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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

( १९८ )

बोधसागर

तामसी, आलसी; मनसे कुटिल और अधीर मूर्ख होता है। विद्या वैभव, धन, पुरुषार्थ, बल और मान बिना मिथ्या अभिमान करनेवाला मूर्ख होता है।

लुच्चाई, लफंगई, लबारपना, कुकर्म, कुटिलता, बेगरजीपना और मलिनता मूर्खका लक्षण है।

दांत, आँख, हाथ, वस्त्र और पग सर्वकाल मैला रखे सो मूर्ख और ऊँचे चढ़कर वस्त्र पहिरे, बाहर चौतरेपर बहुत बैठकर प्रायः नंगे शरीर रहे सो मूर्ख है।

वैधृति, व्यतिपात और कितने कुमुहूतोंको अपशकुनकी बात गिने सो मूर्ख है।

कोधसे, अभिमानसे और कुबुद्धि से अपना आप ही घात करे ऐसा अव्यवस्थित चित्तवाला मूर्ख है।

अपने सुहृदके साथ खेदके साथ व्यवहार कर, सुख और शांतिका शब्द भी न बोले और नीच जनोंकी स्तुति करे वह मूर्ख है।

अपनेको सर्वप्रकारसे पूर्ण माने, शरणगतको धिक्कारे और लक्ष्मीका भरोसा करे वह मूर्ख है।

पुत्र, कलत्र, और स्त्री अर्थात् सांसारिक विषय वासनाको ही मुख्य मानकर उसीमें मुग्ध होकर जो परमात्माको भूल जावे उसे मूर्ख जानना चाहिये।

“करनी पार उतरनी” “जस करनी तस भरनी”।

दोहा—कबीर कमाई आपनी, कदी न निष्फल जाय।

सात समुद्र आड़ा पड़े, मिले अगाऊ धाय ॥

—अंगकी साखी।

जो इस भावको नहीं समझता है वह मूर्ख है, पुरुषोंकी अपेक्षा जो स्त्रियोंको विशेष मान दे वह मूर्ख है।

धर्मवोध

( १९९ )

जो दुर्जनके साथ भाषण करे, मर्यादाको त्यागकर और आँख मूँदकर मार्ग चले वह मूर्ख है ।

पितर, गुरु, देव, माता, पिता, आता, गुरुभाई, बड़ी बहिन चाची, गुरुपत्नी, गुरुबहिन और स्वामी आदि गुरुजनोंका द्रोह करे वह मूर्ख है ।

गंभीरताको छोड़कर बोले, आदर बिना बोले, बिना पूछे बोले, निन्द्य वस्तुको अंगीकार करे, मार्ग छोड़कर चले और कुकम्भी मित्र करे वह मूर्ख है ।

दूसरेको दुखी देखकर हँसे, सुख माने और दूसरेको सुखी देखकर दुख माने, ईर्षा और वैरसे हृदयको जलावे और गई वस्तुका शोक करे वह मूर्ख है ।

अपनी प्रतिष्ठाकी रक्षा करना जाने नहीं, सदा हँसी ठट्टठा करे और हँसी ठट्टठा करके भी लड़ उठे उसे मूर्ख जानना ।

अपनेसे पूरा हो सके नहीं ऐसी शर्त करे, बिना कामके ही बड़बड़ करे, बोलनेकी रीति जाने नहीं उसे मूर्ख जानना ।

वस्त्र शस्त्र बिना ऊँचे स्थल पर जा बैठे और अपने गोत्रका विश्वास घात करे वह मूर्ख है ।

चोरको अपनी पहचान बतलाये, दृष्टि पड़ी हुई वस्तु मांगे क्रोधमें अपना अहित करे वह मूर्ख है ।

नीच लोगोंकी संगति करे, घमंडके साथ बात करे, बायें हाथसे पानी पीये वह मूर्ख है ।

समर्थके साथ मत्सरता करे, अलम्ब्य वस्तुकी आशा करे और अपनेही घरमें चोरी करे वह मूर्ख है ।

परमात्मा बिना मनुष्यपर विश्वास लावे और निरर्थक अपनी आयु नष्ट करे वह मूर्ख है ।

( २०० )

बोधसागर

“संसार दुःखसे भरा है” ऐसा जानने पर भी देवोंको गाली दें और मित्रोंको भला बुरा कहे वह मूर्ख है ।

अरूप अन्यायके लिये भी क्षमा न करे, सदा बरछीके नोक पर भी रहे और विश्वासघात करे उसे मूर्ख जानो ।

समर्थके साथ विरोध करे, जनमंडली जिसको देखकर क्रोधित हो, घडीमें भला घडीमें बुरा हो उसे मूर्ख जानो ।

पुराने सेवकोंको छुडाकर नया सेवक रखे और जिसकी सभा नायक विना हो वह मूर्ख है ।

अर्नीतिसे धन प्राप्त करे, न्यायनीति और धर्मको छोड दे तथा साथके आदमियोंको त्याग दे वह मूर्ख है ।

अपना पैसा दूसरेके पास रखे, दूसरेका अपने पास रखे, नीचलोगोंके साथ व्यवहार करे वह मूर्ख है ।

अतीतका अंत दूढे, कुग्राममें जाकर वास करे और हमेशा चिन्तामें रहे सो मूर्ख है ।

दो जन बात करते हों वहाँ जाकर बैठे और दोनों हाथसे शिर खुजलावे वह मूर्ख है ।

पानीमें थूके, पगसे पग खुजलावे, नीच मनुष्यकी सेवा करे वह मूर्ख है ।

स्त्री और बालकको मुँह चढावे अर्थात् निडर करे, परस्त्रीके साथ कलह करे, बहुत कालकी मर्यादाको हलकी करे, गुंगे जीवको कारण विना मारे और मूर्खसे मैत्री करे वह मूर्ख है ।

दोकी लड़ाई झगडेको खड़ा होकर देखे और झूठी बातको सच्ची और सच्चीको झूठी माने वह मूर्ख है ।

लक्ष्मी मिलनेपर पहली पहचान भूल जावे और पूज्य वर्गोंपर दुष्कृत चलावे वह मूर्ख है ।

धर्मबोध

( २०१ )

अपने स्वार्थ तक नम्रता दिखलावे, स्वार्थ निकले पीछे बेपरवाह होजावे और उपकार करनेवाला कार्य न करे वह मूर्ख है ।

जो अक्षर छोड़कर पढ़े, पुस्तककी ओर दृष्टि न रखे और अपनेको बहुत बुद्धिमान् प्रकट करे वह मूर्ख है ।

स्वयम् कभी पुस्तक पाठ करे नहीं, दूसरोंको पाठ करने दे नहीं और पुस्तकोंको बांधकर रखे वह महामूर्ख है ।

इस प्रकारसे संक्षेपमें मूर्खोंका लक्षण वर्णन किया, अपनी हितकी कामना करनेवाला पुरुष इनका विचार कर सदा ही इन दुर्गुणोंसे बचनेका प्रयत्न करे, जिससे मूर्खोंकी पंक्तिसे निकलकर उत्तमोंकी गिनतीमें आवे ।

अथ पठित मूर्खका लक्षण वर्णन

पीछे मूर्खका लक्षण वर्णन कर आये, अब उनका लक्षण वर्णन कहूँगा कि, जो बुद्धिमान् और पढ़-लिखकर भी मूर्ख हैं । अर्थात् विद्वान् होनेपर भी जिनमें मूर्खता होती है उन्हें पठितमूर्ख, कहते हैं ।

बहुत शास्त्र और ग्रन्थोंका पठन पाठन और श्रवण किया हो, ब्रह्मज्ञानकी वार्ता करे, परन्तु झूठी आशा और मिथ्या अभिमानका त्याग न करे ऐसे विद्वान्को तोतेके ज्ञानसमान अज्ञानी मूर्ख जानना ।

मुक्त पुरुषोंके चरित्रको बारम्बार मुखसे कहता है परन्तु उनके सदाचारका अनुकरण करता नहीं और स्वधर्मके साधनोंको तुच्छ दृष्टिसे देखता है तथा औरोंको उनके आचरणसे हटाता हो उसे पढ़ा हुआ मूर्ख समझना ।

( २०२ )

बोधसागर

अपने ज्ञातापनके अभिमानसे सर्वमें दोष लगाता है, प्राणी मात्रमें छिद्रान्वेषण किया करता है, उसके शिष्य अथवा अधीनस्थ मनुष्य उसकी आज्ञासे बाहर चलनेवाले हों, जिसके बोलनेसे दूसरोंका दिल दुखाता हो, ऐसे पंडितको पठितमूर्ख समझो ।

सम्पूर्ण पुस्तक बांचे बिना ग्रन्थको तथा ग्रन्थकारको दूषण देना, ग्रन्थके गुणको भी अवगुण ही समझना, थोडे अवगुणको देखकर संपूर्ण अवगुण किसीमें कल्पना करलेना पठितमूर्खोंके अतिरिक्त दूसरे किससे हो सकता है ?

सदाचार और सल्लक्षणोंसे हास्य मानकर, सदाचारी और सल्लक्षण युक्त पुरुषोंकी निन्दा करता है, सदा उनको नीचा-दिसानेकी चिन्तामें लगा रहता है, वह जो कुछ नीति अथवा न्याय अपने दोषोंको छिपानेके लिये करता है सब छल छिद्रसे भरे होते हैं ।

मैं ज्ञानी हूँ, सर्वज्ञाता हूँ ऐसा मिथ्याभिमान रखकर प्रत्येक कार्योंमें हाथ डाल देता है परन्तु कार्य्य सिद्ध न होनेपर मिथ्या क्रोधके वश हो जाता है । लोगोंके अधिकारका विचार किये बिना उनसे बोलनेका साहस करता है और बचन जो बोलता है वह भी कठोर ।

बहुश्रुतपनके कारण वक्ताका सभामें अपमान करता है और मिथ्या बकवाद करता है ।

जिस बातके लिये दूसरोंको दूषित कहता वही बात अपनेमें होते हुए भी उसे जान नहीं सकता ।

अभ्यास द्वारा सर्व विद्या प्राप्त कर लेता है परन्तु उसके द्वारा जगतका कुछ उपकार नहीं कर सकता, किसीका उससे माधान नहीं होता ।

धर्मबोध

( २०३ )

जिस प्रकार हार्थी स्पर्श विषयमें लुब्ध होकर और भवैरा गन्धमें लुब्ध होकर बन्धनको प्राप्त होता है उसी प्रकार पठित-मूर्ख संसारमें फँसता है।

वह स्त्रियोंमें लुब्ध होता है, उन्हींका संग करता है, उन्हींका अपनी वाणी द्वारा निरूपण करता है और नीच काममें प्रवृत्त रहता है।

जिससे उसके मानकी हानि होती रहती है उसीको दृढ़ रखता है, और अपनेको शरीर समझता हुआ सदा उसीके लालन पालनमें लगा रहता है।

सद्गुरु परमात्माकी स्तुतिको छोड़कर सत्य धर्म ग्रन्थोंका लिखना और रचना छोड़कर सांसारिक मनुष्योंकी प्रशंसा करता है उनकी मिथ्या बड़ाई करता है, उनके विषयमें प्रशंसा करता है, उनके विषयमें कविता बनाता है, जिससे कुछ सांसारिक लाभ हो उसीकी बड़ाई करता है, जो दृष्टिगोचर होता है उसीको सत्य जानता है ऐसा जो विद्वान हो वह मूर्ख ही कहलाने योग्य है।

स्त्रियोंके अवयवका वर्णन करता है, शृङ्गार रसकी कवितामें अपना समय बिताता है, नाटकादिके हावभावके वर्णन करनेमें अपनी लेखनीको घिसता है वह ईश्वरको भूल जाता है।

वैभवको प्राप्त हो सर्व प्राणीमात्रको तुच्छ समझता है और स्वयम् नास्तिक बनता है।

व्युत्पन्न, वैरागी, ब्रह्मज्ञानी, संन्यासी, साधु, महंत आदि उच्च उपाधिको धारण करनेपर भी प्राकृत जनोंको व्यापार धन्धाके भविष्य कहनेका काम उठाता है वह महामूर्ख है और उसे दम्भी विषयाभिलाषी पठितमूर्खके पदको प्राप्त हुआ जानना।

( २०४ )

बोधसागर

जो किसीकी भी पूरी बातको सुने बिना उसके गुणदोषमें छिद्र ढूँढने लगता है और दूसरेकी उन्नति देख नहीं सकता है ऐसे दूषित विद्वान्को पठितमूर्ख कहते हैं।

भक्तिके साधन, वैराग्य और भजन बिना भक्त और शाम-दमादि साधन बिना ब्रह्मज्ञानी, और सत्यासत्यकी परीक्षा बिना अपनेको केवल मुखसे ही भक्त, ब्रह्मज्ञानी और पारखी कहलानेकी कामनावाले पठित पुरुषोंको मूर्ख कहा जाता है।

स्वधर्मके नित्य नैमित्तिक कर्मोंमें श्रद्धाहीन, ऊंचकुलमें भी जन्म धारण कर नीच कर्मोंमें प्रवृत्त होनेवाला विद्वान् मूर्ख है, उसका आदर करनेवाला यदि नीच पुरुष भी हो तो उसकी मिथ्या प्रशंसा करता है और पीठ पीछे उसकी निन्दा करता है जैसे पठितमूर्ख जानो।

“मुखपर एक और पीठ पीछे दूसरा” ऐसी जिसकी आदत हो, बोलनेकी बात अलग और करनेकी अलग हो, संसारमें अत्यन्त प्रवृत्ति करने पर भी परमार्थको धिक्कारे और अपने वचनको सिद्ध करनेके लिये अपने ज्ञातव्यका आश्रय ले। सांची बातको किनारे छोड़कर लोगोंकी रुचिके अनुसार बात करे, ऐसे अपने जीवनको पराधीन और मृतक करनेवाले विद्वान् को पठितमूर्ख जानना।

जो लोगोंको दिखलानेके लिये दम्भ किया करता है, अकर्तव्यको कर्तव्य मानकर उसमें प्रवृत्त होता है, मनमें सीधा और योग्य-मार्गको जानते हुए भी लोभ (लालच) से, अथवा मान-बड़ाईकी इच्छा, या किसी भी परके पक्षपातसे सत्य त्याग करके टेढ़े रस्ते चलता है उसे पारखी महामूर्ख और ज्ञानियोंकी सभासे बाहर समझते हैं, यदि वह उच्च आसन पर भी बैठा हो तो क्या ?

धर्मबोध

( २०५ )

रातदिन उत्तम उत्तम ग्रन्थोंका श्रवण करते हुये भी अपना अवगुण त्याग नहीं करता है, अपना हित आप समझता नहीं है, तत्त्वनिरूपणके श्रवण मननको जहाँ उत्तम मनुष्य बैठते हों उनकी मसखरी करता हो, वह मिथ्याज्ञानी कदापि अपना हित नहीं कर सकता ।

अपना शिष्य अनधिकारी होकर अपमान करने लगे तब भी उसकी आशा न छोड़े, ग्रन्थोंको सुनते, या विचारते अथवा किसीके मुखसे उपदेश द्वारा अपने कर्तव्यकी स्वामी ( कसर ) कुछ मालूम हो तो कोषित होकर गडबड़ करने लगे तो यदि वह लोगोंमें बहुत बुद्धिमान् भी प्रसिद्ध हो तो भी उसे महामूर्ख जानना ।

वैभवमें मग्न होकर सतगुरुकी उपेक्षा करे और अपनी गुरुपरम्पराको याद करे उसे भी मूर्ख जानना; यद्यपि वह वैभवप्रतापसे जगतमें बुद्धिमान् कहलाता हो ।

जो ज्ञानकी बात कहकर धन जमा करता है, कृपणके समान धन भोगता है, धनके लिये ही परमार्थकी बात करता है, स्वयम् तो कर सकता नहीं और दूसरोंको वही बातें सिखाता और ब्रह्मज्ञानका उपयोग अनधिकारी विषयलम्पट लोगोंके समक्ष करता हो, ऐसा महंत, गोस्वामी और साधु संत भक्ति-मार्गको भ्रष्टकर पक्षपात द्वारा वैर विरोध बढ़ानेवाला है ।

परिवार त्यागकर साधु वेष धारण कर लेनेवालोंको संसार तो छूट ही गया और इधर परमार्थका भी साधन नहीं हो सका ऐसा जो धर्मर्ममार्गदाको भ्रष्ट करनेवाला हो वह धर्मविरोधी मूर्ख कहलाता है ।

( २०६ )

बोधसागर

जिस धर्मका स्वांग बनाया हो, उस धर्मके ऊपर पड़ते हुए विधर्मियोंके आक्रमणकी उपेक्षा कर जो स्वमान मर्यादाकी मरम्मतमें लगा रहे उस धर्मविध्वंसी मिथ्या स्वांगधारीको मूर्ख समझना चाहिये ।

स्वधर्मकी जिन बातों और कर्मोंसे हाँसी होती हो, उन कर्मों और बातोंमें प्रकृत होकर, स्वधर्मके सिद्धान्तको न जाननेवाले, अथवा उसकी निन्दाकरनेवाले धर्म दूषियोंसे जो मेल मिलाप बढ़ावे वह धर्मघाती मूर्ख है ।

इस प्रकार संसारमें भले कहलाते हुए भी मूर्खताके ही वनमें भटकनेवालोंका संक्षेपसे वर्णन किया । सज्जन जन इसे विचारें और आत्मसुधारके मार्गको पक्षपात रहित होकर ग्रहण करें ।

इति श्रीधर्मबोध प्रथम भाग समाप्त

प्रारंभिक पृष्ठ (कमालबोध)

भारतपथिक कबीरपंथी स्वामी श्रीयुगलानन्द (विहारी) द्वारा संशोधित

खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई-४

नं. १० बोधसागर

संस्करण : फरवरी २०१९, संवत् २०७५

मूल्य : २१० रुपये मात्र ।

मुद्रक एवं प्रकाशक:

खेमराज श्रीकृष्णदास, TM

अध्यक्ष : श्रीवेंकटेश्वर प्रेस,

खेमराज श्रीकृष्णदास मार्ग,

मुंबई - ४०० ००४.

© सर्वाधिकार : प्रकाशक द्वारा सुरक्षित

Printers & Publishers : Khemraj Shrikrishnadass, Prop: Shri Venkateshwar Press, Khemraj Shrikrishnadass Marg, 7th Khetwadi, Mumbai - 400 004.

Web Site : http://www.Khe-shri.com Email : khemraj@vsnl.com

Printed by Sanjay Bajaj For M/s. Khemraj Shrikrishnadass Proprietors Shri Venkateshwar Press, Mumbai - 400 004, at their Shri Venkateshwar Press, 66 Hadapsar Industrial Estate, Pune 411 013.

श्री कमालबोध ग्रन्थ

बोधसागरे-

कमालबोध


भारतपथिक कबीरपंथी

स्वामी श्रीयुगलानन्दद्वारा संगृहीत

खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई-४

भारतीय

प्रहिलासूत्र

प्रहिलासूत्र

भारतीय प्रहिलासूत्र

भारतीय प्रहिलासूत्र

प्रहिलासूत्र

सत्यनाम

श्री कबीर साहिब

A faint, stylized illustration of a seated Buddhist figure, possibly a Bodhisattva or Buddha, holding a bowl and a staff, surrounded by a halo.

ॐ नमः शिवाय

सत्यमुक्त, आदअदली, अजर अचिन्त, पुरुष, मुनींद्र, करुणामय, कबीर, सुरति योग संतायन, धनीधर्मदास चुरामणिनाम, सुदर्शन नाम, कुलपति नाम, प्रबोध गुरुबालापीर, केवलनाम, अमोल नाम, सुरतिसनेही नाम, हक नाम, पाकनाम, प्रगट नाम, धीरज नाम, उग्र नाम, दयानामकी दया, वंश- व्यालीसकी दया ।

अथ श्रीबोधसागरे

कमालबोध प्रारम्भः

एकत्रिशस्तरङ्गः

चौपाई

शाह सिकन्दर दिल्ली सुलताना। बैठे तख्त करे रजधाना ॥ बहुतेक दिवस आनन्दमें गयऊ। एते कायाको बेदन भयऊ ॥ देह अग्नि उठी अधिकाई। रैन दिवस शाहा सुधि नाहीं ॥ बहुतेक इलम कियो सुलताना। फेर औलिया सिद्ध सुलाना ॥ कोई विधि जलन दूर नहीं जाई। दिन दिन उठी चले अधिकाई ॥

( २ )

बोधसागर

शाहसिकन्दर प्रतिज्ञा

दोहा—दीन दुनीका मैं धनी, मेरा जाय प्रान । मेरा बेदन जो हरे, मनवाँछित पावे दान ॥ ऐसा कोई औलिया नाही । मेरे तनकी तपन बुझाहीं ॥

वजीर वचन

कहै वजीर सुनो सुलताना । काशीमें एक फकीर सयाना ॥ वहां एक हिंदू फकीर रहाई । चौदहसौ वर्षजिनउमरधराई ॥ सब हिन्दू कदमों पै जाहीं । सब हिन्दूके पीर कहाहीं ॥ उनको चणारविन्द धरो तुम जाई । दर्शन करत जलन मिट जाई ॥ रामानन्द कहैं सुनी बड़ाई । शाह सवारी काशी आई ॥

दोहा—आय दुनीके बादशाह, सब संगहि दललाय ।

जलन मिटनके कारने, कदमों पहुँचे जाय ॥

चौपाई

भयो प्रभात जलन अधिकाया । जब रामानंद कहै दर्शन धाया ॥ शाह सिकन्दर दर्शन आये । सबही अमीर सङ्ग चलिधाये ॥ आये मण्डप आये सुलताना । रामानंद दिल रहै खिसियाना ॥ शाहको अग्नि उठी अधिकार्ई । भये विकल सही ना जाई ॥ त्राहि त्राहि तब कीन पुकारा । रामानन्द तब मुखफेरि सिधारा ॥ देखि दशा भई अति क्रोधा । कहै वजीर सुनो सब योधा ॥ देखो इस काफिरकी गुमराही । चढ़त क्रोध मोंहि रह्योनजाही ॥ दीन दुनीके शाह सुलताना । जिनको नमै सकल जहाना ॥ सो काफिरके कदमो आवे । देखत तेहि काफिरसुँह फिरावे ॥ ऐसो काल चढ़यो बलवंडा । नफरके घटमें भयो परचण्डा ॥ ऐसो तेग चलायो जायी । काटयो शिरधड दूर गिरायी ॥ ताह अवसर अचरजअस भयञ्ज । देखत दुनी अचम्भो ठयञ्ज ॥

कमालबोध

( ३ )

कटे अङ्गसों धार बहायी । आधा रक्त अरु दूध चलाई ॥ शाह सिकंदर अन्देशा माने । भेद न जाने मनमाँहि तवाने ॥ स्वामीके तन चलत दुइ धारी । हाहाकरे तब दुनिया सारी ॥

दोहा-गुरु रामानन्दहि मारिया, काशी नगर मैझार ।

शाहके वेदन बहु बढचो, त्रास भई संसार ॥

यक तो वेदनको दुखभारी । दुसरे अचरज परी अगारी ॥ कहैं सिकन्दर मन अकुलायी । ऐसा कोई औलिया नाही ॥ हमरे तनको तपन बुझावे । बहुरी अचरज को भेद बतावे ॥ सबही कहै सुनों सुलताना । इनका शिष्य यक अहे सयाना ॥ मरल गौ कह बार जियाया । बहुतक अचरजतिनदिवलाया ॥ रामानन्दहु ते अधिक बड़ाई । सत्यकबीर कहैं सब ताई ॥ तिनको दर्शन करिये शाहा । सो पुनि कहिहैं अचरजकोराहा ॥ सुनत वचन सिकंदर भाई । कीन दर्श कबीर पहुँ जाई ॥ शाह सिकंदर दर्शन आये । मिटिगयीतपनसबहुःखमिटाये ॥ जबही शाह कियो दीदारा । मिटि गयी तपनअग्निकीझारा ॥ कहे शाह तुम सच्चे साई । तुमरे दर्श तपन बुझाई ॥

दोहा-जबही तपन बुझायउ, सतगुरु दीनदयाल ।

भइ प्रतीत तब शाहको, भयो शिष्य तेहि बाल ॥

चौपाई

भयसुरीद जुलहाके आयी । तब हा-जुलकरेन-नाम धराई ॥ ज्ञान ध्यान चरचा बहु कीन्हा । शाहसिकंदर शरणजब लीन्हा ॥

१-इस शब्दके ऊपर बहुत विचार किया, किन्तु शुद्धशब्दका पता नहीं लगा जुल करन न तो फारसी या अरबी शब्द है न संस्कृत या हिन्दी । कमालबोधकी एकही प्रति मेरे पास है जो सम्मत १९११ का लिखा हुआ है । विशेषता यह है कि यह पुस्तक खास पं श्री पाक नाम साहबके समयमें उन्हींके हुजूरमें रहनेवाले एक संतकीलिखी हुई है तथापि इसमें इतनी अशुद्धियां हैं कि एक २ चौपाईको पढ़नेमें दो दो मिनट लग जाता है तथापि हजारों सन्देह सहित कापी लिखी जाती हैं ।

नं. १० बोधसागर -२

( ४ )

बोधसागर

सतहतर लाखसो बीरा लीन्हा । सबहीं जीव अमरकर दीन्हा ॥ सतहतरलाखजिवलोकसिधाने । अपने अवगुनसबगये हिराने ॥ तब सिकंदर यक विनती लावा । मिहर गुरुकरि ताहि लखावा ॥ अहो साहिबमोहिंग्रन्थ लखाई । बाचे ग्रन्थ दिल समझाई ॥ तब सदूर हुकुम अस कीना । जस मांग्योशाहतसतेहिदीना ॥ नवी सिन्दको लेहु बुलायी । कागजकमलसबसाथलिवायी ॥ शाह सिकन्दर तुरत बुलाये । सवाला खसोतेही बेर आये ॥ सवालाख देह बीर तब कीना । सोउ सिकन्दर सब सुधिलीना ॥ तनमनधन जब अर्पण कीना । शिरके साट साहब चीन्हा ॥ फिरे शाह जब दिल्ली आये । काजी मुछा सब सुनि पाये ॥ शेखतकी रहे उनपर पीरा । सब मिलि गये उनके तीरा ॥ सब मिल कहैं सुनो मम पीरा । शाहसिकंदर कसभये अधीरा ॥ काशी माहिं गये जब शाहा । कबीरहि कीन्ह गुरु नरनाहा ॥ सुतन तकी बहुते रिसियाना । का तुम कहौअसबातबिराना ॥ ऐसा कैसा ख्याल खिलायो । कैसे मोरा मुरीद फिरायो ॥ चलो जाइये शाह दरबारा । सब मिलि पूछें ज्ञानविचारा ॥ जुलहा मुरीद कससो भयऊ । सो सब पूछें तिसका भैऊ ॥ केहि कारण मुरीद सो हुआ । काजीमुल्ला सब कहैं सूआ ॥ सब मिलि आये भरे दरबारा । बैठे तख्तशाह सरदारा ॥ तिन कहैं आदरशाहभलदीन्हा । तिन पुनि प्रश्न पूछिसो लीन्हा ॥ कहो शाह तुम कहाँ मत पाये । कैसे अपना ईस्म फिराये ॥ काफिर कहैं मुरीदकस तुम हुये । काजीमुल्ला सब कहैं सुये ॥ दीनके घर कहैं टोटा भाई । दीनका कर आदिमो आई ॥ सो तुम कैसे दियो मिटायी । चार बिहिस्त अछाहफरमायी ॥

१ नाम

कमालबोध

( ५ )

इनकूँ तजि आगे कहँ जाओ । चार मुकाम लाहूत सो भाओ ॥ दीन इस्लाम असल दरसायो । सोतुम छोड़ि कहँ भटका खायो ॥ दीन दुनीके तुम सरदारा । कैसे मेटचो दीन तुम्हारा ॥ खुदाके अहदी काजी कहावैं । दीन इसलामको राह बतावैं ॥ दीन इसलाम असल है भाई । और सबे जग कुफर चलाई ॥

सिकन्दर वचन

मुनत सिकन्दर उत्तर दीन्हा । सबको मन अचरज असभीना ॥ भूले काजी भूले मुलाना । तिनहू भूले लाये फरमाना ॥ दीनका घर दूर है भाई । बिन जाने तुम असल ठहराई ॥ किसने विहिस्त बैकुण्ठ बनाया । दीनका असल किसने फरमाया ॥ दोहा-काजी मुछा भूलिया, भरमें सकल जहान । मुहम्मद भूले संदेशसे, सोई लाये फरमान ॥

चौपाई

एते सतगुरु दिल्ली आये । शाहसिकन्दर बहुत सुखपाये ॥ जमुना बिच है महल सुबारक । बैठे पीर जहाँ होइके फारक ॥ काजी मुछाको लिये बुलाये । शेखतकी तुरत चलि आये ॥

शेखतकी वचन

कहशेखतकी जुलम तुम कीना । मुरीद हमार फिरायके लीन्हा ॥ काह कियो सुनो मति धीरा । जुलम किया तुम दास कबीरा ॥ कौन इलम शाइको दिखलायी । कौन सुधि तुम नाम सुनायी ॥

कबीर वचन

मियाँ हम इलम फकीरी बोलेँ । समरथ नाम लिये जग डोलेँ ॥ हम दुवैश हैं दर्प दिवाना । सतकी चाल चलेँ जग जाना ॥

काजीमुल्ला वचन

निराकार जिन कुरान बखाना । नूर जो उत्तरयो सब जग जाना ॥ कही खुदाकी और निनारा । इसका हमको कहो विचारा ॥