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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

( ४८ )

बोधसागर

जहाँ जावै तहाँ निंदा करई । सो शिष कोध अगिन ते जरई ॥ ऐसे शिषको ठौर जो नाही । गुरु रुख लोपत है मनमाहीं ॥ वेद पुराण कहै सब साखी । साखी शब्द सबै यों भाखी ॥ मानुष जन्म पायकर खोवै । सतगुरु विमुखा युगयुग रोवै ॥ ताते सतगुरु शरना लीजै । कपट भाव सब दूर करीजै ॥ योग यज्ञ तप दान करावै । गुरु विमुख फल कबहु न पावै ॥ गुरुही जपतप तीरथ कहिये । गुरुही सांच अरु मिथ्या पहिये ॥ सतगुरु बिना मुक्ति नहिं कोई । ऊंच नीच भावै जो होई ॥ आतम ब्रह्म गुरु ते मेरा । ताके शरणों आयो मैं चेरा ॥ चार युगन जे संतहि भयऊ । ब्रह्मरूप होय पारहि गयऊ ॥ सो जानहु गुरु संग प्रभाऊ । लोकहु वेद न आन पराऊ ॥

दोहा—गुरु आज्ञा जिन जिन लही, सन्यो सकल विधि काज ॥ नरक रूप जग दूर धरयो, श्रीगुरु महाराज ॥

उपदेश प्राप्ति लक्षण—चौपाई

दोउ कर जोरि गुरुके आगे । करि बहु विन्ती चरनन लागे ॥ अति शीतल बोलै सब वैना । मेटे सकल कपके वैना ॥ हे गुरु तुम हो दीनदयाला । मैं हूँ दीन करो प्रतिपाला ॥ तुम बन्दी छोर अतिहि अनाथा । भवजल बूडत पकड़ो हाथा ॥ दै उपदेश गुरु मंत्र सुनाओ । जनम मरन भवदुःख छुडाओ ॥ यो अधीन होय शिष जबहीं । शिषपर कृपा करै गुरु तबहीं ॥ गुरुसे शिष जब दीक्षा मांगै । मन कम वचन धरै धन आगै ॥ ऐसी प्रीति देखै गुरु जबही । गुप्त मंत्र सुनावै तबही ॥ अरु भक्तिमुक्तिको पंथ बतावै । बुरो होय को पंथ छुडावै ॥ ऐसे शिष उपदेशी पावै । होय दिव्य दृष्टि पुरुषपेजावै ॥

सुभिरनबोध

( ४९ )

गुरुसेवा माहात्म्य

गंगा यमुना बद्दीश समेते । जगन्नाथादि धाम हैं तेते ॥ सेवे फल प्राप्त होय न जेतो । गुरुसेवामें पावै फल तेतो ॥ गुरु महात्म को वार न पारा । वरणेशिवसनकादिक अवतारा ॥ गुरु महिमा मोपै वरणि न जाई । महिमा अनन्तममम तिलघुताई ॥

गुरु भावना

गुरुको पुरुष ब्रह्मकर जाने । और भाव कबहुँ नहि आने ॥ काम क्रोध रहितगुरु मेरा । पाप पुण्यका करत निवेरा ॥ काम क्रोध लोभ समाना । तो शिष जानहु तीन समाना ॥ यही दृष्टिसे गुरुको सबै । तबतन मन धन गुरु सबको देवै ॥ तनकरि टहल करै गुरु सेवा । सो शिष लहै मुक्तिको मेवा ॥ बचन उचारे पुढुम सम वाणी । द्रव्य लगावै गुरुहित जानी ॥ ऊँच नीच सबही सुन लीजै । कबीर बचन प्रमाण करीजै ॥ मेरे और कछु नहि चहिये । गुरु भावना गुरुहिय लहिये ॥

दोहा—सात द्रौप नौ खण्डमें, औ इकीस ब्रह्मण्ड ।

सतगुरु विना न बाचिहौ, काल बढ़ो परचंड ॥

यही भाव भक्तिका लक्षण कहिये । गुरुके भाव विन भव जल बहिये ॥ जिन बातनसे गुरु दुख पावे । तिन बातनको दूर बहावे ॥ वेद पुराण सबै मिलि गावै । नेमी धर्मौ चौरासि न जावै ॥ अष्ट अङ्गसों दंड परनामा । संध्या प्रात करै निषकासा ॥ गुरुको शिष ऐसे नहि मानै । सो त्रयताप जरत चारो खानै ॥ योगी यती तपी आशरमा । बिनु गुरु कोउ न जानै मरमा ॥

गुरुचरणोदक माहात्म्य

कोटिक तीरथ सब करआवै । गुरु चरणा फल तुरतहि पावै ॥ कदाचित् चरणा मृत पावै । चौरासी गत सतलोक सिधावै ॥

( ५० )

बोधसागर

कोटिक जप तप करै करावै । वेद पुराण सबै मिलि गावै ॥ गुरुपद रज मस्तक पर देवै । सो फल तत्कालहि लेवै ॥

दोहा—गुरु चरणोदक अनन्त फल, हमते कही न जाय ।

मनकी पुरवै कामना, जो लेवे चित्त लगाय ॥

सतगुरु समान को हिन्तु, अन्तर करो विचार ।

कागा सो हंसा करै, दरसावै ततसार ॥

गुरु महिमा ग्रंथ यह, कहैं कबीर समझाय ।

पाप ताप सबही हरे, अमरलोक लै जाय ॥

इति श्रीगुरु उपदेश महिमायोग समाप्त


[कबीर पंथी भारत पथिक स्वामी श्रीयुगलानन्दद्वारा संगृहीत और संशोधित कबीर दर्शन लाइब्रेरीसे संपादित]

सुमिरनबोध

( ५१ )

गुरुमहिमा प्रारंभः

प्रथम खण्ड

चौपाई

गुरुकी शरणा लीजै भाई । जाते जीव नरक नहिं जाई ॥ गुरु मुख हो परम पद पावे । चौरासीमें बहुरि न आवे ॥ गुरु पद सेवे विरला कोई । जापर कृपा साहबकी होई ॥ गुरु विनु मुक्ति न पावे भाई । नरक उर्द्धमुख वासा पाई ॥ गुरुको कृपा कटे यम फांसी । विलम्बनहोयमिलेअविनाशी ॥ गुरु विनु काहु न पाया ज्ञाना । ज्यों थोथा भुसछडेकिशाना ॥ गुरु महिमा शुक्र देवजो पाई । चढि विमान वैकुंठे जाई ॥ गुरु विनु पढै जो वेद पुराना । ताको नाहिं मिलै भगवाना ॥ गुरु सेवा जो करे सुभागा । माया मोह सकलभ्रम त्यागा ॥ गुरुकी नाव चढे जो प्राणी । खेद उतारे सतगुरु ज्ञानी ॥ तीरथ वरत और सब पूजा । गुरु विन देवता और न दूजा ॥ नौ नाथ चौरासो सिद्धा । गुरुके चरण सेवे गोविन्दा ॥ गुरु विनु प्रेत जनम सब पावै । वर्ष सहस्र गर्भ मांहि रहावै ॥ गुरु विनु दान पुण्य जो करही । मिथ्या होय कबहुँनहिंफलही ॥ गुरु विनु भरम न छूटै भाई । कोटि उपाय करै चतुराई ॥ गुरु विनु होम यज्ञ जो साधे । औरो मन दश पातक बाधे ॥ सतगुरु मिले तो अगम बतावै । यमकी आंचताहिं नहिं आवै ॥ गुरुके मिले कटे दुख पापा । जनम जनमको मिटै संतापा ॥ गुरुके चरण सदा चित दीजै । जीवनजन्म सुफल करलीजै ॥ गुरुके चरण सदा चित जानो । क्यों भूले तुम चतुर स्थानो ॥ गुरु भगता मन आतम सोई । वाके हिरदे रहों समोई ॥

( ५२ )

बोधसागर

गुरु मुख ज्ञान ले चेतो भाई । मानुष जन्म बहुरिनहिं पाई ॥ सुख संपति आपन नहिं प्राणी । समझि देखु तुमनिश्वयजानी ॥ चौविस गुरु हरि आपहि धरिया । गुरु सेवा हरि आपहि करिया ॥ गुरुकी निंदा सुनै जो काना । ताको निश्वय नरक निदाना ॥ दशवां अंश गुरुको दीजै । जीवन जनम सुफल कर लीजै ॥ गुरु मुख प्राणी काहे न हूजै । हृदय नाम सदा रस पीजै ॥ गुरु सीढी चढ़ि ऊपर जाई । सुखसागरमें रहे समाई ॥ अपने मुख निंदा जो करई । शूकर स्थान जन्म सो धरई ॥ निगुरु करै करै मुक्ति आशा । कैसे पावै मुक्ति निवासा ॥ औरो सुकृत देह जो पावे । सतगुरु विन मुक्ती नहिं आवे ॥ गौरी शंकर और गणेशा । सबही लीन्हा गुरु उपदेशा ॥ शिव विरंचि गुरु सेवा कीन्हा । नारद दीक्षा भुवको दीन्हा ॥ सतगुरु मिले परम सुखदायी । जनम जन्मका दुःख नसाई ॥ जबगुरु किया अटल अविनाशी । सुर नर मुनि सब सेवक रासी ॥ भवजन नदिया अगम अपारा । गुरु विनु कैसे उतरे पारा ॥ गुरु विनु आत्म कैसे जाने । सुख सागर कैसे पहिचाने ॥ भक्ति पदार्थ कैसे पावे । गुरु विनु कीन जो राह बतावे ॥ गुरु मुख नाम देव रैदासा । गुरु महिमा उनहूँ परकासा ॥ तैतिस कोटि देव त्रिपुरारी । गुरु विनु भूले सकल अचारी ॥ गुरु विनु भरमें लख चौरासी । जनम अनेक नरकके वासी ॥ गुरु विनु पशु जनम सो पावै । फिर २ गर्भ बासमें आवै ॥ गुरु विमुख सोई दुख पावे । जनम जनम सोई डहकावै ॥ गुरु सेवे जो चतुर स्थाना । गुरु पटतर कोई और न आना ॥ गुरुकी सेवा मुक्ति निज पावे । बहुरि न हंसा भवजल आवे ॥ भवजल छूटन यही उपाई । गुरुकी सेवा करो सब धाई ॥

सुमिरनबोध

( ५३ )

सारखी-सतगुरु दीन दयाल है, देवे भक्ति सुकाम । मनसा वाचा कर्मना, सुमिरो सतगुरु नाम ॥ सत्य शब्द के पटतरे, देवेको कछु नाहिं । कहले गुरु संतोषिये, हवस रही मन माहिं ॥ अति उण्डा गहरा घना, बुद्धिवन्त मति धीर । सो धोखा विरचे नहीं, सतगुरु मिलहि कबीर ॥ इति श्री प्रथमखण्ड गुरुमहिमा समाप्त

अथ गुरुदेवकी महिमा प्रारंभः

द्वितीय खण्ड

गुरुदेवकी महिमा बरणौ । जे गुरु देव तुम्हारी शरणों ॥ गावत जे गुण पार न पावे । ब्रह्मा शंकर शेष गुण गावे ॥ प्रथमहि रगुण ऐसा कीन्हा । तारक मंत्र रामको दीन्हा ॥ माता तिलक दिया सरूपा । जाको बन्दे राजा औ भूपा ॥ ज्ञानगुरु उपदेश बताया । दया धर्मकी राह चिन्हाया ॥ जीव दया घटहीमें होई । जीव दया ब्रह्म है सोई ॥ गुरुसे आधीन चेला बोले । खरा शब्द उर अन्तर खोले ॥ स्वारा मिशरी बचने स्वमें । गुरुके चरणों चेला रमें ॥ भीतर हिरदे गुरुसों भले । ताके पीछे रामहिं मिले ॥ गुरु रीझेसो कीजे कामा । ताके पीछे रामहिं रामा ॥ शिष सरस्वतीगुरु यमुना अङ्गा । राम मिले सब सरिता गङ्गा ॥ चेला गुरुमें गुरुमें राम । भक्ति महातम न्यारा नाम ॥ गुरु आज्ञा निरबाहें नेम । तब पावे सरवज्ञी प्रेम ॥ सरवज्ञी राम सकल घट सारा । है सबही में सब सों न्यारा ॥ ऐसी जाने मनमें रहै । खोजे बूझे तासो कहै ॥

( ५४ )

बोधसागर

गुरुकी महिमा संक्षेप भनी । गुरुकी महिमा अनंत घनी ॥ औतार धरी हरि गुरु करे । गुरु किये तब नारद तरे ॥ साख पुरातम ऐसी सुनी । बात हमारी गुरु चरणों बनी ॥ कीड़ी जैसा मैं हों दासा । पडा रहा गुरु चरणों पास ॥ गुरु चरणों राखों विश्वास । गुरुहि पुरावे मनकी आसा ॥ सारखी-गुरु गोविन्द अरु शिष मिलि, कीन्हा भक्ति विवेक ॥

तिरबेनी धारा बही, आगै गङ्गा एक ॥

गुरुकी महिमा अनंत है, मोसो कही न जाय ।

तन मन गुरुको सौंपिकै, चरणों रहों समाय ॥

इति श्रीद्वितीय खण्ड गुरु महिमा समाप्त

अथ गुरुमहिमा प्रारंभः

तृतीयखण्ड

गुरु सतपद भजु अमृतबानी । गुरु बिनु नहीं रे प्राणी ॥ गुरु हैं आदि अन्तके दाता । गुरु हैं मुक्ति पदके दाता ॥ गुरु गङ्गा काशिहि स्थाना । चारवेद गुरुगमसे जाना ॥ अरसठ तीरथ भ्रमि २ आवे । सो फल गुरुके चरणों पावे ॥ गुरुको तजै भजै जो आना । ता पशु याको फोकट ज्ञाना ॥ गुरु पारस परसे जो कोई । लोहाते जिव कश्चन होई ॥ शुक्र गुरु किये जनकरुवैदेही । वो भै गुरुके परम सनेही ॥ नारद गुरु प्रहलाद पढाये । भक्तिहेतु जिन दर्शन पाये ॥ काकभुशुंडि शंभु गुरु कीन्हा । अगम निगम सब कहि दीन्हा ॥ ब्रह्मा गुरु अग्निको कियेऊ । होम यज्ञ जिन यज्ञ दियेऊ ॥ वशिष्ठ मुनिगुरुकियेरघुनाथा । पाये दर्शन भये सनाथा ॥ कृष्ण गये दुर्वासा शरणा । पाये भक्ति जब तारन तरना ॥

प्रारंभिक पृष्ठ (कबीर चरित्र बोध)

सुमिरनबोध

( ५५ )

नारद उपदेश धिमरसे पाये । चौरासीसे तुरत बचाये ॥ गुरु कह सोई है सांचा । बिलु परचे सेवक है काँचा ॥ गुरु सामरथ सबके पारा । गहे शरण उतरे भवपारा ॥ कहैं कबीर गुरु आप अकेला । दशो औतार गुरूका चेला ॥

सारखी-राम कृष्णसों को बड़ा, तिनहू तो गुरु कीन्ह ।

तीन लोकके वे धनी, सो गुरु आगे अधीन ॥

हरिसेवा युगचार हैं गुरु सेवा पल एक ।

तासु पटतर ना तुले, संतन किया विवेक ॥

अथ प्रचलित गुरुमहिमा कबीर दर्शन लाइब्रेरीके संस्थापक कबीरपंथी भारतपथिक स्वामी श्रीयुगलानन्दद्वारा संगृहीत संशोधित और सम्पादित ।

इति श्रीतृतीय खण्ड गुरुमहिमा समाप्त

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श्रीः

बोध—सागर

( कबीर चरित्र बोध प्रारंभ )

भारतपथिक कबीर पंथी—

स्वामी श्रीयुगलानन्द द्वारा संशोधित

खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन,

बम्बई-४

नं. ११ बोधसागर

संस्करण : फरवरी २०१९, संवत् २०७५

मूल्य : २०० रुपये मात्र ।

© सर्वाधिकार : प्रकाशक द्वारा सुरक्षित

मुद्रक एवं प्रकाशक:

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कबीर चरित्र बोध

सत्यनाम

A black and white woodcut-style illustration of a bearded man, likely a saint or guru, seated in a meditative posture on a raised platform. He wears a tall, pointed hat and a long robe, holding a rosary. A large, ornate umbrella is held over him, and a small pot sits on the ground to his left. A halo of light surrounds his head.

श्री कबीर साहिब

The image is a very faint, low-contrast scan of a document. In the center, there is a large, ghostly outline of a seated figure, possibly a deity or a historical figure, wearing a crown or headdress. The figure's features are barely discernible. Above the figure, there is some faint, illegible text. Below the figure, there is also some faint, illegible text. The overall appearance is that of a faded or poorly reproduced page.

सत्यमुकृत, आदि अदली, अजर, अचिन्त, पुरुष, मुनीन्द्र, करुणामय, कबीर, सुरति योग संतान, धनी धर्मदास, चुरामणिनाम, सुदर्शन नाम, कुलपति नाम, प्रबोध गुरुबालापीर, केवल नाम, अमोल नाम, सुरतिसनेही नाम, हक्क नाम, पाकनाम, प्रकट नाम, धीरज नाम, उग्र नाम, दया नामकी दया, वंश- व्यालीसकी दया

अथ श्रीबोधसागरे

समत्रिशतिस्तरंगः

कबीर चरित्र बोध प्रारम्भः

दोहा-गुरु कबीर जग विदित है, भक्त मुक्ति दातार । जिव मुक्तावन कारने, आये जगत मैझार ॥ कीन्ह चरित नाना जगत, सोई करो बखान । परमानन्द यश पाइ है, नहिं पावा कोइ आन ॥ उभय आनंदके प्राप्तिको, साधन अहै अनूप । गुरु चरित गायन करी, होवे हंसन भूप ॥

( १७९० )

बोधसागर

सत्य पुरुषकी आज्ञा

सत्यपुरुषने ज्ञानीजीसे कहा कि, ऐ ज्ञानीजी ! काल पुरुषने समस्त जीवोंको फँसाकर मार लिया, सब जीव भटक भटक कर कालकी फाँसीमें पड़ गये, कोई जीव मेरे लोकमें नहीं आता मैंने सुकृति जी (धर्मदास) को सत्य पंथके प्रचारके लिये पृथ्वी पर भेजा था—उनको कालपुरुषने धोखा देकर लोक वेदमें फँसा लिया और धर्मदासजी सत्यपुरुषकी भक्तिको छोड़कर कालपुरुषकी भक्तिमें लग गये। इस कारण आप पृथ्वी पर जाओ और सुकृतिजीको चेताकर मुक्तिपंथ पृथ्वीपर प्रकट करो। तब ज्ञानीजी सत्यपुरुषकी आज्ञा शिरोधार्य कर दंडवत् प्रणाम करके सत्यलोकसे बिदा हुए।

कबीर साहिबका काशीमें प्रकट होना

सम्बत् चौदह सौ पचपन विक्रमी ज्येष्ठ सुदि पूर्णिमा सोमवारके दिन सत्यपुरुषका तेज काशीके लहर तालाबमें उतरा, उस समय पृथ्वी और आकाश प्रकाशित हो गया। उस समय अष्टानंद वैष्णव उस तालाब पर बैठे थे। वृष्टि हो रही थी, बादल आकाशमें घिरे रहनेके कारण अंधकार छाया हुआ था, और बिजली चमक रही थी, जिस समय वह प्रकाश तालाबमें उतरा उस समय समस्त तालाब जगमग जगमग करने लगा और बड़ा प्रकाश हुआ। वह प्रकाश उस तालाबमें ठहर गया और प्रत्येक दिशाएँ जगमगाहटसे परिपूर्ण हो गयीं और इस आश्चर्यमय प्रकाशको देखकर अष्टानंदजी आश्चर्यान्वित हुए। प्रकाशके फैलते ही मयूर चकोर आदि नाना प्रकारके पक्षी बोलने चहचहाने लगे, कमल तथा नीलकमलके पुष्प लहलहाने और भँवरे गूँजने लगे। अष्टानन्दजीने जो उस तेजके

कबीर चरित्रबोध

( १७९१ )

देखा तो आनकर उसका समस्त विवरण रामानन्द स्वामीसे कहा कि, हे स्वामीजी ! मैंने लहर तालाबमें एक ऐसी ज्यो-तिका निरीक्षण किया है जिससे मुझको अत्यन्त आश्चर्य हुआ है। उस ज्योतिको आकाशसे उतरते और लहर तालाबमें ठहरते देखा जब वह प्रकाश उस तालाबमें उतरा तब तालाब ज्योतिसे प्रकाशित हो गया। यह बात सुनकर रामानन्द स्वामीने अष्टा-नन्दसे कहा कि, वह प्रकाश जो तुमने देखा था उसका कौतुक शीघ्र ही तुम्हारे देखने तथा सुननेमें आवेगा।

वह तेज बालकके आकारमें हुआ उस जलके ऊपर कम-लोंके पुष्पोंमें उतराने और बालकोंके सहश हाथ पाव फेंकने लगा वह तेज अपनी समस्त प्रभाओंको पृथक् करके मनुष्यके बच्चेके आकारमें दिखलायी दिया।

नीरूके पूर्वजन्मका वृत्तान्त

श्वपच सुदर्शनके जो माता पिता थे वे दोनों भङ्गीका शरीर छोड़कर ब्राह्मण ब्राह्मणी हुए थे, और चँदबोर नगरमें रहते थे, इनके प्रेमसे कबीर साहब इनके घर गये और उनको सुक्ति-मार्ग बतलाने लगे, परन्तु उन्होंने ध्यान नहीं दिया, तब सत्य गुरु उनके गृहसे अन्तर्धान हो गये। इसके उपरान्त वे दोनों ब्राह्मण ब्राह्मणी परलोकगामी होकर काशीमें जोलाहा जोलाही हुए और उनका नाम नीरू और नीमाह्वाद है। सुदर्शनजीके माता पिता तीसरे जन्ममें जोलाहा जोलाही हुए थे। इनको सुक्तिप्रदान करनेके निमित्त पुनः कबीर साहब उनके घर गये और काशीमें लहर तालाबमें प्रकट हुए।

कबीर साहबका नीमाको मिलना

नीरू जोलाहा काशी नगरीमें रहता था, एक दिवस वह अपनी

( १७९२ )

बोधसागर

स्त्री सहित चला आता था, देवात् वह लहर तालाबके सर्मी-पसे होकर निकला । उसकी स्त्री नीमा प्यासी हुई और जल पीनेके निमित्त उस तालाब पर गयी वहीँ देखा तो एक बड़ा ही सुन्दर बालक कमलोंमें पैरता फिरता है और हाथ पाँव फेंक रहा है । उस बालकको देखकर नीमा तालाबके भीतर घुसकर उस बच्चेको अपनी गोदमें उठा लिया और तालाबसे बाहर निकलकर नीरूके पास गयी ।

नीमा और नीरूकी बातचीत

तब पूछा कि, यह किसका लड़का ले आयी है ? तब नीमाने उत्तर दिया कि, मैंने तालाबमें पाया है । नीरूने कह दिया कि, यह लड़का जहाँसे तू ले आयी है वहाँ ही रख आ नहीं मालूम यह किसका लड़का है । तब उस स्त्रीने उत्तर दिया कि, ऐसा सुन्दर बालक तो मैं कदापि नहीं फेंकूँगी । तब नीरूने कहा कि, लोग मुझको हँसेंगे और ठट्टाएँ उड़ावेंगे कि सुकलावेहीमें नीरू अपनी स्त्रीके साथ एक पुत्र भी ले आया, इस कारण इस बालकको तू फेंकि आ । इस बातको जब नीमाने स्वीकार नहीं किया तब नीरू अपनी स्त्रीको मारने पीटनेपर प्रस्तुत हुआ और झिड़कियाँ देने लगा । अब वह स्त्री खड़े खड़े अपने चित्तमें चिंता करने लगी । इतनेमें वह बालक स्वयम् बोल उठा कि, ऐ नीमा मैं तेरे पूर्वजन्म प्रेमके कारण तेरे घर आया हूँ । तू मुझको मत फेंक और अपने घर ले चल यदि मेरा कहना मानोगी तो मैं तुम्हें आवागमनके फेरेसे छुड़ा दूँगा और मुक्तिप्रदान करूँगा, समस्त दुःख संताप हर कर और वह शब्द बतलाऊंगा कि, जिससे कभी कालके फंदेमें नहीं पड़ेगी ।

कबीर चरित्रबोध

( १७१३ )

जब वह बालक इस प्रकार बोला तो उसकी बात सुनकर नीमा निर्भय हो गयी, बालककी बात सुनकर नीरू भी कुछ नहीं बोला । अब वे दोनों प्रसन्नतापूर्वक उस बालकको लेकर अपने घर आये । जब काशीके लोगोंने देखा कि, नीरू तो अपनी स्त्रीके साथ एक पुत्र भी ले आया तो लोग ठट्टा और हँसी करने लगे । तब नीरूने लोगोंको समझाया कि, हमने यह बालक लहर तालाबमें पाया है, बालकका कुल विवरण कह सुनाया, फिर बुलाकर पूछने लगा कि इस बालकका क्या नाम रखना चाहिये । ब्राह्मण पत्रा लिये विचार ही रहे थे, इतनेमें वह बालक स्वयम् बोल उठा कि ऐ ब्राह्मण ! मेरा नाम कबीर है, दूसरा नाम रखनेकी चिन्ता मत करो । यह बात सुनकर सब लोग अत्यन्त चकित हुए कि यह बालक तो स्वयम् ही अपना नाम बतलाता है यह कैसा बालक है यह किसी सिद्धका अवतार है कि कोई देवता है ? काशीमें इस बातकी चर्चा घर घर होने लगी कि, नीरूके घरमें एक बच्चा आया है सो बातें करता है । फिर नीरूने काजीको बुलाया और पूछा कि, इस बालकका क्या नाम रखना चाहिये । जब काजी किताब खोलकर बालकका नाम स्थिर करने लगा तब कुरानके मध्यमें बालकके चार नाम निकले कबीर १ अकबर २ किबरा ३ किबरिया ४ ये चार नाम देखकर काजी चुप हो रहा और अपने दातोंके नीचे अँगुली दबाने लगा । फिर फिर वह कुरान खोलकर देखता तो समस्त कुरान उसको उन्हीं नामोंसे भरा दिखाई दिया । अब काजीके मनमें अत्यन्त सन्देह उत्पन्न हुआ

( १७९४ )

बोधसागर

१०

कि, ये चारों नाम तो खुदाके हैं अब क्या करें हमारे धर्मकी अप्रतिष्ठा हुई ।

गरीबदासजीकी पारख, अंगकी सखियाँ

काशीपुरको कस्द किया, उत्तरे अधर अधार । मोमिनका मुजरा हुआ, जङ्गलमें दीदार ॥ कोटि किरन शशि भानु सुधि, आसन अधर विमान । परसत पूरण ब्रह्मको, शीतल पिंड औ प्रान ॥ गोद लिया मुख चूमिके, हेम रूप झलकन्त । जगर मगर काया करे, दमके पद्म अनन्त ॥ काशी उमडी गुल भया, मोमिनका घर घेर । कोइ कह ब्रह्म विष्णु हैं, कोइ कहे इंद्र कुबेर ॥ कोइ कह वरुण धर्मराय हैं, कोइ कोइ कहता ईश । सोलह कला सुभान गति, कोई कहै जगदीश ॥ भगति मुक्ति ले उत्तरे, मेटन तीनों ताप । मोमिन घर डेरा लिया, कहै कबीरा बाप ॥ दूध पीवै नहिं अन्न भखे, नहीं पलने झूलंत । अधर आसन है ध्यानमें, कमल खिला फूलंत ॥ कोइ कहे छल ईश्वर नहीं, कोइ किन्नर कहलाय । कोइ कहे गुण ईशका, ज्यों ज्यों मारिये साय ॥ काशीमें अचरज भया, गयी जगतकी निंद । ऐसे दूल्हा उत्तरे, ज्यों कन्या बरबिंद ॥ खल्क मुल्क देखन गया, राजा परजा रीत । जम्बूद्वीप जहानमें उत्तरे, शब्द अतीत ॥

१ सकल कुरान कबीर है, हरफ लिखे जो लेख ।

काशी के काजी कहै, गयी दीनकी टेक ॥

११

कबीर चरित्रबोध

( १७९५ )

दुनी कहे यह देव है, देव कहै यह ईश । ईश कहै परब्रह्म है, पूर न विश्वे वीश ॥ काजी गये कुरान ले, धर लड़केको नाँउ । अक्षर अक्षरमें पुरे, धन्य कबीर बल जाँउ ॥ सकल कुरान कबीर है, हरफ लिखे जो लेख । काशीके काजी कहै, गयी दीनकी टेक ॥ शिव उतरे शिवपुरीसे, अविगत नदन विनोद । महके कमल खुशी भया, लिया ईशको गोद ॥ नजर नजरसे मिल गयी, किया दर्श परणाम । धन्य मोमिन धन्य पूरना, धन्य काशी निष्काम ॥ सात बार चर्चा करे, बोलै बालक बैनु । शिव सो कर मस्तक धरचो, ला मोमिन यक घेनु ॥ अनग्यावरको दुहतही, दूध दिया ततकाल । पीयो बालक ब्रह्म गति, वहां शिव भये दयाल ॥ कष्ट मानुषके जब भई, नित दुनिया वर देहि । चरण चले तत पुरीमें, यहि शिक्षा नित लेहि ॥

जब काशीके सब काजियोंको यह समाचार मिला तब वे इस समाचारको सुनकर बड़े ही चिन्तित हुए कि, यह कैसा आश्चर्य अद्भुत व्यापार है कि, समस्त कुरानमें कबीर ही कबीर दिखाई देता है । अब कौन उपाय करना चाहिये कि, ऐसे दरिद्री जोलाहेके पुत्रका इतना बड़ा नाम न रखवा जावे । फिर फिर कुरान खोलकर देखते तो यही चारों नाम निकलते । इन चारों नामोंके सिवाय और कुछ नहीं निकला । तब काशी- के काजियोंने आपसमें सम्मति की और नीरूसे कहा कि, ऐ नीरू ! तू इस बालकको अपने घरके भीतर लेजाकर मार