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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

( १७४ )

बोधसागर

कायापांजी कर कहो विशेषा । मैं अपने घट कहूं विवेक्षा ॥ करि विवेक तहैं सुरति लगाऊँ । पांजी द्वार घाट मैं पाऊँ ॥ सुरति लगाय रहूँ मैं तहैंवां । सार शब्द मूल है जहैंवां ॥ करि विवेक तहां सुरति पठाऊँ । पांजां द्वार घाट मैं पाऊँ ॥ पावो घाट सुरतिके द्वारा । तो मैं सुरति करो पैठारा ॥ बिना घाट कहाँ जाऊँ भाई । बिन जाने कहैं रहूँ समाई ॥ बिन जाने जाऊँ केहि घाटा । कैसे पाऊँ शब्द के बाटा ॥ बिन जाने शब्दकरि घाटा । शब्द अगम अगम है बाटा ॥ शब्दके अंग अगम है भाई । बिन जाने सब गये नसाई ॥ पाऊँ द्वार शब्दका टीका । अवर सकल जग लागे फीका ॥ अगम शब्द कहो अर्थार्थ । बिन पाये शब्द गह्यो न जाई ॥ मूल शब्द जहैं होय उचारा । सो पाऊँ सुमेरु चढ़ि द्वारा ॥ भाषो द्वार सुमेरु बखानी । कहवांते सुमेरु पुनि जानी ॥ कहवांते अकाशका लेखा । सो मोहि साहेब कहो विवेक्षा ॥

साखी-धर्मदास बिनती करे, घाट घाट कहो समझाय ।

तहां मैं सुरति लगाइके, शब्दमें रहूँ समय ॥

सद्गुरु उवाच-चौपाई

धर्मदास मैं भेद बताऊँ । सुरति शब्दका द्वार चिन्हाऊँ ॥ चन्द्रलगनका कहूँ विचारा । तहवां सुरति करो बैठारा ॥ चन्द्रद्वार होय आवो जाई । यही घाट मैं रहो समाई ॥ दोउस्वर साधि करो यक घाटा । चन्द्रद्वार होय पावो बाटा ॥

धर्मदास उवाच

कौन घाट चन्द्र है भाई । कौन घाट सूर्य पै आई ॥

१ विवेक्षा-विवेक-विचार

कायापांजी

( १७५ )

सदगुरु उवाच

दहिने घाट चन्द्रका वासा । बाँवें सूर करै प्रकाशा ॥ यही दोउ स्वर साधो भाई । चन्द्रद्वार होय निकसो आई ॥ अगम पंथ दहिने स्वर करहु । सुरती संयोगनाल चित धरहु ॥ चन्द्रद्वार होय आओ जाइ । शब्द सुरतिमें रहो समाई ॥ स्वर दाहिने सुरति चढ़ाओ । तबही डोर शब्दकी पायो ॥ शब्द डोर दहिने दिशि जाई । धर्मदास तुम गहो बनाई ॥ पाओ डोर शब्दको भाई । अगम पंथ चढ़ि बैठो जाई ॥ गहो बनाइ कटै यम पासी । पहुँचो लोक मिटै चौरासी ॥ स्वर दाहिने होय करे पयाना । तब सोहं सुरतिहोय अगु आना ॥

सार्वी--कहैं कबीर धर्मदाससे, ऐसा साधो घाट । आगे भेद बताऊं, तहं देखो लिजवाट ॥

चौपाई

अहो धर्मदास मैं भेद बताऊं । शब्दहि सुरतिका द्वार चिह्नाऊं ॥ भाष्यो शब्द सुरतिका पासा । सो मैं तुमसे कहों प्रकाशा ॥ कहूँ तत्त्व तहैं करो जो बासा । मथो तत्त्व तुम धर्मदासा ॥ मथो तत्त्व सुरति सो भाई । पुनि आगेको देहु रंगाई ॥ तत्त्व मथो तुम अंश हमारा । तत्त्वसे उतरो भवजल पारा ॥

धर्मदास उवाच

कह्यो तत्त्व तुम मथो बनाई । ज्ञानी तुमहि कहो समझाई ॥ कहवा आहि तत्त्व को बासा । सो ज्ञानी मोहि कहो प्रकाशा ॥

सतगुरु बचन

दहिनस्वर साधि चढ़ो आकाशा । त्रिकुटी मध्य तत्त्वका वासा ॥ त्रिकुटीमध्य तत्त्व जो रहाई । तहाँ सुरति सो देखो जाई ॥ त्रिकुटी मध्य तत्त्वको थाना तेहि मथि आगे देहु पयाना ॥

( १७६ )

बोधसागर

सुरति डोरी चलै बरजहेरा । मथिके तत्त्व कपाट उघेरा ॥ तेहि आगे सुमेरु बखानी । बरनो द्वार स्वरूप खानी ॥ वाहि द्वार होय सुरति चढ़ाओ। आगे अगम भेद पुनि पाओ ॥ त्रिकुटी आगे सुमेरु ठेकाना । तापर जुब्बा अकाश विधाना ॥ आंगुलचारी अकाश परमानो । धर्मदास तुम निजकर जानो ॥

धर्मदास वचन

अब अकाशका भाखों राहा । हम अजानका जानों थाहा ॥

सद्गुरु वचन

अब अकाशका भाखूं लेखा । सुरतिकमल तहैं निजकर देखा ॥ बांये धर्मराय अस्थाना । दहिने सुरति द्वार ठिकाना ॥ सुरति कमल सुमेरुके आगे । बिहैगम डोर तहाँसे लागे ॥ सुरति कमलके रूप बखानो । एक चन्द्र आभा अनुमानो ॥ वाहि कमलमें झलकै चंदा । सुरति चढ़ाय तुम करो आनन्ददा ॥ तहवां डोर शब्दकी भाई । सुरति संयोग चढ़ि देखो जाई ॥ सुरति नाल है बड़ बरियारा । मध्य लिलाट धर्म रखवारा ॥ शब्द काहे न करहु विचारा । धर्मदास तुम अंश हमारा ॥ दहिने सुरति कमल कहैं पावा । तेहि आगे पुनि ध्यान लगावा ॥ तेहिदिगसुरतिकमलको लेखा । सुरति तत्त्व नैन बिन देखा ॥ ताकर भेद मैं देऊँ बताई । सुइ परमाण द्वार निरमाई ॥ धर्मदास मैं कहूँ पुकारी । तिल परमाण तहैं खुलै केवारी ॥ तेहि केवार दोय है घाटा । चढ़े सुरति तब पावो बाटा ॥ सोहैं सुरतिले चढो संभारी । तिल परमाण खुलै केवारी ॥ नासिकानाल सुरति जो ध्यावे । खोली केवारी तब बाहर आवे ॥ पशुरी सुरति कमलको जानी । तासे सुरति करो पहिचानी ॥

साखी-सतगुरु भेद बतावई, तब पावे यह द्वार । कहैं कबीर धर्मदाससो, निश्चय वचन हमार ॥

कायापांजी

( १७७ )

धर्मदास वचन-चौपाई

धर्मदास चरनन चितलावा । अगमागम तुम मोहि बुलावा ॥ आगे गम्य मोहि देहु लखाई । अब मैं गहों सुरति बनाई ॥ यह तो ठीक चिन्हैउ मैं भाई । तुम परताप गम्य हम पाई ॥ अब आगेकर कहो बखाना । जहाँ मूलशब्दका पावों ध्याना ॥ जेहिते शब्दमें जाय समाई । तवन गम्य मोहि देहु लखाई ॥ भाषो मूल जाओ बलिहारी । मूलशब्द पुनि गहों सम्हारी ॥ सुरति कमल गम तुम भाखो । सुरति सम्हार अपने चितराखो ॥ सुरति कमल सुनब मैं साहेब । विहंगम डोरि गही चितलायब ॥ अब आगेका भाषो राहा । हम अजान का जानो थाहा ॥ तुम्हरे जनाय हम जानब भाई । तुम जानो सो करो बनाई ॥

साखी-समरत्थ आगे भाषो, मैकहू सुरति सम्हार । सकल पसारा मेटिके, उत्तह भवजल पार ॥ सतगुरु तब दया भई, पावों पद निर्वान । आगे गम्य बतावहु, सतगुरु वचन परमान ॥

सद्गुरु वचन-चौपाई

सुरति कमलके आगे भाखों । तुमसे गोप कछू नहीं राखों ॥ सुरति कमलहोय निकसो भाई । विहंगम डोरि गहो चितलाई ॥ विहंगम डोर दहिने दिशि जाई । तुमसों भेद कहौ समझाई ॥ सुरति कमलके कहों ठिकाना । आगे है योजन परमाना ॥ अक्षय वृक्ष तहाँ लागा भाई । दवना मरुआ बरनि न जाई ॥ बेलि चमेली बास सुबासा । बास सुबास किया प्रकाशा ॥

साखी-दवना मरुआ गुलाब है, गुलाब चमेली बास । तहवां अक्षय वृक्ष है, वरणों वास सुबास ॥

( १७८ )

बोधसागर

चौपाई

अक्षय वृक्षके बरणों अंगा । श्वेत स्वरूप तहां देखो रंगा ॥ श्वेत स्वरूप तहां देखो भाई । ऐसा भेद अगम अर्थार्ई ॥ ऐसा अलख लखे जो कोई । जरा मरण रहित सो होई ॥ विहंगम डोरि तहाँते आई । अकल कलामें जाइ समाई ॥ श्रवण ऊपरका कहां ठिकाना । झींगुर शब्द करै घमसाना ॥ दहिने स्वरपर ताकर ठाऊं । यही निजभेद मैं तुम्हें बताऊं ॥ अर्ध कमल उर्धमुख रहई । तहवां मूल शब्द उच्चरई ॥ धर्मदास तुम करहु संभारा । अकल कलामें शब्द उचारा ॥ ताकी सुरति धर्मनि तुम धरहूँ । होय धर्मनि यहि शब्दे गहहूँ ॥ तौन शब्द मैं दीन बताई । उहै डोरीले आगे जाई ॥ सबै दिशि लागी है ताही । यहि डोरी गहि मिलहूँ वाही ॥ बिहंगम डोरी शब्दमें लागी । झींगुर शब्द ऊबे धन जागी ॥ अकल कमल है श्वेत स्वरूपा । ताहि जोतिका कहां निरूपा ॥ अकल कमलका भाषों लेखा । छत्तीस पंखुरी ताहि हम देखा ॥ झलके मोति वरणि नहि जाई । चहुँ दिशि ज्योति चमके आई ॥ छत्तीस पंखुरीका विस्तारा । आप आप मुख राग उचारा ॥ तेहि भीतरका कहां हवाला । आभा उठि तहां चमके लाला ॥ होय उजियार दीपकके टेमा । पावो जाय सुरतिके प्रेमा ॥ आभा उठे सो वरणि न जाई । तुमकहं दीन अलख लखाई ॥ भीतर कमल होय उजियारा । तहां मूलशब्द करै झनकारा ॥ उमगै मोती लाल अरु हीरा । तहवां बैठे सत् कबीरा ॥ मोती झालर ऊपर छाजे । भीतर शब्द जो मूल विराजे ॥ अक्षय कमल जहँ तार ठिकाना । गुह्यकमल जहाँ होय निदाना ॥ तेहि आभा वरणि न जाई । साठ भानुकी ज्योति छपाई ॥

कायापांजी

( १७९ )

अस उजियार तेहि कमलमें होई। ताका मरम न जाने कोई ॥ अरिष्ट कमल है भेद निनारा। देखों जाई सकल उजियारा ॥ वोहि ठेकान सुरति करू ध्याना। तहां गुप्त होय जाय समाना ॥ एह समान जो बैठे जाई। हो धर्मनि तोहि देउ लखाई ॥ अकह कमल तहां प्रकाशा। ताहि सँहै निःअक्षरका वासा ॥ दुइ कमल मुखही मुख जोरा। तेहिमा शब्द करै घनचोरा ॥ गुप्त नाम गुञ्जार तहाँ देख्यो। मूलशब्दकी जड़ पेख्यो ॥ गुंजार अकह कमलमें आवे। मूलशब्द झंकार सुनावे ॥ मोतीवरण होय उजियाग। फूही छूटे अगरकी धारा ॥ छूटत अगर धार तहाँ भारी। सभै बिलोय मैं कहों विचारी ॥ सुरति संजोय तहाँ पिवै अघाई। जाते तप्त दूर होय भाई ॥ अकह कमलमें करो पैठारा। पीबो जाय अगरकी धारा ॥ झमकत अगर तहां निज मूला। उनसम तुल्य नहीं कोइ तूला ॥ यहि निज जपु अजपा जापा। पहुँचो लोक मिटै संतापा ॥ बरषे तहां अगरकी धारा। सुरतिनाल तहां करो अहारा ॥ जीवतही तहां रहो समाई। यह निज दीन्हों वस्तु लखाई ॥

साखी—कहै कबीर धर्मदाससे, यही वस्तु निजसार ।

यही वस्तु जो जानिये, उतरे भवजल पार ॥

इति श्रीग्रन्थ कायापांजी सम्पूर्ण

A decorative border with a repeating scrollwork pattern surrounds the central illustration. The illustration depicts a potted plant with dense foliage and several flowers, possibly tulips, in a dark, textured pot.

सत्यसुकृत, आदि अदली, अजर, अचिन्त, पुरुष, मुनीन्द्र, करुणामय, कबीर, सुरतियोग संतान, धनी, धर्मदास, चूशामणिनाम, सुदर्शन नाम, कुलपति नाम, प्रबोध गुरुबालापीर, केवल नाम, अमोल नाम, सुरतिसनेही नाम, हक नाम, पाकनाम, प्रकट नाम, धीरज नाम, उग्र नाम, दया नामकी दया- वंश व्यालीसकी दया

अथ श्रीबोधसागरे

पद्मविंशतिस्तरंगः

अथ पद्म मुद्रा प्रारम्भ

सुक्ति वचन

सुक्ति कहें सुनो गुरुज्ञानी । आगम भेद तुम कहौ बखानी ॥ सकल सृष्टिकी उत्पति भाखौ । मोसों गाय कछु निज राखौ ॥ ब्रह्म जीव कैसे उत्पानी । सोई भेद गुरु कहो बखानी ॥ सुक्त भेद गुरु देहु बताई । जाते हंसा लोक सिधाई ॥

( १८२ )

बोधसागर

योगजीत वचन

योगजीत तब बोलैं बानी । सुकित सुनौ आदि सहिदानी ॥ जाके मर्म ना जाने कोई । तुमसों भाष कहां मैं सोई ॥ उतपतको सब भेद बताऊँ । अगम निगम सब तुम्हे लखाऊँ ॥

साखी-ज्ञान पंचसुद्रा कहों, मूलज्ञान को सार ।

ऋषि मुनि देवनको मता, ताते अगम अपार ॥

चौपाई

प्रथमहि सुद्रा खेचरी कहिये । सो स्थान गगनमो लहिये ॥ धूप बरण तहां लखो प्रकाशा । चेतन ब्रह्मको तामैं वाशा ॥ तत्त्वमाहे विचित्र है सोई । कामधेनु तहां कहिये जोई ॥ पुढुप प्रकाश तहां बिजुली देखा । झिलमिल जोत तारागण देखा ॥ रक्तवर्ण तहां सूर्य लखाई । प्रथम आकाशको भेद बताई ॥ साचरीसुद्रा नासिका अस्थाना । उतंग बिंदको है तहां ध्याना ॥ तहां नाकाश गगन है वासा । बिजुली रूपरेख प्रकाशा ॥ मणिगण रतन मुक्तामणि हीरा । सोहंग रूप पवन तहां धीरा ॥ नासा अग्र करै तहाँ मेला । पवन सिन्धुमें दीजे हेला ॥ तासों हंस लीन होय जाई । निःअक्षरसो जाय समाई ॥ चाचरी सुद्रा दियो बताई । ताको भेद कहौ समुझाई ॥ भोचरीको स्थान लखाऊँ । रकाश गगनको भेद बताऊँ ॥ मन बुद्ध चित तहाँ होत हुलासा । तहां योग कीजे प्रकाशा ॥ चित्चेतन तहाँ झिलमिल देखा । नील वरण पवनकी रेखा ॥ तहवां कोट सूर्यको तेजू । झीन महलमों सुखमन सेजू ॥ तहां गगनमो होत अनन्दा । तहां उदित है पूरण चन्दा ॥ तामो अलख ब्रह्मको कहिये । जासों भेद मुक्तको लहिये ॥ तेहिसों ध्यान लगावै कोई । अमी बुन्द तहां चाखै सोई ॥

पञ्चमुद्रा

( १८३ )

अगोचरीको अब कहो निवासा । तासों कीजे योग प्रकाशा ॥ सुर्तनदी तहां उठे तरङ्गा । झालर भेरी शंख मृदंगा ॥ किकिन चिचिन किगरी बैना । गरजनशान धुनधुन सुवसेना ॥ शून्य महलमों बैठे जाई । दशोंद्वार तब वन्द कराई ॥ यह विध ध्यान गगनमों करई । सत्तर बाजा तब सुनु परई ॥ अनहद नाद सुने जो प्राणी । उपजे महासुखके खानी ॥ सतगुरु कहै सांच सोई योगी । तहां मरण मगन रमावत भोगी ॥ अगोचरी मुद्रा कहा प्रकाशा । ताको योग युक्तकी आशा ॥ उनमुनि मुद्रा महद अकाशा । अलखपुर्ष तहां कीन्हों वासा ॥ ब्रह्मप्रकाश तहांअण्ड न पिण्डा । लोकालोक नहीं ब्रह्मण्डा ॥ ब्रण अब्रण जात नहीं पाती । नहींतहां दिवस नहीं तहांराती ॥ तामों सरवर गहिर गँभीरा । जाके आदि अन्त नहीं तीरा ॥ ज्ञानी योगी जप तहां लागा । भयोअनन्द सकलो भ्रम भागा ॥ तामो लीन रहै जो कोई । गुप्त मनोरथ पावै सोई ॥ योग जीत कहो भेद अपारा । बिरला साधू करे विचारा ॥ खेचरी चाचरी भोचरी जानी । अगोचरा उनमुनिकही बखानी ॥ उनमुनि लागी योगपर निद्रा । सुख समाजजहांपरम अनन्दा ॥ यह प्रकाश उनमुनिमों कहिये । कछुक भेद पुनि तामों लहिये ॥ पञ्च मुद्रा और पञ्च अकाशा । पंच ध्यान और पञ्च प्रकाशा ॥ पञ्च वर्ण और पञ्च हैं वेदा । पञ्च तत्त्वके पञ्च हैं भेदा ॥ पञ्च मन्दिर औ पञ्च हैं द्वारा । पञ्च रूप औ पञ्च अहारा ॥ पञ्च इन्द्री औ पञ्च हैं स्वादा । पञ्च विद्या औ पञ्च हैं नादा ॥ पञ्च हैं आसन पञ्च हैं योगी । पञ्च मंदिर औ पञ्च हैं भोगी ॥ पञ्च सत्त औ पञ्च हैं सीउ । पञ्च कर्म औ पञ्च हैं जीउ ॥ पञ्च पृथ्वी औ पञ्च हैं नीरा । पञ्च तेज औ पञ्च समीरा ॥

( १८४ )

बोधसागर

पञ्च लिंग औ पञ्च हैं पूजा । पञ्च एक पञ्च है दूजा ॥ पांचों आवें पांचों जाई । पांचों मरें पांचोंको खाई ॥ पांचों सुक्षिम औ पांच अस्थूला । पांच डार औ पांच हैं मूला ॥ पांच पाप औ पांच हैं पुत्रा । पांच बस्ती और पांच हैं सुत्रा ॥ पांच पांच पांचों सब भवा । पांच स्वामी और पांच हैं सेवा ॥ पंच गुरु और पंच हैं चेला । पांच भाव और पांच हैं मेला ॥ पञ्च मुद्राका कहों बिचारा । ताको योगी करे सम्हारा ॥ चार छोड़ पांचो करे बासा । ताते पांचका कहो प्रकाशा ॥ पांचों मुद्रा उनमुनि कहिये । तासों भेद सुत्तिको लहिये ॥ ब्रह्म प्रकाश तहाँ पूरन चन्दा । रैन दिवस नहि सहज अनन्दा ॥ दुतिया भाव तहाँ नहि काया । तहवां नहीं धूप और छाया ॥ हम तुम कर्म भ्रम नहि दोई । तहां सिलान ब्रह्म सो होई ॥ सहज शून्यको लखे जो भेवा । आप ही कर्ता आप ही देवा ॥ प्रथमही आपुपुर्ष विस्तारा । तहांते भयो ब्रह्म आकारा ॥ आकारते अहंकार उपजाई । ताते बहु विस्तार बनाई ॥ सोहं स्वासा पुर्ष उचारा । तहांते भौ अक्षर ओंकारा ॥ पांच ब्रह्मकी उत्पति भाषों । तुमसों गाय कछू नहीं राखों ॥ अकास ब्रह्मको भास बताऊँ । वायु ब्रह्मको तहवां लाऊँ ॥ पुन है तेज ब्रह्मकी बानी । जलकी बहुरि कहों उत्पानी ॥ फिर पृथ्वीको भास लखाऊँ । प्रथम ब्रह्मको भेद सुनाऊँ ॥ अविगत आदि ब्रह्मको भासा । ताको भेद कहों प्रकाशा ॥ प्रथमें नाम आकाश कहाई । दुतिये गगनाकाश बताई ॥ फिर रकाशको नाम सुनाऊँ । चौथे गगनसकाश लखाऊँ ॥ पांचे महद अकाशकी बानी । पञ्च अकाशमें कहों बखानी ॥ अब सुन कहों पञ्च अस्थाना । सकित तुमसों कहों बखाना ॥

पञ्चसुद्धा

( १८५ )

मुखके अग्र खेचरी बासा । ताको ध्यान जन करे अकाशा ॥ नासा अग्रत्रिकुटी अस्थाना । चाचरी सुद्धा तहाँ बखाना ॥ चक्षु अग्र भोचरी जाना । उर्ध्वअकाशको है तहाँ ध्याना ॥ श्रवन अग्र अगोचरी थाना । सहज शून्यको है तहाँ ध्याना ॥ तिलकपाट उनसुनी कहीजै । महाशून्य ध्यान तहाँ कीजै ॥ प्रथमहि खेचरीक सुद्धा कहिये । धूमवरण रंग तहाँ लहिये ॥ पीतवर्ण तहाँ देखे जाई । अकह रूप तहाँ रहो समाई ॥ औरौ वर्ण रक्त लख आई । कामधेनु तहाँ देखो गार्ई ॥ करुणवृक्षकी तहवों छाया । नहीं तहाँ काल नहीं तहाँ काया ॥ तहाँ समाध लगावे जाई । अमी बुंद तहाँ चाखे भाई ॥ ताकर पीवत अमर होइ जाई । सोई भेदमें वरण सुनाई ॥ द्वितिये चाचरि सुद्धा बखानी । नासा ध्यान तासको जानी ॥ तहाँ उत्तंग ब्रह्मको देखा । हंस रूप तहवों पुन पेखा ॥ मणिगण रतन विन्दको बासा । कर्तारूप पुरुष प्रकाशा ॥ जगमग ज्योति देखिये तहिया । बिन शशि सूर उजैरो जहिया ॥ चहुँदिश दामिनि दमके आई । चन्द्र सूर तामों छपजाई ॥ इतना रूप चाचरी जानी । ताको भेद कहीं प्रवानी ॥ त्रितिये भोचारी सुद्धा कहिये । अष्ट अंग पुन तामों लहिये ॥ मन बुध चित अहंकारन माया । ममता काम हर्षकी छाया ॥ तेज पुञ्ज तहाँ झिलमिल देखा । सूक्ष्म अस्थान तहाँ पुन पेखा ॥ चित चेतन्य तहाँ पुन दोई । तामों मिले परमपद सोई ॥ भोचरी सुद्धा कहि समझाई । ताको मर्म कोइ ज्ञानी पाई ॥ चौथे अगोचरी सुद्धा जाहीं । महाशब्द धुन उपजे ताहीं ॥ नाना ताल बैन मृदंगा । यंत्र ढोल सहनाई अंगा ॥ राबाब किंकिन झालरी बाजा । नभेरी चिंचिन शंखधुन गाजा ॥

( १८६ )

बोधसागर

मेघनाद गजनीं तहां कहिये । शंख शब्द धुन तामों लहिये ॥ बाजा सुने सूष्य तव होई । काम क्रोध मद सब गहि खोई ॥ लोभ मोह तज पावे सोई । प्रवर्त छोड़ निरवर्त जो होई तमो सतो रजो गुण विसरावै । आगे रूप दर्श तब पावै ॥ अगोचरीको अब कहेउ उपाई । योगी कर्म महा सच पाई ॥ पांचे मुद्रा उनमुनि जानी । ताकर भेद अब कहीं बखानी ॥ उनमुनि देश लखे जब जाई । अमर वस्तु तब भाषे आई ॥ ब्रह्म अखण्ड देखिये जाई । ब्रह्मरूप तब भाषे आई ॥ श्वेत पीत श्याम नहीं सोई । अरुण सजुजतें न्यारा होई ॥ रूप सरूप हृद वेहद नहीं । चारो बानि खानि नहीं ताहीं ॥ ब्रण अब्रण काया नहीं माया । युग बैदनकी तहाँ न छाया ॥ षटदर्शन पाखंड ना तहाँ । बावन अक्षर अकार न जहाँ ॥ नौ षट चार अष्टदश नहीं । पांचो तत्त्व धाम नहीं ताहीं ॥ मन बुध चित अहंकार नावासा । काल कर्मको नहीं प्रकाशा ॥ तहाँ ध्यानधर तारी लावै । सोई मूल परम पद पावै ॥ उनमुनि सिरवर बहुर चढ़जाई । जहाँकी गम्य देव नहीं पाई ॥ नहीं तहाँ काल नहीं तहँ काया । नहीं तहाँ प्रमत्ता मोहन माया ॥ चन्द्र सूर तारागण नहीं । दिवस रैन तहाँ धूप न छाहीं ॥ पिंड ब्रह्मांडको तहाँ न लेखा । केवल पारब्रह्म तहाँ देखा ॥ अलखरूप तहाँ अबिगत सोई । सबके परे ध्यान वह होई ॥ तासों ध्यान लगावे प्राणी । असी चारके छूटे खाणी ॥ अब वेदनको बास बताऊँ । ताको भेद अब वर्ण सुनाऊँ ॥ जिह्वा अग्र ऋग्वेदको वासा । नासा अग्र यजुर प्रकाशा ॥ श्रवण अग्र शाम सुति कहिये । चक्षु अग्र अथरवण लहिये ॥ शून्य अग्र सोहंग प्रकाशा । तहवों सुसमे वेद को बासा ॥

पञ्चमुद्रा

( १८७ )

वेदनके अस्थान बताई । अब इंद्रिनके स्वाद लखाई ॥ लिंग इंद्री कामिन सो नेही । जिह्वा षट् श्वाद तो लेही ॥ नासा गंध सुगंध अघाई । चक्षु इंद्री रूप लोभाई ॥ श्रवण स्वाद मधुर धुन बानी । ये पांचोंके स्वाद बखानी ॥ पृथी अस्थूल ऋग्वेदकी बानी । नीर अस्थूल जजुर पहिचानी ॥ वायु अस्थूल साम सुतिं कहिये । तेज अस्थूल अथरवण लहिये ॥ अनहद अस्थूल सोहंगकी बानी । सुसम देवताको पहिचानी ॥ खोजे ताहि मुक्त तब होई । सुसम वेद सम और न कोई ॥ वेद अस्थूल कहा समझाई । आसन योगी भेद बताई ॥ पृथ्वीरूप जहाँ आसन जाना । जीवरूप योगी पहिचाना ॥ पानीरूप जहाँ आसन कहिये । हंसरूप योगी तहाँ लहिये ॥ तेजरूप जहाँ आसन जानी । चेतनरूप योगी पहिचानी ॥ बांयेरूप है आसन जहिया । निराकार योगी है तहिया ॥ आकाश रूप आसन प्रवाना । निरंजन योगी जहाँ बखाना ॥ आवागम अब भेद बताई । तुमसो सुकृत नाहिं डुराई ॥ जीव पृथी मिल आवे जाई । मिल पृथी पुनि बहुरि सिधाई ॥ हंस रूप जल मिलके आवै । बहुर नीर मिल घरहि सिधावै ॥ चैतन तेज मिल आवै सोई । बहुर तेज मिल तहाँ सगोई ॥ निरालंब बाये मिलि आवै । बहुर बाये मिल गृहे समावै ॥ निरञ्जन मिल आकाशको आवै । बहुर गगन मिल उलट समावै ॥ आवागम मैं दीन बताई । जन पहुँचनको भेद लखाई ॥ प्रथम पृथीको जल उपजावै । सो जल बहुर पृथीको खादे ॥ जलकी उत्पत्त तेज सो होई । भक्षे तेज पुन जलको सोई ॥ तेजको बाये रूप उपजावै । उलट वाये पुन ताको खावै ॥ बाँये रूप अकाश उपजाई । फिर अकाश पुन ताको खाई ॥ आकाश शून्यते उत्पत्त जानौ । बहुरि शून्यमें जाय समानौ ॥

( १८८ )

बोधसागर

पृथी जीव गृहे कहौं प्रकाशा । गुदा द्वारमें कीन्हो बासा ॥ पानी हंसको गृहे बताई । ललाट अधरमें बैठक पाई ॥ तेज चेतनको धाम बताई । पीत चक्षुके द्वार रढ़ाई ॥ निरालंभ बायेको थाना । नाभी नाशिक द्वार समाना ॥ आकाश निरंजनको प्रकाशा । श्रवण द्वार ब्रह्मांड है बासा ॥ पांचोंके गृह वर्ण सुनाई । रंग अहार कहौं समुझाई ॥ पृथ्वी पीतवर्ण उच्चार । सो तो जीवको कहौं अहारा ॥ पानी श्वेतवर्ण है भाई । सो तो अहार हंसको आई ॥ तेजको रक्तवर्ण पहिचाना । सो तो अहार चेतन को जाना ॥ बायेको सवुजवर्ण है भाई । निरालंबको भक्षण आई ॥ अकाश नीलवर्ण पहिचानी । निरंजनको अहारसो जानी ॥ रंग अहार कहेउ समुझाई । पृथ्वी पंचके नीर बुझाई ॥ पृथ्वी नीर पुत्र है भाई । हाड पृथ्वीको बिंद कड़ाई ॥ नीर पृथीको श्रोणित अंशा । पसीना त्वचा पृथीको वंशा ॥ रोम पृथीको वंश कड़ाई । पृथी नीरको भेद लखाई ॥ पृथी बिमल गुण कहिये भाई । अब पृथी गन वर्ण बताई ॥ तेज तमोगुणको पहिचाना । बाये गन्धगुण लखो सुजाना ॥ अकाशअलखगुण जानहु भाई । पांचोंके गुणवर्ण सुनाई ॥ अब प्रक्रीत पचीस बताऊँ । पाचों तत्त्व विभाग लखाऊँ ॥ हाड चाम मास रोम लखाई । नाटिका पृथी प्रकृत बताई ॥ रक्त पित्त कफ स्वाद बखाना । स्नारप्रकृतजलतत्त्वको जाना ॥ भूखप्यास मुख प्रभा जम्हानो । आलस निद्रा तेज पहिचानो ॥ धावन कूदन बलकर भाई । परसन सकुचन पवन बताई ॥ लोभ मोह हंकार भै जाना । बिंद अकाश प्रकृत बखाना ॥ पांच पचीस अंग कहि दीन्हौं । तासु मर्म कोइ बिरले चीन्हौं ॥

पञ्चमुद्रा

( १८९ )

प्रथमहि जीवरूप पहिचानो । प्रथमै ताके चेला जानो ॥ औ पुन हंसरूप है भाई । पानी चेला तास बताई ॥ चेतनरूप गुरु है सोई । चेला तेज तासुको होई ॥ निरालंब गुरु पहिचानो । वाय तासको चेला जानो ॥ अलख निरंजन गुरु बखाना । चेला आकाश तासको जाना ॥ गुरु शिष्यको भेद बताई । अब तत्त्वनकी परष लखाई ॥

छंद-चौकोर मंद और शुद्धपुरी धरनी है सोई । नीचे शीतल मंद चले जलको तत होई ॥ तेज तत्त्व जो ऊंच आगमनकी आइसु होई । दहिने बांये चले बाँये तत्त्व जानो सोई ॥ सबुजके मध्य सुखमना पवन गगनको जानिये । आकाश नाम तासों कहि पाँचों तत्त्व बखानिये ॥ नाभी गंध समान पवनको अंश बखानो । ह्दे माही प्राण अगिनको अंश सो जानो ॥ कंठ बसे आपान अंश तेहि जलको जानो । गगन बसे उद्यान अंश आकाश बखानो ॥ सब देहीमें ब्यान है अंश पृथ्वीको जानिये । पंच प्राण ये जानिये अंशहीते पहिचानिये ॥

चौपाई

पंचप्राणकी संघ लखाई । अब उनमुनिको भेद बताई ॥ मुद्रापांच प्रकट मैं भाषा । तामहि श्रेष्ठ उनमुनि राखा ॥ चारोंके परे उनमुनि कहिये । अलखरूप पुनि तामों लहिये ॥ सोई ब्रह्मज्ञान कहलावै । धरे ध्यान तहां अमृत पावै ॥ पावे साध अमीरस पीवै । सो योगी जग युगयुग जीवै ॥ ना फिर आवै ना फिर जाई । अखंड मंडलमें रहे समाई ॥

( १९० )

बोधसागर

ताको जरा मरन नहीं होई । परम तत्त्वमें रहे समोई ॥ योग जीत कहु ज्ञान अपारा । यह मार्ग है सत् विचारा ॥

सुकित वचन

सुकित कहैं सुनो गुरुज्ञानी । सुद्धा पंच तुम कही बखानी ॥ और कथा एक पूछो तोही । सो समुझाय कहु प्रभु मोही ॥ कायामाहे कमल जो होई । तेहि स्थान सुनावो सोई ॥ कौन कमलकै पखुरी जाना । कौन देव तहां कीन्हों थाना ॥ कौन कमलसों स्वासा आवै । कौन कमलमें जाय समावै ॥ कौन कमलसों होय गुंजारा । कौन कमलसों करे उचारा ॥ केतिक स्वासा आवै जाई । भिन्न भिन्न सब लेख बताई ॥

योग जीत वचन

हे सुकित मैं तुम्हैं लखाऊं । कमलनको प्रमान बताऊं ॥ प्रथमहि कमल चतुरदल कहिये । देवगणेश पुन तामों लहिये ॥ रिद्धसिद्ध जहाँ सत्क उपासा । तहाँ जा पूछै सो प्रकाशा ॥ षटदल कमल ब्रह्माको बासा । सावित्री तहाँ कीन्ह निवासा ॥ षटसहस्र तहाँ जाप बखाना । देवन सहित इन्द्र अस्थाना ॥ अष्टदलकमलहरिलक्ष्मी वासा । षटसहस्र तहाँ जाप निवासा ॥ द्वादश कमलमों शिवको जाना । षटहजार जाप बंधाना ॥ तहाँ शिव योग लगावैं तारी । पारवती संग सहित विचारी ॥ षोडश कमल जीव मन वासा । एक सहस्र जाप प्रकाशा ॥ त्रैदल कमल भारथी वासा । सोतो उज्ज्वल कमल निवासा ॥ एक सहस्र जाप तहाँ कीजै । यह संकल्प जाय तहाँ दीजै ॥ दोय दल कमल हंस अस्थाना । तामह परम हंसको जाना ॥ एक सहस्र जाप प्रकाशा । कर्म भ्रमको है तहाँ नाशा ॥ सहस्रदल कमलमों झिलमिल जाना । ज्योति सरूप तहाँ पहिचाना ॥ ताहै रंगहै अलख अपारा । अलख पुर्ष है सबते सारा ॥

पञ्चमुद्रा

( १९१ )

नवें कमल आदको जानो । जाते निरगुण पुर्ष बखानो ॥ एकइस हजार छैसे जाप कहिये । सो सब पुर्ष ध्यानमें लहिये ॥ अष्ट कमलको भेद बताई । और ज्ञान अब भाषो भाई ॥ स्वासाको प्रमाण अब भाषो । तेहि प्रभाव प्रकटकर राखों ॥ अब स्वासाको भेद बताऊँ । जाको मर्म कोई नहिं पाऊँ ॥ अभी अखण्डते वर्ये धारा । तहाँते स्वास होय गुंजारा ॥ निसवासरको जाने मूला । स्वासा सार शब्दसमूला ॥ दशयें घरते स्वासा आवै । कछु नाभी कछु अलख चढ़ावै ॥ निस दिन चले स्वासाकी धारा । सातसे आगर साठि हजार ॥ अभी कमल अमान सो नाला । अढ़ाई दल पखुरी रिसाला ॥ तहाँते चले पवनकी धारा । स्वासा माहे शब्द गुजारा ॥ उनचालिस हजार एकसे आवै । एतिक चिकुर द्वारसो धावै ॥ हृदे कमल होय स्वासा आवै । एकइस हजार और छैसे धावै ॥ एता जाप तहाँ प्रवाना । एकइस हजार और छैसे जाना ॥ एतिक स्वासा हृदे ले आवै । क्षिन् बाहिर क्षिन् भीतर धावै ॥ दुसरा कमल है झिलमिल माही । झलके जोत अथर धुन ताही ॥ सहस्र पखुरी कमल अनूपा । तहाँ बसे मन जीत सुरूपा ॥ ताहे कमल पर बाजा बाजै । सत्तर बाजा तहाँ बिराजै ॥ तहां घरनी घरियार बजावै । घरी घरी टंकोरा लावै ॥ छैसे औ पचहत्तर स्वासा । एतिक एक घरी प्रकाशा ॥ एतिक स्वासा कमत युगमाही । तब घरनी घरियार बजाही ॥ या विधि चार टंकोरा ठोकै । राहु केतु संग व्यालि न रोकै ॥ पहर एक करे धुन पूरा । ग्रहण गिरासे शशि औ सूर ॥ गहन गिरा सत निसरे स्वासा । रवि शशि राहु केतु प्रकाशा ॥ तेहि संग एक सापनी रहई । घरीघरी वह जीवको गहई ॥ श्वासा सोरह ग्रहण लगावै । छटे मास तेहि काल सतावै ॥

( १९२ )

बोधसागर

स्वासा परख घरीकी राखे । जो दम चले सो आगम भावै ॥ सत्ताइससो स्वासा चले जबही । पहर टंकारा मारे तबही ॥ एतिक स्वासा पहर प्रवानी । घरी चारमों गजर बन्धानी ॥ आठ पहर छ घरी बजावै । ठोके गजर गहर नहिं लावै ॥ चार घरी चारो युग मूला । चार पहर चारो अस्थूला ॥ चारो युग एक पहरके माही । चारो युगकी वतैं छाही ॥ प्रथम पहर सतयुग प्रवाना । ताकर प्रथम घरी बंधाना ॥ सतयुगमें युग चार अपारा । चारो युगके नाम निनारा ॥ प्रथमह सतयुग रोपो थाना । चारो युग तेहि माहि समाना ॥ सतयुग प्रथमहि घरी उतपानी । किलक नामयुग ताहि बखानी ॥ किलक जगकी स्वासा सारा । छैसे पचहत्तर स्वास सुधारा ॥ एतिकस्वासाकिलक युगमाहीं । पूछै जीव अच्छेकी छाहीं ॥ वीतत घरी गजर घहराई । काल टंकोरा मारे धाई ॥ या युग अन्तकी आवे घरी । आसे नागिन सनमुख खड़ी ॥ प्रथम किलकयुग होय संधारा । पीछे कमतयुग करे पसारा ॥ सतयुग घरी दूसरी आवै । तैतिक स्वासा कमत युग पावै ॥ जवे कमत युगकरे हंकारा । उतपत थोरी बहुत संधारा ॥ कमत युगकी स्वासा जानो । छैसे पचहत्तर स्वासा बखानो ॥ एतिक स्वासा कमत युग माही । गुण औगुण सब निखैं ताही ॥ बीते कमत कमोद युग आवै । तीसरी घरी बासना धावै ॥ आवांगवन विचारे जोई । युग कमोद सुख पावे सोई ॥ तिसरी घरी कमोदकी आवै । तब कमोद युग सुख दिखरावै ॥ युग कमोद अमल जब आवै । दुखी सुखी नर सब सुख पावै ॥ युग कमोदकी प्रलै होई । दुखी सुखी जाने सब कोई ॥ तबही होय सूर संचारा । महाविरोध उपजे संसारा ॥

पञ्चमुद्रा

( १९३ )

चन्द सनेह होय जो हीना । महासूल तन होय मलीना ॥ श्वासा घरी सातसे भारी । युगकमोदकी कथा निनारी ॥ युगकंकवत होय पैसारा । चौथी घरी कोध अधिकारा ॥ ताकी घरी निकट जब आवै । सतयुग अंत कंकवत पावै ॥ सतयुग अंत होन नहि पावै । युग कंकवत आन समावै ॥ युगकंकवत काल दुखदाई । काया कहर गिरासे आई ॥ युगकंकवत कालकी वाजी । कलह विकार सब जगमों साजी ॥ युगकंकवत महाबल योधा । अंतकाल सतयुगसों कोधा ॥ सतयुगअंत कंकवत माही । अंतकालकी व्यापे छाहीं ॥ युगकंकवत मोहकी छाहीं । काम कोध ममता लपटाहीं ॥ अंतकाल सतयुगके भयऊ । चारो युग परले तर गयऊ ॥ चारों युगका भेद बतावा । अगम निगम सब भाष सुनावा ॥

साखी—एके युगके बीतते, चारों गये बिनास ।

एक नाद चारों युग खायो, सतयुग कीन्हो ग्रास ॥

किलक कमोद चंदके नेहा । कमत कंकवत सूर सनेहा ॥ भये युग अंत एक संगचारी । चार शब्द एक नाद सँघारी ॥ एक नाद एक पहर कहावै । चार घरी एक माहि समावै ॥ चार घरी चारों युग बीतै । शब्द नाद रवि शशिघर जीतै ॥ सतयुगको तब भयो बिनाशा । त्रेतायुगको भयो प्रकाशा ॥ दूसर युग तब भौ विश्वासा । दूसर पहर तत्त्व प्रकाशा ॥ तेज लगन श्वासा अनुसारी । ताते त्रेतायुग संचारी ॥ त्रेता युगकी पखुरी चारी । चार घरी युग चार बिचारी ॥ जस युगअंत सतयुगमों देखा । सोई युग त्रेतामों लेखा ॥ जब जब अंत होय युग केरा । तब तब नादकाल घन घोरा ॥

नं. ८ कबीरसागर - ७