कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( ३८ )
बोधसागर
चौपाई
कहै गुरु तुम शिष्य भये मोरे । यह सब बुद्धिको दीनेहु तेरे ॥ कहै कबीर सब तुम परतापा । हमरे तुमहि माया अरु बापा ॥ तब गुरु हमपर भये दयाला । निजकरदियौ सुमिरिनी माला ॥ कहै गुरु सुन साधु कबीरा । तुम तो सेवक हो मतिधीरा ॥ सर्वांनंद विप्र यक आये । तिन पुनि गुरुते गोष्ठि कराये ॥ ताहि जीत गुरु शिष्य करावा । तब गुरु हम कह तिलककरावा ॥ सब पर श्रेष्ठ हमें गुरु कीना । हम पुनि सबते रहै अधीना ॥
साखी-गुरुके सब शिष्य मोहिको, बोलैं गुरुसमान ।
हम गुरु साधु अधीन हैं, भाषै निर्भय ज्ञान ॥
शब्द
लख कोई विरलापद निर्बान । बिन रसना सूर धरै ध्यान ॥ तामें दरसे पुरुष पुरान । कर्म छोड़ि सब भर्म नसान ॥ डुरमति छोड़ि कमल धरु ध्यान । तीन लोकमें काल समान ॥ चौथे लोकमें नाम निसान । रामानन्द गुरु करै बखान ॥ दास कबीरको निरमल ज्ञान ।
इति
मेरो नाम कबीरा हो जगत गुरु जाहिरा । तीन लोकमें मागा मेरा त्रिकुटी है अस्थान ॥ पानीपौन समेरसमाना इस विधि रच्यौ जहाना । गगन मन्दिरमें वासा मेरा मंजनि है अस्थाना ॥ ब्रह्मबीज हमहीसे आया हमरै सकल जहाना । अनहद लहर गगन गढ उपजै बाजै सोहं तारा ॥ गुप्त भेद वाहीसे कहिये जो निज होय हमारा । भवबंधनसे लेहु छोड़ाई निरमल करो शरीरा ॥
आगमनिगमबोध
( ३९ )
सुर नर सुनि कोई भेद न पावै पावै संतगंभीरा ॥ वेद कदापि पार नहिं पावै ऐसे मतिके धीरा । कहै कबीर सुनो रामानन्द दोनों दीनके पीरा ॥
चौपाई
रामानन्द कबीर कहानी । जक्तमाह बहु विधि विहरानी ॥ कछु मैं सूक्ष्म लिख्यौ बनाई । कीरति जासु जक्तमें छाई ॥ सत् कबीरको चरित अनेका । सो कछु इहां लिखौ नहिं एका ॥ केते परचा गुरुहि देखाई । तब ताके हिय निश्चय आई ॥ मैं घनघोर गुष्ठि गुरु पाही । अगम ज्ञान सुनि बोले ताही ॥
रामानंद वचन
दोहा-मैं जाना तुम जोलहा, मोहि पडा बड घोष । मूल दिशा मोहि देव कबीर, जीवत आवै संतोष ॥ करता तुम हो साधू हो, सत्य कबीर है देव । तनमन तुमको अपिहों, करह दीक्षा मोहि देव ॥
सत्यकबीर वचन-शब्द
सारखी-काल करन्ते आज कर, आज करंते अब । औसर बीता जात है; व्यौहार करोगे कब ॥ काल करंते काल है, मोहि भरोसा नाहिं । यह तनं काचा कुम्भ है, विनशि जाय छनमाहिं ॥ घडी पलकको सुधि नहीं, करो कालको साज । काल अचानक मारि है, ज्यों तीतरको बाज ॥
चौपाई
योगी गोरख नाथ प्रतापी । तासुतेज पृथ्वी पर व्यापी ॥ काशी नग्रमें सो पग परही । रामानन्दसे चर्चा करही ॥ चरचामैं गोरख जय पावै । कंठी तोरे तिलक छुडावै ॥
( ४० )
बोधसागर
सत्य कबीर शिष्य जब भयऊ । यह वृत्तांत तब सो सुनि लयऊ ॥ गोरखनाथके डरके मारे । बैरागी नहीं वेष सँवारे ॥ तब कबीर आज्ञा अनुसार । वैष्णव सकल स्वरूप सँवारा ॥ सो सुधि गोरखनाथ जो पायौ । काशीनथ शीघ्र चलि आयौ ॥ रामानन्दको खबरि पठाई । चर्चा करो मेरे सँग आई ॥ रामानन्दकी पहिली पौरी । सत्य कबीर बैठे तिहि ठौरी ॥ कह कबीर सुन गोरखनाथा । चर्चा करो हमारे साथा ॥ प्रथम करो चर्चा सँग मेरे । पीछे मेरे गुरुको टेरे ॥ बालक रूप कबीर निहारी । तब गोरख ताहि बचन उचारी ॥
सत्यकबीर वचन--शब्द
कबके भये वैरागी कबीरजी कबके भये वैरागी । नाथजी हम जवसे भये वैरागी मेरी आदि अन्त सुधिलागी ॥ धुधूकार आदिको मेला नहीं गुरु नहीं चेला । जबका तो हम योग उपासा तबका फिरों अकेला ॥ धरती नहीं जदकी टोपी दीना ब्रह्मा नहीं जदका टीका । शिवशंकरसो योगी नहीं जदका झोली शिवका ॥ द्रापरकी हम करी फावडी त्रेताको हम दंडा । सतयुग मेरी फिरी दुहाई कलियुग फिरौ नौखण्डा ॥ गुरुके वचन साधुकी संगत अजर अमर घर पाया । कहैं कबीर सुनोहो गोरख जब हम तत्त्व लखाया ॥ जो बूझे सो बावरा क्या उमर हमारी । असंख्य युग परलय गई तबके ब्रह्मचारी ॥ कोटि निरंजन हो गये परलोक सिधारी । हम तो सदा महबूब हैं सोहं ब्रह्मचारी ॥ दश कोटि ब्रह्मा भये नौ कोटि कन्हैया ।
आगमनिगमबोध
( ४१ )
सात कोटि शंभू भये मोरी एक पलैया ॥ कोटिन नारद होगये महम्मदसे चारी । देवतनकी गिनती नहीं है क्या सृष्टि विचारी ॥ नहीं बूढ़ा नहीं बालक नहीं भाट भिखारी । कहै कबीर सुन गोरख यह उमर हमारी ॥ अविध्व अविगतसे चलि आये कोई भेद सरम नहीं पाया । ना मेरो जन्म न गर्भवसेरा बालक है देखलाया ॥ काशीनथ जङ्गल विचडेरा तहाँ जोलाहे पाया । माता पिता मोरे कछु नाहीं न मेरो गृहदासी ॥ जुलाहाको सुत आनिकहाया जगत करत है हाँसी । धड नहीं मेरे गगन कछु नाहीं सूझै अगम अपारा ॥ सत्य स्वरूपी नाम साहेबको सौहै नाम हमारा । अधरद्दीप नहीं गगन गुफामें तहँनिजु वस्तु हमारा ॥ ज्योतिषरूपी अलख निरञ्जन सो जपै नाम हमारा । हाड चाम लोहू नहीं मोरे हौ सतनाम उपासी ॥ तारन तरन अभै पददाता कहै कबीर अविनाशी ।
गोरखवचन
कौन छुरा कौन पानी गुरु मूँडै कौन बानी ॥
सत्यकबीर वचन
शब्द छुरा निरञ्जन पानी गुरु मूँडै निरबानबानी ।
गोरखवचन
कौन दर कौन दरवेश कौन गुरुने मूँडै केश ॥
कौन पुरुको सुमिरी नांव मांगो भिक्षा भांडो गांव ॥
सत्यकबीर वचन
मन दर पौन दरवेश गुरु गोविंदने मूँडै केश ॥
अलख पुरुषको सुमिरो नांव मांगो भिक्षा तारो गांव ॥
( ४२ )
बोधसागर
गोरख वचन—चौपाई
कौन तुमारी उत्पत्ति कीनी । किसने तुमको माला दीनी ॥ कौन गुरु दीनो उपदेश । उतारो माला करो आदेश ॥
कबीर वचन
आदि पुरुषने उत्पत्ति कीनी । सिरजन हारने माला दीनी ॥ गुरु गोविंद दीनो उपदेश । न उतारों माला नाकरों आदेश ॥
गोरख वचन
क्या लै उठो क्या लै बैठो रहो कौनकी छाया । कौन माह निरञ्जन पेखे कैसे त्यागी माया ॥
कबीर वचन
एकले उठ एकले बैठे रहै एककी छाया ॥ एकै माह निरञ्जन पेखा सहजे त्यागी माया ॥
गोरख वचन
कौन तुमारी डिब्बी बोलिये कौन तुमारा चावल ॥ कौनसो तुममें सिद्ध बोलिये कौनसो तुमरो रावल ॥
कबीर वचन
काया हमारी डिब्बी बोलिये कर्म हमारे चावल ॥ एक हमसे सिद्ध बोलिये और सकल है रावल ॥
गोरख वचन
कौन तुमारी गुदरी बोलिये कौन तुमारा धागा ॥ कौन तुमारी टोपी बोलिये काहेते मन लगा ॥
कबीर वचन
काया हमारी गुदरी बोलिये पौन हमारा धागा ॥ गगन हमारी टोपी बोलिये अलख पुरु मन लगा ॥
आगमनिगमबोध
( ४३ )
गोरखवचन
कौन तुमारी तिलक बोलिये कौन तुमारा छापा ॥ कौन तुमारी जाति बोलिये कहा तुमारी आसा ॥
कबीरवचन
तत्त्व हमारी तिलक बोलिये राम नाम है छापा ॥ वैष्णव हमारी जाति बोलिये शब्द मंडलमें आसा ॥
गोरखवचन
शब्द कहाँसे आया कहो शब्दको विचार ॥ नहीं तो तिलक माला धरो उतार ॥
कबीरवचन
शब्दै धरती शब्दै अकाश । शब्दै पांच तत्त्वके बास ॥ कहैं कबीर हम शब्द सनेही । शब्द न बिनसै बिनसै देही ॥
गोरखवचन
अंडान मंडान चार खुरो द्वै कान ॥ जान तो जान नातो झोली माला उरे आन ॥
कबीरवचन
अण्डान धरती मंडान आकाश चारों खूट चारोंखूरी चंद्रसूर्यद्वै कान ना जानो मात्रा तो गुरु रामानंदकी आन ॥ शेर्ली सिंगी और खटपटी । फिर बोलो तोरों कनपटी ॥
गोरखवचन
आसन बांधो बासन बांधो अरु बांधो नौद्वारा ॥ तोहि बांधों तेरे गुरुको बांधों निकसे कौने द्वारा ॥
कबीरवचन
आसन मुक्ता वासन मुक्ता मुक्ता है नौ द्वारा ॥ मैं मुक्ता मेरो गुरुभी मुक्ता निकसै दशमें द्वारा ॥
( ४४ )
बोधसागर
चौपाई
गोरखनाथ कबीर समाजा । विविध ज्ञान विज्ञान विराजा ॥ चर्चा पर्चा बहुविधि ठानो । विदित जत्तमें लोगन जानो ॥ इहांसो कथा लिखो नहिं कोई । अन्त बाद जिहि औसर होई ॥ गोरख नर्म भये तिहि बारा । विनयसहित निजबचनउचारा ॥
गोरखबचन
नवो नाथ चौरासी सिद्ध, इनको अनहद ज्ञान । अविचल घर कबीरको, यह गति विरलाजान ॥ झोरी झण्डा कूबरी, शेली टोपी साथ । दाय़ा भई कबीर की, चढ़ाई गोरखनाथ ॥
धर्मदास बचन
दोहा-बाजा बाजा रहितका, परा नगरमें शोर । सतगुरु खसम कबीर है, नजर न आवै और ॥
नानकशाह बचन
शब्द-वाह वाह कबीर गुरु पूरा है । पूरे गुरुनकी मैं बलि जैहौं जाको सकल जहूरा है ॥ अधर दुलैच परै है गुरुनके शिव ब्रह्मा जह शूला है ॥ श्वेत ध्वजा फहरात गुरुनके बाजत अनहद तूरा है ॥ पूर्ण कबीर सकल घट दरशै हरदम हाल जहूरा है ॥ नाम कबीर जपै बडभागी नानक चरणको धूरा है ॥
सत्य कबीरबचन नानकशाहप्रति
शब्द-वाह वाह लडके जीतारहु । मंड़येकी रोटी बथुयेकी भाजी ठंडा पानी पीतारहु ॥ प्रेमकि मुई सुरतिको धागा ज्ञानगूदरी सीतारहु ॥
आगमनिगमबोध
( ४५ )
यहि लडकेकी बड बड अँखियां नितप्रति दरशन करतारहु ॥ कहैं कबीर सुनो भाई लडके रामरसिक रस पीतारहु ॥
मल्लुकदास वचन
शब्द-जपो रे भाई साहिब नाम कबीर ॥
एक समय गुरुवंशी बजाई कार्लिंदीके तीर ।
सुरनरसुनि सब चकित भये हैं अरु यमुनाजीको नीर ॥
काशी तजि गुरु मगहर आये दोऊदीनके पीर ।
कोइ गाड़ै कोइ अभ्रजलावै नेक न धरते धीर ॥
चार दागते सतगुरु न्यारा अजर अमरो शरीर ।
जगन्नाथको मंदिर थापे हटि गये सायर नीर ॥
आसा रोपि ससुद्ध हटाये ऐसे गुरु गँभीर ।
दास मल्लुक श्लोक कहत हैं खोजहु खसम कबीर ॥
दाबूराम वचन
साखी-अधर चाल कबीरकी, मोसे कही न जाय ।
दाढ़ कूदै मिरग ज्यों, पर धरनि पर आय ॥
हिन्दूको सतगुरु सही, सुसलमानको पीर ।
दाढ़ दोनों दीनमें, अदली नाम कबीर ॥
हिन्दू अपनी हृद चले, सुसलमान हृद माह ।
दाढ़ चाल कबीरकी, दोऊ दीनमें नाह ॥
दाढ़ बैठे जहाजपर, जो दरियाके तीर ।
जलकी जेती माछरी, रटै कबीर कबीर ॥
नाभाञ्च वचन
दोहा-वानी अरबो खरबो, ग्रन्था कोटि हजार ।
करता पुरुष कबीर, रहै नामे विचार ॥
नं. १० बोधसागर - ८
( ४६ )
बोधसागर
गरीबदास वचन
सारखी-गरीबपंजा दस्त, कबीरकासिरपर धारो हंस । जम किंकर चपै नहीं, अथर जात है वंश ॥
श्रीमहादेव उवाच
श्लोक-यः सुखसागरो दाता बीजज्ञानं तथैव च । आद्यन्तरहितो लोके यः कबीर इहोच्यते ॥ कलांशेन गतो भूम्यां विलासा सत्य संज्ञकः । दीनोद्धारतिदक्षः कबीरसंज्ञः इहोच्यते ॥ कर्ताकोन्यायकारी च व्यक्ताव्यक्तःसनातनः । रमते सत्यलोके यः स कबीर इहोच्यते ॥
पारवतीजीने पूछा कि कबीर किसको कहते हैं ? उनके उत्तरमें शिवजीने कबीर साहिबकी स्तुतिमें सौ एक श्लोक कहे हैं उस ग्रन्थको कबीर एकोत्तर कहते हैं जो सामवेद और पाताल खण्डमें हैं उसमेंसे यह तीन श्लोक लिखे हैं ।
इति
अथ वैष्णव आचार वर्णन-चौपाई
सहित बिचार आचार घनरे । उज्वल क्रिया तासुकी हेरे ॥ नित दातन मज्जन तन करही । शौच क्रिया भली भाँतिसे धरही ॥ मांस मद्य आदिक हैं जेते । जानि अभक्ष न संग्रह तेते ॥ जप तप ध्यान धुन्दधते धारे । ठाकुरकी पूजा विस्तारे ॥ मूरति होय कि मानस ध्याना । उभय भाँति हरि सेवा ठाना ॥
अथ मूर्तिपूजा आठ प्रकार वर्णन
दोहा-मनोमयी परतक्ष कही, चित्र बखानो काठ । माटी धात ध्यानमय, प्रतिमा पूजा आठ ॥
आगमनिगमबोध
( ४७ )
चौपाई
प्रथमहि पानी विद्या जानो । विनविद्या किमिहरि पहिचानो॥ द्वितिये पुष्पको अर्थ कहीजै । एक देवकी टेक कहीजै ॥ तृतिये चावल अर्थ सुनाओ । भोग अशुचिपरधान्यन खाओ॥ चौथे चन्दनते इमि जानी । काम क्रोधकी कीजै हानी ॥ कीना डाह द्वेष सब जोई । उरते दूर बहाओ सोई ॥ पंचम धूप अर्थ इमि कहिये । प्रीति देव गरमीते गहिये ॥ छठये दीपको अर्थ बताओ । बुद्धिदीप निजहृदय जगाओ ॥
अथ मुक्तिस्वरूप वर्णन—चौपाई
जीवते ब्रह्म होय जो कोई । मुक्तनाम भाषे श्रुति सोई ॥ चार भांतिकी मुक्ति प्रमाना । सालोको सामीप बखाना ॥ सारूपो सायुज्य कहीजै । ऐसो तिनको अर्थ गहीजै ॥ सालोकहिं प्रभु लोक निवासा । सामीपा हरिके ढिग वासा ॥ सारूपा प्रभु रूप हो भाषा । सायुज्यौ हरिमें मिल दासा ॥ जस वासना दास उर होई । तैसी मुक्ती पावै सोई ॥ जब उपासना पूर्ण भैऊ । जीवनमुक्त ताहि तब कहेऊ ॥ परम धामको जब सो जावै । हरिपारषद तासु ढिग आवै ॥ जब हरिधामको चालन लागे । थूल देहको तब सो त्यागे ॥ लिंगदेह तब धारण करई । पांचो तत्त्व देह परिहरई ॥ जब भूलोकते आगे चाला । पृथ्वी तत्त्व देह तब डाला ॥ बहुरि देह पानी की धारा । तब जसतत्त्व लंघिहो पारा ॥ बहुरि अग्निदेही गह सोई । पार अग्नि घेरा तब होई ॥ फेर वायुकी देहको धारी । पौन घेर बाहर पग धारी ॥ इमि तन त्यागत गहनव्रीना । सकल घेर बाहर पग दीना ॥ चलि ब्रह्मांड पार जब कीता । मायापार भो त्रिगुणातीता ॥
( ४८ )
बोधसागर
पुनि परमात्म प्रकाश बखाना । तामें जाय करे असनाना ॥ करि असनान लिंगतन छोडा । दिव्य देह अबिकारी जोडा ॥ ज्ञानानंद ब्रह्म तन पाई । निज स्वामी के द्वारे जाई ॥ आदरयुत प्रभुके ढिग आवै । हरिगुण विविधि मांतिसे गावै ॥ प्रभु दायामाया ते छूटा । कठिन दुःखते प्रभुपद जूटा ॥ ब्रह्मानंद मगन मन होई । यद्यपि ऐसो समरथ सोई ॥ रचे अमित ब्रह्मांड जो चाहे । पालपोषिके पुनि तिहि ढाहे ॥ तदपि ब्रह्म सुख ऐसो लहई । और दिशा नहीं तो चितबहई ॥ याहूमें व्यौरा बहु तेरा । कथा कछुक लिखिये तिनकेरा ॥ व्यौरा वेद कहे यहि भाये । जो कोई सुक्त स्वरूप समाये ॥ सागरमें जस बुंद समाना । पै वह बुंद आपको जाना ॥ बढ़ुरि कहै श्रुति ऐसो लेखो । ऐसी मुक्ति जीवको देखो ॥ पुष्पमाल जैसे हरि केलो । अथवा जैसे भूषन हेरो ॥ यहिविधिजिवहरि अंगमें जूटा । जिहि औसर मायाते छूटा ॥
इतिमुक्त
अथ परलोकमें पुण्यात्मा और परमात्माको वर्णन दोहा-कथा कहौ परलोककी, जब जिव त्यागे प्रान । मुरछा मृतके गत भये, पुनि तिहि जक्त फुरान ॥
चौपाई
जीवकी जब मूरछा गत होई । इंद्रिन सहित आप तन जोई ॥ पिछली स्मृतिहि दियो बिसराई । जन्म धरंत आपको पाई ॥ बाल युवा बृद्धादिक माना । जाति पांति कुलमें लपटाना ॥ भ्रम करिके जित जगको देखा । जैसे कछु स्वपनेको लेखा ॥ जाग्रत स्वप्न भेद नहीं कोई । स्वप्नहुमें स्वपनांतर होई ॥ भ्रमही करि पितु माता जाना । मिथ्या भास गहे अज्ञाना ॥
आगमनिगमबोध
( ४९ )
मृतक होय जीव जिहि बारा । देह अन्त बाहक तब धारा ॥ बहुरि बासना प्रेरि लै आवै । अधि भौतिक देही दिखलावै ॥ अधि भौतिक देहि जब पाया । दुखसुखको कारन यह आया ॥ हृदय कमल अंगुष्ठ प्रमाना । जीव अकाश जौ नाम बखाना ॥ ताहि कमलमें भर्मत रहई । लोक अनन्त दृष्टिमें गहई ॥ तहैं कोटिन ब्रह्मांड निहारी । हृदय कमल निज माह विचारी ॥ तीन प्रकार पुण्य जन राशी । मूरख पुनि धानां अभ्याशी ॥ तृतिये सर्व शिरो सुनि ज्ञानी । भिन्न २ गति निर्णय ठानी ॥ धानां भ्यासीकी यह बाता । तन तजि इष्ट देव दिग जाता ॥ अपने इष्ट देव पुर जाई । नाना विधि सुख भोग कराई ॥ नहिं मूरख नहिं ज्ञानी जोई । सुखसे निज तन त्यागे सोई ॥ बहुरि जन्म जगमें सो पाई । पुनि सो आतम लाभ लहाई ॥ अब ज्ञानीकी कथा बखानी । तजत देह सब सुखकी खानी ॥ मुक्ति विदेह तासुको ठीका । जिनके हृदय ज्ञानको ठीका ॥ पापीको अब मरण बतावो । महा दुःख ताके उर छावो ॥ जिनको अज्ञानिनको सङ्ग । उत्तम बुद्धि होय जिहि भंगा ॥ पापी चार कर्म जो करही । श्रुति विरुद्ध मग माह बिचरही ॥ तजै देह जब ऐसे लोगा । तिनको घेर शूल सौ सोगा ॥ विषय बुद्धि जासु लपटानी । दुसह दुःख पावै सो प्रानी ॥ हो पदार्थसे तिनहि वियोगा । रुंधित कंठ स्मृत सुख भोगा ॥ नैन तासु दोउ तब फटि जाही । कांति विरूप अंग हो ताही ॥ अंग उपांग टूटै तिहि बारी । प्रान निकसिगहि मारग नारी ॥ होय पदार्थ वियोग दुखारी । अस अनुमान करे दुख भारी ॥ अग्नि कुंडमें डारे जैसे । दुःसह पावै दुखजिव जैसे ॥ सर्व द्रव्य तिहि भ्रमयुत भासा । नभ पृथ्वी पृथ्वी आकाशा ॥
( ५० )
बोधसागर
परम कष्ट पावै तिहि काला । नभते जनु कोइ महिमें डाला ॥ पाथर में धरि मनहु पिसाना । जिमि तून भोडरमें भरमाना ॥ अंध कूपमें जैसे गेरा । मानहु कोल्हूमें धरि पेरा ॥ रथते गिरे जीव जिमि नीचे । रस्सी ज्यों गलडारिके खींचे ॥ दुःख अनंत परकार बखानो । कह लो ताकी निर्णय ठानो ॥ मूर्छित होय गहै जडताई । ताके कर्म जुरहि सब आई ॥ जिमि किशान बीजनको बोवे । समय पाय ताको फल होवे ॥ प्रान अपान कला दोउ टूटे । विषय वियोग महा दुख जूटे ॥ मृत्यु समय जब जिव सुरछाना । गगन लीन हो पौन अरु प्राना ॥ ताहि प्रानमें चेतन ताई । चेतनता बासना गहाई ॥ सहित बासना चेतन प्राना । गगन रूप है गगन समाना ॥ यथा गंधको पौन गहाई । ताहि सहित नभ स्थित कराई ॥ तिमि चेतन बासन सहिते । जाय अकाश माह सो थीते ॥ तिहि अनुसार बहुरि जगफुरता । तब कालते सो तिहि जुरता ॥ दोय प्रकारके जीव दुखानी । पापी अरु पुण्यातम प्रानी ॥ पुनि तिनमें कर तीन विधाना । एक महा पापी करि जाना ॥ द्वितिय मध्य तृतिये लघु होई । तीन प्रकार पुण्य जन सोई ॥ एक महा पुण्यातम लोई । पुनि मध्यम लघुको मतिजोई ॥ प्रथम महा पापी दुख हेरे । धन पखान सो ताको टेरे ॥ जड समान सुरछामें रहई । वर्ष सहस्र न चेतन गहई ॥ ताहु सुरछामें दुख भूरी । बहुरि ताहि चेतनता फूरी ॥ जब ताके तनमें सुधि आवै । आको देह सहित लखि पावै ॥ तब सो जायके नरकमें परता । अमित काल तामें दुख भरता ॥ नाना भांति परम दुख पाई । बहुरि नरकते बाहर आई ॥ देह अनंत धरे पशु केरा । बहुरि सो मानुष को तन हेरा ॥
आगमनिगमबोध
( ५१ )
जब धारे सो मानुष देहा । महा नीच दारिद्री गेहा ॥ सोऊ तन धरि दुःखबहु भोगा । कबहु न सुख पावैसो लोगा ॥ अब मध्यपापी गति वरणो । जाहि समय होतोको मरणो ॥ जडीभूत हो वृक्ष समाना । उर अंतर दुख दौंदह काना ॥ कछुक काल पीछे सुधि आवै । अर्क माह निज वासा पावै ॥ नर्क भोगि पुनि पशुतन धारी । फिर नरदेह केरि अधिकारी ॥ अब सुन लछु पापीकी वाता । मूर्छित हो पुनि चेतन गाता ॥ नर्क भोगि पुनि पशु कलेवर । ताहि भोगिफिरमानुषतनधर ॥ अब पुण्यातमको कह मर्मा । जिनके जक्त मोह भल कर्मा ॥ महा पुण्यजन जब मरिजावै । स्वर्गसे तब विमान चलि आवै ॥ तिहि विमानपर ताहि चढाई । आदर सहित वाहि ले जाई ॥ जाहि देवताको सो ध्यावै । तासु लोक निज भौन बनावै ॥ अपने इष्टदेव ढिग जाई । सबहि भांतितिहिमुखसरसाई ॥ भोगि स्वर्ग आवै नर देशा । काहू फलमें करै प्रवेशा ॥ तिहि फलको पुरुष जो खाई । वीर्य द्वार तिहि उदर समाई ॥ जननी जठरते बाहर होई । उत्तम कुल धनवंता सोई ॥ जौं वासना रहित हो येही । तो सौं धरे संत गृह देही ॥ सहित वासना सुख सरसाया । रहित वासना भक्ति अमाया ॥ अब मध्यम धर्मी गति सुनिये । प्रेरित पुण्यस्वर्ग ग्रह गुनिये ॥ अब लछु पुन्यातप गति कहई । मृत्यु पीछे अस चेतन गहई ॥ सगे बंधु मम क्रिया कराही । ताते पितर लोक हम जाही ॥ पितरलोक सुख लहि महि आवै । जैसा कर्म देहै तस पावै ॥ पापी सुये दुःख चहुँ पास । महा कठिनमारगतिहिभासा ॥ जिहि मारग ताको लेजाई । कंटक लगे चरन में ताही ॥ तपै तेज रबि तापै भारी । ताते ताको तन जर छारी ॥
( ५२ )
बोधसागर
जो कोई पुण्यातम लोई । छायाको अनुभव तिहि होई ॥ सुन्दर सर वापी विधि नाना । चहुँदिश बने सोहावनथाना ॥ सुखद पंथसे तेहि लेजाही । पापीको सब बुःख दरशाही ॥ धर्मरायके ढिग जब जावै । चित्रगुप्त तब लेख लगावै ॥ चित्रगुप्त क्रम कागज खोले । सबके पुण्य पापको बोले ॥ चित्रगुप्त जस न्याव चुकावै । तैसे जीव दुःख सुख पावै ॥ बडे पूण्यते स्वर्ग बसेरा । जगमें सब सुकर्म जिन केरा ॥ जहां तहां शोभित बन बागा । भांति २ के दुम तहाँ लागा ॥ इन्द्रके नन्दन बनकी शोभा । जाहि देखि मुनिवरमनलोभा ॥ देव अंगना केर छवि भारी । महा मोहनी रूप सँवारी ॥ स्वर्ग गुन सुख कथे बहुता । लहे जीव निज पुण्य प्रसूता ॥
दोहा-जैसे स्वर्गमें सुख घने, तिभि दुःखनर्कअनंत ।
होय जहां यमयातना, बहुविधि वेद वदंत ॥
इति
अथ प्रलयवर्णन-चौपाई
तैतालिस लाख बीस हजारा । चहुँ युग आयु यकठै धारा ॥ ताको सहस गुना पुनि करिये । एक ब्योस ब्रह्माको धरिये ॥ जैसी दिन तैसी है राती । जागे ब्रह्मा रैन सिराती ॥ दिनमें करै जगतको काजा । रैनमें निद्राको सुख साजा ॥ रैनमें सबही जगत नशाना । चन्द्र सूर्य लम्बादिक नाना ॥ केते ऋषि मुनि सहितविधाता । जीये और सकल विनसाता ॥ बहुरि वेद ऐसो अनुमाना । ब्रह्मा सहित सकल विनशाना ॥ दूजा ब्रह्मा पुनि तन धारी । कारय सकल करे संसारी ॥ जन्मको सूतक बहु नहि टूटै । एक मेरे दूजा पुनि जूटै ॥ न्यायशास्त्रअरुसांख्य बखाना । सकलकृतमतिदिकालसिराना ॥
आगमनिगमबोध
( ५३ )
पुनि वेदान्त सो मता गहीते । कृतम जाल कबहूँ नहि वीते ॥ एक मरे दूजा पुनि होई । कारय जक्त सनातन सोई ॥ दोय प्रकारकि परलय होई । खण्ड प्रलय महा पल्य सोई ॥ खण्डप्रलय पुनि द्वैविधि कीनो । ऐसो ताको लेखा चीन्हो ॥ नाम चतुरमुख कल्प कहीजै । चौदह मन्वंतर तामें कीजै ॥ एक मन्वंतर जब बित जावै । तब जगमें जल प्रलय आवै ॥ पृथ्वी जड चेतन संहारा । सकल नसाहि ताहि जलधारा ॥ एक मन्वन्तरकी थित भाखा । तीस करोर पञ्चासी लाखा ॥ मध्यमें दोय मन्वंतर केरे । संधी नाम तासुको टेरे ॥ सत्रह लक्ष सहस्र अठाइस । तासन्धीको लेख लगाइस ॥ इतने काल जक्त नहि रहई । बरते शून्य वेद अस कहई ॥ बाल भोग लघु परलय जाना । महा प्रलय निश भोजन माना ॥ जब जो महाप्रलय तिहि आवै । मरा जो निश्चय देह सो पावै ॥ होय सकल जब धर्मकी हानी । पाप पयोधि बुडै नर प्रानी ॥ कतहु न दीख अचार बिचारा । मन मत पन्थ जक्त जिव धारा ॥
छन्दोटक
सुत मानत मातु न तात जही । गुरु सेवन देवन दान कही ॥ कलि कौतुक घोर कठोर महा । सुखदुःखितको हरिनाम कहा ॥ कपटी लपटी नर नारि गना । नहि मानत सन्त महन्त जना ॥ तपसी लपसी जग खात फिरे । सुंडिका धनिका बनिकार भिरे ॥ द्विज चिन्ह उनेउ न वेद किया । भगवाँ यक भेष अलेख प्रिया ॥ बहु यंत्रन मन्त्रन दर्व हरी । बिन राम रमे किमि काम सरी ॥ बिरती बिन सिद्ध जती फिरते । नहि ज्ञान है चित बिना थिरते ॥ कलिकाल कराल दुकाल मरी । नर पीडक सो दुख द्रंद भरी ॥ तजि रूपवती युवती भरता । नहि गारि लहो परनारि रता ॥
( ५४ )
बोधसागर
तिय सुन्दर पीय विहायगता । अरधंगन सङ्ग अनंग मता ॥ कर पाप अनंत भनंत कहा । परिताप संतापन लोग दहा ॥ श्रुतिपन्थ बिहायकुपन्थ चले । तजि अमृतछाकसो खाकडले ॥ गृह सम्पति दंपति हीन भये । दरवेश अलेखको भेष भये ॥ नहिं साध विषय क्रमसाधतये । विन सार लखे यमद्वार गये ॥ मदनातुर युत्य फिरै युवती । किमि भोग नरा नरही कुवती ॥ तिय ठाट भये जब घाट नरा । न अधार कहू विभिचार भरा ॥ उठिगे श्रुति धर्मनके बकता । मनमानता जो जेहि सो छकता ॥ बरणाश्रम धर्मके मर्म नहीं । सब शंकर भे न सुकर्म कहीं ॥ समता बिगता ममता गरको । जिव रोग वो शोकनमें ढरको ॥ अघ औगुन सौगुन जीव लदा । मन वांछित बोध न वेद वदा ॥
चौपाई
यहि विधि जक्त धर्म बिनसावै । तब हयश्रीव प्रगट हो आवै ॥ शिर तुरंग देही नर जाको । धावै सकल घरा परि पाको ॥ पौन प्रसंग अङ्ग तिहि पाई । जीवकि बुद्धि शुद्ध है जाई ॥ लघु प्रलय जब धर्मकि हानी । महाप्रलय अब कहो बखानी ॥ चीन्ह अनेक भयावन होई । औबा मरी भरी दुखजोई ॥ पश्चिम दिशिते रवि उगि आवै । द्वितीया दक्षिणमें प्रकटावै ॥ उत्तर पूरव सूर्य देखे । दशाहु दिशा दश रवि यह लेखे ॥ एक सूर्य प्रथमै ते रहऊ । बडवा अग्नि ते सोई कहेऊ ॥ बडवानल अरु ग्यारह सूर। द्वादश सूर्य तेजते पूरा ॥ शिव पुनि तीसर नैन उधारा । शेषके मुखते अग्नि प्रचारा ॥ महा तेज पृथ्वीमें भरेऊ । थावर जङ्गम सब कछु जरेऊ ॥ पौन प्रचंड अण्ड भरि पेखे । परवत उडहि तूलके लेखे ॥ गिरि सुमेरु आदिक गिर नाना । सूखे पत्र सो गगन उडाना ॥
आगमनिगमबोध
( ५५ )
सात सिंधु तिहि काल छुभाही । जलकी वृद्धि एक है जाही ॥ पुष्कर मेघ कीन पुनि कोपा । जलसे सकल भूमिको तोपा ॥ मुसल धार पानी बरसाई । मोटा धार पुनि वृक्ष कि नाई ॥ बहुरि नदीकी धारा जैसे । नभसे पानी वरवै ऐसे ॥ ये तो जल दिशा उर्ध चढता । पहुँचे ब्रह्मलोक परजंता ॥ इन्द्र कुबेर आदिक दिगपाला । भोगिके ब्रह्म लोकको चाला ॥ यहि बिधि सकल जलामय होई । जीव जंतु कहुँ रहै न कोई ॥ पृथ्वी गलि जलमें मिलि जाई । तिहि औसर भैरों प्रकटाई ॥ पृथ्वीते आकाश लों देही । महा भयानक रुद्र है येही ॥ तिहु दृग मानहु सूर्य है तीनी । ऐसो तेज मयी कहि दीनी ॥ तिही भैरोंकी श्वासा चाले । पानीके ऊपर सो डाले ॥ पौन प्रचंड नासिका बाटा । ताते होय बारिको घाटा ॥ ताकी श्वासा जल जब सोखे । रहे रुद्र पुनि आपै चोखे ॥ दशहु दिशा शून्य है जाई । रविशशि अग्न्यादिक बिनशाई ॥ गुन अरु तत्त्व न कबहुँ प्रकाशा । सर्व शून्य वतैं चहुँ पासा ॥ भैरों तनते निजु तन धारी । प्रकटे महा भैरवी नारी ॥ महा भयावन मूरत जाकी । सप्त सिन्धुकर कंगन ताकी ॥ मानुष छाया देखो जैसे । भैरों तनते प्रकटै जैसे ॥ इन्द्र कुबेर वरुण यम काला । तिनके मुंडको पहिरे माला ॥ नृत्त करे सो तहैं तिहि बारा । अट्ट अट्ट करि शब्द उचारा ॥ भैरों और भैरवी दोई । नृत्त करे तब शून्यमें सोई ॥ बहुरि लय भैरवी है जाई । भैरोंके तन माह समाई ॥ अब कछु शेष रहा नहीं खेला । तब भैरों रहि गयो अकेला ॥ दोहा-धरतीसे आकाशलों, भैरोंकी जो देह । सर्व शून्य करि दशदिशा घटन लगी तब येह ॥
( ५६ )
बोधसागर
प्रथमें पर्वत सम भई, बहुरि वृक्षके भाय । पुनि अंगुष्ठ पुनिरेनसम, पुनि सो गई लोपाय ॥ सर्व शून्य दशहू दिशा, पिसा सकल संसार । दृश्य कतहुँ कछु नालहा, रहा अलख करतार ॥ ब्रह्माते ले जीव सब, जहाँ लगि कीट पतंग । मुक्ति विदेह महाप्रलय, रचना पावै वेद प्रसंग ॥ सब जिव मुक्ति विदेह लह, रचना जब पुनि होय । आतम सत्ता ब्रह्मने जक्त, फुरै पुनि सोय ॥
इति श्रीवेदधर्म वर्णन
अथ न्यायधर्म वर्णन
दोहा-कर्ता पुरुष है देव जहाँ, गुरु संन्यासी जान । न्याय शास्त्र सब मम कथा, धर्म ग्रंथ परमान ॥ अथ उत्पत्ति कथा वर्णन
सोरठा-न्याय शास्त्र परमान, नित्यानित्यको बाद बहु । जग सबही प्रकटान, सूक्ष्म तत्त्वसे जानिये ॥ प्रलय बहुरि जब होय, सूक्ष्म परमाणू रहै । ताते थूल गहोय, दूनों तिगुनो चौगुण ॥ परमेश्वर करतार, आदि अंत नहीं तासुको । गहे आप औतार, देते सोई चहुँ वेदको ॥ नर्क स्वर्ग आनित, जीवको सो शुभ ज्ञान । सो प्रभुसबको हितकहे सो तासुगुन आठ बिधि ॥
चौपाई
प्रथमहि ज्ञान प्रयत्न है दूजे । तीजे इच्छा संख्या चौथे ॥ पंचम पुनि परमान गनीजै । परथक्त्वा षष्ठमें भनीजै ॥ पुनि संयोग विभाग कहाये । ये ईश्वर गुन आठ गनाये ॥
आगमनिगमबोध
( ५७ )
जेती वस्तु जगतमें उपजाया । सोलह पदार्थते सबकी काया॥ तिनको भेद जो भलिविधिजाना । सोई पावै पद निर्वाना ॥ तीनों गुण ईश्वरके अंशा । तिनको ताही रूप प्रशंसा ॥
इति
अथ आदि सन्यासी दत्तात्रेयजीकी कथा—चौपाई
अत्री मुनि अनसूया नारी । नारि पुरुष कीनो तप भारी ॥ तीन देव तब हरिषित भेऊ । ब्रह्मा विष्णु शम्भु जिहि कहेऊ ॥ ताकै भौन गौन तिहि कीने । आदर मान तिन्हैं ऋषि दीने ॥ अनसुइया पुनि कीन रसोई । तीनों देव जिवावत होई ॥ भे प्रसन्न तब तीनों देवा । मांगो बर पूरण तब सेवा ॥ तब अनसुइया वचन उचारे । तुम समान हौ पुत्र हमारे ॥ दीन सोई बर मांग्यो जोई । पुनि मारग निज लीनो ओई ॥ अनुसुइया जैसो वर पाया । तीन पुत्र भे ताके जाया ॥ तिहुते तीन अंश परकाशा । दत्त चन्द्रमा अरु दुर्वासा ॥ दत्त विष्णु औतार कहाये । ब्रह्मा अंशते चन्द्र उपाये ॥ शिव औतार कहे दुर्वासा । धर्म चला जग तिनकी आशा ॥ दत्तसे दीगांबर संन्यासी । अवधूता मारग जो भाषी ॥ ब्रह्मा अंशते चन्द्र उपाये । सो निज भौन अकाश बनाये ॥ डुरवासा ते दंडी भेऊ । दंडी आदि ताहिको कहेऊ ॥ दत्तात्रेय के चौबिस चेले । धर्म कर्म संन्यास गहेले ॥
इति
अथ द्वितीय सन्यासी शंकराचार्यकी कथा—चौपाई
वरने भव्य न्यास बर बानी । जब कलि होय वेद मतहानी ॥ जैन बुद्ध मत अधिक पसारा । वेद धर्म निंदहि निरधारा ॥ जैन बुद्ध विधि गह नर लोई । वेद धर्म मानै नहि कोई ॥