कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( १८८ )
बोधसागर
पृथी जीव गृहे कहौं प्रकाशा । गुदा द्वारमें कीन्हो वासा ॥ पानी हंसको गृहे बताई । ललाट अथरमें बैठक पाई ॥ तेज चेतनको धाम बताई । पीत चक्षुके द्वार रखाई ॥ निरालंभ बायेको थाना । नाभी नाशिक द्वार समाना ॥ आकाश निरंजनको प्रकाशा । श्रवण द्वार ब्रह्मांड है वासा ॥ पांचोंके गृह वर्ण सुनाई । रंग अहार कहौं समुझाई ॥ पृथ्वी पीतवर्ण उच्चार । सो तो जीवको कहौं अहारा ॥ पानी श्वेतवर्ण है भाई । सो तो अहार हंसको आई ॥ तेजको रक्तवर्ण पहिचाना । सो तो अहार चेतन को जाना ॥ बायेको सवुजवर्ण है भाई । निरालंबको भक्षण आई ॥ अकाश नीलवर्ण पहिचानी । निरंजनको अहारसो जानी ॥ रंग अहार कहेउ समुझाई । पृथ्वी पंचके नीर बुझाई ॥ पृथ्वी नीर पुत्र है भाई । हाड पृथ्वीको बिंद कहाई ॥ नीर पृथीको श्रोणित अंशा । पसीना त्वचा पृथीको वंशा ॥ रोम पृथीको वंश कहाई । पृथी नीरको भेद लखाई ॥ पृथी विमल गुण कहिये भाई । अब पृथी गन वर्ण बताई ॥ तेज तमोगुणको पहिचाना । बाये गन्धगुण लखो सुजाना ॥ अकाशअलखगुण जानहु भाई । पांचोंके गुणवर्ण सुनाई ॥ अब प्रकीत पचीस बताऊँ । पाचों तत्त्व विभाग लखाऊँ ॥ हाड चाम मास रोम लखाई । नाटिका पृथी प्रकृत बताई ॥ रक्त पित्त कफ स्वाद बखाना । स्नारप्रकृतजलतत्त्वको जाना ॥ भूखप्यास मुख प्रभा जम्हानो । आलस निद्रा तेज पहिचानो ॥ धावन कूदन बलकर भाई । परसन सकुचन पवन बताई ॥ लोभ मोह हंकार भै जाना । बिंद अकाश प्रकृत बखाना ॥ पांच पचीस अंग कहि दीन्हौं । तासु मर्म कोइ बिरले चीन्हौं ॥
पञ्चमुद्रा
( १८९ )
प्रथमहि जीवरूप पहिचानो । प्रथमै ताके चेला जानो ॥ औ पुन हंसरूप है भाई । पानी चेला तास बताई ॥ चेतनरूप गुरु है सोई । चेला तेज तासुको होई ॥ निरालंब गुरु पहिचानो । वाय तासको चेला जानो ॥ अलख निरंजन गुरु बखाना । चेला आकाश तासको जाना ॥ गुरु शिष्यको भेद बताई । अब तत्त्वनकी परष लखाई ॥
छंद-चौकोर मंद और शुद्धपुरी धरनी है सोई ।
नीचे शीतल मंद चले जलको तत होई ॥ तेज तत्त्व जो ऊंच आगमनकी आइसु होई । दहिने बांये चले बाँये तत्त्व जानो सोई ॥ सबुजके मध्य सुखमना पवन गगनको जानिये । आकाश नाम तासों कहि पांचों तत्त्व बखानिये ॥ नाभी गंध समान पवनको अंश बखानो । हृदे माही प्राण अगिनको अंश सो जानो ॥ कंठ बसे आपान अंश तेहि जलको जानो । गगन बसे उद्यान अंश आकाश बखानो ॥ सब देहीमें ब्यान है अंश पृथ्वीको जानिये । पंच प्राण ये जानिये अंशहीते पहिचानिये ॥
चौपाई
पंचप्राणकी संघ लखाई । अब उनमुनिको भेद बताई ॥ मुद्रापांच प्रकट मैं भाषा । तामहि श्रेष्ठ उनमुनि राखा ॥ चारोंके परे उनमुनि कहिये । अलखरूप पुनि तामों ल्हिये ॥ सोई ब्रह्मज्ञान कहलावै । धरे ध्यान तहां अमृत पावै ॥ पावे साध अमीरस पीवै । सो योगी जग युगयुग जीवै ॥ ना फिर आवै ना फिर जाई । अखंड मंडलमें रहे समाई ॥
( १९० )
बोधसागर
ताको जरा मरन नहिं होई । परम तत्त्वमें रहे समोई ॥ योग जीत कहु ज्ञान अपारा । यह मार्ग है सत् विचारा ॥
सुक्ति वचन
सुक्ति कहैं सुनो गुरुज्ञानी । सुद्रा पंच तुम कही बखानी ॥ और कथा एक पूछो तोही । सो समुझाय कहो प्रभु मोही ॥ कायामाहे कमल जो होई । तेहि स्थान सुनावो सोई ॥ कौन कमलकै पखुरी जाना । कौन देव तहाँ कीन्हों थाना ॥ कौन कमलसों स्वासा आवै । कौन कमलमें जाय समावै ॥ कौन कमलसों होय गुजारा । कौन कमलसों करे उचारा ॥ केतिक स्वासा आवे जाई । भिन्न भिन्न सब लेख बताई ॥
योग जीत वचन
हे सुक्ति मैं तुम्हैं लखाऊं । कमलनको प्रमान बताऊं ॥ प्रथमहि कमल चतुरदल कहिये । देवगणेश पुन तामों लहिये ॥ रिद्धसिद्ध जहाँ सत् उपासा । तहाँ जा पूछै सो प्रकाशा ॥ षटदल कमल ब्रह्माको बासा । सावित्री तहाँ कीन्ह निवासा ॥ षटसहस्र तहाँ जाप बखाना । देवन सहित इंद्र अस्थाना ॥ अष्टदलकमलहरिलक्ष्मी वासा । षटसहस्र तहाँ जाप निवासा ॥ द्वादश कमलमें शिवको जाना । षटहजार जाप बंधाना ॥ तहाँ शिव योग लगावैं तारी । पारवती संग सहित विचारी ॥ षोडश कमल जीव मन वासा । एक सहस्र जाप प्रकाशा ॥ त्रैदल कमल भारथी वासा । सोतो उज्ज्वल कमल निवासा ॥ एक सहस्र जाप तहाँ कीजे । यह संकल्प जाय तहाँ दीजे ॥ दोय दल कमल हंस अस्थाना । तामह परम हंसको जाना ॥ एक सहस्र जाप प्रकाशा । कर्म भ्रमको है तहाँ नाशा ॥ सहस्रदलकमलमें झिलमिल जाना । ज्योति सरूप तहाँ पहिचाना ॥ ताहै रंगहै अलख अपारा । अलख पुर्ण है सबते सारा ॥
पञ्चमुद्रा
( १९१ )
नवै कमल आदको जानो । जाते निरगुण पुर्ष बखानो ॥ एकइस हजार छैसे जाप कहिये । सो सब पुर्ष ध्यानमें लहिये ॥ अष्ट कमलको भेद बताई । और ज्ञान अब भाषो भाई ॥ स्वासाको प्रमाण अब भाषो । तेहि प्रभाव प्रकटकर राखों ॥ अब स्वासाको भेद बताऊँ । जाको मर्म कोई नहीं पाऊँ ॥ अमी अखण्डते वर्ष धारा । तहाँते स्वास होय गुंजारा ॥ निसवासरको जाने मूला । स्वासा सार शब्दसमूला ॥ दशयै घरते स्वासा आवै । कछु नाभी कछु अलख चढ़ावै ॥ निस दिन चले स्वासाकी धारा । सातसे आगर साठि हजारा ॥ अमी कमल अमान सो नाला । अढ़ाई दल पखुरी रिसाला ॥ तहाँते चले पवनकी धारा । स्वासा माहे शब्द गुजारा ॥ उनचालिस हजार एकसे आवै । एतिक चिकुर द्वारसो धावै ॥ ह्दे कमल होय स्वासा आवै । एकइस हजार और छैसे धावै ॥ एता जाप तहाँ प्रवाना । एकइस हजार और छैसे जाना ॥ एतिक स्वासा ह्दे ले आवै । क्षिन बाहिर क्षिन भीतर धावै ॥ दुसरा कमल है झिलमिल माही । झलके जोत अधर धुन ताही ॥ सहस्र पखुरी कमल अन्ना । तहाँ बसे मन जीत सरूपा ॥ ताहे कमल पर बाजा बाजै । सत्तर बाजा तहाँ विराजै ॥ तहाँ घरनी घरियार बजावे । घरी घरी टंकोरा लावै ॥ छैसे औ पचहत्तर स्वासा । एतिक एक घरी प्रकाशा ॥ एतिक स्वासा कमत युगमाही । तब घरनी घरियार बजाही ॥ या विधि चार टँकोरा ठोकै । राहु केतु संग ब्यालि न रोकै ॥ पहर एक करे धुन पूरा । गृहण गिरासे शशि औ सूरा ॥ गहन गिरा सत निसरे स्वासा । रवि शशि राहु केतु प्रकाशा ॥ तेहि संग एक सापनी रहई । घरीघरी वह जीवको गहई ॥ श्वासा सोरह ग्रहण लगावै । छटे मास तेहि काल सतावै ॥
( १९२ )
बोधसागर
स्वासा परख घरीकी राखे । जो दम चले सो आगम भावै॥ सत्ताइससो स्वासा चले जबही । पहर टंकारा मारे तबही ॥ एतिक स्वासा पहर प्रवानी । घरी चारमों गजर बन्धानी ॥ आठ पहर छ घरी बजावै । ठोके गजर गहर नहिं लावै ॥ चार घरी चारो युग मूला । चार पहर चारो अस्थूला ॥ चारो युग एक पहरके माही । चारो युगकी वतें छाही ॥ प्रथम पहर सतयुग प्रवाना । ताकर प्रथम घरी बंधाना ॥ सतयुगमें युग चार अपारा । चारो युगके नाम निनारा ॥ प्रथमह सतयुग रोपो थाना । चारो युग तेहि माहि समाना ॥ सतयुग प्रथमहि घरी उत्पानी । किलक नामयुग ताहि बखानी ॥ किलक जगकी स्वासा सारा । छैसे पचहत्तर स्वास सुधारा ॥ एतिकस्वासाकिलक युगमाहीं । पूछै जीव अछैकी छाहीं ॥ वीतत घरी गजर घहराई । काल टंकोरा मारे धाई ॥ या युग अन्तकी आवे घरी । ग्रासे नागिन सनमुख खड़ी ॥ प्रथम किलकयुग होय संघारा । पीछे कमतयुग करे पसारा ॥ सतयुग घरी दूसरी आवै । तैतिक स्वासा कमत युग पावै ॥ जवे कमत युगकरे हंकारा । उत्पत थोरी बहुत संघारा ॥ कमत युगकी स्वासा जानो । छैसे पचहत्तर स्वासा बखानो ॥ एतिक स्वासा कमत युग माही । गुण औगुण सब निखें ताही ॥ बीते कमत कमोद युग आवै । तीसरी घरी बासना धावै ॥ आवागवन विचारे जोई । युग कमोद सुख पावे सोई ॥ तिसरी घरी कमोदकी आवै । तब कमोद युग सुख दिखरावै ॥ युग कमोद अमल जब आवै । दुखी सुखी नर सब सुख पावै ॥ युग कमोदकी प्रलै होई । दुखी सुखी जाने सब कोई ॥ तबही होय सूर संचारा । महाविरोध उपजे संसारा ॥
पञ्चसुत्रा
( १५३ )
चन्द सनेह होय जो हीना । महासूल तन होय मलीना ॥ धासा घरी सातसे भारी । युगकमोदकी कथा निनारी ॥ युगकंकवत होय पैसारा । चौथी घरी कोध अधिकारा ॥ ताकी घरी निकट जब आवै । सतयुग अंत कंकवत पावै ॥ सतयुग अंत होन नहिं पावै । युग कंकवत आन समावै ॥ युगकंकवत काल दुखदाई । काया कहर गिरासे आई ॥ युगकंकवत कालकी बाजी । कलह विकार सब जगमों साजी ॥ युगकंकवत महाबल योधा । अंतकाल सतयुगसों क्रोधा ॥ सतयुगअंत कंकवत माहीं । अंतकालकी व्यापे छाहीं ॥ युगकंकवत मोहकी छाहीं । काम कोध ममता लपटाहीं ॥ अंतकाल सतयुगके भयऊ । चारो युग परले तर गयऊ ॥ चारों युगका भेद बतावा । अगम निगम सब भाष सुनावा ॥
साखी—एके युगके बीतते, चारों गये विनास ।
एक नाद चारों युग खायो, सतयुग कीन्हो ग्रास ॥
किलक कमोद चंदके नेहा । कमत कंकवत सूर सनेहा ॥ भये युग अंत एक संगचारी । चार शब्द एक नाद सँघारी ॥ एक नाद एक पहर कहावै । चार घरी एक माहि समावै ॥ चार घरी चारों युग बीतै । शब्द नाद रवि शशिघर जीतै ॥ सतयुगको तब भयो विनाशा । त्रेतायुगको भयो प्रकाशा ॥ दूसर युग तब भौ विश्वासा । दूसर पहर तत्त्व प्रकाशा ॥ तेज लगन श्वासा अनुसारी । ताते त्रेतायुग संचारी ॥ त्रेता युगकी पखुरी चारी । चार घरी युग चार विचारी ॥ जस युगअंत सतयुगमों देखा । सोई युग त्रेतामों लेखा ॥ जब जब अंत होय युग केरा । तब तब नादकाल घन घोरा ॥
नं. ८ कबीरसागर - ७
( १९४ )
बोधसागर
त्रेता युगमें कलह अपारा । यज्ञ दान व्रत नेम अचारा ॥ तेहि पीछे द्वापर युग आवा । काल अंत तब आन समावा ॥ अहंकार तामें अति भाखा । अब कलयुगकी वणों साखा ॥ काम क्रोध और पाप अपारा । लोभ मोह यम कीन्ह पसारा ॥ एक पहर चारों युग जाना । ताको वर्ण कहों बिछलाना ॥ पांच तत्त्व तीनों गुण कहिये । ताते पिंडकी उत्पति लहिये ॥ अष्टधात कहिये अस्थूला । ताते रचो गर्भको मूला ॥ शिवकी श्वासा वायु सरूपा । सक्ती गहे जानके रूपा ॥ शिवको रूप शक्ति गहि लेई । तब सांचा मो जावन देई ॥ जावन जगे तब सांचा माहीं । थाका होय रुधिरके ताहीं ॥ तेहि थाकाकी रचना भारी । तीन लोककी विभो सवारी ॥ महल मध्य पुनि जीव समावा । जलके भीतर महल बनावा ॥ महलके माहिं बनाये छजा । तामो दश कीन्हों दरवजा ॥ सांचा अन्न जरे नहिं कबहीं । पिंड सवारो अन्तर जबहीं ॥ सांचा माहिं दियो रंग ढारी । नख सिख शोभा बहुत सवांगी ॥ तीनों लोक रचो पलमाहीं । गढ़पति अंश तब साजा ताहीं ॥ प्रथमहि सायेर सात सँवारा । पर्वत आठ कीन्ह अधिकारा ॥ अठारह गंडा नदी बहाई । तामह गुप्त बहे ठहराई ॥ अठारह सहस्र बनाये नारा । अष्टधातुले साज सुधारा ॥ रक्त हांडको सब अस्थूला । बाढ़े लिंग सवांरे मूला ॥ आगे रचो दोह भुज देडा । सातद्वीप पृथ्वी नौखंडा ॥ बहुर सँवारो दोय पग खंभा । मदन महाबल उपजो रंभा ॥ नासा चढाय मस्तक पर लाई । सातभैंवर नौनाट लगाई ॥ उत्तर मेर शिर जो अस्थूला । सरवर माहिं कमल बहु फूला ॥ नाभी माहिं दल चार बनाई । फूल फल बास घट छाई ॥
पञ्चमुद्रा
( १९५ )
आठो अंग रचो अस्थूला । शिव शक्ती दोनों समतूला ॥ सोई अंग शक्त सोह ईसा । एकै रूप एक समदीसा ॥ नख सिरख रचो गर्भस्थाना । सातद्वीप नौखंड बखाना ॥ प्रथमहि ब्रह्म द्वीप निरमावा । ताऊपर बहु रचना लावा ॥ एकद्वीप नौखंड बनाई । त्रिकुटी सात तहां निखाई ॥ एकद्वीपमहैं सातो नाला । सातोनाल सात हैं चाला ॥ सरवर सात कमल है साता । रंग पांच पांचौ उत्पाता ॥ त्रिकुटी मध्य एकहै कीला । तहां देखिये रंगरसीला ॥ ता कीलामह कानी लागी । पवन सनेह आत्मा जागी ॥ ता कीलामह लागी डोरी । खूटा लगा पवन झकझोरी ॥ झूले मन पवन झूलावै घेरी । एक घर झून्य एक घर फेरी ॥ खूटा होयके पवन झकोरी । इंगला पिंगला सुखमण जोरी ॥ रविशशि पवन गहे मन जोरी । खूटा लाग पवनकी डोरी ॥ मेरे डंडपर खूटा गाड़ा । नदी तीन ताऊपर बाड़ा ॥ खूटातरे नदीत्रिय बहई । तीननदी बिच खूटा रहई ॥ खूटाके दहिने दिश गंगा । अति शीतल बहे नीर तरंगा ॥ सूरसनेह नीर हिय पसैं । सुरतसनेह धनी तहैं दसैं ॥ खूटाके है बांये अंगा । यमुना नदी बहे अतिरंगा ॥ सुखमन सरस्वती नीर तरंगा । लहर लालच तेज विष अंगा ॥ तहां बसे सरयू तेहि साथ । रावल एक बयालिस हाथा ॥ काल अनन्त रूप रस नाथा । बसे अथर दीखे नहिं माथा ॥ बाढी नदी दोह विकरारा । शीतल तेज बहे दोउ अधारा ॥ तिसरी नदी गुप्त पर्वाहा । अविगत जल बहेअगमअथाहा ॥ खूटा तरे होय नदी सिधारा । चली सरस्वती फोरि पहारा ॥ मध्य लहर रस विषके खानी । गंगा यमुना बीच समानी ॥
( १९६ )
त्रिधसागर
त्रिकुटी संगम भयो मिलाना । भवर गुफा माधो करथाना ॥ त्रिवेणी तट बसे सुदंगा । ताको मम लखा परसंगा ॥ गणगंधर्व मुनि सब कर थाना । सुर नर मुनि कर बैठे ध्याना ॥ तैतिस कोट देव मुनि भारी । यक्ष यक्षणी देव कुमारी ॥ नागसुता अपसरा मोहिनी । चढ़ विमान सब फिरे जोहिनी ॥ असुरपिशाचऋषनागजोलाहल । त्रिवेणीतट करे कोलाहल ॥ तीनलोक जौ जीव निवासा । सो सब करो त्रिवेणी बासा ॥ त्रिवेणी तट माधौ देवा । सब मिल करे तासुकी सेवा ॥ ताहि प्राग होय चलो प्रवाहा । गंगासागर संगम जाहा ॥ देश देश गंगा फिर आई । घाट घाट बहु क्षेत्र बँधई ॥ जहां तहां तप ध्यान लगावै । योग यज्ञ तप बहुत करावै ॥ ऋतुबसंत प्रागको धावै । मकर नहाय बजार लगावै ॥ अर्ध उर्ध बिच लागी हाटा । भीतर बाहर औघट घाटा ॥ गर्भमाहि सब युक्ति बनाई । तीन कचहरी तहां लगाई ॥ जहां नदी संगम पर्वाना । तहवां रचो एक अस्थाना ॥ संगम बीच गुफा एकधारा । ताहि गुफामों सात है द्वारा ॥ एकद्वार होय नाद सूधारे । एकद्वार होय रूप निहारे ॥ एकद्वार होय वास बसावै । एकद्वार होय अग्नि समावै ॥ एकद्वार हो स्वाद लिवाने । एकद्वार होय न्याय चुकावै ॥ एकद्वार होय नाद उचारा । योग जीव यह मता विचारा ॥ सातनाल चौदह सुरभाऊ । सातोंके हैं एक सुभाऊ ॥ सातो सात शून्य में बासा । सातो बसे गुफाके पास ॥ अनहद भेद श्वासाकी धारा । ताको भाषतहों व्यवहारा ॥
साखी-रचना भाषेउ पिंडकी, श्वासा सहित विचार । बिरलाजन कोई परखि है, अलखरूप व्यवहार ॥
पञ्चसुदृढा
( १९७ )
सुक्ति वचन-चौपाई
सुक्ति कह सुन सत्यगुरु ज्ञानी । अगम कथा कहीं अन्तरयार्मी ॥ और कथा अब मोसों भाषों । जो पूछों सो गीय न राषों ॥ हंस अवधको भेद बतावो । तास मर्म सब मोहि सुनावो ॥ आगम वरष मासषट जानो । तो कछु अपने निजमत ठानो ॥ ताको भेद कहों समुझाई । सो मोहि सतगुरु भेद लखाई ॥
योगजीत वचन
सुक्ति सुनो सत् मम वानी । भिन्न भिन्न मैं कहों बखानी ॥ पाचघरी बांये सुर पाई । सोई दहिनो श्वासा चलाई ॥ दशश्वासा सुखमन जो कहिये । ताको भेद बराबर लहिये ॥ आठ पहर पिंगला सुर हालै । बरष तीसरे हंसा चालै ॥ आठ दिवस दहिनो सुर बहै । हंसा अवध वर्ष दोय रहै ॥ सोरह दिन पिंगला सुर बोले । वर्ष एक मो हंसा डोलै ॥ वीस रैयन दिन दहिनो पाई । तब षट मासमें हंस चलाई ॥ एकति सरोज दक्षस्वरको जानो । तब दोय दिनमें हंस पयानो ॥ पांचघरी सुखमन जो हालै । पांचघरी मो हंसा चालै ॥ चन्द सूर सुषमन छपजाई । सुखसे तीजो पवन चलाई ॥ ऐसी विधि पवन चलाई । पहर माहिं हंसा चल जाई ॥
साखी-धूम मंडल दीखे नहीं, जोत न नेत्र लखाय । छठे मास हंसा चले, बचै न कोट उपाय ॥ छाया शीस दीखे नहीं, भुजा शिखर ना दिखाय । दीप बास आवै नहीं, छठे मास चल जाय ॥ गगन शब्द गरजे नहीं, नेत्र गुञ्ज छपजाय । मास एकके अवधमें, हंसा तन तज जाय ॥ भैवरगुफा तिल ना लखे, पुतरी जब चढ़जाय । पहर एकमें जानिये, हंसा तन तज जाय ॥
( १९८ )
बोधसागर
सुक्रित वचन चौपाई
सुक्रित कहे सुनो गुरु ज्ञानी । आगम पचै सब हम जानी ॥ और एक पूछौं गुरु तोही । भिन्न भिन्नके भाखौ मोही ॥ जीव ब्रह्म कैसे प्रगटाई । सबके उत्पत्त देहु बताई ॥ ताकर भेद गोंय जिन राखो । सत्य सत्य सब मोसो भाखो ॥
कौतुक
कौन सो मन है कौन पवन है कौन शब्द है भाई । कौन प्रान है कौन हंस है कौन ब्रह्म ठहराई ॥ कौन काल है कौन जीव है कौन शून्य पहिचानी । कौन शिव है कौन निरंजन कहो सकल उत्पानी ॥
योगजीत वचन
चंचल मन है श्वास पवन है शब्द शून्य पहिचानी । प्राण निरंतर अखल ब्रह्म है सोहंग हंस बखानी ॥ कारण काल शून्य अविनाशी जीव कर्म पहिचानी । जीव शक्ति करतार निरंजन ऐसा भेद बखानी ॥
सुक्रित वचन
मन कहाँ रहे पवन कहाँ वासा शब्द वास कहैं कीन्ह । कहाँ प्रान कहैं ब्रह्म वास है हंस कहाँ है लीन्ह ॥ कारण काल केहि ठोर बसत है कहाँ शून्य ठहराई । जीव शीव निरंजन वासा सो मोहि देहु बताई ॥
योगजीत वचन
हृदे मन है नाभि पवन है अनहद शब्द को वासा । निरन्तर प्राण ब्रह्म ब्रह्मण्डे गगन हंस पर्काशा ॥ सकलमें काल शीव चंदामें शून्य निरूपम माही । सुखमन मध्य निरंजन वासा योगी देखे ताही ॥
पञ्चमुद्रा
( १९९ )
सुक्ति वचन
इन्द्री नाभी तब नाहीं स्वामी पवन कहा तब बासा । जादिन अनहद रूप नहीं तब शब्द कहाँ पकीशा ॥ ब्रह्मांड ना तो तब ब्रह्म कहाँ तो गगन नहीं कहाँ हंसा । निरूपम विना शून्य कहाँ कहिये भेद कहौं प्रकाशा ॥ आकार नहीं तब जीव कहाँ तो चन्द नहीं तब शीऊ । सुखमन नहीं तब कहाँ निरंजन ससुझाय कहो सब भेऊ ॥
योगजीत वचन
इंद्री विन मन हतो निरूपम निराकारमें प्रवना । अलख रूपमें शब्द बासतो अविगतिमें तब प्राना ॥ अविनाशीमें हंसबास तो शून्य कालमें बासा । ऊँकारमें काल बास तो ऐसा भेद प्रकाशा ॥ जीव शीवमें प्रथमो बासा शीव निरंजन माहीं । सबको बास प्रकट कर भाखों भेद कहैं तुम पाहीं ॥
सुक्ति वचन
कहाँते उत्पत भयो निरंजन कहाँ शीव उत्पानी । काल जीव कहाँते प्रकटो शून्य भयो केहि खानी ॥ कहाँते उत्पत भये अविनाशी कहाँते उत्पन हंसा । कहाँते उत्पन ब्रह्मभयो है प्राण भयो कह अंशा ॥ शब्द पवन मन कहाँते उत्पन कहाँते प्रकटो जीऊ । सबके उत्पन मोसों भाखों केहिबिधि प्रकटो शीऊ ॥
योगजीत वचन
आदि ब्रह्मते भयो निरंजन तहाँते प्रकटो शीऊ । तौन भेद तुमसों कहो सुक्ति शिवते उपजो जीऊ ॥ जीवते उत्पत काल भयो है कालते भयो ओँकारा । ओँकारते शून्य भयो है शून्यते जोत प्रकारा ॥
( २०० )
बोधसागर
जोत ब्रह्मते सब प्रकारा अगम भेदको कहो विचारा । अखंड रूपते भयो अविनाशी अविनाशी ते हंसा ॥ शब्दते उत्पत्त पवनकी है पवनते स्वांसा अंशा ॥
सुक्ति वचन--चौपाई
अन्तकाल जब आवे भाई । तन छूटे मन कहाँ समाई ॥ पवन शब्द हंसा कहाँ सिधाई । अन्तकाल कहवां ठहराई ॥ कालशून्य तब कहा समैहै । जीव शीव कहवां चल जैहै ॥ अन्त निरंजन कहो समाई । ताको भेद कहौ समुझाई ॥
योगजीत वचन
तन छूटे मन जोत समाई । पवन श्वांसमें तब खप जाई ॥ प्राण समय शब्दके माहीं । हंस ब्रह्ममें तब खपजाहीं ॥ अविनाशी शिवमाहे समाई । ब्रह्म अलखमें तब खप जाई ॥ अलख अनुपमों जाय समाना । अन्त प्रलैको भेद बखाना ॥ उत्पत्त सकल भाष हम दीना । ताको भेद लखो पवीना ॥ सत्य सत्य यह बानी जानो । आदि वचन यह तुम निर्वानो ॥
सुक्ति वचन--चौपाई
हे समर्थ मैं तुम बलिहारी । खोल भेद अब कहौं बिसारी ॥ केता प्रवान लोक अस्थाना । ताको भेद कहौं निर्वाना ॥ संख्या योजन ताकी भाखो । ताकर भेद गोय जनि राखो ॥ कहाँ कौन सो पुरी रहाई । कौन अंश तहाँ आसन लाई ॥
साखी-सब उत्पत्त तुम भाषिया, भेद कहेउ समुझाय । अब मन मो निश्चय भई, आगम भेद लखाय ॥
योगजीत वचन
साखी-योजनकी मरजाद बहु, आगे जो पवीन । अंशसहित अब भाखेल, तिनको नाम बखान ॥
पञ्चमुद्रा
( २०१ )
चौपाई
अब मैं कहौ लोककी बानी । निरगुण भेद कहौ बिलछानी ॥ प्रथमहि कुम्भ रूप औतारा । पीछे सकल सृष्टि विस्तारा ॥ योजनकोट एक सुख कहिये । कोट पचास पीठ तेहि लहिये ॥ एक कोटको मस्तक जाना । कोटकोटके अन्त बखाना ॥ एक कोटपर नेत्र बताई । सोरा माथ चौसठ हाथ पाई ॥ पृथी ते दून कुम्भ है भाई । पूरबदिशि सुख बरन भुनाई ॥ उंचास कोट पृथ्वी पर्वाणा । ताके तरे कुम्भ अस्थाना ॥ बहुर अष्ट दिगपाल बखाना । कुम्भ पीठपर है अस्थाना ॥ चौसठ पुंडरीक तहां कहिये । बावन लक्षको मस्तक लहिये ॥ छयकोट ऊचे प्रमाना । कुम्भ पीठपर कीन्हों थाना ॥ ऊपर कुम्भ शेषको जाना । पंद्रह कोट ताहि प्रवाना ॥ तहां वासुककी बैठक कहिये । और वराहु तासुपर लहिये ॥ ताकी डाढ़ पृथी ठहराई । राई प्रवानसो दीखे भाई ॥ पर्वत अष्टपृथी पर जाना । मध्यपृथी सुमेर बखाना ॥ सोरह सहस्र नीचे बधाना । एता योजन तरे समाना ॥ बीस सहस्र योजन चौरासी । चार दिशा तेहि फेर रहासी ॥ चौरासी सहस्र योजन प्रवाना । इतना ऊँच सुमेर बखाना ॥ तापर चारपुरी हैं भाई । अमरपुरी पुन तहां बनाई ॥ तहां इंद्र सुखराज कराई । तीन देव अस्थान बताई ॥ तैत्तिस कोट देवता जाना । अठासी सहस्र ऋषि प्रवाना ॥ तहां कुबेर भंडारी कहिये । अलकापुरी नामसो लहिये ॥ नौ पदुम नील अठतालिस । चौत्तिस पर्व अर्ब उनतालिस ॥ सतावन कोट कहौ प्रवाना । पैंसठ लाख कहो बंधाना ॥ पञ्चानवे सहस्र और तहां कहिये । पचास एकसो योजन लहिये ॥
( २०२ )
बोधसागर
एता योजन कहो प्रमाना । पृथ्वी अकाशको अन्तर जाना ॥ एता स्याम अंड पहिचानी । आगे और अबलोक बखानी ॥ पृथीते लक्ष योजन बंधाना । तहवां सूरज देवको अस्थाना ॥ सूरजते चन्दलोक है भाई । योजन लक्ष आगे चल जाई ॥ चन्दलोकते आगे जाना । योजन लक्ष नक्षत्र बखाना ॥ योजन लक्ष आगे चलजाई । ताके आगे भौम बताई ॥ भौमके आगे बुध अस्थाना । योजन लक्ष आगे प्रवाना ॥ बुधके आगे गुरु पहिचानो । योजन लक्षमें ताहि बखानो ॥ गुरुके आगे शुक्र बताई । योजन लक्ष कहों ठहराई ॥ शुक्रके आगे शनिको जाना । लक्ष योजन आगे पहिचाना ॥ शनिके आगे अदित बखाना । योजन लक्ष कहो प्रवाना ॥ तेहिके आगे सोम कहीजै । सोमके आगे राहु लहीजै ॥ राहु केतु लोक अस्थाना । योजन लक्ष आगे बंधाना ॥ तहाँते लक्ष योजन प्रवाना । तहवां सप्तऋषीश्वर जाना ॥ तेरह लक्ष ऋषिन सो भाई । आगे विधिको लोक बताई ॥ तहाँते लक्षयोजन बंधाना । महाविष्णु आगे पर्वाणा ॥ श्रीनारायण बैठे जहँवा । सूवा ऊपर पालंग तहँवा ॥ पग अगुष्ट मुख दीन्हों सोई । बालरूप तहाँ कीन्हों जोई ॥ तहाँते गौलोक कहावे भाई । राधा सती तहाँते आई ॥ सोई नाम अर्चित कहावे । सच्चिदानन्द ताहि गोहरावे ॥ इहालंग सगुणरूप बतलाई । यही चारों वेदन गुन गाई ॥ आगेको कछु भेद न पाई । इहालंग सबही मिल गोहराई ॥ तैंतिसकोट इहालंग गावै । आगेका कछु भेद न पावै ॥ चारमुक्तका कहे बखाना । यही रूपको करे पर्वाणा ॥ बहुते तेज उहालंग जाई । प्रले समै नाश होय भाई ॥
पञ्चसुत्रा
( २०३ )
नौ औतार देहधर आवा । सो अचितके अंश कहावा ॥ जहाँलग अंश सकल पुन देखा । तहाँलग मायारूप विशेषा ॥ आगे अक्ष लोक है भाई । तहाँ गये फिर बहुरि न आई ॥
साखी-इहाँलग सरगुण रूप है, सो हम दीन्ह लखाय । जग नहि जानत तासको, निरगुणके कोधौँ आह ॥
सुक्ति वचन--चौपाई
हो समर्थ तुम अगम अपारा । तुम हो निरगुणके औतारा ॥ अब आगेको भेद बताई । लोक पुर्ष सब वर्ण सुनाई ॥ जहवाँ हंस जाव ठहराई । बहुर नहीं प्रलैतर आई ॥ ताकर भेद कहो समुझाई । अगम निगम सब वर्ण सुनाई ॥
साखी-सतगुरु भाषो आदिते, लोकन को पर्वान । केता अन्तर ताहिको, पुर्ष भेद निरवान ॥
योगजीत वचन--चौपाई
हेसुक्ति मैं कहां बखानी । वणौ अगम निगमकी बानी ॥ अचितलोकमें दीन्ह बताई । लोकालोक सब वर्ण सुनाई ॥ अब भाषों निरगुणको लेखा । योजन संख्या लोक विशेषा ॥ अचितके आगे लोक बखानो । तीनअंशख योजन पहिचानो ॥ सोहंगलोक तहाँ है भाई । आठ अंश तिनते उपजाई ॥ सोहंग पुरुष है अगम अपारा । जगर मगर जहाँ हैउजियारा ॥ सोहंग पुर्षके आगे जाना । मूल नाम तहाँ पुर्ष बखाना ॥ पांच असंख योजन प्रमाना । तहवाँ मूलनाम बंधाना ॥ मूलनाम तहं आमन कीन्हा । आदि पुर्षके अंश जो चीन्हा ॥ मूलपुर्ष है अगम निसानी । तास भेद मैं कहां बखानी ॥ मूलपुर्ष ते आगे जाना । अंकुर नाम तहाँ पुर्ष बखाना ॥ तीन असंख आगे है भाई । अंकुरनाम तहाँ पुरुष रहाई ॥
( २०४ )
बोधसागर
ताको उग्रलोक है भाई । तहां अंकूर उदित रहाई ॥ अंकूरलोकते आगे जाना । इक्ष नाम तहां पुर्ष बखाना ॥ चार असंख योजन प्रमानी । इक्ष्या पुर्ष तहां रजधानी ॥ सोई पुर्ष कर्ता होयं आवा । आदपुर्षके अंश कहावा ॥ प्रथम पुर्षकी इक्ष्या आई । ताते इक्ष्या नाम कहाई ॥ ताहि पुर्षको कहां ठिकाना । है सुकित तुम सत्तही माना ॥ इक्ष्या आगे लोक बखानो । सोतो अंश पुर्षको जानो ॥ नौ नील एक संख बखाना । बानी नाम पुर्ष स्थाना ॥ पुर्ष प्रथम बानी उच्चार । ताते नाम सर्व आकारा ॥ ताहि पुर्षको भेद बताई । एतो आद पुर्ष हैं भाई ॥ बानी नामते आगे जाना । सहजनाम तहां पुर्ष बखाना ॥ दशलाख एकशंख बखाना । सहज पुर्षको तहां अस्थाना ॥ तहवां सहज पुर्ष है भाई । आदिपुर्षके अंश कहाई ॥ सातपुर्ष इहांलग जाना । निरंजन अक्षर नीचे थाना ॥ अचितसौ अक्षर उपजे भाई । निरंजन अंश अक्षरते आई ॥
साखी-निरंजन और सहजलों, नौ पुर्ष प्रमान । आदिपुर्ष आगे कहां, जितने सब उत्पान ॥
सहज अंशलग जैतिक भाषा । सो रचना परलयतर राषा ॥ इहांलग प्रलैको प्रमाना । आगे अक्षैलोक अस्थाना ॥ सहज पुर्षते आगे जाई । आदिपुर्षको लोक दिखाई ॥ सहजते एक असंख प्रवाना । तहवां आदिपुर्ष निरबाना ॥ तहँवा प्रलैकालकी छाया । नहीं तहां कछु मोह और माया ॥ तहां न तीनों गुनका भेषा । ब्रह्मा विष्णु तहां न महेशा ॥ नहीं तहां जोत निरंजन राई । अक्षर अचित तहां नहि जाई ॥ तहां नहीं शिवशक्ती औतारा । नहीं तहां अक्षर ओकारा ॥
पञ्चमुद्रा
( २०५ )
ब्रह्मजीव नहीं तत्त्वकी छाया । नहिं तहैं दशइंद्री निरमाया ॥ काम क्रोध मद लोभ न कोई । तहवां हर्ष सोग नहिं दोई ॥ नादबिंदको तहां न पानी । नहीं तहैं सृष्टि चौरासी जानी ॥ चंद सूर तारागण नाही । नहीं तहैं दिवस रैनकी छाहीं ॥ ज्ञान ध्यानको तहां न लेषा । पाप पुण्य तहवां नहीं देषा ॥ डार मूल तहां वृक्ष न छाया । जीव सीव तहांकालन काया ॥ पवन न पानी पुरुष न नारी । हृद अनहृद तहां नहीं विचारी ॥ यंत्र मंत्र तहां दरद न धोखा । नर्क स्वर्ग संशय नहिं शोका ॥ श्वेत पीत सबज नहीं लाला । मोर सोर नहीं वृद्ध ना बाला ॥ पिंड ब्रह्मांडको तहां न लेखा । लोक अलोक तहां नहीं देखा ॥ मन औ वृद्ध पवन नहीं जाना । रचना बाहिरसो अस्थाना ॥ आदि पुरुषको है तहां थाना । यह चरित्र एकौ नहीं जाना ॥ हे सुकृत मैं तुम्है लखावा । निरगुणरूप वर्ण दर्शावा ॥
सुकृत वचन
हो सतगुरु तुम आगम भाषा । वर्णैउ पेड़ पत्र अरु शाखा ॥ अब तुम कहो पुरुषको रूप । कैसी कला हे कौन स्वरूपा ॥ लोक प्रकाशको भेद बतावो । लोक प्रमान मोहि समुझावो ॥ यामैं कछु न राखो गोई । है समर्थ अब भाषो सोई ॥
सार्वी—आदि पुरुषके रूपको, कहो भेद समुझाय ।
लोक प्रमान मरजाद सब सो मोहि देहु बताय ॥
योगजीत वचन—चौपाई
प्रथम पुरुषको रूप बखानो । सो तुम रूप हृदयमें आनो ॥ पुर्षअंग छबि वर्ण सुनाई । गुप्त भेद मैं तोहि लखाई ॥ पुरुष शोभा अगम अपारा । ताको को अब बरणे पारा ॥ कोट अनन्त योजन लौ काया । कहाँ लग कहों तासुकी छाया ॥
( २०६ )
बोधसागर
कछु संक्षेप मैं देऊँ बताईं । कहाँ कहीं कछु वर्णि न जाईं ॥ कोटि कल्प युगजाय सिराईं । मुख अनन्तसो वर्णि न जाईं ॥ ये कछु सूक्ष्म रूप लखाऊँ । कछु कछु शोभा वर्णि सुनाऊँ ॥ अब मस्तकको बणों भेषा । मानों अनंत भानु शशिलेखा ॥ जगर मगर मस्तक उजियारा । वर्णत बने न रूप अपारा ॥ अब नेत्रनको कहीं प्रमाना । मानो अनन्त भान शशि जाना ॥ जिमि कोटिन दामिन लपटानी । जोत अनंतनकी जिमि खानी ॥ वर्णत बने न ताको रंगा । कहाँलग कहीं तास प्रसंगा ॥ नासारूप कहीं प्रचंडा । मानो अन्न अनन्त ब्रह्मंडा ॥ पोहप बास तहांति प्रकटाईं । ब्राण अनंत योजन लग जाईं ॥ श्रवणरूप मैं कहीं बखानी । अनंत सिंध मानो समानी ॥ ता मह कमल अनन्तन फूला । साखा पत्र डार नहीं मूला ॥ ताको शोभा वर्णि न जाईं । कमल रूप तहां अधिक सुहाईं ॥ अब मुख शोभा कहीं बखानी । पिंड ब्रह्मांड तेहिमाहिसमानी ॥ नौ शून्य जहां लग बासा । सो मुख भीतर कीन्ह निवासा ॥ लोक अनंत देखिये ताही । सर्वाकार रूप है जाही ॥ पुर्ररूपका बणों भाईं । वर्णत बने न होय दिठाईं ॥ पुरुष शोभा अगम अपारा । मुख अनंत नहीं पावे पारा ॥ चिकुर शोभा कहीं बुझाईं । कोटिन रवि शशि रोम लजाईं ॥ कोटिन चंद सूर प्रकाशा । एक एक रोम अनन्तन भासा ॥ पुरुष अंगका करौ बखाना । रचना कोट तासुमों जाना ॥ श्वेत अकार पुरुषको अंगा । फटकबर्ण देहीको रंगा ॥ शब्द स्वरूप पुरुष है भाईं । वणों कहा वर्ण नहीं जाईं ॥ जहां लग जीव बुन्द है भाईं । ताकर भेद कहीं समुझाईं ॥ जीव अनन्त बुन्द सम जानो । अमी सिन्धु पुरुष पहिचानो ॥
पञ्चसुत्रा
( २०७ )
यह प्रमान पुर्षको जाना । सो अब तनमों कहों बखाना ॥ सूक्षिम रूप गगनमों वासा । ताहि रूपको कहों प्रकासा ॥ तनभोरूप जो सूक्षिम जानो । सोई रूप बाहिर पहिचानो ॥ जो भीतर सो बाहिर कहिये । एकप्रमाण रूपसो लहिये ॥
साखी-बारूके दशअंश कर, ताकर बिस्वा बीश ।
ताहूते सूक्षिम कहो, इम प्रकटो जगदीश ॥
लोक समानो पुर्षमो, पुर्षहि लोक समान ।
पुर्ष निरंतर लोक है, लोक पुर्षमो जान ॥
सुक्ति वचन-चौपाई
हो समर्थ मैं तुव बलिहारी । सर्व भेद तुम कही विचारी ॥
अब प्रभु कहो ध्यानको लेखा । जेहिते रूपहि पुर्षको देखा ॥
ताको नाम मंत्र उपदेसा । सो सत्गुरु अब कहो सँदेसा ॥
सोई मंत्र गुरु देहु बताई । जाके बल हँसा घर जाई ॥
करनी योगकी रहनी आशा । हँसा करे लोकमों वासा ॥
सोई नाम गुरु देहु बताई । मेरो हंस लेहु मुक्ताई ॥
और रहनी हँसनकी भाखो । मोसों गोय कछू जनि राखो ॥
कौन नेहते हँस कहाई । कौन नेहते लोक समाई ॥
योगजीत वचन
सुक्ति सुनो सत्य मम बानी । जैसी रहन हंस पहिचानी ॥
तास रहन अब वर्ण सुनाऊँ । नेह प्रेमकी उक्त लखाऊँ ॥
जैसे सीप स्वात करे नेहा । लागी प्रीत भूल निज देहा ॥
जैसे त्रिया पुर्षको चाहै । या विधि संत ध्यान औगाहै ॥
जैसे चात्रिक बुंद पुकारा । सोई लगन संत अधिकारा ॥
जैसे बासको भँवर लोभाई । योजन एक तहां उड़ जाई ॥
जैसे चंद चकोर हुलासा । ऐसे संत पुर्षको आसा ॥