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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

ज्ञानस्थितिबोध

( १५३ )

यह युग बीत अनन्तन बारा । युग २ आयेउ जिव रस्वारा॥ नर जाने जुलहा अवतारा । साधन काज देह हम धारा ॥ अगम शब्द नहिं जात गैवारा । बार अनेक जगत पुकारा ॥ जीवन बारहिबार पुकारा । नरदेही बहुते हँकारा ॥

साखी-जीवनसों घर २ कहा, नहिं माने उपदेश । गुप्तभाव हम तब भये, चले अमरपुर देश ॥

चौपाई

पांजी चले ठाव हम भयेऊ । सात स्वर्ग ऊपर चढ़ गयेऊ ॥ तहवां देख धर्म अस्थाना । नानझंकारी ताहि बखाना ॥ द्वारे वज्र सिला दे बैठे । बैठे हर सब जेठे ॥ धर्मराय अति प्रबल जगाती । मांगे दान जीव बहु भांती ॥ तिन हम सबको आद बढ़ावा । कैसे ज्ञानी जीवन मुक्तावा ॥ हम कहें सुनो दुष्ट वटपारा । छोड़हु रार पलकमें मारा ॥ छोड़ ठांव यम भये निनारा । पहुँचे अमरलोक मझारा ॥ पुरुष दरश कीन्हे तेहि क्षणमें । घट २ व्याप सकल जीवनमें ॥ तहाँ नहीं परवेश जमन को । बैठक पाँति सकल हंसन को ॥ हरष शोक नहिं करे कतूला । सदा बसंत फूल ऋतु फूला ॥ मोर चकोर बोल मृदु बैना । कोकला कोयल वचन सुबैना ॥ बैठक तहाँही सकल पुरुषकी । बोलत वचन अमीरस रसकी ॥

पुरुष वचन

साखी- वह सत बोले पुरुष तब, सुनो सँदेशी अंश । भवसागर बहु दिन रहे, केतक लाये हंस ॥

ज्ञानी वचन-चौपाई

रहे शब्दसों तब कर जोरी । बंदी छोर विनय सुन मोरी ॥ काम अरु कोथ मोह औ लोभा । माया फँसै जीव पर शोभा ॥

( १५४ )

बोधसागर

सकल जीव अघ आतम पुंजा । फिरि २ परहि जनमके कुंजा ॥

पुरुष वचन

तब समरथ अस वचन पुकारा । दुनियाँ जात काल मुख द्वारा ॥ हो ज्ञानी तुम बहुर सिधाओ । शब्द देव जीवन मुक्ताओ ॥ देव परवाना अपने हाथा । सकल जीव जो होय सनाथा ॥ तिनका तोरहु यम का लेशा । माथे हाथ दे कहो संदेशा ॥ नरियर धोती तान मैंगे हो । सत्य शब्द देअंक चढै हो ॥ येही शब्द येही परवाना । सत्य शब्द निश्चय कर जाना ॥ सन्त समाज सुनो तुम महिमा । गुरुपद परस दरस एक लहमा ॥ तेहि समधन नहिं जगमें औरा । कोट जन्म तीरथ फल दौरा ॥ जो कोइ साथ मंदिरमें आवे । चरण पखार चरणामृत लावे ॥ नारी पुरुष एक मत कीजे । सतगुरु दया अमीरस पीजे ॥

साखी—काम कोध तृष्णा तजे, तजै मान अपमान ।

सद्गुरु दया जाहिपर, यम शिर मरदे मान ॥

चौपाई

जो ये तक तज सेवा करहै । सो प्राणी भवसागर तरहै ॥ सेवा करत कसर भई जाई । तवै कालघर बजत बधाई ॥ सेवा करे चरण चितलाई । पाँच साथ मिल भगत कराई ॥ संतोष बोध जीवन पर भाषा । जो कोइ साधू मन दृढ़ राखा ॥ जरा मरण तिनका हो नासू । गुरु पद गह सन्त निज दासू ॥ अगम ज्ञान संतोष वरदानी । हंसा आप होय महिमानी ॥ अगम अपार ज्ञान संतोषू । सकल साधु हिलमिल परतोषू ॥ संतोष ज्ञान स्वाती सम कहिये । सज्जन सत समझ दृढ़ रहिये ॥ स्वाती ज्ञान साथ जो पावे । सो साधू सतलोक सिधावे ॥

ज्ञानस्थितिबोध

( १५५ )

साखी-ज्ञानकथा ऐसो कहे, जस स्वातीको पान । सबहिनमें जो गुण करे, सन्त लेइ बिलछान ॥

चौपाई

संतोष ज्ञान मल्यागिरि जैसे । निकट बृक्ष प्रबल हो जैसे ॥ श्रोता सुने श्रवण शुभ बानी । ज्ञानी हृदय करो बिलछानी ॥ साधू ज्ञान सुने चितलाई । ताका हंस विगोइ न जाई ॥ अन्न सोय जो भूख बुझेहै । ज्ञान सोइ जेहि लोकहि जैहै ॥ सतगुर शब्द गहे जो हियमें । बचन अमोल मानमिल पियमें ॥ जाके हृदे कपट नहिं न्याप् । सो साधू मेंटे त्रिय ताप् ॥ बहुर न देह धरे यहि जगमें । कमलपत्र सम न्यारे जलमें ॥ जो प्राणी ऐसी गहि रीती । तजतहि देह चले यम जीती ॥ काया तजे प्रीति गुरु लागी । हंस समाज पहुँच अनुरागी ॥ गुरु प्रताप मम दर्शन पावे । हंसन समसर सेज बिछावे ॥ अमृत फलके भोजन पैहो । अटल दुलीचा सेज बिछेहो ॥ क्रीट रवीस जगमगत सुहावन । अमर चीर शोभा बटु पावन ॥ षोडश रबि जनु अंग लपेटा । हरषहि शोक सकल दुख मेटा ॥

साखी-अस बीरा परताप बल, प्रबल काल क्षय होय । जेहि सद्गुर वहियाँ मिले, हंसन जाय विगोय ॥

इति श्रीछोटासंतोष बोध समाप्त

( १५६ )

बोधसागर

अथ बड़ा सन्तोषबोध प्रारंभ

चतुर्विंशतिस्तत्रंगः

धर्मदास वचन चौपाई

धर्मदास पूछे चितलाई । तत्त्व भेद कहिये समुझाई ॥ कौन तुरीके योजन दौरा । भाषो साहेब हम हैं भौरा ॥ तत्त्वनके स्थान चिन्हाओ । बाहर भीतर भाषि सुनाओ ॥ विनय करूं कीजे प्रभु दाय। धर्मदास गहे दोनू पाया ॥

सदगुरु वचन

धर्मनि सुनो तत्त्व व्यवहारा । निशिवासर का कहूँ विचारा ॥ तत्त्वतत्त्वका स्थान चिन्हाऊँ । कहि करि वाहर भीतर दशाऊँ ॥ स्वासासंग होय आवे जाई । तत्त्वभेद सुनियो चितलाई ॥ लालतुरी योजन परवाना । मुशकी कोजन डेठ सिधाना ॥ हरीतुरी योजन दाय जाई । पीला योजन तीन चलाई ॥ हंसा योजन चारहि ध्यावे । फिरिके दण्ड तबै ले आवै ॥ मूल कमल है तेज ठिकाना । षट दल तत्त्व अकाश बखाना ॥ कमल अष्ट दल है तत्त्वबाई । द्वादश दल पृथ्वी सु रहाई ॥ षोडश दल जलतत्त्व बखाना । धर्मदास गहि राख ठिकाना ॥ याविधि पाचौ आवै जाई । अपनी मनजिलको सुन भाई ॥ गौचतुरी रथ एक सर्वा। ता उपर मन जिव असवारा ॥ जाव पडचो है मनके हाथा । नाच नचावे राखै साथा ॥ क्षण भीरत क्षण बाहर आवै । सतगुरु मिलतो साधिलखावै ॥

साखी—अष्टपांखुरी कमल है, ता ऊपर जिव बास । ताकर मनको आसना, नख शिख तनके पास ॥

संतोषबोध

( १५७ )

धर्मदास वचन

साहेब कहो भेद टकसारा । जेहिते जिवका होय उबारा ॥ नौ तत्त्वनको भेद बताओ । सकल कामना मोर मिटाओ ॥ पाँच तत्त्व जाने सब कोई । चारि तत्त्वकी खबरि न होई ॥ पाँच तत्त्व खेले मैदाना । चारि तत्त्व रहे कौन ठिकाना ॥ कहाँ तत्त्वनको भोजन केता । ताके चेत आगम है चेत ॥ इनका सतगुरु कहो बिचारा । कहो केता तत्त्व करै अहारा ॥

सद्गुरु वचन

धर्मदास मैं अगम बताऊँ । नौ तत्त्व को भेद लखाऊँ ॥ पाँच तत्त्व खेले मैदाना । चारि तत्त्व ब्रह्मांड ठिकाना ॥ छठवाँ अग्नि तत्त्व जो होई । नैना वीच रमै पुनि सोई ॥ दोयदल कमल वरणहै चारी । बैठे निरञ्जन आसन मारी ॥ ताहि कमलको नाम बताऊँ । चारि वरणका रूप दिखाऊँ ॥ लखै शब्दसो जाने भेदा । राता पीरा श्याम सपेदा ॥

साखी—ताहि कमलको छाड़िके, कीजै शब्द विचार । पाँच तत्त्व संभारिहो, उतरो भव जल पार ॥

चौपाई

निशि बासर की स्वांसा जेती । कहूँ विचार चले दम तेती ॥ छःसै स्वास इक्कीस हजार । येते निशिदिन दमहि सुधारा ॥ ताको भोजन सबमिलि पावे । जो सतगुरु यहि भेद बतावे ॥ बीस सहस्र पंच देव पाई । ताको लेखो कहूँ समुझाई ॥ प्रतिदेव पाछे चार हजार । रहै जाप सोलहसै सारा ॥ छठवें तत्त्व निरञ्जन राई । जाप सहस्र तहाँ पहुँचाई ॥ सोलहसै मैं छःसै रहई । ताको भेद हंस कोह गहई ॥ जाप अठोतर जब रहि जाई । ताछिन शब्द सुरति मिलाई ॥

( १५८ )

बोधसागर

साठसमै बाहर चौपाई । ततछिन हंस लोक को जाई ॥ सुषुमनि तत्त्व करे असवारी । तबे कालकी पहुँचे धारी ॥

साखी--जादिन काल आसहि, पगते करे उजारि ।

भागि जीव चढ़ि बैठही, द्वार कुल्फ उधारि ॥

धर्मदास वचन--चौपाई

साहेब इतना भेद बताई । जाते काल छुवन नहि पाई ॥ सब तत्त्वनको भायो भेदा । एक २ का कह्यो निषेदा ॥ तत्त्वके संग जीव चलि जाई । कौन ठौरनमें बासा पाई ॥ कौन तत्त्व संग धरे जिवदेही । कौन तत्त्व है सुक्त सनेही ॥

सद्गुरु वचन

नौ तत्त्वनका भेद बताऊँ । द्वारा तीनको कहि समझाऊँ ॥ तेज तत्त्वमें करे पयाना । वज्रशिलामें जाय समाना ॥ आकाश तत्त्वमें छूटे भाई । तारागणमें जाय समाई ॥ वायु तत्त्वमें छाडे देहा । वन वृक्षनमें जाय उरेहा ॥ पृथ्वी तत्त्वमें छूटे भाई । तौ जीव देह पशुकी पाई ॥ जल तत्त्वमें जब छूटे जाई । नरकी देह धरे तब आई ॥ अग्नि तत्त्वमें तजै शरीरा । होय पशुपक्षी कहै कबीरा ॥ छै तत्त्वनको कह्यो विचारा । तीन तत्त्वको भेद निनारा ॥ तीन तत्त्व भेद जो पावे । निश्चय हंसा लोक सिधावे ॥

धर्मदास वचन

छै तत्त्वनको पायो भेदा । तीन तत्त्वको कहो निषेदा ॥ तीन तत्त्व देहु प्रकट बताई । जासे हंसा लोक चल जाई ॥

सद्गुरु वचन

धर्मदास सुनिये चितलाई । तीन तत्त्व मैं देउं बताई ॥ शब्द तत्त्व जो जानै भाई । सुरति तत्त्वको ध्यान लगाई ॥

संतोष बोध

( १५९ )

नीर तत्त्व जाके घट होई । ताकर आवागमन न होई ॥ नौ तत्त्वनको कह्यो विचारा । धर्मदास तुम करो सँभारा ॥ कहूँ भेद तत्त्वकी बानी । क्षत्र अधर है नाम निशानी ॥ षष्ठ कमल नैन लगि देखा । तीन भेदको कहूँ विवेका ॥ तीन भेद पुरुष तेहिके पास । छाड़े काल जीवकी आसा ॥ पुरुष शब्द हैं शीतल अंगा । तत्त्व निःअक्षर कमलके संगा ॥ आप पुरुष तेहि पिण्ड न हाथा । पुरुष बिदेहि शीश बिन गाथा ॥ कायामांहि लगी यक नाला । तहवां रहे निरंजन काला ॥ ताशिर ऊपर पांजी लागी । ताहि चढ़ि हंसा जाये आगी ॥ स्वेत औ पीत कमल है गाता । तीन तत्त्व जीव संग रहाता ॥ ताहि तत्त्वको भाव सुनाई । तीन रूप तीन महिठाई ॥ कायाक्षेत्र ताहि हम दीन्हौ । खेत कमाय सो आगम चीन्हौ ॥ सप्तपाखुरी कमल यक होई । ताकर भेद कहौ मैं सोई ॥ कमल एक लोकहै तीना । तीन लोक तीनोंपुर कीना ॥ चौथालोक अधर कहि चीन्हौ । ताकरि काल गमन नहि कीन्हौ ॥

साखी-तीनलोक विचारिके, गहे शब्द टकसार ।

कहै कबीर विचारिके, उतरो भवजलपार ॥

धर्मदास वचन चौपाई

साहेब बचन कही परमाना । तीनलोकका कहो ठिकाना ॥ चौथालोक मोहि समझाई । सुनू भेद तब मन पतिआई ॥

सतगुरु उवाच

धर्मदास मैं तोहि बुझाऊँ । तीनलोक स्थान चिन्हाऊँ ॥ ब्रह्मलोक लिंग अस्थाना । तहाँते उत्पति होय निदाना ॥ विष्णुलोक नाभी विस्तारा । शिवका लोकहै हृदय मैझारा ॥

( १६० )

बोधसागर

चौथालोक अधर अस्थाना । कहै कबीर मैं कह्यौ बिधाना ॥ ताहि लोकको ध्यान लगावे । चलत हंस काल नहि पावे ॥

सारखी-अधर करै जब आसन, पिण्ड झरोखे नूर । मैं अदली कदली बसूँ, कहाँ खोजै बडि दूर ॥

धर्मदास उवाच चौपाई

साहेब लोक कहा हम जाना । और भेद कछु कहो बखाना ॥ सात पांखडी वरणि दिखाओ । भिन्न २ करि मोहिं लखाओ ॥

सद्गुरु उवाच

सात पांखडी कहूँ ठिकाना । धर्मनि बचन सत्कर माना ॥ श्रवण दोय पांखडी जाना । सुने शब्द तबही सुख माना ॥ होय पांखडी नैन बखानी । पापदृष्टि सबही क्षय हानी ॥ पांचये पांखडी कहूँ बिचारा । रसना शब्द उठै हंकारा ॥ छठी गांखडी इन्द्री जानी । उत्पत्ति बिन्दुले डारे तानी ॥ सातवीं पांखडी हेठ बतावा । खोजै कमल स्थिर घर पावा ॥ पांखडी सात कमल है एका । भीतर ताहि जीव मन ठेका ॥ ताहि कमलमें तार लगाई । सोई तारको चीन्हों भाई ॥ सोही तार अधर ले राखा । जो कोई साधु हृदयमें ताका ॥ ताहि तारका बहुत पसारा । खंड ब्रह्मांड पताला संबारा ॥ ताहि तारमें डोरी लागी । बिरला चीन्हे संत सभागी ॥ श्वेतभाव तारको अंगा । नाम निःअक्षर ताके संगा ॥

सारखी--कहै कबीर धर्मदाससे, गुप्त निःअक्षर नाम ॥ निःअक्षर लखपावई, होय जीवको काम ।

धर्मदास उवाच चौपाई

कमलभेद तुम भले सुनाया । अक्षरभेद सोइ हम पाया ॥ साहेब कहो जीव किमि आया । नरदेही कैसे करि पाया ॥

संतोषबोध

( १६१ )

कैसे घटमें कीन पसारा । कौन अस्थल बैठक संवारा ॥ इतना भेद कहां समझाई । सतगुरु मैं तुम बलि जाई ॥

सद्गुरु उवाच

धर्मदास सुनियो चितलाई । जो बूझे सो देखै बताई ॥ पवनजीव ब्रह्माण्ड रहाई । ता पीछे नाभी चलजाई ॥ नयन नासिका कीना साखी । मूल कमल सुरति गहि राखी ॥ चक्षुज्योति जो बरै उजियारा । हिरदाकमल ब्रह्माण्ड मझारा ॥ जीव बैठे द्रौपन में जाई । काया क्षेत्रमें जाय समाई ॥ ता बिधि घटमें जीवहि आया । रज बीजहीते पिंड बँधाया ॥ शीश स्वारि बांही निर्माई । कंठ कमल हृदय बनाई ॥ ता ऊपर द्विपि बदन सवारा । पवनजीवसे भय उजियारा ॥ कमल सबज स्वेत है राता । नाभी सकल पुनि सब गाता ॥ ता पीछे दोय खम्भ लगाया । रचिकाया पुनि जीव समाया ॥ स्वाती पवन पुरुषकी स्वांसा । जिन कीना जीवन संग बासा ॥ ताको भेद सुना धर्मदासा । तौलि लेहु सत्ताइस मासा ॥ छिन छिन पलपल आवै भाई । जीव संधि लेखे नहि पाई ॥ प्रथम घडी ब्रह्माण्ड रहाई । दूजी घडी नाभी चल जाई ॥

साखी-तीजी घडीके बीतते, फिर तहँवा चलजाय ॥

अस बिधि रहनी जीवकी, कहै कबीर समझाय ॥

धर्मदास वचन चौपाई

जा बिधि जीव देहमें आया । सोई भेद हम निज कर पाया ॥ दयावंत प्रभु और बताई । छुटै हंस कौन दिशि जाई ॥ काया तजिकै होय न्हारा । कौन दिशा हंस पगुधारा ॥ तौन ठाम मोहि देहु बताई । तहां सुरति राखूं ठहराई ॥

नं. ८ कबीरसागर -

( १६२ )

बोधसागर

साखी—चारखूट धरती अहै, आठ दिशा है पवन । सतगुरु कहो विचारिके, हँसाके दिशि कवन ॥

सदगुरु वचन चौपाई

मारग दोय तोहि कहँ ज्ञाना । एक बंधन एक मोक्ष बखाना ॥ जो स्वासा सँग करै पयाना । पाँच तत्त्वमें जाय समाना ॥ फिरि फिरि आवै फिरि २ जावे । बहुरि जगमें नाम धरावे ॥ अधर तत्त्वमें शब्द निवासा । ताहि माहि जिव करै जो बासा ॥ सार शब्दमें रहै समाई । अभय द्वार होइ आवै जाई ॥ वहां न लागै काल कसाई । द्वीप अधरमें बैठे जाई ॥ गुप्तभेद काहु बिरलै पावा । तुमको धर्मनि प्रगट सुनावा ॥

साखी—उत्तर घाटी ऊतरे । अधरहि बैठे आय । तहांते सुरति लगावई, पुरुषके परसे पाय ।

धर्मदास वचन चौपाई

ताहि अधरको कहो ठिकाना । देखू जब मेरा मन माना ॥ बिन देखे परतीत न आवै । जो नहि सतगुरु भेद बतावे ॥

सदगुरु वचन

धर्मदास मैं भेद बताई । जाय अधरमें जीव समाई ॥ ताहि अधरको कहँ ठिकाना । योजन आठ ऊपर परमाना ॥

साखी—एक अधर होय आवही; एक अधर होय जाय । एक अधर आसन करै, अधरही माहिँ समाय ॥

चौपाई

प्रथम हंस सुखसागर जाई । सुखसागर में दर्शन पाई ॥ सुखसागरका यही सँदेशा । लागे उडुगण पाती कैसा ॥ हँसा पैठिके कीन सनाना । भय उजियारी षोडश भाना ॥ लागी डोर शब्दकी नेहा । असपांजी अवर बिदेहा ॥

संतोषबोध

( १६३ )

लागी डोरी शब्दकी तारा । चढ़ै हंसा पांजी उजियारा ॥ चढ़िके हंस अधरसे पेखा । हंसा उलटि ठाटको देखा ॥ भलि साहेब मोहि कीनि दाया । छूटि सकल मोह और माया ॥ पुहुपमांहि जस वास समाना । हंस धरै इमि पुरुष ध्याना ॥ या विधि हंस अमरघर जाई । धर्मदास सुनियो चितलाई ॥

साखी-धरती अकाशसे बाहिरें, जहां शब्द निर्वान । तहां जीव चढ़ि बैठही, काल मरम नहिं जान ॥

धर्मदास वचन-चौपाई

सद्गुरु भेद सतहि समाना । द्रौपखंडका कहो ठिकाना ॥ कायाखंड कहो मोहि भाखी । जाते जीव अमरघर राखी ॥

सतगुरु वचन

धर्मदास बूझी भलवानी । सत्य वचन तोहिकहुं बखानी ॥ प्रथमखण्ड शब्द है भाई । दूसर खण्ड सुरति ठहराई ॥ तीसर खण्ड निरतिमें ठयऊँ । चौथा खण्ड प्रेम निर्मयऊँ ॥ पांचवाँ खण्ड शील है भाई । छठाँ खण्ड क्षमा निर्माई ॥ सातवाँ खण्ड संतोष हटाया । आठवाँ खण्ड दया समझाया ॥ नव खण्ड भक्ति कहि दीन्हा । धर्मदास तुम निजकरि चीन्हा ॥ इन खण्डनमें खेले जाई । निश्चय हंसा लोक सिधाई ॥ सुनो सात द्रौपनके नाऊँ । भिन्न भिन्न करि कहि समझाऊँ ॥ द्रौपतत्त्व है बड उजियारा । ताको निशिदिन करो विचारा ॥ धर्ती तत्त्व अग्नि जो होई । द्रौपजलानिधि जाय समोई ॥ तेजतत्त्वमें भाषि सुनाई । द्रौप शून्यमें जाय समाई ॥ जलका तत्त्व कहू विस्तारा । तेहि सुखसागर द्रौप सिधारा ॥ वायस तत्त्व सुनो धर्मनिवानी । पवनद्रौपमें जाय समानी ॥ तत्त्व अकाश कहू समझाई । द्रौपस्वर्गमें जाय समाई ॥

( १६४ )

बोधनागर

अग्नितत्त्वकी सुनियो वानी । दीप अग्निमें जाय समानी ॥ सुषुमनि तत्त्व कहूँ समझाई । दीप अथरमें बैठे जाई ॥

सारखी-सातद्वीप नौ खण्ड हैं इनमें, रहे समाय । कहे कवीर धर्मदाससे, निश्चय लोक सिधाय ॥

धर्मदास उवाच

साहब भेद कहो हम जाना । सातबारका कहो ठिकाना ॥ सातबार कैसे उपजाई । चन्द सूर्य कैसे निर्माई ॥ सूरज कैसे तेज समोई । सीतल चन्द कौन विधि होई ॥ निशिवासर कैसे कर जानी । ये सब भेद कहो मोहि ज्ञानी ॥

सतगुरु उवाच

धर्मदास बूझी बल नागर । संत सुकृत ज्ञान उजागर ॥ कहूँ भेद सुनियो चितलाई । चन्द्रसूर दिनवार बताई ॥ पुरुष कमलते सातो वारा । ताको भेद कहूँ टकसारा ॥ सप्तपाखंडी जब बिकसाई । सातबार तहांते आई ॥ आठवाँ बार कमलमें रहेऊ । ताहि बारते सातो कियेऊ ॥ कलीकमल भये औधियारा । निशिवासरको भयो विचारा ॥

सारखी-भंजन कीनो कमलको, छोलन कीनो पास । चन्द्रसूर जाते भये कियो पृथ्वी प्रकाश ॥

चौपाई

पहिले छोलन जल' नहि रहेऊ । ताते सूर तेज जो भयऊ ॥ सुनियो चन्द्रकेरि शीतलताई । धर्मदास मैं देउँ बताई ॥ सीच्यो अभी छोल पुनि जबही । शीतल चन्दा उपजे तबही ॥ छोलन चूनि झरि झरि परही । नक्षत्र चंद्रमा संगति करही ॥ यहि विधि चन्द्रसूर जो भयेऊ । धर्मदास हम तुमसे कहेऊ ॥ यह सब रचना कूर्मको दीना । पाछे ध्यान अथरमें कीन्हा ॥

संतोषबोध

( १६५ )

सब विस्तार कूर्मही दयऊ । तबही पुरुष कन्याको कियऊ॥ रचना रही कूर्मके पेटा । धर्मराय ताघर नहिं दीठा ॥

साखी--रचना रही कूर्ममें, पुरुषहि दीन सर्वांरि । जाते शब्द उत्पति भई, सो मैं कहूँ विचारि ॥

चौपाई

धर्मराय सेवा सितधारा । तब पुरुष ताहि बाचा हारा ॥ पुरुष दीन उत्पति धर्मराई । धायके लडे कूर्मसे जाई ॥

साखी--क्षीणै माथा नख करी, हरे सबे विस्तार । महाशून्य लेय आयऊ, धर्मराय बरियार ॥

चौपाई

निकसी खान वेद रस बानी । चांद सूर्य यों उडगण जानी॥ सब विस्तार निकसिजब आया । धर्म जलनिधि राख छिपाया॥

साखी--निकसी वस्तु कूर्मते, ना कोइ कीन विचार । मूल बीज जब पाइया, भयाकाल बरिआर ॥

धर्मदास उवाच चौपाई

को ले शीश कूर्म का छीना । यह तो भेद सकल हम चीना॥ धर्मराय कन्या कैसे पाई । तीन देव कैसे उपजाई ॥

सद्गुरु वचन

अद्या पुरुष दीन पठवाई । आदि भवानी अमृत लाई ॥ अष्टांगी देखी धर्मराई । तासु सुरति संयोग बनाई ॥ अद्याके विधि शिवसो सुरारी । मथि जलनिधि रतन निकारी॥ अष्टांगीते भये विस्तारा । सब रचना या कीन हमारा ॥

कूर्म वर्णन

बिनती कूर्म पुरुषते लाई । तव सुत शीश हमार छिनाई ॥ छोछा उदर भया हमारा । अहो पुरुष कहु देहु अहारा ॥

( १६६ )

बोधसागर

साखी-वचन तुम्हारा मानेऊ, राखि शब्दकी कानि । नीर जलानिधि सोखिके, मेटत सब उत्पानि ॥

पुरुष उवाच

वाणीपुरुष अथरसे कहेऊ । जाउ कूर्म मागि सो लेऊ ॥ वचन हमारा सत जो होई । जो मांगो सो देऊं तोई ॥

कूर्म उवाच

साखी-ना कछु भोजन चाहैं, ना कछु करूं अहार । चन्द्र सूर्य जब पाउं, तब लेऊं शिर भार ॥

पुरुष उवाच चौपाई

चांद सूर्य मैं देहू तोही । कैसे चलै सृष्टि पुनि सोही ॥ जो जगमें होय अंधियारा । कैसे चलै सृष्टि व्यवहारा ॥

कर्म उवाच

साखी-चांद सूर्य चलि आवही, तो मैं करूं अहार । चांद सूर्य पहुंचे नहीं, निगुलूं सब संसार ॥

पुरुष उवाच-चौपाई

पुरुष वचन तब कहैं बिचारी । भोजन सूर पहरलेहु चारी ॥ शशि भोजनका भाषू लेखा । घडी घडीको करूं विवेका ॥ अमी चन्द्रके पेट रहाई । ताको लेखा कहुं समझाई ॥ अमृत क्षणक्षण तुम लेहो । पाछै सम्पूर्ण करि देहो ॥ चन्द्रतेज धर्मनि इमि हानी । सूर्यतेज जो बहुत बखानी ॥ कूर्म पुरुष वचन हियो देखा । घडी पहरको बांधे लेखा ॥ पल क्षण दंड परमाना । घडी पहरकी कहूँ ठिकाना ॥ षट स्वासाकी पल यक होई । षट पलकी क्षण जानों सोई ॥ दश क्षणको यक दंड बखाना । दोय दंड यक घड़ी परमाना ॥ चारि घड़ी यक पहर विवेका । चारि पहरका दिन यक लेखा ॥ सात बार दूना करि जाना । यहि विधि पाख भयो परमाना ॥

संतोषबोध *

( १६७ )

दोयपाखको मास बखाना । दोयमासकी ऋतु यक जाना ॥ दोयऋतुको थककाल विशेषा । तीन चौकड़ी बरष यक देखा ॥ आगे देखो ताकर लेखा । धर्मदास अब कहूँ बिवेका ॥ निशि वासर पुनि होय जबही । कर्म अहार सुरले तबही ॥ चारिपहर निशिकरै जो आसा । वासरसुर सब होय प्रकाशा ॥ अत्र चन्दाको कहूँ बखाना । धर्मदास तुम निज करि जाना ॥ कृष्णपक्ष पडिवा जब आवे । कूर्म अहार चन्द्रको पावे ॥ कूर्मअहार चन्द्र इमि लीन्हौं । घडी घडी घटती तब कीन्हौं ॥ शुक्लपक्षते भया निवासा । पूनम चन्द्र किया प्रकाशा ॥ पूनम व्रत कूर्म जो कीन्हा । ताते चन्द्रआस नहिं लीन्हा ॥ अमी चन्द्रमें रहे समाई । पूनम अधिक जाहिते भाई ॥ पूरण व्रत पूनमको होई । पूनममें चौका आरम्भे सोई ॥ तीन व्रत वंशको दीना । अंश बचाय अपनाकरिलीना ॥

साखी-दीना अपने वंशकी, करि हैं शब्द संभार ।

गुप्तनाम गहि राखि है, हंस उतारे पार ॥

चौपाई

सुमिरे नाम औ सुरति संभारे । नाम पान दे हंस उबारे ॥ जा दिन मुक्ति साथै कोई । निःअक्षरकी गमताही होई ॥ पूरण व्रत पूनम जो होई । पूनम चौका कूर्मका सोई ॥ अहो कूर्म आसन पर जाई । सत्य वचन कहूँ समझाई ॥ ऐसे वचन कूर्मको भयऊ । कहैं कबीर धर्मनि सुनि लयऊ ॥

धर्मदास वचन

साहेब भेट कहे हम पेखा । अब भाष्यो पवनन कर लेखा ॥ पवन भेद मोहि कहौ समुझाई । वचन तुम्हार रहूँ लवलार्ई ॥ कहो कहाँ ते पवन उठि आई । दिशा भेद तुम मोहि सुनाई ॥

( १६८ )

बोधसागर

कवन पवनते जीव उत्पानी । सोई पवन तुम कहौ बखानी ॥ ताहि पवनको नाम बताऔ । कर्म काटि हंसा मुक्ताऔ ॥ कैसे सीप स्वातीको पावै । कारण कौन बांझ रहि जावै ॥ ये सब भेद दया करि कहेऊ । साहब मोहि अपना करि लयेऊ ॥

सदगुरु उवाच

धर्मदास सुनु पवनकी खानी । कूर्म मुखते पवन उत्पानी ॥ चारि अरति पवन उठि आया । ताको भेद कोई जन पाया ॥ शीश कूर्मका कहूँ बखानी । साधु सुजन कोई कोई जानी ॥ माया आठ पृथ्वीमें भीना । आठ दिशा भइ ताकर चीना ॥ माथा आठ आठ है माना । चारिदिशा चारि कौन परमाना ॥ माथा तीन छीनि ले गयऊ । माथा तीन पेटमें रहेऊ ॥ काकर चौदह भुवन बनाया । सोई रूप नर करे सुभावा ॥ अधर पवन सो जीव उत्पानी । चले उर्द्धसों अधर समानी ॥ ताहि वचनको पारस नामा । होय संयोग उठ जब कामा ॥ बाई और ते देहि जगाई । उमगे काम चले मनताई ॥ चले बिन्दु तीन मुख धाई । उरधहुते अधर जब आई ॥ ऋतुबसन्त जा दिन होई । स्वाती पवन पड़े पुनि सोई ॥ ऋतुबसन्त त्रियतन आवे । खुले कमल तब चाह जनावे ॥ शिव शक्ति सो मिलि है आई । स्वाती बुन्द शक्ति तब पाई ॥ तौन पवन बिन्दु गहि लेही । ताते बांझ होय नहिं तेही ॥ उत्पति पवन कही हम सोइ । स्वाती पवनले सम्पुट होई ॥

साखी—जाहि पवन पर चंदा रसे, ताहि न आसे काल । को यह भेद विचारि है, सोइ जौहरी लाल ॥

चौपाई

धर्मदास तोहि कहूँ बिचारा । सूझि पड़े सो भेदन्यारा ॥

संतोषबोध

( १६९ )

स्वाती पवन छुवन नहीं पावे । बिन्दु अकेला जो उठि धावे ॥ ताते शून्य होय पुनि जाई । कहूँ भेद चित्तराखु समाई ॥ पवन भेद हम तुमसो कहेऊ । नाम न्यारा इन्ते रहेऊ ॥

साखी-पवन भेद हम भाखेऊ, तामैं कालपसार ।

पचासी पवनके बाहिरे, अरज शब्द है सार ॥

धर्मदास उवाच-चौपाई

पवन भेद सतगुरु हम जाना । अब कछु कहिये नाम बखाना ॥ निःअक्षरका कहो प्रकाशा । है भीतर कि बाहर बासा ॥ कैसे हंसा लोक समाई । कौन बस्तु जो होय सहाई ॥ कैप्रमान बस्तु जो होई । साहेब मोहि कहो तुम सोई ॥

सद्गुरु उवाच

धर्मदास मैं भेद बताऊँ । संशय तेरो सबहि मिटाऊँ ॥ बावन अक्षर मय संसारा । निःअक्षरसो लोक पसारा ॥ सोइ नाम है अक्षर निवासा । कायाते बाहर प्रकाशा ॥ नाम भेद मैं तुमसे कहेऊ । धर्मदास तुम निजकर ठहेऊ ॥ तौन नाम मुनि हंसा पावे । कहै कबीर सो लोक सिधावे ॥

साखी-धरनि अकाशके बाहिरे; योजन आठ परमान ।

तहां क्षत्रतन राखेऊ हंसा करे विश्राम ॥

चौपाई

विन सतगुरु कोई भेद न पाई । धर्मदास मैं तोहि लखाई ॥ राई भर है वस्तु हमारी । अर्धराय स्थूल सवाँरी ॥ लहर लहर बादलमें होई । पुरुष मूल निज जानो सोई ॥ उनको सौप दीन शिर भारा । वै जीवनको करै उबारा ॥ भाषू शब्द प्रथमहैं राई । फूटि अकाश घोर होय जाई ॥ वाहिवक्त जो तजै शरीरा । आवै लोक अस कहै कबीरा ॥

( १७० )

बोधसागर

सत्तलोक अधर है धामा । तहवों पुरुष अजर है नामा ॥ तौन नामले हंस उड़ाना । पहुचै हंसलोक अस्थाना ॥ तहाँ गये जिवकाल न पावे । योनि संकट बहुरि न आवे ॥

सारखी--सबे भेद हम भाषेऊ, कहा शब्द टकसार । धर्मदास प्रतीति करि, सुमिरहु नाम हमार ॥

धर्मदास उवाच-चौपाई

कहेउ शब्द मोर मन माना । अब प्रभु कहिये सुरति ठिकाना ॥ कहो सुरतिकी उत्पति भयेऊ । कहो निरति दूसर निर्मयऊ ॥ कौन सरूप सुरतिको जानी । कैसे निरति दूसरी ठानी ॥ कैसेके घट आनि समानी । सो समरथ मोहि कहो बखानी ॥ सुरति निरति संगति किमि भयऊ । कैसे समझ हृदयमें लहेऊ ॥

सारखी-सुरति निरतिकी उत्पति, सब कहि भाषहु मोहि ॥ दोनों कैसे देखिये, पूछतहौं गुरु तोहि ॥

सदगुरु वचन चौपाई

धर्मदास मैं कहूं वखानी । भाखं सुरति निरति उत्पानी ॥ मूल नाभि ते शब्द उचारा । फूढीनाल भई दुइ धारा ॥ स्वाती पवन अधरते आई । सुरति निरति संगति मिलि धाई ॥ सुरति निरति यों उत्पति होई । ताको भेद लखे जन कोई ॥ सुरति निरतकी सुधि ना पाई । सो नर पशु पक्षी है भाई ॥ मूरख सो मोहरति है गयऊ । शब्द बांधि जिन सुरति ना गहेऊ ॥ तेहि शब्दका करो विचारा । सुरति निरतिले शब्द संभारा ॥

सारखी-अंकुर नाम वह शब्द है, कीना सकल पसार ॥ कहे कबीर धर्मदास सों गहो शब्द टकसार ॥

चौपाई

गहै शब्द सो लोक सिधाई । बिना शब्द पशु पक्षी भाई ॥

संतोषबोध

( १७१ )

बिना शब्द जैसे घट अंधियारा । धरि धरि काल करै अहारा ॥ शब्द सुरति निरति यक ठौरा । कहै पुरुष तहां मोहि निहोरा ॥ अगम तत्त्व गहि मथै शरीरा । निरति नाम भये सत्कबीरा ॥ निरति धरे शब्दकी आशा । सुरति नाम तुम गहु धर्मदासा ॥ सुरति निरतिसे बांधे नेहा । पावै नाम होय हंस विदेहा ॥ कथि ज्ञान भाषेउ टकसारा । धर्मदास तुम करो विचारा ॥ हम तुम कीना सकल पसारा । लोक न जाने मूठ गँवारा ॥ मथुरा बैठिके ज्ञान सुनाई । धर्मदाम गहे सतगुरु पाई ॥ पूरण ज्ञान तुम मोहि सुनावा । संसय सबही दूर बहाया ॥

साखी-गुरु समाना शिष्यमें, शिष्य लिया कर नेह । विलगाये विलगे नहीं, एक प्राण दुइ देह ॥

इति श्रीग्रन्थसंतोषबोध समाप्त


A black and white line drawing of a vase filled with flowers and leaves, centered on the page. The vase is cylindrical with vertical lines, and the flowers are clustered at the top with long, pointed leaves. The drawing is framed by a decorative border consisting of repeating scrollwork patterns along the edges of the page.