥
साखी-तीजी घडीके बीतते, फिर तहँवा चलजाय ॥
अस बिधि रहनी जीवकी, कहै कबीर समझाय ॥
धर्मदास वचन चौपाई
जा बिधि जीव देहमें आया । सोई भेद हम निज कर पाया ॥ दयावंत प्रभु और बताई । छुटै हंस कौन दिशि जाई ॥ काया तजिकै होय न्हारा । कौन दिशा हंस पगुधारा ॥ तौन ठाम मोहि देहु बताई । तहां सुरति राखूं ठहराई ॥
नं. ८ कबीरसागर -
( १६२ )
बोधसागर
साखी—चारखूट धरती अहै, आठ दिशा है पवन । सतगुरु कहो विचारिके, हँसाके दिशि कवन ॥
सदगुरु वचन चौपाई
मारग दोय तोहि कहँ ज्ञाना । एक बंधन एक मोक्ष बखाना ॥ जो स्वासा सँग करै पयाना । पाँच तत्त्वमें जाय समाना ॥ फिरि फिरि आवै फिरि २ जावे । बहुरि जगमें नाम धरावे ॥ अधर तत्त्वमें शब्द निवासा । ताहि माहि जिव करै जो बासा ॥ सार शब्दमें रहै समाई । अभय द्वार होइ आवै जाई ॥ वहां न लागै काल कसाई । द्वीप अधरमें बैठे जाई ॥ गुप्तभेद काहु बिरलै पावा । तुमको धर्मनि प्रगट सुनावा ॥
साखी—उत्तर घाटी ऊतरे । अधरहि बैठे आय । तहांते सुरति लगावई, पुरुषके परसे पाय ।
धर्मदास वचन चौपाई
ताहि अधरको कहो ठिकाना । देखू जब मेरा मन माना ॥ बिन देखे परतीत न आवै । जो नहि सतगुरु भेद बतावे ॥
सदगुरु वचन
धर्मदास मैं भेद बताई । जाय अधरमें जीव समाई ॥ ताहि अधरको कहँ ठिकाना । योजन आठ ऊपर परमाना ॥
साखी—एक अधर होय आवही; एक अधर होय जाय । एक अधर आसन करै, अधरही माहिँ समाय ॥
चौपाई
प्रथम हंस सुखसागर जाई । सुखसागर में दर्शन पाई ॥ सुखसागरका यही सँदेशा । लागे उडुगण पाती कैसा ॥ हँसा पैठिके कीन सनाना । भय उजियारी षोडश भाना ॥ लागी डोर शब्दकी नेहा । असपांजी अवर बिदेहा ॥
संतोषबोध
( १६३ )
लागी डोरी शब्दकी तारा । चढ़ै हंसा पांजी उजियारा ॥ चढ़िके हंस अधरसे पेखा । हंसा उलटि ठाटको देखा ॥ भलि साहेब मोहि कीनि दाया । छूटि सकल मोह और माया ॥ पुहुपमांहि जस वास समाना । हंस धरै इमि पुरुष ध्याना ॥ या विधि हंस अमरघर जाई । धर्मदास सुनियो चितलाई ॥
साखी-धरती अकाशसे बाहिरें, जहां शब्द निर्वान । तहां जीव चढ़ि बैठही, काल मरम नहिं जान ॥
धर्मदास वचन-चौपाई
सद्गुरु भेद सतहि समाना । द्रौपखंडका कहो ठिकाना ॥ कायाखंड कहो मोहि भाखी । जाते जीव अमरघर राखी ॥
सतगुरु वचन
धर्मदास बूझी भलवानी । सत्य वचन तोहिकहुं बखानी ॥ प्रथमखण्ड शब्द है भाई । दूसर खण्ड सुरति ठहराई ॥ तीसर खण्ड निरतिमें ठयऊँ । चौथा खण्ड प्रेम निर्मयऊँ ॥ पांचवाँ खण्ड शील है भाई । छठाँ खण्ड क्षमा निर्माई ॥ सातवाँ खण्ड संतोष हटाया । आठवाँ खण्ड दया समझाया ॥ नव खण्ड भक्ति कहि दीन्हा । धर्मदास तुम निजकरि चीन्हा ॥ इन खण्डनमें खेले जाई । निश्चय हंसा लोक सिधाई ॥ सुनो सात द्रौपनके नाऊँ । भिन्न भिन्न करि कहि समझाऊँ ॥ द्रौपतत्त्व है बड उजियारा । ताको निशिदिन करो विचारा ॥ धर्ती तत्त्व अग्नि जो होई । द्रौपजलानिधि जाय समोई ॥ तेजतत्त्वमें भाषि सुनाई । द्रौप शून्यमें जाय समाई ॥ जलका तत्त्व कहू विस्तारा । तेहि सुखसागर द्रौप सिधारा ॥ वायस तत्त्व सुनो धर्मनिवानी । पवनद्रौपमें जाय समानी ॥ तत्त्व अकाश कहू समझाई । द्रौपस्वर्गमें जाय समाई ॥
( १६४ )
बोधनागर
अग्नितत्त्वकी सुनियो वानी । दीप अग्निमें जाय समानी ॥ सुषुमनि तत्त्व कहूँ समझाई । दीप अथरमें बैठे जाई ॥
सारखी-सातद्वीप नौ खण्ड हैं इनमें, रहे समाय । कहे कवीर धर्मदाससे, निश्चय लोक सिधाय ॥
धर्मदास उवाच
साहब भेद कहो हम जाना । सातबारका कहो ठिकाना ॥ सातबार कैसे उपजाई । चन्द सूर्य कैसे निर्माई ॥ सूरज कैसे तेज समोई । सीतल चन्द कौन विधि होई ॥ निशिवासर कैसे कर जानी । ये सब भेद कहो मोहि ज्ञानी ॥
सतगुरु उवाच
धर्मदास बूझी बल नागर । संत सुकृत ज्ञान उजागर ॥ कहूँ भेद सुनियो चितलाई । चन्द्रसूर दिनवार बताई ॥ पुरुष कमलते सातो वारा । ताको भेद कहूँ टकसारा ॥ सप्तपाखंडी जब बिकसाई । सातबार तहांते आई ॥ आठवाँ बार कमलमें रहेऊ । ताहि बारते सातो कियेऊ ॥ कलीकमल भये औधियारा । निशिवासरको भयो विचारा ॥
सारखी-भंजन कीनो कमलको, छोलन कीनो पास । चन्द्रसूर जाते भये कियो पृथ्वी प्रकाश ॥
चौपाई
पहिले छोलन जल' नहि रहेऊ । ताते सूर तेज जो भयऊ ॥ सुनियो चन्द्रकेरि शीतलताई । धर्मदास मैं देउँ बताई ॥ सीच्यो अभी छोल पुनि जबही । शीतल चन्दा उपजे तबही ॥ छोलन चूनि झरि झरि परही । नक्षत्र चंद्रमा संगति करही ॥ यहि विधि चन्द्रसूर जो भयेऊ । धर्मदास हम तुमसे कहेऊ ॥ यह सब रचना कूर्मको दीना । पाछे ध्यान अथरमें कीन्हा ॥
संतोषबोध
( १६५ )
सब विस्तार कूर्मही दयऊ । तबही पुरुष कन्याको कियऊ॥ रचना रही कूर्मके पेटा । धर्मराय ताघर नहिं दीठा ॥
साखी--रचना रही कूर्ममें, पुरुषहि दीन सर्वांरि । जाते शब्द उत्पति भई, सो मैं कहूँ विचारि ॥
चौपाई
धर्मराय सेवा सितधारा । तब पुरुष ताहि बाचा हारा ॥ पुरुष दीन उत्पति धर्मराई । धायके लडे कूर्मसे जाई ॥
साखी--क्षीणै माथा नख करी, हरे सबे विस्तार । महाशून्य लेय आयऊ, धर्मराय बरियार ॥
चौपाई
निकसी खान वेद रस बानी । चांद सूर्य यों उडगण जानी॥ सब विस्तार निकसिजब आया । धर्म जलनिधि राख छिपाया॥
साखी--निकसी वस्तु कूर्मते, ना कोइ कीन विचार । मूल बीज जब पाइया, भयाकाल बरिआर ॥
धर्मदास उवाच चौपाई
को ले शीश कूर्म का छीना । यह तो भेद सकल हम चीना॥ धर्मराय कन्या कैसे पाई । तीन देव कैसे उपजाई ॥
सद्गुरु वचन
अद्या पुरुष दीन पठवाई । आदि भवानी अमृत लाई ॥ अष्टांगी देखी धर्मराई । तासु सुरति संयोग बनाई ॥ अद्याके विधि शिवसो सुरारी । मथि जलनिधि रतन निकारी॥ अष्टांगीते भये विस्तारा । सब रचना या कीन हमारा ॥
कूर्म वर्णन
बिनती कूर्म पुरुषते लाई । तव सुत शीश हमार छिनाई ॥ छोछा उदर भया हमारा । अहो पुरुष कहु देहु अहारा ॥
( १६६ )
बोधसागर
साखी-वचन तुम्हारा मानेऊ, राखि शब्दकी कानि । नीर जलानिधि सोखिके, मेटत सब उत्पानि ॥
पुरुष उवाच
वाणीपुरुष अथरसे कहेऊ । जाउ कूर्म मागि सो लेऊ ॥ वचन हमारा सत जो होई । जो मांगो सो देऊं तोई ॥
कूर्म उवाच
साखी-ना कछु भोजन चाहैं, ना कछु करूं अहार । चन्द्र सूर्य जब पाउं, तब लेऊं शिर भार ॥
पुरुष उवाच चौपाई
चांद सूर्य मैं देहू तोही । कैसे चलै सृष्टि पुनि सोही ॥ जो जगमें होय अंधियारा । कैसे चलै सृष्टि व्यवहारा ॥
कर्म उवाच
साखी-चांद सूर्य चलि आवही, तो मैं करूं अहार । चांद सूर्य पहुंचे नहीं, निगुलूं सब संसार ॥
पुरुष उवाच-चौपाई
पुरुष वचन तब कहैं बिचारी । भोजन सूर पहरलेहु चारी ॥ शशि भोजनका भाषू लेखा । घडी घडीको करूं विवेका ॥ अमी चन्द्रके पेट रहाई । ताको लेखा कहुं समझाई ॥ अमृत क्षणक्षण तुम लेहो । पाछै सम्पूर्ण करि देहो ॥ चन्द्रतेज धर्मनि इमि हानी । सूर्यतेज जो बहुत बखानी ॥ कूर्म पुरुष वचन हियो देखा । घडी पहरको बांधे लेखा ॥ पल क्षण दंड परमाना । घडी पहरकी कहूँ ठिकाना ॥ षट स्वासाकी पल यक होई । षट पलकी क्षण जानों सोई ॥ दश क्षणको यक दंड बखाना । दोय दंड यक घड़ी परमाना ॥ चारि घड़ी यक पहर विवेका । चारि पहरका दिन यक लेखा ॥ सात बार दूना करि जाना । यहि विधि पाख भयो परमाना ॥
संतोषबोध *
( १६७ )
दोयपाखको मास बखाना । दोयमासकी ऋतु यक जाना ॥ दोयऋतुको थककाल विशेषा । तीन चौकड़ी बरष यक देखा ॥ आगे देखो ताकर लेखा । धर्मदास अब कहूँ बिवेका ॥ निशि वासर पुनि होय जबही । कर्म अहार सुरले तबही ॥ चारिपहर निशिकरै जो आसा । वासरसुर सब होय प्रकाशा ॥ अत्र चन्दाको कहूँ बखाना । धर्मदास तुम निज करि जाना ॥ कृष्णपक्ष पडिवा जब आवे । कूर्म अहार चन्द्रको पावे ॥ कूर्मअहार चन्द्र इमि लीन्हौं । घडी घडी घटती तब कीन्हौं ॥ शुक्लपक्षते भया निवासा । पूनम चन्द्र किया प्रकाशा ॥ पूनम व्रत कूर्म जो कीन्हा । ताते चन्द्रआस नहिं लीन्हा ॥ अमी चन्द्रमें रहे समाई । पूनम अधिक जाहिते भाई ॥ पूरण व्रत पूनमको होई । पूनममें चौका आरम्भे सोई ॥ तीन व्रत वंशको दीना । अंश बचाय अपनाकरिलीना ॥
साखी-दीना अपने वंशकी, करि हैं शब्द संभार ।
गुप्तनाम गहि राखि है, हंस उतारे पार ॥
चौपाई
सुमिरे नाम औ सुरति संभारे । नाम पान दे हंस उबारे ॥ जा दिन मुक्ति साथै कोई । निःअक्षरकी गमताही होई ॥ पूरण व्रत पूनम जो होई । पूनम चौका कूर्मका सोई ॥ अहो कूर्म आसन पर जाई । सत्य वचन कहूँ समझाई ॥ ऐसे वचन कूर्मको भयऊ । कहैं कबीर धर्मनि सुनि लयऊ ॥
धर्मदास वचन
साहेब भेट कहे हम पेखा । अब भाष्यो पवनन कर लेखा ॥ पवन भेद मोहि कहौ समुझाई । वचन तुम्हार रहूँ लवलार्ई ॥ कहो कहाँ ते पवन उठि आई । दिशा भेद तुम मोहि सुनाई ॥
( १६८ )
बोधसागर
कवन पवनते जीव उत्पानी । सोई पवन तुम कहौ बखानी ॥ ताहि पवनको नाम बताऔ । कर्म काटि हंसा मुक्ताऔ ॥ कैसे सीप स्वातीको पावै । कारण कौन बांझ रहि जावै ॥ ये सब भेद दया करि कहेऊ । साहब मोहि अपना करि लयेऊ ॥
सदगुरु उवाच
धर्मदास सुनु पवनकी खानी । कूर्म मुखते पवन उत्पानी ॥ चारि अरति पवन उठि आया । ताको भेद कोई जन पाया ॥ शीश कूर्मका कहूँ बखानी । साधु सुजन कोई कोई जानी ॥ माया आठ पृथ्वीमें भीना । आठ दिशा भइ ताकर चीना ॥ माथा आठ आठ है माना । चारिदिशा चारि कौन परमाना ॥ माथा तीन छीनि ले गयऊ । माथा तीन पेटमें रहेऊ ॥ काकर चौदह भुवन बनाया । सोई रूप नर करे सुभावा ॥ अधर पवन सो जीव उत्पानी । चले उर्द्धसों अधर समानी ॥ ताहि वचनको पारस नामा । होय संयोग उठ जब कामा ॥ बाई और ते देहि जगाई । उमगे काम चले मनताई ॥ चले बिन्दु तीन मुख धाई । उरधहुते अधर जब आई ॥ ऋतुबसन्त जा दिन होई । स्वाती पवन पड़े पुनि सोई ॥ ऋतुबसन्त त्रियतन आवे । खुले कमल तब चाह जनावे ॥ शिव शक्ति सो मिलि है आई । स्वाती बुन्द शक्ति तब पाई ॥ तौन पवन बिन्दु गहि लेही । ताते बांझ होय नहिं तेही ॥ उत्पति पवन कही हम सोइ । स्वाती पवनले सम्पुट होई ॥
साखी—जाहि पवन पर चंदा रसे, ताहि न आसे काल । को यह भेद विचारि है, सोइ जौहरी लाल ॥
चौपाई
धर्मदास तोहि कहूँ बिचारा । सूझि पड़े सो भेदन्यारा ॥
संतोषबोध
( १६९ )
स्वाती पवन छुवन नहीं पावे । बिन्दु अकेला जो उठि धावे ॥ ताते शून्य होय पुनि जाई । कहूँ भेद चित्तराखु समाई ॥ पवन भेद हम तुमसो कहेऊ । नाम न्यारा इन्ते रहेऊ ॥
साखी-पवन भेद हम भाखेऊ, तामैं कालपसार ।
पचासी पवनके बाहिरे, अरज शब्द है सार ॥
धर्मदास उवाच-चौपाई
पवन भेद सतगुरु हम जाना । अब कछु कहिये नाम बखाना ॥ निःअक्षरका कहो प्रकाशा । है भीतर कि बाहर बासा ॥ कैसे हंसा लोक समाई । कौन बस्तु जो होय सहाई ॥ कैप्रमान बस्तु जो होई । साहेब मोहि कहो तुम सोई ॥
सद्गुरु उवाच
धर्मदास मैं भेद बताऊँ । संशय तेरो सबहि मिटाऊँ ॥ बावन अक्षर मय संसारा । निःअक्षरसो लोक पसारा ॥ सोइ नाम है अक्षर निवासा । कायाते बाहर प्रकाशा ॥ नाम भेद मैं तुमसे कहेऊ । धर्मदास तुम निजकर ठहेऊ ॥ तौन नाम मुनि हंसा पावे । कहै कबीर सो लोक सिधावे ॥
साखी-धरनि अकाशके बाहिरे; योजन आठ परमान ।
तहां क्षत्रतन राखेऊ हंसा करे विश्राम ॥
चौपाई
विन सतगुरु कोई भेद न पाई । धर्मदास मैं तोहि लखाई ॥ राई भर है वस्तु हमारी । अर्धराय स्थूल सवाँरी ॥ लहर लहर बादलमें होई । पुरुष मूल निज जानो सोई ॥ उनको सौप दीन शिर भारा । वै जीवनको करै उबारा ॥ भाषू शब्द प्रथमहैं राई । फूटि अकाश घोर होय जाई ॥ वाहिवक्त जो तजै शरीरा । आवै लोक अस कहै कबीरा ॥
( १७० )
बोधसागर
सत्तलोक अधर है धामा । तहवों पुरुष अजर है नामा ॥ तौन नामले हंस उड़ाना । पहुचै हंसलोक अस्थाना ॥ तहाँ गये जिवकाल न पावे । योनि संकट बहुरि न आवे ॥
सारखी--सबे भेद हम भाषेऊ, कहा शब्द टकसार । धर्मदास प्रतीति करि, सुमिरहु नाम हमार ॥
धर्मदास उवाच-चौपाई
कहेउ शब्द मोर मन माना । अब प्रभु कहिये सुरति ठिकाना ॥ कहो सुरतिकी उत्पति भयेऊ । कहो निरति दूसर निर्मयऊ ॥ कौन सरूप सुरतिको जानी । कैसे निरति दूसरी ठानी ॥ कैसेके घट आनि समानी । सो समरथ मोहि कहो बखानी ॥ सुरति निरति संगति किमि भयऊ । कैसे समझ हृदयमें लहेऊ ॥
सारखी-सुरति निरतिकी उत्पति, सब कहि भाषहु मोहि ॥ दोनों कैसे देखिये, पूछतहौं गुरु तोहि ॥
सदगुरु वचन चौपाई
धर्मदास मैं कहूं वखानी । भाखं सुरति निरति उत्पानी ॥ मूल नाभि ते शब्द उचारा । फूढीनाल भई दुइ धारा ॥ स्वाती पवन अधरते आई । सुरति निरति संगति मिलि धाई ॥ सुरति निरति यों उत्पति होई । ताको भेद लखे जन कोई ॥ सुरति निरतकी सुधि ना पाई । सो नर पशु पक्षी है भाई ॥ मूरख सो मोहरति है गयऊ । शब्द बांधि जिन सुरति ना गहेऊ ॥ तेहि शब्दका करो विचारा । सुरति निरतिले शब्द संभारा ॥
सारखी-अंकुर नाम वह शब्द है, कीना सकल पसार ॥ कहे कबीर धर्मदास सों गहो शब्द टकसार ॥
चौपाई
गहै शब्द सो लोक सिधाई । बिना शब्द पशु पक्षी भाई ॥
संतोषबोध
( १७१ )
बिना शब्द जैसे घट अंधियारा । धरि धरि काल करै अहारा ॥ शब्द सुरति निरति यक ठौरा । कहै पुरुष तहां मोहि निहोरा ॥ अगम तत्त्व गहि मथै शरीरा । निरति नाम भये सत्कबीरा ॥ निरति धरे शब्दकी आशा । सुरति नाम तुम गहु धर्मदासा ॥ सुरति निरतिसे बांधे नेहा । पावै नाम होय हंस विदेहा ॥ कथि ज्ञान भाषेउ टकसारा । धर्मदास तुम करो विचारा ॥ हम तुम कीना सकल पसारा । लोक न जाने मूठ गँवारा ॥ मथुरा बैठिके ज्ञान सुनाई । धर्मदाम गहे सतगुरु पाई ॥ पूरण ज्ञान तुम मोहि सुनावा । संसय सबही दूर बहाया ॥
साखी-गुरु समाना शिष्यमें, शिष्य लिया कर नेह । विलगाये विलगे नहीं, एक प्राण दुइ देह ॥
इति श्रीग्रन्थसंतोषबोध समाप्त