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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

( १२ )

बोधसागर

अधर दरिआव धसेको मीलिया, बाहिरा भीतरा एक पानी । कहैं कबीर यह खेलदरिआवका, योग अवधूतकी यहै बाणी ॥ शशि प्रकाशते सूर उगासही, तूर बाजै तहाँ संत झूले । तत झनकार तहाँ नूर वर्षत रहै, सरस पीवै तहाँ पांच भूले ॥ दरिआव और बुन्दज्यो देखअन्त नहीं, जीव अरुशीवयो एकआही । कहैं कबीर यह सैन गुंगा तणी, वेद कितेबकी गम नाही ॥ अगम स्थान गुरुज्ञान बिन नाल है, लहै गुरुज्ञान कोइ संत पूरा । द्वादशां पलटि करि षोडशां प्रकटै, गगन गजै तहाँ बजै तूरा ॥ ईड़ा पिंगला सुषुमना समकरै, अर्ध अरु उर्ध विचध्यानलावै । कहैं कबीर सोइ संत निर्भय रहै, कालकी चोट फिरनाहि खावै ॥ अधर आसन किया अगमप्यालापिया, योगको मूलगहि युक्तिपाई । पंथ बिन चलिगये शहर बेगम्य पुरा, दया गुरुदेवकी समझि आई ॥ ध्यान धरि देखियानैन बिनुपेखिया, अगम अगाध सब कहत जाई । कहैं कबीर कोइ भेद विरला लहै, सो कहैया भेद भाई ॥ शहर बेगम्य पुरागम्य कोई ना लहै, होय बेगम्य सोई गम्य पावै । गुननकी गम्य ना अजब बिश्राम है, सैनको लहै सोइ सैनगावै ॥ मूक बाणी तिको स्वाद कैसे लहे, स्वाद दावै सोई सुख मानै । कहैं कबीर या सैन गुंगा तणी, गुंगा होय सो सैन जानै ॥ अधरही ख्याल अरु अधरही कल है, अधरके बीच तहाँ मठकीया । खेल उलटा चला जाय चौथे मिला, सिन्धुके मुख फिर शीस दीया । शब्द घंघोर टंकोर तहाँ अधर है, नूरको परास करि पीव पाया । कहैं कबीर यह खेल अवधूतका, खेलि अवधूत घर सहज आया ॥ छका अवधूत मस्ताना माता फिरै, ज्ञान वैराग्य सों छका पूरा । श्वास उश्वासका प्रेम प्याला पिया, गगन गजै तहाँ बजै तूरा ॥ पीठ संसार सो राम राता रहैं, यतन जरना लिया सदा खेले ।

आत्मबोध

( १३ )

कहैं कबीर गुरु पीरसूं सुखसुख, परम सुख धाम तहाँ प्राण मेलै॥ छकासो थका फिर देह धारे नहीं, करम कपाट सब दूर कीया । जिनश्वासउश्वासका प्रेमप्यालापिया, नामदरि आवतहाँ पैसिजीया ॥ चढीमतबालिया औरहु आमनसावता, फटिकज्यों फेरिनहिं फूटजावै। कहैं कबीर जिनवासनिर्भय किया, बहुरि संसारमें नाहिं आवै ॥ तरक संसार सो फरक फुक्र सदा, गरक गुरुज्ञानमें युक्ति योगी । अरध अरु उरधके बीच आसन किया, बंक प्यालेपीवे रस भोगी ॥ आधा दरिआव जहाँ जाय डोरिलगी, महल वारीकका भेदपाया। कहैं कबीर यों संत निर्भय हुआ, परमसुख धाम तहाँ प्राणलाया ॥ चमड़ी मतबालि तहाँ ब्रह्म भाठी झरै, पिपै कोह सूरमां शीसमेलै। पांचको मेलि सैतानको पकड़ि करि, प्रेमकाप्यालाअधर झेलै ॥ पलटिमनपवनको उलटिसूधाकंवल, अरधअरुउरधबिचध्यानलावै। कहैं कबीर मस्तानमाता रहै, बिनाकर तातियां नाद गावै ॥ आठही पहर मतबाली लागी रहै, आठही पहरकी छाक पीवै । आठही पहर मस्ता माता रहै, ब्रह्मकी छोलिमें संत जीवै ॥ साचही कहतअरुसांचही रहत है, काचको त्यागिकरि सांच लाग। कहैं कबीर यों सन्तनिर्भय हुआ, जन्मअरुमरनका भर्म भागा ॥ करत किलोक दरिआवके बीचमें, ब्रह्मकी छोलिमें हंस झूलै । अरध अरु उरधका एकवारा तहाँ, पलटिमनपवनको कमलफूलै ॥ गगन गजें तहाँ सदा पावस झरै, होत झड़रैन दिन बजै तूरा । बेनकितेवको गमनाहीं तहाँ, कहैं कबीर कोई रमै सूर। ॥ बजत करताल तहाँ नीरनिर्झरझरै, होत टकसाल तहाँ, शब्दपूरा । गैबकी मौन अरु ज्ञानका चांदना, शब्दअनहद तहाँ बजै तूरा ॥ होत ततकार तहाँ निरतनिशदिन करै, सुरतिमनपवनके बैठिछाजै । कहैं कबीर गुरुपीरकी मिहरिसूं, बिना बयबादले गगनि गाजै ॥

( १४ )

बोधसागर

गगनकीगुफातहाँ गैवाकाचांदना, उदयअरुअस्तका नाम नाही । दिवसअरुनैतहाँ नेकनहिं पाइये, परमप्रकाशका सन्तमाहीं ॥ सदा आनन्द दुख द्वन्द व्यापे नहीं, पूर्णानन्द भरपूर देखा । भ्रम अरु भ्रान्ति तहाँ नेकनहिं पाइये, कहैं कबीर रस एकपेखा ॥ खेल ब्रह्मांडका पिण्डमें देखिया, जगतकी भरमनादूर भागी । बाहिरा भीतराएक आकाशवत, सुषुप्ता डोरी तहाँ उलटिलागी ॥ पाँचको पलटिकरि शून्य मोघरकिया, धरामें अघर भरपूरदेखा । कहैं कबीर गुरु पीरकी हमरि सँ, त्रिकुटि मध्य दीदार पेखा ॥ देख दीदार मस्तान मन होरहा, सकल भरपूर है नूर तेरा । सुभग दरिआवजहाँहंसमोतीचुगे, कालका जालतहाँ नाहिनेरा ॥ ज्ञानकीपालिअरुसहजमतवालिहै, अघरआसनकिया अगमडेरा । कहैं कबीर तहाँ द्वैत भासे नहीं, जन्म अरु मरनका मिटाफेरा ॥ ब्रह्मदरियावतहाँ करतकिलोलमन, सुरतिकीसीपतहाँ शब्दमोती । गुरुपीरकीनिहरते भेदयह पाय है, मोतिया माँहितहाँ नाम जोती ॥ तिनयापरख कोइ जानिहैं जौहरी, कौडियावणिजनहिंपरखिआवे । कहैंकबीरकोइ होय मरजीबता, तोखेल दरिआवका हाथ आवै ॥ चितकीरचमककीप्रीतिकरि पथरिया, सुरतिकासोखताखूबलाया । अग्निको झारि अवधूतप्रचण्ड करि, कर्मसब काठले माँहि द्याया ॥ हुआ निर्धूमसब सकलसंसार मिटा, खुला कपाट तब घाटपाया । कहैं कबीरअब द्वैत दीखै नहीं, अखंड करूणा भई रामराया ॥ करियोगयमडाठउगालि करिदेहगुण, चतुर्दशभवनका लोग खाया । महाप्रलयकियाबीजकोईनारहा, रहाएकनिर्द्वन्दनहिंकालखाया ॥ खेल अगाधकोइ साधुभल पाइ हैं, महाप्रलय जिनकिया सोई । कहैं कबीर फिर उपजिविनशै नहीं, अहंमताजिनकुबुधि खोई ॥ कालकेजालके भेद नहिं राममें, कालकहाँ कौनको खाइ हैं रे ।

आत्मबोध

( १५ )

वस्तुमें वस्तुअरु तत्त्वमें तत्त्व मिलै, जीवका नामयो जायहैं रे॥ जन्म अरु मरनकी शंक नाही कछु, जन्म अरुमरनको पाइहैरे॥ कहैं कबीर यों संत निर्भय हुआ, बहुरि संसार नहिं आइहैं रे ॥ धेनु व्यावैतिको दूध भरवे नहीं, बाँझडी धेनुको दूध होई । बाँझडी धेनुको दूध पीवैतिको, होय सुख रूप ना मरै कोई ॥ बाँझडी धेनुको पुत्र पैदा हुआ, मरि मन मृगको माँस खावै । कहैं कबीर सो पुत्र हैं पाँगुला, चढ़ै आकाश फिर नाहिं आवै॥ ससुन्द उलटा तबै सीपमाहीं मिला, हुआ मोती तहां सीपमाहीं । जल बिनाहंसतहांसदामोती चुगै, ताहंसको कालकी चोट नाही॥ नदी उलटी तबै ससुन्द माहीं मिली, प्राण हंसा तहां सदा झूलै । कहैं कबीर कोइ भेद बिरला लहै, बिना जल केतकी कमल फूलै॥ नहरी काटि करि उलटि पाछे दर्द, ज्याथुं दरियावका सोटलागि। सदा सुख सिंधुमें माछल्लों झूलता, जन्मअरुमरनका भर्मभागा॥ रोमही रोम रसनीरको पीवता, नीरकी प्यासमें सदा जीवै । कहैं कबीर सुख सिंधु छाड़ै नहीं, खार दरिआवजलनाहिं पीवै॥ सुख सिंधुकेसीरका स्वाद तबपाइ हैं, चाहका चौतरा उठिजावै । बीजके माहिं ज्यों वृक्ष विस्तार है, यों चाहके माँहिसबरोग आवै॥ प्रौढ़ वैरागमें होय आरूढ़ मन, चाहके चौतरे आग दीजै । कहैं कबीर यों होय निर्वासनी, ततसो रत्न होय काज कीजै ॥ सूर प्रकाश तहां रैन कहाँ पाइये, रैनप्रकाश नहिं सूर भासै । ज्ञान प्रकाश अज्ञान कहैं पाइये, होय अज्ञान तहां ज्ञान नासै ॥ काम बलवान तहारांम कहैं पाइये, रमिरहा राम तहां कामनाहीं। कहैं कबीर यह तत्त्वविचार है, समझि बिचारि करि देख माहीं॥ कामकी कोथली मूलमें जलि गई, रामकी कोथली रहै प्यारे । राम विश्राम तहां काम कहाँ पाइये, कामविश्रामतहारांममन्यारे॥

नं. ९ कबीरसागर - २

( १६ )

बोधसागर

दिवस अरु रैन फिर एकठां ना रहे, ज्ञान अज्ञान नहिं एक होई । कहैं कबीर यह भेद जान्या बिना, जीव विश्राम क्यों लहै कोई॥ घुरत निशान तहां शून्यके बीचमें, रमत चौगान कोइ सन्त सूर। झूझ बिन झूझ अरु बूझ बिनु बूझना, पावविनपंथतहां बजै तूरा॥ नैन बिनु सैन अरु बैनबिनुबोलना, पाप प्रचंड तहां जाय चूरा । कहैं कबीर ये विकट सा खेल है, लहै कोइ सन्त गुरु ज्ञान पूरा॥ एक शामसेर एकसार बजती रहे, खेल कोई सूरमा सन्त झेलै । कामदलजीतिकरिकोधपयमालकरि, परमसुखधामतहां प्राणमेलै॥ शील सनाहकरि ज्ञानको खड़ले, आय चौगानमें खेल खेलै । कहैं कबीर सन्त जन सूरमा, शीसको सौंपि करि करम ठेलै ॥ पकड़ि शमशेर संग्राममें पैठिया, देह प्रयंत करि युद्ध भाई । काटि शिर बैरिया दाबि जहाँका तहां, आयदरबारमें शीस नाई ॥ करतमतवाली जहाँ सन्तजनसूरमा, घुरतनिशानतहां गगनि घाई । कहैं कबीर अब श्यामसो सुखरू, मौजदरियावकी भक्ति पाई ॥ तन बन्दूक अरु पवन दारू किया, ज्ञानगोली तहां खूब दाटी । सुरतिकी जामगीमूठ चौथेलगी, भर्मकी भीति तहां दूरिफाटी ॥ कहैं कबीर कोइ खेलिहैं सूरमा, कायरा खेल यह हाथ नाही । आसकी फाँसको काटि निर्भय भया, रामरमिरामरमि गर्क माहीं॥ ज्ञान शमशेरको बाँधि योगी चढ़ै, मारिमन मीररणधीर हूआ । खेतकोजीतिकरिपिसनसबपेलिया, मिलाहरिमांहि अबनाहिंजूवा ॥ जगतमें यश अरु दाद दगीहमें, खेलयो खेलिहैं सूर कोई । कहैं कबीर यह सूरका खेल है, कायरां खेल ये नाहिं होई ॥ सूर संग्रामको देखि भाजे नहीं, देखि भाजैतिको सूर नाही । काम अरुकोधमदलोभसोजूझना, मंडाघमसान तहां खेतमाहीं ॥ शील अरु साँच संतोषसहाई भये, ज्ञान शमशेर तहां खूब बाजै ।

आत्मबोध

( १७ )

कहैं कबीर कोइ जूझि हैं सूरमा, कायरा भीरु तहां धरडिभाजै ॥ शूर संग्रामको देखि सन्मुख मँडा, शीश दे नाथको साथ हुआ । कमदकीलो कियो फौजमांही पड़ा, पिसन पाँचुदलजीति जुवा ॥ ज्ञान शमशेर ले भूमि सवसर करी, जाय निर्बानपद किया बासा । कहैं कबीर रणधीर निर्भय हुआ, शीस जगदीश जगजीति खासा ॥ साधुका खेल तो विकटबैडा मता, सती औ सूरकी चाल आगै । सूर घमसान है पलकएक दोयका, सती घमसान पलकएक लागै ॥ साधु घमसान है रैन दिन जूझना, देह प्रयंत का काम भाई । कहैं कबीर टुकबाग ढीली करै, तो उलटि मनमगनसौ जमी आई ॥ साधु पद कहत तो बात अगाध है, साधु का खेल तो कठिन भाई । होयमरजीवता गत सब गुण करै, साधु पद भला तो हाथ आई ॥ अवनिकै गुण धरै रहत गिरि मेरुज्यों, किलाको देखि नहि छोभ पावै । कहैं कबीर कोइ रेख नहि ऊपजै, साधु पद भला तो हाथ आवै ॥ नाच आवै तबै काछको काछिये, नाचविनकाछ किस काम आवै । पहिरि सन्नाह धरि नाम रणजीतको, बेरघमसानके कूदि जावै ॥ उत्तरे नूर अरु श्याम नहि आदरे, दाद दर्गाह में नाहि पावै । सिंहकी खाल अरु चाल है भेडकी, कहैं कबीर तब सियालखावै ॥ ब्रह्म चौगान तहाँ ज्ञानकी गेंद है, रमत अवधूत कोई सन्त सूर । सुरतिके दंडसोफेरि मन पवनको, शब्द अनहद तहाँ बजे तूरा ॥ सदारसएकतहाँ मूठिनही विभचरे, कालसेतीलडै रैन दिन होय घमसानमाही । कहैं कबीर यह विकट बैड़ा मता, कायरा खेल का काम नाहीं ॥ सकल संसारमें एक चीपि फिरि, शील अरु सांच संतोष नाहीं । जगत अरु भेष सबएक नाकै चला, जत अरु सत्त कहाँ ठौर पाहीं ॥ दम्भपाषंड संसार सब मिलत है, सांचके शब्दको नाहि मानै । कहैं कबीर यह खेल बारीकहैं, साधुके राहको कौन जानै ॥

मो० सा०

( १८ )

बोधसागर

सकल संसार विषधारमें बहुत है, रहत कोइ सन्तजन नामराता । झूठ अरुकपटयेदूरिदिलते करे, तबजन्मअरु मरनका मर्म भागा ॥ सुखसार हृदयधरे छारसब पर हरे, इन्द्रिया द्वारते फिरै पूठा । कहैं कबीर सोइ सन्त निर्भय हुआ, जगतसंसार सो रहै रूठा ॥ राग अरु द्वेषते रहित हैं तेजना, यजना रामके रंग राते । महल बारीकमें सदा भीना रहै, प्रेम प्याला पिवे रस माते ॥ ज्ञान गलतान अरु अंग शीतलसब, धरामें अधरमिलिएकहुआ । कहैं कबीर महदादि अरु मठज्यों, घटा फूटै जबै माहि जूवा ॥ भेष दरिआवमें हंस भी होत है, भेषदरिआव तहाँ बग होई । भेषदरियाव तहाँ रतन भी होत है, भेषदरिआव तहाँ सङ्ग सोई ॥ जीवता मुये बिन भेद पावै नहीं, जीवता मरै सो भेद पावै । कहैं कबीर गुरुपीर पूरा मिलै, तब कछु नमूना दृष्टि आवै ॥ झूठ अरु सांचका तान कैसे मिलै, रैन अरु दिवसका फरकभारी । लौनअरु शकरएकहोतहैं, कहाँ खाँडकीजात कहाँ लवनखारी ॥ हंस अरु बगदोउ एकसे देखिये, चालके माहिती फरक भारी । कहैं कबीर वह हंस मोती चुगे, वगतो माछली दूँडिभारी ॥ साधुके संगते साधुही होत है, जगतके संगते जगत होवे । साधुके संगते परम सुख ऊपजे, जगतके संगते जन्म खोवे ॥ साधुके संगते परमपद पाइये, जगतके संग दुख होय भारी । कहैं कबीर यह संतका शब्द है, सुनोरे जीव सब पुर्ण नारी ॥ दरिद्री देख अवधूत है भरथरी, दूसरा दरिद्री नाहिं कोई । पांच अरु पचीसकूपलटि नाकैकिया, मनअरूपवनयेजातिदोई ॥ सदानिर्द्वन्दकोइद्वन्द व्यापेनहीं, अजरअमरानन्द अगम राता । कहैं कबीर यह दरिद्री देखिये, दूसरा दरिद्री नरक जाता ॥ सुखी अवधूत दुखी सब जगत है, रैनदिनपचतनहिं भूख भागे ।

आत्मबोध

( १९ )

ये सदानिर्द्वन्द्व कोइ द्वन्द्वव्यापेनहीं, गुरुदेवकेशब्दतेस्मृति लागी॥ तत्त्वस्मृति अरुगत सबगुण किया, प्रकटी अग्नि सब भर्म भागा । कहैं कबीर संसार सब गलत है, नहीं ज्ञानका ओढना सदा नागा । नरकका जीव सब नरकमें मिलरहा, नरकविन और नहिं बात आवै । नरकमें उपज्या नरकमें खपेगा, रैन दिन नर्कके माहिं ध्यावै ॥ शील अरु साँच संतोष सूझै नहीं, इन्द्रिया द्वार रस जहर पीवै । कहैं कबीर नर सही सो मरेगा, बिना हरि आसरे कहाँ जीवै ॥ नाम गुरुदेव अरु शिष्य है नारिका, कपिज्यों नाचता फिरत भाई । देत है ठान तब करत उनमाद नर, बन्दगी करत है चित्त लाई ॥ करत सँघार अरु खानको देत है, गुड अरु सूठ बूरा विसाई । कहैं कबीर यह अकिल अज्ञानकी, कहत गुरुदेव नहीं लाज आई ॥ बारहि बार मन पवनको सोधि नर, पाँच प्रमोधि करि नाम लीजे । भांग अरु तमाकू खाय अफीमको, कालके जालमें न्याय छीजे ॥ भांगकी तोरमें रैन दिन फूलिया, भजन प्रतापका सुख नाहीं । कहैं कबीर सुनु शब्द साँचा कहूं, समझविचार करि देख माहीं ॥ कहनको साथ अरु व्याध छूटैनहीं, कोटिमें पाव या देख भाई । खेत अरु कुवा फिर व्याज बाढो करै, बलधिया हाँक करि देत खाई ॥ नामको फेरि करि जगत धूता सबै, नागिनी नारि घर बार पूरा । कहैं कबीर मन माहि फूला फिरै, काल शिर बाजि है देख वूरा ॥ प्रतिग्रह झेलता डरता नाहिं है, कौन गति होइ है जीव थारी । होयगा ऊंट अरु बाड़िको चरैगा, सो डरता फिरैगा बन सारी ॥ पायकी पोटको डारिरे पापिया, पछै भी भार तलब है भारी । कहैं कबीर नर अंध चेतै नहीं, बात सांची कहूं लगे खारी ॥ साधु जो होय तो व्याधको नाश कर, व्याधके नाशते साधु होवै । वासना व्याधि सब जीवको दहत है, बिना गुरुदेव कह कौन खोवै ॥

( २० )

बोधसागर

कतरनी कपटदिलबीचते दूरिकरि, सांचकी नापनी हाथ लीजै । कहैं कबीर यों होय निर्बासना, निर्मला तत रस नाम लीजै ॥ मगनहोयविश्वासधरिध्यानअलेखको, लिखाहैलेखसोमिटैनाहीं । किया है कृत कहु मेटिको करिसकै, दुखअरुसुख या देहमांही ॥ टहलुवा संग दोय टहल करबो करै, आपनी आपनी बेरि आवै । कहैं कबीर यों जानि निर्भय रही, किया है कृत सो कहा जावै ॥ कियासो हुआ अरु करै सो होयगा, जीव क्यों कल्पताफिरैभाई । लिखाहै अंकसो मेटिको करिसके, बिनाहै रिजक सो दियाजाई ॥ गहो विश्वास एक समरत्थ धनीका, आनको छाड़ि अलेखधावो । कहै कबीर सब कल्पना दूरिकरि, पैसिदिलमाहि दिलदारपावो ॥ जीवको जक नहीं रैनदिन पचतहै, करमकी रेख सोई पाइहै रे । तनकी भूख सहल है बावरे, मनकी मेर नहीं धायहै रे ॥ आपना कृत तो दृष्टि नहिं देखता, पारके भागको रोयहै रे । कहैं कबीर यों रतनको खोय करि, जीव अज्ञानमें सोयहै रे ॥ आपनी अग्निमें आपही जलतहै, दोष कहो कौनको दीजिये रे । संत तो चन्द्रज्यों अंगशीतल सबै, जीवआपही आपमें छीजियेरे ॥ नीरके पीयेते प्यास मिटि जात हैं, डूबि मरै तो दोष कैसा । कहैं कबीर ये दोष कहु कौनको, जीव पाताल लै न्यायबैसा ॥ कामकी अग्निमें जीव सब जरत हैं, ज्ञानविचार कछुनाहिंबूझे । खोय प्रतीत अरु बोय बाजीदई, शब्द मानै नहीं काल सूझे ॥ झूठको थापि करि सांचको उत्थपै, झूठकी पक्षको गहेगांठी । कहैं कबीर नर अंधचेतै नहीं, कालकी चोट यों खाय डाठी ॥ कामबलवानजगमाहिं योद्धासबल, बीजविस्तार तिहुँलोककिया । स्वर्गऔमृत्युपाताल सबघेरिया, जीवजलथल सब मारिलिया ॥ खंडब्रह्माण्ड सो जीव सारागया, रहा कोइ एक जो कोटि माहीं ।

आत्मबोध

( २१ )

कहैं कबीर गुरु शरण गहि ऊबरा, सो विषधारमें बहा नहीं ॥ करै प्रतीत सो खाय खोटा सही, रहै निर्भय तहां चोर लागै । अग्रिके संगमें ज्योंधीवपिघला चले, कामिनी संग यों कामजागै ॥ काम बलवान सब जीव अंधा किया, पडा।मनस्वार्थी संग झूले । कहैं कबीर कोइ संतजन ऊबरे, नाम निर्वाण नहि पलक भूले ॥ नैनकी चोट तो बहुत करडी बहै, चोटसूं ऊबरे संत कोई । शील सन्नाह करि ज्ञानको खड्ग ले शब्दगुरुदेवके सुरति पोई ॥ शब्द विचारका कोट नीका किया, तासुके ऊपर चोट नहीं । चोट तो तासुको लागिहै आत्मा, कपटकी कतरनी रहैमाहीं ॥ जीवके बांधने एक नारी बनी, दूसरा और नहीं बन्ध है रे । ज्योंचोरको रोकने एक खोडा घना, नहिंकाठविना दूसराफंदहैरे ॥ ऊबै एककोई कोटिमें संत जन, कीलको काटि हरिनाम लागै । कहैं कबीर फिर फन्दमें ना पड़े, शब्द गुरुदेवके सुरति जागै ॥ तीनही लोक तहाँ एक नारी बनी, स्वर्ग अरु मृत्यु पाताल माहीं । चारहुँ खानका जीव परबस पड़ा, नारिविन दूसरो फन्दनाहीं ॥ मृत्तिका एक और घट बहु भांतिके, मोहिनी सकलमें एक दीसै । कहैं कबीर कोइ सन्त जन ऊबरे, दूसरा जीव सबकाल पीसै ॥ नारिभगद्वारमुख बिन्दुनहिंदीजिये, जगतकीकस्ताननहिं जोरभाई । ज्ञान वैरागि अरु भक्तिसो पलटिये, एकदिन काजसो सिद्धपाई ॥ पांचको उलटि मन अरु पवनको, संत अनेक यों पार हुआ । सहजही सहजदरिआवमाहींमिला, कहैं कबीर ते नाही जूआ ॥ दास मनोहर नहीं यकरंग रहत है, करै किरकंट ज्यों रंग केता । गहै वैरागअरु चढे आकाशको, गिरे धरनिमाहिं फिर नाहिं चेता ॥ मानकीतानमें खायगोतासही, कांचअरुस्फटिक ज्यों फूटिजावै । कहैं कबीरजनहीर कहैं पाइये, इन्द्रियाद्वारमनउलटि आवै ॥

( २२ )

बोधसागर

मिहरकरमिहरकरमिहरकर महाबली, जीवकूं शरणअब राखतेरी । पिसनपांचप्रबल सोबसि मेरे नहीं, सन महानंतकी सबल फेरी ॥ तरसअब कीजियेसुख मोहिदीजिये, दयाकरिजीवकोराखिलीजै । दासकबीरकी बिन्ती साम्भलौ, देवकरुणा मई दरश दीजै ॥ साईं बारही बार मैं कहतपुकारिके, दरदसों दरसदेओ नाम तेरा । पाचको नाथि करि साथराखौसही, विनादीदार दुखप्रानमेरा ॥ काल अकरालकी चोटजोराबहै, विनानिज देवकहो कौन राखै । दास कबीर यह बीनती करत हैं, बारहीबार रस राम चाखै ॥ तुही तू तुही एकसमरथ धनी, तुम विना और कोइ नाहिं मेरे । काम अरु क्रोधमदलोभ वैरी सबल, रैन दिनजीवको रहैं घेरे ॥ त्राहि पुनि त्राहिमें रैन दिनकर हूँ, मेहरिकरि आपनीशरणलीजै । दासकबीर यह बीनती करत है, देवकरुणा मई नाम दीजै ॥ होय निरपक्ष सबपक्षकूं त्यागकरि, रहै मस्तान गुरुज्ञानमाहीं । शील अरु सांच संतोष हृदयधरै, कपटकरतूतके निकट नाहीं ॥ कपटकरतूति तहाँ रामराजी नहीं, सांचकरतूति सब साधु गावैं । कहैं कबीर यक सांचको ले रहो, वेद कितनैं सब साँच गावैं ॥ जगत् अरु भेषके पक्षमें ना पड़े, रहैनिर्पक्ष सोइ युक्ति योगी । फेरिमनपवनको घेरि पांचोपिसन, प्रेमसुखधामजहांप्राणभोगी ॥ जहाँ आयो तहाँ दुख है बहुघना, पक्षकीलाय सब जीव छीजै । कहैं कबीर कोइ सन्तजन सूरमा, होय निर्पक्ष रस अगम पीजै ॥ राम निर्पक्ष निर्पक्षही साधु है, होय निर्पक्ष निर्पक्षही माहीं । साँचको परसि अरु झूठको त्यागिये, साँचकी पक्षकहुँदागनाहीं ॥ साँच सहजैतिरे झूठमें बह मरे, झूठ प्रपंच सू जगत भाता । कहैं कबीर कोई संतजन जोहरी, छाड़ि प्रपंच निजनामराता ॥ भेषको पहरिकरि भर्म भूलैमती, भेष पहिरे कछु सिद्धि नाहीं ।

आत्मबोध

( २३ )

काम अरु कोध मदलोभमाहीघणा, शीलअरु सांचसंतोष नाहीं॥ कपटके भेष सो काज सूझे नहीं, कपटको भेष नहीं राम राजी । कहैं कबीर नरसांच करनी विना, कालकी चोट पौखायताजी ॥ भेष अवधूत अरु धूत माही वसे,जीवकूँ बावला करि दिआरे । नहिंबोलनेसुधिअरुचालनेखबरिनहीं,बशिनहींतहाँपांचवलझियारे॥ घाटियांदोयतहांतहुत साधनी, सांकरीतासुकेबीचमेंउलझियारे । कहैंकबीरनरपन्थको भूलि करि, सुरतिका सूतनहिं सुलझियारे ॥ तिलकमाथे दियाहाथमें लाकड़ो, भजनका भेदतो नाहिं पाया । शीलअरुसांचसंतोषअन्तरनहीं, कनक अरु कामिनीजहरखाया ॥ गूदड़ीपहिनकरिबगआसनकिया, माछलीगटकनेकोसुरति भारी । कहैं कबीर जब काल गढ़घेरिहै, कौन गति होयगी जीवथारी ॥ हाथके माहि तो सुमरनी फिरत हैं, जीभहूँ फिरतहैं सुखमाहीं । दास मनोहर तो चहुँदिशफिरत है, मनअरु पवनकी गमनाहीं ॥ निरखता भीति अरुगोरडीछतरडी, नागिनी माहिंफौंकारमेले । कहैं कबीर यह भजन कैसे करै, नीदके आश्रय जीव खेले ॥ शील अरुसांचसंतोषकाभेष करि, क्षमा अरुदयादिलमाहिधारो । झूठ अरु कपट दिलते दूरि करि, सत्यका शब्द सुखते उचारो ॥ साँचका भेष यह देख सतगुरु कहा, संत अनेक यों पार हूआ । कहैं कबीर सुखधाममाहीं मिला, बहुरि विषधारमें नाहिं मूआ॥ भेषकूँ पहिरि करि जगतधूता सबै, नामका आसरा नाहिं नेरा । औषधोंबूटियांलागिभर्मत फिरै, क्यों छूटिहै जीवका भर्म फेरा ॥ मारता धातु हरताल तांबे सुरा, यंत्रा मंत्रा बुधि खोई । कहैं कबीर नर स्वांगकोपहिरि करि, अंतको बेरियोंचलया रोई॥ भेषकोपहिरिकरिजगतधूतासबै, एकनामनिर्वाणउर नाहिं आशा । औषधो बूटियांलागिभर्मत फिरै, क्योंछूटिहैं जीकाकाल फाँसा ॥

( २४ )

बोधसागर

और डहकायकरिआप डहका फिरै,जीवका भलाकयौहोय भाई । कहैं कबीर नरस्वांगकोपहरिकरि, साधुकी राह नहिं हाथ आई ॥ संत पूरा मिलै जीवको तारि है, वासना जीवकी खोवे । नाम उपदेश अरुभर्मनादूरिकरि, पाचको पलटि भवपार होवै ॥ मिलै अध बेसरा इन्द्रिया स्वार्थी, जीवबहकायकरि टूकरखावै । आपुभव सिन्धु औ जीवको लेवहै, कहैं कबीर नहिं पार पावै ॥ योगकी युक्ति तौ मूठ समझैनहीं, स्वांगकोपहरिकरि सिद्धहूआ । ज्ञान वैराग अरु दया जाना नहीं, वासना बीज तहां जाय मूआ ॥ मान मस्तान अरुद्रेष माहीघना, आंठि अभिमानकी नाहिं छूटी । कहैं कबीर सो पार कैसे लहै, माहिली वाहिली चारि फूटी ॥ अंधसाधुपदछाडिसंसारमेंघीसपडा, कौंडियॉरुयालमोरतनखोया । जन्म अरुमरनकादुखसिरपरसहा, योंमोहकेमहलमें जीव सोया ॥ अल्पही भोग अरु अल्पही जीवना, ज्ञानविचार कछु नाहिं कीया । कहैं कबीर यों बूडि विषधारमें, छाडि सुखसारको जहरपीया ॥ प्रेमके पंथको भूलि उलटा पडा, बँवनको खायकर फूलि बैठा । गयो वैराग अरु वन्दगी नाबन्यो, कर्मके कीचमें गला हैठा ॥ नरकमें जानकी टेक गाढ़ी गही, दोष निदौषको धार माही । कहैं कबीर सो सुखसार कैसे लहै, छांडिसुखसारकूं जहरखाई ॥ ताहि उगालकरि फेरले खात है, देख मनकूकरा पडत भारी । शब्द अरुचेसला कानिमाने नहीं शर्म सूझै नहीं होत ख्वारी ॥ जहाँका ऊपजा तहां फिरि आग्या, मायकारूप फिरिनारिकीया । काल अकरालकी चोट छूटै नहीं, कहैं कबीर धिरकार जीया ॥ नामनिज नीरविन पीर पावै नहीं, पाचसोरॉंचिकरिसांचखोया । शहदकी बुन्दके रस प्रवसभया, यो मोहके महलमें जीवसोया ॥ कामअरु कोथ मदलोभमाहीघना, कनक अरुकामिनीरंगराता ।

आत्मबोध

( २५ )

कहैं कबीर सोइपार कैसे लहै, कालकी चोटकूँ फेरि खाता ॥ अंध ज्ञानवैरागअरु भक्तिको कहत है, रहसतोएकनहिंहाथ आवै । फिरत कडछी जैसे पाकके बीचमें, रसके स्वादको नाहिं पावै ॥ ज्योटिलीको देखिकरिदिछीकीनकलकहै, तासुकीनकलकोइ और ठाने । कहैं कबीर कोइ भेद पावै नहीं, भेद तो देखने द्वार जानै ॥ वेद वेदांत अरु कथत भागवतको, अर्थ अनुभवतणांकरतनीका । ज्ञानवैराग अरु भक्तिको कहत है, रहतर नामविना सबै फीका ॥ कामिनीकुबुद्धिउरमांहिकांटाघना एकनामनिर्वाणउरनाहिंटीका । कहैं कबीर सो पार कैसे लहै, कनक अरु कामिनी हाथबीका ॥ रांडिया खेलेमें रांडिया होयगा, खेले अवधूतका होय न्यारा । खान अरु पान वशी ते जीवहै, कहो क्यों होय भौ सिन्धु पारा ॥ चालताजमीपैअरुकहत आकाशका, कहोक्योंमानिहैसाधु सोई । कहैं कबीर यह संतका शब्दहै, कहै ज्यों रहै अवधूत सोई ॥ कहत वैराग अरुराग छूटै नहीं, पांचसों राचिकरिजीव खोया । इन्द्रियास्वार्थी शब्दअनुभव कथै, पदसो बांधिकरिजीव खोया ॥ नाम निर्गुण किहै रहत है गुणमई, शिष्य शास्त्रातणी भूख भारी । कहैं कबीर जब काल गढ़ घेरिहै, कौन गति होयगी जीव थारी ॥ राग अरु द्वेष की चौतरा साजि करि, तासुके ऊपरे जीव बैठा । झूठको थापिकरि सांचको उत्थपै, अज्ञानकी केन्द्र गरकपैठा ॥ रागअरु द्वेषका चौतरा खोदिये, ज्ञानकूदाल सोढाह भाई । कहैं कबीर तब साधु पद पाइये, मुक्तिके महलमें सहज जाई ॥ पांच अरु तीनको करत निषेद नरमहलचौथा तणी बात गावै । रहत रजमा बिनाकहतर झूठी सबै, होय अवधूत तो कहत भावै ॥ जेनाम रसना रटैपापपलमें कटै, कनक अरुकामिनी त्याग दोई । कामअरु क्रोधमदलोभ को त्यागि नर, कहैंकबीरयोंसहज सोई ॥

( २६ )

बोधसागर

कहतको सूर अरु रहतको कूडहै, रहतबिनकहतकिसकामआवै । रहत रजमा विना कहत झूठी सबै, पांच फूटा फिरै काल खावै ॥ पांचको वसकरै नाम हृदय धरै, मुक्तिकी राह कयोंसहजि आवै । कहैं कबीर कोई सन्त जन सूरमा, कहत अरु रहत तब एकभावै ॥ ज्ञान वैराग विनु कूफ़फ़ंद टूटै नहीं, ज्ञान वैराग सोकुफ़फ़ंदटूटै । ज्ञान वैराग बिन जीव छूटै नहीं, ज्ञान वैराग सो जीव छूटै ॥ ज्ञान वैराग बिन पीव पावै नहीं, ज्ञान वैराग सो पीव पावै । ज्ञान वैराग बिन काज थावै नहीं, ज्ञान वैराग सो काज थावै ॥ बिनावैरागकहोज्ञानकिसकामका, पुरुषबिननारिनहिंशोभापावै । स्वांगते साहु अरु गति है चोरकी, करै तब चोरिया शिर कटावै॥ भेष तो साधुअरुकुबुधि माहीघणी,कुबुधिको कोथली नाहिं छूटै । शील अरुसाँचसंतोषअन्तर नहीं, कहैं कबीर तब काल कूटै ॥ कहनको साहु असगति है चोरकी,साहुजी कहत नहिं शर्मआवै। झूठही कहत अरु झूठही रहत है, रैन दिन झूठमें जन्म जावै ॥ मानके आसरे फूलकरि बैसिया, इन्द्रियास्वाद मनमाहिं भावै । कहैं कबीर ते साहु कयों बोलिये, यमरायके खेसले खूब खावै॥ ज्ञान वैराग बिन शब्द चालै नहीं, चढ़ कमान बिनु तीर कैसा । उज्वला दीसता द्रव्यखोटकारुपया, तासुकाकौनगनि देह पैसा॥ कठिन करतूतिपुनि कहाका होत है, रहतर जमाबिनाशब्दझूठा। कहैं कबीर जन काजतबही सरे, पाँच मन मनसा फिरै पूठा ॥ तुरंग रागातलै कान मोती झुलै, पाँच हथियार तहां बांधिसोई । मालमोतियातणीसौजआछावनी,पणिबिनाकारण रहे पुरुषकोई॥ नारि सुख नालहै गर्भ तो नारहै, बिना वैराग तो शब्द काँचा । कहैं कबीर ज्यों पुरुष हैहीजड़ा, बिनाकरतूतिनहिंपुरुषसाँचा ॥ शब्द अनुभव करै माहिप्रचोधरे, मन अरु पवनकी युक्तिआनै।

आत्मबोध

( २७ )

ज्ञान चौकस कहे सैन चौथे गहे, सीस सतनामकी छाप ठाने ॥ कनक अरु कामिनी रेख माहीघणी, भायतृष्णातनीमीटिनाहीं । कहैं कबीर सब झूठ ही बोलना, आप है कालकी डाढ माहीं ॥ पवनको साधि करिकरतउपाधिनर, बासना बीजतो नाहिँछीजै । दूध अरु भातफिर ओगरामागता, दास मनोहरका लाडकीजै ॥ कहत है योग अरुभोगको गहत है, योग को मूल तो हाथ नाहीं। कहैं कबीर नर करत आजीवका, खान अरु पान है चित्त माहीं॥ दर्दमन्द दर्दके चोटको जानि हैं, वे दर्दको चोटकी खबर कैसी । पीवकी चोटको विरहनी जानिहै, रैनदिन पीवमें सुरति बैसी ॥ श्रवणअरुनयनसुखवैनमें बसत है, पीवविन और नहिं बात आवै। कहैं कबीर यह विरहनी अंग है, रैनदिन निरखता पंथ जावै ॥ नीर विनुमीनअरुचन्दचकोरविन, सीपकोस्वातिकीएकप्यासा । धरणिके नीर नहिं नेह पपीहरे, विरहिनी एकयों राम आसा ॥ नारिसे पुरुष अरु पुरुषसे नारि है, सुरतिकीडोरज्योंएक होवै । कहैं कबीर यह विरहनी अंग है, रैनदिन पीवका पंथ जोवै ॥ योगकी युक्तिको रोगिया नाल है, रोगकी खानितहां योगनाहीं । कूडिया कंथिया काज सीजै नहीं, कहत कपूर अरुहींग खासी ॥ नाम निर्वाणतहां कामकहाँपाइये, कामनाकुबुधितहांनामकैसा । कहैं कबीर नर जहरको खात है, शब्द अनुभव करेफूलिबैसा ॥ योगकी युक्तिकोरागिया नाल है, रोगकी खानि तहां योग कैसा। कनकअरुकामिनीखानगहिरीखरी, तासुके ऊपर जीव बैसा ॥ मूलिया खायकरि करतउदगार नर, कहत कपूरकी बासआवै । कहै कबीर एका दृष्टि देखये, कनक अरु कामिनीजहर खावै ॥ शब्दको मानिहै कौन पर्माण है, वेदांत सिद्धांत तहां एकमेला । त्याग वैराग अरु शीलसंतोषविनु, करतज्योंठेलियाबालखेला ॥

( २८ )

बोधसागर

पीवको परसता कष्ट बहु होत है, पीवकी सेज नहिं खेलहांसी । कहैं कबीर रहत रजमा बिना, शब्दअनुभवकियाबांधिजासी ॥ त्यागवैरागअरुहरतरजमाबिना, शब्दअनुभव किया कौन मानै। नूर अरु तेज मन पवन कू कथतहै, महल चौथातणी बातठानै॥ खेतनिपेदे हुई चौडेही जानिये, शीलअरु साँच संतोष आवै । कहैं कबीर एता दृष्टि देखिये, वेदांत सिद्धांत सब साधु गावै ॥ सोवता होय तो जागि है बापुडा,जागता सोवता कहाँ जागै । मान मनमाहिं अभिमान ज्ञानी हुआ,शब्दअवधूतकाकहाँ लागै॥ कहतअरु सुनतसबअवधिपूरीभई, अनुपाइनीभक्तिनिहिहाथआई । कहैं कबीर ये ज्ञान सब थोथरा,जीवका भला क्यों होय भाई ॥ कहतअरुसुनत सबअवधिपूरीभई, उलझिसुलझिनहींएक आंटा । शीलअरुसांचसंतोषअन्तर नहीं, कामनाकुबुधिउरमाहिं काटा ॥ अग्निकेसंगज्योलारखपघिलतचलै, योशब्दकोसुनतटुकचेतहोवै । कहैंकबीरनरपढै जबआंतरा, लाल की लाखनहिं उलटि जीवै ॥ करत आचारअरुखबर तनकी नहीं, सदा नौ द्वारमें बहै आमैं । नाकमें रीट अरुआँमैंकीचड़ा, सदा ठेठी बहै कान तामैं ॥ हाडमुखलार अरु मूत्र विष्टा बहै,करत अभिमान तू देख जायैं। कहैं कबीर नर चेत सोवै कहाँ, होयज्योंपाकभजिसन्त नामैं ॥ फोड़िपाषाण को दूजी हरिबीच करि,आपकर्ता हुआ देखु दूजा । तोड़ि सरजीव अरु पूजिनिर्जीबको, कहो क्यों मानिहै रामपूजा॥ कर्म मार्ग चढै सांच बूझै नहीं, मानता है मैं करत पूजा । कहैं कबीर नर अंध चेते नहीं, फूटि चारो गई पडा दूजा ॥ जागती जोति तहाँ छूत लागे नहीं, छूत लागै तहाँ भर्म भाई । कर्म अरुभर्ममें जीव जूझै सबै, चार अरु असी कापडा खाई ॥ शोचके शब्द का भेद पावै नहीं, इन्द्रिया स्वादसब जीवलागा ।

आत्मबोध

( २१ )

कहैं कबीर तहाँ जागती जोति है, कर्म अरु भर्म सब दूर भागा ॥ हृदके जीव सो बोलना कौनसा, बात बेहदकी कहा जानै । प्रवृत्ति प्रपञ्चमें रैन दिन जूझना, शब्द अवधूतका कहा मानै ॥ दृष्टिदीसै तहाँ कालका जाल है, नामनिवांण नहीं हाथ आया । प्रेम प्रकाशका भेद पाया नहीं, कहैं कबीर तहाँ सहज विलाया ॥ आपनी आपनी खालमें सबमस्त है, चार अरु असीका जीवसारा । करत आचार तहाँ गरकमनहोयरहा, होय उदास नहीं होय पारा ॥ सूकरा कूकरा तनको पायकरि, झूकरा कूकरा भोग भावै । कहैं कबीर यों नर्कमें झूलना, बिना सतसंग नहीं पार पावै ॥ इशक साईं तहाँ तर्क वजूद है, इशकवजूद तहाँ नर्क साईं । योगिया यतियां शेष संन्यासियां, भेषहूं देखिये बहुत माही ॥ बिनाही बन्दगीविहिस्त पावैनहीं, बन्दगीकरत नहीं खेलहासी । कहैं कबीर ये इशक वजूद का, दोजरखकी राहको लिया जासी ॥ तर्क वजूद सो इशक साईं करो, छाड़ि बदफेल रस एक पीजे । मनीको मारिदिलमाँहि नेकी गहो, भिस्तिकी राहकूँसोधिलीजे ॥ सबआपपैदाकियाघटनहींफोड़िये, फर्जन्दसब आपका देखभाई । कहैं कबीर यह सतका शब्द है, विहिस्तके राह को सहज जाई ॥ मियाँजीजीवतामारिकरिकहत हलालहुआ, सुदीरनहीं खूबखाना । मिहरिको दूरिकरिकहर दिलमेंधरी, दोजरखकीराहको सहीजाना ॥ नफसके वास्ते कुफ बहुत करतेहौ, ज्वाब दर्गाहमें भरै कैसा । कहैं कबीर इन्साफ तब होयगा, मार दर्गाह में खूब वैसा ॥ मियाँजीराहकोछाड़िवेराहक्यों, चलतहौ ज्वाबदर्गाहमेंनाहिंआवै । करत बदफेल दिन चारिके वास्ते, देखि वजूद क्यों शाक खावै ॥ सुसलमानईमानसो पाककमालभरो, जीवकोमारिकरिनाहिंखाना । नकसशैतानको मारिकिरिदूरिकर, बावरे कहैंकबीरयोंभिश्तिजाना ॥

( ३० )

बोधसागर

मियाजीआबकानीपनाहक दर्गाहमें, पिशाबकानीपनाहकनाहीं । कहर कोडुरि मिहरदिलमें धरो, यो बन्दगी करत कबूल साई ॥ पांचबिसमिलकरो पाकरोजा धरो, गुस्सेका गला तूका भाई । कहैं कबीर यह सत्यका शब्द है,विहिस्तकी राहकं सहज नाई॥ जैनके मांहि तो खेन पैदा हुआ, खेनका रोग तो जाय नाहीं । कण बिना तूसडा कूटते हैं सदा,कर्ममें लीन नहिं सांच पाई ॥ दयाको कहै अरु सदा निर्दई रहै, तोडि सर्जीव नरजीव पूजै । कहैं कबीर यों जन्मका आँधला, सांच अरु झूठ नाहिं सूझे ॥ खेनके रोगते श्वांस बैठे नहीं, श्वांस बैठे बिना कहां साता । नामनिज औषधीनिकट न्यारीरही,छाडि निजऔषधी कर्मराता ॥ आपप्रकाश बिन कहा नहीं ऊपजे, कालके चक्रमें खाय फेरा । कहैं कबीर यों जैनमें खेन हैं, नाम निर्वाण नहिं निकट हेरा ॥ कौड़ियां कौड़ियां जोड़ी करि एकठी, खाय खचै नहीं मूलपापी । धरै घरमाहिं फिर व्याज बाढो करै, रैन दिन माहिले बुरीथापी ॥ दोयगा सर्प अरु भूत भर्मत फिरै, खाय खचै नहीं मूल भाई । कहैं कबीर जब ज्वाब कैसे भरे, यमराज के घेसले खूब खाई ॥ शब्द उपदेश मैं सबनकं कहत हूं, समुझिकरिआपनासूखलीजे । राग अरु द्वेषकूरूरिसब छोडिके, आपने जीवका भला कीजे ॥ आय सतसंगमें कुबुधिको दूरिकरि,सुबुधि सन्तोषउरमाहिंधारो । कहैं कबीर यह शब्द निर्दोष है, आपने जीवका काज सारो ॥ टेरि पुकारि सब जीवसों कहत हौं, सत्यका शब्द तुम गुनलोई । गुरुदेव करतूत गुरु देवही पाइये, शिष्यकरतूतसो शिष्य होई ॥ शिष्य दुर्बुद्धि गुरुदेव क्या दोषहै, शिष्य अवधूत गुरुवार वैसा । करै करतूति सो आपनी पाइहै, शिष्यगुरुदेवका काम कैसा ॥ शब्द सांचा कहूं गुप्तका कामना, सांचके शब्दको लाज कैसी ।

आत्मबोध

(३१)

आप अरु बाप गुरुदेव अरु शिष्य है, करै करतूतसो पायतैसी॥ सांचके खेलकूँ सांच मीठा लगै, कपटके खेलकूँ सांच खारा । कहैं कबीर ये एकठे ना रहे, दिवस अरु रैन प्रकाश न्यारा ॥ आपने आपने सांचसो खेलना, कपटका खेल नाहीं काम आवे। कपटके खेलसो काम कोई नासरै, अंतकी बेरदुख प्राणपावे ॥ बाहिरा भीतरा साफ दिलको करो, मैलको धोय रसराम पीजै । दास कबीर यों कहत पुकारिके, कपटकी कोथली दूरि कीजै ॥ सांच करणी करै सांच मुखऊचरे, दम्भ अरु कपटको दूरिडारे । शील अरु सांच संतोष हृदयधरै, कामअरुकोधमदलोभमारै ॥ कनकअरु कामिनी त्यागि साई भजै, रामतेजे जनाराम गावै । कहैं कबी जनपार तेही लहै, कालकी चोट फिर नाहिं खावै ॥ सांच करनी करै दम्भकूँ परहरै, सांच करतूतको संत गावै । सांच करनी रहै सांच मुखते कहै, सांच दर्गाहमें दाद पावै ॥ दया अरु शील संतोष सांचे गहै, झूठ दर्गाहमें दाद नाहीं । कहैं कबीर जन्म झूठहै जर्दरू, सांचके बीच है आप साई ॥ सांच करनी बिना काज सीझे नहीं, झूठप्रपंच सो जीव राजी । मानमस्तान अरु खानहै लूनकी, कालकी चोट यों स्वायताजी॥ शब्द चर्चा नहीं ज्ञानहै घेसला, देखि शैली करो पेट मोटा । कहैं कबीर यों जानि जड़होयरहो, सुमिरिसतनाममतखायखोटा॥ मिलै जो साधुतहाँ बोलना खूबहै, होय बकवाद तहाँ ज्ञान टूटै । साधुके बोलने प्रेम सुख होत है, मूढके बोलने काल कूटै ॥ रैनदिन चित्तकी वृत्तिकूँ घेरिये, युक्ति जाने तिको युक्त योगी । कहैं कबीर मनपवन कूँ फेरिकरि, सदाआनन्दरस नामभोगी ॥ सबकपटकूँ दूरिकरि सांचकरणीकरौ, कपटकरतूतिनिहिं पारपावे। कपटकरतूतसो काज कोई नासरै, सांचकरतूतसो काज थावे ॥